हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 230 ☆ ज्ञानवर्धक कविता पहेली —- बूझो तो जानें… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 230 ☆ 

ज्ञानवर्धक कविता पहेली —- बूझो तो जानें ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

 देवनदी वह कौन है बच्चो

जिसको माँ कहते हैं।

मंदाकिनी भी कहें उसे हम

जीव अनेकों रहते हैं।

 *

अमरतरंगिनी, भागीरथी है

जिसका जल अमृत कहलाता।

देवपगा स्नान जो करते

उनका मन पावन हो जाता।

 *

स्वर्गापगा, जाह्नवी कहते

जिसे भगीरथ धरा पर लाए।

सुरसरिता कहे जिसे हम

पूर्वज जिसमें तर जाएँ।

 *

ध्रुवनंदा है वही विक्षुपगा

वही पूज्य है नदीश्वरी।

सत्य, सनातन वही संस्कृति

वही है बच्चो सुरसरि।

 *

सुरधुनि है भारत की माता

गंदा इसको कभी न करना।

पाप जो लेते अपने सिर पर

उनको दंड पड़ेगा भरना।

उत्तर- माँ गंगा नदी।

 डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #258 – कविता – ☆ चलो गुनगुनाएँ हम… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”   महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम बाल गीत चलो गुनगुनाएँ हम” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #258 ☆

चलो गुनगुनाएँ हम☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

एक गीत गाएँ हम

जीवन की बगिया में

चलो खिलखिलाएँ हम।

*

भिन्न-भिन्न जाति पंथ

है अनेक धर्म ग्रंथ

सबका है एक मंत्र

प्रेम प्यार पाएँ हम।

एक गीत गाएँ हम।।

*

मातृभूमि का वंदन

माटी इसकी चंदन

इसका सम्मान करें

शीश पर लगाएँ हम।

एक गीत गाएँ हम।।

*

तुलसी मीरा कबीर

गाई दीनन की पीर

संतो के पावन पद

सबको सुनाएँ हम।

एक गीत गाएँ हम।।

*

हम सब मिल खूब पढ़ें

आपस में नहीं लड़ें

भेदभाव भूल,

ऊंच-नीच को मिटाएँ हम

एक गीत गाएँ हम

*

सीमा पर है जवान

खेतों में है किसान

योगदान को इनके

नहीं भूल पाएँ हम।

एक गीत गाएँ हम।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 82 ☆ क्या है जीवन… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “क्या है जीवन…” ।

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 82 ☆ क्या है जीवन… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

   क्या है जीवन

   जैसे उड़ता हुआ परिन्दा

   खोज रहा है नीड़।

 

   रिश्ते टूटी डाल

   घोंसलों का अपनापन

   बुनता रहा भरोसा

   सन्नाटों में आँगन

 

   लुटता जीवन

   झुका हुआ होकर शर्मिंदा

   टूट चुकी है रीढ़।

 

   वक्त कँटीले ख्वाब

   आँख राहें पथरीली

   मोड़ हादसे पढ़ें

   हवा भाषा जहरीली

 

   कटता जीवन

   कोलाहल पीकर है जिंदा

   उगा रहा है भीड़।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हमने तो… ☆ डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक ☆

डॉ जसप्रीत कौर फ़लक

☆ कविता ☆ हमने तो… ☆ डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक 

हमने कुछ और ढूँढा था तुझमें

     हमने  समझा था 

प्यार का समन्दर हो तुम

    ख़बर नहीं  थी 

उजड़े सहरा का मंज़र हो तुम

    हम  तो   समझे   थे 

कि दिल   के   ख़ला को  भर जाओगे तुम

      यह   ख़बर  नहीं   थी

कि  और   भी तन्हा कर जाओगे तुम

 हमने तो कुछ और ढूँढा था तुझमें

        

हम  तो  समझे   थे

 कि इश्क़ की हक़ीक़त   हो   तुम

      यह   ख़बर  नहीं   थी 

  कि  रेत  पे लिखी इबारत हो तुम

 

हमने तो कुछ और ढूँढा था तुझमें

     हम तो समझे  थे 

कि प्यार पहली की शबनम हो तुम

     यह  ख़बर  नहीं  थी 

कि  पतझड़ का मौसम  हो  तुम

हमने तो कुछ और ढूँढा था तुझमें

 

हम  तो  समझे  थे 

कि प्यार में भीगा अहसास हो तुम

     यह ख़बर नहीं थी

कि नदी नहीं सिर्फ़ प्यास  हो  तुम

हमने तो कुछ और ढूँढा था तुझमें

 

हम तो समझे थे

कि तेरी  आँखों  में

कशिश, प्यार का काजल होगा

यह  ख़बर  नहीं   थी 

कि  तेरा  दिल

अतीत के दुखों से बोझल होगा

हमने तो कुछ और ढूँढा था तुझमें

 

हम  तो  समझे  थे 

कि  तुम्हें   सिर्फ़ एक  तारे  से   मुहब्बत  है

यह    ख़बर  नहीं   थी 

कि  तुम्हें  तो फ़लक सारे से मुहब्बत है।

 डॉ. जसप्रीत कौर फ़लक

संपर्क – मकान न.-11 सैक्टर 1-A गुरू ग्यान विहार, डुगरी, लुधियाना, पंजाब – 141003 फोन नं – 9646863733 ई मेल – [email protected]

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 86 ☆ महज़ खादी पहिनने से कोई गांधी नहीं बनता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “महज़ खादी पहिनने से कोई गांधी नहीं बनता“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 86 ☆

✍ महज़ खादी पहिनने से कोई गांधी नहीं बनता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ये खंज़र और ये  ढालें कहानी अपनी कहती हैं

किसी की मद भरी चालें कहानी अपनी कहती है

 *

नई कोपल से पेड़ों का पुराना पन नहीं छिपता

तने की खुरदरी छालें कहानी अपनी कहती हैं

 *

ये दावा झूठ पर्दाफाश होना है गुनाहों का

पुलिस की जाँच पडतालें कहानी अपनी कहती हैं

 *

छुपा लो मुफ़लिसी का हाल लेकिन वो नहीं छुपता

परोसी रोटियाँ दालें कहानी अपनी कहती हैं

 *

महज़ खादी पहिनने से कोई गांधी नहीं बनता

तुम्हारी रेशमी शालें कहानी अपनी कहती हैं

 *

उठाकर सर वजनदारी नहीं किरदार की दिखला

लचकती फल लदी डालें कहानी अपनी कहती है

 *

किन्ही को बात गोली से भी बढ़कर ज़ख्म करती है

किन्ही की मोटी पर खालें कहानी अपनी कहती हैं

 *

रिआया है अरुण खुशहाल पाते हक़ सभी अपना

मग़र ये रोज़ हड़तालें कहानी अपनी कहती है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # 82 – सिसकियाँ समझाएँगी… ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकेंगे।  आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना – सिसकियाँ समझाएँगी।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # 82 – सिसकियाँ समझाएँगी… ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

इस बिदाई की व्यथा को सिसकियाँ समझाएँगी 

सबकी आँखों में घिरी ये बदलियाँ समझाएँगी

तुम, विरह की वेदना को, जानना चाहो अगर 

रेत पर व्याकुल तड़पती, मछलियाँ समझाएँगी

 *

काफिला होगा बहारों का, तुम्हारे साथ में 

तब तुम्हारी शोहरत को, तितलियाँ समझाएँगी

 *

हम सुमित्रों की दुआएँ, साथ में होंगी सदा 

महफिलों में गूंजती, स्वर लहरियाँ समझाएँगी

 *

अंजुमन में, चंद चेहरे याद आएँगे सदा 

चाहने वालों से खाली, कुर्सियाँ समझाएँगी

 *

जब भी वापस आओगे, पथ पर बिछे होंगे नयन 

राह तकती आपकी, ये खिड़कियाँ समझाएँगी

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 155 – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपके “मनोज के दोहे। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 155 – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆

पानी जब हो कुनकुना, तभी नहाते रोज।

काँप रहा तन ठंड से, प्राण प्रिये दे भोज।।

धूप सुहानी लग रही, शरद शिशिर ऋतु मास।

बैठे कंबल ओढ़ कर, गरम चाय की आस।।

नर्म दूब में खेलतीं, रोज सुबह की बूँद।

सूरज की किरणें उन्हें, सिखा रहीं हैं कूँद।।

 *

ठिठुरन बढ़ती जा रही, ज्यों-ज्यों बढ़ती रात।

खुला हुआ आकाश चल, मिल-जुल करते बात।।

 *

सूरज की अठखेलियाँ, दिन में करे बवाल।

शीत लहर का आगमन, तन-मन है बेहाल।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पी ? ?

वह अबाध

बह रहा है,

लहरों का कंपन

भीतर ही भीतर

साँस ले रहा है,

उसके प्रवाह को

बाधा मत पहुँचाना,

समुद्र की शांति होती है;

सच्चे आदमी की चुप्पी..!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रात: 9:37 बजे, 26 नवम्बर 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥  मार्गशीर्ष साधना 16 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक चलेगी। साथ ही आत्म-परिष्कार एवं ध्यान-साधना भी चलेंगी💥

 🕉️ इस माह के संदर्भ में गीता में स्वयं भगवान ने कहा है, मासानां मार्गशीर्षो अहम्! अर्थात मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस साधना के लिए मंत्र होगा-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

  इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दत्त जयंती मनाई जाती है। 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 217 – कथा क्रम (स्वगत)… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपका भावप्रवण कविता – कथा क्रम (स्वगत)।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 217 – कथा क्रम (स्वगत)… ✍

(नारी, नदी या पाषाणी हो माधवी (कथा काव्य) से )

क्रमशः आगे…

तुम्हारी सीमाएँ – मर्यादा?

ऋषिवर,

तुम भूल गये

साध्य और साधन की

पवित्रता ।

भूल गये

श्वेत केतु का संकल्प

उसकी व्यवस्था ।

सत्य मान बैठे

ऋषि का वरदान

अक्षत कौमार्य का विधान!

आवश्यक नहीं थी

गुरु दक्षिणा,

झेल लेते

गुरु का क्रोध,

उनका शाप ।

क्षमा करना

आपके द्वारा किये

कृत्य को

आज की भाषा में

‘दलाली’ कहते हैं

जिसका ध्येय

नारी की अस्मिता की मान रक्षा नहीं

मात्र धन होता है।

धिक्कार है तुम्हें।

उत्तर दे सको तो देना

अनुत्तरित है

मेरा प्रश्न !

© डॉ राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 217 – “उसकी कहीं मंसा…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत उसकी कहीं मंसा...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 217 ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “उसकी कहीं मंसा...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

पानबाई

जलती अखण्ड

जोत तुम में

ढूँडो न अब

दिया सलाई

पान बाई

 

वह जो वासी

है घट-घट का

पता रही पूछ

भला पनघट का

 

धरी नही रह

जाये चतुराई

पानबाई

 

ढूंड रही है

यहाँ हर काया

तेरी ही तेरी

तो है माया

 

फिर क्या पर्वत

और क्या खाई

पानबाई

 

है तो यह

उसकी कहीं मंसा

उड़ गया किधर

को है वह हंसा

 

छोड़ छाड़ कर

अपनी ठकुराई

पानबाई

 

* पानबाई = प्राणवायु, मंसा= मंशा, जोत = ज्योति

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-12-2024

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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