1

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 78 ☆ दमखम दिखाने दो ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “दमखम दिखाने दो”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 78 – दमखम दिखाने दो 

प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। बहुत से बिंदु इस आधार पर तय होते हैं कि सामने वाला क्या कर रहा है, हम उससे कैसे खुद को बेहतर बनाकर प्रस्तुत करें। आनन -फानन में मगनलाल जी एक से बढ़कर एक कारनामें करते जा रहे हैं ये बात अलग है कि वे वही करते हैं जो कार्यालय के प्रमुख जी करते हैं। झूठ की बुनियाद पर कागज की नाव चलकर जैसे तैसे हीरो तो बन गए पर इस बात का डर हमेशा बना रहता है कि कहीं जल के बहाव में भींग कर अपना अस्तित्व न मिटा दें। सो वे सारे बुद्धिजीवी वर्ग से दूरी बनाते हुए मूर्खों को ही साथ लेकर चलने में भलाई समझते हैं।

कहीं ऐसा न हो कि कोई राजपाठ लेकर भाग जाए वैसे भी भागने और भगाने का क्रम तो अनवरत चलता रहा है। अपनी मर्जी से सौंपने की तैयारी करिए अन्यथा हमसे छीनते भी बनता है। हम भी गुटबाजी में सुकून महसूस करते हैं। बिना तोड़फोड़ आंनद  नहीं आता। जल का उतार- चढ़ाव ही लहरों व किनारों के बीच जुड़ाव बनाए रखता है। बहसबाजी के दौरान  कई कड़वे सत्य निकल कर आते हैं। कहते हैं कि  बिना मौसम की बरसात किसी न किसी अनिष्ट का संकेत है सो  ऐसी बरसातों के लिए तैयार होना समझदार व्यक्ति की निशानी होती है।

कई बार जाने अनजाने लोग ग़लतियाँ कर देते हैं जिससे  लोग उनसे दूरी बना लेते हैं। होना ये चाहिए कि हम किसी भी विवाद पर जल्दबाजी में प्रतिक्रिया न दें, थोड़ा धैर्य रखने से उलझन कम होती है, सिक्के दोनों पहलुओं को समझने का समय भी मिल जाता है।

ध्यान से देखें तो लगभग सारे विवाद अकारण ही होते हैं जिनके मूल में कोई आधार नहीं रहता  बस  अपने को सही साबित करने की होड़ में लोग दूर होते चले जाते हैं।  ऐसे में मूक दर्शक मन ही मन अपना निर्णय सुरक्षित रख लेते हैं व कौन  कैसा है, किसकी ग़लती है ये सब आँकलन करते हैं। इस दौरान मजेदार बात सामने आती है कि जो कुछ नहीं करता वो सामने से आकर बिना बात हंगामा करते हुए सब कुछ छोड़ देता है और पलायन में ही अपना भविष्य सुरक्षित समझता है। बात – बेबात पर अपना रुतबा दिखाने वाले अंत में पेपरबाजी पर उतर आते हैं और सारा श्रेय लेकर स्वयंसिद्धा बनकर इतराते हुए अघोषित जंग को जीतने का दमखम दिखाने लगते हैं।

अतः कोई भी निर्णय लेने से पहले कई बार अवश्य सोचे तभी सकारात्मक हल मिलेगा और अच्छे लोग आपके साथ जुड़े रह पायेंगे।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 129 ☆ व्यंग्य – ड्रेन आउट द मनी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  द्वारा लिखित एक विचारणीय व्यंग्य  ‘ड्रेन आउट द मनी’ । इस विचारणीय आलेख के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 129 ☆

🌻  व्यंग्य – ड्रेन आउट द मनी 🌻

दक्षिण भारत के एक जूनियर इंजीनियर साहब के घर के ड्रेन पाईप से एंटी करप्शन ब्यूरो ने पांच सौ रुपये के ढ़ेर से बंडल ढ़ूंढ़ निकाले और चोक नाली से जल की अविरल धारा पुनः बह निकली. अब इन जाँच एजेंसियो को कौन बताये कि रुपये कमाना कितना कठिन है. घोटाले, भ्रष्टाचार, कमीशन, हफ्ता, पुलिसिया वसूली, माफिया, शराब, ड्रग्स, सेक्स रैकेट,  वगैरह कुछ लोकप्रिय फार्मूले हैं जिनमें रातो की नींद दिन का चैन सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है, तब कहीं बाथरूम की दीवारों, छत की सीलिंग, फर्श या गद्दे में छिपाने लायक थोड़े से रुपये जुट पाते हैं. अपने और परिवार के सदस्यो यहां तक कि कुत्ते बिल्ली के नाम पर सोना चांदी, चल-अचल संपत्ति अर्जित करना हंसी खेल नही होता. उनसे पूछिये जिन्होंने ऐसी अकूत कमाई की है. अरे मन मारना पड़ता है तरह तरह के समझौते करने पड़ते हैं, गलत को सही बताना पड़ता है. किसी की बीमारी की मजबूरी में उससे रुपये ऐंठने के लिये कितना बेगैरत बनना पड़ता है, यह किसी भी ऐसे डाक्टर से पूछ लीजीये जिसने महामारी की आपदा में अवसर तलाश कर रुपये बनायें हों.  जांच के दौरान संपत्ति का कोई हिसाब-किताब नहीं दे पाने का रुतबा हासिल करना बिल्कुल सरल नही होता. ऐसे बड़े लोगों के ड्राइवर, नौकर, कर्मचारी भी उनकी बेनामी संपत्तियो के आफिशियल मालिक होते हैं. नेता जी, सरकारी अफसर, ठेकेदार, डाक्टर जिसे जहाँ मौका मिल पाता है अपने सारे जुगाड़ और योग्यता से संम्पत्ति बढ़ाने में जुटे दिखते हैं. दूसरी ओर आम आदमी अपना पसीना निचोड़ निचोड़ कर महीने दर महीने बीमा की किश्तें भरता रहता है और बैंक स्टेटमेंट्स में बढ़ते रुपयो को देखकर मुंगेरीलाल के हसीन सपनों में खोया रहता है. वैसे रुपये कमाना जितना कठिन है, उन्हें संभालना उससे भी ज्यादा मुश्किल. माया बड़ी ठगनी होती है. सही निवेश न हो तो मेहनत से कमाई सारी संपत्ति डेप्रिशियेशन की भेंट चढ़ जाती है. शेयर बाजार बड़ों बड़ो को रातों रात सड़क पर ले आने की क्षमता रखता है.

आई ए एस के साक्षात्कार में पूछा गया यदि  2 करोड़ रुपये १० मिनट में छिपाने का समय मिलता हैं तो आप क्या करेंगे ?  उम्मीदवार का उत्तर था मैं ऑनलाइन आयकर विभाग को स्वयं सूचित करूँगा और उनको जानकारी दूंगा कि मेरे पास 2 करोड़ रुपये अघोषित धन हैं. मै इस 2 करोड़ पर जितना कर और जुर्माना बनता हैं सब जमा करना चाहता हूँ. जितना कर और जुर्माना निर्धारित होगा उसे जमा कर दूंगा. इसके बाद जो भी धनराशि बचेगी वह सफ़ेद धन बन जाएगी और उसे म्यूचुअल फंड में निवेश कर दूंगा. कुछ ही वर्षों में वह बढ़कर 2 करोड़ से ज्यादा हो जायेगी. उम्मीदवार का चयन कर लिया गया. नियम पूर्वक चलना श्रेष्ठ मार्ग होता है. रुपयों को रोलिंग में बने रहना चाहिये. लक्ष्मी मैया सदा ऐसी कृपा बनायें रखें कि अच्छा पैसा खूब आये और हमेशा अच्छे कामों में लगता रहे. सद्कार्यो में किया गया निवेश पुण्य अर्जित करता है  और पुण्य ही वह करेंसी है जो परलोक में भी साथ जा सकती है. शायद इसीलिये धर्माचार्य भले ही स्वयं अपने आश्रमो में लकदक संग्रह करते हों पर अपने शिष्यों को यही शिक्षा देते नजर आते हैं कि रुपया हाथ का मैल है. दान दया ही माया को स्थायित्व देते हैं. तो यदि घर के ड्रेन पाईप से रुपयों की बरामदगी से बचना हो तो  मेक इट योर हेबिट टु ड्रेन आउट द मनी इन गुड काजेज एण्ड हेलपिंग अदर्स.  

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #116 ☆ व्यंग्य – कलियुग में चमत्कार ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘कलियुग में चमत्कार। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 11 ☆

☆ व्यंग्य – कलियुग में चमत्कार 

एस.पी.साहब दूसरे शहर से बदली होकर आये थे। चार महीने बाद उनके पुत्र की शादी हुई। इंस्पेक्टर प्रीतमलाल को बुलाया, कहा, ‘शामियाना, केटरिंग और रोशनी का इंतज़ाम करो। जो भी पेमेंट बनेगा कर दिया जाएगा। एडवांस देना ज़रूरी हो तो वह भी दिया जा सकता है। इंतज़ाम बढ़िया होना चाहिए।’                       

प्रीतमलाल ने सैल्यूट मारा, कहा, ‘हो जाएगा, सर,बढ़िया इन्तज़ाम हो जाएगा। आप निश्चिंत रहें।’

प्रीतमलाल मोटरसाइकिल लेकर पंजाब टेंट हाउस के सरदार जी के पास पहुँचे। कहा, ‘एस पी साहब के यहाँ अगली पच्चीस की शादी है। इन्तज़ाम करना है। नोट कर लो।’

सुनकर सरदार जी का मुँह उतर गया। कुछ सेकंड मुँह से बोल नहीं निकला। गला साफ करके ज़बरदस्ती प्रसन्नता दिखाते हुए बोले, ‘हो जाएगा, साब, बिलकुल हो जाएगा। आप फिकर मत करो। आप का काम नहीं होगा तो किसका होगा?’

इंस्पेक्टर साहब बोले, ‘पेमेंट की चिन्ता मत करना। साहब ने कहा है कि हो जाएगा।’

सरदार जी ने फीकी मुस्कान के साथ जवाब दिया, ‘वो ठीक है सर। कोई बात नहीं है। इन्तजाम हो जाएगा। डिपार्टमेंट का काम अपना काम है।’

इंस्पेक्टर साहब ने पूछा, ‘कुछ एडवांस वगैरः की ज़रूरत है क्या?’

सरदार जी घबराकर बोले, ‘अरे नहीं सर। एडवांस का क्या होगा?कोई प्राब्लम नहीं है। आपका काम हो जाएगा।’

प्रीतमलाल संतुष्ट होकर लौट गये।

एस. पी. साहब के पुत्र की शादी हुई। इन्तज़ाम एकदम पुख्ता था। लंबा चौड़ा शामियाना लगा,नीचे कुर्सियों और सोफों की लम्बी कतार। जगमग करती रोशनी। खाने के लिए बड़े दायरे में फैले बूथ। आजकल के फैशन के हिसाब से तरह तरह की भोजन-सामग्री। सारा इंतज़ाम एस. पी.साहब की पोज़ीशन के हिसाब से। मेहमान खूब खुश होकर गये।

सबेरे सब काम सिमट गया। शामियाना, कुर्सियां, बूथ, देखते देखते सब ग़ायब हो गये।

चार पाँच दिन बाद इंस्पेक्टर प्रीतमलाल फिर सरदार जी के पास पहुँचे। बोले, ‘चलो सरदार जी, साहब ने हिसाब के लिए बुलाया है।’

सरदार जी सुनकर परेशान हो गये। बोले, ‘किस बात का हिसाब जी?’

इंस्पेक्टर ने कहा, ‘क्यों, शादी के इन्तज़ाम का हिसाब नहीं करना है?’

सरदार जी हाथ हिलाकर बोले, ‘कोई हिसाब नहीं है सर। आपका काम हो गया, हिसाब की क्या बात है?’

दरोगा जी बोले, ‘ये साहब ज़रा दूसरी तरह के हैं। धरम-करम वाले हैं। बिना हिसाब किये नहीं मानेंगे। चलो,हिसाब कर लो।’

सरदार जी और परेशान होकर बोले, ‘नईं सर,माफ करो। कोई हिसाब किताब नहीं है। आप खुश खुश घर जाओ। साहब से हमारा सलाम बोलना।’

प्रीतमलाल भी कुछ परेशान हुए। समझाकर बोले, ‘अरे चलो सरदार जी,साहब सचमुच हिसाब करना चाहते हैं।’

सरदार जी हाथ जोड़कर बोले, ‘जुरूर हमसे कोई गलती हुई है जो आप हिसाब की बात बार बार कर रहे हैं। बताओ जी क्या गलती हुई?’

प्रीतमलाल ने हँसकर जवाब दिया, ‘अरे   कोई गलती नहीं है। चलो, चल कर अपना पैसा ले लो।’

सरदार जी ने अपनी हिसाब की नोटबुक उठायी और उसके पन्ने पलटने लगे। फिर बोले, ‘सर जी, हमारे खाते में तो आपका कोई काम हुआ ही नहीं।’

प्रीतमलाल आश्चर्य से बोले, ‘क्या?’

सरदार जी पन्ने पलटते हुए बोले, ‘इसमें तो कहीं आपका हिसाब चढ़ा नहीं है। हमारी दुकान से तो आपका काम हुआ नहीं।’

प्रीतमलाल विस्मित होकर बोले, ‘शादी में इन्तज़ाम आपका नहीं था?’

सरदार जी फिर नोटबुक पर नज़र टिकाकर बोले, ‘इस नोटबुक के हिसाब से तो नहीं था, सर।’

प्रीतमलाल बोले, ‘लेकिन मैं तो आपको आर्डर देकर गया था।’

सरदार जी ने जवाब दिया, ‘जुरूर दे गये थे, लेकिन उस दिन की बुकिंग दूसरी जगह की पहले से थी। मैं आपको बताना भूल गया था। बाद में मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन आपसे कंटैक्ट नहीं हुआ।’

प्रीतमलाल परेशान होकर लौट गये।

एस.पी.साहब को बताया तो साहब ने सरदार जी को तलब किया। सरदार जी अपनी नोटबुक लिये पहुँचे।

साहब ने पूछा, ‘सरदार जी, अपना हिसाब क्यों नहीं बता रहे हैं?’

सरदार जी ने बड़ी सादगी से जवाब दिया, ‘सर जी, हमने तो आपका कोई काम किया ही नहीं। हिसाब कैसे बतायें?हमारी नोटबुक में तो कुछ चढ़ा ही नहीं। जुरूर कुछ गल्तफैमी हुई है।’

एस.पी. साहब हँसे, बोले, ‘हम खूब समझते हैं। नाटक मत करो,सरदार जी। अपना पैसा ले लो।’

सरदार जी अपने कानों को हाथ लगाकर बोले, ‘हम सच बोल रहे हैं, सर जी। हमारी दुकान से आपका काम नहीं हुआ।’

एस. पी. साहब बोले, ‘बहुत हुआ सरदार जी। अपने पैसे ले लो।’

सरदार जी दुखी भाव से बोले, ‘कैसे ले लें, सर जी?हम बिना काम का पैसा लेना गुनाह समझते हैं।’

एस.पी.साहब निरुत्तर हो गये। उसके बाद दो तीन बार इंस्पेक्टर प्रीतमलाल फिर गये, लेकिन सरदार जी की नोटबुक यही कहती रही कि उन्होंने एस.पी.साहब के यहाँ कोई काम नहीं किया। प्रीतमलाल ने उनसे कहा कि कई लोगों ने उन्हें वहाँ इन्तज़ाम में लगा देखा था तो उनका जवाब था कि कोई उनका हमशकल होगा, वे तो उस दिन एसपी साहब के बंगले के आसपास भी नहीं गये।

उनसे यह भी कहा गया कि शादी के दिन आये सामान पर ‘पंजाब टेंट हाउस’ लिखा देखा गया था। उस पर भी सरदार जी का जवाब था, ‘नईं जी। जुरूर आपको गल्तफैमी हुई होगी।’

उसके बाद पुलिस हल्के में चर्चा चल पड़ी कि कैसे जिन सरदार जी को काम दिया गया था वे तो एस. पी.साहब के बंगले पर पहुँचे ही नहीं और फिर भी किसी चमत्कार से सारा काम हो गया। पुलिस हल्के से निकलकर यह चर्चा पूरे शहर में फैल गयी। लोग पुरानी कथाओं के उदाहरण देकर सिद्ध करने लगे कि यह घटना नयी नहीं है। पहले भी भगवान ने आदमी का रूप धारण कर कई बार भक्तों को संकट से बचाया है। इस घटना से सिद्ध हुआ कि कलियुग में भी चमत्कार संभव है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 9 – व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में – भाग-3 ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।  

आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की अगली कड़ी में आलेख ‘व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में’ – भाग-3।  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 9 – व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में – भाग-3 ☆ श्री रमेश सैनी ☆ 

[प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ]

बीसवीं सदी के साहित्य के इतिहास को खंगालना है, तो बहुत कुछ चकित करने वाली चीज मिल जाती हैं वैसे इतिहास समय का दस्तावेज होता है..वह होना चाहिए, पर होता नहीं है. इतिहास में अधिकतर राजनीतिक उतार-चढ़ाव, उथल पुथल राज्योत्थान पतन का अधिक महत्व दिया जाता जा रहा है. इतिहास मे जीवन मूल्यों, मानवीय संवेदना और सामाजिक परिवर्तन परिदृश्य नहीं के बराबर होता है. समाजशास्त्र भी सामाजिक गतिविधियों और परिवर्तन पर अधिक बात करता है. यहाँ पर मानवीय संवेदना छूट जाती हैं. एक साहित्य ही है. जो मानवीय सरोकारों, चिंताओं, परिवर्तन के परिदृश्य  समय के साथ समाज के समक्ष रखता है .साहित्य सदा  समकालीनता की बात करता है.समकालीन सरोकार चिंताएं, चरित्र, साहित्य ही लेकर आगे बढ़ता है. अगर विभिन्न समय के साहित्य का अध्ययन करें. तब उस समय की सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का दृश्यावलोकन  करने मिल जाता है.

साहित्य के इतिहास को अधिक खनन से बहुत सी चीजें हमारे हाथ लग जाती हैं. जिसकी हम  कल्पना नहीं करते हैं. कबीर के समय की स्थितियां, विसंगतियां, प्रवृत्तियां, धार्मिक अंधविश्वास आदि कबीर के साहित्य में से ही मिलते हैं. कबीर के साहित्य को पढ़ने से उस समय की सामाजिक स्थितियां का ज्ञान हो जाता है. इसी प्रकार हम भारतेंदु हरिश्चंद्र को पढ़ते हैं. तो उस समय का राजनीतिक, सामाजिक और शासन व्यवस्था की अराजकता का पता चल जाता है. 20 वीं सदी का प्रारंभिक काल अंग्रेजी शासन का अराजकता का काल था. पर इसके साथ अंग्रेजी शासन को उखाड़ने के लिए  स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत भी हो गई थी. भारत में ग्रामीण क्षेत्रों की सामाजिक बनावट, आर्थिक संरचना, सामंती और जमींदारों के अत्याचारों आदि को नजदीक से परखना है. तो आपको उस समय के समकालीन साहित्य से गुजरना ही होगा. तब उस समय के निर्विवाद  प्रमुख साहित्यकार हैं कहानीकार उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद..जिनकी रचनाओं में गांव के उबड़खाबड़ रास्ते, संकुचित विचारों, रीति रिवाजों, जातिवाद आदि की गलियां सहजता से मिल जाएंगी. मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों, उपन्यासों आदि में अपने समय की गरीबी, भुखमरी अंधविश्वास, छुआछूत, पाखंड,जमींदारी प्रथा, महाजनी कुचक्र पाठक के सामने निश्चलता,निडरता से सामने उभारा हैं. पर हां इसके साथ ही समाज में और व्यक्ति में नैतिक मूल्यों में ईमानदारी, ग्रामीणों का भोलापन, आदि आपको सहजता से मिल जाएगा. बानगी की तौर पर उनकी कुछ रचनाओं पर बात की जा सकती है.

मुंशी प्रेमचंद की अपने समय की प्रतिनिधि और चर्चित कहानी “ठाकुर का कुआं” है, जिसमें उस समय का परिदृश्य एक आईने के समान नजर आता है. उस समय की गरीबी और छुआछूत का भयावह दृश्य हमें सोचने को मजबूर कर देता है. उस समय गांव में ठाकुर ब्राह्मण, दलित के कुएँ अलग अलग होते थे. दलित अपने कुएं के अलावा किसी अन्य कुएं से पानी नहीं भर सकते था. अन्य कुएँ  से पानी भरने पर दलित की सजा तय थी और सजा को सोचने से शरीर के रुएँ खड़े हो जाते हैं. दलित के कुएं में जानवर मर गया है. पानी में बदबू आ रही है. गंगी का बीमार पति जब पानी पीता है. बदबू से उसका स्वाद कसैला हो जाता है.पति को प्यास लगी है. गंगी आश्वस्त करती है कि रात के अंधेरे में वह उसके लिए ठाकुर के कुएंँ से पानी ले आएगी. ऊंची जाति का आतंक इतना भयभीत करने वाला होता था कि वह कोशिश करने के बावजूद पानी लेकर नहीं आ सकी और उसे अपनी बाल्टी और रस्सी को कुएंँ में छोड़कर भागना पड़ा. अन्यथा  शायद उसकी जान को को भी खतरा हो सकता था.और गंगी का पति राजकुमार प्यास से बेहाल हो कर बदबूदार पानी पीने को विवश था. इस रचना में उस समय की जातिगत व्यवस्था अत्यंत खतरनाक बिंदु पर थी. इस रचना में छुआछूत और गरीबी का भयावह जो दृश्य हमें दिखाई देता है उसकी आज के समय में हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.  पर आज समाज में जातिगत, छुआछूत वर्ण व्यवस्था  की बुराईयों /विडम्बना में काफी कुछ बदलाव देखने में आया है.

आज हमें ऐसे दृश्य कम देखने मिलते हैं. फिर भी आंचलिक गांव के लोगों की मानसिकता जस का तस दिख जाती है. आज भी ऊंची जाति वर्ग के लोगों का अत्याचार दलित वर्ग पर यदा-कदा सुनाई पड़ जाता है. इसी तरह एक और कहानी का उल्लेख करना जरूरी है “बेटी का धन” यह ऐसी रचना है जिसमें छल, प्रपंच, स्वाभिमान, और उच्चतर मूल्य  समाहित  है. प्रेमचंद ने अपने साहित्य में समय के साथ जिया है. बीसवीं सदी के प्रारंभिक चालीस साल के तत्कालीन साहित्य में भारत के जनजीवन में  सामाजिक वर्ण संरचना, जातिगत व्यवस्था सामंती और जमींदारी प्रथा, छुआछूत, गरीबी भुखमरी के साथ साथ भारतीय संस्कृति जीवन मूल्यों का दर्शन भी दिखाई पड़ते हैं.वह मानवीय मूल्यों और संवेदनाओ का संवेदनहीन समय था. पढ़कर और सुनकर हम चकित रह जाते हैं.  ग्रामीण  परिवेश की तुलना आज के समय से करेंगे तो हमारी आंखें खुली हो जाती है आज का समय इतना बदल गया है कि पुराने समय से उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती है. प्रेमचंद का साहित्य समय के साथ-साथ मानवीय मूल्यों की चिंताओं से रूबरू  कराने वाला है. उनकी अनेक कहानियां ‘पंच परमेश्वर, नमक का दरोगा, बड़े भाई साहब, पूस की रात, कफन, बेटी का धन, शराब की दुकान, ईदगाह, बूढ़ी काकी, तावान, दो बैलों की जोड़ी,आदि रचनाएं अपने समय का प्रतीक प्रतिनिधित्व करती हैं.

इन रचनाओं के माध्यम से उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, गतिविधियों को बहुत आसानी से समझ सकते हैं. अगर हम राजनीति की बात करें, तो उस समय कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रता का आंदोलन तो कर रही थी. उसी समय काँग्रेस भारत के दबे कुचले लोगों का जीवन सुधारने हेतू समाज में व्याप्त अंधविश्वास, भुखमरी, छुआछूत, जातिगत वर्ग भेद की विसंगतियों और सामंती, जमीदारी अत्याचारों के कुचक्र को तोड़ने के लिए भी प्रतिबद्धता के साथ निचले स्तर पर काम कर रही थी. उस समय की कांग्रेस और आज की कांग्रेस में जमीन आसमान का अंतर पाते हैं. साहित्य में समय के  अंतर्संबंध में किसी राजनीतिक दल इस तरह जान रहे हैं. यह साहित्य के समय के संबंध से ही संभव है. मुंशी प्रेमचंद का साहित्य समय के साथ सदियों से चले आ रही  सामाजिक कुरीतियाँ,अंधविश्वास को व्यक्त करने वाला है. जो उस समय की मार्मिक कुरीतियाँ पर सोचने को मजबूर करता है. इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है और इसके निवारण के लिए राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक उपक्रम क्या हो सकते थे या अब हो रहे हैं यह प्रश्न अभी भी जिंदा है. उस समय की भारतीय राजनीतिक संस्थाएं अपने ढंग से जूझ रही थी. तभी तो आज सामाजिक स्तर पर इतना बड़ा बदलाव देख रहे हैं. शायद इसके मूल के पार्श्व में मुख्य कारण लेखक और साहित्यकार  का अपने समय से जुड़ना है. यह जुड़ाव ही मानवीय संवेदना के साथ मनुष्य को बेहतर बनाने के लिए तत्पर है.

क्रमशः….. ( शेष अगले अंको में.)

© श्री रमेश सैनी 

सम्पर्क  : 245/ए, एफ.सी.आई. लाइन, त्रिमूर्ति नगर, दमोह नाका, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 482 002

मोबा. 8319856044  9825866402

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 128 ☆ व्यंग्य – कंफ्यूजन में ग्लैमर का फ्यूजन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  द्वारा लिखित एक विचारणीय व्यंग्य  ‘कंफ्यूजन में ग्लैमर का फ्यूजन’ । इस विचारणीय आलेख के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 128 ☆

🌻  व्यंग्य – कंफ्यूजन में ग्लैमर का फ्यूजन 🌻

कंफ्यूजन का मजा ही अलग होता है.  तभी तो लखनऊ में नबाब साहब ने भूल भुलैया बनवाई थी.  आज भी लोग टिकिट लेकर वहां जाते हैं और खुद के गुम होने का लुत्फ उठाते हैं.  हुआ यों था कि लखनऊ में भयंकर अकाल पड़ा, पूरा अवध दाने दाने का मोहताज हो गया.  लोग मदद मांगने नवाब के पास गये.  वजीरो ने सलाह दी कि खजाने में जमा राशि गरीबो में बाँट दी जाये.  मगर नवाब साहब का मानना था की खैरात में धन बांटने से लोगो को हराम का खाने की आदत पड़ जाएगी. इसलिए उन्होंने रोजगार देने के लिए एक इमारत का निर्माण करवाया जिसको बाद में बड़ा इमामबाड़ा नाम दिया गया. इमामबाड़े में असफी मस्जिद, बावड़ी और भूलभुलैया है. दिल्ली में भी भूल भुलैया है, जो लोकप्रिय पर्यटन स्थल है.  कई बाग बगीचों में भी इसी तर्ज पर ऐसी पौध  वीथिकायें बनाई गई हैं जहां गुम होने के लिये प्रेमी जोडे दूर दूर से वहां घूमने चले आते हैं.

दरअसल कंफ्यूजन में मजे लेने का कौशल हम सब बचपन से ही सीख जाते हैं.  कोई भी बाल पत्रिका उठा लें एक सिरे पर बिल्ली और दूसरे सिरे पर चूहे का एक क्विज  मिल ही जायेगा, बीच में खूब लम्बा घुमावदार ऊपर नीचे चक्कर वाला, पूरे पेज पर पसरा हुआ रास्ता होगा.  बिना कलम उठाये बच्चे को बिल्ली के लिये चूहे तक पहुंचने का शार्टेस्ट रास्ता ढ़ूंढ़ना होता है.  खेलने वाला बच्चा कंफ्यूज हो जाता है, किसी ऐसे दो राहे के चक्रव्यू में उलझ जाता है कि चूहे तक पहुंचने से पहले ही डेड एंड आ जाता  है.

कंफ्यूजन में यदि ग्लैमर का फ्यूजन हो जाये, तो क्या कहने.  चिंकी मिन्की, एक से कपड़ो में बिल्कुल एक सी कद काठी,समान आवाज वाली, एक सी सजी संवरी हू बहू दिखने वाली जुड़वा बहने हैं.  यू ट्यूब से लेकर स्टेज शो तक उनके रोचक कंफ्यूजन ने धमाल मचा रखा है.  कौन चिंकि और कौन मिंकी यह शायद वे स्वयं भी भूल जाती हों.  पर उनकी प्रस्तुतियों में मजा बहुत आता है.  कनफ्यूज दर्शक कभी इसको देखता है कभी उसको, उलझ कर रह जाता है, जैसे मिरर इमेज हो.  पुरानी फिल्मो में जिन्होने सीता और गीता या राम और श्याम देखी हो वे जानते है कि हमारे डायरेक्टर डबल रोल से जुडवा भाई बहनो के कंफ्यूजन में रोमांच, हास्य और मनोरंजन सब ढ़ूंढ़ निकालते की क्षमता रखते हैं.

कंफ्यूजन सबको होता है, जब साहित्यकार को कंफ्यूजन होता है तो वे  संदेह अलंकार रच डालते हैं.  जैसे कि “नारी बिच सारी है कि सारी बिच नारी है”.  कवि भूषण को यह कंफ्यूजन तब हुआ था, जब वे भगवान कृष्ण के द्रोपदी की साड़ी अंतहीन कर उनकी लाज बचाने के प्रसंग का वर्णन कर रहे थे.

यूं इस देश में जनता महज कंफ्यूज दर्शक ही तो है.  पक्ष विपक्ष चिंकी मिंकी की तरह सत्ता के ग्लेमर से जनता को कनफ्युजियाय हुये हैं.  हर चुनावी शो में जनता बस डेड एंड तक ही पहुंच पाती है.  इस एंड पर बिल्ली दूध डकार जाती है, उस एंड पर चूहे मजे में देश कुतरते रहते हैं. सत्ता और जनता के बीच का सारा रास्ता बड़ा घुमावदार है.  आम आदमी ता उम्र इन भ्रम के गलियारों में भटकता रह जाता है.  सत्ता का अंतहीन सुख नेता बिना थके खींचते रहते हैं.  जनता साड़ी की तरह खिंचती, लिपटती रह जाती है.  अदालतो में न्याय के लिये भटकता आदमी कानून की किताबों के ककहरे,काले कोट और जज के कटघरे में सालों जीत की आशा में कनफ्यूज्ड बना रहता है.   

चिंकी मिंकी सा कनफ्यूजन देश ही नही दुनियां में सर्वव्याप्त है.  दुनियां भ्रम में है कि पाकिस्तान में सरकार जनता की है या मिलिट्री की.वहां की मिलिट्री इस भ्रम में है कि सरकार उसकी है या चीन की और जमाना भ्रम में है कि कोरोना वायरस चीन ने जानबूझकर फैलाया या यह प्राकृतिक विपदा के रूप में फैल गया.  इस और उस वैक्सीन के समाचारो के कनफ्यूजन में मुंह नाक ढ़ांके हुये लगभग बंद जिंदगी में दिन हफ्ते महीने निकलते जा रहे हैं.  अपनी दुआ है कि अब यह आंख मिचौली बंद हो, वैक्सीन आ जाये जिससे कंफ्यूजन में ग्लैमर का फ्यूजन चिंकी मिंकी शो लाइव देखा जा सके.   

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #114 ☆ व्यंग्य – शोभा बढ़ाने का मामला ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘शोभा बढ़ाने का मामला’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 114 ☆

☆ व्यंग्य – शोभा बढ़ाने का मामला 

वे मेरे एक मित्र वर्मा जी को पकड़ कर मेरे घर आये थे। पूरे दाँत दिखाकर बोले, ‘स्कूल खोल रहा हूँ। अगले महीने की बीस तारीख को उद्घाटन है। वर्मा जी ने चीफ गेस्ट के लिए आपका नाम सुझाया। कहा आप बड़े आदमी हैं, बहुत बड़े कॉलेज के प्रिंसिपल हैं। आपसे बेहतर आदमी इस काम के लिए नहीं मिलेगा। बस जी,आपकी सेवा में हाज़िर हो गया।’

मैंने पूछा, ‘स्कूल खोलने की बात आपके मन में कैसे आयी?’

वे बोले, ‘बस जी, ऐसे ही। कोई धंधा तो करना ही था। बिना धंधे के कैसे चलेगा?’

मैंने पूछा, ‘पहले क्या धंधा करते थे आप?’

वे बोले, ‘अपना पोल्ट्री का धंधा है जी। उसे बन्द करना है।’

मैंने पूछा, ‘क्यों?’

वे बोले, ‘उस धंधे में बरक्कत नहीं है। चौबीस घंटे की परेशानी है जी। कोई बीमारी लग जाए तो पूरी पोल्ट्री साफ हो जाती है। फिर नौकर भी बड़े बेईमान हो गये हैं। नजर चूकते ही दो चार मुर्गी-अंडे गायब हो जाते हैं। कहाँ तक चौकीदारी करें जी?मन बड़ा दुखी रहता है।’

मैंने पूछा, ‘तो फिर स्कूल खोलने की क्यों सोची?’

वे बोले, ‘अच्छा धंधा है जी। लागत कम है,मुनाफा अच्छा है। चार पाँच हजार रुपये महीने में पढ़ाने वाले मास्टर मिल जाते हैं। आजकल तो मजदूर भी दो तीन सौ रुपये रोज से कम नहीं लेता। पढ़े लिखे लोग सस्ते मिल जाते हैं,बेपढ़े लिखे लोग मँहगे पड़ते हैं।

‘इसके अलावा इस धंधे में ड्रेस और किताबों पर कमीशन भी अच्छा मिल जाएगा। बहुत रास्ते खुल जाएंगे।’

मैंने उनसे पूछा, ‘आप कितना पढ़े हैं?’

वे दाँत निकालकर बोले, ‘इंटर फेल हूँ जी। लेकिन धंधे की टेकनीक खूब जानता हूँ। स्कूल बढ़िया चलेगा। डिपार्टमेंट वालों से रसूख बना लिये हैं। आगे कोई परेशानी नहीं होगी।’

मैंने उनसे पूछा, ‘मंजूरी मिल गयी?’

वे बोले, ‘हाँ जी। वो काम तो आजकल रातोंरात हो जाता है। इंस्पेक्शन रिपोर्ट डिपार्टमेंट में ही बन जाती है। सब काम हो जाता है। वो कोई प्राब्लम नहीं है।’

उन्होंने विदा ली। चलते वक्त हाथ जोड़कर बोले, ‘हमें अपना कीमती वक्त जरूर दीजिएगा जी। आपसे हमारे प्रोग्राम की शोभा है।’

मैंने ‘निश्चिंत रहें’ कह कर उन्हें आश्वस्त किया।

उनका नाम पी.एल. सन्त था। आठ दस दिन बाद सन्त जी का फोन आया कि उद्घाटन कार्यक्रम टल गया है, अगली तारीख वे जल्दी बताएंगे। वे अपने मुर्गीख़ाने को स्कूल में बदलना चाहते थे, उसमें कुछ देर लग रही थी। उनकी नज़र में मुर्गियों और आदमी के बच्चों में कोई ख़ास फर्क नहीं था। बस मुर्गियों की जगह बच्चों को भर देना था। मुर्गियों के साधारण अंडे की जगह अब बच्चे सोने के अंडे देने वाले थे।

इस तैयारी में करीब डेढ़ महीना निकल गया और इस बीच मैं रिटायर होकर घर बैठ गया। फिर एक दिन सन्त जी का फोन आया कि मामला एकदम फिटफाट हो गया है और अगली बारह तारीख को मुझे चीफ गेस्ट के रूप में पधार कर प्रोग्राम की शोभा बढ़ानी है। मैंने सहमति ज़ाहिर कर दी।

आठ दस दिन बाद वे घर आ गये। बड़े उत्साह में थे। वर्मा जी साथ थे। सन्त जी उमंग में बोले, ‘बस सर, सब फिट हो गया। अब आपको शोभा बढ़ानी है। लो कार्ड देख लो। बढ़िया छपा है।’

उन्होंने बाइज्ज़त कार्ड मुझे भेंट किया। देकर बोले, ‘हमने अपने इलाके के एमएलए साहब को प्रोग्राम का अध्यक्ष बना दिया है। आप जानते ही हैं कि आजकल पॉलिटीशन को खुश किये बिना काम नहीं चलता। आप ठहरे एजुकेशन वाले, इसलिए बैलेंस के लिए पॉलिटिक्स वाले आदमी को शामिल कर लिया। आप से तो प्रोग्राम की शोभा बढ़नी है, लेकिन आगे वे ही काम आएंगे।’

मैंने कार्ड देखकर कहा, ‘कार्ड तो बढ़िया छपा है, लेकिन मेरे बारे में कुछ करेक्शन ज़रूरी है।’

सन्त जी अपनी उमंग में ब्रेक लगाकर बोले, ‘क्या हुआ जी? कुछ प्रिंटिंग की मिसटेक हो गयी क्या?  आपके नाम के आगे डॉक्टर तो लगाया है।’

मैंने कहा, ‘मेरे नाम के नीचे जो ‘प्राचार्य’ शब्द छपा है उससे पहले ‘रिटायर्ड’ लगाना ज़रूरी है।’

सन्त जी जैसे आसमान से गिरे, बोले, ‘क्या मतलब जी?’

मैंने कहा, ‘मैं पिछली तीस तारीख को रिटायर हो गया हूँ, इसलिए सही जानकारी के लिए ‘रिटायर्ड’ शब्द लगाना ज़रूरी है।’

सन्त जी का चेहरा उतर गया। उनका उत्साह ग़ायब हो गया। शिकायत के स्वर में बोले, ‘आपने पहले नहीं बताया।’

मैंने कहा, ‘क्या फर्क पड़ता है?’

वे दुखी स्वर में बोले, ‘ज़मीन आसमान का फर्क होता है जी। कुर्सी पर बैठे आदमी में पावर होता है, रिटायर्ड आदमी के पास क्या होता है?’

वर्मा जी ने बात सँभालने की कोशिश की, बोले, ‘कोई फर्क नहीं पड़ता। डॉक्टर साहब शहर के माने हुए विद्वान हैं। पूरा शहर इन्हें जानता है।’

सन्त जी आहत स्वर में बोले, ‘ज़रूर विद्वान होंगे जी, हम कहाँ इनकार करते हैं, लेकिन पावर की बात और है। ये तो दुखी करने वाली बात हो गयी जी।’

वे थोड़ी देर सिर लटकाये बैठे रहे, फिर बोले, ‘ठीक है जी। अब जो हुआ सो हुआ, लेकिन हम तो आपको प्रिंसिपल ही बना कर रखेंगे। हम कार्ड में कुछ नहीं जोड़ेंगे, न अपनी तरफ से प्रोग्राम में आपको रिटायर्ड बतलाएंगे। हमारी इज़्ज़त का सवाल है। आपको अपनी तकरीर में बताना हो तो बता देना। हम तो बारह तारीख तक आपको रिटायर नहीं होने देंगे।’

फिर मज़ाक के स्वर में बोले, ‘आपने कुर्सी क्यों छोड़ दी जी? हमारी खातिर बारह तारीख तक कुर्सी पर बैठे रहते।’

मैंने अपराधी भाव से कहा, ‘अपने हाथ में कहाँ है? जिस तारीख को उम्र पूरी हुई, उस दिन रिटायर होना पड़ता है।’

सन्त जी दाँत चमकाकर बोले, ‘यूँ तो मौत का दिन भी फिक्स्ड होता है, लेकिन आदमी चवनप्राश वगैरः खाकर महूरत टालने की कोशिश में लगा रहता है।’

मैं उनके सटीक जवाब पर निरुत्तर हो गया।

वे चलने के लिए उठे। चलते चलते बोले, ‘आपकी शान के खिलाफ कुछ बोल गया हूँ तो माफ कीजिएगा। दरअसल आपने ऐसी खबर दे दी कि जी दुखी हो गया। जो होता है भले के लिए होता है। प्रोग्राम में ज़रूर पधारिएगा। आपसे ही शोभा है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 9 – व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में – भाग-2 ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।  

आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की अगली कड़ी में आलेख ‘व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में’ – भाग-2।  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 9 – व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में – भाग-2 ☆ श्री रमेश सैनी ☆ 

[प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ]

अभी हमने कबीर के समय की बात की है कबीर का समय मुगलकालीन समय था जो काफी  उथल-पुथल का समय था उस समय मुगलकालीन साम्राज्य में उतार का समय आरंभ हो गया था. छोटे बड़े राज्यों की व्यवस्था चल रही थी.राजघरानों ने साहित्य और कला आश्रय दिया था. कला में संगीत और नृत्य विशेष रुप से  राज्याश्रय में फल फूल रहे थे. इसमें आशातीत विकास और विस्तार भी हुआ.इससे राजा और राज्य की छबि बनाने का उद्देश्य भी छिपा रहता है. इस कारण इन कलाओ और कलाकारों पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है. इससे राज्य,कला और कलाकारों को विशेष लाभ दर्जा मिला रहता था.ऐसा नहीं है कि साहित्य को स्थान को नहीं था. था और अधिक था. पर उन्ही लोगों को था .जो राजा और राज्यों का गुणगान करने में माहिर थे. चारण प्रवृत्ति चरम अवस्था में थी.राजा चारण रखते थे जो राजा की प्रशंसा ही करते थे.वे राजकवि कहलाते थे.उसमें साहित्य से समाज के संबंध की सही छबि स्पष्ट नहीं हो पाती है .उस समय का इतिहास अलग है और उस समय का उपलब्ध साहित्य कुछ और ही बताता है .अगर इसको विपरीत दृष्टि से कहें तो बहुत सहजता से कहा जाता सकता है कि उस समय के साहित्यकारों ने समाज के प्रति अपने सामाजिक और लेखकीय दायित्व का निर्वाह ईमानदारी से नहीं किया. साहित्य के इतिहास के वर्गीकरण को ध्यान में बात करें तो बीसवीं शताब्दी के आरंभ में साहित्य के संबंध में समाज को भली भांति समझा जा सकता है. जिसे साहित्य के आधुनिक काल के आरंभ का समय कहा जा सकता है. इसमें साहित्य का महत्वपूर्ण काल कहा जाता है. उसमें भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की रचनाओं से उस समय के काल और सामाजिक स्थिति को बहुत सरलता से समझा जा सकता है. उस समय की राजव्यवस्था, अराजकता, भ्रष्टाचार, न्याय व्यवस्था का पता चल जाता है.भारतेंदु जी  का सम्पूर्ण साहित्य एक समयकाल और साहित्य का बेहतरीन उदाहरण है.उनकी चर्चित रचना है . “अंधेर नगरी और चौपट राजा”यह रचना अपने समय की सही तश्वीर खींचती है।

वे कहते हैं

अंधेर नगरी चौपट राजा

टके सेर भाजी, टके सेर खाजा

यह रचना नाट्य रुप समाज की अराजकता का बयान करती है. इसमें उसमें समय के बाजार का स्वरूप उभरकर सामने आता है. इसरचना में घासीराम का चूरन में बाजार के विज्ञापन का प्रारंभिक चरण कह सकते हैं जो आज भीषण रुप में अंदर तक पहुंच गया है. आज बाजार आपके घर अंदर तक पहुंच गया है. आज का बाजार हमारी जीवन शैली आदि पर पूरी तरह हाबी हो गया है वह आपको यह सिखाता है आपको क्या खाना है क्या पहनना हैं आपको कैसे रहना है. आपको यह सिखाता है कि अपने दामपत्य जीवन को सफल बनाने के लिए अपने साथी को क्या उपहार देना है.वह खुश हो जाएगा.और तो और वह यह बताता है कि आपको कब किस रंग के कपड़े पहनना है जिससे आपका भविष्य बढ़िया रहेगा.घासीराम का चूरन में वे कहते हैं

   चना बनावे घासीराम, जिनकी छोली में दूकान

इस रचना में उस समय का भ्रष्टाचार उभरकर आया है

 “चना हाकिम सब जो खाते, सबपर दूना टिकस लगाते

तबकी महाजन प्रणाली पर वे कहते

 चूरन सभी महाजन खाते

जिससे सभी जमा हजम कर जाते

आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर वे कहते

चूरन पुलिस वाले खाते

                  सब कानून हजम कर जाते

लो चूरन का ढ़ेर, बेचा टका सेर

आज की व्यवस्था को ध्यान से देखें कुछ भी नही बदला है बस उसका स्वरूप बदल गया. तरीके बदल गए हैं पर बाजार की प्रवृत्ति और आचरण जस का तस वहीं हैं। आज यह रचना हमारे समक्ष न होती तो शायद हम उस समय को जान नहीं सकते हैं. यह यह बात स्पष्ट है कि साहित्य की अन्य विधा में समय कुछ कम उभर का आता है. पर व्यंग्य ही ऐसा माध्यम है कि जहां समय और स्थान प्रतिबिंब बन कर आता है. व्यंग्य ही ऐसा हैं समय का आकलन करने में सक्षम है.भले ही व्यंंग्य में अपने समय की विसंगतियां, विडम्बनाए़ असंतोष, भ्रष्ट आचरण, अंधविश्वास, पाखंड, प्रपंच अपने स्वरुप आ जाता है उससे साहित्य और समय के अतंर्संबंध को समक्षा जाता है.

क्रमशः….. ( शेष अगले अंको में.)

© श्री रमेश सैनी 

सम्पर्क  : 245/ए, एफ.सी.आई. लाइन, त्रिमूर्ति नगर, दमोह नाका, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 482 002

मोबा. 8319856044  9825866402

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 77 ☆ आरामगाह की खोज ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “आरामगाह की खोज”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 77 – आरामगाह की खोज 

दौड़भाग करके मनमौजी लाल ने एक कार्यक्रम तैयार किया किन्तु बात खर्चे पर अटक गयी । संयोजक, आयोजक, प्रतिभागी सभी तैयार थे, बस प्रायोजक को ढूंढना था।  क्या किया जाए अर्थव्यवस्था चीज ही ऐसी है, जिसके इर्द गिर्द पूरी दुनिया चारो धाम कर लेती है । बड़ी मशक्कत के बाद गुनीलाल जी तैयार हुए ,बस फिर क्या था उन्होंने सारी योजना अपने हाथों में ले ली अब तो सबके रोल फीके नजर आने लगे उन्हें मालुम था कि जैसा मैं चाहूँगा वैसा करना पड़ेगा ।

दूसरी तरफ लोगों ने समझाया कि कुछ लोग मिलकर इसके प्रायोजक बनें तभी कार्यक्रम का उद्देश्य पूरा हो सकेगा । सो यह निर्णय हुआ कि साझा आर्थिक अभियान ही चलायेंगे । कार्य ने गति पकड़ी ही थी कि दो दोस्तों की लड़ाई हो गयी, पहले ने दूसरे को खूब भला बुरा कहा व आसपास उपस्थित अन्य लोगों के नाम लेकर भी कहने लगा मेरा  ये दोस्त मन का काला है,  आप लोगों की हमेशा ही बुराई करता रहता है , मैंने इसके लिए कितना पैसा और समय खर्च किया पर ये तो अहसान फरामोश है इसे केवल स्वयं के हित के अलावा कुछ सूझता नहीं ।

वहाँ उपस्थित लोगों ने शांति कराने के उद्देश्य से ज्ञान बघारना शुरू कर दिया जिससे पहले दोस्त को बड़ा गुस्सा आया उसने कहा आप लोग पत्थर के बनें हैं क्या ? मैंने इतना कहा पर आप सबके कानों में जूँ तक नहीं रेंगी,  खासकर  मैडम जी तो बिल्कुल अनजान बन रहीं इनको कोई फर्क ही नहीं पड़ा जबकि सबसे ज्यादा दोषारोपण तो इनके ऊपर ही किया गया ।

मैडम जी ने मुस्कुराते हुए कहा मैं अपने कार्यों का मूल्यांकन स्वयं करती हूँ, आपकी तरह नहीं किसी ने कह दिया कौआ कान  ले गया तो कौआ के पीछे भागने लगे उसे अपशब्द कहते हुए, अरे भई देख भी तो लीजिए कि आपके कान ले गया या किसी और के ।

समझदारी इस बात में  नहीं है कि दूसरे ये तय करें कि हम क्या कर रहें हैं या करेंगे बल्कि इस बात में है कि हम वही करें जिससे मानवता का कल्याण हो । योजनाबद्ध होकर नेक कार्य करते रहें ,देर- सवेर ही सही कार्यों का फल मिलता अवश्य है ।

आर्थिक मुद्दे से होती हुई परेशानी अब भावनाओं तक जा पहुँची थी बस आनन फानन में दो गुट तेयार हो गए । शक्ति का बटवारा सदैव से ही कटुता को जन्म देता आया है सो सारे लोग गुटबाजी का शिकार होकर अपने लक्ष्य से भटकते हुए पुनः आरामगाह की खोज में देखे जा रहे हैं।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #113 ☆ व्यंग्य – वी. आई. पी. श्मशान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘वी. आई. पी. श्मशान ’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 113 ☆

☆ व्यंग्य – वी. आई. पी. श्मशान  

सरजू भाई उस दिन अपने फ्रेंड, फ़िलॉसॉफ़र एंड गाइड बिरजू भाई को आख़िरी विदाई देने लाव-लश्कर के साथ श्मशान पहुँचे थे। बिरजू भाई की तरह सरजू भाई राजनीति के सयाने, तपे हुए खिलाड़ी थे। बिरजू भाई के चरणों में बैठकर उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा था। अब उनके जाने से वे अनाथ महसूस कर रहे थे।

वहाँ बैठे,दुखी मन से वे श्मशान की व्यवस्था देखते रहे। सब तरफ गन्दगी और बदइन्तज़ामी थी। इधर-उधर फेंके हुए चादर,बाँस और घड़ों के टुकड़े पड़े थे। शेडों के नीचे कुत्ते घूम या सो रहे थे। श्मशान का कर्मचारी गन्दी लुंगी लपेटे अपने काम को अंजाम दे रहा था। बैठने के लिए बनी पत्थर की बेंचों पर धूल जमी थी। शोकसभा के लिए माकूल जगह नहीं थी।

वहाँ का दृश्य देखते देखते सरजू भाई का दिल बैठने लगा। वे खुद पचहत्तर के हो गये थे। कभी भी चार के कंधे पर लदकर यहाँ आना पड़ सकता था। लेकिन क्या इतने सुख उठाने के बाद उनका यही हश्र होना था?हमेशा ए.सी.में, गुदगुदे गद्दों पर सोये, कभी अपने हाथ से लेकर पानी नहीं पिया, लक्ज़री गाड़ियों में घूमे, हवाई जहाज में उड़े, और अन्त में यह फजीहत। घोड़े-गधे, राजा- रंक,सब बराबर। सोच सोच कर सरजू भाई का ब्लड-प्रेशर बढ़ने लगा।

घर लौटे तो अपने तीन-चार प्रमुख चमचों को बुलाया। बोले, ‘भैया, हमें श्मशान की दशा देखकर बड़ी चिन्ता हुई। कल के दिन हमें भी वहाँ जाना है,तो क्या हमें भी फजीहत झेलनी पड़ेगी? आप लोग एक प्रस्ताव तैयार करके नगर निगम जाओ और एक अलग भव्य श्मशान के लिए राज्य सरकार से फंड की माँग करो। हमें अब अपनी हैसियत के हिसाब से एक सर्वसुविधायुक्त स्मार्ट श्मशान चाहिए।

‘इसके लिए लम्बा-चौड़ा क्षेत्र हो जहाँ सुन्दर फूलों वाले पौधे और शानदार पेड़ हों, दो चार सौ लोगों के बैठने के लिए आरामदेह, गद्देदार सीटें हों, साफ-सुथरी यूनिफॉर्म वाले ट्रेन्ड कर्मचारी हों और वातावरण ऐसा हो कि वहाँ पहुँचने वालों को गर्व हो। जब ताजमहल मकबरा होते हुए भी जगत-प्रसिद्ध हो सकता है तो हमारा श्मशान क्यों नहीं हो सकता? कम से कम अपने देश में तो हो ही सकता है।

‘नये श्मशान में सौ पचास कारों की पार्किंग व्यवस्था हो, जिन्हें सँभालने के लिए यूनिफॉर्म-धारी कर्मचारी हों। विज़िटर्स को बाहर ही गाउन, मास्क और टोपी दी जाए जो पूरी तरह सैनिटाइज़्ड हों, जैसी वीआईपीज़ को अस्पतालों में दी जाती हैं।

‘इसके अलावा वहाँ एक हैलीपैड भी हो ताकि वीवीआईपी बेझिझक आ सकें। जो दिवंगत राजकीय सम्मान के हकदार हों उनके लिए बैंड और पुलिस की टुकड़ियों के खड़े होने के लिए अलग पट्टियाँ बनायी जाएं। इसके अलावा एक भव्य विशाल शोकसभा हॉल बनाया जाए जहाँ दिवंगत के सम्मान में लोग आराम से अपने विचार प्रकट कर सकें। अभी तो जो हालत है उसमें लोग जल्दी भागने की फ़िराक में रहते हैं।

‘वीआईपी श्मशान में रोशनी का बढ़िया इन्तज़ाम होना चाहिए ताकि वह रात में भी जगमगाता रहे। कुल मिलाकर ऐसी व्यवस्था हो कि मरने वाले को मौत सुहानी लगने लगे। श्मशान इतना बढ़िया बने कि लोग उसे देखने आयें। भाड़े पर रोने वालों की एक परमानेंट टीम भी तैयार की जानी चाहिए।

‘लेकिन एक बात का ध्यान रखना होगा कि जनता को यह न लगे कि यह वीआईपी श्मशान है। उनसे कहेंगे कि उन्हें असुविधा और भीड़-भाड़ से बचाने के लिए ही यह इन्तज़ाम किया गया है।’

सरजू भाई आगे बोले, ‘इस प्रस्ताव को जल्दी आगे भिजवाओ। प्रस्ताव ऊपर पहुँच जाये तो मैं अपने रसूख का इस्तेमाल करके मंजूरी के लिए दबाव डलवाऊँगा। इस उम्र में पता नहीं कब ऊपर से सम्मन आ जाए। इसी एक चीज पर हमारा बस नहीं है, बाकी कोई कष्ट नहीं है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 9 – व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में – भाग-1 ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।  

आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की अगली कड़ी में आलेख ‘व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में’ – भाग-1।  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 9 – व्यंग्य निबंध – साहित्य और समाज का संबंध: समय के संदर्भ में – भाग-1☆ श्री रमेश सैनी ☆ 

[प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ]

जब हम साहित्य और समाज की बात करते हैं तब हमें अचानक महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचना साहित्य और समाज का की एक पंक्ति याद आ जाती है. जो पढ़ रहें हैं,लिख है जिसे सब लोग अपने बातों में,अपने विचारों में उदाहरण देते हैं. “साहित्य समाज का दर्पण है” इस पंक्ति को हम स्कूल से लेकर कॉलेज तक, कॉलेज से लेकर आज तक साहित्य के संदर्भ में कह देते हैं, कहते रहे हैं. यह पंक्ति सिर्फ लेखक ही नहीं आम पाठक भी साहित्य के संदर्भ में अपनी बात बहुत आसानी से क्या कह जाता है.यह सच भी है, जो लिखा गया है.यह जो लिखा जा रहा है. या भविष्य में भी लिखा जाएगा. वह समाज को सामने रखकर ही लिखा जाएगा.अन्यथा  वह लिखा गैर जरूरी सा लगेगा और जो हमारे समाज और व्यक्ति के हित में नहीं है वह साहित्य गैरजरूरी ही है साहित्य की हम बात करते हैं. तब अपने आप समय के साथ दौड़ने लगते हैं. तो वह समय हजारों साल पुराना सौ साल पुराना, आज का समय, या आज के अगले हजार या सौ साल पहले की बात करने लगता हैं . हमारे जरूरतों में साहित्य किसी न किसी रूप में  गुंथा बंधा हुआ है.और हम उससे भाग नहीं सकते .इसलिए महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के अध्ययन के बाद यह पंक्ति उनके विचारों में कौंधी  होगी. साहित्य में समय की बात ना हो तो उसे साहित्य कहने में भी हिचक सी लगती है. अतः जब भी हम किसी के साहित्य का मूल्यांकन करते हैं उसका बैरोमीटर उस समय का ही होता है. उसके साथ व्यक्ति के साहित्य में समय का तापमान कितना है. समय का तापमान ही है जो हमें हमारे समय को, हमारी स्मृतियों ही हमारे साहित्य को बहुत लंबे समय तक आगे ले जाता है. विगत कुछ महीनों पहले पूरा विश्व एक कठिन संकट से गुजरा है. जो हमें लंबे समय तक याद रहेगा और मुमकिन है यह आने वाली पीढ़ी भी हमारी स्मृतियों के सहारे आगे ले जाने में सक्षम होगी. यह बहुत आधुनिक काल है. विज्ञान दिन पर दिन व्यक्ति को बेहतर करने के लिए तत्पर है. इसके बावजूद भी हम कहांँ पर खड़े हैं. पिछड़े हैंऔर.हम असहाय सा महसूस कर रहे हैं. क्योंकि कुछ चीजें हमारे बस में नहीं है.इस कठिन समय में जब चारों ओर हा हा कार मचा है. रोज टीवी सोशल मीडिया और अखबारों में मृत्यु दरों की सूचना बाजार के सेंसेक्स की भांति दे रहे हैं चारों दिशाओं में  सेंसेक्स के आंकड़ों से मीडिया सराबोर है. पहले पढ़कर सुनकर दिल धक से हो जाता रहा है. कारोना के आंकड़े परेशान तो करते थे ही, पर.जिस चीज अधिक चिंता रहती थी. वह था दो शब्दों में बँटा जीवनसाथी. दो शब्द  लाक और अनलॉक. इन दोनों शब्दों के बीच में सारी दुनिया सिमटकर रह गई . उन दो शब्दों के लिए बीच में आज समाज  भूल गया था कि आगे भी जीवन है और जीवन है तो साहित्य भी है. यह सब समय समय का फेर है.आज हमारे संस्कार संवेदना और चरित्र पूरी तरह बदल गया है.उस समय बंद रहते हुए भी जीवन की तलाश शुरु हो गई थी. कारोना के भय का इतना आतंक था .कि हम बंद कमरे में जीवन तलाश रहे थे.. मैं आदिवासी अंचल से हूंँ।मुझे अच्छे से याद है कि जब घर के सामने से शवयात्रा निकलती थी. जब दादी बाहर जाने से रोकती थी, वह दरवाजा खोल कर ओट बनाकर देखा करती थी. जब शव यात्रा निकल जाती तो रास्ते पर पानी पर का होगा डाल देती थी.उसके पीछे यह मान्यता रही होगी कि मृत्यु का भय धुल गया है.और कुछ समय तक वातावरण शांत रहता था. वह  कारोना का समय ,मृत्यु ताण्डव का समय था .हम असहाय मजबूर थे. हमारी संवेदनाओं में निष्ठुरता के पंख निकलने लगे थे. उस समय हम अपने आपको बचाने में लगे थे. वह उस समय की मांग थी कि हम अपने को बचाएं, समाज को बचाएं और साहित्य को बचाए रखना है इस बचाए रखने के उपक्रम में यह रचनात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में आधुनिक तकनीक के माध्यम से बीच का रास्ता निकाला और उस रास्ते ने हमें जीवन के उत्स को बचाने में बहुत मदद की और वह था आधुनिक तकनीक का कमाल.. उसे नया शब्द मिला बेबीनार. बेबीनार और सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने साहित्य को गढ़ने और प्रस्तुत करने का नया माध्यम दिया. और यह जीवन और साहित्य चल पड़ा.  साहित्य और समाज सदा आमने-सामने देखते हैं पर एक दूसरे के समा प्रभाव से तभी तो पूर्व की पूर्ववर्ती विद्वान साहित्यकारों ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा है. जब हम साहित्य और समय पर बात करते हैं तो सर्वप्रथम जीवन को प्रभावित करने वाली चीजें सामने आती हैं.वह भविष्य में साहित्य में बनकर आती हैं. इसी तरह हम अतीत को साहित्य के अनेक कालखंड में देख सकते हैं. या यों कहें हम अपनी सुविधा के लिए कालखंड में विभाजित कर सकते हैं. जिस आधुनिक काल में की बात करते हैं. उसका का मोटे तौर से सन्1900 से मान सकते हैं. जिसे भारतेंदु काल कहते हैं. पर साहित्य तो पहले भी प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा था. कबीर ने अपने समय के अराजक समय को निर्ममता उधेड़ कर रख दिया है जिसे हम सिद्दत याद करते हैं. वह रचनात्मक प्रक्रिया स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ती गई. कबीर ने शबद,बानी में अपने समय के बारे में जो कुछ कहा वे उनके शिष्यों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढी आगे स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ते गए. वे उसे याद कर गांव के चोपाल, मण्डलियों सुनाते रहे  लोगों को लगता कि कबीर नयी बात कर रहा है और उसे याद कर एक गांव से दूसरे गांव और दूसरे गांव से तीसरे गांव, इस तरह यह क्रम चलता रहा. और लोगों में जागृति का भाव आता रहा. उदाहरण के रूप लोगों का विश्वास था कि काशी में मरने से व्यक्ति उसे मुक्ति मिल जाती है. मृत्यु सन्निकट होने पर  लोग व्यक्ति को लोग बनारस छोड़ जाते थे मरने के लिए.इस अंधविश्वास को उघाड़ते हुए कबीर बनारस से मगहर आ गए

क्या काशी क्या मगहर राम हृदय बस मोरा

जो कासी तन तजै कबीरा रामे कौन निहोरा

उनका यह मानना था काशी हो या मगहर, मेरे लिए दोनों बराबर है. मेरे हृदय में राम बसे हैं. अगर सिर्फ काशी में राम बसने से मुक्ति मिल जाए  तो मेरे हृदय में राम का क्या एहसान रह जाएगा. इसी मुक्ति पर कबीर अपने समय की विसंगतियों पर कठोर प्रहार करते हुए कहते हैं..

 साधो भाई, जीबत ही करो आशा

जीबत समझे जीबत बूझे, जीबत मुक्ति निबासा

जीवत करम की फाँस न काटी, मुये मुक्ति की आसा

तन छूटे जिब मिलन कहत है, सो  सब  छूटी  आसा

अबहुँ मिला तो तबहुँ मिलेगा, नहीं तो जमपुर बासा

सत्त   गहे  सतगुरू को  चीन्हे  सत्त-नाम  बिस्बासा

कहें कबीर साधन हितकारी, हम साधन के दासा।

 कबीर ने लोगों को चेताया की जीवन है और जीवन में ही मुक्ति है, मृत्यु के बाद मुक्ति का कोई भी अन्य साधन आशा नहीं है अतः जो हमारे पास साधन है. वही हमारी मुक्ति का माध्यम है. मुक्ति जीवन का भ्रम है.  कबीर ने अपने समय की व्याप्त विसंगतियों ,अंधविश्वासों को लोगों के सामने उजागर किया है.ढोंग और पाखंडॴ यों से उन लोगों को बचाने का उपक्रम किया है यही साहित्य का मूल उद्देश्य साहित्य अपने समय के साथ चलते हुए जीवन और समाज में व्याप्त कमजोरियों विसंगतियों पाखंडियों को उखाड़ कर बेहतर जीवन का मार्ग निर्माण करता है जब हम उन चीजों को पढ़ते हैं तो उस समय काल को भी पढ़ रहे होते हैं उस समय काल को भी जीवन से जोड़ते हैं. तब हमें पता चलता है की साहित्य अपने समय से लोगों को परिचय करा रहा है .एक नया इतिहास रचता है और भविष्य के लिए आगे पीढ़ी को अवगत कराता है तब साहित्य को समय के समयांतर को लेकर बात करते हैं. तब हम कुछ न कुछ गढ़ रहे होते.बुन रहे होते हैं यह यह बुनना चुनना, गढ़ना, पढ़ना ही साहित्य हैं जो जीवन के मूल से साझात्कार कराता है..

***

क्रमशः….. ( शेष अगले अंको में.)

© श्री रमेश सैनी 

सम्पर्क  : 245/ए, एफ.सी.आई. लाइन, त्रिमूर्ति नगर, दमोह नाका, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 482 002

मोबा. 8319856044  9825866402

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈