हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ~ ‘परछाइयां…’ ~ ☆ सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री ☆

सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री 

संक्षिप्त परिचय

आप भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की प्रतिनिधित्व में  कई अंतर बैंक, अंतर संस्था आयोजित स्पर्धाओं में आपके सभी सहभाग पुरस्कार से सम्मानित है । विभिन्न बैंक की पत्रिकाओं में आपके लेख और कविताएं प्रकाशित हैं। आकाशवाणी पुणे में आपके काव्यपाठ सत्र प्रसारित हैं। अनुवाद विधा में भी आपका सराहनीय योगदान है।

LWG. मंच से लिटफेस्ट 2.0 से आप जुड़ी है। इस मंच से लिटफेस्ट की हिंदी काव्य स्पर्धा, जनवरी माह की ऑनलाइन काव्य स्पर्धा , फरवरी माह की  हिंदी काव्य लाइव प्रस्तुति, मार्च महीने की ऑनलाइन काव्य स्पर्धा  में आपकी प्रविष्टियों को पुरस्कार और सम्मान प्राप्त है।

☆ ~ ‘परछाइयां…’ ~ ☆ सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री ? ☆

(लिटररी वारियर्स ग्रुप द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार प्राप्त कविता। प्रतियोगिता का विषय था >> “परछाइयां” /Shadows”।)

जिंदगी की दौड़ धूप में चलते-चलते,

मैंने देखा कोई मेरे

कभी साथ तो कभी पीछे और कभी आगे

चल रहा है।

वो अनजाना, अनदेखा था ज़रूर 

पर मित्र और हितैषी सा लगा,

लगा जैसे उसको परवाह है मेरी,

ख्याल मेरा रखना

अपना फ़र्ज़ मान रहा है जो..

 

आश्चर्य हुआ मुझे इस अद्भुत बंधु से,

जो अनेक रूप धारण करते-करते,

ढलती सूरज और दिन की पूर्ति में

कभी अदृश्य भी हो जाता, मानो,

चांद की ठंडक का आनंद मैं लूट सकूं,

प्यार के पलों को पूरी तरह जी सकूं,

चमकती तारों के बीच

खुद की रोशनी मैं जान सकूं,

अपना प्रकाश मैं औरों में बांट सकूं..

 

धूप- छांव का वस्त्र बदलता आसमां,

मेरे इस सखा से भी वस्त्र बदलवाता, 

जो कभी लम्बा और कभी बौना होता,

जताता अपनी कद और आकार से,

जिंदगी के उतार -चढ़ाव का तत्व-

 

मंजिल दूर हो और मार्ग में तपन, 

मुझे चलना है फिर भी ,तो

हो लेता मेरे साथ, मेरी परछाईं बन,

मेरी पहरेदारी के लिए।

मेरी सफलता दर्ज़ करने के लिए…!!

मेरी सफलता दर्ज़ करने के लिए !!!

~ सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री 

© सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री 

पुणे 

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 243 ☆ बाल गीत – मीठी स्वाद निराला… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 243 ☆ 

☆ बाल गीत – खट्टी – मीठी स्वाद निराला…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।

झटपट खाएँ मटकू लाला।।

 *

नाम अनेकों इसके भइया।

इमली , अम्बा जीभ चटइया।

चटनी से खुल जाता ताला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

दही – भल्ले का स्वाद बढ़ाती।

आलू टिक्की भी गुण गाती।

चाट में चटनी गरममसाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कच्ची – पक्की खूब सुहाती।

सुमन , सुनीता चट कर जाती।

लटक डाल ललचाए माला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

बील , आमिला , कल्ली , खट्टा।

चटनी पीसे सिल का बट्टा।

दिल को करती है मतवाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कई विटामिन की है थाती।

दर्द , शुगर , पाचन में साथी।

सबका पड़ता इससे पाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #272 – कविता – ☆ आत्म शुद्धि की राह कठिन है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता आत्म शुद्धि की राह कठिन है…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #272 ☆

☆ आत्म शुद्धि की राह कठिन है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

अहं भाव श्रेष्ठत्व कुलीनता भेद

भरा जब तक इस मन में

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

संकीर्णता सोच मन में, जब-जब भी आये

अहमन्यता पथिक को, सत्पथ से भटकाये

यदि बिगड़े संतुलन, सहारा कौन बनेगा

सोचें, सम्मुख जब दुर्दिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

ग्रन्थि श्रेष्ठता की, तुलनात्मक भाव जगाए

अस्थिर चित्त, न रिश्तों को दुलार दे पाए

दर्प भरे घेरों में बँधे, अतृप्त विकल जन

मन, दोषों से ग्रस्त मलिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

परछाई के सदृश, दोष यदि अपनायेंगे

सहज सरलता, संतुष्टि कैसे पायेंगे,

कृतज्ञता आभार भाव उपजाएँ मन में

हो प्रयास, साधन अनगिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

आत्मोन्नति के सूत्र, सादगी में ही मिलते

हर मौसम से मेल, पुष्प तब ही हैं खिलते

भेद मिटे आपस के, हो निर्लिप्त आचरण

जैसे जल में, खिले नलिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

☆ 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 96 ☆ भाग्य हमारा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “भाग्य हमारा” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 96 ☆  एक नवगीत-  भाग्य हमारा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

अब तो मौसम के हाथों में

सब कुछ है भाई

देखो भाग्य हमारा

कैसी करवट लेता है।

 

जोड़ तोड़ कर बीज जुटाया

सपनों को बोया

आँखों के पानी से काली

रातों को धोया

 

कुछ कुछ आशा हुई बलवती

मंगरे पर कागा

रहा उचार सगुन बैठा

जाने कब सुधि लेता है।

 

ब्याह गई घर की है मैना

छोड़ गई करजा

और महाजन की ड्योढ़ी पर

हाथ जोड़ परजा

 

खड़ी हुई उम्मीदें सारी

खेतों के आँगन

दगा न दे निष्ठुर मौसम

शंकालू मन होता है।

 

अबके सब त्योहार देहरी

पूजेंगे मिलकर

धरा आत्मा में बैठी

गाएगी संवत्सर

 

फसल रचेगी राँगोली

हर द्वारे बंदनवार

चल कर आँयेगीं ख़ुशियाँ

उल्लास सगुन बोता है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मैं ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मैं ? ?

नई  तरह की रचनाएँ रच रहा हूँ मैं,

अख़बारों में ख़ूब छप रहा हूँ मैं,

देश-विदेश घूम रहा हूँ मैं,

बिज़नेस क्लास टूर कर रहा हूँ मैं..,

 

मैं ढेर सारी प्रॉपर्टी ख़रीद रहा हूँ,

मैं अनगिनत शेअर्स बटोर रहा हूँ,

मैं लिमोसिन चला रहा हूँ,

मैं चार्टर प्लेन बुक करा रहा हूँ..,

 

धड़ल्ले से बिक रहा हूँ मैं,

चैनलों पर दिख रहा हूँ मैं..,

 

मैं यह कर रहा हूँ, मैं वह कर रहा हूँ,

मैं अलां में डूबा हूँ, मैं फलां में डूबा हूँ,

 

मैं…मैं…मैं…,

उम्र बीती मैं और मेरा कहने में,

सारा श्रेय अपने लिए लेने में,

 

आज श्मशान में अपनी देह को

धू-धू जलते देख रहा हूँ मैं,

हाय री विडंबना..!

कह नहीं पाता-

देखो जल रहा हूँ मैं..!

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 100 ☆ अस्त होना है तय उसे समझो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “अस्त होना है तय उसे समझो“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 100 ☆

✍  अस्त होना है तय उसे समझो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

एक तरफ़ा वफ़ा करे कोई

ये तग़ाफ़ुल सहा करे कोई

*

नींद कैसे उड़ा के वो सोता

रात भर जब जगा करे कोई

*

रूह चोला तभी बदलती है

मौत से जब मरा करे कोई

*

ख्वाब साकार होते भवरों के

फूल जब जब खिला करे कोई

*

अस्त होना है तय उसे समझो

सूर्य सा जब चढ़ा करे कोई

*

करना तौबा है इश्क़ से बेहतर

कितना आखिर घुटा करे कोई

*

कब तलक साथ दे रिआया भी

रहनुमा जब छला करे कोई

*

कौन उसको सँभाल सकता है

जब बशर खुद गिरा करे कोई

*

बीच में बोलना बुरा है अरुण

तज़किरा जब किया करे कोई

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ – ‘परछाई…’ – ☆ डॉ. कोयल विश्वास ☆

डॉ. कोयल विश्वास

संक्षिप्त परिचय

नाम : डॉ. कोयल विश्वास

संप्रति: असोशीएट प्रोफेसर एवं हिन्दी विभाग अध्यक्ष, माउंट कार्मेल कॉलेज,स्वायत्त,बेंगलुरू।

प्रकाशित रचनाएं:

  • मौलिक: साहित्यकाश के दो चाँद- बंकिमचंद्र एवं प्रेमचंद( आलोचनात्मक ग्रंथ,2019), मन की खिड़की (कविता संग्रह 2021), गीली मिट्टी की खुशबू (कविता संग्रह 2023), यह तुम्हारा घर नहीं है (कहानी संग्रह 2024)
  • संपादित: कथा कौमुदी, कथा कौस्तुभ, एकाँकी धारा, कथा सरोवर, साहित्य वल्लरी. 
  • अनूदित : The Gazing Damsel Beyond the Canvas (2021), Treading the path of light (2022), Awakening of words (2022), The perfect picture (2023), My Satirical and Humorous stories by Dr. Harish Naval (2023).
  • हिंदी तथा अँग्रेज़ी साझा संकलनों में लगभग 100 कविताएं प्रकाशित तथा पत्र पत्रिकाओं में 30 से भी शोध आलेख प्रकाशित. 

 

☆ ~ ‘परछाई…’ ~ ☆ डॉ. कोयल विश्वास ? ☆

(लिटररी वारियर्स ग्रुप द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त कविता। प्रतियोगिता का विषय था >> “परछाइयां” /Shadows”।)

सागर के लहरों पर तैरती

आसमान की परछाई,

स्फटिक से झीलों में अंकित

पहाड़ों की परछाई,

धरती पर घुमड़ती बादलों की

और बादलों पर

पंख फैलाए बाजों की परछाई|

दूर क्षितिज पर लिपटी है जो

कंचन-रजत आभा सी

सूरज से आँख मिचौली खेलती

इंद्रधनुष की परछाई|

मेरे सपनों में तुम्हारी यादों की

और मेरी यादों में

तुम्हारी उम्मीदों की

अगणित रेशमी परछाई

तितलियों के परों सी नाजुक

फूलों की पंखुड़ियों की परछाई

फूलों पर बसे भौरों की

 

और भौरों के गुंजन में

जीवंत उपवन की परछाई|

बंद आखों में उभर आती है

पुतलियों पर अंकित असंख्य परछाई

ठिठुरती पानी के सतह पर तैरते हो जैसे

हिम शृंग की परछाई|

साथ चलने वाले पथिकों के चेहरे पर

अतृप्ति की परछाई;

क्लांत मन मेरा , संवेदना की आस में

जब पीछे मुडकर् देखा,

दिखा केवल बस एक

मेरी ही परछाई|

~ डॉ. कोयल विश्वास

© डॉ. कोयल विश्वास

असोशीएट प्रोफेसर एवं हिन्दी विभाग अध्यक्ष, माउंट कार्मेल कॉलेज,स्वायत्त,बेंगलुरू।

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ऐसी भी क्या थी बाधा? ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  भावप्रवण कविता – ऐसी भी क्या थी बाधा?।)

✍ ऐसी भी क्या थी बाधा? ☆ श्री हेमंत तारे  

फिसल जाते हैं लम्हें, दिन, महीने,

साल, दशक,

या

उम्र तमाम

सुलझाने में गुत्थियां,

कुछ उलझनें,

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

या

चिन्हें- अनचिन्हें

उत्तर, प्रतिउत्तर ।

 

और फिर,

जब – तब  प्रकट होता है

अप्रत्याशित, यक्षप्रश्न एक

कि

ऐसी भी क्या थी बाधा

या था कोई संकोच

जो

बंध गयी थी घिग्घी,

उस पल, उस घड़ी

कि

रह गया अनकहा,

अपने मन का सच।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # 93 – जानते हैं हम शराफत आपकी… ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकेंगे।  आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना – जानते हैं हम शराफत आपकी।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # 93– जानते हैं हम शराफत आपकी… ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

जानते हैं हम, शराफत आपकी 

आँख करती हैं शरारत, आपकी

*

कत्ल हो जाता, लहू बहता नहीं 

ऐसी कातिल है, नजाकत आपकी

*

फूल खिलते हैं चमन के, बाद में 

पहले, लेते हैं इजाजत, आपकी

*

कितने घर, बर्बाद तुमने कर दिये 

जानते हैं, हम भी ताकत आपकी

*

कब से, ये पलकें बिछी हैं राह में 

जाने कब होगी, इनायत आपकी

*

चैन से जीने नहीं देती मुझे 

बेवजह की, यह अदावत आपकी

*

गम में खुश रहकर, बसर करने लगे 

शुक्रिया, यह है इनायत आपकी

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अभिमन्यु ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अभिमन्यु ? ?

कृतज्ञ हूँ

उन सबका,

मुझे रोकने

जो रचते रहे

चक्रव्यूह..,

और परोक्षतः

शनैः- शनैः

गढ़ते गए

मेरे भीतर

अभिमन्यु..!

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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