हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # 29 ☆ इस अंजुमन में आपको आना है बारबार…  ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

 

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  “इस अंजुमन में आपको आना है बारबार… ”।) 

☆ शेष कुशल # 29 ☆

☆ व्यंग्य – “इस अंजुमन में आपको आना है बारबार… ” – शांतिलाल जैन ☆ 

किसी भी अस्पताल में सबसे कठिन समय वो नहीं होता जब आप दर्द से बेपनाह कराह रहे होते हैं, वो होता जो डॉक्सा द्वारा छुट्टी कर देने का निर्णय दिए जाने और फायनली डिस्चार्ज टिकट हाथ में आ जाने के बीच गुजरता है. जमानत हो जाती है, ऑर्डर की कॉपी जेल अधिकारी तक नहीं पहुंच पाती. छुट्टी हो जाती है डिस्चार्ज टिकट बिलिंग काउंटर तक नहीं पहुंच पाता. अस्पताल के गेट की मजबूती जेल-गेट से कम नहीं होती श्रीमान. आप समय से बाहर आ सकें के प्रयास में आपका अटेंडेंट बदहवास काउन्टर-दर-काउन्टर भटकता है और आप हाथ पर लगे कैनुला को बेबसी से देखते हुए हर थोड़ी देर में पत्नी को फोन पर बताते हो बस कुछ ही देर में घर पहुँच जाएंगे, खाना मत भेजना. ‘कुछ देर’ का मतलब मिनिमम साढ़े छह घंटे तो होता ही है.

ताज़ा हादसा अपन के साथ हुआ. दादू आठ दिन से अस्पताल में भर्ती था और अपन उसकी तीमारदारी में लगे थे. राउंड पर आए डॉक्सा ने सुबह नौ बजकर तेरह मिनिट पर लंबे लंबे चार्ट पर निगाह मार कर, नर्स से चाइनीज लेंग्वेज़ में कुछ पूछा. नर्स ने मंगोलियन भाषा में जवाब दिया. मुझे पक्का यकीन है कि डॉक्सा ने जो कहा वो नर्स नहीं समझी और नर्स के कहे को समझने की जरूरत डॉक्सा ने नहीं समझी. जो भी हुआ, डॉक्सा ने कहा – ‘आज आपकी छुट्टी कर देते हैं’. अंधा क्या चाहे श्रीमान – दो आँखें. दादू का बस चलता तो वो सीढ़ी से उतरने का धैर्य भी नहीं रखता, खिड़की से कूद कर घर चला जाता. फिलवक्त दादू सातवें आसमान पर था और अपन उसके साथ थे. फौरन से पेश्तर बेटे को मोबाइल पर कहा कि वो कार लेकर हमको लिवाने आ जाए. सामान भी रहेगा चद्दर, पतीली, चम्मच, बची दवाईयां, सक्कर की पुड़िया, बिस्कुट का पूड़ा और आधी घिसी हुई साबुन की बट्टी. दस हज़ार रुपयों के खून से सराबोर दो जंगी काली डरावनी एमआरआई की तस्वीरें, धमनियों और किडनियों से बहे अलग अलग द्रवों की जांच रिपोर्टें. 

नादां थे हम जो पंद्रह मिनट में अस्पताल छोड़ देने की उम्मीद पाल बैठे थे. अभी तो दास्तां-ए-डिस्चार्ज शुरू हुई थी, कुछेक ट्रेजिक मोड आने बाकी थे. साढ़े ग्यारह बज चुके थे और डिस्चार्ज किए जाने का आदेश उसी फ्लोर के नर्सिंग स्टेशन तक भी पहुंचा नहीं था. दादू सातवें से उतरकर पांचवें आसमान पर आ गया था. मैं नर्सिंग स्टेशन पर खड़ा था और वे मेरी तरफ देख भी नहीं रही थीं. इन आठ दिनों में ही मैंने जाना कि आँकड़े भरने, रिकार्ड रखने और उसी में तल्लीन रहने में हमारे अस्पतालों ने भारतीय सांख्यिकीय संस्थान से बाज़ी कैसे मार ली है. जब जब मैं नर्स को बुलाने जाता वे मरीजों की फ़ाईल्स में शरीर का तापमान, खून का दबाव, शकर की मात्रा और यूरिन का आऊटपुट जैसी जानकारी दर्ज़ करने में इस कदर तल्लीन होती कि मुझे चाबी से काउन्टर का टॉप पर तीन बार खट-खट करना पड़ता. जीडीपी और मुद्रास्फीति के आंकड़ों को दर्ज़ करनेवाले अर्थशास्त्रियों को नर्सिंग स्टॉफ से सीखना चाहिए – डाटाशीट कैसे फ़िल-अप की जाती है. नर्सें सुनिश्चित करतीं कि मरीज को इंजेक्शन लगे न लगे उसके लगाए जाने की इंट्री चार्ट में जरूर हो. वहाँ खड़े एक जूनियर डॉक्टर ने पुष्टि की – यस इनको डिस्चार्ज देना है. कहा– आप अपने रूम में बैठिए हम पर्चा डॉक्सा से साईन करवाके काउन्टर पर भिजवाते हैं. और डॉक्सा ? वो अब तक ओटी में प्रवेश कर गए थे. वहाँ से बाहर कब निकलेंगे ये नजूमी का तोता ही बता सकता था जो आज अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर बैठा नहीं था. दादू पाँचवे से तीसरे आसमान पर उतर आया.

इस बीच एक सफाईकर्मी महिला ने रोजाना से बेहतर पोंछा मारा. मुंह में अतिरिक्त मिश्री घोलकर पूछा – ‘बाबूजी छुट्टी हो गई आपकी.’ उसने बताया कि उसकी शिफ्ट खत्म होने वाली है और वो घर जानेवाली है. शेष दादू की समझ पर छोड़ा गया कि वो अपनी जेब से आरबीआई गवर्नर का हस्ताक्षर किया हुआ वो पत्र उसे सौंप दे जिस पर लिखा हो ‘मैं धारक को पचास रूपये अदा करने का वचन देता हूँ’. पेमेंट सक्सेसफुल का मेसेज रिसीव्ड हुआ.

दादू के हाथ में कैनुला उसके अस्पताल का बंदी होने की पहचान थी जिससे वो जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहता था. चेची विवश थी, कैनुला हटाने का ग्रीन सिग्नल उसे अभी मिला नहीं था. दादू कभी कैनुला की टोपी घुमाता कभी उसके बाहर निकल आए खून की बूंदों से चिंतित होता. उसके आसपास का हिस्सा सूज़ गया था. वो दिल बार बार खड़ा करने की कोशिश करता जो बार बार बैठा जा रहा था. पथराई आँखों से कभी घड़ी की ओर देखता कभी छत के पंखे को. जेल होती तो सुरंग खोदकर भागा जा सकता था, कमरा नंबर 407 से फरार होने की गेल न थी. न ही बेडशीट पंखे में बांधकर आत्महत्या कर लेने कोई गुंजाईश थी.

पैथ-लैब, कैथ-लैब, पल्मोनरी, एक्स-रे विभाग, मेडिकल शॉप, केंटीन का मेरी-गो राउन्ड झूला था जिसमें नो-ड्यूज पाने की गरज से मैं गोल-गोल घूमता रहा. मेन गेट में घुसते ही बायीं ओर बने मंदिर में से गणेशजी मुझे कभी अनुनय, कभी गुस्सा, कभी खीज, तो कभी शब्दशः बाल नोचते हुवे देखते रहे मगर कुछ कर न सके. वे मरीजों को शीघ्र स्वस्थ होने का आशीर्वाद तो दे पा रहे थे मगर स्टॉफ से इफिशियंसी से काम करवा पाना उनके भी बस का नहीं था. मैंने पूछा – प्रभु, कैशलेस होने का मतलब सिर के केश का लेस होते जाना तो नहीं होता ना!! प्रभु इस पर तो चुप्पी साध गए लेकिन उन्होने मुझे धीरे से समझाया कि यहाँ उनकी टेरेटरी मंदिर तक ही सीमित है – शेष पूरे परिसर में केवल आदरणीया लक्ष्मीजी का ही आदेश चलता है.

अस्पताल की पूरी कोशिश थी कि ओरिजिनल मरीज भले ही डिस्चार्ज होकर घर चला जाए मगर उसके अटेंडेंट को वे हायपर टेंशन, एङ्क्साईटी, उच्च रक्तचाप के केस में रोक कर एडमिट कर सकें. हमारा वार्ड चौथी मंज़िल पर था, बिलिंग काउंटर धरातल पर. और लिफ्ट ? केवल मरीजों और डॉक्टरों के लिए थी. ऊपर नीचे होने में सांस फूल जाती, धड़कने असामान्य आवाज़ करने लगती, बीपी बढ़ने लगता, घुटने पिराने लगते थे. तीन बार मैं बिलिंग काउन्टर पर क्लियर करके आया था कि हमारा कैशलेस तो है ही, बीस हज़ार एक्सट्रा जमा है. हर बार काउन्टर पर कोई नया शख्स होता हर बार मैं उसे पूरी रामायण सुनाता. आखिरी में वो मुझसे पूछता सीता राम की कौन थी ?

दादू अंतिम ढाई आसमान भी नीचे उतर आया. उसकी पॉज़िटिविटी ही उसे बचाए हुवे थी. सिस्टम की बेदिली में भी उसने कुछ पॉज़िटिव खोज लिया था. उसने बताया कि दूसरी विंग में आज सुबह मृत घोषित किए गए आत्मारामजी सहगल जीवित हो उठे हैं. पहचान की गफलत में यमदूत से  आत्मा ले जाने में मिस्टेक हो गई थी. चित्रगुप्त के पॉइंट-आउट करते ही यमदूत जब वापस लौटा तो पाया कि सर्टिफिकेट जारी किए जाने में हो रही देरी से डेड-बॉडी अभी तक अस्पताल में ही पड़ी है. उसने राहत की सांस ली और सहगल साहब की आत्मा फिर से उसी शरीर में रोपकर चला गया.

बहरहाल, हमारे पुण्य कर्म का उदय हुआ. अभी शाम के पाँच बजने में दस मिनिट कम हैं. कैनुला निकाल दिया गया है. जो सुबह सातवें आसमान पर थे अब सड़क पर हैं. हमसे ज्यादा समझदार तो बेटा निकला. सुबह ही उसने कह दिया था – पापा आप तो ओला कर लेना या ऑटो ले लेना. ऑफिस से उसकी एक दिन की छुट्टी बच जो गई है.

और आप श्रीमान ! दास्तां-ए-डिस्चार्ज पूरी हुई मानकर मत चलिएगा… आनेवाले सप्ताहों में कई चक्कर लगाने पड़ेंगे – कुछ जाँचे बाहर भेजी हैं उनकी रिपोर्ट आनी बाकी है, पक्का बिल लेना है, सील लगवाना है, क्लेम फॉर्म में निकली क्वेरीज के जवाब लिखवाना है. सो शेष कथा फिर कभी…

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 147 ☆ चौपाल चर्चा – “साइकिल के बहाने”☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  – चौपाल चर्चा – “साइकिल के बहाने”)  

☆ व्यंग्य # 147 ☆ चौपाल चर्चा – “साइकिल के बहाने” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

हमारी चौपाल चर्चा के फूफा ने जब से  सेकेंड हैंड साइकिल खरीदी है, तब से साइकिल चर्चा में रही आती है। साइकिल जिनसे खरीदी है वे भी पुराने मित्र हैं, जब भी साइकिल पर चर्चा चलती है वे चुपके चुपके मुस्कराते रहते हैं, पर मुस्कराने का राज नहीं बताते। एक साथी का सोचना है कि फूफा ठगे गए हैं क्योंकि आजकल ऐसे कोई साइकिल खरीदता नहीं और इतनी पुरानी साइकिल कबाड़ी भी कबाड़ के भाव लेता है, फूफा अपने आपको होशियार समझते हैं, हर बात में खुचड़ करने का उनका स्वभाव है, कुछ लोग उन्हें अरकाटी कहते हैं, ठगे जाने पर भी सामने वाले को वे बुद्धू समझते हैं।

सब लोग फूफा को खुश करने के लिए साइकिल की झूठी तारीफ करते रहते हैं। एक दिन अचानक साइकिल का अगला चका फूट गया, टायर और ट्यूब फट गये,  साइकिल पर और साइकिल सवारी करने वाले पर तरह तरह की बहस होने लगी। ऐसे समय में छकौड़ी को अपनी साइकिल याद आ गई, जिसमें वो कालेज पढ़ने जाता था।  साइकिल में तीन डण्डे होते थे, नीचे वाले डण्डे में दो हुक लगे रहते थे जिसमें हवा भरने का पम्प फंसा रहता था। उस समय साइकिल में हवा भरने में बड़ा मजा आता था। अब तो न वे पम्प रहे न वैसी साइकिल रही, उस समय छकौड़ी की साइकिल गरीबी रेखा की साइकिल कहलाती थी, जिसमें बाकायदा फटे टायर में गैटर डाल दिया जाता था।

चौपाल में साइकिल चर्चा चल रही थी कि अचानक मुन्ना ने देश की अर्थव्यवस्था पर  चिंता जाहिर कर दी तो फूफा डांटने लगे, कहने लगे बीच में मत बोला करो। मामू अड़ गए कहने लगे आज की चर्चा साइकिल और अर्थव्यवस्था पर होनी चाहिए।

बीच में गंगू ने एक जोरदार प्रश्न दाग दिया, 

“क्या साइक्लिंग अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है…?”

प्रश्न हास्यास्पद जरूर है परन्तु सत्य है !

“एक साइकिल चलाने वाला देश की चरमराती अर्थव्यवस्था में कितनी मदद करता है”?

सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। जिस भाई ने साइकिल बेची थी उसने शर्माते हुए जबाब दिया – “साइकिल चलाने वाला कभी मंहगी गाड़ी नहीं खरीदता, वो कभी लोन नहीं लेता, वो गाड़ी का बीमा नहीं करवाता, वो तेल नहीं खरीदता, वो गाड़ी की सर्विसिंग नहीं करवाता, वो पैसे देकर गाड़ी पार्किंग नहीं करता, और वो मोटा (मोटापा) नहीं होता।”

गंगू बोला – “ये सत्य है कि स्वस्थ व्यक्ति अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं है,क्योंकि:-

-वो दवाई नहीं खरीदता, 

-वो अस्पताल या चिकित्सालय के पास नहीं जाता, 

-वो राष्ट्र के GDP में कोई योगदान नहीं देता ।”

दोस्तों के बीच मजाकिया बहस करने में सबको मजा आ रहा था, कुछ लोग साइकिल सवारी के और फायदे बताने को तैयार हुए पर अचानक पीछे से एक सांड आया और उसने अपने सींगों में साइकिल फंसाकर सड़क के उस पार फैंक दी। चौपाल चर्चा में बैठे सब लोग डर कर इधर उधर भाग गए। फूफा बड़बडाते हुए बोले- “लगता है साइकिल गलत मुहूर्त में ले ली। फूफा डरे डरे कभी सांड को देखते और कभी टूटी साइकिल को…”

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #150 ☆ व्यंग्य – दलिद्दर की बीमारी ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य दलिद्दर की बीमारी। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 150 ☆

☆ व्यंग्य – दलिद्दर की बीमारी 

दलिद्दर अपनी कंजूसी के लिए विख्यात हैं। माँ-बाप ने तो उनका नाम चंद्रमा प्रसाद रखा था, लेकिन उनके सूमपन को देखकर मोहल्ले वालों ने उनका नाम दलिद्दर रख दिया था। चंद्रमा प्रसाद ने भी इस नाम को स्वीकार कर लिया था। जब लोग उन्हें ‘दलिद्दर’ कहकर पुकारते तो वे घूम कर प्रेम से जवाब देते, ‘हाँ भैया।’

दलिद्दर ने कौड़ी कौड़ी जोड़कर भारी मकान खड़ा किया था। उसमें छोटे-छोटे कमरे बनाकर चार किरायेदार घुसा दिए थे। मकान बनते वक्त दलिद्दर ने खुद ही ईंटें ढोयीं थीं और मिस्त्री का काम भी किया। इसमें उनका उद्देश्य सिर्फ पैसा बचाने का था।

अब दलिद्दर अपने किरायेदारों को हलाकान किये रहते थे। रोज उन्हें पच्चीस निर्देश देते। उनका व्यवहार ऐसा था जैसे मकान किराये पर देकर उन्होंने कोई एहसान किया हो, या जैसे किरायेदार मुफ्त में रह रहे हों।

दलिद्दर हमेशा गंदी कमीज़ और पायजामा पहनते थे और अक्सर नंगे पाँव रहते थे। संपन्न होने के बाद भी वे हरएक के सामने अपने कष्टों का रोना रोते रहते। कोई उनकी संपन्नता की बात करता तो वे मुँह पर भारी दुख लाकर कहते, ‘अरे भैया, साँप के पाँव साँप को ही दिखते हैं। यहाँ गिरस्ती का बोझ उठाते कमर टूट रही है और तुम्हें मजाक सूझता है। तुम क्या समझते हो ये गंदे कपड़े पहनने का मुझे शौक है?’ कई बार वे अपनी तकलीफों का बयान करते आँखों में आँसू भर लाते।

दलिद्दर शाम को चौराहे पर चाय की दूकान के पास खड़े रहते। कोई परिचित दिखता तो खिलकर कहते, ‘आओ भई, मैं देख रहा था कोई दोस्त मिले तो चाय का जुगाड़ हो जाए। बड़ी कड़की चल रही है।’

कोई उनसे चाय पिलाने को कहता तो वे या तो ठंडी आह भरकर ज़मीन की तरफ देखने लगते, या कहते, ‘यार, अभी पिछले महीने ही तो पिलायी थी। एक महीना भी तो नहीं हुआ। हम कोई धन्नासेठ हैं जो रोज चाय पिलायें।’

दलिद्दर अपनी या परिवार की दवा- दारू पर बहुत कम पैसा खर्चते थे। कभी कोई बीमार पड़ता तो दवा की दूकान पर जाते और कहते, ‘भैया, बुखार की कोई सस्ती गोली दे दो।’ जब हालत चिन्ताजनक हो जाती तभी डॉक्टर के पास जाते। तब भी अगर डॉक्टर दस दिन दवा खाने को कहता जो पाँच दिन में ही बन्द कर देते।

एक बार दलिद्दर को बुखार आया। दलिद्दर जाते और दूकानदार से पूछकर सस्ती गोलियाँ लेकर खा लेते। लेकिन बुखार ठीक नहीं हुआ। आखिर हारकर दलिद्दर डॉक्टर के पास पहुँचे। डॉक्टर ने जाँच की, कहा, ‘कंजूसराम, रोग बिगाड़ कर अब हमारे पास आये हो? दवा खानी हो तो हम लिखें, नहीं तो भोगते रहो।’

दलिद्दर दुखी भाव से बोले, ‘खाएँगे। आप लिख दो।’

डॉक्टर बोला, ‘नहीं खाओगे तो ऊपर चले जाओगे। सोच लो, पैसा बचाना है या जान।’

दलिद्दर कुछ खीझ कर बोले, ‘कहा न। खाएँगे। लिख दो।’

डॉक्टर ने परचा दिया तो दलिद्दर बोले, ‘आपके पास तो नमूने की दवाइयाँ पड़ी होंगीं। उन्हीं में से दे दो। आपको पुन्न होगा।’    

डॉक्टर बोला, ‘ये दवाइयाँ मेरे पास नहीं हैं। दूकान से खरीदनी पड़ेंगीं। फिर तुम जैसे आदमी को मुफ्त में दवा देने से मुझे कोई पुण्य नहीं होने वाला।’

दलिद्दर चुप हो गये। फिर उन्होंने अपनी जेबें घिस घिस कर बड़ी देर में नोट निकालकर डॉक्टर की फीस दी। फिर वे मुँह लटकाये दवा की दूकान पर पहुँचे। दवा के दाम पूछे। दाम सुनकर वापस लौट कर डॉक्टर के पास आ गये, बोले, ‘यह कैसी दवा लिखी आपने। एक  कैप्सूल दस रुपये का। रोज तीन कैप्सूल खाना है। तीस रुपये के हुए। कोई सस्ती दवा लिखिए।’

डॉक्टर बोला, ‘पहले आ जाते तो सस्ती दवा से काम चल जाता। अब यही दवा खानी हो तो खाओ नहीं तो घर जाकर यमराज का इंतज़ार करो।’

दलिद्दर गुस्सा होकर ‘अंधेर है’ कह कर चले गये।

इसके बाद दलिद्दर एक हफ्ते बाद दिखाने आये। उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं और शरीर दुबला दिख रहा था। डॉक्टर ने जाँच की, बोला, ‘बुखार तो ठीक है, लेकिन तुम्हारी हालत क्या हो रही है?’

दलिद्दर दुखी भाव से बोले, ‘पता नहीं। जी घबराता है, रात को नींद नहीं आती। भूख गायब है। लेकिन कोई नयी दवा मत लिख देना।’

अगले हफ्ते दलित आये तो उनका मुँह और लटका था। डॉक्टर जाँच करके बोला, ‘अब बुखार तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन तुम लटक क्यों रहे हो?’

दलिद्दर भन्ना कर बोले, ‘हमसे पूछ रहे हैं कि हम क्यों लटक रहे हैं। पन्द्रह दिन की दवा में एक हजार से ज्यादा खर्च हो गये। इतने तो हमने जिन्दगी में कभी दवा पर खर्च नहीं किये होंगे। इतनी मँहगी जिन्दगी से तो मौत अच्छी।’

डॉक्टर हंँसकर बोला, ‘चलो, अब खुश हो जाओ। अब तुम ठीक हो गये। अब और पैसा नहीं लगेगा।’

दलिद्दर मनहूस चेहरा लिये उठे। उठ कर बोले, ‘खुश कैसे हो जाएँ? जो खर्च हो गया है उसको पूरा करने में दो चार महीने लग जाएँगे। किफायत से रहना पड़ेगा। आपने एक बीमारी ठीक करके दूसरी लगा दी। पहली बीमारी तो जल्दी ठीक हो गयी, दूसरी ठीक होने में टाइम लगेगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 109 ☆ जुगलबंदी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय व्यंग्य “जुगलबंदी”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 109 ☆

☆ जुगलबंदी ☆ 

आंदोलनों की आड़ में कार्यों को बाधित करने की शैली पुरानी हो चली है। तकनीकी अब बदलाव चाहती है। जहाँ संख्या बल हो वहीं पर अपने को टीम लीडर बनाकर खड़े हो जाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए किसी मजबूत हस्त की छत्र छाया चाहिए होती है। पीछे से सही गलत की सलाह मिलती रहे तो कदम सुरक्षित दिशा की ओर खुद व खुद  बढ़ते जाते हैं। यहाँ आकर्षण बल का सिद्धांत का सिद्धांत लागू होने लगता है। लोग वहीं का रुख कर लेते हैं जहाँ मजबूती दिखाई  देती है।

मुहँ फुलाकर हाथ पर हाथ धरे बैठने से टीम का आखिरी सदस्य भी चला गया। अब किसके सामने अपनी महत्वा को बताएंगे। दरसल आप में नेतृत्व की क्षमता  नहीं थी  सो ऐसा तो होना ही था। लगभग सभी क्षेत्रों में यही चल रहा है। पकड़ ढीली होते ही ताश के पत्ते खुलने लगते हैं और रेतीला महल भरभरा कर ढह जाता है। रेत सीमेंट का जोड़ बहुत जरूरी है। केवल नींव के पत्थर तो आपको मौसम की मार से नहीं बचा सकते हैं। आजकल खम्भों पर बहुमंजिला इमारतें तनी होती हैं। सो नींव का एक पत्थर यदि चिल्लाकर दुहाई देगा की वही प्रमुख है उसे पूजो इस पर कोई ध्यान नहीं देगा।

सुधारों की ओर समय रहते ध्यान न देने पर बारिश में छतों से पानी टपकना, दीवारों में सीलन आना, घरों में पानी घुसना ये सब आम बातें हैं। हमारे जीवन के सभी कार्य इन्हीं नियमों से चल रहे हैं। समय रहते संतान को संस्कारित न किया जाए तो वो बिना मौसम आपकी बेज्जती करवाती रहती है। और मोह से ग्रसित व्यक्ति  धृतराष्ट्र की तरह महाभारत के चक्रव्यूह का गुनहगार बन ही जाता है।

अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने से ही मजबूती कायम होगी। कहते हैं नियमित पुस्तक पढ़ने से हर समस्या का हल मिल जाता है। हमें दूसरों के अनुभवों से सीखने व समझने हेतु अपने क्षेत्र से सम्बंधित पुस्तकें पढ़नी चाहिए।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ अकादमी का भूत ☆ डॉ मधुकांत ☆

डॉ मधुकांत  

(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ मधुकांत जी का हार्दिक स्वागत)

संक्षिप्त परिचय  

जन्म – 11अक्टूबर1949( सांपला-हरियाणा )

पुरस्कार, सम्मान – हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला से बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सम्मान तथा महाकवि सूरदास आजीवन साहित्य साधना सम्मान (पांच लाख) महामहिम राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री हरियाणा द्वारा पुरस्कृत ।

प्रकाशित साहित्य (175पुस्तकें) – 09 उपन्यास, 13 कहानी – 28 लघुकथा-15 कविता, 42 –  बाल साहित्य, 34 अन्य, 34 संपादन।  रचनाओं पर शोध कार्य।

नाटक ‘युवा क्रांति के शोले’ महाराष्ट्र सरकार के 12वीं कक्षा की हिंदी पुस्तक युवक भारती में सम्मिलित।  रचनाओं का 27 भाषाओं में अनुवाद

संप्रति –सेवानिवृत्त अध्यापक, स्वतंत्र लेखन ,रक्तदान सेवा तथा हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंथा के नाटक अंक का संपादन।   प्रज्ञा साहित्यिक मंच के संरक्षक 

☆ व्यंग्य – अकादमी का भूत ☆ डॉ मधुकांत ☆

लाख जतन किए परंतु सब निष्फल। निदेशक महोदय से लेकर चपरासी तक कभी बैठक करते, कभी अकेले में चिंतन करते… समझने का प्रयत्न करते… परंतु सब समझ से परे…। समझ में आए या ना आए परंतु यह कैसे घोषणा कर दें कि साहित्य अकादमी के कार्यालय में भूत का साया है ।जो साहित्य समाज को दिशा प्रदान करता है वह अपने माथे पर अंधविश्वास का कलंक कैसे लगने दें ।

पहली -दूसरी घटना पर किसी ने विशेष ध्यान न दिया परंतु साक्षात को प्रमाण की क्या आवश्यकता। सुबह-सुबह साहित्य अकादमी के पुरस्कारों की लिस्ट गायब हुई ।दूसरी लिस्ट निकाली गई तो सारे पुरस्कार उल्टे सीधे हो गए। मुख्यमंत्री के पी ए साहब का प्रतिदिन फोन आ जाता, ‘आज ही पुरस्कृत साहित्यकारों की लिस्ट भेजो ।चुनाव का बिगुल बजने वाला है ।इससे पूर्व पुरस्कारों की घोषणा हो जानी चाहिए…’। तीसरी लिस्ट तैयार की गई तो पी ए साहब दो दिन के लिए बाहर चले गए ।

अगले दिन सारा स्टाफ निदेशक लाल पांडे के ऑफिस में  जमा हो गया ।मेज पर रखी पुरस्कारों की लिस्ट पर समीप में लुढकी पड़ी स्याही की दवा ने भूत जैसा आतंकित चित्र बना दिया । पंखे के रेगुलेटर से अचानक सपार्किंग के साथ जोरदार चिंगारी निकली और पंखे की आवाज एकदम बढ़ गई। तेज हवा से कुर्सी का टॉवल उड़कर गायब हो गया। बाथरूम के अंदर से टप टप पानी गिरने की भयानक आवाज आने लगी। ऑफिस की कुंडी में लटकता हुआ ताला जोर-जोर से हिलने लगा…। सब देखकर लाल पांडे की चीख निकल गई। आवाज सुनकर उनकी सचिव कविता भागी आई ,सर यह किसी भूत-प्रेत का ही काम है…कुछ ना कुछ कराना पड़ेगा…।

 तो क्या करें एक तो दफ्तर में भूत, दूसरा मुख्यमंत्री का भूत… लाल पांडे घबरा गए । “चिंता क्या है सर, लिस्ट तो आपके कंप्यूटर में है एक और निकाल लीजिए ।मैं खुद जाकर दे आती हूं…” मैम कविता ने सुझाया ।

लाल पांडे जी अपनी उंगलियों को कंप्यूटर पर चलाने लगे। कंप्यूटर में फाइल गायब पाकर उनके माथे पर पसीना आ गया। कुर्सी के पीछे खड़ी मैम कविता भी यह देखकर भयभीत हो गई, “सर अब तो कुछ करना ही पड़ेगा। एक ओझा मेरी पहचान का है।”  “कुछ भी करो परंतु  यह समाचार प्रेस में नहीं जाना  चाहिए… पी ए साहब का फोन भी आने वाला होगा । घबराहट के कारण मेरे पेट में गुड गुड होने लगी है।मैं तो दो दिन की सिक- लीव लेकर मैं घर जा रहा हूं। कविता जी ,आप निर्णय तैयार करने वाले एक्सपर्ट की डिटेल लेकर अवॉर्ड की लिस्ट तैयार कर लेना… और हां वह ओझा वाला उपाय भी करले” ,समझाते हुए लाल पांडे ऑफिस से बाहर आ गए ।

दोपहर को कविता मैम का फोन आया ,”सर एक ओझा को कार्यालय में बुलाया है…।”

 “पहले यह बताओ पी ए साहब का फोन तो नहीं आया…?”

 “जी नहीं। मेरे रहते आप चिंता ना करें…”। 

“कविता जी पत्नी गुजर जाने के बाद आपका ही सहारा है, अब बताइए ओझा जी क्या कहते हैं?” दबी आवाज में कविता मैंम ने समझाया, “सर वह कहता है हमारे ऑफिस पर किसी असंतुष्ट, स्वर्गीय साहित्यकार के भूत का साया है…”। 

“कविता जी, इनसे ऐसा उपाय पूछो जिसका तुरंत प्रभाव पड़ जाए”। “मैंने पूछा है सर ओझा जी का कहना है कोई असंतुष्ट साहित्यकार ,जो जाने अनजाने पुरस्कार मिलने से वंचित रह गया हो और उसकी अकाल मृत्यु हो गई हो… उसकी पहचान करिए ,तब इलाज किया जा सकता है”।

“साहित्यकार… असंतुष्ट… अकालमृत्यु ,” बुदबुदाते हुए कई चेहरे उनकी आंखों में घूमने लगे। “कविता जी आप तो मुझसे भी पुरानी है ।आप ही कुछ रास्ता निकालिए, अन्यथा मैं तो लंबा बीमार पड़ जाऊंगा।” “आप चिंता ना करें सर ,मैं कुछ करती हूं” ।

लाल पांडे जी को आज अनुभव हुआ  कि औरतों में पुरुष से अधिक हौसला होता है । मोबाइल बंद होने के बाद घर और ऑफिस दोनों में चिंतन -मनन होने लगा।          

एक घंटे बाद मैम कविता ने फोन आया ,”सर मुझे याद आता है कई वर्ष पहले हमने कहानी प्रतियोगिता कराई थी। जिसमें तीन निर्णायक थे। विशेषज्ञों के निर्णय से अलग हमने राजनीतिक दबाव के कारण अलग निर्णय घोषित करना पड़ा था। हमारे ऑफिस के एक सस्पेंड चपरासी ने विशेषज्ञों वाला सही निर्णय चोरी करके अखबार में भेज दिया ।तब अकादमी की खूब फजीहत हुई थी । निर्णायक मंडल ने जिस लेखक का नाम प्रथम घोषित किया था, समाचार पत्र में पढ़कर उनको सदमा बैठ गया और कुछ ही दिनों बाद  हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई थी ।ओझा जी कहते हैं शत-प्रतिशत यह वही व्यक्ति है इसी साहित्यकार की मुक्ति के लिए ओझा जी ने उपाय बताया है कि पुरस्कार की राशि उसकी पत्नी को भेज दें और ₹5000 ओझा जी ने अपनी फीस भी बताई है ।” 

“कर दो कविता जी तुरंत कर दो किसी प्रकार उस भूत से पिंड छुड़वाइए ,,,,ग्यारह और पांच सोलह हजार की बात है ,मैं किसी फंड में एडजस्ट करा दूंगा।”

“ठीक है सर, मैं कुछ करती हूं ।”

सायं चार बजे कविता मैम का घबराया हुआ फोन आया ,”सर पी ए साहब ने अवॉर्ड की लिस्ट मंगवाई ।मैंने आनाकानी की तो कहने लगे मैं आपके ऑफिस में आ रहा हूं । सर, आप को भी  बुलाने के लिए कहा है…।”

“अरे कविता जी आपने कहा नहीं मुझे दस्त लगे हैं। देखो, कविता जी जैसे तैसे आप संभाल लीजिए, मैं आपको दशरथ वाला एक  वचन देता हूं…आप कभी भी उसे मांग लेना…।”

 “ठीक है सर, मैं कुछ करती हूं परंतु आप अकादमी के महामहिम है ।अपने वचन को अच्छे से याद रखना।”

 रात को कविता जी ने फोन करके विस्तार से विवरण दिया। “सर, मैंने पी ए जी को सब कुछ बता दिया ।उन्हें भी यकीन हो गया कि अकादमी में कोई भूत का साया है। उन्होंने भी तुरंत समाधान करने को कहा है। आपके तुरंत स्वस्थ होने की कामना भी की है। सर, अब तो आपके दस्तों की ट्रेन को लाल झंडी दिखाई दे गई होगी … परंतु मेरा वचन याद रखना।” “वेरी गुड कविता और दिवंगत लेखक की पुरस्कार राशि का क्या किया ?”

“सर, रामचरण को भेज रखा है।”

अगले दिन लाल पांडे जी उत्साह पूर्वक अकादमी  भवन में आए ।उनके आते ही सब उनके ऑफिस में जमा हो गए। रामचरण ने उत्साह पूर्वक बताया, “सर लेखक की पत्नी भी स्वर्ग सिधार  गई थी। ओझा जी से संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि पुरस्कार की माला बनाकर उनकी मजार पर चढ़ा दो। इधर मैं उन की शांति के लिए पाठ आरंभ करता हूं… हां सुबह सुबह मेरी दक्षिणा अवश्य भिजवा देना। इसलिए सर जी मैं ओझा जी की दक्षिणा देकर अभी अभी यहां आया हूं ।”

“शाबाश रामचरण,” निदेशक महोदय निश्चिंत से हो गए। 

तभी पी ए साहब का फोन आ गया। कांपते हाथों से निदेशक महोदय ने फोन उठाया। “थैंक्यू लाल पांडे जी, आपने ऑफिस खुलने से पहले ही अवॉर्ड की लिस्ट मुख्यमंत्री की टेबल पर रखवा दी… थैंक यू अगेन…।”

 ‘यह किसी कर्मचारी का कार्य है या ओझा का चमत्कार’-आश्चर्य और खुशी के कारण निदेशक महोदय का मुंह खुला का खुला रह गया । उनके चारों ओर खड़े कर्मचारी कुछ भी समझ न पाए कि हमारे निदेशक महोदय को अचानक यह क्या हो गया है।

© डॉ मधुकांत 

सम्पर्क – 211 एल, मॉडल टाउन, डबल पार्क, रोहतक ,हरियाणा 124001

मो 9896667714  ईमेल [email protected]

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 146 ☆ जंगल का कानून ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी  की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  – “जंगल का कानून”।)  

☆ व्यंग्य # 146 ☆ जंगल का कानून ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

बड़े बड़े पेट  एवं मोटे-मोटे हाथ पांव वाले मांसाहारी नेताओं और अमीरों की कुदृष्टि से परेशान होकर जंगल के सारे शेरों ने अपनी आपातकालीन बैठक में सोशल मीडिया और टीवी चैनल में टाइगर जाति पर की जा रही ऊटपटांग बयानबाजी पर निंदा प्रस्ताव रखा। शेर शांत है, शेर का मुंह खुला है, शेर के दांत दिख रहे हैं, शेर अब दहाड़ने लगा है, शेर अब पहले जैसा नहीं रहा, पहले वाले शेर में अलग बात थी… जैसी बातों से मीडिया मार्केट गरम है, और टीवी चैनल वाले अच्छी कमाई कर रहे हैं अपनी टीआरपी बढ़ा रहे हैं।  बैठक में एक शेरनी ने आरोप लगाया कि ये हाथ मटकाने वाले लोग बेवजह तंग करने पर उतारू हैं, कुछ मांसाहारी बड़े लोग  भोली-भाली विदेशी शेरनी को बुरी नजर से देखते हैं और अंट संट कमेंट्स करते हैं सोशल मीडिया में ऐसी घटनाएं दिनों दिन बढ़ रही हैं। 

शेरों के मुखिया ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि  पहले जैसी इंसानियत नहीं रही, अब बात बात में बतड़ंग हो जाता है, टीवी चैनल की डिबेट में ये लोग जानवरों जैसे लड़ते हैं, और हमारी टाइगर कौम को एक विचारधारा से जोड़ कर कुछ भी कहते हैं….शेर का मुंह चाहे खुला हो या अधखुला, शांत हो या खूंखार, बन्द मुह से चबाता हो, चाहे बिना चबाए गुटक जाता हो। शेर के ऊपर आप राजनीति करने वाले कौन होते हो। शेर  शेर है चाहे वो ख़ुश रहे, चाहे अवसादग्रस्त, शांत रहें या उग्र। तुम लोग कौन होते हो  जो चाहते हो कि  उसका चेहरा भी वैसा दिखना  चाहिए जैसा हम कल्पना करते है, सोचते है। शेर को शेर ही रहने दो यार।

कितना मुह खोलना है, कि बन्द रखना है,बोलना है कि नही, दहाड़ना है या मुह मोड़ना है, मुह दिखाना है या मुह छिपाना, दाँत निपोरना या जीभ दिखाना ये सब आप इंसान से करा सकते है जंगल के राजा से नही…. समझे कि नहीं।

इन सब कारणों से जंगल के राजा ने नया कानून प्रस्तावित किया है कि जब भी जंगल में टाइगर देखने ऐसे मांसाहारी और राजनीति करने वाले लोग आयेंगे तो कोई भी शेर शेरनी इनको दर्शन नहीं देगा, और धोखे से देखने की कोशिश की तो गुर्रा कर उन्हें डरायेंगे। जानवर का मांस खाना अच्छी बात नहीं है। और शराब पीकर मांस खाते हुए ये लोग बहुत बुरी बुरी बात करते हैं जिससे जंगल की हवा प्रदूषित होती है। ये सब दो चार दिन को ऐश करने यहां आते हैं और जंगल का वातावरण खराब कर जाते हैं। मीटिंग के अंत में निंदा प्रस्ताव में कहा गया कि मांसाहारी और ऊंटपटांग राजनीति करने वालों  से शेर जाति घृणा करती है और जंगल बचाने की अपील करती है। 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – हास्य-व्यंग्य ☆ अरे ओ सांबा! ☆ श्री विनय माधव गोखले ☆

श्री विनय माधव गोखले

🤣  हास्य-व्यंग्य 😁

☆ अरे ओ सांबा! ☆  श्री विनय माधव गोखले ☆ 

अरे ओ सांबा!

(हाथ में साडी लेके टहलते हुए पूछता है…)

सरदार: कितनी औरते थी?

सेल्समन: दो थी सरदार।

सरदार: गधे के बच्चों! वे दो थी और तुम चार! फिर भी बेच नही पाये! बैठे हैं खाली हाथ… क्या समझकर बैठे थे की सरदार बहुत खुस होगा… बोनस देगा क्यूं?? अरे ओ सांबा, कितनी साडियाँ रखी है हमने दुकान के अंदर?

सांबा: पूरी एक हजार…

सरदार: सुना तुमने, पूरी एक हजार!! और ये इतनी सुंदर साडियाँ इसलिये हैं की यहां से पचास-पचास कोस दूर गाँव में जब बेटी रात को साडी के लिये रोती है, तो माँ उसे कहती है –

“मत रो बेटी, मत रो। मत रो, कल गब्बर सिंग की दुकान से ही खरीद लायेंगे।”

और ये चार नालायक… ये गब्बरसिंग का नाम पूरा मिट्टी में मिलाई दिये। इसकी सजा मिलेगी, बराबर मिलेगी!!😡

सरदार एक सेल्समन से पूछता है- कितनी साडियाँ हैं इस ढेर के अंदर??

Salesman: आँ…?

सरदार: कितनी साडियाँ हैं इस ढेर के अंदर??

Salesman: पचास…सरदार!

सरदार: पचास साडी और आदमी चार। बहुत नाइन्साफी है ये।

© विनय माधव गोखले

भ्रमणध्वनी – 09890028667

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #148 ☆ व्यंग्य – साहब की किरकिट ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘साहब की किरकिट’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 148 ☆

☆ व्यंग्य – साहब की किरकिट

विमल नया नया दफ्तर में भर्ती हुआ है। जोश है, कुछ करने की कुलबुलाहट होती है। अभी उसकी ज़िंदगी का ‘दफ्तरीकरण’ होना शुरू नहीं हुआ है।

दफ्तर में नये साल की पार्टी थी। तभी विमल ने बड़े साहब के सामने प्रस्ताव रख दिया, ‘सर, क्यों न इतवार को दफ्तर के लोगों का एक क्रिकेट मैच हो जाए।’

बड़े साहब को भी कुछ अच्छा लगा। उन्होंने मंजूरी दे दी। विमल ने दौड़-भाग करके क्रिकेट का सामान इकट्ठा कर लिया। दफ्तर के बड़े बाबू अग्रवाल जी ने सुना तो माथा ठोंका, बोले, ‘इन नये नये लौंडों के आने से यही तो गड़बड़ होती है।अब दफ्तर वाले ‘किरकिट’ खेलेंगे। एक इतवार मिलता था घर की सब्जी भाजी लाने के लिए, वह भी गया। खेलो किरकिट।’

गुजराती क्लब के मैदान में इंतज़ाम हुआ। दर्शकों के लिए कुर्सियाँ लगायी गयीं। साहबों की मेम साहबें उन पर आकर विराजीं। लंच का इंतज़ाम किया गया।

दो टीमें बनीं। एक के कप्तान बड़े साहब, दूसरी के छोटे साहब। खेल शुरू हुआ। जैसे बल्लेबाज़, ऐसे ही गेंदबाज़। जो कभी पहले खेलते भी रहे थे उनकी उँगलियाँ अब कलम पकड़ने की ही अभ्यस्त रह गयी थीं। गेंदबाज़ों की गेंद विकेटों से कई फुट दूर से निकल जाती। बल्ला बढ़ाने पर भी गेंद छूने को न मिलती। कभी टप्पा खाकर ऐसे उछलती कि खेलने वाले को अपना चश्मा सँभालना मुश्किल हो जाता। सबको खेल से ज़्यादा अपने हाथ-पाँव बचाने की फिक्र थी। मनोरंजन के पीछे हाथ-पाँव टूटें और दफ्तर से छुट्टी लेना पड़े तो हो गया खेल। चश्मा टूट जाए तो एक हज़ार रुपये की दच्च पड़े।

बड़े साहब खेलने आये तो सब ने तालियाँ बजायीं। छोटी अफसर-पत्नियाँ बड़ी मेम साहब के पास तारीफ करने के लिए सिमट आयीं।

छोटे साहब ने गेंद सँभाली। बहुत सँभल कर गेंद फेंकना शुरू किया, कि न साहब को लगे, न विकेटों को। बड़े साहब हर बार हवा में बल्ला घुमा देते। कभी बल्ला गेंद में लग जाता तो सब फील्डर तालियाँ बजाते, कहते, ‘वाह साहब, क्या बढ़िया शॉट लगाया है।’ अफसर-पत्नियाँ बड़ी मेम साहब से कहतीं, ‘कितना अच्छा खेल रहे हैं। जरूर नई उमर में खूब खेलते रहे होंगे।’ तारीफ करने की होड़ लगी थी। सबने कम से कम एक वाक्य बोला। चुप रहें तो घर लौटने पर पति की लताड़ सुननी पड़े।

श्रीमती वर्मा बोलीं, ‘जब अभी इतना अच्छा खेलते हैं तो नई उमर में तो चैंपियन रहे होंगे।’

बड़ी मेम साहब खुश होकर बोलीं, ‘मेरे को नईं मालूम।’

एक गेंद पर बड़े साहब ने बल्ला घुमाया। संयोग से बल्ला गेंद में लग गया और गेंद चौधरी बाबू की तरफ भागी। चौधरी बाबू ने रोकने का अभिनय करते हुए उसे एक लात लगायी और गेंद चार रन की बाउंड्री की तरफ दौड़ी। बाउंड्री पार करने से पहले ही अंपायर बने बख्शी बाबू ने बाउंड्री का इशारा दे दिया। खूब जोरों की तालियाँ बजीं।।

चौधरी बाबू प्रमुदित होकर बोले, ‘कमाल का शॉट लगाया साहब।’ बख्शी बाबू भी चौका देखकर बहुत खुश थे।

बड़े बाबू ‘किरकिट विरकिट’ भूलकर लंच के इंतज़ाम में लगे थे। भीतर से उन्हें बड़ा संताप था कि दफ्तर के लौंडों ने उनका इतवार खराब कर दिया था। जब साहब के किसी शॉट पर तालियाँ बजतीं तो वे भी घूम कर ताली बजाकर ‘वाह’ बोलते और फिर वापस अपने काम में लग जाते।

बड़े साहब आधे घंटे से जमे थे। उनका आउट होना मुश्किल था क्योंकि कोई उन्हें आउट करना ही नहीं चाहता था।

तभी छोटे साहब ने एक तरफ से गेंद फेंकने का काम विमल को दिया।

विमल बड़े साहब के अभी तक आउट न होने पर कसमसा रहा था। नौकरी की ड्यूटी के अनेक पहलू अभी तक उसकी समझ में नहीं आये थे।

छोटे साहब ने उसे गेंद देते हुए कहा, ‘ठीक से फेंकना।’

विमल बड़े साहब को आउट करके अपना कौशल दिखाना चाहता था। अफसर- पत्नियों पर प्रभाव डालने की भी कुछ ललक थी। उसने धीमी लेकिन सीधी गेंद फेंकी।

पहली गेंद तो विकेटों के ऊपर से निकल गयी, दूसरी ने सब गिल्लियाँ बिखेर दीं। लेकिन अंपायर बख्शी बाबू ने गिल्लियाँ उड़ते ही हाथ उठाकर कहा, ‘नो बॉल।’

विमल कुछ नहीं बोला। अगली गेंद में फिर गिल्लियाँ साफ। बख्शी बाबू फिर हाथ उठाकर बोले, ‘नो बॉल।’ विमल बोला, ‘पहले ही कहना चाहिए था।’ बख्शी बाबू बोले, ‘पहले ही कहा था।’

अगली गेंद फिर गिल्लियाँ ले गयी। बख्शी बाबू फिर हाथ उठाकर बोले, ‘नो बॉल।’ लेकिन बड़े साहब को कुछ शर्म लगी। बल्ला ले कर चल दिये, बोले, ‘नहीं भई, हम आउट हो गये।’

सबको लगा कि खेल का मज़ा ही ख़त्म हो गया। जब बड़े साहब ही मैदान से हट गये तो खेल का मज़ा ही क्या रहा? साहब गये तो जैसे खेल की जान निकाल ले गये।

बड़े बाबू काम छोड़कर दौड़े दौड़े विमल के बाद आये, बोले, ‘तुम अजीब बेवकूफ हो। साहब को आउट करके धर दिया। टेढ़ी-मेढ़ी गेंदें नहीं फेंक सकते थे?’

विमल बोला, ‘मैं तो ‘रूल्स’ के हिसाब से ही खेल रहा था।’

बड़े बाबू बोले, ‘बेटा, ‘किरकिट’ के रूल्स तो बहुत जानते हो, अब कुछ नौकरी के रूल्स भी समझ लो, नहीं तो कभी तुम्हारी गिल्लियाँ ऐसी साफ होंगीं कि दुबारा जमाना मुश्किल हो जाएगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #147 ☆ व्यंग्य – तालाब को गंदा करने वाली मछली ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘तालाब को गंदा करने वाली मछली’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 147 ☆

☆ व्यंग्य – तालाब को गंदा करने वाली मछली

शहर के साहित्यिक-जगत में आनंद मंगल है। हर दूसरे चौथे विमोचन, सम्मान, अभिनंदन, लोकार्पण, गोष्ठियाँ होती रहती हैं क्योंकि ज़्यादातर लेखकों की नज़र में यही लेखन की उपलब्धियाँ हैं, भले ही उनका लिखा कोई पढ़े या न पढ़े। गोष्ठी में प्रशंसा हो जाती है तो लेखक का मन एकाध हफ्ता हरा भरा रहता है। लेखक- बिरादरी के लोग एक दूसरे की भरपूर तारीफ करना अपनी ड्यूटी समझते हैं क्योंकि आलोचना लेखक के कोमल मन को दुखी करती है, जो पाप से कम नहीं होता। कोई सिरफिरा रचना की ख़ामियाँ गिना दे तो ज़िन्दगी भर की दुश्मनी हो जाती है। इसलिए एक दूसरे की पीठ खुजाने का काम चलता रहता है।

इस सुकून और सुख भरे वातावरण में नगर के जाने-माने कवि अनोखेलाल ‘उदासीन’ काँटा बने हुए हैं। ‘उदासीन’ जी महाकवि निराला जैसे ही निराले हैं। नगर की साहित्यिक फ़िज़ाँ में वे खपते नहीं। साहित्यिक बिरादरी में वे सनकी माने जाते हैं। सम्मान-अभिनंदन से दूर भागते हैं, प्रशंसा से बिदकते हैं, विमोचन-लोकार्पण को ढोंग और नौटंकी मानते हैं। गोष्ठियों में खरी खरी आलोचना कर देते हैं और लेखक को नाराज़ कर देते हैं। कहते हैं, ‘साहित्यिक कार्यक्रम भटैती और ठकुरसुहाती के लिए नहीं होते। लेखक में आलोचना बर्दाश्त करने का माद्दा होना चाहिए।’ इसीलिए जिस सभा में वे पहुँच जाते हैं वहाँ उपस्थित लेखकों के मुँँह का ज़ायका बिगड़ जाता है। दिल की धड़कन बढ़ जाती है। समझदार लेखक उन्हें अपने कार्यक्रम में आमंत्रित करना ‘भूल’ जाते हैं।

हर गोष्ठी में ‘उदासीन’ जी के खिलाफ शिकायतों का दफ्तर खुल ही जाता है। पिछली गोष्ठी में कवि गिरधारीलाल ‘निर्मोही’ बोले, ‘बहुत बेकार आदमी है यह। मैं कुछ दिन पहले अपनी पंद्रह-बीस कविताएँ दे आया था। सोचा था पढ़ कर तारीफ करेगा। तीन दिन बाद गया तो कविताएँ मेरी तरफ है फेंक दीं। बोला, छठवीं क्लास के बच्चे जैसी कविताएँ लिखते हो और कवि बनने चले हो। अब बताइए, मैं तीस साल से कविताएँ लिख रहा हूँ और किसी ने ऐसी बात नहीं कही। मेरी कविताओं पर तीन छात्र पीएचडी की डिग्री पा चुके हैं और यह आदमी मेरी कविताओं को रद्दी की टोकरी में डाल रहा है।’

एक और कवि मुकुंदी लाल ‘निराश’ बोले, ‘अरे भैया, एक संस्था इनके पास सम्मान का प्रस्ताव लेकर आयी तो पूछने लगे मेरा सम्मान क्यों करना चाहते हो, मेरी कौन सी कविताएँ पढ़ी है, उनमें क्या अच्छा लगा? बेचारे प्रस्ताव करने वाले भाग खड़े हुए। अब बताइए, सम्मान का कोई कारण होता है क्या?’

गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकारों ने इस स्थिति को गंभीर और शहर के साहित्यिक वातावरण के लिए नुकसानदेह बताया। ‘उदासीन’ जी के आचरण से दुखी सभी साहित्यकारों ने नगर के सबसे सयाने कवि छैलबिहारी ‘दद्दा’ से अनुरोध किया कि चूँकि अब पानी सर से ऊपर चढ़ चुका है, अतः वे अपने सयानेपन का उपयोग करके ‘उदासीन’ जी को सुधारने की कोशिश करें। उन्हें ज़िम्मेदारी दी गयी कि वे ‘उदासीन’ जी का ‘ब्रेनवाश’ करने का प्रयत्न करें और उन्हें समझायें कि वे चंदन-अभिनंदन से छड़कने-बिदकने के बजाय उसे अंगीकार करने की आदत डालें। दूसरे शब्दों में, वे एक असामान्य साहित्यकार की बजाय एक ‘नॉर्मल’ साहित्यकार बन जाएं। यह सुझाव भी दिया गया कि नये लेखकों को ‘उदासीन’ जी की सोहबत से बचाया जाए क्योंकि एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 106 ☆ योग्य और उपयोगी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना  योग्य और उपयोगी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 106 ☆

☆ योग्य और उपयोगी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’  

चलिए इस कार्य को मैं कर देती हूँ मुस्कुराते हुए रीना ने कहा।

अरे भई प्रिंटिंग का कार्य कोई सहज नहीं होता। आपको इसके स्किल पर कार्य करना होगा। स्वयं में कोई न कोई ऐसी विशेषता हो कि लोग आपको याद करें समझाते हुए संपादक महोदय ने कहा।

मैं रचनाओं को एकत्रित करुँगी। संयोजक के रूप में मुझे शामिल कर लीजिए।

देखिए आजकल वन मैन आर्मी का जमाना है। जब हमको ऐसे लोग मिल रहे हैं तो आपके ऊपर समय क्यों व्यर्थ करें।

हाँ ये बात तो है। अब इस पर चिंतन मनन करुँगी। क्या ऐसा हम सबके साथ भी होता है। अगर होता है तो उपयोगी बनें। माना कि उपयोगिता अहंकार को बढ़ावा देती है।अपने आपको सर्वे सर्वा  समझने की भूल करते हुए व्यक्ति कब अहंकार रूपी कार में सवार होकर निकल पड़ता है पता ही नहीं चलता। अपने रुतबे के चक्कर में कड़वे वचन, झूठ की चादर, मंगल को अमंगल करने की कोशिश इसी उधेड़बुन में उलझे हुए जीवन व्यतीत होने लगता है। सब से चिल्ला कर बोलना , खुद को साहब मान कर चिल्लाने से ज्यादा प्रभाव पड़ता है। ध्वनि प्रदूषण से भले ही सामने वाला अछूता रह जाए किन्तु अड़ोसी- पड़ोसी का ध्यानाकर्षण अवश्य हो जाता है।

अपने नाम का गुणगान सुनने की लत; नशे से भी खतरनाक होती है। जिसने भी सत्य समझाने का प्रयास किया वही दुश्मन की श्रेणी में आ खड़ा होता है। उसे दूर करने की इच्छा मन में आते ही आदेश जारी करके अलग- थलग कर दिया जाता है।

बेचारे घनश्याम जी दिन भर माथा पच्ची करते रहते हैं। कोई भी ढंग का कार्य उन्हें नहीं आता बस कार्य को फैलाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करते किन्तु अधिकारी उनके इसी गुण के कायल हैं। रायता फैलाने से ज्यादा विज्ञापन होता है। कोई बात नहीं बस नाम हमारा हो, यही इच्छा मौन साधने को बलवती करती है। अपनी खोल में बैठ कर मूक दर्शक बनें रहना और जैसे ही मौका मिला कुछ भी लिखा और पोस्टर लेकर हाजिर। हाजिर जबावी में तो तेनालीराम व बीरबाल का नाम था किंतु यहाँ तो हुजूर सब कुछ खुद करते हुए देखे जा सकते हैं।

सच कहूँ तो ऐसी व्यवस्था से ही कार्यालय चलते हैं। आपसी सामंजस्य तभी होता है जब माँग और पूर्ति बनी रहे। एक दूसरे को आगे बढ़ाते हुए चलते जाना  ही जीत का मूल मंत्र होता है।

जो कुछ करेगा उसे जीत का सेहरा अवश्य मिलेगा। बस रस्सी की तरह पत्थर पर निशान बनाने को आतुर होना पड़ेगा। हर जगह लोग कर्म के पुजारी बन रहे हैं। कुछ लगातार स्वयं को अपडेट कर रहे हैं तो कुछ भूतकाल में जीते हुए डाउनग्रेड हो रहे हैं। अब आपके ऊपर है कि आप किस तरह की जीवनशैली के आदी हैं।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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