हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की#60 – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  लेखनी सुमित्र की #60 –  दोहे 

 

आंसू बहते रात दिन, चिथड़ा हुआ नसीब ।

कोई धनी धोरी नहीं, कितना सही गरीब।।

 

आंसू बहते हैं मगर के, पहचानेगा कौन।

 नेता आंसू बाज हैं, तुरत बदलते ‘टोन’।।

 

आंसू को मोती कहें, और आंख को सीप।

उसकी उतनी अहमियत, जितना रहे समीप।।

 

गर्व गरूरी को लगे, तृण भी तीर समान ।

इसीलिए तो कर रहे, आंसू का अपमान।।

 

कोहिनूर है आंख का, आंसू है अनमोल ।

तीन लोक की संपदा, सके न इसको तोल।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत # 60 – कानपुर-  उन्नाव से ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “कानपुर-उन्नाव से । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 60 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ || कानपुर-  उन्नाव से || ☆

 

एक ठोकर  भर बचा हूँ

बस तुम्हारे पाँव से |

क्यों करोगे याद  मुझको अब

भला गुड़गाँव से ||

 

धुल गया अहसास मीठा 

जल तरंगों का |

लौटआया स्नेह दिलकश 

धनक रंगों का |

 

बहुत धीमी बजी मादल

देह छत की छाँव से ||

 

आँख मेरी तभी से

कहती रही है क्या ?

गोमती जैसे अवध

बहती रही गोया |

 

थक गया है बहुत आँचल  

कानपुर- उन्नाव से ||

 

बिखरती जैसे रूई

बस थम गई है ना !

फिर पिघलती बर्फ की

चुप – चुप लगी मैना |

 

भर गई है नेह छागल 

अधूरे ठहराव  से ||

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

07-05-2019

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # 106 ☆ वापिसी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय  कथा ‘वापिसी’).   

☆ व्यंग्य # 106 ☆ वापिसी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

दस दस घरों के पांच टोले मिलाकर बना है कसवां गांव। गांव के एक टोले के खपरैल घर के अंदर गोबर से पुते चूल्हे के पास मुन्ना पैदा हुआ। पैदा होते ही खिसककर चूल्हे में घुस गया।  धीरे धीरे मुन्ना बड़ा हुआ।

मुन्नालाल गांव के सम्पन्न घरों के बड़े लड़कों को लोहे का रिंग दौड़ाते देखता तो उसका मन भी रिंग के साथ दौड़ने लगता। उसके घर में ऐसा कोई रिंग नहीं था जिससे वह अपनी ललक पूरी कर लेता। दिनों रात रिंग के जुगाड की ऊहापोह में वह परेशान रहता।एक रात मुन्ना ने सपना देखा, सपने में उसे कोयले की सिगड़ी दिखी जिसमें एक रिंग लगा दिखा। सपने की बात उसने जब मां को बताई तो मां ने कहा कि बहुत साल पहले जब उसके ताऊ जी शहर से नौकरी छोड़कर आये थे तो सामान के साथ पुरानी सिगड़ी भी थी जिसे गाय भैंस बांधने वाली सार के पीछे फेंक दिया गया था, फिर वह मिट्टी में दबती गई और उसका पता नहीं चला। सुबह उठते ही मुन्ना लाल ने सिगड़ी की तलाश करना चालू कर दिया, मिट्टी खोदने के बाद उसे सपने में देखी वही सिगड़ी मिल गई,मुन्नालाल की बांछें खिल गई। मुन्ना लाल ने सिगड़ी के सड़े-गले टीन को तोड़कर उसमें से एक सबूत छोटा सा रिंग निकाल लिया, उसे बड़ा सुकून मिला चूंकि अब वह भी गांव के अन्य लड़कों की तरह रिंग लेकर दौड़ सकता था।उसे लगा जैसे उसने दुनिया जीत ली। दिन दिन भर वह रिंग लेकर दौड़ लगाता रहता,खाना पीना भी भूल जाता। गांव के गरीब घर का बेटा लोहे का रिंग लिए खेले,यह बात कुछ लोगों को अच्छी नहीं लगती थी। जबकि मुन्ना लाल ने यह रिंग अपने बुद्धि कौशल से प्राप्त किया था।जब यह बात उसके बाबू को पता चली तो बाबू को लगा कि हमारा मुन्ना लाल होनहार लड़का है, अचानक बाबू के अंदर उम्मीदों का रेला बह गया, उसके बाबू तुरन्त उसके पढ़े-लिखे फूफा के पास मुन्ना लाल को ले गए और उनसे सारी बात बताई।

फूफा ने कहा- इसका मतलब लड़के के अंदर वैज्ञानिक सोच है, इसे अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहिए,यह बड़ा होकर बड़ा वैज्ञानिक बन सकता है। बाबू गरीब था, लड़के को अच्छे स्कूल में पढ़ाना सपने की बात थी। गांव के फटेहाल स्कूल में पढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं था, पर मुन्ना लाल के फूफा ने बाबू के अंदर अजीब तरह की उम्मीदें भर लीं थीं, उसके अंदर कुलबुलाहट होती रहती कि थोड़ा बड़ा होने के बाद शहर के अच्छे स्कूल में मुन्ना लाल का दाखिला करायेगा।

मुन्ना लाल उस सिगड़ी के रिंग को दौड़ाते दौड़ाते बड़ा हो गया,गांव के सम्पन्न घरों के लड़के उसके लिंग से चिढ़ते,उस पर हंसते। ऐसा भी नहीं था कि सम्पन्न परिवार के लड़कों के रिंग कोई सोने चांदी के बने थे या उनमें कोई अजूबा था,मात्र कुछ रुपए देकर गांव के लुहार से उनके रिंग बने थे, मुन्ना लाल का रिंग मुफ्त में धोखे से मिल गया था, मुन्ना लाल के बाबू गरीब थे उनके पास लुहार को देने के लिए पैसे नहीं थे।

मुन्ना लाल बड़ा होता गया, उसे शहर में उसके फूफा के पास पढ़ने को छोड़ दिया गया,वह पढ़ता गया, और बड़ा इंजीनियर हो गया। एक बड़े सरकारी संस्थान में महत्वपूर्ण पद मिल गया, विभाग वाले उसे अब एम एल साब कहने लगे। शादी हुई इंजीनियर लड़की से। दो बच्चे भी तीन साल में हो गये, फिर एक दिन सरकारी काम से मुन्ना लाल अमेरिका के लिए उड़ गए। गांव के उस छोटे से टोले के खपरैल घर की टूटी खटिया में लेटे लेटे बापू ने ये सब बातें खांसते खांसते सुनी, बापू को संतोष भी हुआ और मुन्ना लाल को देखने की ललक पैदा हुई,पर लम्बी बीमारी और बेहिसाब कमजोरी ने खाट से उठने नहीं दिया।

बीच बीच में सुनने में आया कि मुन्ना लाल कनेडियन लड़की के साथ रहने लगे हैं, फिर छै महीने बाद सुनने में आया कि कनेडियन लड़की से अलग होकर अब पाकिस्तानी लड़की के साथ घर बसा लिया है। बीच बीच में अपनी असली पत्नी पत्र भेज देते, थोड़ा पैसा भी भेज देते।जो लोग अमेरिका से छुट्टियों में इंडिया लौटते वे लोग मुन्ना लाल के बड़े रोचक कारनामे सुनाते। बात फैलते फैलते कसवां गांव तक जाती, गांव के लोग सुनकर दांतों तले उंगली दबाते। बीच में एक बार मुन्ना लाल की ओरिजनल पत्नी बच्चों के साथ अमेरिका गयी तो मुन्ना लाल के रंगरेलियां देख कर हताश होकर लौट आयी।

मुन्ना लाल के हर नये चरचे पर गांव के लोग शर्म से पानी पानी हो जाते, फूफा को गलियाते,बाबू अपनी गलती पर पछताते, मुन्ना लाल के बचपन के साथी गांव की चौपाल में हंसी उड़ाते।

एक नई ताज खबर चलते चलते इन दिनों कसवां गांव पहुंची है, मुन्ना लाल के हम उम्र दिलचस्प खबर सुनने बेताब हैं, सुना है कि मुन्ना लाल तीस पेंतीस साल बाद कसवां गांव आने वाले हैं।लोग कहते काहे को आ रहा है, मां बाप को बिलखता छोड़ खुद ऐश करता रहा,एक एक दाना को मां बाप तरसते तरसते मर गए। मां बाप के मरने पर भी नहीं आया,अब काहे को आ रहा है गांव।

एक दिन मुन्ना लाल अमेरिकी संस्कृति लिए गांव पहुंचे। गांव आकर पता चला कि उसके माता-पिता कठिन परिस्थितियों में रहते हुए भूखे प्यासे दुनिया छोड़ चुके थे। बहुत दिन बीत गए थे, उनकी आत्मा की शांति के लिए मुन्ना लाल गांव के गेवडे़ के पीपल के नीचे मिट्टी का दिया जलाकर आंखें मूंदे खड़े हो गए,उसी समय गांव के दो छोटे लड़के लोहे का रिंग लेकर दौड़ते हुए वहां से गुजरे… उसे अचानक याद आया… बचपन में इस लोहे के रिंग को लुहार से बनवाने के लिए उसके बाबू के पास पैसा नहीं था। उसे याद आया, टूटी-फूटी टीन की सिगड़ी को तोड़कर जब उसने रिंग बनायी थी और गांव के सम्पन्न घराने के लड़कों की सम्पन्नता को उस छोटे से रिंग से मात दी थी, फिर उसे याद आया कि वह शायद बचपन में टूटी सिगड़ी से बनाए गए रिंग को शायद वह अमेरिका ले गया था।नम आंखों से मुन्ना लाल ने तय किया कि वह तुरंत अमेरिका पहुंचकर बचपन में बनाये गये उस रिंग की तलाश करेगा और उस रिंग को बाबू की संगमरमर की विशाल प्रतिमा के हाथों में पकड़ा देगा। उसने तय किया कि उस विशाल प्रतिमा को गांव के बीच के चौराहे पर खड़ा करेगा और मूर्ति के उदघाटन के लिए पाकिस्तानी पत्नी ठीक रहेगी या पुरानी भारतीय पत्नी…. इसी उहापोह में मुन्ना लाल पीपल के नीचे खड़ा बहुत देर तक रिंग चलाते बच्चों को देखता रहा। उसने जैसे ही उन खेलते बच्चों को आवाज दी, हवा के झोंके से मिट्टी का दिया बुझ गया और पीपल के पत्ते खड़खड़ाकर आवाज करने लगे, उसे लगा चारों तरफ के पेड़ लड़खड़ाते हुए हंस रहे हैं और उसके नीचे की जमीन खिसक रही है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #50 ☆ #  रामराज्य  # ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी नवरात्रि पर्व पर विशेष कविता “#  रामराज्य  #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 50 ☆

☆ #  रामराज्य  # ☆ 

हमने लोगों का अनुकरण किया

दशहरे के पर्व में साथ दिया

हर्ष और उल्लास से

दशानन का दहन किया

 

सोना बांटा, हाथ मिलाया

सबको अपने गले लगाया

चेहरे पर मुखौटा लगाए

कृत्रिम हंसी से दिल बहलाया

 

रात को सोये, सुबह को जागे

दौड़ में शामिल भागे भागे

भूल गये सब ज्ञान की बातें

“अर्थ” ही है सबसे आगे

 

जीवन में जरूरी है दाम

पद, प्रतिष्ठा, ऊंचा नाम

जीवन-मूल्य गौण हो गये

ना कोई रावण, ना कोई राम

 

सत्य-असत्य में द्वंद है

सत्य पिंजरे में बंद है

असत्य का है बोलबाला

सत्य के नाम पर पाखंड है

 

ना हम राम सा बन पायें

ना हम रावण को भूल पायें

दोनों हममे विद्यमान है

देश में,

फिर रामराज्य कैसे आये?

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 52 ☆ महिमा भक्तीचा… ☆ महंत कवी राज शास्त्री

महंत कवी राज शास्त्री

?  साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 52 ? 

☆ महिमा भक्तीचा… ☆

(सदर रचनेमध्ये दोन दुवे आहेत… एक अष्ट-अक्षरी.. आणि दुसरे… अंत्य-ओळ…)

 

कसे सांगू सांगा तुम्ही

गोड महिमा भक्तीचा

भक्ती-विना होत नाही

मार्ग मोकळा मुक्तीचा…०१

 

मार्ग मोकळा मुक्तीचा

करा धावा श्रीप्रभुचा

तोच आहे वाली आता

अन्य कोणी न कामाचा…०२

 

अन्य कोणी न कामाचा

सर्व लोभी आहेत हो

अर्थ असेल तरच

मैत्री, ती  करतात हो…०३

 

मैत्री, ती करतात हो

धर्म हा लोप पावला

अंध-वृत्ती वर आली

सुज्ञ इथेच  वेडावला…०४

 

सुज्ञ इथेच  वेडावला

पाश-मोह आवळला

जाण इतुकीही न आता

ज्ञान-दीप मावळला…०५

 

ज्ञान-दीप मावळला

राज सहज बोलला

कृष्ण-भक्ती, ही सोज्वळ

स्मरा त्या श्रीगोविंदाला …०७

 

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ अप्रूप पाखरे – 17 – रवींद्रनाथ टैगोर ☆ प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

? वाचताना वेचलेले ?

☆ अप्रूप पाखरे – 17 – रवींद्रनाथ टैगोर ☆ प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆ 

[८५]

जळणार्‍या ओंडक्याची

धडधडती ज्वाळा बनली.

’हा माझा फुलण्याचा क्षण

आणि हाच मृत्यूचाही…’

 

[८६]

तुझा साधेपणा पोरी

किती आरस्पानी

निळ्याशार तळ्यासारखा

तुझ्या सच्चेपणाचा तळ

स्वच्छ दाखवणारा.

 

[८७]

तुझ्या दिवसाची गाणी

गात गातच तर इथवर आलो.

आता या कातर सांजवेळी

वादळ घोंगावणार्‍या

या भयद रस्त्यावर

वाहू देशील का मला

तुझाच दीप

 

[८८]

दुनियेचं काळीज

पुरं वेढलस तू

दाईते,

आपल्या आसवानं

जसं

समुद्रानं पृथ्वीला

कवळून असावं

 

मूळ रचना – स्व. रविंद्रनाथ टैगोर 

मराठी अनुवाद – रेणू देशपांडे (माधुरी द्रवीड)

प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #109 ☆ व्यंग्य – ‘दर्दे-दिल और दर्दे-दाँत – (उर्फ़ मजनूँ के ख़त प्यारी लैला के नाम)’ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘दर्दे-दिल और दर्दे-दाँत – (उर्फ़ मजनूँ के ख़त प्यारी लैला के नाम)’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 109 ☆

☆ व्यंग्य – दर्दे-दिल और दर्दे-दाँत – (उर्फ़ मजनूँ के ख़त प्यारी लैला के नाम)

[1]

जान से भी प्यारी लैला,

आपके पाक इश्क में पूरी तरह डूबा ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ। ज़िन्दगी का और कोई मकसद नहीं है। न दिन को चैन है, न रात को नींद। रात और दिन का फर्क भी आपके इश्क में जाता रहा। किसी वीराने में पड़ा इश्क में सुध-बुध खोये रहता हूँ। खाना-पीना हराम हो गया है। लुकमा मुँह में डालता हूँ तो हलक़ से नीचे नहीं उतरता। लिबास की फिक्र नहीं, ग़ुस्ल किये महीनों हुए। बदन सूख कर काँटा हो रहा है, जैसे जिस्म और रूह का फर्क ख़त्म हो जाएगा। बस दर्द की एक लहर है जो सारे वजूद में चौबीस घंटे दौड़ती रहती है। यही ग़म है अब मेरी ज़िन्दगी, इसे कैसे दिल से जुदा करूँ? आपके तसव्वुर में होश-हवास खोये रहता हूँ। आपका दीदार मिले तो दिल को सुकून आये। लोग सरेआम मुझे लैला का दीवाना कहते हैं। ग़नीमत है कि अभी पत्थर नहीं मारते।

तीन बार शहर कोतवाल ने बुला कर बैठा लिया, फिर मेरी हालत पर तरस खाकर छोड़ दिया। पहली बार पूछने लगे, ‘क्या काम करते हो?’ मैंने बताया कि मैं फिलहाल रोज़गारे-इश्क में मसरूफ हूँ तो हँसने लगे। चन्द दीनार देकर बोले, ‘मियाँ, लो, खाना खा लेना। सिर्फ इश्क से पेट नहीं भरेगा।’ ये नासमझ दुनियावाले इश्क की अज़मत को क्या समझें। कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को। इन नादानों को कौन समझाये कि इश्क क्या शय है। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। आदत के बाद दर्द भी देने लगा मज़ा, हँस हँस के आह आह किये जा रहा हूँ मैं। अब तो लैला ही मेरा ईमान, लैला ही मेरा ख़ुदा है। लैला नहीं तो मैं भी नहीं। दुनिया की ऊँची ऊँची दीवारें तोड़कर और अपने आशिक की ज़िन्दगी की ख़ातिर सारा जहाँ छोड़कर तशरीफ़ ले आयें। अब ये दर्द और बर्दाश्त नहीं होता। किसी शायर ने फरमाया है, दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना। लेकिन मेरा दर्द तो पता नहीं कब दवा बनेगा। फिलहाल तो दर्द ही दर्द है।

अब कमज़ोरी की वजह से लिखा नहीं जा रहा है। जिस्म में जान नहीं बची। हाले दिल यार को लिखूँ क्यूँकर, हाथ दिल से जुदा नहीं होता।

                              आपकी ज़ुल्फों का असीर,
                                         क़ैस

                          
[2]

जान से अजीज़ लैला,

आपको पिछला ख़त रवाना करने के बाद बड़ी मुसीबत में मुब्तिला हो गया। मैं दिन-रात आपके इश्क के दर्द में ही खोया, दीन-दुनिया से बेसुध था कि एक दिन लगा कि कोई और दर्द मेरे जिस्म में सर उठा रहा है। पहले तो मैं उसे भी दर्दे- इश्क समझा, फिर समझ में आया कि यह कोई और, घटिया किस्म का दर्द है। जल्दी ही समझ में आ गया कि यह दर्द मेरे एक दाँत से उठ रहा है। देखते देखते यह हकीर सा दर्द मेरे दर्दे-इश्क पर हावी हो गया।

चन्द लमहों में मैं इस दर्द की गिरफ्त में दीन-दुनिया को भूल गया। इश्क की डोर भी हाथ से छूट गयी। हालत यह हुई कि आपका तसव्वुर करूँ तो आपकी सूरत भी ठीक से याद न आये। हाथ दिल पर रखूँ तो दिल की बजाय दाँत पर पहुँच जाए। मुझे ख़ासी शर्म आयी कि इश्क की अज़ीम बुलन्दियों से गिरकर कहाँ इस नामुराद दाँत के दर्द में फँस गया। लेकिन मेरे होशोहवास गुम थे। बाल नोंचने के सिवा कोई सूरत नज़र नहीं आती थी।

बेबस दौड़ा दौड़ा हकीम साहब के पास गया। वे मेरी हालत देखकर हँसकर बोले, ‘मियाँ, यह दाँत का दर्द है जिसके सामने बड़े बड़े दर्द —दर्दे-दिल, दर्दे-जिगर, दर्दे-गुर्दा—सब पानी भरते हैं। इसमें फायदा यह है कि जब तक यह दर्द रहेगा तब तक आपका दर्दे-इश्क दबा रहेगा। बड़ा दर्द छोटे दर्द को बरतरफ कर देता है। ‘फिर एक तेल दिया, कहा, ‘इसे लगाओ। धीरे धीरे आराम हो जाएगा।’ उसे लगाने से दर्द कुछ कम हुआ है, लेकिन इतना नहीं कि दर्दे-इश्क उसकी जगह ले सके। कुछ वक्त लगेगा।

लेकिन इसमें शक नहीं कि इस दर्दे-दाँत ने मेरे वजूद को हिला डाला। ख़ुदा बचाये इस दर्द से।

लेकिन आप फिक्र मत करना। मेरा दर्दे- इश्क जल्दी ही पूरे जुनून पर होगा।

                                      आपका शैदाई
                                             क़ैस

[3]

मेरी ज़िन्दगी का मक़सद लैला,

मेरा पिछला ख़त मिला होगा। मैं इस वक्त बेहद शर्मिंदगी महसूस कर रहा हूँ कि मैं कुछ वक्त के लिए एक निहायत घटिया किस्म के दर्द में फँसकर इश्क की मक़बूलियत को भूल गया था। लेकिन वह दर्द कंबख़्त इतना जानलेवा था कि उसने मेरे होश फ़ाख़्ता कर दिये थे। यूँ समझिए कि उसने मुझे अर्श से उठाकर दुनिया के सख़्त और बेरहम फर्श पर ला पटका। ख़ैर जो भी हो, वह ज़ालिम दर्द अब करीब करीब दम तोड़ चुका है और मेरा पुराना दर्दे-इश्क फिर धीरे धीरे सर उठा रहा है। मुझे पूरा यकीन है कि दो चार दिन में मेरा दर्दे-इश्क पूरे जुनून में आकर पहले की तरह छलाँगें भरने लगेगा और मैं फिर अपने पुराने दर्द की आग़ोश में गुम हो जाऊँगा। फिर मैं हूँगा और आप।  बीच में न दुनिया होगी, न दर्दे-दाँत।

लेकिन फिर भी मेरे ज़ेहन में यह ख़ौफ़ हमेशा तारी रहेगा कि यह मरदूद दर्दे-दाँत कहीं फिर ज़िन्दा होकर मेरे इश्क की पुरसुकून इमारत को नेस्तनाबूद न कर दे।

                              आपके इश्क में गिरफ्तार
                                          क़ैस

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 62 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 62 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 62) ☆

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 62 ☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

इल्जाम तो हर हाल में

काँटों  पर  ही  लगेगा…

ये सोचकर कुछ फूल भी

चुपचाप ज़ख्म दे जाते हैं…!

 

As such, blame will always be

there on the thorns only….

Considering this even some flowers

quietly inflict the wounds….!

  ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

रहने दो कि अब तुम भी

मुझे पढ़ न सकोगे

बरसात में काग़ज़ की

तरह भीग गया हूँ  मैं ..!

 

Let it be, now even

you can’t read me

I’m like the paper

drenched in the rain…!

  ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

मैं हूँ दिल है,

तन्हाई भी है

तुम भी होते,

तो अच्छा होता…

 

I’m there, heart is there,

loneliness is also there

It would have been nice,

If you were there too..!

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

अगर कभी फ़ुर्सत मिले तो

पानी की लहरों को पढ़ लेना,

हर इक दरिया हज़ारों साल

का अफसाना लिखता है…

 

If you ever get time, then

read the waves of water,

Every single river writes

tales of many of eras…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 109 ☆ संभावना के बीज ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # 108 ☆ संभावना के बीज ☆

सीताफल की पिछले कुछ दिनों से बाज़ार में भारी आवक है। सोसायटी की सीढ़ियाँ उतरते हुए देखता हूँ  कि बच्चे सीताफल खा रहे हैं। फल के बीज निकालकर करीने से एक तरफ़ रख रहे हैं। फिर सारे बीज एक साथ उठाकर डस्टबिन में डाल दिए। स्वच्छता और सामाजिक अनुशासन की दृष्टि से यह उचित भी है।

यहीं से चिंतन जन्मा। सोचने लगा, हर बीज के पेट में एक पौधा  है, पौधे का बीज फेंका जा रहा है। फ्लैट में रहने की विवशता कितना कुछ नष्ट कराती है।

सर्वाधिक दुखद होता है संभावनाओं का नष्ट होना। वस्तुत: संभावना की हत्या महा पाप है। हर संभावना को अवसर मिलना चाहिए। पनपना, न पनपना उसके प्रारब्ध और प्रयास पर निर्भर करता है।

चिंतन बीज से मनुष्य तक पहुँचा। सही ज़मीन न मिलने पर जैसे बीज विकसित नहीं हो पाता, कुछ उसी तरह अपने क्षेत्र में काम करने का अवसर न पाना, संभावना का नष्ट होना है। साँस लेने और जीने में अंतर है। अपनी लघुकथा ‘निश्चय’ के संदर्भ से बात आगे बढ़ाता हूँ। कथा कुछ यूँ है,

“उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला तैराकी में उतरा हुआ था। तैरने में मछली-सा निपुण मैराथन दौड़ रहा था।

जीवन के ओलिम्पिक में खिलाड़ियों की भरमार है पर उत्कर्ष तक पहुँचने वालों की संख्या नगण्य है। मैदान यहीं, खेल यहीं, खिलाड़ी यहीं  दर्शक यहीं, पर मैदान मानो निष्प्राण है।

एकाएक मैराथन वाला सारे बंधन तोड़कर तैरने लगा। तैराक की आँंख में अर्जुन उतर आया, तीर साधने लगा। तीरंदाज के पैर हवा से बातें करने लगे। धावक अब तक जितना दौड़ा नहीं था उससे अधिक दूरी तक भाला फेंकने‌ लगा। भालाफेंक का मारा भाला को पटक कर लम्बी छलांग लगाने लगा। लम्बी छलांग‌ वाला बुलंद हौसले से ऊँचा और ऊँचा, बहुत ऊँचा कूदने लगा।

दर्शकों के उत्साह से मैदान गुंजायमान हो उठा। उदासीनता की जगह उत्साह का सागर उमड़ने लगा। वही मैदान, वही खेल, वे ही दर्शक पर खिलाड़ी क्या बदले, मैदान में प्राण लौट आए।”

अँग्रेज़ी की एक कहावत है, ‘यू गेट लाइफ वन्स। लिव इट राइट। वन्स इज़ इनफ़।’ जीवन को सही जीना अर्थात अपनी संभावना को समझना, सहेजना और श्रमपूर्वक उस पर काम करना।

स्मरण रहे, आप जीवन के जिस भी मोड़ पर हों, जीने की संभावना हमेशा बनी रहती है।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 62 ☆ हाइकु सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित भावप्रवण  ‘हाइकु सलिला। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 62 ☆ 

☆ हाइकु सलिला ☆ 

*

हाइकु करे

शब्द-शब्द जीवंत

छवि भी दिखे।

*

सलिल धार

निर्मल निनादित

हरे थकान।

*

मेघ गरजा

टप टप मृदंग

बजने लगा।

*

किया प्रयास

शाबाशी इसरो को

न हो हताश

*

जब भी लिखो

हमेशा अपना हो

अलग दिखो।

*

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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