हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #99 – जब से मेडल गले में पहनाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा रात  का चौकीदार” महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता  “जब से मेडल गले में पहनाया…” । )

☆  तन्मय साहित्य  # 99 ☆

☆ जब से मेडल गले में पहनाया… ☆

वो बात साफ साफ कहता है   

जैसे नदिया का नीर बहता है।

 

अड़चनें राह में आये जितनी

मुस्कुराते हुए वो सहता है।

 

अपने दुख दर्द यूँ सहजता से

हर किसी से नहीं वो कहता है।

 

हर समय सोच के समन्दर में

डूबकर खुद में मगन रहता है।

 

बसन्त में बसन्त सा रहता

पतझड़ों में भी सदा महका है।

 

इतनी गहराईयों में रहकर भी

पारदर्शी सहज सतह सा है।

 

शीत से काँपती हवाओं में

जेठ सा रैन-दिवस दहता है।

 

जब से मैडल गले में पहनाया

उसी पल से वो शख्स बहका है।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ #81 – 3 – पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है।आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के जीवन के श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े अविस्मरणीय एवं प्रेरक संस्मरण/प्रसंग “पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े ”)

☆ जीवन यात्रा #81 – 3 – पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े ☆ 

(मेरी आगामी पुस्तक घुमक्कड़ के अध्याय पन्ना और हटा की सुनहरी यादें का एक अंश)

आज जन्माष्टमी है बाल गोपाल , कृष्ण कन्हैया , गिरधर नागर, नन्द किशोर यशोदानंदन, देवकीसुत का जन्मोत्सव का दिन I आगामी छह दिनों तक कभी घर- घर सजाई जाने वाली झाँकी और बालमुकुन्द का झूला तो अब कुछ घरों में  सिमट कर रह गया है I पर बृज भूमि अगर कृष्प भक्णि के लिए प्रसिद्द  है तो भैया हमाओ  बुंदेलखंड भी कछु कम नईया I आज से मैं आपको पन्ना  के जुगल किशोर के दर्शन आगामी छह दिनों तक रोज कराउंगा I यह अंश है मेरी आगामी पुस्तक  घुमक्कड़ के

पन्ना शहर के मध्य में स्थित  जुगल किशोर मंदिर आसपास के क्षेत्रों के लोगों  की धार्मिक आस्था व श्रद्धा का केंद्र है I यह प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर उत्तर मध्य कालीन राजपुताना एवं बुन्देली वास्तुकला में निर्मित है I मंदिर के गर्भगृह  में राधा  कृष्ण की भव्य एवं मनोहारी  प्रतिमा स्थापित है जिसे ओरछा से महाराजा छत्रसाल पन्ना लाये थे I बाद में मंदिर का जीर्णोद्धार राजा हिन्दुपत ने सन 1756 में करवाया I राधा कृष्ण की जुगल जोड़ी का प्रतिदिन होने वाला श्रृंगार बुन्देली पहनावे एवं साज-सज्जा के अनुरूप होता है I गर्भगृह के आगे जगमोहन भोग मंडप और विशाल नट मंडप निर्मित है I नट मंडप में छत को सहारा देने के लिए दोनों तरफ गोल खम्भे हैं I  गर्भगृह के उपार भव्य गुम्बज शिखर और चारो कोनों पर चार छोटी छोटी मडिया मंदिर की शोभा में चार चाँद लगा देती हैं I मंदिर का प्रवेश द्वार विशाल है और उसके ऊपर राजपूताना शैली में तोरण द्वार बना हुआ है ।

श्री जुगल किशोर मंदिर के बाहर से ही श्री कृष्ण जी और राधा जी की सुंदर प्रतिमा के दर्शन  होते हैं । मंदिर परिसर में ही हनुमान एवं शिव  जी को समर्पित मंदिर बने हुए हैं । मंदिर के अंदर राधा कृष्ण की  सुंदर सजी हुई भव्य मूर्ति  अपने आकर्षक श्रंगार के कारण श्रद्धालुओं को सहज ही मोह लेती है I भगवान  कृष्ण के हाथ में मुरली है, उनकी मुरली के बारे में कहा जाता है, कि इस मुरली में हीरे जड़े हुए हैं। श्री कृष्ण जी की मूर्ति यहां पर श्याम रंग की है और राधा जी की मूर्ति गौर वर्ण की है। मंदिर में सजावट हेतु लगाए गए झूमर और सुंदर तैल चित्र सहज ही आकर्षित करते हैं I ऐसी ही बाल कृष्ण की लगभग सौ वर्ष पुरानी एक  पेंटिंग हमारे दादाजी की स्मृति में जुगल किशोर जी के मंदिर को फरवरी 1956 में हमारे परिवार ने समर्पित की थी । 

पन्ना शहर के मध्य में स्थित  जुगल किशोर मंदिर आसपास के क्षेत्रों के लोगों  की धार्मिक आस्था व श्रद्धा का केंद्र है I यह प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर उत्तर मध्य कालीन राजपुताना एवं बुन्देली वास्तुकला में निर्मित है I मंदिर के गर्भगृह  में राधा  कृष्ण की भव्य एवं मनोहारी  प्रतिमा स्थापित है जिसे ओरछा से महाराजा छत्रसाल पन्ना लाये थे I बाद में मंदिर का जीर्णोद्धार राजा हिन्दुपत ने सन 1756 में करवाया I राधा कृष्ण की जुगल जोड़ी का प्रतिदिन होने वाला श्रृंगार बुन्देली पहनावे एवं साज-सज्जा के अनुरूप होता है I गर्भगृह के आगे जगमोहन भोग मंडप और विशाल नट मंडप निर्मित है I नट मंडप में छत को सहारा देने के लिए दोनों तरफ गोल खम्भे हैं I  गर्भगृह के उपार भव्य गुम्बज शिखर और चारो कोनों पर चार छोटी छोटी मडिया मंदिर की शोभा में चार चाँद लगा देती हैं I मंदिर का प्रवेश द्वार विशाल है और उसके ऊपर राजपूताना शैली में तोरण द्वार बना हुआ है ।

श्री जुगल किशोर मंदिर के बाहर से ही श्री कृष्ण जी और राधा जी की सुंदर प्रतिमा के दर्शन  होते हैं । मंदिर परिसर में ही हनुमान एवं शिव  जी को समर्पित मंदिर बने हुए हैं। मंदिर के अंदर राधा कृष्ण की  सुंदर सजी हुई भव्य मूर्ति  अपने आकर्षक श्रंगार के कारण श्रद्धालुओं को सहज ही मोह लेती है I भगवान  कृष्ण के हाथ में मुरली है, उनकी मुरली के बारे में कहा जाता है, कि इस मुरली में हीरे जड़े हुए हैं। श्री कृष्ण जी की मूर्ति यहां पर श्याम रंग की है और राधा जी की मूर्ति गौर वर्ण की है। मंदिर में सजावट हेतु लगाए गए झूमर और सुंदर तैल चित्र सहज ही आकर्षित करते हैं I ऐसी ही बाल कृष्ण की लगभग सौ वर्ष पुरानी एक  पेंटिंग हमारे दादाजी की स्मृति में जुगल किशोर जी के मंदिर को फरवरी 1956 में हमारे परिवार ने समर्पित की थी ।

मंदिर के पुजारी रोज सुबह 5 बजे जुगलकिशोर को जगाकर उनकी मंगल आरती करते हैं , फिर कनक कटोरा आरती का आयोजन होता है। इसके बाद पट बंद कर दिए जाते हैं। दोपहर 12 बजे फिर मंदिर के द्वार खोले जाते हैं । ढाई बजे जब पूरे शहर के लोग भोजन कर चुके होते हैं, तब भगवान को भोग लगाया जाता है। यह भोग बहुत ही सात्विक वातावरण में पकाया जाता है I मैंने भी एक बार 2010 में मुंबई से पन्ना आकर थाल भोग अर्पित किया था I मैंने मंदिर के पुजारी से इतने विलम्ब से भगवान को दोपहर का भोजन अर्पित करने का कारण पूछ लिया I पंडितजी के अनुसार आमतौर पर मंदिरों में पहले भगवान को भोग लगता है, फिर भक्तों को प्रसाद मिलता है, लेकिन पन्ना के जुगलकिशोर इतने भक्तवत्सल माने जाते हैं कि वे  पहले अपने भक्तों को पेट पूजा का मौका देते हैं, उसके बाद ही भोग ग्रहण करते हैं। यही वजह है कि यहां दोपहर के भोजन की आरती 2.30 बजे और रात्रि के भोजन की आरती रात 10.30 बजे होती है । मैं भी पुजारी के इस उत्तर को सुनकर भावविभोर हो गया I इस  अनूठी परंपरा और उससे जुड़ी भावना पन्ना वासियों की इस आस्था को और अधिक बल प्रदान करती है कि जुगल किशोरजी अपने राज्य में किसी को भी भूखा नहीं सोने देते । पन्ना के सभी मंदिरों के पट प्राय: रात्रि नौ बजे बंद हो जाते हैं किन्तु जुगल किशोर जू के पट बंद होने का समय साढे दस बजे रात्रि है I

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 50 ☆ लड़खड़ाते कदम ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

(श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे।आज प्रस्तुत है इस कड़ी  की अंतिम भावप्रवण कविता ‘लड़खड़ाते कदम। ) 

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 50 ☆

☆ लड़खड़ाते कदम

 

थम भी जाते कदम,

अगर कोई मुझे पुकार लेता,

रुक भी जाते बढ़ते कदम,

अगर कोई आकर हाथ थाम लेता ||

 

बढ़ते गए कदम धीरे-धीरे,

सोचा कोई तो मुझे थाम लेगा,

डगमगा रहे थे कदम,

सोचा अब कोई तो आवाज देगा ||

 

गिर पड़ा लड़खड़ाते कदम से,

लगा उठा लेगा कोई मुझे आकर,

किसी ने पलट कर भी ना देखा,

खून से लथपथ कदम मजबूर हो खुद खड़े हो गए ||

 

लड़खड़ाते कदम चलने को मजबूर थे,

ना किसी ने रोका ना किसी ने आंसू बहाये,

ड़गमगाते कदमों को खुद रोकना चाहा,

कदम रुकने के बजाय मजबूर होकर आगे बढ़ते गए || 

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 102 ☆ प्रार्थना ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

? साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 102 ?

☆ प्रार्थना ☆

येवो प्रचंड शक्ती या प्रार्थनेत माझ्या

कोमेजल्या फुलांना  चैतन्य दे विधात्या

 

आयुष्य लागले हे आता इथे पणाला

हे ईश्वरा सख्या ये प्राणास वाचवाया

 

अगतिक नको करू रे तू धाव पाव नाथा

साई तुझ्या कृपेची आम्हा मिळोच छाया

 

लागो तुझ्याच मार्गी ओढाळ चित्त रामा

सारी तुझीच बाळे सर्वांस रक्षि राया

 

हे बंध ना तुटावे सांभाळ या जिवांना

देवा तुझ्याच हाती प्रारब्ध सावरायला

 

सा-या जगाच साठी मागेन दान दाता

आता पुन्हा नव्याने बहरोत सर्व बागा

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी क्रमांक- १२ – भाग ४ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मी प्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक- १२ – भाग ४ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

✈️ऐश्वर्यसंपन्न पीटर्सबर्ग✈️

पीटर्सबर्गजवळील पीटरहॉप हे एक अतिशय रम्य, भव्य आणि देखणे ठिकाण आहे. अठराव्या शतकाच्या सुरुवातीला म्हणजे इसवी सन  १७०५ मध्ये पीटर दि ग्रेटने या जागेचा विकास करण्याचे ठरवले. दीडशे हेक्‍टरहून अधिक जागा व्यापलेल्या या भव्य परिसरामध्ये राजवाड्यासारख्या एक डझनाहून अधिक इमारती आहेत. ११ भव्य व सुंदर बगीचे झाडा फुलांनी, शेकडो सुंदर पुतळ्यांनी नटलेले आहेत. या बगिच्यातून २०० हून अधिक, तर्‍हेतर्‍हेची कारंजी आहेत. अप्पर गार्डन आणि लोअर पार्क यांच्या मध्यावर ग्रेट पॅलेसची वास्तु उभी आहे. पीटरहॉपपासून वीस किलोमीटर दूर असलेल्या उंच टेकड्यांवरील नैसर्गिक झऱ्यांचे पाणी अप्पर गार्डनमधील तीन-चार मोठ्या तलावात साठविले आहे.  तिथून पाईपलाईन बांधून लोअर पार्कमधील कारंज्यांमध्ये पाणी खेळविले आहे. अप्पर गार्डन लोअर पार्कपेक्षा साठ फूट अधिक उंचीवर आहे. सर्व कारंजी इलेक्ट्रिक पंपाशिवाय फक्त गुरुत्वाकर्षणाच्या तत्त्वावर चालतात. या वॉटर सिस्टिमचे सर्व डिझायनिंग पीटर दि ग्रेटने स्वतः केले होते. अप्पर गार्डन व लोअर पार्क यांच्या मध्यावरील ग्रेट पॅलेसच्या पुढ्यात अतिशय भव्य असा ‘ग्रेट कास्केड’ आहे. या ग्रेट कास्केडपर्यंत पोहोचण्यासाठी दोन बाजूंना उतरती हिरवळ आणि दोन्हीकडे सतरा पायऱ्यांची उतरण आहे . पायर्‍यांवरुन झुळझुळ पाणी वाहत असते. पायर्‍यांच्या कडेला अतिशय सुंदर अशा ४० शिल्पाकृती आहेत.  दोन्हीकडील पायर्‍यांच्या मधोमध, एका मोठ्या पॉऺ॑डमध्ये, ग्रॅनाईटच्या खडकावर उंच उसळणाऱा पांढराशुभ्र जलस्तंभ आहे.   त्याच्या मागे, तसेच उसळणारे पण थोडेसे लहान फवारे आहेत.ग्रॅनाइट खडकाच्या चारही बाजूला सिंह, घोडा यांच्या तोंडाच्या शिल्पाकृती आहेत .त्यातून पाण्याचे फवारे उडत असतात. पॉ॑डला जोडून असलेला कॅनाल,सी कॅनालने, गल्फ ऑफ फिनलॅ॑डला जोडलेला आहे.पॉ॑डमधून उतरत जाणाऱ्या कॅनालच्या दोन्ही बाजूंना गोलाकार दगडी बशांमधून कारंज्यांच्या अर्धकमानी उसळत असतात. ग्रेट पॅलेसच्या पुढ्यात उभे राहिले की कारंजी,बागा, पुतळे आणि गल्फ ऑफ फिनलॅ॑डपर्यंत गेलेला कॅनाल व त्यापुढे दिसणारा निळा समुद्र हे दृश्य अतिशय विलोभनीय दिसते.

ग्रेट कॅस्केड’च्या उजव्या बाजूच्या भव्य बागेत एका किलवरसारख्या आकाराच्या पॉ॑डमध्ये, शक्तीचे प्रतीक असलेल्या सॅमसन याचा पिळदार अंगाचा सोनेरी उभा पुतळा आहे. सॅमसन हाताने सिंहाचा जबडा फाडत आहे व त्या सिंहमुखातुन वीस मीटर उंच, पांढरा स्वच्छ, मोठा फवारा वेगाने उसळत आहे हे दृश्य नजर खिळवून ठेवते. रशियाने स्वीडनवर  मिळविलेल्या विजयाचे प्रतीक म्हणून हा पुतळा उभारण्यात आला.

ग्रेट कास्केडच्या चौथऱ्यावरील व पायऱ्यांवरील सोनेरी पुतळे तसेच सॅमसन  व सिंह यांचे सोनेरी पुतळे हे प्रथम शिशामध्ये बनविण्यात आले व नंतर त्यांना सोन्याचा मुलामा देण्यात आला.१८०१ मध्ये या सर्व पुतळ्यांचे जसेच्या तसे पुनर्निर्माण करण्यात आले. त्यावेळी ब्राँझवर सोन्याचा मुलामा देण्यात आला. बागांमधून व कारंज्यांजवळ असलेले संगमरवरी अपोलो, व्हिनस, नेपच्यून या देवतांचे पुतळे , तसेच स्नान करणाऱ्या स्त्रिया, पुरुष,मुले यांचे पुतळे अतिशय देखणे आहेत. जांभळ्या, पिवळ्या, लाल रंगाच्या फुलांनी नेटक्या राखलेल्या बागा व त्यामागील घनदाट वृक्षराजी या पार्श्वभूमीवर कारंजी, पुतळे अगदी शोभून दिसत होते.

गल्फच्या किनाऱ्यावर एका बाजूला एक मजली सुंदर पॅलेस आहे. राजवाड्याचा मधला भाग तंबूसारखा उंच तर दोन्ही बाजूला असलेल्या लांब गॅलऱ्या लहान-लहान विटांनी बांधलेल्या आहेत. पीटर दि ग्रेटची लायब्ररी व त्याने युरोपातून आणलेल्या पेंटिंग्जची आर्ट गॅलरी तिथे आहे. दुसऱ्या बाजूला अलेक्झांड्रिया इस्टेट ही गॉथिक शैलीतली छोटी सुबक इमारत आहे. या दोन्ही इमारतींच्या पुढील बाजूला पाच-सहा भव्य बागा आहेत. इथे ३०० प्रकारची ३०,००० लहान मोठी झाडे आहेत. रंगीत पानाफुलांची नेटकी कापलेली ही झाडे खूप सुंदर दिसतात. या बागांमधून हरतऱ्हेची कारंजी उडत असतात. त्यातील ‘सन’ हे कारंजे वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. त्याच्या मध्यावर ब्रांझचे दोन अर्धगोल एकमेकांना जोडलेले आहेत. त्यांच्या कडांना असलेल्या बारीक छिद्रातून सूर्यकिरणांसारखे पाण्याचे फवारे उडतात. विशेष म्हणजे सूर्य जसा फिरेल तसे हे ब्राँझचे मध्यवर्ती गोल फिरतात.

५०५ उसळत्या धारा असलेले पिरॅमिडसारखे एक भव्य कारंजे एका पायऱ्या-पायऱ्यांच्या चौथऱ्यावर आहे.एके ठिकाणी चौथर्‍यावर रोमन शैलीतील फवारे असलेले कारंजे सगळ्यांचे लक्ष वेधून घेत होते. एके ठिकाणी हात पंख्याच्या आकाराच्या मोठ्या कमानीसारख्या जलधारा कोसळत होत्या. छत्रीच्या आकाराच्या एका कारंज्याभोवती अनेकांनी गर्दी केली होती. पांढऱ्या शुभ्र संगमरवरी गोल खांबावर, छत्रीच्या आकाराचे छप्पर होते. त्याला कनातीसारखे लाल हिरवे डिझाईन होते. त्या छपराला असलेल्या  लहान- लहान भोकातून पावसासारख्या अखंड धारा पडत होत्या. त्या पावसामध्ये भिजण्यासाठी गर्दी झाली होती.

या बागेत कारंज्यांचा एक सुंदर खेळ बघायला व अनुभवायला  मिळाला. दुपारी दोन वाजण्याच्या आधी गाइडने सर्वांना दुतर्फा झाडी असलेल्या एका रस्त्यावर कडेला उभे राहायला सांगितले. बरोबर दोन वाजता त्या फुटपाथच्या कडेला असलेल्या भोकांतून पाण्याच्या कमानी उसळल्या.त्या रस्त्यावर पाण्याची एकमेकात गुंफलेल्या धारांची कमान झाली.जेमतेम तीन मिनिटांच्या या खेळात सर्वजण  चिंब भिजून गेले.

उतरत्या छपरासारखेअसलेले एक कारंजे होते. त्याच्या गच्चीचा भाग हा बुद्धिबळाच्या पटासारखा काळ्यापांढर्‍या ग्रॅनाईटने बनविला आहे. त्यावरील झुळझुळत्या कारंज्याच्या कडेला सुंदर शिल्पाकृती आहेत. दोन्ही बाजूच्या सुंदर पायर्‍या चढून वरपर्यंत जाता येते.  परतताना जवळच तीन वादक अत्यंत सुरेल अशा रचना झायलोफोनवर वाजवीत होते. सभोवताली रंगीबेरंगी फुले, पाण्याचा मंद आवाज आणि त्यामध्ये एकरूप झालेले हे सूर वेगळ्या जगात घेऊन गेले.

अप्पर गार्डन मध्ये मोठमोठे तलाव, वृक्ष व फळझाडे आहेत. अप्पर गार्डनमधील पाच रिझर्वायर्समधून लोअर गार्डनमधील सर्व कारंज्यांना पाणीपुरवठा होतो. अप्पर गार्डनच्या  मध्यभागी उंच चौथऱ्यावर नेपच्यून फाउंटन आहे. नेपच्यूनचा ब्राँझचा पुतळा, त्याखालील चौथऱ्यावर स्त्री-पुरुषांची, लहान मुलांची शिल्पे आहेत. सिंह मुखातून, लहान मुलांच्या तोंडातून पाण्याचा फवारे उडतात. तिथेच कडेला नेपच्यूनचा ब्रांझमधील घोड्याचा रथ आहे.

हिरव्या नानाविध छटांच्या  पार्श्वभूमीवर     कल्पकतेने उभारलेली ही कारंजी म्हणजे अभिजात सौंदर्यदृष्टीचे अनुपम दर्शन होते. इतकी वैविध्यपूर्ण कारंजी( शिवाय सर्व चालू स्थितीत) पाहून शरीर आणि मन त्या कारंज्यांच्या तुषारांसारखेच प्रसन्न झाले.

भाग ४ समाप्त

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 88 ☆ ख़ुशी से रिश्ता ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता “ख़ुशी से रिश्ता । )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 88 ☆

☆ ख़ुशी से रिश्ता ☆

बारिश हो रही थी, गुनगुना रही थी बहार 

बहकती हवाओं में था हसीं सा ख़ुमार 

उसने मुझे भी अपनी आगोश में ले लिया

और मेरे दिल को बेपरवाही से भर दिया

रिमझिम में भीगती हुई रक्स करने लगी

तितलियों की चाल में मैं मस्त चलने लगी…

कभी किसी कली को मुस्कुराकर चूमती,

कभी किसी टहनी का हाथ पकड़कर झूमती, 

कभी हंसती, कभी खिलखिलाती

तेज होती बारिश तो उसकी धार पकड़ झूल जाती

चलती तो यूं लगता हिरनी सी है मेरी चाल…

हाँ, हो गयी थी मैं बिलकुल ही बेखयाल…

 

बादल तो बादल था, थोड़ी देर में उड़ गया

पर ख़ुशी के साथ मेरा एक नया रिश्ता जुड़ गया

 

अब जब भी तनहाई की हलचल सुन लेती हूँ

मैं एक बार फिर से उस ख़ुशी से गले मिल लेती हूँ

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कृष्ण काव्य पीयूष — शब्द अमृत ☆ सुश्री नीलम भटनागर 

सुश्री नीलम भटनागर 

 ☆ पुस्तक चर्चा ☆ कृष्ण काव्य पीयूष — शब्द अमृत ☆ सुश्री नीलम भटनागर ☆ 

कृष्ण काव्य पीयूष — शब्द अमृत 

कृष्ण अमृत में पगी श्याम रंग में रंगी बड़ी देर सो ही रही अब पुनः पढ़कर जगी कुछ समय से ऐसा लगने लगा था कि अब तो भक्ति बस ऊपरी दिखावे की बात हो गई है मंदिरों में टीवी पर या कुछ त्योहारों पर । लेकिन चि विवेक रंजन ने कृष्ण काव्य पीयूष भेजी व समीक्षा करने का आग्रह किया । पढ़ा तो लगा कि  ऐसे ही नहीं कहा गया है कि हमारा धर्म सनातन है । 

 मन जब सोचेगा की इति हुई तभी पुनः आरंभ होता दिखेगा।

 एक नजर में ही लगा 

सच में यह रस की  गागर है या यह भक्ति का सागर है 

कैसे कुछ लिखूं इस पर यह खुद ही तो नट नागर है 

न जाने  क्यों अवचेतन में यह सोच बन गई थी  कि विदेशों में तो प्रवासी भारतीय केवल मौज मजे में डूबे रहते हैं , नित नई पार्टियां या भौतिक आनंद ही उनका लक्ष्य होता है ।

पर इस पुस्तक के दर्शन मात्र से यह भ्रम टूट गया । सच ही बिहारी ने यूं ही नही कहा है –

ज्यों ज्यों  डूबे श्याम रंग 

त्यों त्यों उज्जवल होए

पुस्तक खोलते ही अपनी आदत के अनुसार अनुक्रमणिका पर प्रथम दृष्टि गई सारी दुनिया से भक्ति रस में आकंठ डूबे प्रवासी भारतीय रचनाओं के माध्यम से संकलित हैं। 

कनाडा की पूनम चंद्रा  जी ने ” गिरधर ” में लिखा है 

श्याम सलोने हो गए

 स्वर्ण जैसी किरणों ने 

 श्याम को छुआ 

यह मनमोहक दृश्य सिर्फ मेरे लिए है 

सिर्फ मेरे लिए 

तो पूनम जी हर का कृष्ण उसके लिए ही है और आपने यह सब को याद दिला दिया ।

क्योंकि मन श्याम रंग में डूब कर निकलता है तो उज्जवल होकर निकलता है यह विचित्र सत्य है।  बगल के पृष्ठ पर मनु जी की ब्रज में फाग की पंक्तियां हैं 

नभ धरा दामिनी नर-नारी रास रंग राग

 भाव विभोर हो सब कृष्ण संग खेले फाग 

पढ़कर कभी किसी होली पर लिखी  अपनी ही पंक्तियां याद आ गई 

ऐसी होली मची है ब्रज बरसाने बीच

 रंग और अबीर की मची हुई है कीच

 राधा रंग गई ललिता रंग गई 

रंगे ग्वाल बाल

बावला है मन खेलता यहीं से उनके संग 

कौन कौन सी रचना पढ़ें , जिसे पढ़ो उसी में मन डूबता ही जाता है ।  सारे संग्रह को का भाव पक्ष इतना प्रबल है कि पढ़कर वर्णन करना वैसा ही है जैसे प्रभु के विराट स्वरूप का वर्णन करना । 

अचानक सुशील शर्मा कि धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र पर दृष्टि गई और लगा कि गीता का कितना सुंदर भाव अनुवाद है 

ओम हूं मैं व्योम हूं मैं भूत भवन परमात्मा 

स्वर्ग हूं मैं अपवर्ग हूं मैं हिरन गर्भ आत्मा 

प्रतिभा पुरोहित अहमदाबाद की जीवन का सार पढ़ी,  लगा कि इतने अगम्य कृष्ण को इतना सरल कर लिखा है इन्होंने 

कान्हा ने छेड़ी जब बांसुरी की तान 

वृंदावन में छिड़ गया मधुर रागों का गान 

यही तो है हमारे कान्हा सरल से सरल तम और कठिन से अगम्य ।  रसखान के कान्हा गोपियों से छछिया भर छाछ लेकर नाचते हैं , सूर की मन की आंखों से मन में प्रवेश कर बैठते हैं । भक्ति काल के अनेक अनेक कवियों से ऊपर उठना ही होगा मुझे ,  आखिर कृष्ण काव्य  पीयूष का आस्वाद लेना है । 

 श्री कृष्ण के कर्म योगी रूप पर सदा से ही दुनियां और भारतीय प्रेरित होते रहे हैं ।

उसे ही श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी ने कुछ ही पंक्तियों में इतना अच्छा वर्णन किया है कि प्रत्येक शब्द का अर्थ समझते मन खो जाता है । वे लिखते हैं 

 तुम से अनुप्राणित राजनीति

 तुम से विकसित अध्यात्म ज्ञान

 तुम ज्ञाता पथ दर्शक शिक्षक 

कर्मठ योगी अतिभासमान 

बालक किशोर नवयुवक प्रौढ़ 

और वृद्ध सभी के परम मित्र

शिशु बाल गोपाल तरुण सारथी

तुम्हारे विविध चित्र 

भारत जन मन सम्राट सुखद 

भगवान पूज्य हे सत्य काम 

तुम जल थल कण-कण में विद्यमान

हे देव तुम्हें शत शत प्रणाम

मेरा भी प्रणाम स्वीकार हो प्रभु,  क्योंकि मुझे खुद से तुम्हारा यह रूप अत्यंत आकर्षित करता है । प्रत्येक कवि की रचना में मन डूबा जाता है ।गहरे और गहरे पढ़ने का मन होता है । सचमुच का विशेष अमृत है, यह किताब ।

को बड़ छोटू कहत अपराधू ,   रस में सराबोर हो जाइए ।

दृष्टि गई श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव की रचना कृष्ण ही ब्रह्म है पर । विद्गध जी के पुत्र श्री विवेक रंजन भी बहुमुखी रचनाकार हैं । मुझे पिता-पुत्र एक दूसरे के पूरक लगते हैं । प्रभु सबको ऐसा ही पुत्र दे । 

पढ़िए उनकी रचना 

कृष्ण हैं काफ़ीया कृष्ण ही रदीफ़ 

कृष्ण से नज्म है कृष्ण ही वज्म है

 कृष्ण हैं हर किताब हर्फ-हर कृष्ण है 

कृष्ण है शाश्वत कृष्ण अंत हीन है

कृष्ण ही हैं प्रकृति कृष्ण संसार हैं

राहगीर हैं हम कृष्ण की राह के

तीन पंक्तियों वाले यह छन्द रोचक है 

एक रचनाकार जो अपने उपनाम के कारण अनुक्रम में ही आकर्षित कर बैठी का जिक्र जरूरी लगता है । शीतल जैन  अहमक लड़की , सिंगापुर में बैठकर वे इस तरह कृष्ण प्रेम में डूबी हुई है कि 

कान्हा  जिस पल हम दोनों 

एक साथ एक दूसरे के ख्याल में होते हैं 

तब मैं तुम से भी ऊपर होती हूं 

तब मैं रचती हूं तुमसे 

बसती हूं तुम में 

लीन हो जाती हूं तुम में ही 

तुम्हारे ख्याल मुझसे  मिलकर

मुझे मीरा कर देते हैं 

और मुझे मीरा होना पसंद है 

अहमक लड़की तुम सचमुच मीरा ही हो

 मुझे लगता है काश कभी तुम से मिल पाती ।

पढें तो पूरी पुस्तक , पर इस प्रेम दीवानी को अवश्य आत्मसात करें । मेरी कल्पना में अचानक तुम आ जाती हो,  रहो तुम सिंगापुर में मीरा बनकर पाठकों के हृदय में समाई रहो ।

लिखना तो हर कविता पर चाहती हूँ । इतने कृष्ण प्रेम को देखकर मेरी हालत रथ पर बैठे अर्जुन जैसी हो रही है , कमजोर , कांपते हुए ।उनके पास ज्ञान था हमारे पास प्रेम है। श्री कृष्ण का प्रेम हर युग में दीवाना कर देने वाला है।  कृष्ण काव्य पीयूष की  सारी रचनाए पढ़िए । कविताअमृत रस में डूब जाइए।

संपादक जी के वक्तव्य में एक बात बड़ी गहरी लगी तो मुझे भी लिखनी है ।  कि जिनकी रचनाएं शामिल नहीं कर पाए उनसे वह क्षमा प्रार्थी हैं । मैं भी जिनकी रचनाओं पर टीप नही कर सकी उनसे  क्षमा प्रार्थी हूं । 

सभी पाठकों से की ओर से भगवान कृष्ण से यह प्रार्थना करती हूं । 

मेरी भव बाधा हरो 

राधा नागर सोए 

जा तन की झाई पड़े 

श्याम हरित दुति होय

बिहारी ने राधा की कृपा से श्याम जू  को हरे कर दिया और वह ऐसे हरे हुए की पूरे विश्व में हरे कृष्णा, हरे कृष्णा छा गए हैं । 

तो सबको हरे कृष्णा,  श्री कृष्णा ।

© सुश्री नीलम भटनागर

 502 विज्ञान विहार, गुड़गांव 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शब्द मेरे अर्थ तुम्हारे – 6 – हिंदी दिवस विशेष – व्यंग्य – चेतावनी !☆ श्री हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

☆ शब्द मेरे अर्थ तुम्हारे – 6 ☆ हेमन्त बावनकर

☆ हिंदी दिवस विशेष – व्यंग्य – चेतावनी ! ☆

 

आइये

हम सब मिलकर

हिंदी का प्रचार-प्रसार करें

 

पर ठहरिये!

शुरुआत  मैं करुंगा

अपने कार्यालय की दीवार पर

अंग्रेजी की चेतावनी

"Use of English is injurious to the health of this office"

हिंदी में लगाकर

 अंग्रेजी का प्रयोग इस कार्यालय के स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद है”

ताकि

मैं  तसल्ली से

‘अंग्रेजी’ 

पढ़ सकूँ,

लिख सकूँ और बोल सकूँ।

 

© हेमन्त बावनकर,

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 95 – लघुकथा – अनंता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है भाई-भाई केसंबंधों पर आधारित एक लघुकथा  “अनंता। इस विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 95 ☆

 ? लघुकथा – अनंता ?

गणपति का पूजन, अर्चन और अनंत रूप के दर्शन कर सभी बहुत प्रसन्न और शांत मन से अपने अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। एक ही अपार्टमेंट में दो भाइयों का घर, पर दोनों अनजान ऐसे रहते थे कि सभी को लगता था कि दोनों अलग-अलग है।

सुधीर इसी ख्याल को लेकर पंडाल में बैठे देख रहा था कि बिना परिवार के भी यहां सभी परिवार जैसा रहते हैं। परंतु मैंने  अपने छोटे भाई अधीर से क्यों दूरी बना लिया है । उधर आगे बढ़ते पैर ठिठक से गए ।  अधीर का बस यही विचार उसके मन में भी आ रहा था। परंतु दोनों जैसे किसी यंत्रचलित मानव की तरह चलते और देखे जा रहे थे।

हल्की- हल्की रोशनी में दोनों ने देखा कि मम्मी – पापा और सुधीर का बेटा वंश भी चलता आ रहा  हैं। जो कई सालों बाद घर आ रहा था। दोनों ने दौड़कर अगवानी की।

वंश (सुधीर के बेटे ने) गणपति बप्पा के हाथों बंधा हुआ अनंत का धागा निकाला और दिखा कर कहने लगा- “चाचा इसका मतलब आप जानते हैं? इसे अनंता धागा कहा जाता है। साल में अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत शुभकामनाएं और सभी के लिए बप्पा से सुख, समृद्धि मांगते हैं। क्यों ना आज दादा-दादी से आप दोनों अपने हाथों पर अनंता  बंधवा कर सदा के लिए एक हो जाएं।”

दोनों यही तो चाह रहे थे। वंश बेटे को गले लगा लिया। मम्मी -पापा के चरणों पर सिर नवा भगवान गणेश की कृपा को सजते- संवरते देखने लगे। वंश ने जोर से ‘गणपति बप्पा’ की आवाज लगाई और सभी अपार्टमेंट वाले देखने लगे आज क्या हो रहा है। सुधीर और अधीर तो बड़े खुश और गले मिल रहे हैं। बात तो अनंत खुशियों की थी।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ कैलासाहून पृथ्वीवर गणेशआगमन.. ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ विविधा ☆ कैलासाहून पृथ्वीवर गणेश आगमन.. ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

आज कैलासावर अगदी लगबग चालली होती! गणपती बाप्पा दहा दिवसासाठी पृथ्वीतलावर जाणार होते. त्यातच आज पार्वती चा उपवास! अगदी कडकडीत! बारा वर्षे रुईची पाने चाटून, वनात राहून, तपश्चर्या करून तिने शंकराला प्राप्त करून घेतले होते.

हिमालयाने, तिच्या पित्याने स्वर्गातील उत्तमोत्तम स्थळं सुचवली असतील तिला!पण हा भोळा शंकर तिच्या मनी वसला होता! त्यासाठी  तिने उग्र तपश्चर्या करून शंकराची मर्जी संपादन करून घेतली होती.कैलासावर त्यांचे सुखाचे राज्य चालले होते.

कार्तिकेयाच्या जन्मानंतर सुखावले. दुसऱ्या बाळाची चाहूल लागताच पार्वती आणखीच आनंदली! या बाळाच्या जन्माच्या खूप आख्यायिका आहेत.कोणी म्हणतं, घामाच्या मळापासून गणराया ची निर्मिती झाली. गणरायाला हत्तीचे तोंड कसे मिळाले याची कथा वेगळीच आहे, एकदा पार्वती माता स्नान गृहात होत्या. त्यांनी गणपतीला दारात बसवून ठेवले होते आणि कुणाला हि आत पाठवू नको,  असे त्याला सांगितले होते. अचानक शंकराची स्वारी आली पण गणपती काही त्यांना आत सोडेना! तेव्हा क्रोधाविष्ट झालेल्या शंकराने त्याचे मस्तक उडवले. मग पार्वतीने खूप शोक केला, तेव्हा शंकरांनी तिला गणपतीला पुन्हा त्याचे मुख आणून देतो असे आश्वासन दिले! दुसऱ्या दिवशी जो कोणी शंकराच्या दृष्टीस प्रथम पडेल ते मुख आणायचे ठरले. ठरल्याप्रमाणे सकाळी शंकराची स्वारी बाहेर पडली, तेव्हा त्यांना पहिले दर्शन हत्तीचे झाले. मग काय! शंकरांनी त्याचा वध करून ते मुख घरी आणले आणि गणपतीला बसवले. तेव्हापासून गणपती बाप्पाला हत्तीचे तोंड मिळाले. आणि छातीवर सोंड ठेवणारा, सुपाएवढे कान असणारा असा गणपती बाप्पा आपल्या डोळ्यासमोर उभा राहिला. तोच वक्रतुंड महाकाय असा गणपती बाप्पा आपल्याला पूजनीय झाला.

  या गणपतीला सर्वांच्यात मिसळून राहण्याची फार हौस! कैलासावर कंटाळा आला म्हणून पृथ्वीवर माणसांबरोबर राहायला येतो तो दहा दिवस! पार्वती माता काळजीने सांगते,’ हे भूक लाडू घेऊन जा. लवकर परत ये. तिथेच रमून राहू नकोस. तुझ्या उंदरासाठी सुद्धा मी खाऊ देते!

त्याची काळजी घे. आधीच हरितालिका व्रत करून पार्वतीदेवी थकलेली असते.तरी ती  गणपतीला लाडू करून देते! कार्तिकेयाला ही गणपती जाणार, म्हणून वाईट वाटत असते. तो गणपतीला म्हणतो,’ कसा रे जाणार तू एवढ्याशा उंदरावरून?’ पण गणपती त्याच्या त्या छोट्याशा वाहनावरून जायला सिद्ध झालेला असतो. शंकरबाबा गणपतीला सांगतात,’ तिकडे फार मोदक खात बसू नकोस! लवकर परत ये.’त्या सर्वांना गणपतीला सोडताना फार वाईट वाटत असते.

तर इकडे पृथ्वीवर धूम धडाका चालू असतो, गणरायाच्या आगमनाच्या तयारीचा! आरास, महिरपी, वेगवेगळ्या प्रकारचे लाइटिंग अशी सगळी तयारी चालू असते. स्त्रिया गणपतीच्या स्वागतासाठी सज्ज असतात. गणपती पाहुणा येणार असल्यामुळे त्याच्यासाठी खिरापत, मोदका ची तयारी होते. नवीन वस्त्रे, दागिने यांनी बाजारपेठ सजते. लोक उत्साहाने तयारी करतात. घरातील वातावरण उत्साहाने  भरलेले असते. मुलांना मोदकाचे वेध लागलेले असतात. आरत्या म्हणायच्या असतात. गणपती पाहुणा येणार म्हणून दारात रांगोळी काढली जाते, तोरणं लावली जातात, गणरायासाठी वेगळाच थाट! त्याला कुठे बसवू या, त्याचे स्वागत कसे करूया, या विचारात फुलांच्या, लाईटच्या, कागदांच्या, रंगीबेरंगी माळा व दिवे लावले जातात. तो हा हरितालिकेचा दिवस असतो.

जणू पार्वती आधी पृथ्वी वर येऊन त्याच्या स्वागताची सर्व तयारी झाली आहे ना घरोघरी, ते पाहून जाते! उद्या ती त्याची आई म्हणून मिरवणारे असते, तर दोन दिवसांनी तीच गौरी बनून माहेरवाशीण म्हणून येणार असते.ही दोन्हीही नाती प्रेमाची असतात! दोन्ही नात्यात तिचे हे रूप मनोहर दिसते! तोच उत्साह निसर्गातही दिसून येतो.पावसाच्या सरी वर सरी येत रहातात आणि वातावरणात प्रसन्नता आणतात.

गणरायाचे आगमन होताच सगळीकडे आनंदीआनंद पसरतो.

कैलासा वरून पृथ्वीवर आणि आपल्या घरात! उंदराच्या वहानावरून! उद्या बाप्पा ला मोदकाचे जेवण मिळणार!

आणि रोज आरती प्रसादाने आसमंत जागा रहाणार!

संकटनाशक गणपती सौख्याची, आरोग्यदायी नवी लाट घेऊन येणार आहे, म्हणून गर्जू या,

  ? गणपती बाप्पा मोरया! ?

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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