यात्रा-संस्मरण – मेरी यूरोप यात्रा – सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय 

☆ यात्रा संस्मरण – मेरी यूरोप यात्रा

(आज प्रस्तुत है सुदूर पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी का  यूरोप यात्रा संस्मरण। यह संस्मरण निश्चित ही आपको आपकी यूरोप यात्रा की याद दिला देगा। यदि आपने अब तक यह यात्रा नहीं की है तो आपको यात्रा पर जाने के लिए अवश्य प्रेरित करेगा।  एक बेहतरीन यात्रा संस्मरण।)

यदि इब्न बतूता के कथन, “यात्रा वो होती है। जो आपको कहने के लिये कुछ न छोड़े, सिर्फ आपको एक कहानी सुनाने वाले व्यक्ति के रूप में बदल दे। जिसे सुनाते जाना चाहिए।”  यूरोप एक कहानी की तरह है। जिसे सुनाते हुए कभी नहीं थकेंगे। एक बेहतरीन गंतव्य है। यूरोप की यात्रा एक रोलर कोस्‍टर की सैर जैसी होती है। जो दमदार है। मंत्रमुग्‍ध कर देने वाली है और कभी न भुलायी जाने वाली है।

मेरी यूरोप यात्रा बहुत ही रोमांचक व जिज्ञासा पूर्ण थी। जब मैं 55 वर्ष की और मेरे पति महाशय 60 वर्ष के थे। तब अपने बच्चों के आग्रह पर हमने यूरोप यात्रा करने का निर्णय लिया। इससे पहले अमेरिका व अन्य बहुत से देशों की विदेश यात्राएं हम कर चुके थे। पर इस यात्रा की उत्सुकता कुछ अधिक थी। जिसका पहला कारण हमारी जुड़वा बेटियों में से एक बेटी भी जर्मनी के म्यूनिख शहर में रहकर पढ़ाई कर रही थी। उससे मिलने की चाह थी और दूसरा कारण इतिहास में यूरोपीय देशों के बारे में बहुत पढ़ा था। ऐन फ्रैंक की डायरी पढ़ने के बाद तो हिटलर की जगह देखने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी । रोम के राजाओं की बहुत सी कहानियाँ पढ़ी थी। शेक्सपियर, जूलियट, सीजर पढ़ा था। स्विट्जरलैंड की प्राकृतिक सुंदरता को पुस्तकों में पढ़ा व चित्रों में देखा था। नेपोलियन बोनापार्ट के विषय में इतिहास में पढ़ा था। नीदरलैंड का तो कहना ही क्या?

कुल मिलाकर यूरोप यात्रा की लालसा घनिष्ठ होती जा रही थी।

अत: बच्चों ने हमारे विवाह की 33 वीं सालगिरह पर यूरोप यात्रा पर भेजने का निर्णय लिया।”अंधा क्या चाहे दो आँखें” हम बहुत खुश और उत्साहित थे। मैंने तो अपने लेखक धर्म के नाते सबसे पहले अपनी एक नई डायरी और तीन-चार अच्छी नस्ल के कलम रख लिये थे। हमारी यूरोप यात्रा प्रारंभ से अंत तक 25 दिनों की रखी गई थी।

हम 5 मई 2018 को सुबह 10:30 बजे तिनसुकिया असम से स्पाइजेट के जहाज से दिल्ली के लिए रवाना हुए। 5 मई की रात दिल्ली से कुछ जरूरी खरीददारी की व विश्राम किया। फिर 6 मई 2018 की सुबह 3:40 पर एलिटालिया एयरवेज से रोम (इटली) के लिए रवाना हुए। यह सफर सात घंटे का था। रोम के समयानुसार सुबह 8:30 बजे रोम पहुंच गए। वहां से टर्मिनल-1 में पहुंच कर 3:30 बजे म्यूनिख (जर्मनी)के लिए रवाना हुए। 7 मई 2018 शाम 5:30 बजे हम म्यूनिख पहुंच गए थे। एयरपोर्ट से आठ बजे हम पाँच सितारा होटल “लीमेरिडियन” में पहुंचे। यहां का मौसम बहुत ही मनमोहक था। न अधिक गर्मी, न अधिक सर्दी। वैसे यहां ठंड के समय में बहुत अधिक ठंड पड़ती है। तापमान माइनस 12-15 तक चला जाता है। बरफ गिरती है।

जर्मनी की धरती पर जहां नजर उठाओ। वहां सिर्फ हरे-भरे वृक्ष पेड़-पौधे व रंग बिरंगे फूल ही फूल दिखाई देते थे। साफ सुथरी और चौड़ी सड़कें थीं। यहां ईमानदारी लोगों के खून में रहती है। मैट्रो या ट्रम के टिकट का कहीं कोई चैकिंग सिस्टम नहीं है, लेकिन मजाल है कि कोई बिना टिकट सफर कर ले। यह सब कारण ही देश की उन्नति में सहायक होते हैं। यहाँ हमने मरियम चर्च देखी। वहाँ स्ट्रीट पर रूमानिया नृत्य हो रहा था। गीत संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। यहां के लोगों से परिचय प्राप्त किया।यहाँ के लोग बहुत मेहनती होते हैं। यहाँ सभी लोग अपनी राष्ट्र भाषा यानि जर्मन का प्रयोग ही करते हैं। यहां अंग्रेजी भाषा का प्रयोग न के बराबर ही होता है। अंग्रेजी जानते हैं पर बोलते नहीं हैं। जर्मन भाषा की लिपि रोमन ही है। पर भाषा अलग है। अधिकतर लोग साइकिल का प्रयोग करते हैं या पैदल चलते हैं। यहाँ गर्मियों में रात 8:30 बजे तक धूप रहती है। दुकानें ठीक आठ बजे बंद हो जाती हैं। पर होटल रात 12:00 बजे तक खुले रहते हैं। और मैट्रो ट्रेन रात के 2:00 बजे तक चलती हैं। सिर्फ दो घंटे के लिए बंद होकर फिर सुबह चार बजे से चलने लगती हैं। यहाँ रात में किसी प्रकार का कोई डर नहीं है। चोरी चपाटी, मार पीट, हिंसा आदि सभी बुराइयों से जर्मनी पूरी तरह सुरक्षित है। यहाँ बच्चे, लड़कियाँ पूरी तरह सुरक्षित हैं।

11 मई 2018 को रात आठ बजे हम लोग म्यूनिख से ज्यूरिख यानि स्वीट्जरलैंड के लिए निकल पड़े।

यह सफर बस का था,पर सड़कें खुली और अच्छी होने के कारण बस इस तरह चल रही थी कि हमें लग रहा था कि हम हवाई यात्रा कर रहे हैं। बस में शौचालय आदि की भी सुविधा थी। एक कैंटीन भी थी। जिसमें चाय, कॉफी, सैंडविच आदि खरीदे जा सकते थे । दो सीट पर एक यात्री को बैठाया गया था। सभी लोग आराम से सोते हुए जा रहे थे। बस द्वारा जर्मनी की हरी-भरी धरती का आनंद लेते जा रहे थे। दूर तक ऐसा लगता था कि सुंदर स्वच्छ हरे रंग का कालीन बिछा है। दो घंटे के सफर के बाद बस को “लिम्बाट” नदी के एक बड़े से जहाज पर चढ़ाया गया था। इस पानी के जहाज में रेस्टोरेंट भी था। हम लोगों ने यहां कॉफी पी। जहाज की यात्रा लगभग बीस मिनट की थी। इसके बाद नदी पर ब्रिज बना हुआ था। चारों तरफ बस्ती थी। उस ब्रिज पर करीब बीस मिनट बस चली।

यह सारा दृश्य अद्भुत था। कोंचलेगेन वह सीमा थी। जहां पर हमारा पासपोर्ट चैक किया गया था। कोंचलेगेन जर्मनी की अंतिम सीमा थी। इसके बाद से हम दूसरे देश में प्रवेश कर रहे थे। इस तरह बस द्वारा सिर्फ चार घंटे के सफर के बाद रात 12:10 बजे एक दूसरे देश में पहुंच गए थे,और वह देश था स्विट्जरलैंड।

स्विटजरलैंड एक ऐसा देश है। जिसे पर्यटन की दृष्टि से आदर्श माना जाता है। इसलिए यह पर्यटकों में खासा लोकप्रिय है। आल्प्स पर्वत श्रृंखला के करीब स्थित इस देश के प्राकृतिक नजारे, नदियाँ, झीलें और संस्कृति पर्यटकों को खासा लुभाती हैं। कला और संस्कृति से समृद्घ इस देश में बहुत से म्यूजियम और ऐतिहासिक स्थल हैं।

स्विट्जरलैंड मध्य यूरोप का एक देश है। इसकी 60 % ज़मीन आल्प्स पहाड़ों से ढकी हुई है। सो इस देश में बहुत ही ख़ूबसूरत पर्वत, गाँव, सरोवर झील और चारागाह हैं। स्विस लोगों का जीवन स्तर दुनिया में सबसे ऊँचे जीवन स्तरों में से एक है। यहाँ की स्विस घड़ियाँ, चीज़, चॉकलेट आदि बहुत मशहूर हैं।

इस देश की तीन राजभाषाएँ हैं-जर्मन ,फ़्रांसिसी और इतालवी।  स्विट्स़रलैण्ड एक लोकतन्त्र है। जहाँ आज भी प्रत्यक्ष लोकतन्त्र देखने को मिल सकता है। यहाँ कई बॉलीवुड फ़िल्म के गानों की शूटिंग होती है। लगभग 20 % स्विस लोग विदेशी मूल के हैं। इसके मुख्य शहर और पर्यटक स्थल ज्यूरिख, बर्न,  बासल, इंटरलाकेन, लुगानो,  लूत्सर्न, इत्यादि हैं।

यहाँ बर्फ के सुंदर ग्लेशियर हैं। ये ग्लेशियर साल में आठ महीने बर्फ की सुंदर चादर से ढके रहते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ सुंदर वादियाँ हैं। जो सुंदर फूलों और रंगीन पत्तियों वाले पेड़ों से ढकी रहती हैं। भारतीय निर्देशक यश चोपड़ा की फिल्मों में इस खूबसूरत देश के कई नयनाभिराम दृश्य देखने को मिलते हैं। स्विट्जरलैंड में भी हमारे लिए पाँच सितारा होटल “पार्क रेडिशन”बुक था। यह सारा कार्य हमारे बच्चों द्वारा ही किया गया था।

यहां हम रिगि की पहाड़ियों पर ट्रेन द्वारा ऊपर गए। इसकी हाइट पाँच हजार चार सौ फीट थी। यहां लोगों ने भेड़, बकरी और गाय पाल रखी थी। मौसम बहुत अच्छा था। रिगि की पहाड़ी के ऊपर का तापमान 10 डिग्री था। ऊपर पहुंचने में 40 मिनट का समय लगा। हम पाँच हजार चार सौ फीट की ऊँचाई पर ख़ड़े थे। नीचे घर आदि सभी कुछ बहुत छोटे नजर आ रहे थे। मेरा मस्तिष्क बहुत तरोताजा होकर बहुत तेजी से चल रहा था। ईश्वर प्रदत्त प्राकृतिक सुंदरता को देख कर हमने मन ही मन उस सर्वशक्तिमान को प्रणाम किया।

पानी के जहाज द्वारा लुसर्ण लेक से लुसर्ण शहर में गए।

इस तरह तीन दिन हमने स्विट्जरलैंड की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लिया और फिर 13 मई को वापस म्यूनिख आ गए। हमने म्यूनिख में रैंट पर एक फ्लेट ले लिया था। जिसमें सभी प्रकार की सुविधाएं थी। हम अपनी पसंद का भोजन बना खा सकते थे। हमारे फ्लेट के नीचे बाजार था। इस बाजार में 90% प्रतिशत दुकानें टर्किश लोगों की थी। यह टर्किश लोग द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद काम के लिए जर्मनी आकर बस गए थे। इस बाजार में सभी प्रकार का सामान उपलब्ध था। भारतीय भोजन की सामग्री भी उपलब्ध थी।

अब एक दिन म्यूनिख में रहकर हम लोग 15 मई शाम को 9:00 बजे हवाई यात्रा द्वारा नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम के लिए निकल पड़े। दो घंटे की हवाई यात्रा के बाद हम लोग रात के 11:00 बजे एम्सटर्डम पहुंच गए थे।

नीदरलैंड यूरोप महाद्वीप का एक प्रमुख देश है। यह उत्तरी-पूर्वी यूरोप में स्थित है। इसकी उत्तरी तथा पश्चिमी सीमा पर उत्तरी समुद्र स्थित है। दक्षिण में बेल्जियम एवं पूर्व में जर्मनी है। नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम है।

नीदरलैंड को अक्सर हॉलैंड के नाम से भी संबोधित किया जाता है एवं सामान्यतः नीदरलैंड के निवासियों तथा इनकी भाषा दोनों के लिए डच शब्द का उपयोग किया जाता है।

फ्रांस की क्रांति द्वारा उत्पन्न नवीन विचारों से जर्मनी प्रभावित हुआ था। नेपोलियन ने अपनी विजय द्वारा विभिन्न जर्मन-राज्यों को राईन-संघ के अंतर्गत संगठित किया। जिससे जर्मन-राज्यों को एक साथ रहने का एहसास हुआ। इससे जर्मनी में एकता की भावना का प्रसार हुआ। यही कारण था कि जर्मन-राज्यों ने वियना कांग्रेस के समक्ष उन्हें एक सूत्र में संगठित करने की पेशकश की। पर उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

इसकी कई स्मारकीय इमारतें प्राचीन शहर के लंबे इतिहास को दर्शाती हैं।

एम्सटर्डम नीदरलैंड का सबसे महत्वपूर्ण शहर माना जाता था।

एम्सटर्डम ने जिस समय  डच स्वर्ण युग इस शीर्षक का पदभार संभाला था तब यह नीदरलैंड का सांस्कृतिक केंद्र बन गया था।

एम्सटर्डम में संग्रहालयों का अपना एक उचित स्तर है।

सेंट्रल म्यूजियम कला और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।

“कैसल डी हार” एम्सटर्डम स्थित है और पूरे सप्ताह दर्शकों के लिए खुला रहता है।

शहर में विशाल “डोम टॉवर” है।  नीदरलैंड में सबसे ज्यादा चर्च और टॉवर है। यह 14वीं सदी के बने हुए हैं।

एम्सटर्डम देश की सबसे बड़ी प्रदर्शनी और सम्मेलन का केंद्र  है।

यह बिल्कुल सेंट्रल स्टेशन के बगल में स्थित है और एक साल में लगभग एक लाख से अधिक आगंतुकों का स्वागत करता है।

यहां साल में एक बार एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और अवकाश मेला आयोजित किया जाता है।

17 मई 2018 को रात 9:30  बजे एम्सटर्डम से ट्रेन द्वारा हमारी यात्रा बेल्जियम के लिए प्रारंभ हुई थी। प्रति व्यक्ति 26 यूरो का टिकट था। (भारतीय रूपए अनुसार दो हजार अस्सी रुपए) ट्रेन बहुत ही सुविधा जनक थी। रेलवे स्टेशन  भीड़ रहित व सभी प्रकार की सुविधाओं से पूर्ण था। रेलवे स्टेशन पर भी एयरपोर्ट जैसा आभास हो रहा था। स्टेशन पर बड़ी बड़ी ब्रांड के शो रूम थे। हमने एम्सटर्डम के स्टेशन से यहां के प्रसिद्ध रंग-बिरंगे नकली टुलिप के कुछ फूल खरीदे। यह लकड़ी के बने बहुत सुंदर फूल थे।टुलिप के फूल के बगीचे यहां की मुख्य विशेषता है। ट्रेन की सीट बहुत बड़ी-बड़ी व खुली खुली थी।पूरी ट्रेन में बहुत कम यात्री थे। सभी सीट खाली पड़ी थी। यात्रा बहुत ही आरामदायक थी।

ट्रेन काफी खाली थी। यह चेयर कार थी। ट्रेन से दूर दूर तक खेत दिखाई दे रहे थे। यूरोप के सभी देशों में खेती मुख्य व्यवसाय है।

चारों तरफ के सुंदर नजारे को देखते देखते केवल तीन घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद 12:30 बजे हम लोग बेल्जियम के “मिडी स्टेशन” पर पहुंच गए थे।

यूरोप में बेल्जियम एक छोटा सा देश है जो स्पेन, इटली, जर्मनी, फ्रांस, यू.के जैसे कुछ बड़े देशों की तुलना में काफी छोटा है, लेकिन इसके छोटे आकार के बावजूद, इस जगह में कई चीजें हैं जैसे वफ़ल, चॉकलेट, हीरे, फ्रेंच फ्राइज़ और कई अनगिनत चीजें शामिल हैं जो यहाँ मिलती हैं।बेल्जियम अपने मध्ययुगीन पुराने शहरों, फ्लेमिश पुनर्जागरण वास्तुकला और यूरोपीय संघ और नाटो के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय के लिए जाना जाता है।

बेल्जियम देश के अनोखे रोचक तथ्य यह हैं कि बेल्जियम का आधिकारिक नाम”बेल्जियम का साम्राज्य” है। और बेल्जियम के राजा फिलिप वर्तमान शासक हैं।

बेल्जियम में तीन आधिकारिक भाषा हैं और उनमें से कोई भी बेल्जियन नहीं है लोग देश के विभिन्न हिस्सों में डच, फ्रेंच और जर्मन बोलते हैं।

बेल्जियम अलग-अलग प्रकार की 800 से अधिक बियर बनाता है।बेल्जियम प्रत्येक व्यक्ति प्रति वर्ष 150 लीटर बीयर औसतन पीता है। दुनिया का मुख्य हीरा केंद्र  और दूसरा सबसे बड़ा पेट्रोकेमिकल केंद्र बेल्जियम में है। दुनिया में लगभग 90% कच्चे हीरे बेच दिए जाते हैं।पॉलिश किए जाते हैं। और एंटवर्प,बेल्जियम में वितरित किए जाते हैं।

बेल्जियम में 18 वर्ष की आयु तक अनिवार्य शिक्षा है। यह दुनिया की सर्वोच्चतम शिक्षा में से एक है।

बेल्जियम नीदरलैंड के साथ उत्तर की ओर, पूर्व में जर्मनी, दक्षिण पूर्व में लक्ज़मबर्ग और दक्षिण और पश्चिम में फ्रांस का हिस्सा है। उत्तर-पश्चिम में उत्तरी सागर के किनारे समुद्र तट भी हैं।

“स्पा” शब्द, जो कि कई जगहों के बारे में बात करने और कल्याण उपचार पाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। बेल्जियम के शहर स्पा से आता है।

बेल्जियम की फुटबॉल टीम – रेड डेविल्स – फीफा रैंकिंग में दुनिया में नंबर एक है।फुटबॉल (सॉकर) ही एकमात्र चीज है जो सभी बेल्जियम के लोगों को एकजुट कर सकती है। और उन्हें सभी मतभेदों और असहमति को भुला सकती है। भले ही थोड़े समय के लिए।

बेल्जियम प्रति वर्ष 220,000 टन चॉकलेट का उत्पादन करता है।यह बेल्जियम में प्रत्येक व्यक्ति के लिए लगभग 22 किलो चॉकलेट है।

ब्रुसेल्स केवल बेल्जियम की राजधानी नहीं है, बल्कि यूरोपीय संघ की राजधानी भी है। (ईयू) और नाटो का मुख्यालय है। यही कारण है कि ब्रसेल्स को “यूरोप का दिल” कहा जाता है।

यूरोप का पहला कैसीनो “ला रेडॉउट” साल 1763 में बेल्जियम में खोला गया था।

बेल्जियम में 11,787 वर्ग मील (30,528 वर्ग किलोमीटर) का क्षेत्रफल है।

नेपोलियन, ब्रुसेल्स के दक्षिण में एक शहर “वाटरलू” में हार गया था।

बेल्जियम के लोगों का कहना है कि वे ‘अपने पेट में एक ईंट के साथ पैदा’ हुए हैं इसलिए हर बेल्जियम वासी एक घर खरीदने या बनाने की कोशिश करता है। जिसे वे जल्दी से जल्दी कर लेते हैं।

बेल्जियम में दुनिया भर की सड़कों और रेलमार्ग का उच्चतम घनत्व है। यह नीदरलैंड और जापान के बाद प्रति वर्ग किलोमीटर के तीसरे सबसे ज्यादा वाहनों वाला देश है। सभी प्रकार की रोशनी सहित बेल्जियम की राजमार्ग व्यवस्था ही एकमात्र मानव निर्मित संरचना है। जो रात में अंतरिक्ष सी दिखाई देती है।

ब्रुसेल्स का रॉयल पैलेस, बकिंघम पैलेस से 50% बड़ा है।

मार्च 2003 में इलेक्ट्रॉनिक आईडी कार्ड पेश करने के लिए बेल्जियम, इटली के साथ, दुनिया का पहला देश था। यह पूरी आबादी के लिए ई-आईडी जारी करने वाला पहला यूरोपीय देश होगा। बेल्जियम में मतदान अनिवार्य है और इस कानून को लागू किया गया है। बेल्जियम में  टेलीविजन को 1953 में दो चैनलों के साथ पेश किया गया था। एक डच में और एक फ्रेंच में।

80% बिलियर्ड खिलाड़ियों ने  बेल्जियम-निर्मित गेंदों का उपयोग किया है।

विश्व का सबसे बड़ा चॉकलेट बिक्री बिंदु ब्रसेल्स राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। देश के उद्योग में रसायन, संसाधित खाद्य और पेय पदार्थ, इंजीनियरिंग, धातु उत्पाद और मोटर वाहन  असेंबलिंग शामिल हैं।

बेल्जियम की कोस्टल ट्राम दुनिया की सबसे लंबी ट्राम लाइन है। जो 68 किमी लंबी है। पूरी दुनिया में बेल्जियम के घरों में “केवल टी.वी” का सबसे अधिक प्रतिशत है। जो की 97% है।

बेल्जियम के लोगों की औसतन आयु 78-81 वर्ष की है।

यूरोप के लगभग सभी देशों में गर्मी के समय जून जुलाई में रात दस बजे तक दिन रहता है।

यहां पर बाजार ठीक आठ बजे बंद हो जाते हैं। होटल रात के बारह बजे तक खुले रहते हैं।

यहां के सभी रेलवे स्टेशन सुव्यवस्थित,आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण व पूर्णता स्वच्छ हैं।

19 मई 2018 को शाम के 7:45 पर हम लोग बस द्वारा ब्रसेल्स से पेरिस के लिए निकल पड़े। बस सभी प्रकार की सुविधाओं से पूर्ण थी। बस में एक कैंटीन तथा शौचालय की व्यवस्था भी थी।लगभग तीन घंटे की बस यात्रा के बाद 11:15 पर हम लोग पेरिस पहुंच चुके थे। जैसा की पेरिस के बारे में सुन रखा था। पेरिस उससे भी कहीं अधिक था।

फ्रांस के उत्तर में सीन नदी के तट पर बसा कल्पनाओं का शहर है पेरिस। फ्रांस की राजधानी पेरिस को ‘रोशनी का शहर’ और ‘फैशन की राजधानी’ भी कहा जाता है। 105.4 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस शहर की जनसंख्या 22 लाख है। पूरा पेरिस 20 भागों में बंटा है। जिन्हें अरौंडिसमैंट कहते हैं। 6,100 गलियों, 1,124 बार और 1,784 बेकरियों वाले इस शहर के बनने की कहानी बड़ी रोचक है। वर्ष 1852 तक यह आम शहर जैसा ही था। उसी वर्ष नेपोलियन बोनापार्ट का भतीजा लुई नेपोलियन तृतीय राजा बना और उस ने बड़े ही जोरशोर से शहर का नवीनीकरण करना शुरू किया। बैरन हौसमैन नामक इंजीनियर को उस ने यह जिम्मेदारी सौंपी थी।

हौसमैन ने न सिर्फ सौंदर्यीकरण का काम किया, बल्कि शहर को अभिजात्य वर्ग में ला खड़ा करने की भी पुरजोर कोशिश की। शहर में जितनी भी गरीब लोगों की बस्तियां थीं। उन्हें उजाड़ कर जनता को जबरदस्ती शहर के बाहरी हिस्सों में भेज दिया गया था। और फिर चौड़ी खूबसूरत सड़कों, बड़े-बड़े खुले ब्लौक्स और महंगे बाजारों तथा सुंदर घरों का निर्माण किया गया। हरियाली की कमी न हो। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया। 17 साल तक यह सारा काम चलता रहा। और जनता हौसमैन को कोसती, गालियां देती रही।गरीब तो गरीब, अमीरों ने भी उस का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

1870 तक जो पेरिस बन कर तैयार हुआ।उस ने सब की आंखें चौंधिया दीं थीं और कुछ ही समय में यह शहर पूरे यूरोप के गर्व का कारण बन गया।आज पूरे संसार में पेरिस की जो छवि है।उस का मुख्य श्रेय हौसमैन को ही जाता है।

घूमने के लिहाज से वैसे तो पूरे पेरिस शहर में कहीं भी चले जाइए। हर जगह खूबसूरती बिखरी मिलेगी।फिर भी कुछ जगहें ऐसी हैं। जिन्हें देखे बिना पेरिस यात्रा अधूरी ही कहलाएगी।

एफिल टावर फ्रांस की क्रांति की एक शताब्दी पूरी होने का जश्न मनाने के लिए 1889 में पेरिस में एक वर्ल्ड फेयर का आयोजन किया जा रहा था। इस के मुख्यद्वार के रूप में एक बड़ा और भव्य टावर बनाने का प्लान बनाया गया।जिसे बाद में तोड़ दिया जाना था। जिस कंपनी ने इस का निर्माण किया था। उस के मुख्य इंजीनियर एलैक्जैंडर गुस्ताव एफिल के नाम पर इस का नाम एफिल टावर रखा गया।लोहे के जालदार काम से बनी इस संरचना की ऊंचाई 1,063 फुट है। जिस में 3 लैवल हैं और 1,665 सीढि़यां हैं। हर लैवल पर जाने के लिए अलग-अलग लिफ्ट की व्यवस्था है। पहली 2 मंजिलों पर रैस्टोरैंट आदि की भी सुविधा है। हर मंजिल से पूरे शहर का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। जैसा कि पहले से तय था। वर्ष 1909 में इसे नष्ट करने के बारे में सोचा गया था।लेकिन तब तक यह जनता और सरकार, सब के दिलों में घर कर चुका था।इसलिए इसे एक बड़े रेडियो एंटीना की तरह प्रयोग करने का निश्चय किया गया।आज यह टावर पेरिस की पहचान और शान है।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब हिटलर पेरिस में घुसा। तो लोगों ने एफिल टावर की लिफ्ट के केवल काट दिए थे। ताकि हिटलर उन के शहर की इस शान पर न चढ़  सके। हिटलर कुछ सीढि़यां चढ़ा, लेकिन फिर हार मान कर लौट गया।आज यहां पूरे संसार से हर साल 60-70 लाख लोग आते हैं। रात के समय जब पूरे टावर पर लगी 20 हजार लाइटें जगमगाने लगती हैं। तब तो इस की शोभा देखते ही बनती है। इस से जुड़ा एक मजेदार तथ्य है कि मैटल से बना होने के कारण इस की लंबाई सूर्य की गरमी से प्रभावित होती है और मौसम के अनुसार 15 सैंटीमीटर तक घटती बढ़ती रहती है।

डिज्नीलैंड पार्क वाल डिज्नी के पात्रों और फिल्मों की थीम पर बना यह विशाल और भव्य पार्क शहर के मध्य भाग से 32 किलोमीटर पूर्व में स्थित है. 4,800 एकड़ में फैला यह पार्क 1992 में शुरू हुआ था। वर्ष 2002 में इसी के साथ डिज्नी स्टूडियोज का निर्माण किया गया। इन दोनों पार्कों में कुल मिला कर 57 झूले, राइड्स आदि हैं।इन के अलावा यहां रंगबिरंगी परेड, लेजर शो और तरहतरह की अन्य गतिविधियां भी होती रहती हैं। पूरे डिज्नी पार्क को 5 भागों–मेन स्ट्रीट यूएसए, फैंटेसीलैंड, एडवैंचरलैंड, फ्रंटियरलैंड और डिस्कवरीलैंड में बांटा गया है।एक भाग से दूसरे तक जाने के लिए पैदल चलने के अलावा ट्रेन से जाने की भी सुविधा है। एलिस इन वंडरलैंड, पाइरेट्स, स्नोवाइट, पीटर पैन, टौय स्टोरी आदि की थीम पर बने झूले आप को एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं।स्लीपिंग ब्यूटी का महल तो इतना सुंदर है कि देखने वाला मानो सचमुच स्वप्नलोक में ही विचरण करने लगता है। 7 रिजौर्ट, 6 होटल, कई रैस्टोरैंट, शौपिंग सैंटर और एक गोल्फ कोर्स वाले इस थीम पार्क में हर साल एक से डेढ़ करोड़ लोग आते हैं।

फ्रांस की क्रांति और अन्य युद्धों में मारे गए शहीदों की याद में “आर्क औफ ट्रायम्फ” नामक गेट बनाया गया है।रोमन वास्तुकला पर आधारित इस गेट को 1806 में जीन कैलग्रिन ने डिजाइन किया था।कुछ युद्धों और शहीदों के नाम इस की दीवारों पर खुदे हुए हैं।नीचे एक चैंबर बना है। जिस में ‘अनजाने सैनिक का मकबरा’ है। जो पहले विश्वयुद्ध में मारे गए थे। उन सैनिकों को समर्पित है।

नौत्रे डेम कैथेड्रल-

यह एक रोमन कैथोलिक चर्च है। जो फ्रैंच गोथिक शैली में बना है। पूरी दुनिया के कुछ अत्यंत मशहूर चर्चों में से यह एक है। यहां जीसस क्राइस्ट के क्रौस का एक छोटा हिस्सा क्राउन औफ थौर्न तथा उन के कुछ अन्य स्मृतिचिह्न भी रखे गए हैं। नेपोलियन बोनापार्ट के राज्याभिषेक के अलावा अन्य कई बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं का यह चर्च गवाह रहा है। यहां कुल 10 बड़ेबड़े घंटे हैं। जिन में से सब से बड़ा 13 टन से भी ज्यादा भारी है और उस का नाम इमैन्युअल है।

“लुव्र म्यूजियम” यह संसार के सब से बड़े म्यूजियमों में से एक है।शहर के पश्चिमी भाग में सीन नदी के दाहिने तट पर स्थित यह इमारत लगभग 60,600 वर्ग मीटर में फैली है।12वीं शताब्दी में फिलिप द्वितीय ने इस का निर्माण एक किले के रूप में करवाया था। कई राजाओं ने इसे अपना निवास बनाया। अनेक स्वरूप और नाम बदलते हुए 10 अगस्त, 1793 को पहली बार 537 पेंटिंग्स और 184 कलाकृतियों के साथ इसे म्यूजियम का रूप दिया गया। आज इस का इतना विस्तार हो चुका है कि अगर यहां की हरेक कलाकृति को सिर्फ 4 सैकंड देख कर ही आगे बढ़ जाएं तो हमें को पूरा म्यूजियम देखने के लिए 3 महीने का समय चाहिए होगा।

इस तरह फ्रांस और इटली घूमते हुए हम लोग 22 मई को वापस म्यूनिख आ गया। दो दिन म्यूनिख का आनंद लेकर हम लोग 25 मई को अपने प्रिय देश भारत के लिए चल दिए। इस यूरोप यात्रा का एक एक पल अविस्मरणीय है और रहेगा। किसी ने ठीक ही कहा है –

सैर कर दुनिया के गाफिल

जिंदगानी फिर कहाँ ।

जिंदगानी गर रही

तो नौजवानी फिर कहाँ।

 

© निशा नंदिनी भारतीय

तिनसुकिया, असम

9435533394

[email protected]

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सफरनामा- * मेरी यात्रा * – श्री राजेन्द्र कुमार भंडारी “राज” 

श्री राजेन्द्र कुमार भंडारी “राज” 

 * मेरी यात्रा *

(श्री राजेन्द्र कुमार भण्डारी “राज” जी  का e-abhivyakti में स्वागत है। श्री राजेन्द्र कुमार जी बैंक में अधिकारी हैं एवं इनकी लेखन में विशेष रुचि है। आपकी प्रकाशित पुस्तक “दिल की बात (गजल संग्रह) का विशिष्ट स्थान है। यह यात्रा  संस्मरण  “मेरी यात्रा” में  श्री राजेन्द्र कुमार भण्डारी “राज” जी ने  गुजरात, महाराष्ट्र एवं गोवा के विशिष्ट स्थानों की  यात्रा का सजीव चित्रण किया है। ) 

मैंने अपनी यात्रा द्वारका दिल्ली से 15 अक्तूबर 2018 को पौने तीन बजे दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन से प्रारम्भ की जो अहमदाबाद तक थी। मैं अहमदाबाद सुबह नौ  बजकर पचपन मिनट पर पहुँचा। इसके बाद जबलपुर से सोमनाथ जाने वाली ट्रेन पकड़ी, क्योंकि सबसे पहले मुझे सोमनाथ बाबा के दर्शानाथ हेतु सोमनाथ जाना था। जबलपुर-सोमनाथ एक्स्प्रेस रूक-रुक कर चल रही थी, क्योंकि यह ट्रेन अपने समय से पहले ही दो घंटे विलंब से थी और अहमदाबाद से यह ग्यारह बजकर बाईस मिनट पर चली थी। अतः यह हर गाड़ी को स्टेशन से पहले रूक कर उसे पहले जाने देती थी अपनी देरी से आने का परिणाम जो भुगतना था। इस रास्ते में बहुत अच्छे-अच्छे स्टेशन जैसे वीरपुर, सूरेन्दरनगर, राजकोट, भक्तिनगर, नवागड़, जेतलसर, जूनागड़,  केशोद, मालिना, हाटीना, चौरवाड रोड़ और वैरावल आदि-आदि आए। वैरावल में नाव यानि कि नौका ही नौका थे, जैसे कि  वैरावल  वैरावल ना होकर नौकागढ़ हो। मौसम बहुत सुहाना था। मस्त-मस्त हवा चल रही थी। ठंड का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था। दिन में धूप भी मजेदार थी। कपास, अरण्ड, मिर्ची, जीरा और सूरजमुखी के खेत चमचमा रहे थे। वह दृश्य देखते ही बनता था। जैसै-जैसे सूरज ढ़ल रहा था मौसम की मस्ती बढ़ती जा रही थी। मौसम अपने पूरे यौवन पर था। अब शाम हो चली थी। दिन ढ़ल गया था। रात होने लगी थी। पक्षियों की तरह मैं भी अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रहा था। जूनागढ़ के बाद गाडी़ ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी। मानों दिन की सारी कमी अब पूरी करनी हो। अन्ततः मैं सोमनाथ पहुँच ही गया, रात के आठ बजकर इक्यावन मिनट पर।

चलने को यहाँ के लोग “हालो” बोलते हैं। हालो भई हालो मतलब “चलो भाई चलो” और “बैसो” मतलब “बैठो”,  त्रण मतलब “तीन”। जमी लिधौ मतलब “खाना खा लिया” आदि-आदि। भाषा बडी मधुर हैं लोग शांत व सुशील स्वभाव के हैं अर्थात जैसी भाषा वैसै  ही लोग,  मानस मतलब “लोग”। शुद्ध भाषा का अनुसरण ये लोग बखूबी करते हैं।  पर एक बात यहाँ ख़ास हैं रात को सब लोग अपने-अपने मुख्यः द्वार के बाहर बैठ जाते हैं जैसे कोई पंचायत कर रहे हों। घर की सारी बत्तियां बन्द करके, केवल एक मुख्य कमरे को छोडकर, इससे बिजली की बचत तो होती ही हैं पर साथ में पैसे की भी। अब मैं सोमनाथ पहुँच गया। सोमनाथ रेलवे स्टेशन से मैनें आटो-रिक्शा लिया और आशापुरा होटल नौ  बजे पहुँच गया। यह होटल सोमनाथ मंदिर के बिल्कुल पास में ही था। सुबह 17 अक्तूबर 2018 को 7 बजे सोमनाथ बाबा के दर्शन किए और समुद्र को प्रणाम किया उसके बाद  त्रिवेणी के भालसा मंदिर (यहाँ श्री कृष्ण जी के पैर में तीर लगा था।  जब श्री कृष्ण जी यहाँ विश्राम कर रहे थे तब एक भील ने उनके पग में तीर मारा था) के दर्शन किऐ।

फिर कार से ग्यारह  बजकर पाँच मिनट पर दीव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में बड़ी गर्मी थी, परंतु समुद्र होने के कारण इसका  तनिक भी पता न चला। दीव के रास्ते में सुंदरपुरम, गौरखमडी, प्रांचि, मोरडिया, कोडियार केसरिया होते हुऐ दीव शहर सवा बजे पहुँचा। रास्ते में नारियल के पेड़ों  की भरमार थी। जौं, गन्ना और मूंगफली, बाजरा की खेती थी। भेड बकरियाँ रास्ते की शान थी। जहाँ देखो वहाँ जालाराम का होटल या ढाबा मिल जाता था। यहाँ धर्मशालायेँ भी बहुत हैं। लोग मावा व गुटका बहुत खाते हैं तथा साथ ही सोडा भी बहुत पीते हैं। मैं पहले दीव फोर्ट, दीव संग्रहालय, चक्रवर्ती बीच, आई एन एस कुकरी, गंगेशवर मंदिर, फिर नागवा बीच गया। यहाँ पानी कौटा जेल देखा जो समुंदर के बीचो बीच में है। मैं यहाँ बीच से पाँच  बजकर बीस मिनट पर चला। ताड़़ी व नारियल के पेडों की भरमार को देखते हुऐ चैक पोस्ट से छः बजे निकला और सोमनाथ, आठ बजकर अड़तालीस मिन्ट पर पहुँचा गया।  वहाँ से सवा दस बजे सोमनाथ से औखाँ के लिए ट्रैन पकडी जो सोमनाथ से दस बजकर उन्नीस मिनट पर औखाँ के लिए चल पडी।

रास्ते में वेरावल, कसौद,  जूनागढ़, राजकोट, जामनगर, खमबाडिया, भोगाथ, भाटिया से होते हुऐ  द्वारका से सात  बजकर पचपन मिनट पर पहुँचा। खाने के पैकेट को यहाँ पार्सल बोलते है द्वारका में जुलेलाल गेस्ट में ठहरा। मगर वहाँ से 18 अक्तूबर 2018 दोपहर के दिन बेट द्वारका के लिए निकला। सबसे पहले रुक्मणी माता  मंदिर के दर्शन किए। उसके बाद 16 किलेमीटर दूर  नागेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन किए। इसके बाद 5 किलोमीटर दूरी पर गोपी तलाब था वहाँ  गोपी तलाब के दर्शन किए। अंत में चार बजकर बीस  मिनट पर औखाँ यानि कि बेट द्वारका गया। वहाँ पाँच बजकर बीस मिनट पर द्वारिकाधीश श्री कृष्ण जी के दर्शन करने के बाद बेट द्वारिका से छः बजकर चालीस मिनट  पर द्वारिका के लिए वापस हो लिया और सात  बजकर पचपन मिनट पर द्वारिका पहुचँ गया।

अगले सफ़र के लिए मैंने अपने तरक्क़ी के पहले पडाव़ व मेरी मनचाही जगह पौरबन्दर   को चुना। मैंने जुलेलाल होटल को खाली किया। होटल ठीक नौ बजे छोड़ कर नौ बजकर दो मिनट पर पोरबन्दर की बस पकडी़ और चल पडा़ अपनी  मनपसन्द राह यानि मंजिल की ओर। जय श्रीकृष्णा। जय सुदामाजी की।

पोरबन्दर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी और श्री कृष्णजी के सखा श्री सुदामाजी की जन्म स्थली हैं। रास्ते में, भोगात, लामबा, हरसद, वीसावडा, पालकडा, रातडी आवीयो नतलब आया। यहाँ हऱसद माताजी का चर्चित मंदिर हैं। कुछ शब्द जैसे बे वी गयो, आ वी गयो, चालो, सू नाम छै, क्या जाओ छौ, तमारो देश मतलब गावँ के गुजराती भाषा के शब्द बडे़ मधुर लगते थे। पोरबन्दर में कीर्ती मंदिर यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के दर्शन किए बाद में सुदामा  मंदिर के दर्शन, राऩावाव में जामुवंत गुफा के जो पोरबन्दर से 12 किलोनीटर की दूरी पर है। (जामवंत की गुफा की मिट्टी में सोना पाया जाता हैं ऐसा यहाँ के लोग कहते हैं, परंतु यह मिट्टी घर तक ले जाते जाते गायब हो जाती हैं केवल कुछ नसीब वालों के घर तक पहुंचती हैं।)

माधोपुर में माँ रानी रुक्मणी के मंदिर के दर्शन किये। माधोपुर पोरबन्दर से 40 किलोमीटर दूर है। यह माँ रुक्मणी का जन्म स्थल हैं जहाँ से भगवान श्री कृष्ण रुक्मणी को भगा कर ले गये थे। इसके बाद चौपाटी गया तथा शाम को राम मंदिर शांतिपनी मंदिर गया वहाँ लक्ष्मी-नारायण  के दर्शन किए। और रात को सूरत के लिये  ट्रेन पकड़ी जो पोरबन्दर से नौ बजकर सात  मिनट पर मुंबई के लिये रवाना हुई। पोरबन्दर की छवि निराली है। पुरानी यादें ताजा हो गईं। कुछ पुराने मित्र मिल गये। बडा़ मजा आया। अब सूरत से मुझे शिरडी जाना था जो नासिक से कुछ आगे है। रास्ते में बड़े-बडे़ स्टेशन जैसे जामनगर, राजकोट, सुरेन्द्रनगर, नडियाड, कणजरी बोरीवली, आनन्द, वसाद, बडोदरा (बरोडा), विश्वामित्री, ईटोला, मियागाम, करजन, भरूच, अंकलेश्वर, पानौली, कौसम्मभा, कीम, सायण, गोठनगाम आदि-आदि  फिर सूरत आया। यहाँ की भाषा वाह क्या कहने- आ बाजू मतलब “इस तरफ”। पग मतलब “पैर”, हम सपिड बधारी मतलब “रफ्तार तेज कर ली”, हम जौईयो का मतलब “चाहना”, जलसा करो मतलब “आनंद हो”, तपास मतलब “ढूँढना”, बांधौ नथी मतलब “कोई ऐतराज नहीं” आदि-आदि।

भरूच में सिंगदाना (मूंगफली) बहुत मिलता है। वैसे समस्त गुजरात में मूंगफली, अरणड, बाजरा, मिर्च, सौप, सूरजमुखी, जौ, नारियल, कैसर आम, आलू, अदरक, लहसुन, सिरडी (ईख मतलब गन्ना), चना, मुँग दाल, अरहर दाल आदि-आदि बहुत होता हैं। यहाँ ज़मीन में आयल (तेल) बहुत निकलता है। सूरत में डायमंड यानी हीरा और साडि्यों का काम ज्यादा होता हैं। राजकोट में मशीनरी का जिस मशीन का पार्ट कहीं नहीं मिलता वह यहाँ जरूर मिल जाएगा। साढ़े बारह बजे सूरत पहुँचा और सूरत बस अड्डे से नासिक के लिए बस पकड़ी जो डेढ़ बजे नासिक के लिए रवाना हुई।  नवसार, धर्मपुरा और पेठा से होती हुए नासिक पौने नौ बजे पहुँची। धर्मपुरा में नाश्ते के लिए एक होटल पर रुकी जो बहुत ही बेकार था केवल भजिया चाय और कोल्ड ड्रिंक के अलावा यहाँ कुछ नहीं था। रास्ता भी काफी खराब था।

नासिक से शिर्डी के लिए बस ली जो नौ बजे शिर्डी के लिए रवाना हुई। नासिक बहुत खूबसूरत शहर है। शिर्डी ग्यारह बजकर बीस मिनट पर पहुँच गया। और होटल ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर पहुँच गया। सुबह बाबा साईनाथ के दर्शन किए। रविवार की वजह से मंदिर में बहुत भीड़ थी। यहाँ पहले दर्शन पास लेना पडता हैं फिर दर्शन की लाईन में लगना पडता है। लाईन से ही बाबा के दर्शन होते हैं। हर अच्छी और पक्की व्यवस्था है। बड़े आराम से दर्शन दिए बाबा साईनाथ जी महाराज ने। दिल और मन दोनों गदगद हो गया। थोडा बाजार घूमा और फिर खाना खाकरवापस होटल आ गया। और थोडा सा आराम किया। उसके बाद ट्रैवल एजेंसी से गोवा जाने वाली बस की टिकट कराई जो चार बजे की थी। होटल से सवा तीन बजे निकला और बस पकडी। बस ठीक चार बजे गोवा के लिए चल पड़ी। शिर्डी छोडने का दिल तो नहीं कर रहा था, परन्तु आध्यात्मिकता में ज्यादा न पड़ कर बाकी कार्य भी पूरे करने थे क्योंकि काफी दिनों से मेरी इच्छा गोवा देखने की थी, तो मैने सोचा यह अच्छा अवसर हैं क्योंकि की गोवा यहाँ से नजदीक भी  था अत: इस अवसर का लाभ लिया जाए इसलिए मैने आनन-फानन में चार  बजे गोवा की टिकट कराई और चल दिया गोवा   बच्चों को बोला तो वे भी बड़े खुश हुए और उन्होंने गोवा से दिल्ली वापसी की 24 तारीख की चार बजकर पैंतीस मिनट की एयर एशिया की टिकट की बुकिंग करा दी ।

अब मै सुबह पाँच बजे गोवा पहुँच गया था। रास्ते में गाडी कोपरगाँव, अहमदनगर टोल पर रुकी। पणजी से होते हुए गोवा सवा दस बजे पहुँच गया। वहाँ से कोलुआ बीच के लिए टैक्सी ली और सीधा जिम्मी कॉटेज पहुँचा। ग्यारह बजे कमरा लिया। थोड़ा आराम किया और एक बजे कोलुआ बीच गया। पूरे दिन मौज मस्ती की। खाना खाया। शाम को मार्केटिंग की। अगले दिन उतर (नौर्थ) गोवा घूमने गया। फिर पणजी आया। यहाँ कैसिनो बहुत हैं  यहाँ जुआ खेलना अलाउड है। यहाँ के लोग जुआ बहुत खेलते हैं।  गोवा में नारियल, काजू बहुत होता है। और यहाँ शराब भी बहुत बनती है। ख़ासकर काजू और नारियल की। मंगलवार 23 अक्तूबर 2018 को बस से नौर्थ गोवा घूमा। सिन्कूरियम डॉलफिन ट्रिप पर गया। सनो पार्क घूमा। रास्ते में रिवर जुआरी और रिवर मांडवी, रॉक बीच आए। 24 अक्तूबर 2018 को दाबोली विमानतल से चार  बजकर पैंतीस  मिनट पर एयर एशिया की फ्लाइट पकड़ी ।  सात बजकर अठारह मिनट पर दिल्ली हवाई अड्डा पहुँच गया और 8 बजकर 40 मिनट पर वापस अपने आशियानें मतलब घर पहुँच गया। आखिर में जमानें की खाक़ छान कर “राज़” वापस अपने द्वार।

© श्री राजेन्द्र कुमार भंडारी “राज”

(श्री राजेन्द्र कुमार भंडारी ” राज” बैंक में अधिकारी है। आपकी लेखन में  विशेष अभिरुचि है। आपकी प्रकाशित पुस्तक “दिल की बात (गजल संग्रह) है।) 

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प्लैटिनम हाइट्स , सेक्टर- 18 बी
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