हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलमा की कलम से # 50 ☆ गीत – हो मुबारक नया साल… ☆ डॉ. सलमा जमाल ☆

डॉ.  सलमा जमाल 

(डा. सलमा जमाल जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। रानी दुर्गावती विश्विद्यालय जबलपुर से  एम. ए. (हिन्दी, इतिहास, समाज शास्त्र), बी.एड., पी एच डी (मानद), डी लिट (मानद), एल. एल.बी. की शिक्षा प्राप्त ।  15 वर्षों का शिक्षण कार्य का अनुभव  एवं विगत 25 वर्षों से समाज सेवारत ।आकाशवाणी छतरपुर/जबलपुर एवं दूरदर्शन भोपाल में काव्यांजलि में लगभग प्रतिवर्ष रचनाओं का प्रसारण। कवि सम्मेलनों, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जिनमें भारत सरकार की पत्रिका “पर्यावरण” दिल्ली प्रमुख हैं में रचनाएँ सतत प्रकाशित।अब तक 125 से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार/अलंकरण। वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति, पाँच संस्थाओं की संरक्षिका एवं विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन।

आपके द्वारा रचित अमृत का सागर (गीता-चिन्तन) और बुन्देली हनुमान चालीसा (आल्हा शैली) हमारी साँझा विरासत के प्रतीक है।

आप प्रत्येक बुधवार को आपका साप्ताहिक स्तम्भ  ‘सलमा की कलम से’ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण बुन्देली गीत “नाचो मोर…”।

✒️ साप्ताहिक स्तम्भ – सलमा की कलम से # 49 ✒️

?  गीत – हो मुबारक नया साल…  ✒️  डॉ. सलमा जमाल ?

दो हज़ार बाइस

आपको पुराना लगे ।

तेइस का सवेरा

सभी को सुहाना लगे ।।

 

गिरती हुई ईंट को

फ़िर से लगायें आओ ।

हमें बीती यादों का

हुज़ूम फ़साना लगे ।।

 

नव वर्ष से मिल जायें

सबको ख़ुशियों के अंबार ।

पिछले सारे ग़म

केवल एक बहाना लगें ।।

 

भुलाओ गिले-शिकवे

हो मुबारक नया साल ।

पुकारो सलमा सपनों

को जो तराना लगे ।।

© डा. सलमा जमाल

298, प्रगति नगर, तिलहरी, चौथा मील, मंडला रोड, पोस्ट बिलहरी, जबलपुर 482020
email – [email protected]

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Poetry ☆ ‘चयन’… श्री संजय भारद्वाज (भावानुवाद) – ‘Selection…’ ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi poem “~ चयन ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

श्री संजय भारद्वाज जी की मूल रचना

? संजय दृष्टि – चयन ??

समुद्र में अमृत पलता,

समुद्र ही हलाहल उगलता,

शब्दों से गूँजता ऋचापाठ,

शब्द ही कहलाते अवाच्य,

चिंतन अपना-अपना,

चयन भी अपना-अपना!

© संजय भारद्वाज 

रात्रि 11.31, 14.9.20

मोबाइल– 9890122603, संजयउवाच@डाटामेल.भारत, [email protected]

☆☆☆☆☆

English Version by – Captain Pravin Raghuvanshi

? ~ Selection ~ ??

Ocean nurtures the nectar,

Ocean only oozes out the ‘Halahal’, – the poison,

Words echo the

‘Richas’- holy hymns of the Veda

Words only are termed as unspeakable;

Contemplation of thoughts is very own,

and so is its choice of selection.

~Pravin

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “प्रियतम…” ☆ श्रीमति प्रेमलता उपाध्याय ‘स्नेह’ ☆

श्रीमति प्रेमलता उपाध्याय ‘स्नेह’

(श्रीमति प्रेमलता उपाध्याय ‘स्नेह’ जी  द्वारा गणित विषय में शिक्षण कार्य के साथ ही हिन्दी, बुन्देली एवं अंग्रेजी में सतत लेखन। काव्य संग्रह अंतस घट छलका, देहरी पर दीप” काव्य संग्रह एवं 8 साझा संग्रह प्रकाशित। हम समय समय पर आपकी रचनाएँ अपने पाठकों से साझा करते रहेंगे।  आज प्रस्तुत है आपकी कविता “प्रियतम…”।) 

☆ “प्रियतम…” ☆ श्रीमति प्रेमलता उपाध्याय ‘स्नेह’ ☆

चातक  विहग   से   तृषित    अधरों    पर,

स्नेह अभिसिंचन कर संतृप्त कर पाऊं ।

 

ह्रदय  सिंधु  में  उच्चाटित   उर्मियों   के,

आवेग में मैं पूर्णतः समाहित हो जाऊं।

 

देह को आबद्ध करते स्नेहिल आलिंगन में ,

कोमल   मधुर   स्वप्न   लिए   सो   जाऊं।

 

प्रीत की मादक सुगंध लिए रक्तिम कपोंलों पर,

हौले   से    तरंगित  उन  श्वासों  में  खो  जाऊं।

 

कल्पनाओं  की  उड़ान  नहीं इतनी ऊंची,

कि तुझे सदा के लिए कल्पित कर जाऊं।

 

मेरे शब्द बिंब  छंद प्रतीक कथानक सब कहे,

बस  मिलन  के  विरह  के   गीत तेरे ही गाऊं।

 

इस   जन्म  उस  जन्म  हर  जन्म  और,

जन्म जन्मांतर तक बस तेरी हो जाऊं।

 

पलकें झपकाऊँ तो प्रतिबिंब हो तुम्हारा,

नयन  खोलूँ  तो  साक्षात्  तुम्हें  ही पाऊं। 

 

नींद के बोझ से शिथिल पलकों पर बस,

साथी   मधुरिम   स्वप्न   तेरे   धर   जाऊं।

 

किंचित भी ओझल होना  मत  प्रियतम,

तन मन उपवन सब वासंती कर जाऊं। 

 

मधुमास की पारिजात भीगी मिलन यामिनी,

पिया    अब    तो    नाम    तेरे    कर    जाऊं।

 

निशीथ  चंद्र के धवल चांदनी चुंबन,

तेरी   अलकों  पलकों  पे धर जाऊं।

© प्रेमलता उपाध्याय ‘स्नेह’ 

संपर्क – 37 तथास्तु, सुरेखा कॉलोनी, केंद्रीय विद्यालय के सामने, बालाकोट रोड दमोह मध्य प्रदेश

ईमेल – plupadhyay1970@gmail:com  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 62 – मनोज के दोहे… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 62 – मनोज के दोहे… 

1 विग्रह

विग्रह शालिगराम का, देव विष्णु प्रतिरूप।

पूजन अर्चन हम करें, दर्शन सुखद अनूप ।।

2 वितान

उड़ने को आकाश है, फैला हुआ वितान।

पंछी पर फैला उड़े, मानव उड़ें विमान।।

3 विहग

उड़ें विहग आकाश में, नापें नभ का छोर।

शाखों पर विश्राम कर, उड़ते फिर नित भोर।।

4 विहान

नव विहान अब हो रहा, भारत में फिर आज।

विश्व पटल पर छा गया, सिर में पहने  ताज।।

5 विवान

किरणें बिखरा चल पड़ा, रथ आरूढ़ विवान।

प्राणी को आश्वस्त कर, गढ़ने नया विहान।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कालचक्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

श्री भास्कर साधना आरम्भ हो गई है। इसमें जाग्रत देवता सूर्यनारायण के मंत्र का पाठ होगा। मंत्र इस प्रकार है-

💥 ।। ॐ भास्कराय नमः।। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – कालचक्र ??

(कवितासंग्रह ‘योंही’ से।)

उम्र की दहलीज पर

सिकुड़ी बैठी वह देह,

निरंतर बुदबुदाती रहती है,

दहलीज की परिधि के भीतर

बसे लोग अनपढ़ हैं,

बड़बड़ाहट और बुदबुदाहट में

 फ़र्क नहीं समझते!

मोतियाबिंद और ग्लुकोमा के

चश्मे लगाए बुदबुदाती आँखें

पढ़ नहीं पातीं वर्तमान,

फलत: दोहराती रहती हैं अतीत!

मानस में बसे पुराने चित्र

रोक देते हैं आँखों को

वहीं का वहीं,

परिधि के भीतर के लोग

सिकुड़ी देह को धकिया कर

खुद को घोषित

कर देते हैं वर्तमान,

अनुभवी अतीत

खिसियानी हँसी हँसता है,

भविष्य, बिल्ली-सा पंजों को साधे

धीरे-2 वर्तमान को निगलता है,

मेरी आँखें ‘संजय’ हो जाती हैं…..,

देखती हैं चित्र दहलीज़ किनारे

बैठे हुओं को परिधि पार कर

बाहर जाते और

स्वयंभू वर्तमान को शनै:-शनै:

दहलीज के करीब आते,

मेरी आँखें ‘संजय’ हो जाती हैं…..!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 118 – गीत – बजी राग की रणभेरी… ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण गीत – बजी राग की रणभेरी।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 118 – गीत – बजी राग की रणभेरी…  ✍

साँस साँस सुरभित है मेरी

बजी राग की रणभेरी।

 

नाम सुना तो लगा कि जैसे

परिचय बड़ा पुराना

स्वर सुनते ही लगा कि यह तो

है जाना पहिचाना

 

प्राणों में कुछ बजा कि जैसे

बजती है बजनेरी।

 

देखा पहिली बार तुम्हें जब

आकर्षण ने बाँधा

मनमोहन के हृदय पटल पर

कौंध गई थी राधा।

 

पलक झपकने में अब लगती

ज्यों दिनभर की देरी।

 

बाँहों में जब बाँधा तुमको

लगा हुआ आकाशी

अधरों का रस पीकर भी तो

रही आत्मा प्यासी।

 

तेरा मेरा नाता ऐसा

जैसे चाँद चकोरी।

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत # 120 – “सूने अवसर में उमीद…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “सूने अवसर में उमीद।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 120 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ || “सूने अवसर में उमीद…” || ☆

पूछी नहीं कभी लोटे

से अंतर की पीड़ा

शौचालाय को जल

नहीं, बता सरपंची-कीड़ा

 

कैसे हलकू के घर का

कुछ हिस्सा मेरा घर है

पटवारी से पूछो तो

मिलता सीधा उत्तर है

 

तेरे बाबा ने पड़ोस

से साँठगाँठ कर के यह

तहसीली कानून यहाँ

अपने माफिक मीड़ा

 

सुलगे रहे हैअश्रु पतनी

की आँखों में संध्या

इस आधी मियार के

घर में बनी विवश बंध्या

 

छप्पर से रिसरिस कर

ठंडी पवन झरा करती है

सूने अवसर में उमीद

तबसरा किया करती है

 

जी अकुलाता जीवन की

यह भीषण दुश्चिंता

भूख भगादे भवन बनादे

ईश्वर अभियंता

 

पानी की रिमझिम भी अब

इस वक्त यहाँ गिरनी थी

माँग चूँग कर लाई आटा

वह भी है सींड़ा

तबसरा= समीक्षा

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

24-11-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – भूमिका ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

श्री भास्कर साधना आरम्भ हो गई है। इसमें जाग्रत देवता सूर्यनारायण के मंत्र का पाठ होगा। मंत्र इस प्रकार है-

💥 ।। ॐ भास्कराय नमः।। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि – भूमिका ??

उसने याद रखे काँटे,

पुष्प देते समय

अनायास जो

मुझसे, उसे चुभे थे,

मेरे नथुनों में

बसी रही

फूलों की गंध सदा

जो सायास

मुझे काँटे

चुभोते समय

उससे लिपट कर

चली आई थी,

फूल और काँटे का संग

आजीवन है

अपनी-अपनी भूमिका पर

दोनों कायम हैं।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ रुहानी रिश्ते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने ‘प्रवीन  ‘आफ़ताब’’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम भावप्रवण रचना “रुहानी रिश्ते…  

? रुहानी रिश्ते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

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आज़ाद कर दो

इन परिंदों को

खुले आसमां में,

अगर वापस आए,

तो वो तुम्हारे थे…,

वरना समझ लेना

वो कभी थे

ही नहीं तुम्हारे…

 

जो दिल के करीबी रिश्ते

तुम्हें रूहानी लगते थे

हक़ीक़त में,

वो कभी थे ही

नहीं तुम्हारे…!

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 109 ☆ # हिस्सा… # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है दीप पर्व पर आपकी एक भावप्रवण कविता “#हिस्सा …#”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 109 ☆

☆ # हिस्सा … # ☆ 

हमने अपने करीबी मित्र को समझाया

भाई, शराब बुरी चीज है

फिर भी तुम्हें

क्यों अजीज़ है ?

घर, परिवार टूट जाते हैं

लोग सड़क पर

आ जाते हैं

तुम इससे नाता तोड़ो

पीने की आदत छोड़ो

वो बोला –

भाई, पहले कहां पीता था

मस्ती मे जीवन जीता था

फिर –

पहले आई नोटबंदी

फैक्टरी मे हो गई तालाबंदी

फिर आई कोरोना की माहामारी

घर में लाई बेरोजगारी

लॉक डाऊन शहर में लग गया

इस शराब का ग्रहण

हमारे जीवन को लग गया

अब नुक्कड़ पर

सब्जी का ठेला लगाते हैं

थोड़ा बहुत पेट भरने के

लायक कमाते हैं

मंहगाई ने

कमर तोड़ दी है

बीमार पत्नी ने

जीने की आस छोड़ दी है

भूख, गरीबी और बेरोजगारी ने

हमें घेर लिया है

सब रिश्तेदारों ने

मुंह फेर लिया है

जीने की कशमकश में

हर पल

लड़ना पड़ता है

थक हार कर

मजबूरी में पीना पड़ता है

दोस्त,

यह सिर्फ मेरा नहीं

हजारों पीड़ित बेरोजगारों का

किस्सा है

इस चकाचौंध वाले विकास में

हम ढूंढ रहे हैं

हमारा कहां हिस्सा है/

© श्याम खापर्डे

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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