English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 58 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 58 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 58) ☆

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 57 ☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

टूट कर चाहना किसी को

गुनाह है ग़र ,

तो फिर बेशुमार लोग

गुनहगार हैं यहाँ…

 

If loving someone overly

is  a  crime,

then countless people

are  culprits  here…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

कशमकश का

अहम मत पालो,

जो काम ख़ुशी दे,

उसे अभी कर डालो…

 

Don’t get entangled into

the dilemma of ego,

Work that gives you

happiness, do it now…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 दोस्ती  का  हाथ जब

मैंने बढ़ा दिया तो…

फिर कभी गिना नहीं कि

किसने कब दग़ा दिया…

 

When I extended the

hand  of  friendship,

Then never counted

who betrayed me when!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

न  गिला  है कोई  हालात  से,

न शिकायत किसी की बात से

खुद ही सारे वर्क जुदा हो रहे,

मेरी ज़िन्दगी की किताब से…!

 

No grudge against any situation,

Not even a complaint with anyone

All the writing itself is vanishing,

from the manuscript of my life….!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 59 ☆ दोहे ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा  रचित  ‘सलिल – दोहे’। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 59 ☆ 

☆ सलिल दोहे ☆ 

*

सलिल न बन्धन बाँधता, बहकर देता खोल।

चाहे चुप रह समझिए, चाहे पीटें ढोल।।

*

अंजुरी भर ले अधर से, लगा बुझा ले प्यास।

मन चाहे पैरों कुचल, युग पा ले संत्रास।।

*

उठे, बरस, बह फिर उठे, यही ‘सलिल’ की रीत।

दंभ-द्वेष से दूर दे, विमल प्रीत को प्रीत।।

*

स्नेह संतुलन साधकर, ‘सलिल’ धरा को सींच।

बह जाता निज राह पर, सुख से आँखें मींच।।

*

क्या पहले क्या बाद में, घुली कुँए में भंग।

गाँव पिए मदमस्त है, कर अपनों से जंग।।

*

जो अव्यक्त है, उसी से, बनता है साहित्य।

व्यक्त करे सत-शिव तभी, सुंदर का प्रागट्य।।

*

नमन नलिनि को कीजिए, विजय आप हो साथ।

‘सलिल’ प्रवह सब जगत में, ऊँचा रखकर माथ।।

*

हर रेखा विश्वास की, शक-सेना की हार।

सक्सेना विजयी रहे, बाँट स्नेह-सत्कार।

*

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य #88 ☆ मानव मन पर देश काल तथा परिस्थितियों का प्रभाव ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  श्री सूबेदार पाण्डेय जी की  एक विचारणीय आलेख  “# मानव मन पर देश काल तथा परिस्थितियों का प्रभाव #। ) 

– श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# 88 ☆ # मानव मन पर देश काल तथा परिस्थितियों का प्रभाव # ☆

भोजपुरी भाषा में एक कहावत है,

मन ना रंगायो ,रंगायो जोगी कपड़ा।

बार दाढ़ी रखि बाबा ,बनिए गइले बकरा।

इसी प्रकार मन की   मनोस्थिति पर   टिप्पणी करते हुए कबीर साहब ने कहा कि —-

माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर।

कर का मनका (माला के दाने)डारि के ,मन का मनका फेर।।

कबिरा माला काठ की ,कहि समुझावत मोहि ।

मन ना फिरायो आपना, कहां फिरावत मोहिं।।

                अथवा

जप माला छापा तिलक,सरै न एकौ काम।

मन कांचे नांचे बृथा ,सांचे रांचे राम।।

तथा गोपी उद्धव संवाद में

सूरदास जी ने गोपियों के माध्यम से मन के मनोभावों का गहराई से चित्रण करते हुए कहा कि  #उधो मन ना भयो दस बीस# तथा अन्य संतों महात्माओं ने भी जगह जगह मन की गतिविधियों को उद्धरित किया है, और श्री मद्भागवत गीता में तो वेद ब्यास जी अर्जुन द्वारा मन की चंचलता पर भगवान कृष्ण से मन को बस में करने का उपाय पूछा था कि—- हे केशव ! आप मन को बस में करने की बात करते हैं —-जिस प्रकार वायु को मुठ्ठी में कैद नहीं किया जा सकता, फिर उसी तरह चंचल स्वभाव वाले मन को कैसे बस में किया जा सकता है।

जिसके प्रतिउत्तर में  भगवान कहते हैं —-हे अर्जुन! निरंतर योगाभ्यास तथा वैराग्य के द्वारा मन को बस में करना अत्यंत सरल है।

हमने अपने अध्ययन में यह पाया कि क्षणिक ही सही उत्तेजित अवस्था में कठोर  से कठोर साधना करने वाला साधक नियंत्रण खो कर पतित हो अपना मान सम्मान गंवा देता है। आइए हम अपने अध्ययन द्वारा  मानव मन के स्वभाव प्रभाव का अध्ययन करें और समझे कि किस प्रकार उत्तेजना तथा भावुकता का  देश काल परिस्थिति तथा कहानी दृश्य चित्र तथा चलचित्र से परिस्थितियों से  मन  कैसे प्रभावित होता है।

मन की गतिविधियों पर अध्ययन करने से पहले हमें अपनी शारिरिक संरचना पर ध्यान देना होगा।   और उसकी बनावट तथा उसकी कार्यप्रणाली को समझना होगा तभी हम मन  के स्वभाव  को आसानी से समझ पायेंगे।

पौराणिक तथा बैज्ञानिक  अध्ययन तथा मान्यता के आधार पर  पंच भौतिक तत्वों  क्षिति ,जल पावक गगन तथा समीरा के संयोग  से मां के गर्भ में पल रहा , हमारा स्थूल शरीर निर्मित है, तथा शारीरिक संचालन के लिए जिस प्राण चेतना की आवश्यकता होती है वह प्राण वायु है उसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते।

जब प्राण शरीर से अलग होता है तब स्थूल शरीर मर जाता है उसी स्थूल शरीर में आत्मा निवास करती है जिसे इश्वरीय अंश से उत्पन्न माना जाता है , शरीर और आत्मा के बीच एक तत्व  मन भी रहता है

 जो इंद्रियों के द्वारा मन पसंद भोग करता है, तथा सुख और दुख की अनुभूति मन में ही होती है। शांत तथा उत्तेजित मन ही होता है मन ही मित्र है मन ही आप का शत्रु है यह अति संवेदनशील है  उसके उपर  परिस्थितियों तथा कथा कहानी गीत चलचित्र छाया चित्र का प्रभाव भी देखा गया है मन का क्षणिक आवेश व्यक्ति को पतन के गर्त में धकेल देता है। वहीं शांत तथा   एकाग्र मन आप को उन्नति शीर्ष पर स्थापित कर देता है।एक

तरफ कामुक दृश्य के चल चित्र तथा छाया चित्र उत्तेजना से भर देते हैं, वहीं भावुक दृश्य आपकी आंखों में पानी भर देते हैं इस लिए निरंतर योगाभ्यास तथा विरक्ति पथ पर चलते हुए लोककल्याण में रत रह कर हम अपनी आत्मिक शांति को प्राप्त कर आत्मोउन्नति कर सकते हैं।

ऊं सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया।

© सूबेदार  पांडेय “आत्मानंद”

18–09–21

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #2 – व्यंग्य के मूल तत्त्व ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।  

आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की दूसरी कड़ी में आलेख ‘व्यंग्य के मूल तत्त्व

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #2 – व्यंग्य के मूल तत्त्व ☆ श्री रमेश सैनी ☆ 

[प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ]

साहित्य के परिदृश्य में व्यंग्य एक महत्त्वपूर्ण विधा है। व्यंग्य ही समाज में व्याप्त सभी प्रकार की बुराइयों और परिवर्तन को सामने लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहा है। व्यंग्य की प्रासंगिकता और पठनीयता ने पाठकों के साथ.साथ लेखकों को भी अपनी ओर खींचा है। कवि हो कहानीकार हो .सभी इस विधा में अपना हाथ आजमाना चाहते हैं। उनको लगता है कि इसमें हाथ साफ़ करना सरल है सहज है। इस व्यंग्य विधा में आजमाइश के दौर में कुछ भी लिखा जा रहा है। मुश्किल यह भी है कि तकनीकी सुविधा ने इसे पाठक के पास पहुँचा दिया है। मोबाइल लेपटॉप पर लिखो और वहीं से ईमेल के माध्यम से पत्र.पत्रिकाओं तक पहुँचा दो। सम्पादक भी वहीं से अपने अख़बार में स्पेस दे देता है। कागज पर पढ़ने और कम्प्यूटर पर पढ़ने में अन्तर होता है। लेपटॉप या कम्प्यूटर में पढ़ना एक तकलीफ से गुजरना होता है। इस तकलीफ से बचने के चक्कर में अनेक रचनाएँ लेखक के नाम से अख़बार में जगह बना लेती हैं। यही व्यवस्था कहीं सुविधा देती हैतो कहीं संकट पैदा करती है।

विगत कुछ वर्षों से राजनीतिक प्रभाव की पतली परत पूरे जनमानस पर दिखाई दे रही थी और उसके प्रभाव से मुक्त होने के संकेत नज़र नहीं आ रहें हैं.। पूरा भारतीय मानस और लेखक भी मुक्त नहीं हो पा रहे हैं .वैसे व्यंग्यकारों का प्रिय विषय राजनीति और पुलिस है क्योंकि यहाँ पर विसंगतियाँ और सामाजिक दंश आसानी से दिख जाता है। नज़र को साफ़ करने के लिये काजल या सुरमा नहीं लगाना पड़ता है। कलम उठाओ और लिख डालो. इनकी प्रवृत्ति और प्रकृति पर। करोना काल ने सामाजिक,मानवीय और शासकीय स्तर पर संवेदना के केन्द्र व्याप्त विसंगतियों को उघाड़ कर रख दिया.पिछले दिनों तो ऐसा लग रहा था कि जहाँ देखो वहाँ यह सत्ता के स्तर पर व्यंग्य बगरो बसंत है.लोग भूखे प्यासे बिना संसाधन के सैकड़ों किलोमीटर भाग रहें. लोग मर रहे हैं .शासन और उसकी अव्यवस्था अस्त व्यस्त थी. प्रकृति ने व्यंग्य के लिए सभी प्रकार की विसंगतियां बुराइयां मौजूद थी.बस आपको उसे कैच करना है। लोग  ने लोंका ;कैच किया भी। लोगों ने इस पर लिखा भी. मगर मैं दावे से कह सकता हूँ कि इन व्यंग्यों ने आप को चौंकाया नहीं .आप के मस्तक पर चिन्ता की रेखाएँ नहीं खींचीं और न ही आप बेचैन दिखे और न ही आप विचलित हुए। मैं यह भी दावा करता हूँ कि इस परिदृश्य पर दसियों व्यंग्यकारों की सैकड़ों रचनाएँ मुझे अख़बारों के पन्नों पर दिखीं. जिन्हें लेखकों ने आपके मोबाइल और लेपटॉप के माध्यम से आपको पढ़वाया भी। पर काजू बादाम और किसमिस चिलगोजों के दौर में आपको एकाध रचना छोड़कर सभी स्मृति से गायब हो गयी हैं. जबकि हरिशंकर परसाई की अकाल उत्सव,.अपील का जादू या शरद जोशी की रचनाओं में जीप पर सवार इल्लियां शीर्षक मूल रहा है. जिसमें वे कांग्रेस के तीस वर्षों को याद करते हैं। उसी समय परसाई जी की रचना अपील का जादू.इसी तरह शंकर पुणतांबेकर की रचना एक मंत्री का स्वर्ग लोक में आदि उस दौर के लेखकों की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं. जो आपके स्मृति पटल से मुक्त नहीं हो पा रही हैं। यहाँ भी साहित्य में मुक्ति का संकट है। नया तो स्वीकारना चाह रहे हैं पर पुराना हमारे मस्तिष्क पटल पर छाया हुआ है। पर ऐसा भी नहीं है कि अनेक रचनाएँ हमारे दिमाग के दरवाज़े पर दस्तक दे रही हैं। कुछ दिन पहले प्रेम जनमेजय के दो व्यंग्य ‘बर्फ का पानी’और ‘भ्रष्टाचार के सैनिक’ हमारे दिमाग पर अड्डा जमाये हैं। ‘बर्फ का पानी’ रचना अभी कालजयी रचना की प्रक्रिया से गुजर रही है। क्योंकि कालजयी रचना को प्राकृतिक रूप से पकने में समय लगता है।

किसी भी व्यंग्य रचना के निर्माण की पृष्ठभूमि में लेखक की दृष्टिए संवेदनाएं, सरोकार और वैचारिक प्रतिबद्धता का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। सुप्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने एक जगह कहा था ‘पार्टनर आपकी पॉलिटिक्स क्या है’ यही पॉलिटिक्स लेखक से मनुष्य का निर्माण करती है। यह बात साहित्य के साथ व्यंग्यकारों के लिये फिट बैठती है.क्योंकि व्यंग्यकार अपना राँ मेटेरियल जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियों से उठाता है। इस उठाने की प्रक्रिया में व्यंग्यकार के पास दृष्टि संवेदना और सरोकारों का होना ज़रूरी है। मेरा मानना है. इनकी अनुपस्थिति में व्यंग्य लेखन विकलांग दिखेगा। प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य की बहुत सी परिभाषाएँ की गई हैं पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना है’ व्यंग्य भी जीवन और समाज के परिप्रेक्ष्य में ही सही परिलक्षित होता है। परसाई जी को यों ही बड़ा लेखक नहीं माना जाता है। उनमें तीनों चीज़ें आत्मसात थीं। एक दृष्टि ही है  जो समाज और जीवन में विसंगतियाँ बुराइयाँ आदि प्रवृत्तियों को पकड़ सकती है। दृष्टि को सम्पन्न करने के लिये मनुष्यता के ज़रूरी तत्त्वों को आधार मान वैचारिक प्रतिबद्धता का अनुशासन होना नितांत आवश्यक है। इस सम्बंध में मेरे पास दो उदाहरण हैं . पहला हरिशंकर परसाई की रचनाए ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ और दूसरा डॉ.प्रेम जनमेजय की रचनाए ‘बर्फ का पानी’ बर्फ का पानी रचना पढ़ते ही लेखक की दृष्टि संवेदना और सरोकार का आभास हो जाता है.परन्तु ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ को समझने के लिये इसकी पृष्ठभूमि को समझना ज़रूरी है।

पिछले दिनों इस पर हमारे मित्र हिमांशु राय का संस्मरण भी फेसबुक पर काफ़ी चर्चित रहा। जबलपुर के आमनपुर क्षेत्र में एक काण्ड हुआ. जिसमें पुलिस की अकर्मण्यता के चलते एक मजदूर की मृत्यु हो गयी। पुलिस ने एक झूठा केस लगाकर वामपंथी विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी के एक सदस्य हिमांशु राय के पिता श्री एस एन राय के ऊपर हत्या का आरोप लगाकर गिरफ़्तार कर लिया। वे परसाई जी के अनन्य मित्र थे। वे पूरे घटनाक्रम से भलीभाँति परिचित थे। उस वक़्त मध्यप्रदेश में जनसंघ की सरकार थी। उन पर केस चला। निचली अदालत से सज़ा हुई। वे उच्च न्यायालय से बरी हो गए। जिस पुलिस दरोगा ने यह केस बनाया. वह इस काम में माहिर कुटिल तथा विशेषज्ञ था। इस काम के लिये वह सम्मान से जाना जाता था । बड़े.बड़े अफसर उससे झूठे केस बनाने में उसकी मदद लिया करते थे। मातादीन का चरित्र पुलिस का सच्चा चरित्र था। मात्र बीस प्रतिशत की फेंटेसी और अस्सी प्रतिशत की सच्चाई से यह कालजयी रचना बन गयी। मगर इस रचना के निर्माण में दृष्टि संवेदना और सरोकार तत्त्व विशेष रोल का निर्वाह कर रहे थे। इस कारण यह रचना क्लासिक और कालजयी है। परसाई जी ने पुलिस के प्रपंच को देखा महसूस किया तथा उसे पाखण्ड का जन सरोकारों के तहत उजागर किया।

व्यंग्य को परखने और रचने के लिये दृष्टि होना चाहिये और यह दृष्टि व्यापक अध्ययन और अनुभव से विकसित होती है। यही संकेत देती है कि आपको किसके पक्ष में खड़े होना है . तय है शोषित के पक्ष में। दृष्टि विकसित न होने पर व्यंग्यकार हानि.लाभ का गुणा भाग करने लगता है। और इस गुणा भाग से उपजने वाले व्यंग्य में भौंथरापन आ जाता है। वह जीवन और समाज की समस्या से भागने लगता है। विसंगतियों  विडम्बनाओं भ्रष्टाचार रूढ़िवादिता आदि से किनारा काट उन चीज़ों पर केन्द्रित हो जाता है जिनके होने और न होने से व्यक्ति का जीवन प्रभावित नहीं होता।

व्यंग्यकार की संवेदना ही जीवन के रचाव को पढ़ने में समर्थ होती है। गरीब मजदूर शोषित स्त्री वर्ग की निरीहता कमज़ोरी दर्द को संवेदन ही महसूस करती है। परसाई की रचना अकाल उत्सव शरद जोशी की ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ अनेक रचनाएँ बनती हैं।

मकान टपकने वाली रचना पर परसाई जी लिखते हैं. मैं समझ गया कि ज्यों.ज्यों देश में इंजीनियरिंग कॉलेज़ खुलते जा रहे हैं त्यों.त्यों कच्चे पुल और तिड़कने वाली वाली इमारतें क्यों अधिक बन रही हैंए और जब हर ज़िले में कॉलेज हो जायेगा तब हम कहाँ रहेंगे

व्यंग्यकारों के पक्ष में एक बात और सामने दिखती है कि वह विकृतियों संगतियों से मुँह नहीं चुरा सकता है. भाग नहीं सकता है। यदि वह भागता है या भागने का प्रयत्न करता है. तो पक्का है कि वह गुणा भाग लाभ हानि के चक्कर में पड़ गया है। वह व्यंग्यकार कहलाने का हक़ भी खो देता है। यदि उसकी संवेदनाएँ उसके सरोकार उसकी प्रतिबद्धता भागने से रोकने का कार्य करते हैं. तभी व्यंग्यकार में मनुष्य के दर्शन होते हैं। व्यंग्यकार का भागना बहुत जटिल विचारणीय चिंता करने काम ही बेईमानी भरा  है. भागने की संभावना तलाशना ही व्यंग्यकार का कमीनापन है और उसे व्यंग्य लिखना छोड़ कर प्रेम कविताए कहानी लिखना शुरू कर देना चाहिये। क्योंकि समाज की समस्याओं से बचने और उपदेश देने की गुंजाइश यहाँ अधिक होती है।

व्यंग्यकार को संवेदनशील होने के साथ कठोर भी होना पड़ता है। उस माँ की तरह संवेदनशील जो अपनी संतान को लाड़.प्यार तो करती है और अच्छा मनुष्य बनाने के लिये कठोर दण्ड भी देती है। इस चीज़ को समझना सरल नहीं है। व्यंग्यकार की कठोरता सामाजिक और वैयक्तिक अनुशासन बनाये रखती है। वर्त्तमान समय के युवा आलोचक रमेश तिवारी का कहना है कि व्यंग्य लिखना असहमत होना है। व्यंग्य सहमति या संगति में नहीं लिखा जा सकता है। इसके लिये असहमति और विसंगति अनिवार्य है। इसे पढ़कर याद आता हैए असहमति लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है। लोकतंत्र का प्राण है,यानी व्यंग्य लिखना मात्र असहमत होना नहीं. बल्कि यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होना भी है। जिस समाज में जितना व्यंग्य और व्यंग्यकार की जितनी उपलब्धता होगी वह लोकतंत्र उतना ही मजबूत और दीर्घकालीन भी होगा। यह सब व्यंग्यकार में उपलब्ध दृष्टि संवेदना और सरोकारों से ही आता है। सरोकारों में दृढ़ता व्यंग्यकार को शोषित.पीड़ित वर्ग के प्रति जागरूक और प्रतिबद्ध भी बनाती है। व्यंग्य.रचनाकार के सरोकार समाज में ग़रीब दलित शोषित की रूढ़िवादिता भ्रष्टाचार और कूपमंडूकता के प्रति सजगए सतर्क और समर्पित भी बनाती है तथा जीवन को निकट से देखने.पढ़ने की दृष्टि भी विकसित करते हैं।

यहाँ पर मैं एक उदाहरण भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ . जबलपुर में सन् 1961 में एक साम्प्रदायिक दंगा हुआ था. जो बढ़ता हुआ आसपास के ज़िलों तक फैल गया था। दंगा चरम स्थिति में था। उस वक़्त शहर का हर वर्ग परसाई को जानने लगा था। तब परसाई जी और उनके मित्र श्री हनुमान वर्मा मायाराम सुरजन महेन्द्र वाजपेयी रामेश्वर प्रसाद गुरु जी आदि दंगा क्षेत्र में जाते रहे और लोगों को समझाते रहे। उनकी बात का गहरा असर हुआ और दंगा शीघ्र समाप्त करने में प्रशासन को उनसे सार्थक मदद मिली। यह समाज के रचनाकार और ज़िम्मेदार लोगों के सरोकार ही थे जो खतरे की परवाह न करते हुए उन्हें दंगाग्रस्त क्षेत्रों में ले गये।

यहाँ पर अपनी बात ख़त्म करने के पहले या भी जोड़ना चाहूँगा कि व्यंग्य लिखने के पूर्व लेखक को मानवीय संवेदनाए शोषण आदि के कारणों को जानने पढ़ने के लिये उसकी भाषा व्यंग्यकार को पढ़ना आना चाहिये।

हरीश पाठक ने अपनी बात रखते हुए कहा था कि व्यंग्यकार को अपनी बात लिखने के लिये व्यंग्य की भाषा और उसके शिल्प को उसके अनुरूप रचाव करना भी आना चाहिए. क्योंकि व्यंग्य की भाषा और शिल्प अन्य विधाओं से भिन्न होता है। अतः यदि इस बात को नज़र अंदाज़ किया गया तो व्यंग्य सपाट हो जायेगा।

और अंत में एक छोटी पर मोटी सी बात है कि जीवन के मूल्य तत्त्व ही व्यंग्य के मूल तत्त्व हैं।

© श्री रमेश सैनी 

सम्पर्क  : 245/ए, एफ.सी.आई. लाइन, त्रिमूर्ति नगर, दमोह नाका, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 482 002

मोबा. 8319856044  9825866402

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 46☆ दोहे ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा  रचित भावप्रवण  “दोहे । हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। ) 

☆ काव्य धारा # 46☆ दोहे  ☆

जग में शांति समृद्धि हो, हो सबका कल्याण।

मन में पावन प्रेम हो, यह वर दो भगवान।।

 

इस जग के हर देश मे, हो शुभ ममता भाव।

पावन प्रिय संवाद का, हो न कोई अभाव।।

 

युग युग लडी लडाईयाँ, ली बहुतो की जान।

पिछली अटपट चलन तज, मानव बने महान।।

 

जहाँ  बैर वहाँ नाश है, दुख का गहन प्रभाव।

जहाँ  प्रेम वहा शांति है, आपस मे सदभाव।।

 

सही सोच सदवृत्ति से, मन बनता बलवान।

मिटते सबके कष्ट सब, होता शुभ कल्याण।।

 

पडी हुई हर गांठ की, दवा है मन की बात।

होता ज्ञान प्रकाश जब, कटती काली रात।।

 

मन है जिसका ड्रायवर, यह तन है वह कार।

अगर  ड्रायवर शराबी, खतरो की भरमार।।

 

मानव मूल्यों का सतत, होता जाता ह्रास।

इससे उठता जा रहा, आपस का विश्वास।।

 

मन पवित्र तो दिखता है, वातावरण पवित्र।

नहीं कही कोई शत्रु, तब हर जन दिखता मित्र।।

 

मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।

अपने मन को जीतकर, ही संभव उद्धार।।

 

पावन मन से ही उपजता, जीवन मे आनंद।

निर्मल मन को ही सदा, मिले सच्चिदानंद।।

 

शांत शुद्ध मन में नही, उठते कोई विकार।

मन की सात्विक वृत्ति हित, धर्म सबल आधार।।

 

बुद्धि तो पैनी हुई, पर धुली मन में दुष्टता।

इससे भटके लोग जग के, भूल गये है शिष्टता।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

[email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – “मैं” की यात्रा का पथिक…1 ☆ श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  साप्ताहिकआलेख श्रृंखला की प्रथम कड़ी  “मैं” की यात्रा का पथिक…1”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – “मैं” की यात्रा का पथिक…1 ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

अन्य सभी समूहों की तरह यह समूह भी बौद्धिक, भावुक, भौतिक, आध्यात्मिक में से किसी एक या दो मौलिक प्रवृत्तियों से प्रधानतः परिचालित मनुष्यों का समूह है। यह लेख आध्यात्मिक रुझान के व्यक्तियों के लिए महत्व का हो सकता है। धार्मिकता और आध्यात्मिकता में बहुत अंतर होता है। आध्यात्मिक ज्ञान की खोज आत्मचिंतन से आरम्भ होकर प्रज्ञा पर जाकर खुलती है। जिसमें बाहरी अवयवों को छोड़ना होता है। यानि मोह की सत्ता को नकारना। धन, व्यक्ति, स्थान, ईश्वर मोह से बाँधते हैं। पत्नी, संतान, भौतिक वस्तुएँ मुझसे अलग हैं। यहाँ तक कि मेरे अंदर पार्थिव देह भी मुझसे विलग है। “मैं” नितांत अकेला है, जैसा जन्म के समय था, जैसा मृत्यु के समय होगा।

इन्हें त्यागकर गृह त्यागने वाला सन्यासी होता है। जो घर में रहकर ही अभ्यास करता है वह गृहस्थ सन्यासी।

हम सब उम्र के जिस पड़ाव पर हैं उसमें “मैं की यात्रा” पर चिंतन-मनन आनंददायक और बहुत राहत देने वाला अभ्यास हो सकता है। कभी हमने काग़ज़-पेन लेकर शांति से बैठकर सोचा ही नहीं कि जन्म से लेकर अब तक “मैं की यात्रा” किन पड़ावों से होकर गुजरी है। यह यात्रा नितांत अकेली है। कोई संगी-साथी नहीं। मैं और मेरी चेतना, परमात्मा से अलग भी और जुड़ी भी।

“मैं की यात्रा” के चार आयाम होते हैं- मेरी बौद्धिक यात्रा, मेरी भावनात्मक यात्रा, मेरी दैहिक यात्रा और मेरी आध्यात्मिक यात्रा। हम क्यों न इन चार यात्राओं पर चिंतन-मनन करें। इसके दो लाभ हो सकते हैं-

एक-यादों के रेचन से राहत महसूस होगी,

दूसरा- वर्तमान से आगे आनंददायक समय गुज़ारने के बारे में हमारा नज़रिया खुलेगा।

हो सकता है कुछ लोगों को यह महज़ बकवास लगे लेकिन पिछले छै महीनों में मैंने इस धारणा पर काम किया है। उसका सबसे बड़ा फ़ायदा हुआ कि “मैं क्या चाहता हूँ” यह अच्छी तरह से स्पष्ट होने लगा। मेरा आनंददायक समय का दायरा बढ़ने लगा है। समय आनंद से गुजरे, इस उम्र में इससे बड़ा वरदान कुछ और नहीं हो सकता।

महान दार्शनिक बर्ट्रेन्ड रसल की पुस्तक “Conquest of Happiness” में बताया गया है कि “अक्सर हम अपने से बात ही नहीं करते हैं। दूसरों से बातें करके अपना मापदंड तय करके समय गुज़ारते रहते हैं।”

भारतीय संदर्भ में कहें तो “आत्म चिंतन” नहीं करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हमारा नियंत्रण दूसरों के जैसे अख़बार, देश, समाज, रिश्तेदार, मीडिया, के हाथों में रहता हैं। हमारी खुद की चाहत नज़रअन्दाज़ होती जाती है। हम बेवजह परेशान होते रहते हैं।

जीवन का समय या तो यूँ ही गुजरता है, या चिंता व्याधि से बीतता है या इंद्रिय सुख-दुःख की अल्टा पलटी में गुजरता है। जीवन का आनंद और उस आनंद से मिलती राहत की अनुभूति कहीं गुम हो जाती है क्योंकि हम क्या चाहते हैं हमें इसका पता ही नहीं चलता।

खुद से बात के लिए हमें सबसे अलग होना होता है। आत्म तत्व को देह तत्व से विलग करना होता है। तब “मैं की यात्रा” शुरू होती है। सोचिए समझिए ठीक लगे तो अभ्यास कीजिए अन्यथा बकवास समझ कर दुनियावी बीन पर नाचते रहिए।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #58 – सेवाभाव और संस्कार ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।” )

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #58 –  सेवाभाव और संस्कार ☆ श्री आशीष कुमार

एक संत ने एक विश्व- विद्यालय का आरंभ किया, इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण करना था जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।

एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया, जिसका विषय था – “जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।”

निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई।

किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि- हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं, जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों।

वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।

इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए।

आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।

यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे।

संत ने सबको शांत कराते हुए बोले:- ‘प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था।

दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।

इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था।

आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा।

यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया।

सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।

जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।’

सदैव प्रसन्न रहिये।

जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 72 – किती उगा झुरायचे…? ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 72 – किती उगा झुरायचे…? ☆

(वृत्त – देवप्रिया, लगावली –गालगाल गालगाल गालगाल गालगा)

आठवात गुंतुनी,  किती  उगा झुरायचे

श्रावणातल्या सरी, तरी मनी  जळायचे….!

 

स्वार्थ साधण्यास गोड, बोलतात माणसे

प्रेम शोधुनी तयात का उगा रडायचे….!

 

मीच भक्ष जाहले , अनेक रंग पाहुनी

रंग बदलणे तुझे,  कधी मला कळायचे….!

 

कृष्ण भेटतो कुणास,द्रौपदीसमान त्या

तू स्वतःस रक्षण्या, स्वतःस ओळखायचे…!

 

पंख लाभता नवीन, पाखरे उडायची

प्रेत आठवातले तुला, पुन्हा छळायचे….!

 

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 99 ☆ स्वार्थ-नि:स्वार्थ ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख स्वार्थ-नि:स्वार्थ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 99 ☆

☆ स्वार्थ-नि:स्वार्थ ☆

‘बिना स्वार्थ आप किसी का भला करके देखिए; आपकी तमाम उलझनें ऊपर वाला सुलझा देगा।’ इस संसार में जो भी आप करते हैं; लौटकर आपके पास आता है। इसलिए सदैव अच्छे कर्म करने की सलाह दी जाती है। परन्तु आजकल हर इंसान स्वार्थी हो गया है। वह अपने व अपने परिवार से इतर सोचता ही नहीं तथा परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक ही सीमित नहीं रहे; पति-पत्नी तक सिमट कर रह गये हैं। उनके अहम् परस्पर टकराते हैं, जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ की बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने व प्रतिशोध लेने हेतु कटघरे में खड़ा करने का भरसक प्रयास करते हैं। विवाह नामक संस्था चरमरा रही है और युवा पीढ़ी ‘तू नहीं, और सही’ में विश्वास करने लगी हैं, जिसका मूल कारण है अत्यधिक व्यस्तता। वैसे तो लड़के आजकल विवाह के नाम से भी कतराने लगे हैं, क्योंकि लड़कियों की बढ़ती लालसा व आकांक्षाओं के कारण वे दहेज के घिनौने इल्ज़ाम लगा पूरे परिवार को जेल की सीखचों के पीछे पहुंचाने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं। कई बार तो वे अपने माता-पिता की पैसे की बढ़ती हवस के कारण वह सब करने को विवश होती हैं।

स्वार्थ रक्तबीज की भांति समाज में सुरसा के मुख की भांति बढ़ता चला जा रहा है और समाज की जड़ों को खोखला कर रहा है। इसका मूल कारण है हमारी बढ़ती हुई आकांक्षाएं, जिन की पूर्ति हेतु मानव उचित-अनुचित के भेद को नकार देता है। सिसरो के मतानुसार ‘इच्छा की प्यास कभी नहीं बझती, ना पूर्ण रूप से संतुष्ट होती है और उसका पेट भी आज तक कोई नहीं भर पाया।’ हमारी इच्छाएं ही समस्याओं के रूप में मुंह बाये खड़ी रहती हैं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है तथा समस्याओं का यह सिलसिला जीवन के समानांतर सतत् रूप से चलता रहता है और मानव आजीवन इनके अंत होने की प्रतीक्षा करता रहता है; उनसे लड़ता रहता है। परंतु जब वह समस्या का सामना करने पर स्वयं को पराजित व असमर्थ अनुभव करता है, तो नैराश्य भाव का जन्म होता है। ऐसी स्थिति में विवेक को जाग्रत करने की आवश्यकता होती है तथा समस्याओं को जीवन का अपरिहार्य अंग मानकर चलना ही वास्तव में जीवन है।

समस्याएं जीवन की दशा व दिशा को तय करती हैं और वे तो जीवन भर बनी रहती है। सो! उनके बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखना कारग़र है। वास्तव में कुछ समस्याएं समय के अनुसार स्वयं समाप्त हो जाती हैं; कुछ को मानव अपने प्रयास से हल कर लेता है और कुछ समस्याएं कोशिश करने के बाद भी हल नहीं होती। ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ देना ही बेहतर है। उचित समय पर वे स्वत: समाप्त हो जाती हैं। इसलिए उनके बारे में सोचो मत और जीवन का आनंद लो। चैन की नींद सो जाओ; यथासमय उनका समाधान अवश्य निकल आएगा। इस संदर्भ में मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहती हूं कि जब तक हृदय में स्वार्थ भाव विद्यमान रहेगा; आप निश्चिंत जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते और कामना रूपी भंवर से कभी बाहर नहीं आ सकते। स्वार्थ व आत्मकेंद्रिता दोनों पर्यायवाची हैं। जो व्यक्ति केवल अपने सुखों के बारे में सोचता है, कभी दूसरे का हित नहीं कर सकता और उस व्यूह से मुक्त नहीं हो पाता। परंतु जो सुख देने में है, वह पाने में नहीं। इसलिए कहा जाता है कि जब आपका एक हाथ दान देने को उठे, तो दूसरे हाथ को उसकी खबर नहीं होनी चाहिए। ‘नेकी कर और कुएं में डाल’ यह सार्थक संदेश है, जिसका अनुसरण प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। यह प्रकृति का नियम है कि आप जितने बीज धरती में रोपते हैं; वे कई गुना होकर फसल के रूप में आपके पास आते हैं। इस प्रकार नि:स्वार्थ भाव से किए गये कर्म असंख्य दुआओं के रूप में आपकी झोली में आते हैं। सो! परमात्मा स्वयं सभी समस्याओं व उलझनों को सुलझा देता है। इसलिए हमें समीक्षा नहीं, प्रतीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानता है तथा वही करता है; जो हमारे लिए बेहतर होता है।

‘अच्छे विचारों को यदि आचरण में न लाया जाए, तो वे सपनों से अधिक कुछ नहीं हैं’ एमर्सन की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। स्वीकारोक्ति अथवा प्रायश्चित सर्वोत्तम गुण है। हमें अपने दुष्कर्मों को  मात्र स्वीकारना ही नहीं चाहिए; प्रायश्चित करते हुए जीवन में दोबारा ना करने का मन बनाना चाहिए। वाल्मीकि जी के मतानुसार संत दूसरों को दु:ख से बचाने के लिए कष्ट सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने के लिए।’ सो! जिस व्यक्ति का आचरण अच्छा होता है, उसका तन व मन दोनों सुंदर होते हैं और वे संसार में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

दूसरी ओर दुष्ट लोग दूसरों को कष्ट में डालकर सुक़ून पाते हैं। परंतु हमें उनके सम्मुख झुकना अथवा पराजय स्वीकार नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वीर पुरुष युद्ध के मैदान को पीठ दिखा कर नहीं भागते, बल्कि सीने पर गोली खाकर अपनी वीरता का प्रमाण देते हैं। सो! मानव को हर विषम परिस्थिति का सामना साहस-पूर्वक करना चाहिए। ‘चलना ही ज़िंदगी है और निष्काम कर्म का फल सदैव मीठा होता है। ‘सहज पके, सो मीठा होय’ और ‘ऋतु आय फल होय’ पंक्तियां उक्त भाव की पोषक हैं। वैसे ‘हमारी वर्तमान प्रवृत्तियां हमारे पिछले विचार- पूर्वक किए गए कर्मों का परिणाम होती हैं।’ स्वामी विवेकानंद जन्म-जन्मांतर के सिद्धांत में विश्वास रखते थे। सो! झूठ आत्मा के खेत में जंगली घास की तरह है। अगर उसे वक्त रहते उखाड़ न फेंका जाए, तो वह सारे खेत में फैल जाएगी और अच्छे बीज उगने की जगह भी ना रहेगी। इसलिए कहा जाता है कि बुराई को प्रारंभ में ही दबा दें। यदि आपने तनिक भी ढील छोड़ी, तो वह खरपतवार की भांति बढ़ती रहेगी और आपको उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देगी; जहां से लौटने का कोई मार्ग शेष नहीं बचेगा।

प्यार व सम्मान दो ऐसे तोहफ़े हैं, अगर देने लग जाओ तो बेज़ुबान भी झुक जाते हैं। सो! लफ़्ज़ों को सदैव चख कर व शब्द संभाल कर बोलिए। शब्द के हाथ ना पांव/ एक शब्द करे औषधि/  एक शब्द करे घाव।’ कबीर जी की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है। शब्द यदि सार्थक हैं, तो प्राणवायु की तरह आपके हृदय को ऊर्जस्वित कर सकते हैं। यदि आप अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो दूसरों के हृदय को घायल भी कर सकते हैं। इसलिए सदैव मधुर वाणी बोलिए। यह आप्त मन में आशा का संचरण करती है। निगाहें भी व्यक्ति को घायल करने का सामर्थ्य रखती हैं। दूसरी ओर जब कोई अनदेखा कर देता है, तो बहुत चोट लगती है। अक्सर रिश्ते इसलिए नहीं सुलझ पाते, क्योंकि लोग ग़ैरों की बातों में आकर अपनों से उलझ जाते हैं और जब कोई अपना दूर चला जाता है, तो बहुत तकलीफ़ होती है। परंतु जब कोई अपना पास रहकर भी दूरियां बना लेता है, तो उससे भी अधिक तकलीफ़ होती है। इसलिए जो जैसा है; उसी रूप में स्वीकारें; संबंध लंबे समय तक बने रहेंगे। अपने दिल में जो है; उसे कहने का साहस और दूसरे के दिल में जो है; उसे समझने की कला यदि आप में है, तो रिश्ते टूटेंगे नहीं। हां इसके लिए आवश्यकता है कि आप वॉकिंग डिस्टेंस भले रखें, टॉकिंग डिस्टेंस कभी मत रखें, क्योंकि ‘ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुक़ाम/ वे फिर नहीं आते।’ इसलिए किसी से अपेक्षा मत करें, बल्कि यह भाव मन में रहे कि हमने किसी के लिए किया क्या है? ‘सो! जीवन में देना सीखें; केवल तेरा ही तेरा का जाप करें– जीवन में आपको कभी कोई अभाव नहीं खलेगा।’

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

#239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 51 ☆ गरीबों का विकास ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अत्यंत विचारणीय  एवं सार्थक आलेख  “गरीबों का विकास”.)

☆ किसलय की कलम से # 51 ☆

☆ गरीबों का विकास ☆

आज से साठ-सत्तर वर्ष पूर्व तक “दो जून की रोटी मिलना” समाज में एक संतुष्टिदायक मुहावरा माना जाता था। घर का मुखिया दिहाड़ी पर जाता था और पूरे घर के उदर-पोषण की जरूरतें पूरी कर लेता था। पूरा परिवार साधारण जीवनशैली से जीवन यापन कर लेता था। शनैःशनैः शिक्षा, प्रगति, फैशन, नई जरूरतें व महत्त्वाकांक्षाओं के चलते श्रमिक समुदाय इन सब के पीछे भागने लगा। मनोरंजन, व्यसन, सुख-सुविधाओं के संसाधन जुटाने को प्राथमिकता देने लगा। जरूरी जीवनोपयोगी आवश्यकताओं के बजाय बाह्याडंबर व गैर जरूरी चीजों हेतु कर्ज तक लेने लगा, तब दैनिक मजदूरी से उसकी ये सब जरूरतें पूरी होना भला कैसे संभव होगा। पहले घर की पत्नी थोड़ा-थोड़ा करके अच्छी खासी रकम बचत के रूप में अपने पास सुरक्षित रख लिया करती थी, जो घर की जरूरतों के अतिरिक्त घर जमीन, जेवर खरीदने, शादी, त्योहार व तीर्थाटन करने में बड़े काम आते थे।  इन परिवारों की बचत उनके सुख-दुख व भविष्य के लिए निश्चिंतता का मुख्य कारक हुआ करते थे। अनावश्यक खर्च, दिखावे, व ‘संतोषी परम सुखी’ की धारणा इनके जीवन को सुखमय बनाए रखने में बड़ी सहायक होती थी। परिवार के अन्य सदस्यों की कमाई और संतानों के नौकरी पेशा होने से परिवारों का उत्तरोत्तर संपन्न होना अक्सर दिखाई देता था।

आज की परिस्थितियाँ इसके एकदम विपरीत हो चली हैं।  हम भले ही गले तक कर्ज में डूब जाएँ लेकिन हमारे शौक व सुख सुविधाओं में कोई कमी नहीं होना चाहिए। वहीं जब आपके द्वारा लिए गए कर्ज के तगादे किए जाते हैं, आपके कर्ज न चुकाने पर धमकियाँ और गालियाँ मिलती हैं। सरेआम बेइज्जती होती है, तब आपका और आपके परिवार का क्या हाल होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। गरीब तबके की महत्वाकांक्षा एवं बाह्याडंबर उनको विकास नहीं विनाश के मार्ग पर ले जाता है।

चिंतन करने पर स्वयं ज्ञात हो जाएगा कि आज का गरीब तबका प्रायः गरीब ही रहता है। इस तबके के लोग न चाहते हुए भी अपनी कमाई को झूठी प्रतिष्ठा के मोह में उन वस्तुओं को क्रय करने और उन सुविधाओं को भोगने में खर्च करते रहते हैं जिनके न रहने पर भी वे छोटी-मोटी परेशानियाँ सहकर सुखी रह सकते हैं। अपनी इन प्रवृत्तियों के कारण ही एक दिन वह उपरोक्त असहज स्थिति में पहुँच जाता है। आज हम देख रहे हैं कि दुनिया की समस्त सुख-सुविधाएँ होने पर भी कुछ लोग उनका उपभोग नहीं कर पाते। कार-हवाई जहाज होने पर भी स्वास्थ्य के  लिए लोग घंटों पैदल चलते हैं। काजू-बादाम और छप्पनभोग उपलब्ध होने पर भी लोग भुने चने और कच्ची सब्जियों का सेवन करने बाध्य होते हैं, फिर भी क्यों आज के लोग इतने ऐशोआराम और फिजूलखर्ची में अपना और अपने परिवार का चैन हराम करने पर तुले रहते हैं।

आज जब शिक्षा का प्रतिशत बढ़ रहा। रोजगार, नौकरियाँ, धंधों की कमी नहीं है, तब हम पहले सुख-समृद्धि को प्राप्त करने हेतु कटिबद्ध क्यों नहीं हो पाते। कुछ करने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। यदि आपको सुख-समृद्धि की चाह है तो पहले आपको शिक्षित होना होगा, परिश्रम करना होगा, प्रयास करने होंगे। कहा भी गया है कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ इसलिए हमें अपेक्षाएँ और महत्त्वाकांक्षाएँ नहीं परिश्रम, लगन व प्रयास से अवसर तलाशने होंगे, एक-एक पल को सार्थक बनाने का संकल्प लेना होगा। समय के साथ चलने वाले ही आगे बढ़ते हैं, वैसे भी आज की परिस्थितियों में आपको पीछे मुड़कर कौन देखने वाला है।

गरीबों का विकास तभी संभव है जब वे अपना समय और अपनी कमाई को सत्कर्म तथा सत्मार्ग में लगाएँगे। समाज में लोग सत्कर्म, परिश्रम एवं सकारात्मक सोच से ही आगे बढ़ सकते हैं। केवल दो वक्त खाना खाकर तो पशु-पक्षी भी जीवन जी लेते हैं। मानव जीवन की सार्थकता तभी है जब हम सादगी और परमार्थ के मार्ग पर चलते हुए अपना परलोक सँवारें।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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