हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४१ – क्या चल रहा है? ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४१ क्या चल रहा है? … ?

एक विज्ञापन बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिलता था, ‘फलां-फलां बॉडी-स्प्रे चल रहा है।’ इसी तर्ज़ पर एक मित्र से पूछा,‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिला,‘यही सोच रहा हूँ कि इतना जीवन बीत गया, क्या किया और क्या कर रहा हूँ? जीवन में क्या चल रहा है?’ उत्तर चिंतन को दिशा दे गया।

स्तुतः यह प्रश्न हरेक को अपने आपसे अवश्य करना चाहिए-‘क्या चल रहा है?’ दिन में जितनी बार आईना देखते हो, उतनी बार पूछो खुद से-‘क्या चल रहा है?’ बकौल डॉ. हरिवंशराय बच्चन-‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’ चौबीस घंटे भौतिकता के संचय में डूबा मनुष्य जीवन में भौतिकता का भी उपभोग नहीं कर पाता। संचित धन को निहारने, हसरतें पालने और सब कुछ धरा पर धरा छोड़कर चले जानेवाले से बड़ा बावरा भिखारी और कौन होगा? पीछे दुनिया हँसती है-‘संपदा तो थी पर ज़िंदगी भर ‘मंगता’ ही रहा।’

बड़ा प्रश्न है कि क्या साँसें भी विधाता द्वारा प्रदत्त संपदा नहीं हैं? प्राणवायु अवशोषित करना-कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जित करना, इतना भर नहीं होता साँस लेना। मरीज़ ‘कोमा’ में हो तो रिश्तेदार कहते हैं-‘ कुछ बचा नहीं है, बस किसी तरह साँसें भर रहा है।’ हम में से अधिकांश लोग एक मानसिक ‘कोमा’ में हैं। साँसें भर रहे हैं, समय स्वतः जीवन में कालावधि जोड़ रहा है। काल के आने से पूर्व मिलनेवाली अवधि-कालावधि। हम अपनी सुविधा से ‘काल’ का लोप कर ‘अवधि’ के मोह में पड़े बस साँसें भर रहे हैं। फिर एक दिन एकाएक प्रकट होगा काल और पूछेगा-‘क्या चल रहा है?’ जीवन भर सटीक उत्तर देनेवाला भी काल के आगे हकलाने लगता है, बौरा जाता है, सूझता कुछ भी नहीं।

एक साधु से शिष्य ने पूछा कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था की जा सकती है जिसमें मनुष्य की मृत्यु का समय उसे पहले से पता चला जाए। ऐसा हो सके तो हर मनुष्य अपने जीवन में किए जा सकनेवाले कार्यों की सूची बनाकर निश्चित समय में उन्हें पूरा कर सकेगा, मृत्यु के समय किसी तरह का पश्चाताप नहीं रहेगा। साधु ने कहा, ‘जगत का तो मुझे पता नहीं पर तेरी मृत्यु आठ दिन बाद हो जाएगी। सारे काम उससे पहले कर लेना।’ कहकर साधु आठ दिन की यात्रा पर चले गए।  इधर गुरु का वाक्य सुनना भर था कि शिष्य का चेहरा पीला पड़ गया। वह थरथर काँपने लगा। खड़े-खड़े उसे चक्कर आने लगा। कुछ ही मिनटों में उसने खटिया पकड़ ली। खाना-पीना छूट गया, हर क्षण उसे काल सिर पर खड़ा दिखने लगा। आठ दिन में तो वह सूख कर काँटा हो चला। यात्रा से लौटकर गुरु जी ने पूछा, ‘क्यों पुत्र, सब काम पूरे कर लिए न?’ शिष्य सुबकने लगा। आँखों में बहने के लिए जल भी नहीं बचा था। कहा, ‘गुरु जी, कैसे काम और कैसी पूर्ति? मृत्यु के भय से मैं तो अपनी सुध-बुध भी भूल गया हूँ। कुछ ही क्षण बचे हैं, काल बस अब प्राण हरण कर ही लेगा।’ गुरु जी मुस्कराए और बोले, ‘ यदि मृत्यु की पूर्व जानकारी देने की व्यवस्था हो जाए तो जगत की वही स्थिति होगी जो तुम्हारी हुई है।…और हाँ सुनो, तुमसे असत्य बोलने का प्रायश्चित करने मैं आठ दिन की साधना पर गया था।

तुम्हारी और मेरी भी मृत्यु कब होगी, मैं नहीं जानता।’

काल आया भी नहीं था, उसकी काल्पनिक छवि से यह हाल हुआ। वह जब साक्षात सम्मुख होगा तब क्या स्थिति होगी? जीवन ऐसा जिओ कि काल के आगे भी स्मित रूप से जा सको, उसके आगमन का भी आनंद मना सको। जैसा पहले कहा गया-साँस लेना भर नहीं होता जीवन। शब्द है-‘श्वासोच्छवास।’ प्रकृति में कोई भी प्रक्रिया एकांगी नहीं है। लेने के साथ देना भी जुड़ा है। जीवन भर लेने में, बटोरने में लगे रहे, भिखारी बने रहे। संचय होते हुए भी देने का मन बना ही नहीं, दाता कभी बन ही नहीं सके।

जीवन सरकती बालू वाले टाइमर की तरह है। रेत गति से सरक रही है, अवधि रीत रही है। काल निकट और निकट, सन्निकट है। कोई पूछे, न पूछे, बार-बार पूछो अपने आप से- ‘क्या चल रहा है?’ अपने उत्तर आप जानो पर हरेक पर अनिवार्य रूप से लागू होनेवाला मास्टर उत्तर स्मरण रहे-काल चल रहा है।

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८३ – विमर्श: योग दिवस… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – विमर्श: योग दिवस…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८३ ☆

☆ विमर्श: योग दिवस… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

योग क्या?

जोड़ना, संचय करना.

संचय क्या और क्यों करना?

सृष्टि का निर्माण और विलय का कारक है ‘ऊर्जा’, अत: संचय ऊर्जा का… लक्ष्य ऊर्जा को रूपांतरित कर परम ऊर्जा तक आरोहण कर पाना.

ऊर्जा संचय और योग में क्या संबंध है?

योग शारीरिक, मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को चैतन्य कर, उनकी वृद्धि करता है .फलत: नकारात्मकता का ह्रास होकर सकारात्मकता की वृद्धि होती है. व्यक्ति का स्वास्थ्य और चिंतन दोनों का परिष्कार होता है.

योग धनाढ्यों और ढोंगियों का पाखंड है.

योग के क्षेत्र में कुछ धनाढ्य और ढोंगी हैं. धनाढ्य होना अपराध नहीं है, ढोंगी होना और ठगना अपराध है. पहचानना और बचना अपनी जागरूकता और विवेक से ही संभव है, गेहूं के बोर में कुछ कंकर होने से पूरा गेहूं नहीं फेंका जा सकता. इसी तरह कुछ पाखंडियों के कारण पूरा योग त्याज्य नहीं हो सकता.

दैनिक जीवन की व्यस्तता और समयाभाव के कारण योग करने नहीं जाया जा सकता.

योग करने के लिए कहीं जाना नहीं है, न अलग से समय चाहिए. एक बार सीखने के बाद अभ्यास अपना काम करते हुए भी किया जा सकता है. कार्यालय, कारखाना, खेत, रसोई हर जगह योग किया जा सकता है, वह भी अपना काम करते-करते.

योग कैसे कार्य करता है?

योग मुद्राएँ शरीर की शिराओं में रक्त प्रवाह की गति को सुधरती हैं. मन को प्रसन्न करती है. फलत: थकान और ऊब समाप्त होती है. प्रसन्न मन काम करने पर परिणाम की मात्रा और गुण दोनों में वृद्धि होती है. इससे मिली प्रशंसा और सफलता अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देती है.

योग खर्ची ला है.

नहीं योग बिन किसी अतिरिक्त व्यय के किया जा सकता है. योग रोग घटाकर बचत कराता है.

कैसे?

योग से सही आसन सीख कर कार्य करते समय शरीर को सही स्थिति में रखें तो थकान कम होगी, श्वास-प्रश्वास नियमित हो तो रक्त प्रवाह की गति और उनमें ओषजन की मात्रा बढ़ेगी.फलत: ऊर्जा, उत्साह, प्रसन्नता और सामर्थ्य में वृद्धि होगी.

योग सिखाने वाले बाबा ढोंगी और विलासी होते हैं.

निस्संदेह कुछ बाबा ऐसे हो सकते हैं. उन्हें छोड़कर सच्च्ररित्र प्रशिक्षक को चुना जा सकता है. दूरदर्शन, अंतरजाल आदि की मदद से बिना खर्च भी सीखा जा सकता है.

योग और भोग में क्या अंतर है?

योग और भोग एक सिक्के के दो पहलू हैं. ‘दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’, जीने के लिए अन्न, वस्त्र, मकान का भोग करना ही होगा. बेहतर जीवन स्तर और आपदा-प्रबंधन हेतु संचय भी करना होगा. राग और विराग का संतुलन और समन्वय ही ‘सम्भोग’ है. इसे केवल दैहिक क्रिया मानना भूल है. ‘सम्भोग’ की प्राप्ति में योग सहायक होता है. ‘सम्भोग’ से ‘समाधि’ अर्थात आत्म और परमात्म के ऐक्य की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है. अत्यधिक योग और अत्यधिक भोग दोनों अतृप्ति, अरुचि और अंत में विनाश के कारण बनते हैं. ‘योग; ‘भोग’ का प्रेरक और ‘भोग’ ‘योग’ का पूरक है.

योग कौन कर सकता है?

योग हर जीवित प्राणी कर सकता है. पशु-पक्षी स्वचेतना से प्रकृति अनुसार आचरण करते हैं जो योग है. मनुष्य में बुद्धितत्व की प्रधानता उसे सर्वार्थ से दूर कर स्वार्थ के निकट कर देती है. योग उसे आत्म तत्व के निकट ले जाकर ब्रम्हांश होने की प्रतीति कराता है. कंकर-कंकर में शंकर होने की अनुभूति होते ही वह सृष्टि के कण-कण से आत्मीयता अनुभव करता है. योग मौन से संवाद की कला है. बिन बोले सुनना-कहना और ग्रहण करना और बाँट देना ही सच्चा योग है.

योग दिवस क्यों?

योग दिवस केवल स्मरण करने के लिए कि अगले योग दिवस तक योगरत रहकर अपने और सबके जीवन को बेहतर और प्रसन्नता पूर्ण बनाएँ.

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२१.६.२०१८

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०३ – व्यंग्य – सड़क पर बिखरा साहित्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सड़क पर बिखरा साहित्य)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०३ – व्यंग्य  – सड़क पर बिखरा साहित्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)  

सड़कों पर दौड़ते वाहन केवल वाहन नहीं होते, बल्कि चलती-फिरती दर्शनशास्त्र की यूनिवर्सिटी होते हैं। जब कोई नौसिखिया ड्राइवर अपनी चमचमाती कार में बैठकर स्टियरिंग थामता है तो उसे लगता है कि वह सड़क का सिकंदर है लेकिन असली ज्ञान तो उस खटारा ट्रक के पीछे लिखा होता है जो धुएं का गुबार छोड़ते हुए कहता है “मालिक की ज़िंदगी, चेले की ऐश उड़ाओ कैश”। यह लाइन पढ़ते ही कार के गियर में हाथ लगाए बैठे मध्यमवर्गीय इंसान का सारा घमंड वैसे ही पिघल जाता है जैसे चिलचिलाती धूप में कुल्फी पिघलती है। हमारे देश की सड़कों पर ट्रैफिक रूल्स की कॉपियां भले ही धूल खा रही हों पर इन ट्रकों और ऑटो के पीछे लिखे जीवन के गहरे फलसफे हर आने-जाने वाले की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। आप किसी भी बड़े शहर के चौराहे पर खड़े हो जाइए आपको यमराज की ड्यूटी और इंसानी मजबूरी का ऐसा लाइव कॉम्बिनेशन कहीं और देखने को नहीं मिलेगा जो इन गाड़ियों के बंपर पर मुफ्त में उपलब्ध रहता है। यह इस देश का सबसे सस्ता और टिकाऊ मनोरंजन है जिसे देखने के लिए किसी मल्टीप्लेक्स का टिकट नहीं कटाना पड़ता बस अपनी आंखें खुली रखनी पड़ती हैं।

सड़क पर निकलते ही पहला मुकाबला उस बिरादरी से होता है जो जीवन को एक रेस समझती है और जिनकी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “धीरे चलोगे तो बार-बार मिलोगे, तेज़ चलोगे तो हरिद्वार मिलोगे”। इस एक लाइन में जीवन और मृत्यु का जो अद्भुत ककहरा सिखाया गया है उसे पढ़कर बड़े-बड़े संतों की समाधि भंग हो सकती है। लोग सुबह-सुबह ऑफिस जाने की जल्दी में अपनी बाइक को हवाई जहाज बनाने की कोशिश करते हैं तभी उनके सामने कोई ऐसा ही ऑटो आ जाता है जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा ब्रेक मत मार, एक्सीडेंट हो जाएगा”। इसे पढ़कर अच्छे-अच्छे रोमियो अपनी गाड़ी की स्पीड चालीस से नीचे कर लेते हैं क्योंकि मोहब्बत और हाईवे दोनों में ही जब ब्रेक फेल होता है तो नुकसान सीधा दिल और बंपर का ही होता है। भारतीय सड़कों पर ड्राइविंग करना किसी युद्ध के मैदान में उतरने जैसा है जहाँ आपको हर मोड़ पर एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। यहाँ यमराज किसी कोने में बैठकर चाय की चुस्की ले रहे होते हैं और उनके प्रतिनिधि के रूप में हमारी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर”। यह सीधा सा संदेश उस पूरी व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो हर वक्त आगे निकलने की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी है।

सच्ची मोहब्बत की तलाश में भटके हुए आशिकों के लिए तो ये गाड़ियां किसी मंदिर के चबूतरे जैसी हैं जहाँ हर टूटे दिल की दास्तान पेंट से लिखी होती है। जब कोई आशिक अपनी महबूबा की शादी के गम में देवदास बनने की बजाय ट्रक का ड्राइवर बन जाता है तो वह अपनी गाड़ी पर लिखवाता है “दिल दिया था जिसको, वो चली गई विप्रो, अब ढूँढ रहा हूँ उसको मेट्रो-मेट्रो”। यह महज़ एक शायरी नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत की उस कड़वी सच्चाई का दस्तावेज़ है जहाँ भावनाएं सैलरी पैकेज के सामने घुटने टेक देती हैं। ऐसी ही एक गाड़ी के पीछे जब लिखा मिलता है “तूने ठुकराया मेरा प्यार, अब देख मेरी कार का गियर” तो समझ आता है कि इश्क में मिला धोखा ही इंसान को बड़ा बिज़नेसमैन या फिर भारी वाहन का मालिक बनाता है। सड़कों पर चलता हुआ यह दर्द जब गियर के साथ बदलता है तो रात के सन्नाटे में हेडलाइट की रोशनी में एक और लाइन चमकती है “महबूबा की याद में, गियर बदला रात में”। इस देश के सारे आशिक अपनी नाकामी का जश्न इन सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाकर मनाते हैं मानो उनका क्लच और ब्रेक ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा बचा हो। प्यार में जुदाई झेल रहे इन जाबाँजों की बातें सुनकर तो पत्थर का दिल भी पिघल जाए और वह भी अपनी गाड़ी की डिक्की पर कुछ ऐसा ही लिखवाने को मजबूर हो जाए।

आर्थिक मंदी और मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष की जो गाथा इन लोहे के शेरों पर लिखी होती है वह किसी अर्थशास्त्र की किताब में नहीं मिल सकती। जब एक आम आदमी बैंक से लोन लेकर अपने सपनों की गाड़ी सड़क पर उतारता है तो उसकी पहली प्रार्थना यही होती है “मालिक की दया, बैंक का कर्जा”। यह लाइन उस अंतहीन चक्रव्यूह को बयां करती है जिसमें फंसा इंसान हर महीने की तारीख आने से पहले ही कांपने लगता है। इसके ठीक बगल में कोई पुरानी खटारा गाड़ी अपनी जर्जर हालत पर हंसती हुई कहती है “ये मत देख कि कितनी पुरानी है, ये देख कि कितनी तूफानी है”। यह आत्मविश्वास ही इस देश की असली ताकत है जो संसाधनों की कमी के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखता है। किश्तों के बोझ तले दबे हुए ड्राइवर्स का दर्द तब और गहरा हो जाता है जब उनकी गाड़ी के पीछे लिखा होता है “किश्तों पर ज़िंदा हूँ, मालिक का परिंदा हूँ”। यह पंक्तियां किसी बड़े कवि की कविता से कम नहीं हैं जो सीधे समाज के उस हिस्से पर रोशनी डालती हैं जो दिन-रात पसीना बहाकर देश का चक्का चलाता है। लोन पर ली गई गाड़ियों के मालिक जब दुनिया की बुरी नज़रों से परेशान होते हैं तो साफ लिख देते हैं “लोन पर ली है भाई, घूर कर नज़र मत लगा” जिससे बुरी नज़र वाले का मुंह खुद ही काला हो जाता है।

इन वाहनों के पीछे छिपा शुद्ध देसी हास्य रस ऐसा होता है जो डिप्रेशन के मरीजों के लिए रामबाण इलाज की तरह काम करता है। किसी सिग्नल पर खड़े होकर जब अचानक नज़र पड़ती है “हॉर्न पो पो दीदी गो गो” तो चेहरे पर हंसी की ऐसी लहर दौड़ जाती है जिसे रोकना नामुमकिन हो जाता है। यह लाइन हमारे समाज के उस स्टीरियोटाइप पर एक मीठा सा कटाक्ष है जो महिलाओं की ड्राइविंग को लेकर अक्सर चुटकुले बनाता रहता है। वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक सुख और सामाजिक ताने-बाने को एक साथ समेटे हुए एक लंबा सा ट्रक कहता है “छोटा परिवार, सुखी परिवार और ये लंबा ट्रक, सबका यार”। सड़कों पर चलने वाले इन मुसाफिरों का अपनी गाड़ियों से ऐसा रिश्ता होता है कि वे उन्हें महज़ मशीन नहीं बल्कि अपने जिगर का टुकड़ा समझते हैं। जब कोई मनचला अपनी गाड़ी को हवा में उड़ाने की कोशिश करता है तो उसे रोकने के लिए पीछे लिखा होता है “धीरे चलो, घर पर कोई इंतज़ार कर रहा है शायद बेलन लेकर”। यह बेलन का डर ही है जो इस देश के शादीशुदा पुरुषों को सुरक्षित घर पहुँचाने में पुलिस प्रशासन से ज़्यादा मददगार साबित होता है और सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकता है।

जीवन के परम ज्ञान और सस्पेंस की जो बातें इन गाड़ियों के पिछले हिस्से में छिपी होती हैं उन्हें समझने के लिए थोड़ी दार्शनिक दृष्टि की जरूरत होती है। जब आप अपनी गाड़ी को बहुत संभाल कर चला रहे होते हैं तभी सामने वाले ट्रक पर लिखा होता है “नज़र हटी, दुर्घटना घटी सब्जी पूरी बंटी”। यह लाइन मौत के बाद होने वाले भोज की तरफ इतना सटीक इशारा करती है कि पढ़ने वाला तुरंत अपनी सीट बेल्ट और हेलमेट को ठीक करने लगता है। जीवन की नश्वरता को इससे बेहतर तरीके से कोई और नहीं समझा सकता जहाँ एक पल की लापरवाही आपको सीधे परलोक का टिकट दिला सकती है। समय के चक्र और इंसान की औकात को याद दिलाते हुए एक और सूक्ति वाक्य मिलता है “समय बलवान है, इंसान तो बस मेहमान है”। इन पंक्तियों को पढ़कर लगता है कि जैसे कोई सूफी संत अपनी कुटिया छोड़कर हाईवे पर ट्रक चलाने आ गया हो और लोगों को मोक्ष का रास्ता दिखा रहा हो। इसी सस्पेंस और चेतावनी के बीच जब लिखा मिलता है “आज नकद, कल उधार गाड़ी पर लिखना मना है यार” तो समझ आता है कि इस आध्यात्मिक दुनिया के पीछे भी व्यापार का असली नियम पूरी कड़ाई से लागू होता है।

छोटे वाहनों और दोपहिया गाड़ियों के पीछे का टशन तो बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के ठाट-बाठ को भी फीका कर देने का माद्दा रखता है। एक छोटा सा ऑटो रिक्शा जब संकरी गलियों से सांप की तरह बलखाते हुए निकलता है तो उसके पीछे लिखा होता है “ऑटो है छोटा, पर दिल है बड़ा”। यह लाइन उस ड्राइवर के स्वाभिमान को दर्शाती है जो भले ही रोज़ का चंद रुपया कमाता हो पर किसी अमीर की अमीरी के आगे झुकना नहीं जानता। वहीं कॉलेज जाने वाले किसी लड़के की बाइक पर जब लिखा होता है “नो गर्लफ्रेंड, नो टेंशन” तो साफ़ समझ आता है कि यह दिल टूटने के बाद का वैराग्य है जो बाइक की रफ्तार में तब्दील हो चुका है। चालान के डर से कांपते हुए इस दौर के युवाओं का दर्द भी गाड़ियों पर बखूबी उभर कर सामने आता है जब वे लिखवाते हैं “चालान से डर नहीं लगता साहब, खाली जेब से लगता है”। कानून के लंबे हाथों और ट्रैफिक पुलिस के कैमरों के बीच ये छोटी गाड़ियां अपनी आज़ादी का परचम लहराते हुए कहती हैं कि हवा से बातें करना और सड़कों से नाता जोड़ना ही इनका असली मक़सद है।

सड़क का यह पूरा सफरनामा अजीबोगरीब घटना से होती है। हाईवे पर एक बहुत ही शानदार, महंगी और विदेशी स्पोर्ट्स कार फर्राटा भर रही होती है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो वह सड़क पर नहीं बल्कि हवा में उड़ रही हो। उस कार का मालिक चश्मा चढ़ाए, स्टीयरिंग पर उंगलियां थिरकाते हुए खुद को दुनिया का शहंशाह समझ रहा होता है। तभी उसके आगे एक बहुत ही पुराना, जंग लगा हुआ और भयंकर काला धुआं छोड़ता हुआ कबाड़ ट्रक आ जाता है, जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “जो हमसे टकराएगा, वो सीधा गैरेज जाएगा”। स्पोर्ट्स कार का घमंडी मालिक उस खटारे को देखकर खीझ जाता है और उसे ओवरटेक करने के लिए लगातार हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगता है। वह खिड़की से हाथ बाहर निकालकर चिल्लाता है “ए भाई! साइड हटा अपनी इस बैलगाड़ी को!”

तभी वह खटारा ट्रक अचानक बीच सड़क पर रुक जाता है और उसके रुकते ही स्पोर्ट्स कार वाले को भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते हैं, जिससे उसकी कार के टायर चीख उठते हैं। कार का मालिक गुस्से में लाल-पीला होकर नीचे उतरता है और उस ट्रक के केबिन का दरवाज़ा खटखटाते हुए चिल्लाता है “बाहर निकल! गाड़ी चलानी नहीं आती तो रोड पर क्यों आ जाते हो?” जैसे ही ट्रक का खटखटाता हुआ दरवाज़ा चरमराकर खुलता है, अंदर से कोई साधारण ड्राइवर नहीं बल्कि खुद यमराज नीचे उतरते हैं। यमराज ने पैरों में हवाई चप्पल पहन रखी होती है, गले में गेंदे की सूखी माला होती है और हाथ में भैंसे की रस्सी की जगह एक चमचमाती डिजिटल चालान मशीन होती है। कार का मालिक उन्हें देखकर हक्का-बक्का रह जाता है और उसकी घिग्घी बंध जाती है।

यमराज बड़े प्यार से मुस्कुराते हैं, उस अमीर लड़के के कंधे पर हाथ रखते हैं और ठेठ बनारसी अंदाज़ में कहते हैं “काहे इतना भौकाल टाइट कर रहे हो बाबू? बहुत देर से तुम हमारी गाड़ी के पीछे लिखी लाइनें पढ़ रहे थे न? अब जरा इस मशीन पर अपनी उंगली का अंगूठा लगाओ।” लड़का कांपते हुए पूछता है “प्रभु, आप यहाँ ट्रक चला रहे हैं?” यमराज हंसते हुए जवाब देते हैं “अरे भाई! धरती पर इतना ट्रैफिक और प्रदूषण हो गया है कि भैंसे को सांस लेने में दिक्कत होती है, इसलिए हमने भी लोन पर यह सेकंड हैंड ट्रक उठा लिया है। वैसे तुम्हारी कार का बीमा और तुम्हारी सांसों का परमिट दोनों ही आज इसी वक्त समाप्त हो चुके हैं, चलो अब चुपचाप पीछे वाले केबिन में बैठो, वहाँ पहले से ही तीन ओवरस्पीडिंग वाले आशिक बैठे ‘महबूबा की याद में’ गियर बदल रहे हैं!”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२५ ⇒ व्यंग्य – लॉ और इन-लॉ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “लॉ और इन-लॉ।)

?अभी अभी # १०२५ ⇒ व्यंग्य – लॉ और इन-लॉ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इंसान प्रेम को रिश्तों में बांधता है, उसे नाम देता है, समाज उसे स्वीकृति देता है। रिश्ते लौकिक भी होते हैं और अलौकिक भी ! जिन प्रथा और परंपराओं को समाज मान्यता देता है, कालांतर में वे ही कानून का रूप ले लेती हैं। अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेने पर विवाह संपन्न हो जाता है। शादी होते ही नए रिश्ते जन्म लेने लगते हैं, सास ससुर, साला साली, दामाद और समधी, समधन। एक और संसार, जिसे ससुराल कहते हैं, जीवन में प्रवेश कर जाता है।

कानून को अंग्रेजी में लॉ कहते हैं और ससुराल पक्ष को इन -लॉ। दुनिया का कोई कानून आपको अपने ससुर को कानूनी रूप से पिता मानने को बाध्य नहीं कर सकता। हम यहां उनकी बात नहीं कर रहे, जो अपने बाप को ही बाप नहीं मानते। लेकिन ससुर को फादर -इन -लॉ, यानी कानून के अनुसार पिता तो नहीं माना जा सकता न। साला यह कौन सा लॉ है जो साले को जबरदस्ती ब्रदर – इन – लॉ, यानी कानूनी रूप से आपका भाई बना बैठता है। यह तो अंधा कानून हुआ। भाषा के नाम पर रिश्तों का यह अत्याचार हम कब तक सहते रहेंगे। सास, सास ही रहेगी, वह मदर – इन – लॉ, यानी कानूनी तरीके से हमारी मां नहीं बन सकेगी। बहू, बहू ही रहेगी, सारी खुदाई एक तरफ रहेगी, लेकिन जोरू का भाई, जोरू का भाई ही रहेगा, कानूनी रूप से हमारा भाई यानी ब्रदर – इन – लॉ कभी नहीं बनेगा। हमने पहले भी अंग्रेजी का विरोध किया है, और कानूनन, रिश्तों की आड़ में ससुराल को हम पर हावी करने की इस साजिश का हम पुरजोर विरोध करते हैं।।

हम शायद इस बात को इतना तूल भी नहीं देते, अगर हमारी साली बीच में नहीं आती ! हमने शादी ही यह सोचकर करी थी कि साली, आधी घर वाली लेकिन जब अंग्रेजी किताब उठाई तो पाया वह तो सिस्टर – इन – लॉ है, यानी वह तो आधी बहन बनने पर तुल गई। आग लगे ऐसी अंग्रेजी किताबों को। कितना प्यारा शब्द है दूल्हा – दुल्हन !

और अंग्रेजी में ब्राइड और ब्राइड ग्रूम। हमें तो इस इंग्लिश शब्द में जोरू और जोरू के गुलाम वाली बू आती है। हसबैंड वाइफ फिर भी थोड़ा ठीक है, वाइफ ही अपना बैंड बजा रही है, फादर – इन – लॉ तो नहीं।

हम कानून का भी सम्मान करते हैं और रिश्तों का भी। कुछ रिश्ते कानून से भी ऊपर होते हैं, और संसारी रिश्तों से भी ! उन्हें हम अलौकिक रिश्ते कहते हैं। शिव पार्वती, लक्ष्मी नारायण और सीता – राम की तरह ही एक अलौकिक रिश्ता और भी है राधा कृष्ण का, जहां कोई सामाजिक बंधन, मर्यादा नहीं। सबसे ऊंची, प्रेम सगाई। एक ऐसा आदर्श जो मुक्त है, उन्मुक्त है, लेकिन आचरण में नहीं उतारा जा सकता। भक्त होना बड़ा कठिन है। अपने पति के होते हुए जब चित्तौड़ की महारानी, मीराबाई गलियों में इकतारा ले, गाती फिरती है, मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, तो सारे आदर्श, प्रथा, परंपराएं, सामाजिक बंधन, कानूनी बेड़ियां कमजोर पड़ जाती हैं। मीरा जीत जाती है, जगत हार जाता है।।

चलिए वापस लौटते हैं लव इन और इन लाँ के रिश्ते से लिव इन रिलेशन पर ! जी हां, वही मुक्त और उन्मुक्त प्रेम जिसे सुप्रीम कोर्ट भी मान्यता दे चुका है। गुजरात का छुट्टा छेड़ा, कब का गुजरात छोड़, एक व्यापक रूप अख्तयार कर चुका है। विवाह का रजिस्ट्रेशन जरूरी है, लिव इन का नहीं, क्योंकि विवाह एक बंधन है और लिव इन एक आपसी करार, जिससे आप जब चाहें करें इन्कार।

रिश्तों में प्रेम हो, मर्यादा हो, एक ऐसा मनोवैज्ञानिक बंधन हो जिसमें मुक्ति का भी अहसास हो। समाज और कानून के बंधन में कब बंध पाए प्रेम के रिश्ते। अगर रिश्तों में प्रेम होता तो इतने तलाक नहीं होते। घर घर में पारिवारिक क्लेश और मनमुटाव नहीं होता। एक ही रास्ता रिश्तों को पटरी पर लाने का। लव इन, लॉ आउट। लव नॉट आउट।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (22 जून से 28 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (22 जून से 28 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कहा जाता है कि समय सबसे बलवान होता है परंतु हमारे देवता श्री माता अंजनी के लाल श्री हनुमान जी समय से भी शक्तिशाली है अगर समय कुछ गड़बड़ करता है तो उसको सुधारने की ताकत हमारे श्री हनुमान जी में है, हनुमान जी की भक्ति की कड़ी में आज की चौपाई है –

नासै रोग हरे सब पीरा |

जपत निरन्तर हनुमत बीरा ||

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से समस्त प्रकार के रोग और पीड़ाओं का अंत हो जाएगा।

नासै रोग हरे सब पीरा नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 22 जून से 28 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य मिथुन राशि में, मंगल वृष राशि में, बुध, गुरु और शुक्र कर्क राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे

आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। व्यापारियों को सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग मिल सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 तारीख के दोपहर तक का समय कार्यों के प्रति अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों का निपटारा करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की थोड़ी उम्मीद है। भाई बहनों के साथ सामान्य संबंध रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। आपके जीवनसाथी को विभिन्न कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। दुर्घटना होने की आशंका करीब करीब नहीं है। आप को अपने संतान से इस सप्ताह कोई विशेष सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए उपयोगी है। 24, 25 और 26 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है। औऊप

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। आपके जीवनसाथी के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। भाग्य पर नहीं। इस सप्ताह आपको अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सचेत रहना चाहिए। कुछ लोग आपको मानसिक कष्ट प्रदान करने का प्रयास कर सकते हैं। उनसे सावधान रहें। अगर आप सावधान रहेंगे तो वे आपको तंग नहीं कर पाएंगे। कचहरी के कार्यों में भी सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख परिणाम दायक हैं। सभी प्रकार के कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए आपको इन तारीखों का उपयोग करना चाहिए। 27 और 28 तारीख को आप अपने शत्रुओं पर सफलता पा सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए ठीक रहेगा। उनको उन्नति प्राप्त हो सकती है। उनका अच्छा सहयोग आपको प्राप्त होगा। छात्रों के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनको परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। व्यापार ठीक चलेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा अर्थात जैसा पहले था वैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 तारीख के दोपहर तक का समय हर प्रकार के कार्यों के लिए ठीक-ठाक है। 26 तारीख की दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। विशेष रूप से अपने संतान के प्रति। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर पूजा पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपको धन लाभ की उम्मीद है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके माता जी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। संतान से आपके सहयोग मिलेगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। अधिकारी और कर्मचारियों को सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। व्यापार सामान्य रूप से चलेगा। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 26 की दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख प्रतिष्ठा संबंधी कार्यों के लिए उपयोगी है। जनप्रतिनिधियों को इस तारीख का उपयोग करना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है, मगर बहुत ज्यादा सावधानी लेनी पड़ेगी। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ आपका संबंध ठीक-ठाक रहेगा। आपके माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। गारदन या कमर में दर्द हो हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख विभिन्न कार्यों में मददगार है। 26 तारीख के दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख को आपको अपने भाइयों के प्रति सावधान रहना चाहिए। उनसे आपको या उनको कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन सफेद चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका साथ दे सकता है। कुछ कार्य भाग्य के भरोसे कर सकते हैं। मगर ज्यादा विश्वास आपको अपने कर्मों पर करना चाहिए। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। कार्यालय में आपको सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। वैसे कार्यालय में आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मंगल दायक है। 26 की दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख को आपको धन प्राप्त करने के संबंध में सतर्कता पूर्वक कार्य करना चाहिए। अगर आप सतर्कता पूर्वक कार्य नहीं करेंगे तो धन आपके पास नहीं आ पाएगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपकी मानसिक स्थिति भी बहुत अच्छी रहेगी। आत्मविश्वास बढ़ेगा। भाग्य से आपको लाभ मिलेगा। आपके जीवनसाथी को शारीरिक कष्ट हो सकता है। संतान से आपको सामान्य सहयोग ही प्राप्त हो पाएगा। ज्यादा सहयोग नहीं मिलेगा। दुर्घटनाओं से चोट लगने की संभावना बहुत कम है। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 26 की दोपहर के बाद से लेकर 27 और 28 तारीख को लाभदायक है। 24, 25 और 26 तारीख की दोपहर तक आपको सावधान रहकर कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। श्रइस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास बहुत बढ़ेगा। आपके कई कार्य आपके आत्म विश्वास के कारण ही संपन्न हो जाएंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। दुर्घटनाओं से आपको खतरा होने की उम्मीद करीब करीब नहीं है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह थोड़े से परिश्रम से परास्त कर सकते हैं, परंतु उनसे आपको इस सप्ताह सावधान भी रहना चाहिए। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। वकीलों से मिलने का कार्य आपको 27 और 28 तारीख को विशेष रूप से कर लेना चाहिए। इसके अच्छे परिणाम निकल सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए अत्यंत अच्छा रहेगा। उनको बहुत सारे कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे। अगर आप ज्यादा प्रयास करेंगे समाप्त भी हो सकते हैं। धन प्राप्ति के लिए आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। मगर सावधानी बढ़ानी पड़ेगी। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 तारीख की दोपहर तक का समय अच्छा है। 26 के दोपहर के बाद से लेकर 27 और 28 तारीख को धन लाभ के मामले में आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहना चाहिए। आपके घर में धन खर्च की कोई योजना बन रही है। जैसे नया प्लाट खरीदना, मकान बनवाना, शादी करना आदि। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। परीक्षार्थियों को परीक्षा पास करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 तारीख को कार्यालय के कार्यों में सफलता का योग है। 22 और 23 तारीख को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए ठीक-ठाक हो सकता है। उनको सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं। उनका अच्छा सहयोग भी आपको मिल सकता है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। उनको सफलता प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करते रहें। सफलता मिल सकती है। प्रतिष्ठा सामान्य रहेगी अर्थात आपकी प्रतिष्ठा में न कमी आएगी और ना बढ़ोतरी होगी। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों को निपटने के लिए परिणाम मूलक और प्रभावशाली हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। कोई भी कार्य 26 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर 27 और 28 तारीख को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५६ – आलेख – सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५६ ☆

☆ आलेख ☆ ~ सूर्य की घनघोर किरणों का असर – तब और अब ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सूर्य की किरणे शरीर को छुकर लौट पड़ी, लगा कि किसी ने जलते लाल तप्त लौह को बदन पर ही रख दिया हो। गनीमत बस इतनी थी कि किरणे छु कर ही निकल गयीं थीं। असंख्य – अनगिनत विषाणु -कीटाणु बिलबिला कर रह गये और यह कहते सुने गये कि हे भगवन् ! जान बची तो लाखों पाए।

हालांकि आधुनिक घोर शीतक यन्त्र से निकली बर्फ़ीली हवाओं से चिल्ड हो रहे कमरे से निकल कर बाहर आने की जुर्रत उसने मज़बूरी में ही कि थी। मन का सुकून शबाश पर था  लेकिन उसे यह पता नही था कि असंख्य दुश्मन भी सुकून से उसे चूस रहे थे। घुटनों और जोड़ों के दर्द से कराहते शरीर के पास बेचारा नींद आने से डर रहा था। एक गिलास दूध में घोल कर पिए गये सेसेस का इतना असर जरूर हुआ कि अगले कुछ दिनों- हफ्तों वह बिना दर्द के सो पाया।

पच्चास वर्ष पहले बचपन में अलगू चाचा को खुली पीठ को घंटों हल जोतते लेखक ने देखा था, जिनके नंगे बदन को सूर्य की यहीं घनघोर किरणे घंटो चूमती रहती थीं और वे ची करना तो दूर की बाद, पूर्बी की धुन में खो गये होते थे। उन असंख्य बिषाणुओं – किटाणुओं का दूर दूर तक पता नही लगता था, यूँ कहे सूर्य की तप्त किरणों में उनका अस्तित्व ही नही बचा था। अलगू चाचा का शरीर बिना बिस्तर बिछे बसखट पर जब एक बार गिरा तो उसके बाद वे चैन की वाली  दुनियां में जाकर भूल गये कि कोई दर्द वाली दुनियां भी होती है।

बैलो के गर्दन में बधे घुघुरुओ की आवाज ने उन्हें हौले से जगाया, तो ठंडी ठंडी भोर ने उनका आलिंगन करते हुए पूछा, अलगू चाचा पक्षियों का कलरव आपको कैसा लगा ?

♥♥♥♥

नोट : तब दादा की पीठ पर सूर्य की किरणे कहर बरसाती थी, लेकिन जिन्दगी रोग रहित चैन की थी, आज पोते के पीठ पर जब ए. सी  बर्फ जमाती है, लेकिन जिंदगी दर्द भरी, पीड़ा में है.

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

भड़पुरा से झाँसीघाट: 17 अक्टूबर 2018

रात्रि विश्राम हमने भडपुरा स्थित कुटी में किया। कुटी की देखभाल एक बूढ़ी माँ माँग-ताँग कर करती है। वह आश्रम किसी बड़े किसान ने इस शर्त पर बनवा दिया था कि परिक्रमा करने वालों को भोजन मिलना चाहिए। बूढ़ी माँ वैरागी हैं, उसका बेटा नवरात्रि में दुर्गा जी की मूर्ति का पंडा बना था। झाँकी के पंडाल में रहता था। सुबह नहाने धोने भर को घर आता था। उसे ख़बर लगी तो वह देखने आया। बातचीत करके संतुष्ट हो कर चला गया। उसकी बीबी को छः लोगों के लिए रोटी सब्ज़ी बनाना था तो उसका मूड ख़राब होने से वातावरण ठीक नहीं रहा। हमने खाना बनाने में मदद की पेशकश की, जिसे निष्ठुरता से ठुकरा दिया गया। उसका 12 साल का लड़का बहुत बातूनी था। उसी के मार्फ़त बातचीत चलती रही। अंत में अपनी घरेलू चार रोटियों के बराबर एक टिक्कड नमक मिर्च में बनी आलू की सब्ज़ी के साथ एक गोल थाली में आए जैसे भीम अपनी गदा के साथ रथ में डोलता चला आ रहा हो। किसी ने दो किसी ने तीन और किसी ने चार खाए। सच हैं स्वाद भोजन में नहीं भूख में होता है। नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात। यहाँ तो न खाट थी और न भात परंतु नर्मदा  किनारा था। बाहर निकल कर नर्मदा की ओर देखा वह शांत होकर हँसिया आकार चाँद की रोशनी में निंद्रामग्न थी। लहरों की झिलमिल जो दिन में नज़र आती है वह नदारत थी।

वर्षो बाद जमीन पर और कुछ लोगों ने शायद जीवन में पहली बार गद्दे के बिना सोने का प्रयास शुरू हुआ। बिस्तर तीन तरफ़ से खुली दलहान में लगाए गए। सबसे पहले तो मच्छरों का हमला हुआ लड़के ने कचरा जलाकर धुआँ करके उनसे छुटकारा दिलाया। उसके बाद मुंशीलाल जी के पास एक कुतिया आकर सो गई। उसे डंडे से भगाया। सोने की कोशिश की तो बरगद के पेड़ पर तेज़ हलचल होने लगी। जैसे भूतों का डेरा हो। उठकर देखा तो निशाचार चमगादड़ का एक झुंड बरगद के फलों को खा रहा था। फलों के टुकड़े पट-पट नीचे गिर रहे थे। एकाध घंटा चमगादड़ देखते रहे। फिर सोने की कोशिश की तो सिर के पास कुछ आवाज़ आई। हाथ फेरा तो एक मेंढक पकड़ में आया उसे दूर फेंक दिया। सब डर गए कि मेंढक की खोज में साँप वहाँ आ सकता है। हमने सोचा छोड़ो यार शंकर भगवान गले में डाले रहते हैं। अब आएगा सो आएगा। 90% सांप ज़हरीले नहीं होते हैं और फिर जैसे हम सांप से डरते हैं उसी प्रकार वे भी आदमी से डरते हैं। अरुण दनायक जी अपनी डायरी लिखने बैठ गए। लोग पहले पानी पीते फिर पेशाब जाते रात गुज़रने की राह देखते रहे। देर रात एक झपकी लगी और सवेरा हो गया। कहीं कोई पाखाना नहीं था। खुले में हल्के हुए। कुटी की गाय का एक-एक गिलास कच्चा दूध पिया। उनको तीन सौ रुपए दान स्वरूप दिए और चल पड़े।

हम गाँव वालों से बैलों के बारे में पूछते रहे कि एक ज़माने में खेतों में, सड़कों पर और गौधुलि बेला में चर कर लौटते हुई रेहड में गायों के साथ मस्ती करते बैल और उछलते बछड़े दिखते थे, वे अब नदारत हैं। जो जानकारी मिली वह भयावह है। जब से ट्रैक्टर ट्रॉली, कल्टिवेटर, रोटावेटा, आए हैं तब से हल-बखर और बैलगाड़ी के साथ बैलों की भी विदाई हो गई लगती है। यहाँ तक तो ठीक था कि यंत्रीकरण ने मानवीय श्रम की जगह मशीनीकरण से कृषि काम आसान और उसकी गति तेज़ हो गई।

ग्रामीण लोगों से जब पूछा कि बैलों की ग़ैर-मौजूदगी में गायों के ग्यावन की क्या व्यवस्था है। ख़ुलासे चौंकाने वाले थे। गाय बैल का नैसर्गिक संसर्ग समाप्त हो गया है। भिटौनी में पशु चिकित्सालय में ख़बर देने पर वहाँ से कृत्रिम गर्भधारण करने कर्मचारी आते हैं। कृत्रिम गर्भाधान से गाय की देशी नस्ल ख़त्म हो रही है क्योंकि नर्मदा किनारे के गाँवों में बैल बूचडखानों की भेंट चढ़ चुके हैं। सरकार हरियाणा से विदेशी नस्ल का बीज लाकर गर्भाधान करवाती है। इस व्यवस्था से गाय के दूध की प्राकृतिक गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। उनके और भैंस के दूध में कोई अंतर नहीं रहा है। गाय का दूध अब हल्का पीला नहीं होता। हमने जब भडपुरा में गाय का ताज़ा दूध पिया था वह पूरी तरह सफ़ेद था। सबसे पहले तो गाय से प्राकृतिक चारा छीनकर  उन्हें खली-भूसा खिलाने लगे। उनसे खुली हवा में विचरण के साथ अब बैलों से प्राकृतिक मिलन भी छुड़ा लिया। एक मशीनी क्रिया से अनुत्तेजित अवस्था में लम्बी सीरिंज से गर्भाधान ने पशुओं से उत्साह उमंग उछलना कूदना भी छुड़ा लिया है। ऊपर से इंजेक्शन लगाकर दूध दुहने लगे। इस पूरी यात्रा में नर्मदा किनारे सिर्फ़ एक जगह गायों को बैल दिखा उनके चेहरे चमक उठे वे चारा चरना छोड़कर एकटक बैल को देखे जा रहीं थीं। भूख, नींद, आराम और प्रजनन पशुओं और मनुष्य की एकसी अनिवार्यता हैं इसीलिए मनुष्य को सामाजिक पशु माना जाता है। वह अद्भुत दृश्य तुरंत मोबाइल में क़ैद कर लिया।

हम पाँचों फिर चले और बीहड डांगर, नाले पार करते भीकमपुर पहुँचे। ऊँची घास से रास्ता नहीं सूझता था। एक भी गलत कदम कम से कम बीस फुट नींचे गिरा सकता था। और हुआ भी यही एक जगह रास्ते की खोज में दनायक जी गिरते गिरते बचे वापिस मुड उपर से मुंशीलाल पाटकार ने आवाज लगाई इधर आईये रास्ता यहाँ से है। अरुण दनायक ने सुरेश पटवा को मन ही मन कुढ़ते हुए ख़ूब गालियों से नवाज़ा कि यार इनके कहने में कहाँ फँस गए। अब कभी नहीं आएँगे। थोड़ा आराम करने के बाद बोले यार अगली यात्रा फ़रवरी में ही करेंगे।

भडपुरा के हनुमान आश्रम का तोता हमारे पहुँचते ही अपने सिर पर आकर बैठ गया। उतरने से साफ़ इंकार करता रहा। चिकनी चाँद उसे भा गई। तोता महाराज वीडियो के शौक़ीन थे। जिस देश में गंगा बहती है का “है आग हमारे सीने मे हम आग से खेला करते हैं “ गीत पर ख़ूब नाचा ससुरा। विडियो बंद करो तो चोंच मारता था। फिर लगाया “चल उड़ जा रे पंछी ये देश हुआ बेगाना” सुनकर मस्त हो गए तोता राम। काफ़ी मान-मनुअ्अल के बाद अरूण दनायक भाई के सिर को भी उपकृत किया। एक और साथी जगमोहन भाई की ज़िद पर महाराज वहाँ पहुँचे लेकिन टैक्स के रूप में चोंच मारकर ख़ून निकाल दिया। उसे काजू दिए तो उसने कुतर कर छोड़ दिए। तोता खुले में रहता था उड़ता नहीं था। पता चला कि उसे गाँजा पीसकर खिलाया गया है इसलिए उसे तलफ की आदत हो है इसलिए वह बाबाओं के पास रहता है।

धरती कछार गाँव पड़ा, वहाँ के स्कूल में दनायक जी ने बच्चों से मुलाकात में गांधी चर्चा की जिसने हमें आन्नदित किया कि गांधी जी की पहुँच समय और भौगोलिक स्थितियों की ग़ुलाम नहीं है। आंगनवाडी केन्द्र की ममता चढार की कर्तव्य परायणता से प्रफुल्लित हुए। धरती कछार से गोपाल बर्मन को कोलिता दादा का बैग रखने को साथ ले लिया। उसने बातों-बातों में बताया कि लोग भाजपा से नाराज़ हैं। ग्रामीण समाज में भी लड़कियाँ खुल कर बिना झिझक सामने आने लगीं हैं और शादियों के लिए लड़कों को निरस्त भी करने लगीं हैं। वहीं दूसरी ओर उनका यौन व्यवहार भी तेज़ी से बदल रहा है। बाय फ़्रेंड-गर्ल फ़्रेंड का कल्चर खेतों में या मेड पर विडीओ, वट्सएप, फ़ेस्बुक के माध्यम से फैल रहा है। ये मोबाइल क्रांति का असर है। अब लड़कियाँ को सेनेटरी पैड और विटामिन की गोलियाँ आंगनवाड़ी से प्रदान की जाती हैं।

आश्रम से चले तो आधा घण्टे में एक बड़े नाले से साबका पड़ा। सौ फ़ुट चढ़ाई चढ़ कर फिर नीचे उतर नाला पार किया, फिर चढ़ाई चढ़कर ऊपर पहुँचे तो पहाड़ी के सामने एक और नाला दिखा। भूगोल का दिमाग़ लगाया तो देखा कि एक ही नाला सांप की कुंडली की तरह चारों तरफ़ घुमा हुआ है। चार-पाँच बार पहाड़ियाँ चढ़-उतर कर नाला पार करना होगा लोगों का दम निकल जाएगा। निर्णय लिया कि दाहिनी तरफ़ नर्मदा में उतर जाएँ वहाँ से किनारे-किनारे झाँसीघाट की तरफ़ बढ़ेंगे। आगे बढ़े तो एक सौ फ़ुट ऊँची खाई का मुँह नाले में खुल रहा था। वह नाला नर्मदा में मिल रहा था। उतरने को कहीं कोई रास्ता नहीं था। हम (सुरेश पटवा) और कोलिता दादा आगे थे बाक़ी तीन पीछे भटक गए। कोलिता दादा को पीछे करके हम बैठ कर सौ फ़ुट खाई में स्कीइंग करके नाले के किनारे से नर्मदा की गोद में पहुँच गए। उन्होंने कोलिता दादा को भी इसी तरह स्कीइंग करके उतारा। तब तक बाक़ी लोग ऊपर आ गए थे वे चिल्ला रहे थे कि रास्ता कहाँ है। उनको तरीक़ा बताया तो वे आगे बढ़ने को तैयार न थे। लेकिन कोई रास्ता था भी नहीं। आधे घंटे की मशक़्क़त के बाद सब लोग नीचे आ गए। वहाँ से विक्रमपुर का रेल पुल अब स्पस्ट दिख रहा था और झाँसीघाट का सड़क पुल धुंधला सा नज़र आ रहा था।

ग्वारीघाट से लगभग पचास किमी दूर जबलपुर और नरसिंघपुर की सीमा पर स्थित भीकमपुर गाँव है। नर्मदा दाहिनी तट की ओर शान्त सी बहती है उधर बाँए तट से सनेर नदी अथाह जलराशि लिये आगे बढती है। ऐसा लगता है नर्मदा बडी विनम्रता से सनेर की भेंट की हुई जलराशि वैसे ही स्वीकारती है जैसे भिषुणी भिक्षा ग्रहण करती है और फिर अगले घाट की ओर चली जाती है। सनेर सदानीरा है,इसका जल स्वच्छ है और इसे लोग सनीर भी कहते हैं। सनेर नदी का उदगम सतपुडा के पहाड से होता है। इसका उदगम स्थल लखनादौन जिला सिवनी स्थित नागटोरिया रय्यत है। यह बारहमासी नदी धनककडी, नागन देवरी, दरगडा, सूखाभारत आदि गावों से गुजरते हुये संगम स्थल भीकमपुर पहुँचती है। कोलूघाट तट पर सिवनी जिले के आदिवासियों का मेला भरता है तो संगम तट भीकमपुर में जबलपुर व नरसिंहपुर जिले के लोग शिवरात्रि आदि पर्वो पर एकत्रित होते हैं।

नर्मदा परिक्रमा का पहला खंड योजना अनुसार पूरा होने को आ रहा था। सुबह से खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के भरोसे चले आ रहे थे। मंज़िल सामने देखकर भूखी देहों में अजीब सा शक्ति संचार होने लगा। नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लिया फिर दो घंटे में विक्रमपुर के रेल्वे पुलों के नीचे से निकल झाँसीघाट पहुँच गए। नहाया धोया नर्मदा जी को प्रणाम करके झोतेश्वर धर्मशाला पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ – कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भयानक“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३५ ?

? कविता – भयानक… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

द्वेष  ईर्ष्या  कपट  भयानक

गर्म-गर्म  लू-लपट भयानक

=2=

शेर    मारने,    चूहे  निकले

मिल रई ऐसी रपट भयानक

=3=

शिष्य  गुरु  पर  हावी  हैं उफ़

अब वो डाँट न डपट भयानक

=4=

बाहर    ख़ामोशी   है   किन्तु

भीतर शोर है विकट भयानक

=5=

दंगे-तिकड़म-हुड़दंग   ‘राजेश’

करवाती यह  टिकट भयानक

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ – मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मानव अब तो जाग. )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ७ ☆

☆ मानव अब तो जाग ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

नभ से हर पल गिर रही, लपटें बनकर आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

दिनकर निकले भोर में, मोहक लगता रूप।

भरी दुपहरी में लगे, लपट बनी यह धूप।।

शहर सकल वीरान यह, मनुज रहे सब भाग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

सघन वनों को काट कर, बनते खूब मकान।

बढ़ता पारा देख अब, विकल हुए इंसान।।

सब जन मिलकर गा रहे, गहन तपन का राग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

बचना है यदि ताप से, जन-जन करे प्रयास।

तरुवर हर इक द्वार हो, हरी-भरी सी घास।।

रिम-झिम प्रभु बरसात कर, मिट जाए यह आग।

जले धरा भी ताप से, मानव अब तो जाग।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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