(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना – मधुछन्द नहीं भूला…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # 85 – मधुछन्द नहीं भूला… ☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है “मनोज क दोहे ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # 158 – सजल – एक-एक कर बिछुड़े अपने ☆
(सुप्रतिष्ठित साहित्यकार सुश्री ऋता सिंह जी द्वारा ई- अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपने यात्रा संस्मरणों पर आधारित आलेख श्रृंखला को स्नेह प्रतिसाद के लिए आभार। आज प्रस्तुत है आपकी डायरी के पन्ने से … – लघु कथा – अमृत का प्याला… ।)
मेरी डायरी के पन्ने से # 40 – लघु कथा – अमृत का प्याला… – सुश्री ऋता सिंह
मेरे पास अब कोई परमानेंट ड्राइवर नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर मैं ड्राइवर रखने वाली संस्था से ड्राइवर बुला लेती हूँ।
आज मुझे एक लंबी यात्रा पर निकालना था तो एक परिचित ड्राइवर जो अक्सर मेरी गाड़ी चलाने के लिए आता था, मैंने उसी की माँग डाली थी। सौभाग्यवश संस्था ने उसे गाड़ी चलाने के लिए के लिए भेज दिया था।
गाड़ी में बैठते ही साथ उसने एक डिब्बा खोलकर मुझे मिठाई खिलाई और बोला , आंटी मैंने एक और ज़मीन का टुकड़ा खरीद लिया ।
उसकी बात सुनकर मुझे खुशी हुई।
लोगों की गाड़ी चलाकर प्रति घंटे ₹100 कमानेवाले इस चालक ने अपने घर की खेती बाड़ी कभी नहीं बेची। बल्कि अब एक और टुकड़ा जमीन का खरीद ही लिया। उसकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए।
मैंने खुशी से पूछा – तो अब इसमें भी तो खेती ही करोगे न बेटा ?
वह हँसकर बोला – जी, बिल्कुल ! अब यह खेती घर वालों के लिए है।
मतलब ?
वह गियर बदलते हुए बोला, अब मैं इस पर ऑर्गेनिक खेती करूँगा ।
तो क्या इसके पहले ऑर्गेनिक खेती नहीं करते थे ?
नहीं आंटी , हम हर प्रकार के पेस्टिसाइड डालकर ही फसलें उगाया करते हैं। वरना कीड़े लगकर फसलें खराब होने लगती हैं। छोटी ज़मीन का एक और टुकड़ा है हमारे घर में जिस पर घर पर लगने वाली रोज़मर्रा की सब्ज़ियाँ उगाई जाती हैं। अब परिवार बड़ा हो गया है इसलिए एक और ज़मीन के टुकड़े की जरूरत पड़ गई। अब उन दोनों ज़मीन के टुकड़ों पर घर के लोगों के लिए बिना किसी प्रकार के पेस्टिसाइड यूज़ किए , गोबर खाद आदि डालकर खेती करेंगे। घरवालों को ,बच्चों को सबको शुद्ध और ताज़ी सब्ज़ियाँ नियमित रूप से अब मिला करेंगी।बच्चे हेल्दी रहेंगे।
मैंने एक गहन उच्छ् वास छोड़ा।
सोचने लगी औरों को जहऱ देने वाले सारा अमृत का प्याला अपने लिए ही रख लेते हैं!! शायद यही ज़माने का नियम है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – “ केन बेतवा लिंक परियोजना बहुउपयोगी…” ।)
पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है. सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं. बढ़ती आबादी के दबाव में, तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है. इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है. नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं. बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं. बांधो के दुष्परिणाम भी हुये, जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ. बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं.
रहवासी क्षेत्रो के अंधाधुन्ध सीमेंटीकरण, पालीथिन के व्यापक उपयोग तथा कचरे के समुचित डिस्पोजल के अभाव में, हर साल तेज बारिश के समय या बादल फटने की प्राकृतिक घटनाओ से शहर, सड़कें बस्तियां लगातार डूब में आने की घटनायें बढ़ी हैं. विगत वर्षो में चेन्नई, केरल की बाढ़ हम भूले भी न थे कि इस साल पटना व अन्य तटीय नगरो में गंगा जी घुस आई. मध्यप्रदेश के गांधी सागर बांध का पावर हाउस समय रहते बांध के पानी की निकासी के अभाव में डूब गया.
बाढ़ की इन समस्याओ के तकनीकी समाधान क्या हैं?
नदियो को जोड़ने के प्रोजेक्टस की परिकल्पना स्व अटल बिहारी बाजपेई जी ने की थी, जिसका क्रियान्वयन अब मोदी जी ने प्रारंभ किया है। केन बेतवा लिंक से बड़ी तब्दीली देखने मिलेगी ।अन्य ढेरों इस तरह के प्रोजेक्ट अब तक धनाभाव में मैदानी हकीकत नही बन पाये हैं. उनमें नहरें बनाकर बेसिन चेंज करने होंगे, पहाड़ो की कटिंग, सुरंगे बनानी पड़ेंगी, ये सारे प्रोजेक्टस् बेहद खर्चीले हैं, और फिलहाल सरकारो के पास इतनी अकूत राशि नही है.
बाढ़ की त्रासदी के इंजीनियरिंग समाधान क्या हो सकते हैं ?
अब समय आ गया है कि जलाशयो, वाटर बाडीज, शहरो के पास नदियो को ऊंचा नही गहरा किया जावे. यांत्रिक सुविधाओ व तकनीकी रूप से विगत दो दशको में हम इतने संपन्न हो चुके हैं कि समुद्र की तलहटी पर भी उत्खनन के काम हो रहे हैं. समुद्र पर पुल तक बनाये जा रहे हैं बिजली और आप्टिकल सिग्नल केबल लाइनें बिछाई जा रही है. तालाबो, जलाशयो की सफाई के लिये जहाजो पर माउंटेड ड्रिलिंग, एक्सकेवेटर, मडपम्पिंग मशीने उपलब्ध हैं. कई विशेषज्ञ कम्पनियां इस क्षेत्र में काम करने की क्षमता सम्पन्न हैं. मूलतः इस तरह के कार्य हेतु किसी जहाज या बड़ी नाव, स्टीमर पर एक फ्रेम माउंट किया जाता है जिसमें मथानी की तरह का बड़ा रिग उपकरण लगाया जाता है, जो जलाशय की तलहटी तक पहुंच कर मिट्टी को मथकर खोदता है, फिर उसे मड पम्प के जरिये जलाशय से बाहर फेंका जाता है. नदियो के ग्रीष्म काल में सूख जाने पर तो यह काम सरलता से जेसीबी मशीनो से ही किया जा सकता है. नदी और बड़े नालो मे भी नदी की ही चौड़ाई तथा लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में चम्मच के आकार की लगभग दस से बीस मीटर की गहराई में खुदाई करके रिजरवायर बनाये जा सकते हैं. इन वाटर बाडीज में नदी के बहाव का पानी भर जायेगा, उपरी सतह से नदी का प्रवाह भी बना रहेगा जिससे पानी का आक्सीजन कंटेंट पर्याप्त रहेगा. २ से ४ वर्षो में इन रिजरवायर में धीरे धीरे सिल्ट जमा होगी जिसे इस अंतराल पर ड्रोजर के द्वारा साफ करना होगा. नदी के क्षेत्रफल में ही इस तरह तैयार जलाशय का विस्तार होने से कोई भी अतिरिक्त डूब क्षेत्र जैसी समस्या नही होगी. जलाशय के पानी को पम्प करके यथा आवश्यकता उपयोग किया जाता रहेगा.
अब जरूरी है कि अभियान चलाकर बांधो में जमा सिल्ट ही न निकाली जाये वरन जियालाजिकल एक्सपर्टस की सलाह के अनुरूप बांधो को गहरा करके उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई जाने के लिये हर स्तर पर प्रयास किये जायें. शहरो के किनारे से होकर गुजरने वाली नदियो में ग्रीष्म काल में जल धारा सूख जाती है, हाल ही पवित्र क्षिप्रा के तट पर संपन्न उज्जैन के सिंहस्थ के लिये क्षिप्रा में नर्मदा नदी का पानी पम्प करके डालना पड़ा था. यदि क्षिप्रा की तली को गहरा करके जलाशय बना दिया जावे तो उसका पानी स्वतः ही नदी में बारहो माह संग्रहित रहा आवेगा . इस विधि से बरसात के दिनो में बाढ़ की समस्या से भी किसी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है. इतना ही नही गिरते हुये भू जल स्तर पर भी नियंत्रण हो सकता है क्योकि गहराई में पानी संग्रहण से जमीन रिचार्ज होगी, साथ ही जब नदी में ही पानी उपलब्ध होगा तो लोग ट्यूब वेल का इस्तेमाल भी कम करेंगे. इस तरह दोहरे स्तर पर भूजल में वृद्धि होगी. नदियो व अन्य वाटर बाडीज के गहरी करण से जो मिट्टी, व अन्य सामग्री बाहर आयेगी उसका उपयोग भी भवन निर्माण, सड़क निर्माण तथा अन्य इंफ्रा स्ट्रक्चर डेवलेपमेंट में किया जा सकेगा. वर्तमान में इसके लिये पहाड़ खोदे जा रहे हैं जिससे पर्यावरण को व्यापक स्थाई नुकसान हो रहा है, क्योकि पहाड़ियो की खुदाई करके पत्थर व मुरम तो प्राप्त हो रही है पर इन पर लगे वृक्षो का विनाश हो रहा है, एवं पहाड़ियो के खत्म होते जाने से स्थानीय बादलो से होने वाली वर्षा भी प्रभावित हो रही है.
नदियो की तलहटी की खुदाई से एक और बड़ा लाभ यह होगा कि इन नदियो के भीतर छिपी खनिज संपदा का अनावरण सहज ही हो सकेगा. छत्तीसगढ़ में महानदी में स्वर्ण कण मिलते हैं, तो कावेरी के थले में प्राकृतिक गैस, इस तरह के अनेक संभावना वाले क्षेत्रो में विषेश उत्खनन भी करवाया जा सकता है.
पुरातात्विक महत्व के अनेक परिणाम भी हमें नदियो तथा जलाशयो के गहरे उत्खनन से मिल सकते हैं, क्योकि भारतीय संस्कृति में आज भी अनेक आयोजनो के अवशेष नदियो में विसर्जित कर देने की परम्परा हम पाले हुये हैं. नदियो के पुलो से गुजरते हुये जाने कितने ही सिक्के नदी में डाले जाने की आस्था जन मानस में देखने को मिलती है. निश्चित ही सदियो की बाढ़ में अपने साथ नदियां जो कुछ बहाकर ले आई होंगी उस इतिहास को अनावृत करने में नदियो के गहरी करण से बड़ा योगदान मिलेगा.
पन बिजली बनाने के लिये अवश्य ऊँचे बांधो की जरूरत बनी रहेगी, पर उसमें भी रिवर्सिबल रिजरवायर, पम्प टरबाईन टेक्नीक से पीकिंग अवर विद्युत उत्पादन को बढ़ावा देकर गहरे जलाशयो के पानी का उपयोग किया जा सकता है.
मेरे इस आमूल मौलिक विचार पर भूवैज्ञानिक, राजनेता, नगर व ग्राम स्थानीय प्रशासन, केद्र व राज्य सरकारो को तुरंत कार्य करने की जरुरत है, जिससे महाराष्ट्र जैसे सूखे से देश बच सके कि हमें पानी की ट्रेने न चलानी पड़े, बल्कि बरसात में हर क्षेत्र की नदियो में बाढ़ की तबाही मचाता जो पानी व्यर्थ बह जाता है तथा साथ में मिट्टी बहा ले जाता है वह नगर नगर में नदी के क्षेत्रफल के विस्तार में ही गहराई में साल भर संग्रहित रह सके और इन प्राकृतिक जलाशयो से उस क्षेत्र की जल आपूर्ति वर्ष भर हो सके. इन दिनों जलवायु परिवर्तन से फ्लैश फ्लड का बचाव इस तरह संभव हो सकेगा।
केन बेतवा लिंक परियोजना का जितना स्वागत किया जाए कम है, इससे रोजगार, जल प्रबंधन, ग्राउंड वाटर लेवल में वृद्धि, बाढ़ से बचाव, वर्षा जल का सदुपयोग, बेसिन चेंज से पर्यावरण नियंत्रण जैसे बड़े कार्य होंगे ।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय आलेख “इंटरनेट बधाई”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 212 ☆
🌻आलेख 🌻 इंटरनेट बधाई🌻
आधुनिक, वैज्ञानिक युग, या सोशल मीडिया युग कह लिजिये। कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सोशल मीडिया ने अपना वर्चस्व बना कर रखा हुआ है। गूगल महाधिपति ज्ञान का भंडार बांट रहा है। बधाईयों के सुंदर शब्द, पिरोये गये पुष्पहार, सजे गुलदस्ते, चाहे जैसा इमेज निकालना, यहाँ तक के कि मृत्यु श्रद्धांजलि की तस्वीरें भी अनेक दिखाई देती है।
परंतु क्या? इनमें आदमी के आत्मिय, श्रद्धा भाव शामिल हो पता है। फेसबुक फ्रेंड की भरमार, परंतु दैनिक जीवन में जब वह अकेला किसी चीज के लिए परेशान खड़ा है, तब वह केवल वही अकेला होता है।
सोशल मीडिया केवल नयन सुख है। आत्मा की संतुष्टि नहीं आपको कई उपदेश और कई ज्ञान की बातें मिलेगी परंतु कोई आपकी आत्मा को संतुष्टि के पल नही दे सकता। क्षण भर की खुशी तो पहुँचा सकता है। परन्तु जो अपनों के बीच होता है,जिसकी यादें बरसों मन को गुदगुदाती रहती है। वह न जाने कहाँ खतम हो गया।
आज घर परिवार को याद करते-करते वह भाव विभोर हो रहा था। एक समय ऐसा था कि जब पूरा परिवार इकट्ठा हो, तो पता चला कि परिवार किसे कहा जाता है।
कहाँ का सामान कहाँ कब पहुंच जाए। किसी को पता नहीं रहता था। हर बच्चे को एक साथ बिठाकर नाश्ता कराना, एक स्नान का काम तो दूसरा सबको तैयार कर दिया। कब भोजन बना और तब तक न जाने खेल-खेल में क्या हो जाता।
पता चलता था किसी के बदले किसी को दो-चार थप्पड़ ज्यादा लग गए। फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं। भोजन की थाली पड़ोसी के घर तक पहुँच जाती। भोजन एक साथ। बच्चों में होड़ किसी का मुँह इधर किसी का मुँह उधर। कोई किसी की थाली से खा रहा है और कोई कुछ गिर रहा, परंतु सभी खुश। दादा जी या ताऊ जी एक-एक बाइट सबको खिला देते।
घर परिवार में ऐसा समय आया कि सब कुछ नष्ट होता चला गया। सभी ज्यादा समझदार जो हो गए थे। बड़े चुपचाप और छोटों का मुँह कुछ ज्यादा खुल गया। बूढ़े माँ पिताजी की सेवा भी वही करें जो केवल सुनता है, कुछ कहता नहीं है।
और चुपचाप पैसा देता रहे। राम तो सभी बनना चाहे परंतु लक्ष्मण न बनना पड़े। बिना कमाए माँ-बाप की जायदाद मिल जाए और जो बाहर है वह केवल पैसा भेज दे।
बोलचाल आना-जाना बातचीत सब बंद। वर्षों से अलग-अलग।
परंतु जाते-जाते अंग्रेजी साल का अंतिम दिन, जैसे ही मोबाइल उठाया फेसबुक फ्रेंड रिक्वेस्ट पर अचानक नजर गई। एक नाम जो बरसों से तो अलग, परंतु हृदय के करीब होते हुए भी मीलों दूर।
संवेदना खत्म हो चुकी थी, परंतु हृदय के कोने में अब भी अपनेपन का एहसास था। मन प्रसन्नता से भर उठा। चलो आज फ्रेंड रिक्वेस्ट में नाम तो शामिल हो गया।
आत्मीय ना सही सोशल मीडिया फ्रेंड बनकर ही वह जुड़ा रहेगा, घर परिवार से। फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर वह नव वर्ष की सोशल मीडिया (इंटरनेट बधाईयाँ) शुभकामनाएँ भेज, आज बहुत खुश हो रहा था।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 114 ☆ देश-परदेश – तथाकथित टीवी के कला कार्यक्रम के निर्णायक और जमूरे ☆ श्री राकेश कुमार ☆
मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता, नग्नता और अश्लीलता का प्रदर्शन देखते, सुनते जीवन के कई दशक व्यतीत हो चुके हैं।
प्रतियोगिता मुख्य रूप से नृत्य और गायन कला में ही होती हैं। कभी कभी विभिन्न कलाओं को लेकर भी कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं।
इन कार्यक्रमों को “जमूरों” के माध्यम से चलाया जाता हैं। टीवी चैनल वालों के पास कुल आठ दस जमूरे सभी कार्यक्रम को संचालित कर सकने के काबिल हैं। कार्यक्रम गायन कला का हो या पाक कला जैसे विषय की, ये जम्मूरे सब काम कर लेते हैं। प्रतियोगियों के निर्णायकों को अपनी हाजिर जवाबी या ठिठोलेपन से दर्शकों का दिल बहलाने के लिए फूहड़ता का प्रदर्शन करते हुए ये जमूरे पाए जाते है।
इन कार्यक्रमों के निर्णायक फिल्मी पृष्ठभूमि से होते हैं।गायन और नृत्य क्षेत्र में कुछ अच्छे और मंजे हुए कलाकार भी होते हैं। अधिकतर निर्णायक शालीनता की हदों को पार कर नग्नता का प्रदर्शन करते हैं। इनमें से अधिकतर तलाक शुदा या निजी जीवन में कुछ अनैतिक कार्यों में लिप्त परिवारों से होते हैं।
हमारे बच्चे जो इन कार्यक्रमों में प्रतियोगी बनकर भाग लेते है, उनके साथ भी कार्यक्रम के निर्माता तरह तरह के निजी संबंध बनाने की झूठी कहानियां भी चलाते हैं। कभी कभी तो इन झूठी कहानियों में बच्चों के परिवार वालों को भी जबरदस्ती शामिल किया जाता हैं।
देश के करोड़ों बच्चे जो इन कार्यक्रमों को टीवी पर देखते है, क्या उस कला के बारे में ज्ञान की वृद्धि होती होगी ? सिवाय घटिया नग्न और अश्लील बातों के वो शायद ही कुछ और अर्जित कर पाते हैं।
निर्णायक जितनी घटिया हरकते करता है, उसको देश के बड़े बड़े विज्ञापन करने को भी मिल जाते हैं। बदनाम है, तो क्या हुआ, चर्चा भी तो हमारी ही होती हैं।
☆ व्रतोपासना – ५. तळपत्या सूर्याची निंदा करु नये ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆
उन्हाळा सुरु झाला की मला काही मंडळी आवर्जून आठवतात. त्यांना जणू सूर्य म्हणजे आपला शत्रू वाटतो. आणि कोणत्याही वेळी बाहेर पडले तरी ही मंडळी काय हा सूर्य,किती ते उन अशी सतत तक्रार करत असतात. याला बऱ्याच प्रमाणात मीडिया पण जबाबदार आहे. त्यांच्या प्रॉडक्टच्या जाहिराती मनावर फार परिणाम करतात.
त्या विरुद्ध काही मंडळी सूर्योपासना करतात. त्या विषयी फार आदर वाटतो.
उन्हाळा सुरु झाला की, आपण सहज म्हणतो, ‘ काय हा उन्हाळा. केव्हा संपणार? ‘ पण हा सूर्य तळपलाच नाही तर पुढे पावसाळा कसा येणार? आणि धनधान्य कसे पिकणार? आणि हा सूर्य प्रकाश सगळ्याच जीवसृष्टी साठी आवश्यक असतो. कित्येक कामे सूर्यावर अवलंबून असतात. आपली दिनचर्या जरी घड्याळावर अवलंबून असेल तरी इतर सृष्टी साठी मात्र सूर्य आवश्यक असतो. आरोग्याच्या दृष्टीने सुद्धा सूर्य आवश्यक आहे. त्याच्या शिवाय आपण दिवसाची कल्पना सुद्धा करू शकत नाही. आपल्याला आवश्यक आणि महत्वाचे व्हिटॅमिन डी आपल्याला सूर्य प्रकाशात सहज व मोफत मिळते. पृथ्वीवर ज्या भागात काही महिने सूर्य उगवत नाही त्यांना सूर्याचे दर्शन,त्याची उब खूप महत्वाची वाटते.
सूर्याचे अनन्य साधारण महत्व आहे आणि ते सर्वांना माहिती आहे. ज्या वेळी सूर्य जास्त प्रखर असेल त्यावेळी आपण आपले विविध उपयांनी संरक्षण करु शकतो. त्या साठी सूर्याला नावे ठेवणे योग्य नाही. आपण मोठी माणसे जसे वागतो,बोलतो त्याचेच अनुकरण लहान मुले करतात. आपण जर त्यांना सूर्याचे महत्व सांगितले तर त्यांना आपण चांगली दृष्टी, चांगले विचार देऊ शकतो. आपण ज्या निसर्ग देवता मानतो त्यांचे पूजन करतो त्यात सूर्याचे स्थान खूप महत्वाचे आहे. म्हणून सूर्याची कधीही निंदा करू नये.
मृणाल म्हणजे माझी आतेबहीण. माझ्यात आणि तिच्यात फार फार तर एखाद्या वर्षाचं अंतर असेल म्हणजे आम्ही तशा बरोबरीच्याच. एकत्रच वाढलो, एकत्र खेळलो, बागडलो, मोठ्या झालो आणि आयुष्याला जशी वळणं मिळत गेली तसं तसे आपापल्या विश्वात रमलो.
पण आज मागे वळून बघताना, मृणाल एक व्यक्ती म्हणून तिचा विचार करताना माझ्या मनात अनेकविध अनेक रंगी भावना जागृत होतात. कळत नकळत आपण या व्यक्तीमधल्या कोणत्या आदर्श मूल्यांकडे आकर्षित होत गेलो किंवा आजही आकर्षित होतो याचा विचार माझ्या मनात येतो आणि एकाच वयाच्या जरी असलो तरी त्या त्या वयातल्या वैयक्तिक गुणांचे मापन करताना मृणाल माझ्यापेक्षा अनेक बाबतीत सरस्, सर्वश्रेष्ठ होती—आहे आणि तिच्या या श्रेष्ठत्वाचा पगडा अथवा सरसतेचं प्रभुत्व माझ्या मनावर लहानपणापासूनच होतं असं वाटतं.
गोष्टी अगदी किरकोळही असतील. म्हणजे ज्या वयात मला साधी कणिक भिजवता येत नव्हती त्या वयात मृणाल अगदी सफाईदारपणे सुंदर मऊ गोलाकार पोळ्या करत असे. कुमुद आत्या कधी आजारी असली तर क्षणात ती साऱ्या घर कामाची जबाबदारी लीलया उचलत असे. अगदी तिच्या आईप्रमाणे घरातलं स्वयंपाक पाणी व इतर सारी कामे, शिवाय आईच्या औषधपाण्याचं वेळापत्रक सांभाळून, सर्व काही आवरून शाळेत वेळेवर पोहोचायची. शाळेतही अत्यंत हुशार विद्यार्थिनी म्हणून तिची ख्याती होती. एकही दिवस गृहपाठ केला नाही म्हणून तिला शिक्षा झाली नसेल. सुंदर हस्ताक्षरातल्या तिच्या वह्यांची आठवण आजही माझ्या मनात आहे. शिवाय ती नुसतीच अभ्यासू किंवा पुस्तकी किडाही नव्हती. लहान वयातही तिचं वाचन दांडगं होतं. तिला कोणतंही पुस्तक द्या ते ती एका बैठकीत वाचून काढायची. वाचनाचा वेग आणि आकलन या दोन्हीचा समतोल ती कसा काय साधायची याचं मला आजही नवल वाटतं. जे पुस्तक वाचायला मला एक दोन दिवस तरी लागायचे ते ती काही तासातच कशी काय संपवू शकते याचं मला नेहमी आश्चर्य वाटायचं आणि अशा अनेक कारणांमुळे असेल पण ही समवयस्क आतेबहीण मनातल्या मनात माझी गुरुच बनायची. नकळत मी ही माझ्या मनाला सांगून पहायची,” मृणाल सारखं आपल्यालाही हे आलं पाहिजे…जमलं पाहिजे.”
एक मात्र होतं तिचं लहानपण आणि माझं बालपण -काळ एकच असला तरी आमच्या भोवतालचं वातावरण वेगळं होतं. मृणाल भावंडात मोठी होती म्हणून तिला जन्मत:च मोठेपण लाभलेलं होतं. आई-वडिलांची, भावंडांची ती अतिशय लाडकी होती हे नि:संशय. तिचे पप्पा ज्यांना आम्ही “बाळासाहेब” म्हणत असू- ते एक चतुरस्त्र व्यक्तीमत्त्व नक्कीच होतं. शिक्षण क्षेत्रामधील एक नामांकित व्यक्ती म्हणून त्यांचा लौकिक होता. शिक्षणाचे महत्त्व त्यांना फार होतं. शिक्षण याचा अर्थ केवळ पाठ्यपुस्तकीय किंवा केवळ जगण्यासाठी उपयुक्त साधन एवढंच नव्हे तर ते कसं चौफेर आणि अवधानयुक्त असावं याबद्दल ते खूप आग्रही होते. आपल्या तिन्ही मुलांनी नेहमीच उच्च स्थानावर असायला हवं म्हणून ते जागरूकही होते. त्याबाबतीत ते काहीसे कडक आणि शिस्तप्रिय मात्र होते. काहीसं छडी लागे छम छम विद्या येई घमघम या काव्यपंक्तीचा लाक्षणिक अर्थ त्यांच्या कृतीत जाणवायचा. त्यामुळे त्यांचा धाक वाटायचा. आदराबरोबर भीती वाटायची आणि मला असंही तेव्हा वाटायचं की मृणालभोवती एक धाक आहे, काहीसं दडपण आहे. ज्या मुक्त वातावरणात मी वाढत होते त्यापेक्षा मृणालभोवतीचं वातावरण नक्कीच वेगळं होतं. बाळासाहेबांची आणि माझ्या वडिलांची वैचारिक बैठक, दोघांच्याही व्यक्तिमत्त्वातील भव्यता जरी समान असली तरी कुठेतरी विचारांच्या प्रतिपादनात नक्कीच साम्य नव्हतं आणि याच फरकाचा परिणाम आमच्या जडणघडणीत होत असावा पण असे जरी असले तरी माझ्या आणि मृणालच्या अनेक आघाडीवरच्या प्रगतीत महत् अंतर होतं. हे अंतर पार करण्याची जिद्द माझ्यात नव्हती पण मी विलक्षण प्रभावित मात्र व्हायची.
सुट्टीत आम्ही नेहमी एकत्र खेळायचो. विशेषतः आमचे बैठे खेळ खूपच रंगायचे. त्यातले ठळक खेळ म्हणजे कॅरम, पत्ते आणि बुद्धीबळ. कॅरम आणि पत्ते खेळताना माझ्या मनात नेहमीच छुपा विचार असायचा की, “मृणालच आपली पार्टनर असावी. तिच्या विरोधात नको बाई खेळायला.” कारण त्यातही ती अग्रेसरच होती पण त्यात मला जाणवायचा तो तिचा समजूतदारपणा. खेळताना “कुठे चुकले” हे मात्र ती सांगायची पण ते सांगताना तिचा सूर अगदी विलंबित लईत असायचा.
तिच्यात आणि माझ्यात खेळताना एक फरक जाणवायचा तो म्हणजे मला खेळायला खूप आवडायचे, माझी वृत्ती खेळकर होती पण “खेळाडू” हा किताब मला मिळू शकला नाही. याउलट मृणाल मैदानी खेळात, बैठ्या खेळात, बॅडमिंटन, टेबल टेनिस सारख्या खेळातही प्रवीण होती. आमच्या शाळेच्या टीमची तर ती कॅप्टनच होती. अंतर शालेय जिल्हास्तरीय क्रीडा क्षेत्रात तिची उल्लेखनीय कामगिरी होती आणि खेळातलं हे प्राविण्य तिने महाविद्यालयीन स्तरावरही गाजवलं. तिला मिळणाऱ्या ट्रॉफीज पाहून त्या बालवयात, उमलत्या वयात तिच्याविषयी वाटणाऱ्या कौतुकानेच नव्हे तर “मी का नाही तिच्यासारखी होऊ शकत?” या वैष्यम्यानेसुद्धा मी भारावून जायचे.
खरं म्हणजे आमच्या परिवारामध्ये वेगवेगळी गुणसंपदा तशी प्रत्येकात होती पण मृणाल मला नेहमीच सर्वगुणसंपन्न वाटायची. दिवाळीत तिने काढलेल्या मोठमोठ्या सुबक रांगोळ्या, तिचे भरत काम, तिचे शिवणकाम, तिने बनवलेला फराळ या सगळ्यातला तिचा जो उत्कृष्टपणा असायचा त्याने मात्र मी थक्क व्हायचे. केवळ तिच्या गुणांची यादी देणे हा मात्र माझा या लेखनाविषयीचा उद्देश नक्कीच नाही.
तिच्या आयुष्याचा आलेख मांडताना म्हणजे अगदी शाळेत सतत पहिला नंबर मिळवणाऱ्या शाळकरी मुलीपासून ते इन्स्टिट्यूट ऑफ सायन्स या गव्हर्नमेंट कॉलेजच्या डीन पदी पोहोचणारी, पीएचडीचे अनेक विद्यार्थी घडवणारी, विद्यार्थीप्रिय एक बुद्धिमान स्त्री म्हणून तिच्याकडे पाहताना टप्प्याटप्प्यावर माझ्या मनात अनेक प्रश्न आहेत. अनेकविध गुणांची शिदोरी बांधून देताना त्या अज्ञात परमेश्वराने तिच्या भविष्यातल्या नियतीविषयीचा विचार आणि तरतूद करून ठेवली होती का?
कुमुदआत्या गेली तेव्हा मला वाटते मृणाल कॉलेजच्या पदवी क्रमाच्या शेवटच्या वर्षाला असेल. विनू, अनिल (तिचे धाकटे भाऊ) तर लहानच होते. खरं म्हणजे अर्धवट वयात ज्यांचं मातृत्व हरवतंं तेव्हा त्यांचं बिथरलेपण काय असू शकतं याची मी नक्कीच साक्षीदार आहे आणि त्याहीपेक्षा जास्त एका क्षणात प्रौढत्वात विरघळणारी बाल्याची रेषा मला अधिक कंपित करून गेली. क्षणात तिने डोळ्यातले अश्रू पुसले होते आणि लहान भावांचे भविष्य आणि वडिलांचं पोरकेपण, एकाकीपण अत्यंत प्रेमाने आणि जबाबदारीने स्वतःच्या झोळीत पेललं. एका क्षणात तिने एक वेगळं मातृत्वच स्वीकारलं जणू आणि आनंदाने नसलं तरी विनातक्रार तिनं ते सांभाळलं. सामान्यातलं असामान्यत्व म्हणजे काय, साधुत्व म्हणजे काय, संतपण कशाला म्हणायचं याविषयीचे अदृश्य सूक्ष्म सूत्र मला मृणालच्या व्यक्तिमत्त्वात नक्कीच शोधता आलं.
कुमुदआत्या गेल्यानंतरचं तिचं आयुष्य म्हणजे खरोखरच एक यज्ञ होता, एक तपस्या होती. जगण्याची तिची भूमिकाच पार बदलून गेली होती. भावंडांना आईची उणीव तिने कधीच भासू दिली नाही आणि पहाडासारख्या शिस्तप्रिय, कडक व्यक्तिमत्त्वांच्या वडिलांसाठीही ती सावली बनून राहिली. स्वतःच्या साऱ्या कायिक, ऐहिक सुखाच्या तिनं जणू काही समिधा केल्या पण आईविना जगताना परिवारातला आनंद टिकवण्यासाठी ती धडपडत राहिली. विनू आणि अनिल मार्गी लागल्यानंतर तिने स्वतःच्या आयुष्याचा विचार करायला सुरुवात केली. तोपर्यंत ती चाळीशीत पोहचली होती. अर्थात तिने स्वतःच्या बुद्धिमत्तेच्या जोरावर, करिअरचे उच्चतम टप्पे पार केलेलेच होते. अपार जिद्दीने आणि चिकाटीने शिष्यवृत्ती मिळवल्या, परदेशी सेमिनार गाजवले. विद्यार्थ्यांचे प्रेम मिळवले. शैक्षणिक क्षेत्रात अत्यंत गरजेचा घटक म्हणजे गुणांकनातला प्रामाणिपणा. तिने तो कायम जपला. स्पर्धात्मक परीक्षेसाठीच्या परीक्षकांच्या पॅनलवर असताना तिला करोडपती बनण्याची अनेक प्रलोभने दाखवली गेली पण तिने ती अत्यंत तात्विकपणे झुगारून लावली आणि त्यासाठी तिला ते पदही सोडावे लागले पण त्यामुळे ती यत्किंचितही विचलित झाली नाही.
खरं सांगू जेव्हा मी आणि मीच नव्हे तर तिच्या आजूबाजूचे सारे समवयस्क एका ठराविक चाकोरीतलं सुखी आयुष्य जगत होते तेव्हा मृणाल मात्र जीवनातली अडथळ्यांची शर्यत अथकपणे नेटाने खेळत होती. सर्वगुणसंपन्नतेची शिदोरी तिला कोणा अज्ञात शक्तीने बांधून दिली होती त्या बळावर ती खंबीरपणे स्वाभिमानाने तिचं जीवन जगत होती.
अनेकवेळा मला ती काहीशी घट्ट विचारांची वाटते. तिच्यात एक क्रिटीक आहे असंही जाणवतं. ती पटकन् किंवा उगीचच समोरच्याला बरं वाटावं म्हणून कौतुक करण्याच्या भानगडीत पडत नाही.हा गुण समजायचा की तिच्या व्यक्तीमत्त्वातला अभाव मानायचा हे मला माहीत नाही. पण ती एक आवडती प्राध्यापिका, प्राचार्य होती. तिने अनेकांना घडवलं याचा अर्थ तिने कुणाही गुणवंताचं मानसिक खच्चीकरण न करता किंवा अवास्तव कौतुकही न करता त्याचा यशाचा मार्ग त्याला दाखवून दिला हे सत्य आहे. शिक्षक कसा असावा याचा ती वस्तुपाठच आहे.
एका अपघातात तिला कायमस्वरूपी अपंगत्व प्राप्त झालं तरी पण कधी असहाय्यतेचं अथवा अधूपणाचं भांडवल करून जगणं तिने मान्य केलं नाही. अशाही परिस्थितीत आजही कौटुंबिक सुखदुःखाच्या प्रसंगी, सामाजिक वा इतर अनेक ठिकाणी तिची मनापासून उपस्थिती असते.
इतक्या मोठ्या पदावर विराजमान असतानाही निवृत्तीनंतर मिळणाऱ्या वेतनासाठी केवळ सामाजिक करंटेपणाशी, संकुचित जळाऊ वृत्तीशी तिला विनाकारण लढा द्यावा लागला होता. स्वतःच्या शारीरिक व्याधींचाही बाऊ न करता केवळ “भागधेय” असं समजून ती कणखरपणे लढत राहिली. ती शरण कधीच गेली नाही.
आजही आजारी नवऱ्याची मनापासून सेवा करताना तिचा तोल ती कधीही ढळू देत नाही. आम्हीच तिच्यावरच्या प्रेमामुळे तिला काहीबाही सूचना देत असतो पण ती एकच सांगते,” ठीक चाललंय् माझं. करू शकते मी. इतका काही त्रास नाहीये.”
अमेरिकेवरून येणाऱ्या धाकट्या भावासाठी आजही त्याच वात्सल्याने ती त्याच्या आवडीचे खाद्यपदार्थ स्वतःच्या हाताने बनवते. माझ्या मनात नेहमी येतं इतक्या गुणसंपन्न बुद्धिमान व्यक्तीचं आयुष्य कसं असायला हवं होतं..? निवांत आरामदायी… असं नक्कीच नाही जे आज तिचं आहे. जगत असताना कदाचित तिच्या हातून फार मोठ्या भावानिक चुका झाल्या का? कुठेतरी व्यवहारात ती कमी पडली का? की तिच्या आयुष्यातल्या सुखाच्या वेळाच चुकल्या?
ती मला एकदा म्हणाली होती, “ सुख म्हणजे नक्की काय असतं ते मला माहीत नाही पण मी माझ्या दुःखाला, वेदनांना शंभर टक्के देऊन त्यांना मात्र माझ्या ताब्यात ठेवलेलं आहे.” अशावेळी मला तिच्या स्त्रीत्वात एक कणखर पौरुष दिसतं.
पुन्हा पुन्हा मी मृणालचा विचार करते तेव्हा मला वाटतं मृणालसारख्या व्यक्ती इतरांनाच उदाहरणादाखल असतात, आधारभूत असतात आणि मुख्य म्हणजे अशा व्यक्ती कधी निराधार नसतातच. त्यांच्या अंतरातलं बळ हाच त्यांचा आधार असतो. बाह्य जगाच्या आधाराची त्यांना गरज नसते का? एक मात्र नक्की की स्थितप्रज्ञतेचे प्रवाह मला तिच्या जगण्यात नेहमी जाणवतात. खिंड लढवणाऱ्या योध्याचे दर्शन मला तिच्यात होते. मी असं म्हणणं म्हणजे अतिशयोक्ती आहे किंवा अवास्तव केलेलं ग्लोरीफिकेशन आहे असं मला या क्षणीही अजिबात वाटत नाही.
मृणाल या शब्दाचाही मला खरा अर्थ तिच्यात सापडतो… .. कमळाचा देठ .. .. तो कुठे दिसतो का? चिखलात घट्ट रुतलेला असतो. आपल्याला दिसतात ती फक्त पाण्यावरची गोजिरवाणी सुरेख उमललेली कमळं… … मृणालही अशीच आहे. जीवनरूपी दलदलीत पाय घट्ट रोवून रुतलेली. चेहऱ्यावर मात्र सदैव हास्याचं कमळ फुललेलं.
☆ “शह आणि काटशह” – लेखक : डॉ. राजीव जोशी ☆ परिचय – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆
पुस्तक : शह आणि काटशह (वैद्यकीय व्यवसायातील चुरस)
लेखक : डॉ. राजीव जोशी
पृष्ठे : २४४
मूल्य: ४००₹
या पुस्तकातील एकूण ३१ प्रकरणांतून वैद्यकीय व्यवसायातील चांगल्या-वाईट घटनांची चिरफाड करण्यात आली आहे. आणि शह आणि काटशह या स्वरूपात लिहिलेली आहे, जी वाचनीय आहे. त्यातील काही भाग-
व्यवसायातील चुरस
या पुस्तकाची प्रस्तावना डॉ. सुहास नेने यांनी लिहिली आहे …. ‘कोणतीही गोष्ट अर्थार्जन करण्यासाठी करायची म्हटली की, त्यात नफ्याचा आणि तोट्याचा विचार आलाच. कोणीही जास्तीत जास्त नफा कसा मिळवावा आणि तोही कमीत कमी तोटा सोसून असाच विचार करणार. अगदी वैद्यकीय व्यवसायातही ही गोष्ट ओघानेच आली. किंबहुना क्वचितप्रसंगी चार गुना अधिकच ! चार पैसे दुसऱ्यापेक्षा जास्त मिळवायचे म्हणजे त्यात चुरस, ईर्षाही आलीच. चुरस आली की त्यात डाव, प्रतिडाव, शह-काटशह हे पण येणे क्रमप्राप्त झाले. ‘Everything is fair in love and war. ‘ …. असे त्यात त्यांनी म्हटले आहे. शह-काटशहदेखील चुकीच्या मार्गाने द्यायचे, का नीतीच्या मानदंडांचा विचार करायचा, हा शेवटी ज्याचा त्याचा प्रश्न राहतो. रुग्णाच्या हितासाठी राबवलेली चुरस रुग्णाच्या नक्कीच कायम फायद्याची यात कणभरही शंका नाही.
डॉक्टर राजीव जोशी अशाच निर्हेतुक चुरशीचे स्वागत करतात आणि त्याप्रमाणे वागतात आणि म्हणून अगदी निःसंकोचपणे लिहूनही जातात……
… चुरशीच्या डावाची सुरुवात प्रतिष्ठित, आधीपासूनच एस्टॅब्लिश्ड असलेल्या डॉक्टरांच्या रुग्णालयाच्या जवळ स्वतःचे रुग्णालय सुरू करण्यापासून होते आणि एका गोष्टीतून दुसऱ्या तितक्याच उत्कंठावर्धक गोष्टीचा जन्म होतो. हा सिलसिला सुरूच राहतो आणि त्यातून वैद्यकीय विश्वातील अनेक सुरस, चमत्कारिक कथा विश्वास बसणार नाही अशा पद्धतीने उलगडत जातात. सत्यकथा असल्याने त्यात पुण्यातील प्रतिष्ठित, नामांकित डॉक्टरांची नावेही प्रत्यक्षपणे, कधी कधी अप्रत्यक्षपणे येऊन जातात. घासाघीस करून पदरात पाडून घेणाऱ्या तडजोडी, बहाद्दर व्यावसायिकांची कहाणीपण येते. येनकेन प्रकाराने स्वतःच्या पोळीवर तूप ओढून घेणारे अगदी सीनियर सुद्धा त्यातून सुटत नाहीत. गरज नसताना आपण ज्या अभ्यासक्रमाचे शिक्षण घेतलेले नाही; त्याची औषधे बिचाऱ्या अगतिक, अडाणी रुग्णांना देण्याचा अधिकार आहे का, हा सवाल आपोआपच येतो. बऱ्याच वेळी लोकांना साधे हवामानात बदल झाल्यामुळे होणारे व्हायरल इन्फेक्शन असते; की जे आपले आपणच औषधाविना काही दिवसांत जाणारच असते, त्यासाठी भारी भारी अँटिबायोटिकची आवश्यकता नसते. जे काम टाचणीने होणार आहे; त्यासाठी अॅटमबॉम्बचा उपयोग करणे चूकच आहे, परंतु याविषयी माहीत नसल्यामुळे किंवा अन्य काही कारणांमुळे केले जाते. अलंकारिक नसली, तरी ओघवत्या भाषेत असल्यामुळे प्रत्येक घटना अतिशय स्वच्छपणे डोळ्यांसमोर येते.
नुसता प्रॉब्लेम सांगून डॉक्टर राजीव थांबत नाहीत; तर त्यासाठी काय करावे, काय करू नये असा टेक-होम मेसेजही देतात. ही या लिखाणाची खासियत मी समजतो. ‘तुम लढो मैं कपडे संभालता हूँ’ सारखी बोटचेपी वृत्ती त्यांची नाही. इन्शुरन्स कंपन्यांच्या वाढत्या, गोंडस, फसव्या कारभाराबद्दल बोलताना ते परखडपणे आपली मते मांडतातच आणि ‘पती-पत्नी और वो’ यांच्यातील ‘वो’ कडेपण आता खूप लक्ष द्यायला लागणार आहे, असा संकेत देतात. कट किंवा कमिशन आणि डॉक्टर यांचा चोली दामन का साथ असतो, असे समीकरण काही लोकांच्या डोक्यात अतिशय फिट बसलेले आहे. त्यातल्या स्वतःला आलेल्या अनुभवाबद्दलही ते बोलतात; पण या वेळी डॉक्टरांची लेखणी अडखळत नाही, कारण ‘कर नाही तर डर कोणाला !’ कटची कटकट ठेवली नाही, तर डोक्याला त्रास होणारच नाही! (कट घेणारे फक्त फॅमिली डॉक्टरच असतात, असा गोड गैरसमज डॉक्टर जोशींनी करून घेतला असावा; असा माझा समज आहे ! कट घेणाऱ्याचा एक डीएनएच असतो, तो डिग्री किंवा पॅथीमध्ये नसतो !!) आयुर्वेदातील एमडी किंवा एमएससारख्या डिग्ग्रांनी रुग्णांची फसगत करणाऱ्या महाभागांना पण जाता जाता ते सहज फटकारतात. त्यांच्या डिग्रीतला फोलपणा सिद्ध करायला कचरत नाहीत. अप्रामाणिकपणे वैद्यकीय व्यवसाय करणाऱ्या, औषध कंपन्यांच्या प्रतिनिधींच्या ज्ञानावर अवलंबून, त्यांच्या इशाऱ्यावर नाचून औषधे देणाऱ्यांना चिमटा काढायला सोडत नाहीत.
साठा उत्तरांची ही कहाणी सुफल संपूर्ण होताना डॉक्टर राजीवची लेखणी दुसऱ्या भागासाठी सरसावलेली दिसते. ते प्रवेश प्रक्रियेतील भ्रष्टाचाराच्या चक्रव्यूहात शिरतात आणि न सुधारलेल्या किंवा सुधारायचेच नाही, अशा मनोवृत्तीत राहिलेल्या न्याययंत्रणेचे वाभाडे काढतात. पुस्तकाच्या दुसऱ्या भागात रोजनिशी लिहावी, अशा पद्धतीने उत्कंठावर्धक शैलीत मांडलेल्या या कडू सत्य घटनेत स्वतःसाठी नाही, तर वैद्यकीय प्रवेशातील अन्यायाविरुद्ध ‘जनहित याचिका’ (PIL) दाखल करून घेतानाचे स्वानुभव अतिशय रंगतदारपणे रेखाटले आहेत. सहाध्यायी, मित्र- मैत्रिणी, शिक्षक, नातेवाईक, वृत्तपत्रे, प्रशासन आणि न्यायव्यवस्था या साऱ्यांची प्रतिबिंबे या गढूळ पाण्यात आपापल्या कर्माप्रमाणे स्वच्छ पडलेली दिसतात! लाल फितीचा आब, डोळ्यांवर पट्टी बांधलेल्या न्यायदेवतेचा रुबाब, नियमांप्रमाणे चाललेल्या शिक्षणार्थीचा आक्रोश कसा दाबून टाकतो, ‘Justice delayed is Justice denied’ हेच पुनःपुन्हा कसे अधोरेखित करतो आणि रास्त हक्कासाठी सामान्यांना किती झगडावे लागते आणि हातात सत्ता असली की, मी म्हणेन तीच पूर्व दिशा असे राबवणारे कसे भेटतात, हे पटवून देतो.
प्रस्थापित न्यायव्यवस्थेविरुद्ध स्वतःसाठी नव्हे, तर अयोग्य पद्धतीने येऊ पाहिलेल्या पण चुकीच्या राजमार्गाला (!) विरोध करण्यासाठी पदरमोड करून, लष्करच्या भाकरी भाजताना करावा लागणारा मनस्ताप, घालवलेली मनःशांती या साऱ्यांचाही आढावा या दुसऱ्या भागात येतो.
चुरस, शह-काटशह यांना दृश्य स्वरूपात दाखवण्यासाठी वापरलेला बुद्धिबळाचा पट शीर्षकाची यथार्थता नक्की दाखवतो.
परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली
पालघर
मो.9619800030
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈