हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 102 ☆ उपहार व सम्मान ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख उपहार व सम्मान। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 102 ☆

☆ उपहार व सम्मान ☆

किसी को प्रेम देना सबसे बड़ा उपहार है और किसी का प्रेम पाना सबसे बड़ा सम्मान है। उपहार व सम्मान दोनों स्थितियां प्रसन्नता प्रदान करती हैं। जब आप किसी के प्रति प्रेम प्रदर्शित करते हैं, तो उसके लिए वह सबसे बड़ा उपहार होता है और जब कोई आपका हृदय से सम्मान करता है; आप के प्रति प्रेम भाव प्रदर्शित करता है, तो इससे बड़ी खुशी आपके लिए हो नहीं सकती। शायद इसीलिए कहा जाता है कि एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले। जिंदगी देने और लेने का सिलसिला है। आजकल तो सारा कार्य-व्यवहार इसी पर आश्रित है। हर मांगलिक अवसर पर भी हम किसी को उपहार देने से पहले देखते हैं कि उसने हमें अमुक अवसर पर क्या दिया था? वैसे अर्थशास्त्र में इसे बार्टर सिस्टम कहा जाता है। इसके अंतर्गत आप एक वस्तु के बदले में दूसरी वस्तु प्राप्त कर सकते हैं।

वास्तव में उपहार पाने पर वह खुशी नहीं मिलती; जो हमें सम्मान पाने पर मिलती है। हां शर्त यह है कि वह सम्मान हमें हृदय से दिया जाए। वैसे चेहरा मन आईना होता है, जो कभी  झूठ नहीं बोलता। यह हमारे हृदय के भावों को व्यक्त करने का माध्यम है। इसमें जो जैसा है, वैसा ही नज़र आता है। एक फिल्म के गीत की यह पंक्तियां ‘तोरा मन दर्पण कहलाय/ भले-बुरे सारे कर्मण को देखे और दिखाय’ इसी भाव को उजागर करती हैं। इसलिए कहा जाता है कि ‘जहां तुम हो/ वहां तुम्हें सब प्यार करें/ और जहां से तुम चले जाओ/ वहां सब तुम्हें याद करें/ जहां तुम पहुंचने वाले हो/ वहां सब तुम्हारा इंतज़ार करें’ से सिद्ध होता है कि इंसान के पहुंचने से पहले उसका आचार-व्यवहार व व्यक्ति की बुराइयां व खूबियां पहुंच जाती हैं। अब्दुल कलाम जी के शब्दों में ‘तुम्हारी ज़िंदगी में होने वाली हर चीज के लिए ज़िम्मेदार तुम स्वयं हो। इस बात को तुम जितनी जल्दी मान लोगे; ज़िंदगी उतनी बेहतर हो जाएगी।’ सो! दूसरों को अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी ठहराना मूर्खता है,आत्म-प्रवंचना है। ‘जैसे कर्म करेगा, वैसा ही फल देगा भगवान’ तथा ‘बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाय’ पंक्तियां सीधा हाँट करती हैं।

धरती क्षमाशील है; सबको देती है और भीषण आपदाओं को सहन करती है। वृक्ष सदैव शीतल छाया देते हैं। यदि कोई उन्हें पत्थर मारता है, तो भी वे उसे मीठे फल देते हैं। नदियां पापियों के पाप धोती हैं; निरंतर गतिशील रहती हैं तथा शीतल जल प्रदान करती हैं। बादल जल बरसाते हैं; धरती की प्यास बुझाते हैं। सागर असंख्य मोती व मणियां लुटाता है। पर्वत हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं। सो! वे सब देने में विश्वास रखते हैं; तभी उन्हें सम्मान प्राप्त होता है और वे श्रद्धेय व पूजनीय हो जाते हैं। ईश्वर सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और बदले में कोई अपेक्षा नहीं करते। परंतु बाबरा इंसान वहां भी सौदेबाज़ी करता है। यदि मेरा अमुक कार्य संपन्न हो जाए, तो मैं इतने का प्रसाद चढ़ाऊंगा; तुम्हारे दर्शनार्थ आऊंगा। आश्चर्य होता है, यह सोच कर कि सृष्टि-नियंंता को भी किसी से कोई दरक़ार हो सकती है। इसलिए जो भी दें, सम्मान-पूर्वक दें; भीख समझ कर नहीं। बच्चे को भी यदि ‘आप’ कह कर पुकारेंगे, तो ही वह आप शब्द का प्रयोग करेगा। यदि आप उस पर क्रोध करेंगे, तो वह आपसे दूर भागेगा। इसलिए कहा जाता है कि आप दूसरों से वैसा व्यवहार करें, जिसकी अपेक्षा आप उनसे करते हैं, क्योंकि जो आप देते हैं; वही लौट कर आपके पास आता है।

‘नफ़रतों के शहर में/ चालाकियों के डेरे हैं/ यहां वे लोग रहते हैं/ जो तेरे मुख पर तेरे/ मेरे मुख पर मेरे हैं।’ सो! ऐसे लोगों से सावधान रहें, क्योंकि वे पीठ में छुरा घोंकने में तनिक भी देर नहीं लगाते। वे आपके सामने तो आप की प्रशंसा करते हैं और आपके पीछे चटखारे लेकर बुराई करते हैं। ऐसे लोगों को कबीरदास जी ने अपने आंगन में अर्थात् अपने पास रखने की सीख दी है, क्योंकि वे आपके सच्चे हितैषी होते हैं। आपके दोष ढूंढने में अपना अमूल्य समय नष्ट करते हैं। सो! आपको इनका शुक्रगुज़ार  होना चाहिए। शायद! इसलिए कहा गया है कि ‘दिल के साथ रहोगे; तो कम ही लोगों के खास रहोगे।’ वैसे तो ‘दुनियादारी सिखा देती है मक्करियां/  वरना पैदा तो हर इंसान साफ दिल से होता है।’ इसलिए ‘यह मत सोचो कि लोग क्या सोचेंगे/ यह भी हम सोचेंगे/ तो लोग क्या सोचेंगे।’ इसलिए ऐसे लोगों की परवाह मत करो; निरंतर सत्कर्म करते रहो।

प्रेम सृष्टि का सार है। हमें एक-दूसरे के निकट लाता है तथा समझने की शक्ति प्रदान करता है। प्रेम से हम संपूर्ण प्रकृति व जीव-जगत् को वश में कर सकते हैं। प्रेम पाना संसार में सबसे बड़ा सम्मान है। परंतु यह प्रतिदान रूप में ही प्राप्त होता है। यह त्याग का दूसरा रूप है। इस संसार में अगली सांस लेने के निमित्त पहली सांस को छोड़ना पड़ता है। इसलिए मोह-माया के बंधनों से दूर रहो; अपने व्यवहार से उनके दिलों में जगह बनाओ। सबके प्रति स्नेह, प्रेम, सौहार्द व त्याग का भाव रखो; सब तुम्हें अपना समझेंगे और सम्मान करेंगे। सो! आपका व्यवहार दूसरों के प्रति मधुर होना आवश्यक है।

ज़िंदगी को अगर क़ामयाब बनाना है तो याद रखें/ पांव भले फिसल जाए/ ज़ुबान कभी फिसलने मत देना, क्योंकि वाणी के घाव कभी नहीं भरते और दिलों में ऐसी दरारें उत्पन्न कर देते हैं, जिनका भरना संभव नहीं होता। यह बड़े-बड़े महायुद्धों का कारण बन जाती हैं। वैसे भी लड़ने की ताकत तो सबके पास होती है; किसी को जीत पसंद होती है’ तो किसी को संबंध। वैसे भी ताकत की ज़रूरत तब पड़ती है, जब किसी का बुरा करना हो, वरना दुनिया में सब कुछ पाने के लिए प्रेम ही काफी है। प्रेम वह संजीवनी है, जिसके द्वारा हम संबंधों को प्रगाढ़ व शाश्वत् बना सकते हैं। इसलिए किसी के बारे में सुनी हुई बात पर विश्वास ना करें; केवल आंखिन-देखी पर भरोसा रखें, वरना आप सच्चे दोस्त को खो देंगे।

‘ज़िंदगी भर सुख कमा कर/ दरवाज़े से घर लाने की कोशिश करते रहे/ पता ही ना चला/ कब खिड़कियों से उम्र निकल गई।’ मानव आजीवन  सुक़ून की तलाश में भटकता रहता है। उसे सुख-ऐश्वर्य व भौतिक-सम्पदा तो प्राप्त हो जाती है, परंतु शांति नहीं। इसलिए मानव को असीमित इच्छाओं पर अंकुश लगाने की सीख दीजाती है, क्योंकि आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं; इच्छाएं नहीं। भरोसा हो तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक शब्द के कई-कई अर्थ निकलने लगते हैं। मौन वह संजीवनी है, जिससे बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि छोटी-छोटी बातों को बड़ा ना किया करें/ उससे ज़िंदगी छोटी हो जाती है। इसलिए गुस्से के वक्त रुक जाना/ फिर पाना जीवन में/ सरलता और आनंद/ आनंद ही आनंद’ श्रेयस्कर है। सो! अनुमान ग़लत हो सकता है; अनुभव नहीं, क्योंकि अनुमान हमारे मन की कल्पना है; अनुभव जीवन की सीख है। परिस्थिति की पाठशाला ही मानव को वास्तविक शिक्षा देती है। कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं, जो दुआ से मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं, जो किस्मत बदल देते हैं। सुख व्यक्ति के अहंकार की परीक्षा लेता है और दु:ख धैर्य की। दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण व्यक्ति का जीवन सफल होता है और उसे ही जीवन में सम्मान मिलता है, जो अपेक्षा व उपेक्षा दोनों स्थितियों से बच कर रहता है। वास्तव में यह दोनों स्थितियां ही भयावह हैं, जो हमारी उन्नति में अवरोधक का कार्य करती हैं। उपहार पाने पर क्षणिक सुख प्राप्त होता है और सम्मान पाने पर जिस सुख की प्राप्ति होती है, वह मधुर स्मृतियों के रूप में सदैव हमारे साथ रहती हैं। सो! सदैव अच्छे लोगों की संगति करें, क्योंकि वे आपकी अनुपस्थिति में भी आप के पक्षधर बनकर खड़े रहते हैं।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

#239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 54 ☆ आज उपेक्षित होते बुजुर्ग ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अत्यंत विचारणीय  एवं सार्थक आलेख  आज उपेक्षित होते बुजुर्ग”.)

☆ किसलय की कलम से # 54 ☆

☆ आज उपेक्षित होते बुजुर्ग ☆

एक समय था जब बुजुर्गों को वट वृक्ष की संज्ञा दी जाती थी, क्योंकि जिस तरह वटवृक्ष अपनी विशालता और छाया के लिए जाने जाते हैं, उससे कहीं अधिक बुजुर्गों में विशालता और अपने बच्चों को खुशियों रूपी शीतल छाया देने हेतु याद किया जाता था। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। बच्चे बड़े होते ही अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं। ऊपर से एकल परिवार की व्यवस्थाओं में आजा-आजी की छोड़िए वे अपने माँ-बाप को भी वांछित सम्मान नहीं देते। जिन्होंने अपनी औलाद को जी-जान से चाहकर अपना निवाला भी उन्हें खिलाया वही कृतघ्न संतानें माँ-बाप को बुढ़ापे में घर से दूर वृद्धाश्रम में छोड़ आती हैं। इन माता-पिताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिन पर उन्होंने अपना सर्वस्व लुटाया वही संतानें उन्हें बेसहारा कर देंगी। ऐसे वाकये और हकीकत जानकर अन्य बुजुर्गों के दिलों पर क्या बीती होगी। आधा खून तो वैसे ही सूख जाता होगा कि कहीं उनकी संतानें भी उन्हें इसी तरह अकेला न छोड़ दें।

लोग शादी करके बच्चे मनोरंजन के लिए पैदा नहीं करते। हमारे धर्म व हमारी परंपराओं के अनुसार अपना उत्तराधिकार, अपनी धन-संपत्ति का अधिकार भी संतानों को स्वतः स्थानांतरित हो जाता है। भारतीय वंश परंपरा की भी यही सबसे बड़ी विशेषता है कि वंश को आगे बढ़ाने वाला ही श्रेष्ठ कहलाता है, अन्यथा उसे निर्वंशी कहा जाता है। आशय यही है कि अपनी संतानों के लालन-पोषण और शादी-ब्याह का पूरा उत्तरदायित्व माँ-बाप का ही होता है, लेकिन जब वही संतान उन्हें दुख देती हैं, उन्हें उपेक्षित छोड़ती हैं तो उनका दुखी होना स्वाभाविक है।

आज के परिवेश में बुजुर्गों की आधुनिक तकनीकि की अनभिज्ञता के चलते संतानें अपने माँ-बाप को पिछड़ेपन की श्रेणी में गिनने लगे हैं, जबकि हमारे यहाँ श्रेष्ठता के मानक भिन्न रहे हैं। भारत में धर्म परायणता, शिष्टाचार, सत्यता, मृदुव्यवहार एवं परोपकारिता जैसे गुणों की बदौलत इंसान को देवतुल्य तक कहा जाता था। क्या नई तकनीकि आपके व्यवहार में उक्त गुण लाती है, कदापि नहीं। ये गुण आते हैं संस्कारों से, अच्छी शिक्षा से, लेकिन आजकल ये सब बातें पुरानी हो गई हैं। अब तो लोगों को मात्र डिग्री चाहिए और डिग्री के बल पर नौकरी। बस इनसे जिंदगी चलने लगती है। भाड़ में जाएँ माँ-बाप। वे तो अपनी बीवी को लेकर महानगरों में चले जाते हैं या फिर विदेश में जाकर बस जाते हैं।

आज जब उनकी संतानें व  उनके इक्कीसवीं सदी के उनके पोते-पोतियाँ उनसे बात नहीं करते। उनकी सेवा-शुश्रूषा छोड़िये उनका कहा तक कोई नहीं सुनता, ऊपर से उनकी अपनी संतानें भी उनका ही पक्ष लेती हैं। उनके स्वयं के बेटे उनको मुँह बंद करने पर विवश करते हैं, तब एक अच्छा-भला, अनुभव वाला इंसान उपेक्षित महसूस नहीं करेगा तो और क्या करेगा भी क्या। तब उनके पास केवल दो ही विकल्प बचते हैं। पहला या तो ‘मन मार कर जियो’ या फिर दूसरा ‘कहीं डूब मरो’।

अभी मानवता मरती जा रही है। कल जब  वक्त बदलेगा तब इन्हीं वट वृक्षों के तले उन्हें आना पड़ेगा और उनके सदुपदेशों के अनुसार स्वयमेव चलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह दिन भी दूर नहीं है जब इस तथाकथित आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति का भूत हम भारतीयों के सिर से उतरेगा, तभी भारत की यथार्थ में सुनहरी सुबह होगी।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत

संपर्क : 9425325353

ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 101 ☆ नवरात्रि पर्व विशेष – भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना के दोहे । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 101 – साहित्य निकुंज ☆

☆ नवरात्रि पर्व विशेष – भावना के दोहे ☆

 

मण्डप देखो सज गया, कलश स्थापना आज।

देवी का पूजन करो,  बनते    बिगड़े    काज।।

 

अदभुत प्रथम  स्वरूप है, शैल सुता का रूप ।

करते  हैं   आराधना,     देवी    बड़ी    अनूप।।

 

आए दिन नवरात्रि के, बना  आगमन    खास।

श्रद्धा से सब   पूजते,   पूरी    होती     आस।

 

मंगलमय उत्सव यही,   गाए मंगल   गान।

नौ देवी जो   पूजते,    हो जाता   कल्याण।।

 

जग जननी, जगदंबिका, नौ देवी अवतार।

आदिशक्ति वरदायनी,    पूजें    बारंबार।।

 

शक्ति स्वरूपा मातु श्री, करती है   उद्धार।

विनती करने आ गए, माता  के    दरबार।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 90 ☆ माँ के चरणों में भगवान  ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.  “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं एक भावप्रवण कविता “माँ के चरणों में भगवान । आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 90 ☆

☆ माँ के चरणों में भगवान ☆

माँ की महिमा बड़ी महान

माँ के चरणों में भगवान

 

आँखों में जब नींद न आती

लोरी गाकर हमें सुलाती

थप-थपाती प्यार से सिर को

देकर मधुर सुरीली तान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

संकट में वह साहस देती

नजर उतार बलैयां लेती

मुश्किलों के आगे भी वह

खड़ी रहे जो सीना तान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

मंज़िल की माँ राह दिखाती

संस्कार अच्छे सिखलाती

परिवार की जननी बन कर

करे सदा सबका कल्यान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

कहाँ हैं अब आँख के तारे

माँ  के  थे  जो  राजदुलारे

भूल गए वो अब यौवन में

अपनी माँ का भी सम्मान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

घर में जब होता बंटवारा

माँ का दिल रोता बेचारा

अपनी ही खुशी में सारे

भूल गए माँ की मुस्कान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

जिसने सबको पाला-पोसा

उसके लिए न किसने सोचा

बे-बस माँ सिसक कर कहती

बेटे   पूर्ण    करो    अरमान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

माँ  से  बनते  रिश्ते  सारे

माँ से  ही घर में उजियारे

काम-काज दिन-रात करती

फिर भी आती नहीं थकान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

गर्म किसी का माथा होता

माँ का दिल अंदर से रोता

बिन दवा के बन जाती है

माँ दुआओं की इक दुकान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

माँ का दिल मत कभी दुखाना

वही है खुशियों का खजाना

कहता है “संतोष”सभी से

माँ की सेवा कर नादान

माँ की महिमा बड़ी महान

 

माँ   का   ऊँचा  है     स्थान

करिए माँ का सब  गुणगान

माँ के चरणों में भगवान

माँ की महिमा बड़ी महान

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 116 ☆ बीरबल! ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण कविता बीरबल!। इस विचारणीय कविता के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 116 ☆

? कविता – बीरबल! ?

 

बीरबल!

तुम्हारी जाने कब

पकने वाली

खिचडी !

जो तुमने पकाई थी , कभी

उस गरीब को

न्याय दिलाने के लिये .

क्यों आज न्याय के नाम पर

पेशी दर पेशी पक रही है

पक रही है पक रही है.

 

खिचडी क्यों

बगुलों और काले कौऔ की ही गल रही है

और आम जनता

सूखी लकडी सी

देगची से

बहुत नीचे

बेवजह जल रही है.

 

दाल में कुछ काला है जरूर

क्योंकि

रेवडी

सिर्फ अपनों को ही बंट रही है.

 

रेवडी तो हमें चाहिये भी नहीं

बीरबल !

पर मुश्किल यह है कि अब

दो जून खिचडी भी नहीं मिल

रही है।

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 79 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – अष्टादशोऽध्यायः ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । 

आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है अष्टादशोऽध्यायः

पुस्तक इस फ्लिपकार्ट लिंक पर उपलब्ध है =>> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 79 ☆

☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – अष्टादशोऽध्यायः ☆ 

स्नेही मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई है। आज आप पढ़िए अठारहवाँ अध्याय। आनन्द उठाइए। ??

– डॉ राकेश चक्र

☆ अठारहवाँ अध्याय – उपसंहार

?मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई है। आज आप पढ़िए अठारहवाँ अध्याय। आनन्द उठाइए। डॉ राकेश चक्र???

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त अर्जुन को अंतिम अध्याय में सन्यास सिद्धि के बारे में ज्ञान दिया

 

अर्जुन ने भगवान से पूछा–

हे माधव! बतलाइए, क्या है त्याग उद्देश्य।

क्या है जीवन त्यागमय, कह दें आप विशेष्य।। 1

 

श्रीकृष्ण भगवान ने विस्तार से इसका वर्णन कर कहा—-

 

सन्यास क्या है

भौतिक इच्छा से परे, कर कर्मों परित्याग।

फल कर्मों का त्याग दे, यही योग सन्यास।। 2

 

कर्म श्रेष्ठ क्या हैं

विद्व सकामी कर्म को, कहें दोष से पूर्ण।

यज्ञ, दान, तप नित करें, यही सत्य सम्पूर्ण।। 3

 

भरतश्रेष्ठ! निर्णय सुनो, क्या है विषय त्याग।

शास्त्र कहें इस तथ्य को, तीन तरह परित्याग।। 4

 

आवश्यक कर्म क्या हैं

यज्ञ, दान, तप नित करें, नहीं करें परित्याग।

सबको करते शुद्ध ये, तन-मन मिटती आग।। 5

 

अंतिम मत मेरा यही, करो यज्ञ, तप, दान।

अनासक्ति फल बिन करो, हैं कर्तव्य महान।। 6

 

नियत जरूरी कर्म को, कभी न त्यागें मित्र।

त्याग करें जो मोहवश, वही तामसी चित्र।। 7

 

नियत कर्म जो त्यागता, मन में भय, तन क्लेश।

रजोगुणी यह त्याग है, मिले न सुफल  सुवेश।। 8

 

नियत कर्म क्या हैं

नियत कर्म कर्तव्य हैं, त्याग सात्विक जान।

त्याग सुफल आसक्ति दे, कर मेरा गुणगान।। 9

 

सतोगुणी है बुद्धिमय, लिप्त न शुभ गुण होय।

नहीं अशुभ से भी घृणा, करें न संशय कोय।। 10

 

करें त्याग जो कर्मफल,वही त्याग की मूर्ति।

कर्मों का कब त्याग हो,चले युगों से रीति।। 11

 

त्याग का न करने के दुष्परिणाम

मृत्यु बाद फल भोगते,नहीं करें जो त्याग।

इच्छ-अनिच्छित कर्मफल,या मिश्रित अनुभाग।।12

सन्यासी हैं जो मनुज,नहीं कर्मफल ढोंय।

सुख-दुख भी कब भोगते,नहीं दुखों से रोंय।।12

 

सब कार्यों की पूर्ति के लिए पाँच कारण हैं

सकल कर्म की पूर्ति हो,सुनो वेद अनुसार।

कारण प्रियवर पाँच हैं,सुनो कर्म का सार।।13

 

कर्म क्षेत्र यह देह है,कर्ता यही शरीर।

इन्द्रिय,चेष्टाएँ अनत,प्रभू पंच हैं मीर।।14

 

मन,वाणी या देह से,करते जैसा कर्म।

पाँच यही कारण रहे,सकल कर्म-दुष्कर्म।।15

 

कारण पाँच न मानते,माने कर्ता स्वयं।

बुद्धिमान वे जन नहीं,परख न पाएँ अहम।।16

 

अहंकार करता नहीं,खोल बुद्धि के द्वार।

उससे यदि कोई मरे,बँधे न पापा भार।।17

 

ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता सभी,कर्म प्रेरणा होंय।

इन्द्रिय,कर्ता कर्म सब,कर्म संघटक होंय।18

 

बँधी प्रकृति त्रय गुणों में,त्रय-त्रय भेदा होय।

ज्ञान,कर्म कर्ता सभी,वर्णन करता तोय।।19

 

सात्विक प्रकृति क्या है

वही प्रकृति है सात्विक,ज्ञान वही है श्रेष्ठ।

जो देखे सबमें प्रभू,वही भक्तजन ज्येष्ठ।।20

 

राजसी प्रकृति क्या है

प्रकृति राजसी है वही, देखे भिन्न प्रकार।

सबमें करे विभेद वह,निराधार निस्सार।। 21

 

तामसी प्रकृति क्या है

वही तामसी प्रकृति है, करे कार्य जो भ्रष्ट।

सत को माने जो असत, होता ज्ञान निकृष्ट।। 22

 

 सात्विक कर्म क्या हैं

कर्म सात्विक है वही, जिसमें द्वेष न होय।

कर्मफला आसक्ति से, रहे दूर नर जोय।। 23

 

रजोगुणी कर्म क्या हैं

रजोगुणी वह कार्य है, इच्छा पूरी होय।

अहंकार मिथ्या पले,भोग फलों को रोय।। 24

 

तामसी कर्म क्या हैं

कर्म वही जो तामसी, करते शास्त्र विरुद्ध।

दुख पहुँचा , हिंसा करें, तन-मन करें अशुद्ध।। 25

 

सात्विक कर्ता कौन है–

सात्विक कर्ता है वही, करे नीति के कर्म।

उत्साहित संकल्प मन, नहीं डिगे सत् धर्म।। 26

 

राजसी कर्ता कौन है

वह कर्ता है राजसी, जिसके ईर्ष्या, लोभ।

मोह, भोग आसक्ति से,मिला अंततः क्षोभ।। 27

 

तामसी कर्ता कौन है

चलता राहें तामसी, कर्ता शास्त्र विरुद्ध।

पटु कपटी, भोगी , हठी, आलस- मोहाबद्ध।। 28

 

भगवान ने प्रकृति के गुणों के बारे में वर्णन किया

तीन गुणों से युक्त है,त्रयी प्रकृति का रूप।

सुनो बुद्धि, धृति,दृष्टि से, देखो चित्र अनूप।। 29

 

सतोगुणी बुद्धि क्या है

सतोगुणी है बुद्धि वह, जो मन रखे विवेक।

क्या अच्छा है, क्या बुरा, कार्य कराए नेक।। 30

 

राजसी बुद्धि क्या है

बुद्धि राजसी सर्वथा, क्या जाने शुभ कर्म।

संशय में है डोलती, भेद न धर्म-अधर्म।। 31

 

तामसिक बुद्धि क्या है

बुद्धि तामसिक कर सके, भेद न धर्म-अधर्म।

वशीभूत तम,मोह के, करती सदा अकर्म।। 32

 

सात्विक धृति क्या है

धृति सात्विकी बस वही, करें योग अभ्यास।

इन्द्रिय,मन वश प्राण कर, करें बुद्धि के पास।। 33

 

राजसिक धृति क्या है

सत्य राजसिक धृति वही, रहे कर्मफल लिप्त।

काम, धर्म, धन बीच में, रहे सदा संलिप्त।। 34

 

तामसिक धृति क्या है

तमोगुणी है धृति वही , जो लिपटी भय, शोक।

परे नहीं दुख, मोह से, करे न मन पर रोक।। 35

 

तीन प्रकार के सुख (धृति) क्या हैं

भरतश्रेष्ठ !मुझसे सुनो, त्रय सुख का गुणगान।

योग-भोग कर जीव सब, करें स्वयं कल्यान।। 36

 

सात्विक सुख क्या है

सुख भी सात्विकी है वही , पूर्व लगे विष बेल।

करे आत्म साक्षात जो, यह अमृत सम खेल।। 37

 

रजोगुणी सुख क्या है

रजोगुणी धृति है वही, पूर्व अमृत की बेल।

इन्द्रिय विषय मिलाप से, अंत लगे विष खेल।। 38

 

तामसिक सुख क्या है

तमोगुणी धृति है वही, रहे आत्म विपरीत।

सुप्त मोह आलस्य में, सुप्त हो, पूर्व,अंत अति तीत।। 39

 

मनुष्य प्रकृति के तीन गुणों अर्थात सत, रज,तम में बद्ध है

बद्ध जीव सब प्रकृति के, मनुज, देव सँग स्वर्ग।

तीन गुणों में लिप्त हैं, फल भोगे सब कर्म।। 40

 

ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य सब, या हों कर्मा शूद्र।

बँन्धे प्रकृति के गुणों में, भाव कर्म के सूत्र।। 41

 

ब्राह्मण कर्म क्या हैं

आत्मसंयमी, शांति प्रिय, तप, सत रहे पवित्र।

ज्ञान, धर्म, विज्ञानमय, कर्म ब्राह्मण मित्र।। 42

 

क्षत्रिय कर्म क्या हैं

शक्ति, वीरता, दक्षता, युद्ध में रखें धैर्य।

हो उदार नेतृत्वमय, हो क्षत्री बल-धैर्य।।43

 

वैश्य का कर्म क्या है

गौ रक्षा, व्यापार कर, करता कृषि के कार्य।

मूल कर्म यह वैश्य का, करे न आलस आर्य।। 44

 

शूद्र कर्म क्या है

जो सबकी सेवा करे, यही शूद्र का कर्म।

श्रम करता जो लगन से, यही मानवी धर्म।। 44

 

कर्म करना ही सबसे श्रेष्ठ है

अपने कर्म स्वभाव का,करते पालन लोग।

कर्म न छोटा या बड़ा, सिद्धि कर्म का योग।। 45

 

कर्म-भक्ति नियमित करें, उदगम सबका एक।

सबका ईश्वर एक है, करें कर्म सब नेक।। 46

 

नियत कर्म सब ही करें, जो हो वृत्ति स्वभाव।

करें लगन संकल्प से, यही श्रेष्ठतम भाव।। 47

 

जो जिसका कर्तव्य है, करें सभी वह काम।

धैर्य रखें उद्योग से, मिलें सुखद परिणाम।। 48

 

अनासक्त मन,संयमी, करे न भौतिक भोग।

कर्मफलों से मुक्त हो, यही सिद्धि फल-योग।। 49

 

परम् सिद्ध जो ब्रह्म है, सर्वोत्तम वह ज्ञान।

कहता हूँ संक्षेप से, कुंतीपुत्र महान।। 50

 

संसार में अध्यात्म सर्वोच्च गुह्य ज्ञान क्या है और मनुष्य का कर्तव्य क्या है ? भगवान ने अर्जुन को  निम्नलिखित बीस दोहों में बताया है। साथ ही बताया कि भक्त का कैसे कल्याण होता है। गीता का स्वाध्याय और प्रचार करने क्या लाभ हैं

 

विषयेन्द्रिय को त्यागकर, करें बुद्धि जो शुद्ध।

मन वश करते धैर्य से, हो जाते वे बुद्ध।। 51

राग-द्वेष से मुक्त हों, करें वास एकांत।

मन-वाणी संयम करें, योगी जन हो शांत।।51

 

अल्पाहारी, पूर्णतः,विरत, करें न मिथ अहंकार।

काम, क्रोधि, लोभी न हों, रहें सदा निर्विकार।। 52

 

करें आत्म दर्शन नहीं,पालें स्वामी भाव।

मिथ्या शक्ति,प्रमाद से, भक्ति-सत्य बिखराव। 53

 

दिव्य भक्ति में जो मनुज, हो जाता है लीन।

परब्रह्म को प्राप्त कर,पाता दृष्टि नवीन।। 54

 

श्रेष्ठ भक्ति के मार्ग से, मिल जाते भगवान।

पाता नर बैकुंठ गति,और परम कल्यान।। 55

 

शुद्ध भक्ति जो भी करें, संग करें सब कार्य।

पाएँ वे मेरी कृपा, विमल आचरण धार्य।।56

 

सकल कार्य अर्पण करो,रखो सदा हित प्यार।

शरणागत का मैं सदा, करता हूँ उद्धार।। 57

 

श्रद्धा भावी भक्ति से, होता बेड़ा पार।

मिथ्यावादी जो अहम्,पाले मिलती हार।। 58

 

युद्ध करो अर्जुन सखा, करो स्वभावी कर्म।

भाव अवज्ञा का सदा,नष्ट करे सब धर्म।। 59

 

मोह जाल प्रिय छोड़कर, करो धर्म का युद्ध।

पहचानो निज कर्म को, कहते शास्त्र, प्रबुद्ध।। 60

 

जीव-जीव में ईश है,कण-कण अंशाधार।

माया में संलिप्त है, यह पूरा संसार।। 61

 

भारत!गह मेरी शरण, मिले शांति का धाम।

परमधाम पाओ प्रिये, तुम मेरा अभिराम।। 62

 

गुह्य ज्ञान मैंने कहा, मनन करो कुलश्रेष्ठ।

जो भी इच्छा फिर करो, जीवन होगा श्रेष्ठ।। 63

 

सुनो मित्र भारत महत, गूढ़ मर्म का ज्ञान।

यही परम् आदेश है,यही परम कल्यान।। 64

 

मम चिंतन, पूजन करो,वंदन बारंबार।

पाओगे मुझको अटल, मेरा कथन विचार।। 65

 

सकल धर्म परित्याग कर,करो!शरण स्वीकार।

सब पापों से मुक्त कर,करता मैं उद्धार।।-66

 

गुह्य ज्ञान वे कब सुनें,कब संयम अपनायँ।

एकनिष्ठ बिन भक्ति के,द्वेष करें मर जायँ।।-67

 

इस रहस्य को भक्ति के,जो सबको बतलाय।

शुद्ध भक्ति को प्राप्त हो,लौट शरण मम आय।।-68

 

वही भक्त अति प्रिय मुझे,मम करता गुणगान।

जो प्रचार मेरा करे,मुझको देव समान।।-69

 

मैं प्रियवर घोषित करूँ,सुन लें मम संवाद।

करें भक्ति वे बुद्धि से,जीवन बने प्रसाद।।-70

 

श्रद्धा से गीता सुने,होता वह निष्पाप।

पा जाता शुभ लोक को,पाए पुण्य प्रताप।।-71

 

प्रथा पुत्र मेरी सुनो,जो पढ़ता यह शास्त्र।

मोह मिटे अज्ञान भी,बनता मम प्रिय पात्र।।-72

 

भगवान श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण ज्ञान पाकर अर्जुन का माया-मोह का आवरण उसके मन-मस्तिष्क से पूरी तरह हट गया था, तब वह युद्ध करने के लिए तैयार हुआ और भगवान से कहा——

 

अर्जुन कहता कृष्ण से,दूर हुआ मम मोह।

ज्ञानार्जन से बुद्धि पा,मिटा विभ्रम-अवरोह।।-73

 

संजय हस्तनापुर के सम्राट धृतराष्ट्र के सारथी थे, अर्थात रथ चालक थे,साथ ही भगवान के भक्त भी थे। कुरुक्षेत्र का युद्ध होने से पूर्व महर्षि व्यास जी की कृपा से उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई थी, अर्थात वे एक स्थान पर बैठे ही सब कुछ देख व सुन सकते थे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का पूरा संवाद सुना था, जिसका आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाते जा रहे थे। जब दोनों के मध्य संवाद समाप्त हुआ, तब अंत में उन्होंने धृतराष्ट्र से संवाद का रोमांचकारी अनुभव व्यक्त किया। जो गीता जी अंत के पाँच दोहों में इस प्रकार है——-

 

कृष्णार्जुन संवाद से,हुआ हृदय-रोमांच।

सच में अद्भुत वार्ता,मन हो गया शुभांत।।-74

 

व्यास कृपा मुझ पर हुई,सुना परम गुह ज्ञान।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने,जीवन किया महान।।-75

 

हे राजन!संवाद सुन,मन आह्लादित होय।

अति पावन यह वार्ता,दूर करे सब कोय।।-76

 

श्रीकृष्ण भगवान के,अद्भुत देखे रूप।

हर्ष भरे आश्चर्य से,जीवन हुआ अनूप।।-77

 

योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं,जहाँ पार्थ से वीर।

वहीं विजय ऐश्वर्य है,शक्ति,नीति सँग धीर।।-78

 

इति श्रीमद्भगवतगीतारूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन संवाद में ” संन्यास सिद्धि योग ” अठारहवाँ अध्याय समाप्त।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 81 – पाऊस ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #81 ☆ 

☆ पाऊस ☆ 

 

तुझ्या माझ्यातला पाऊस

आता पहिल्यासारखा

राहिला नाही..

तुझ्या सोबत जसा

पावसात भिजायचो ना

तसं पावसात भिजण होत नाही

आता फक्त मी पाऊस

नजरेत साठवतो…

आणि तो ही

तुझी आठवण आली की

आपसुकच गालावर ओघळतो..

तुझं ही काहीसं

असंच होत असेल

खात्री आहे मला

तुझ्याही गालावर नकळत

का होईना

पाऊस ओघळत असेल…!

 

© सुजित कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #102 – दरवाजे …☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा रात  का चौकीदार” महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं प्रसंगवश आपकी  हिंदी पर एक  रचना  “दरवाजे……”। )

☆  तन्मय साहित्य  #102 ☆

☆ दरवाजे……

आते जाते नजर मिलाते ये दरवाजे

प्रहरी बन निश्चिंत कराते ये दरवाजे।

 

घर से बाहर जब जाएँ तो गुमसुम गुमसुम

वापस   लौटें   तो   मुस्काते   ये   दरवाजे।

 

कुन्दे  में  ताले  से  इसे  बंद  जब करते

नथनी नाक में ज्यों लटकाते ये दरवाजे।

 

पर्व, तीज, त्योहारों पर जब तोरण टाँगें

गर्वित  हो  मन  ही मन हर्षाते  दरवाजे।

 

प्रथम  देहरी  पूजें पावन  कामों में जब

बड़े  भाग्य  पाकर  इतराते  ये   दरवाजे।

 

बच्चे  खेलें, आगे – पीछे  इसे  झुलायें

चां..चिं. चूं. करते, किलकाते ये दरवाजे।

 

बारिश में जब फैल -फूल अपनी पर आए

सब  को  नानी  याद  कराते   ये  दरवाजे।

 

मंदिर पर ज्यों कलश, मुकुट राजा का सोहे

वैसे    घर   की   शान   बढ़ाते  ये   दरवाजे।

 

विविध कलाकृतियाँ, नक्काशी, रूप चितेरे

हमें   चैन  की   नींद   सुलाते   ये  दरवाजे।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 104 ☆ पाऊस आणि मी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

? साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 104 ?

☆ पाऊस आणि मी ☆

एका रिमझिमत्या सांजेला,

आठवणींचे मेघ भरून आले आणि पाऊस बरसत राहीला

मनभर….

हिरवागार भोवताल न्याहाळत,

कट्ट्यावरच्या गप्पा

रंगत असताना….

आठवत राहिले, दुस-याच कुणा

सखीबरोबरचे ते पावसाळी दिवस धुवाँधार….

शाळेच्या मैदानावर खेळलेल्या खो खो ची आठवण यावी,

असेच काहीसे….

अनेक अनेक मैत्रिणींचे,

आयुष्यात येणे जाणे,

मावळत्या सूर्याच्या दिशेने जाताना,

ताज्या टवटवीत होत गेल्या,

पूर्वायुष्यातल्या सख्यांच्या

त्या रसिल्या मैफिली….

ऋणानुबंधाच्या कुठल्या धाग्याने बांधलेले असतात हे सेतू?

आपल्याला एकमेकींकडे

घेऊन येणारे?

वळणावळणाने वाहणारी,

ही आयुष्याची नदी,

क्षणभर थबकते

एखाद्या काॅज वे जवळ

आणि उठतात तिच्या पात्रावर आठवणींचे तरंग !

त्या रिमझिमत्या सांजेला

सखे, निमित्त फक्त,

आपल्या गाठीभेटीचे,

 पण आपल्या मनातला

पाऊस मात्र,

किती वेगळा …..

तुझा तुझ्यापुरता,

माझा माझ्यापुरता !!

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 91 ☆ समंदर और वो ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता “समंदर और वो  । )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 91 ☆

☆ समंदर और वो  ☆

जाने क्यों उसे वो समंदर

बहुत अपने सा लगने लगा था!

वो जाकर उसके किनारे पर बैठ जाती

और देखती उसकी आती और जाती मौजों को-

कभी उसके पानी को अपनी अंजुली में उठाकर

अपने चेहरे पर डालती

और ख़ुशी से अभिभूत हो जाती,

कभी उसमें पाँव डालकर

उसका सुहावना स्पर्श महसूस करती 

और कभी पानी में खड़ी होकर दूर तक दौड़ती!

समंदर ही उसकी ज़िंदगी था!

समंदर ही उसकी मंजिल थी!

 

एक दिन यूँ ही जब लहरों को निहारती हुई

वो बैठी थी किनारे पर,

तो उसे नींद की झपकी आ गयी-

जब उठी तो देखा लहरें पीछे को सरक रही हैं!

वो लहरों के पीछे भागी…

लहरें और पीछे हुईं…

वो भागती रही,

और समंदर भी अपना आँचल समेटता रहा!

 

जब कुछ भी हाथ नहीं आया

तो वो बैठ गयी थक-हारकर,

यूँ जैसे उसकी ज़िंदगी ख़त्म हो गयी हो

और रात ढलने पर सो गयी वहीँ 

उस रेत पर जिसके जिगर में उसी की तरह नमी थी!

 

यह तो सुबह होने के बाद उसने जाना

कि यह एहसास खूबसूरत ही है

जहां सब कुछ खाली-खाली हो!

उसने अपने जिगर में उग रही किरणों के साथ

एक नयी ज़िंदगी शुरू कर दी!

 

जब समंदर अपनी लहरों के एहसास के साथ

फिर से आया उससे मिलने,

वो वहाँ से चली गयी थी दूर, बहुत दूर,

ताकि समंदर उसका पता भी न जान पाए!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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