हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०१ ☆ गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक – गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०१ ☆

☆ गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

नारी  का  सम्मान  करें  हम |

दिल  से गौरवगान  करें  हम ||

साथ खड़े हों हर अवसर पर,

जगजाहिर पहचान करें  हम ||

*

सदियों  से  हम  जिसे  पूजते |

सुख-दुख जिसके साथ बाँटते ||

धर्मशास्त्र    गाते    यश-गाथा,

नतमस्तक   हम  वंदन  करते ||

हक़  के लिए विधान करें  हम |

नारी   का   सम्मान  करें   हम |

*

एक       तिहाई       भागीदारी |

विपक्षियों    ने   ना   स्वीकारी ||

संसद    में     प्रस्ताव   गिराया,

महिलाओं    में    गुस्सा   भारी ||

मत    इनके   संसद   में   गूँजें |

अब  इसका  संज्ञान  करें   हम ||

नारी   का   सम्मान   करें   हम |

*

जिसने  हक   इनका   ठुकराया |

उन्हें  समय ने  सबक  सिखाया ||

धैर्य –  धर्म     इनका    पहचानें,

किसने   इनका   मान   घटाया ||

अपने    दुश्मन   को    पहचानें |

कभी न अब अपमान  करें  हम ||

नारी   का   सम्मान   करें   हम |

*

साथ   समय  के  सदा  खड़ी  है |

हर  मुश्किल  से  सदा  लड़ी  है ||

छेड़ें   मत  “संतोष”  इन्हें   अब,

इनकी   जग  में  आन  बड़ी  है ||

देती    हैं   ये    सबको  इज्जत |

बस  इसका भी भान  करें  हम ||

 नारी   का  सम्मान   करें   हम |

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  ‘लोक कथा – लोक देवता‘।)

 

? लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

राजस्थान के पोकरण में तंवर वंशीय राजपूत राजा अजमल थेl राजा श्री कृष्ण जी के परम भक्त थेl इनका विवाह भाटी राजवंश की मीनल देवी से हुआl विवाह के कई वर्षो तक इन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआl भक्त की भक्ति देख कृष्ण जी प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहाl राजा ने कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखीl ईश कृपा से राजा को दो पुत्र प्राप्त हुएl वीरमदेव और रामदेव l रामदेव जी का जन्म भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की दूज को हुआl इनकी शादी सोढा राजपुतानी नेतलदे से हुआl

रामदेव जी ने समाज से जाती पाती, छुआछूत, सामाजिक कुरुतियों को जहाँ समाज से निष्कासित किया वहीं गरीबों एवं दलितों का उत्थान करने की प्रमुख भूमिका निभाईl यही कारण है कि देश के भिन्न प्रांतों के लोग देवता के रूप में उनकी पूजा करने लगेl मेघवाल समुदाय जो कि राजस्थान और गुजरात में खेती, पशुपालन, कांच के काम की कढ़ाई बुनाई के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं एक अनुसूचित जनजाति है, रामदेव जी ने उनके उद्धार हेतु कई काम कियेl

बाबा रामदेव ने जितना हिन्दु उत्थान हेतु काम किया उतना ही मुस्लिम समाज के उत्थान हेतु भी बहुत काम किये इसलिए इन्हें दोनों ही समुदाय के लोग मानते हैंl भादवा मेला जो कि बाबाजी के जन्मदिन दिवस पर लगता है उसमें दोनों ही समुदाय सम्मिलित होते हैंl ये हिन्दुओं के भगवान और मुस्लिम समुदाय के पीर हैंl

रामसा पीर ने समाज को शान्ति और चैन से जीने की सलाह दीl जहाँ भी आपको पंच रंग का ध्वज दिखे वहाँ आपको रामसा जी का मंदिर देखने को मिलेगाl इनके ध्वज में सफ़ेद रंग – पवित्रता, सादगी और शान्ति लिये, लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, साहस और क्रांति लिये, पीला रंग -त्याग सात्विकता, मंगल और आध्यात्मिक शक्ति लिये, नीला रंग- एकता और निष्ठा लिये और हरा रंग -शान्ति, भाईचारा और समृद्धि लिये होता हैl अर्थात ऊंच नीच का अंत और सभी में एक का ही वास हैl

रामसा जी को घोड़े पर बैठा दिखाते हैं क्यूंकि घोड़ा इनकी शक्ति और गति से लोगों तक पहुंचने का प्रतीक हैl

ऐसा कहा जाता है कि रूणिचा में राम सरोवर किनारे भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की ग्यारस को इन्होने जीवित समाधि लीl

रणुजा ना राजा, अजमलजी   ना बेटा, वीरामदे ना वीरा,

राणी हेतलना भरथार, म्हारो हेलो सांभड़ो जी

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २१ – कविता – मेरा रचयिता… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा रचयिता…‘।)

☆ शशि साहित्य # २१ ☆

? कविता – मेरा रचयिता…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बड़े मनोयोग से सुना रहे थे हम ,दास्तां अपनी,

चीत्कार सुन हड़बड़ा कर होश जो आया.

यह अजनबी मंजर नया नया सा था,

यह कुछ और नहीं!!!

अपने उन्ही शब्दों को,

लहुलुहान हो, चोट खाकर लौटते देखा..

 

ना टटोल मेरे मन को,

कि दोबारा सुनाऊं हाल,

अब तो खुद से भी कुछ कहने का अब मन नहीं..

 

शिकवा तो अब किसी से, कैसा भी नहीं.

हजारों साल से खड़े पत्थरों में,

धड़कनें सुनने की झूठी ख्वाहिश…

यह खता मेरी है, किसी और की तो नहीं..

 

मेरा सारा मनुहार, यूं व्यर्थ हो गया,

सींच कर खुद को,मेरे आंसुओं से,

वह और भी मजबूत हो गया.

अब मैं हूं और सिर्फ मेरा रचयिता,

वह अच्छा-अच्छा लिख रहा..

और मैं खुश होकर पढ़ रही.

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९१ – गुरू माऊली…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९१ – विजय साहित्य ?

☆ गुरू माऊली …! ☆

☆

=१= 

 पुस्तक माझी गुरू माऊली

ज्ञान शलाका,देई साऊली.

मुळाक्षरांनी, भरली पाटी

शब्द शारदा, प्रसाद वाटी.

 

=२=

गुरु माऊली, ग्रंथ कोंदणी

ज्ञान संपदा, शब्द गोंदणी.

भावमनीचे, आहे स्पंदन

मनामनांचे, दैवी मंथन.

=३=

ग्रंथगुरू हे,  होय सारथी ,

घडवी ज्ञानी, नवीन पिढी

पुस्तक पेढी, उंची ठरवी

ध्येय पथाची, सुखद शिडी.

 =४=

ज्ञानलालसा, नि ज्ञानार्जन

अक्षरधन हे, मनी जपू

पुस्तक पेढी, सगुण शारदा,

तिन्ही त्रिकाळी तिजसी नमू

 =५=

अक्षरलेणी, अक्षरगाथा,

सरस्वतीच्या, चरणी माथा

पुस्तक पेढी, हवी संग्रही

ज्ञानदायीनी, अक्षर गाथा…!

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १७ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १७ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सत्संग-सज्जन प्रशंसा

परमेश्वर प्राप्तीसाठी नामस्मरण, भक्ती, सेवाभाव याबरोबरच सत्संग या गोष्टीला तितकेच महत्त्व दिल्याचे आपल्याला गाथेतील  अभंगांतून दिसून येते. उच्च समजल्या जाणाऱ्या ब्राह्मण वर्गातील काही  मंडळींकडून तुकाराम महाराजांना अतिशय त्रास दिला जात होता. आम्ही वेद पंडित, शास्त्राचा अभ्यास केलेले, म्हणून आम्हीच अध्यात्माचे जाणकार असे समजून जे समाजातील खालच्या वर्गाचे समजणाऱ्या लोकांना फार पीडा देत असत अशा पाखंडी वर्गावर तुकाराम महाराजांनी त्यांच्या अभंगातून चांगलेच ताशेरे मारले आहेत.

ब्राह्मण असो की वैश्य असो अथवा शूद्र, संत सज्जन कोणाला म्हणावे हे सांगताना तुकाराम महाराज म्हणतात,

हिरा ठेविता ऐरणी/ वाचे मारिता जो घणी /

 तोची मोल यावे खरा/ करणीचा होय चुरा//

 मोहरा तोची अंगे/ सूत न जळे ज्याचे संगे/

 तुका म्हणे तोचि संत/ सोसो जगाचे आघात//

संत कसे असतात तर, जो हिरा ऐरणीवर ठेवून मोठ्या हातोड्याने त्याच्यावर घाव घातला तरी फुटत नाही. तोच हिरा

मौल्यवान आहे दुसरे इतर बनावट काचेचे तुकडे असतात कारण ते घाव घालताच त्यांचा चुरा होतो. ज्याला सूत गुंडाळून अग्नीत टाकले असता सूत जळत नाही तोच खरा मोहरा होय. त्याचप्रमाणे जो जगाने दिलेले सर्व प्रकारचे उपद्रव शांतपणे सहन करतो त्याला संत म्हणावे.

ते संतांचा महिमा वर्णन करतात.

 सकळ चिंतामणी शरीर/ जरी जाय अहंकार समूळ आशा/

 निंदा हिंसा नाही कपट देह बुद्धी/ निर्मळ स्फटिक जसा.//

 मोक्षाचे तीर्थ न लगे वाराणसी/ येती तया पासी अवघे जन//

 तीर्थासी तीर्थ झाला तोची एक/ मोक्ष तेणे दर्शने//

 मन शुद्ध तया काय करीसी माळा/

 मंडित सकळा भूषणासी//

 हरीच्या गुणे गर्जताती सदा/

 आनंद तया मानसी//

 तन मन धन दिले पुरुषोत्तम/ आशा नाही कवणाची//

 तुका म्हणे तो परीसाहुनी आगळा/

 काय महिमा वर्णू त्याचा//

या अभंगात तुकारामांनी संतांची लक्षणे सांगितली आहेत. चित्त शुद्ध असलेल्या संतांबद्दल तुकाराम महाराज गौरवाने बोलत आहेत की ज्याचा अहंकार गेला  आहे, निंदा, हिंसा, कपट, देह बुद्धी याचा वास त्यांच्यात नाही तोच स्फटिकासारखा निर्मळ आहे, त्याचे सर्व शरीर चिंतामणीच आहे. मोक्ष देणारे तीर्थ काशी, तिची त्याला जरुरी नाही. कारण सर्व तीर्थांना पावन करणारा संत हाच तीर्थस्थान झालेला आहे. सर्व जग अशा पुरुषापाशीच येते. याच्या दर्शनानेच मोक्षाचा लाभ होतो. ज्याचे मन शुद्ध झाले आहे त्याला जपमाळेसारख्या बाह्य चिन्हांची काहीही जरुरी राहिलेली नाही. मन शुद्ध असल्यानेच तो सर्व भूषणांनी मंडित झालेला आहे. जे हरीचे गुणगान करत असतात ते निरंतर आनंदातच असतात.त्यांनी स्वतःला पुरुषोत्तमाच्या ठायी अर्पण केले आहे आणि जो कोणावरही आशा ठेवत नाही तो परिसापेक्षाही श्रेष्ठ आहे. त्याचा महिमा शब्दात वर्णन करता येत नाही. संतांच्या दर्शनाने तापत्रयांचा नाश होऊन विश्रांती मिळते.

 

 शुद्ध बीजापोटी/ फळे रसाळ गोमटी/

 मुखी अमृताची वाणी/ देह देवाचे करणी//

 सर्वांग निर्मळ/ चित्त जैसे गंगाजळ/

 तुका म्हणे जाती/ ताप दर्शनी विश्रांती

 

बीज शुद्ध असले की त्यातून उगवणारी फळे रसाळ आणि गोडच असतात, असं सांगून संत तुकाराम पुढे म्हणतात की ज्याच्या मुखात अमृततुल्य गोड शब्द आहेत आणि ज्याचा देह देवकार्यासाठी वापरला जात आहे, ज्याचे चित्त गंगाजळाप्रमाणे पवित्र आहे त्याच्या दर्शनाने त्रिविध ताप हरण होऊन चित्ताला विश्रांती मिळते.

 सोनियाचे ताट क्षीरीने भरिले/

 भक्षावया दिले श्वानालागी//

 मुक्ताफळ हार खराशी घातला/

 कस्तुरी सुकराला चोजविली//*

 वेद पारायण बधिरा सांगे ज्ञान/

 तयाची ते खूण काय जाणे//

 तुका म्हणे ज्याचे तोची एक जाणे/

 भक्तीचे महिमान साधू जाणे//

एक संत साधूच असा आहे की जो भक्तीचा महिमा जाणतो. सामान्यांना हे पटवून देण्यासाठी तुकाराम महाराज या अभंगात रोजच्या जीवनातील काही उदाहरणे देतात.

सोन्याच्या पात्रात खीर भरून ती कुत्र्याला दिली तर त्याचा काय उपयोग? त्याचप्रमाणे गाढवाच्या गळ्यात मोत्याचा हार घातला किंवा डुकराच्या नाकाला कस्तुरी लावली

तर त्याचा महिमा त्यांना कळणार आहे का? एखाद्या बहिर्‍याला(अज्ञानी) माणसाला वेदाचे ज्ञान कितीही देण्याचा प्रयत्न केला तरी ते त्याच्या बुद्धीला समजणार आहे का? जे खरे वर्म आहे ते ज्याचा तोच जाणू शकतो. याच कारणास्तव संतांची संगती धरावी असे तुकाराम महाराजांचे सांगणे आहे.

तुकाराम महाराजांना वैष्णवांचे दास होण्याची तळमळ लागली आहे. कारण ते म्हणतात.

 ते माझे सोयरे सज्जन सांगाती/

 पाय आठवीती विठोबाचे//

 येरा मानविधी पाळणा पुरते/

 देवाची ती भुते म्हणोनिया//

 सर्व भावे जालो वैष्णवांचा दास/

 करीन त्यांची आस उच्छिष्ठाची//

 तुका म्हणे जैसे आवडती हरिदास/

 तैसी नाही आस आणिकांची//

तुकाराम महाराजांच्या मनात हरिदासांविषयी अत्यंत आदर आहे. जे पांडुरंगाच्या चरणांचे चिंतन करतात ते सज्जन माझे सोयरे आहेत असे ते म्हणतात.

बाकीच्यांना मी फक्त विधीपालनापुरते आदराने वागवतो कारण सर्व भूतमात्र देवाच्याच रूपाचे असतात. काया, वाचा, मनाने मात्र तुकाराम महाराज वैष्णवांचे दास आहेत. त्यांच्या उच्छिष्टाची महाराज आशा धरतात. त्यांना हरिदास जितके आवडतात तितके इतर कोणीही आवडत नाही. या अभंगात पर्यायाने सज्जनांची संगती चांगली हे सांगण्याचा महाराजांचा आटोकाट प्रयत्न आहे.

संतांची महती सांगणारा हा आणखी एक अभंग आपण पाहूया.

 काय वाणू आता न पुरे हे वाणी/

 मस्तक चरणी ठेवीतसे//

संत महात्म्य वर्णन करताना महाराजांची वाणी अपुरी पडते. त्यांच्या चरणावर मस्तक ठेवून ते म्हणतात,

 थोरीव सांडली आपुली परिसे/

 नेणे सिवो कैसे लोखंडासी//

 जगाच्या कल्याणा संतांच्या विभूती/

 देह कष्टविति पर उपकारे//

 भुतांची दया हे भांडवल संता/

 आपुली ममता नाही देही//

 तुका म्हणे सुख पराविया सुखे/

 अमृत हे मुखे स्त्रवतसे//

लोखंड अति हीन आहे, त्याला मी कसा स्पर्श करू? असे मनात न आणता परीस त्याचे सोने करतो, त्याचप्रमाणे संतांनी माझ्या सारख्या हीनाचा स्वीकार केला आहे. संतांचे अवतार जगाच्या कल्याणा करताच असतात, ते आपला देह परोपकार करण्यासाठी कष्टवितात. सर्वांवर दया करणे, हे संतांचे स्वाभाविक भांडवल आहे व त्यांना स्वतःच्या देहाची ममता नसते.

ते संत लोकांच्या सुखामुळेच सुखी होतात आणि त्यांचे बोलणे अमृता सारखे मधुर असते. हरीच्या नामामृताचा ओघच त्यांच्या वाणी वाटे वाहत असतो.

पुढील भागात सज्जन प्रशंसे विषयी आणखी काही अभंगांचा आपण विचार करू.

क्रमशः… १६ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # हमारा बजाज… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # हमारा बजाज… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

आमच्या लहानपणी.. म्हणजे साठी च्या दशकात… चैत्र संपता संपता आणि वैशाखाची ओपनिंग सुरू झाली की फारतर जेष्ठ अर्धा अधिका पर्यंत… मराठी महिन्याच्यां गोंधळात न पडता सरळ इंग्रजी मंथचा विचार केला तर मार्च एंड पासून ते जून हाफ पर्यंत उन्हाळ्याचा सिझन सुरू असायचा… त्यावेळी सगळे ऋतू आपल्या वेळा काटेकोरपणाने पाळत असत… इतकचं काय माणसं, संस्था आस्थापना, शाळा, महाविद्यालये, रेल्वे, बस, विमानं इ इ. देखिल आपल्या वर्षभराच्या एकदा आखून दिलेल्या वेळापत्रकानुसार चालत असतं… वार्षिक परिक्षेचे पीर एप्रिलच्या मध्याला एकदा पाण्यात पडले कि सगळी शाळकरी मुलांचा जथ्था आपापल्या पालकांसह उन्हाळी सुट्टीसाठी म्हणून गावाकडे जायचा… शहरातील उन्हाळ्यापेक्षा गावात सौम्य आणि अधिक गारवा तसेच आंबा, काजू, फणस, जांभूळ चा मनसोक्त पाहुणचाराचा आस्वाद आनंद लुटून झाला कि मृगाची पावसाची पहिली सर पडायचा अवकाश कि सगळे आपल्या शहरात परतायचे… तेव्हा त्या दोन तीन महिन्यात इकडे सिलिंग फॅन हुप्प होऊन बसायचा… ते ए. सी. , कुलर वगैरे श्रीमंती सिंम्बाल चे फॅड अद्याप मध्यमवर्गीय कुटुंबात अवतरलेले नव्हते… आणि सिलिंग फॅन मात्र शहरात घराघरातून वर्षभर तिन त्रिकाळ घुमत असायचा… पर्यावरणाचा समतोल साधला गेल्याने उन्हाळी तापमान देखील आपला ठरलेल्या पाऱ्यापेक्षा कधी जास्त होतच नसे… तर सांगत होतो कि तेव्हा सिलिंग फॅन हि एकमेव घरटी गरज होती आणि टेबल फॅन खिशात खुळखळणाऱ्या जास्तीच्या पैशाची चैन समजली जायची… जिथे हम दो और हमारे दो चा मामला तिथे सिलिंग वरचा एकुलता एक हाॅल मधला नि बेडरूम मधला हमारा बजाज आपलं गारेगार वारं फिरवायचा… पण जिथं टिचभर जागेत मणभर माणसं असायची तेव्हा हा चैन म्हणून नावं ठेवलेला टेबल फॅन उपयोगात आणला जायचा.. प्रत्येकाच्या सोयीनुसार कोपऱ्यात फिरता वा खडा ठेवून वारं फिरवायचा… स्पीड ची बटनं चार असली तरी वारं भन्नाट देत असे… पण या टेबल फॅन चा उपयोग मात्र त्या उन्हाळ्यापुरता मर्यादित असे… त्यानंतर तो अडगळीत फळीवर (लाॅफ्टवर) त्याला गवसणी घालून ठेवला जाई तो परत पुढच्या उन्हाळ्यातच खाली उतरे… असं दोन दशके पुढची गेली आणि पुढे पुढे सगळा माहोलच बदलत गेला… त्याला काय होतयं या विचाराने बुद्धीला मांद चढले आणि माणसांची विचाराची दिशा विकृत झाली… त्याचा विपरीत परिणाम निर्सगावर झाला आणि तो देखील माणसासारखाच रंग बदलू लागला.. त्याच्या दैनंदिन वेळापत्रकाचलाच त्याने न जुमानता आपल्या मनाला स्वैर स्वातंत्र्य दिले… सगळे ऋतूंची मनमौजी सुरू झाली… कुणीही उठावं कधीही यावं आपल्याला हवं तसं वागावं.. राहावं, ओरबाडावं, नासधूस करावं नाहीतर हुलकावणी देत राहून तोंडच दाखवायचं नाही… आणि माणसालाच वेठीला धरून त्यालाच जाब विचारायचा… सर्व काही तुझ्या ताब्यात आहे याचा फुकाचा गर्व आहे ना तुला मग दाखव कि वेळेवर हवा तेव्हढा पाऊस, थंडी आणि उन्हाळा आणून… आहे का तुझा निर्सगावर अंकुश तुझा… लावतोस का शिस्त मला… तुला काय वाटलं हमारा बजाज सारखा बटणाच्या कळीवर चालू बंद करून हुकमत आमच्या वर मिळवता येईल काय… अरे तुमचा तो हमारा बजाज देखील काहीवेळा चालता चालता बंद पडतो.. मान टाकतो आणि कशी तुमची ऐन गरजेच्या वेळी काशी करून जातो… तेव्हा तुमची कशी होते चिडचिड… अगदी त्याच तालावर माझ्या या बेताल वागण्यानं देखील तुमच्याच बेजबाबदार पणाने माझ्याशी वागणूकीचा परिणाम तुम्हाला भोगायला लावण्याची किंमत मोजून घेत असतो… तुम्ही काय रे हमारा बजाज म्हणून त्या टेबल फॅन चेच गोडवे गात बसता… नि आम्हाला विसरता… ये हमने आपको करारा जवाब दिया है… तो बाजारातून जेव्हा हमारा बजाज नवा कोरा घरी घेऊन येता तेव्हा त्याच्या नवलाई पुढे सगळे घरदारनं घेरुन बसते आणि तो एकशे ऐंशीच्या कोनात फिरणारा टेबल फॅन मात्र अरे मला जरा मोकळीक द्याल तर मी हवा पसरवेन… कुणी आगाऊ कारटं त्या पात्यावर पेन्सिल, कागद धरून आवाजाची गंमत लुटत असतं.. नि माझ्या गतीला अवरोध झाल्याने मग माझी मतीच खुंटते नि कुठेतरी खरखर करणारा कानाला सहन न होणारा आवाज माझ्याकडून निघाला कि… अरे याला वापरून दहा वर्षे झाली म्हणजे याची गॅरंटी संपली आता त्याला भंगारात मोडीत घालून दूसरा नवा आणायला हवा… असं म्हणून पुन्हा तुम्ही नवा हमारा बजाजच आणता… आमच्या सारखे कैक बाजारात आले आणि गेले पण आमच्या सारखे आम्हीच कायम टिकून राहिलोय… हे तुमचं नि हमारा बजाज चं जन्मोजन्मीचं नातं असं अबाधित राहिले आहे.. जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी… ठंडा ठंडा कुल कुल..

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ७०, ७१, ७२, ७३. ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ७०, ७१, ७२, ७३. ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

।। श्री नारद उवाच ।। 

नारद भक्ति सूत्रे ७० – – 

तन्मया : ||७०||

 अर्थ : भक्त भगवंतमय झालेले असतात.

विवेचन: विभक्त नाही तो भक्त अशी भक्ताची व्याख्या केली जाते. इथे तन्मय असा उल्लेख आहे. साधना पूर्णत्वास गेली की भक्त आणि भगवंत यांच्यात काही भेद रहात नाही. अशा साधकाचे वर्णन भगवंत गीतेत करतात.

*”नाही तृष्णा भय क्रोध माझ्या सेवेत तन्मय|*

*झाले ज्ञान-तपे चोख अनेक मज पावले||”*

(गीताई ०४. १०)

संताना ना कोणापासून भय असते, तर कोणासाठी त्यांच्या मनात क्रोध असतो. त्यांच्या मनात फक्त त्या भगवंताबद्दल निरतिशय प्रेम असते. जणू भगवंतच त्यांच्या ह्रदयात विराजमान असतो. आपल्याला हनुमानाची गोष्ट ठाऊक आहे. वेळ आल्यावर हनुमानाने आपली छाती विदीर्ण करून राम आपल्या हृदयात असल्याचे दाखवून दिले होते. अशी सर्व मंडळी ही सामान्य साधकांसाठी भक्तीचे आदर्श आहेत, प्रमाण आहेत.

प्रभू श्रीरामाला हनुमंताला बक्षिस देण्याकरता एकही गोष्ट योग्य वाटली नाही. शेवटी त्याने हनुमंताला आलिंगन दिले आणि त्याचे कौतुक पुढील शब्दांत केले आहे.

“रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।”

संत तुकाराम महाराज म्हणतात की साधना करता करता अशी वेळ आली की मला आता विठ्ठल माझा सोयरा वाटू लागला आहे. सोयरा अर्थात अगदी जवळचा.

ते एका अभंगात म्हणतात,

*”विठ्ठल सोयरा सज्जन सांगाती । विठ्ठल या चित्तीं बैसलासे ॥१॥ विठ्ठलें हें अंग व्यापिली ते काया । विठ्ठल हे छाया माझी मज ॥२॥ बैसला विठ्ठल जिव्हेचिया माथां । न वदे अन्यथा आन दुजें ॥३॥ सकळां इंद्रियां मन हे प्रधान । तें ही करी ध्यान विठोबाचें ॥४॥” तुका म्हणे या हो विठ्ठलासी आतां । नये विसंबतां माझें मज ॥५॥”*

(अभंग क्रमांक 497, सार्थ तुकाराम गाथा धार्मिक प्रकाशन संस्था)

 जय जय रघुवीर समर्थ

—–

भक्ति सूत्रे क्र. ७१ – 

*”मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति ||७१||”*

अर्थ : सिद्ध भक्ताच्या माता, पिता व पूर्वजांना आनंद होतो. देव देवता आनंदाने नृत्य करतात आणि पृथ्वीला रक्षणकर्ता मिळून ती सनाथ होते.  

विवेचन : दैनंदिन व्यवहारात एखादा मनुष्य जर श्रीमंत झाला, मोठा उद्योगपती झाला तर त्याचे कूळ तर उद्धरतेच, तसेच त्याच्या कर्तृत्वामुळे अनेक लोकांना रोजगार मिळत असतो.

परमार्थातील अंतिम पायरी म्हणजे भक्त आणि भगवंताचे एकरूप होणे. असे पूर्णत्व प्राप्त करणारे तसे मोजकेच असतात, पण ते असतात यात काही शंका नाही. भारतमातेच्या अशी अनेक नररत्ने जन्मास आली की ज्यांनी भगवंताची प्राप्ती करून घेतील आणि ही परंपरा अखंड राहील यात शंका असण्याचे कारण नाही.

एक गोष्ट आपण इथे लक्षात घेतली पाहिजे की जेव्हा एखाद्या जडजीवाला नरदेह प्राप्त होतो, तेव्हा भगवंताला सर्वात जास्त आनंद होतो कारण त्याला वाटते की आता मी याला नरदेह दिला आहे, तर आता हा साधना करून माझी (अर्थात भगवंताची) प्राप्ती करून घेईल, पण प्रत्यक्षात मात्र लाखो करोडो मध्ये एखादा जीव देवत्वापर्यंत पोचतो. मग ज्याप्रमाणे ऑलिंपिक पदक मिळविल्यावर ज्याप्रमाणे त्या देशातील सर्वांना आपल्या घरी दसऱ्याच्या दिवशी दिवाळी आल्यासारखे वाटतेज तसे साधकाच्या नातेवाईकांना, घरच्या लोकांना, पितरांना नव्हे तर देवदेवतांना ही तितकाच उत्कट आनंद होतो असे नारद मुनी आपल्याला सांगत आहेत.

अशा साधकाचे वर्णन संत तुकाराम महाराज आपल्या पुढील अभंगात करतात… 

*”निर्वैर होणें साधनाचें मूळ । येर ते विल्हाळ सांडीमांडी ॥१॥ नाहीं चालों येत सोंगसंपादणी । निवडे अवसानीं शुद्धाशुद्ध ॥२॥ त्यागा नांव तरी निर्वीषयवासना । कार्‍या कारणां पुरता विधि ॥३॥ तुका म्हणे राहे चिंतनीं आवडी । येणें नांवें जोडी सत्यत्वेंसी ॥४॥”*

साधकाच्या अंतरात देवत्व प्रगट झाले की तो सिद्ध होतो. देहाने मनुष्य दिसत असला तरी तो भगवंत झालेला असतो. बाहेरून त्या संताचा व्यवहार कदाचित अतिसामान्य असेल, पण अंतरात मात्र त्याचे अनुसंधान पक्के असते.

त्याच्या नजरेत सर्वजण समान असतात. ते अवतरण करतात, ते आपल्या सारख्या सामान्य जनांचा उद्धार करण्यासाठी. पूज्य ब्रम्हानंद महाराज म्हणायचे की दोन रुपयाचे तिकीट काढले की गोंदवले येथे सगुण ब्रह्म पाहायला मिळायचे. अशा संतांमुळे पृथ्वीवरील पाप नष्ट होते, पृथ्वी सनाथ होते.

जय जय रघुवीर समर्थ

—–

भक्ति सूत्रे क्र. ७२, ७३ – – 

 *”नास्ति तेषु जाति विद्यारूपकुलधनक्रियादि भेदः ॥७२॥”*

*”यतस्तदीय: ||७३||”*

अर्थ : श्रेष्ठ भक्तांमध्ये जातपात, विद्या (शिक्षण), रूप, कुळ, पैसा, करत असलेले काम इत्यादींवर आधारलेले भेद नसतात, कारण ते भगवतांचे एकनिष्ठ भक्त असतात.  

विवेचन : ही दोन्ही एकमेकांस साधारण पुरक आहेत म्हणून त्यांचे विवेचन एकत्र करीत आहे.  

भक्ति करणे म्हणजे भगवंतावर अकारण प्रेम करणे हे आपण पाहिले आहे. दैनंदिन व्यवहार करताना मनुष्याला कधी जाणता तर कधी अजाणता मनुष्याला विविध प्रकारचे भेद पाळावे लागतात, अन्यथा त्याला व्यवहार करता येत नाही. उदा. वाहन कोणतेही असले तरी त्या वाहनाला ठेवण्यासाठी वाहनतळच उचित ठरते. वाहन महागडे आहे म्हणून कोणी त्याला झोपण्याच्या खोलीत नेऊन ठेवत नाही, अर्थात ते उचितही नसते.

संत अर्थात पूर्णत्व पावलेला भक्त हा स्वतः देव झालेला असतो. संत कधीही कोणामध्ये भेद पाळत नाहीत, भेद मानीत नाहीत.  

आपल्याला सर्वांना ज्ञात असलेले एक गीत आहे. — – 

*”टाळ बोले चिपळीला नाच माझ्या संगं*

*देवाजीच्या दारी आज रंगला अभंग ॥धृ॥*

*दरबारी आले रंक आणि राव*

*सारे एकरूप नाही भेदभाव*

*गाऊ नाचू सारे होऊनी नि:संग||१||”*

 या स्थितीला संत पोहचलेले असतात. कोणत्याही संताच्या स्थानी जावं, तिथे आपल्याला मुक्त प्रवेश मिळेल.

संतत्व प्राप्त केलेला मनुष्य व्यवहारातील भेद लक्षात घेऊन त्या त्या माणसांशी, त्या त्या प्राण्यांशी त्या त्या परीने वर्तन करतात.

श्रीगोंदवलेकर महाराजांच्या चरित्रात अशी अनेक उदा. आहेत. त्यातील एक दोन मी इथे सांगतो. एकदा चोरी करायला आलेल्या चोरांना श्रीमहाराजांनी पकडले. त्यांना पोलिसात न देता, पुन्हा चोरी करणार नाही या अटीवर त्यांना अनुग्रह देऊन कृपांकित केले. एका मनुष्य त्यांच्यावर विष प्रयोग करण्यासाठी आला होता. आपल्याला मारायला आलेल्या मनुष्याला सुद्धा श्रीमहाराजांनी अनुग्रह देण्याची तयारी केली होती. पण तो मनुष्य घाबरून पळून गेला. तेव्हा श्रीमहाराज म्हणून गेले, की त्याने चांगली संधी सोडली आणि स्वतःचे नुकसान करून घेतले. इतके दयासिंधुत्व संतच दाखवू शकतात. कारण स्वतः परमात्मा त्यांच्या अंतर्यामी कायम स्थित असतो.

प्रकृतीचे स्वतःचे असे विधिविधान आहे. त्यानुसार घटना घडत असतात. अमुक वेळेस पाऊस पडणार किंवा ऊन पडणार हे प्रकृतीच्या अधीन आहे. अनेक सामान्य माणसांना प्रश्न पडतो की संत अवतार घेतात, तर लोकांचे दुःख, दैन्य दूर का करीत नाहीत? या प्रश्नांची अनेक उत्तरे आजपर्यंत आपण पाहिली असतील, पण पुढील उत्तर मला अधिक उचित वाटते.

एकदा श्री रमण महर्षी यांना एकाने प्रश्न विचारला की तुम्ही आपल्या शक्तीचा इतरांच्यापी कल्याणासाठी उपयोग का करीत नाही? तर त्यावेळी रमण म्हणाले की आम्ही दोन कुठे आहोत, आम्ही एकच आहोत. अर्थात मीच परमात्मा आहे आणि मीच सर्व काही करीत आहे. त्यामुळे अनेक वेळा अनेक लोकांचा गोंधळ होऊ शकतो.

साधक जेव्हा सिद्ध होतो, तो गुरू स्वरूप होऊन जातो. तो जगदाकार होऊन जातो. एकदा श्रीमहाराजांना एका भक्ताने विचारले की आमच्या अनेक प्रश्नांचे तुम्ही इतक्या त्वरेने कसे उत्तर देऊ शकता? त्यावर श्रीमहाराज म्हणाले की मला तुमचा प्रश्न आधीच कळलेला असतो. जेव्हा तुमच्या मनात प्रश्न निर्माण होतो

तेव्हाच तो मला कळतो आणि जेव्हा तुम्ही येऊन मला प्रश्न विचारता, तोपर्यंत उत्तर शोधायला मला अवधी मिळतो. मग मी त्याचे उत्तर देऊ शकतो. अर्थात श्रीमहाराज आपल्या मनात उपस्थित असतात, नव्हे ते कायम आपल्या मनात असतात, असे म्हणता येईल. भगवंताची एक उपाधी मन अशीच आहे, नाही का?

*”जेथे नाम, तेथे माझा प्राण | ही सांभाळावी खुण ||”*

– – श्री गोंदवलेकर महाराज

भक्तीच्या पहिल्या पायरीवर भक्त देवाला म्हणत असतो की *तस्य एव अहम्*.

अर्थात त्याचे रूप, गुणवर्णन ऐकले आहे, पण प्रत्यक्षात तो कसा आहे हे माहित नाही. पण तो मला आवडतो.

भक्तीच्या दुसऱ्या पायरीवर भक्त देवाला म्हणतो की *तव एव अहम्*.

अर्थात भक्त भगवंताच्या सान्निध्यात असतो. भगवंत भक्ताच्या सोबतीला असतो. *”जेथे जातो तेथे तू माझा सांगाती”* अशी भक्ताची खात्री असते.

भक्तीच्या तिसऱ्या पायरीवर भक्त आणि देव एकच होत असतात. *”मी तू पणाची झाली बोळवण, एका जनार्दनी श्रीदत्त ध्यानची* अशी स्थिती असते. देव आणि भक्त एकमेकाला म्हणतात, *त्वम् एव अहम्*. ही तदियतेची स्थिती म्हणता येईल.

यापुढील स्थितीमध्ये भक्त देवाला म्हणतो भक्तीचे सुख भोगण्यासाठी मला भक्तच राहू दे नि तू भगवंत रहा.  

संत तुकाराम महाराज या स्थितीचे वर्णन पुढील प्रमाणे करतात.

*”नको ब्रह्मज्ञान आत्मस्थिती भाव | मी भक्त तू देव ऐसे करी ॥१॥ दावी रूप मज गोपिका-रमणा | ठेवीन चरणावरी माथा ॥२॥ पाहोनि श्रीमुख देईन आळिंगन | जिवे लिंबलोण उतरीन ॥३॥ पुसता सांगेन हितगुज मात | बैसोनि एकांत सुख गोष्टी || ४|| तुका म्हणे यासी न लावी उशीर | माझे अभ्यंकर जाणोनीया ॥५॥”*

संदर्भ : अभंग क्रमांक २२७८, सार्थ तुकाराम गाथा धार्मिक प्रकाशन संस्था

 जय जय रघुवीर समर्थ

नारद महाराज की जय!!!

– क्रमशः भक्तीसूत्रे – ७०, ७१, ७२, ७३.

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “तू तिमिरातून तेजाकडे नेणारी!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “तू तिमिरातून तेजाकडे नेणारी!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

“आता एक खोटं लपवण्यासाठी आणखी एक खोटं बोलणार आहेस का? ” आईच्या या निर्वाणीच्या वाक्यावर साहेब नि:शब्द झाले!

त्यांनी सैन्य प्रशिक्षण महाविद्यालयात पोहोचल्या पोहोचल्या तेथील अधिका-यांना अगदी खरं खरं सांगण्याचा निश्चय केला. आणि आईचा आशीर्वाद घेऊन ते रवाना झाले!

सैन्य प्रशिक्षण आणि त्यातून अधिका-यांचं विशेष प्रशिक्षण हे शारीरिक, मानसिक आणि भावनिक क्षमतांचा कस पाहणारे असते. मिळू शकणा-या मोजक्या सुट्यांच्या दिवसांची हे धडधाकट, राकट लोक लहान मुलांसारखी वाट पहात असतात. आणि घरी आल्यावर अक्षरश: आपल्या आईच्या पदराखाली झोपतात… कारण हीच अशी एक जागा आहे जिथं सारं काही माफ असतं!

“मातोश्री अत्यवस्थ… त्वरीत या! ” अशी तार प्रशिक्षण महाविद्यालयात पोहोचली आणि अभ्यासात गुंतलेल्या जंटलमन कडेटला त्वरीत कळवण्यात आले… जाण्या-येण्याचे दिवस गृहीत धरून तातडीची सुट्टी मंजूर करण्यात आली. कडेटची प्रवासाची व्यवस्था झाली!

अत्यंत काळजीच्या मन:स्थितीत साहेब गावात पोहोचले तर सनईचे सूर कानी पडले… साहेबांच्या जिवलग मित्राचं लग्न होतं. या फौजी साहेबाने लग्नात आवर्जून उपस्थित राहावं, असं त्या मित्राला वाटणं स्वाभाविकच होतं! पण या कारणांसाठी प्रशिक्षणातून सुट्टी मिळणं अशक्य होतं. त्या मित्रांनी मग एक वेगळी युक्ती केली. त्यांनी साहेबांना तार धाडली… ”मातोश्री अत्यवस्थ… त्वरीत या! ” 

त्यावेळी मोबाईल, टेलिफोन इत्यादी संपर्क साधने फारशी सहज उपलब्ध नसल्याने काही चौकशी करणे अशक्य होते. साहेबांनी घाई-घाईत घर गाठले होते. मित्रांचा उद्देश ठीक होता… पण त्यांनी योजलेला उपाय कोणत्याही शिस्तीत अजिबात बसणारा नव्हता! साहेबांच्या मातोश्रींना मात्र हा प्रकार अजिबात रुचला नव्हता.

तरुण वय. साहेबांनी मित्राच्या लग्नाचा स्वागत समारंभ अगदी समरसून अनुभवला. गेल्या कित्येक वर्षांत न भेटलेले यार-दोस्त… दिवस कसे निघून गेले लक्षात नाही आलं. प्रशिक्षण महाविद्यालयात पोहोचण्यास एक पूर्ण दिवस उशीर होणार होता!

अतिशय कष्टात दिवस काढलेल्या त्या माऊलीच्या जीवनाचा पाया होता… सत्य… खरं… जे आहे ते! साहेब लहान असताना आई त्यांना म्हणायची… ”पुढे चांगले दिवस पहायचे असतील आयुष्यात, तर आता कठीण परिश्रमांन पर्याय नाही! अन्यथा तुझी जी क्षमता आहे, त्या क्षमतेला तू केवळ आळसामुळे न्याय दिला नाहीस… असं होईल!” 

कोणत्याही ग्रंथातील लांबलचक उपदेशांपेक्षा आईच्या हृदयातून आलेले हे शब्द या मुलाच्या काळजात घर करून बसले… आणि मग त्याने मागे वळून पाहिले नाही. शालेय जीवनापासून ते पदवीपर्यंत, आय. एम. ए. ची प्रवेश परीक्षा आणि एस. एस. बी. ची मुलाखत… हे सर्व टप्पे केवळ मेहनतीच्या जोरावर यशस्वीरीत्या पार पडले!

प्रशिक्षण महाविद्यालयात पोहोचताच लष्करी शिस्तीनुसार चौकशी झाली… पण साहेबांनी परिणामांची चिंता न करता चूक कबूल केली.. आणि जी शिक्षा दिली गेली ती निमूटपणे भोगली! ज्या प्लाटून कमांडर साहेबांपुढे या साहेबांनी आपला थेट कबुलीजबाब दिला होता, त्या कमांडर साहेबांनी पुढील कारकीर्दीत या साहेबांना त्यांच्याच लष्करी युनिटमध्ये नेमणूक दिली… त्यांना असा प्रामाणिक सैन्याधिकारी त्यांच्या हाताखाली हवा होताच!

मध्ये पस्तीस वर्षे उलटून गेली. हा प्रशिक्षणार्थी अधिकारी पुढे आपल्या सचोटी, मेहनत आणि शौर्य या गुणांच्या जोरावर भारतीय सैन्यात उत्तमोत्तम पदांवर काम करीत गेला. सैनिकी कर्तव्याच्या दृष्टीने अत्यंत आव्हानात्मक असलेल्या जम्मू-काश्मीरमध्ये तब्बल पाच वेळा त्यांची नेमणूक झाली. या पाचही वेळा त्यांनी आपला नेतृत्वगुणांचा ठसा उमटवला. स्पष्ट, थेट आणि खरे बोलणे हा स्वभाव झाल्याने कारकीर्द अत्यंत यशस्वी म्हणावी अशी झाली. सेना मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल अशा पदाकाम्नी सन्मान झाला. आणि आता उद्या सेवेतील अखेरचा दिवस येऊन ठेपला अशी परिस्थिती निर्माण झाली.

अंबाला येथील लष्करी केंदावर मेजर जनरल रंजन महाजन, सेना मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल यांना निरोप देण्याची तयारी सुरु होती. साहेबांनी चालकाला त्यांचे वाहन काढायला सांगितले आणि ते थेट दिल्लीच्या दिशेने निघाले. सुमारे तीन-साडेतीन तासांच्या प्रवासात त्यांना आईने आजवर दिलेल्या संस्कारांचे स्मरण होत होते. देशाप्रती निष्ठा, दयाभाव, संवेदनशीलता, संकटसमयी धीरोदात्त राहण्याचे सामर्थ्य आणि आत्मविश्वास! हे गुण मुलांमध्ये जन्मत:च नसतात… ते पेरावे लागतात… त्याला खतपाणी घालावे लागते… स्वत: तसं वागून दाखवावं लागतं… तेंव्हा तिन्ही लोकी झेंडा फडकवणारी मुलं तयार होतात. जिच्या हाती पाळण्याची दोरी… ती जगाचा असा उद्धार करू शकते. भारतीय सैन्यातील अशा अनेक मातांनी हे सिद्ध करून दाखवलं आहे!

साहेब पूर्ण लष्करी गणवेशात होते. घराचा दरवाजा कुणीतरी उघडला… आईसाहेबांना दाराशी कोण आलं आहे ते समजलं नाही! साहेबांनी खास रुबाबदार पद्धतीने पावलं टाकली… आणि आईसाहेबांना कडक मानवंदना दिली! मातोश्रींनी सुद्धा थरथरत्या हातांनी मोठा साहेब झालेल्या लेकाला सल्यूट केला… आणि पुढच्या क्षणी त्याला मिठी मारली… त्याच्या गालाचे हळूवार चुंबन घेतले. यावेळी दोघा मायलेकांचे चेहरे हे जगातल्या सर्वाधिक आनंदी माणसांचे चेहरे होते!

माणूस आईसाठी सदैव लहानच असतो. आई नावाची शिदोरी सरतही नाही आणि उरतही नाही.

गेल्या वर्षी ८ फेब्रुवारी, २०२६ रोजी महाजन साहेबांचे मातृछत्र हरपले! माझ्या आयुष्याला खरा अर्थ माझ्या आईमुळे प्राप्त झाला, असे महाजन साहेब मोठ्या अभिमानाने सांगतात 

(मेजर जनरल रंजन महाजन (सेवानिवृत्त) यांनी जम्मू-काश्मीर मध्ये दीर्घकाळ सेवा बजावली. त्यांच्या तेथील अनुभवावर आधारीत Kashmir in the life of fire… हे पुस्तक नुकतेच प्रसिद्ध झाले आहे. या पुस्तकाचे मराठी, हिंदी भाषांतर व्हायला पाहिजे. माझाही प्रयत्न राहील. २०२३ मध्ये सेवानिवृत्त होण्याच्या एक दिवस आधी घरी जाऊन आपल्या आईला मानवंदना देतानाचा महाजन साहेबांचा विडीओ लाखो लोकांनी पाहिला! आपल्यापैकी काही वाचकांनी हा विडीओ कदाचित पाहिला नसेल म्हणून हा लेख. दिवंगत मातोश्री यांचे नाव खूप शोधले पण कुठे उल्लेख दिसला नाही. असो… आईचे नाव… आईच! ) 

जय हिंद!

© श्री संभाजी बबन गायके.

न-हे, पुणे,  मो 9881298260

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१२ ☆ विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१२ ☆

?  आलेख – विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

🌳माटी से मानुष तक इस हरियाली की रक्षा करें। विश्व पृथ्वी दिवस की एक दिन देर से शुभकामनाएँ।🌳

धरती हमारी चेतना का व्यापक विस्तार है और इसी चेतना को झकझोरने का एक वैश्विक अनुष्ठान है विश्व पृथ्वी दिवस।  उन्नीस सौ सत्तर की वह सुहानी मगर धरती के लिए हमारी फिक्रमंद सुबह में वर्ल्ड अर्थ डे सेलिब्रेशन का इतिहास है, जब अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के एक आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। वह सब महज एक प्रदर्शन नहीं था । आधुनिक मनुष्य का अपनी जड़ों को संभालने  का पहला सामूहिक संकल्प था जिसे आज पूरी दुनिया २२ अप्रैल के कैलेंडर में पृथ्वी दिवस के रूप में सहेज कर मनाती है। आज इस महाभियान की कमान अर्थ डे नेटवर्क नामक संस्था के हाथों में है जो दुनिया के कोने-कोने में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है।

प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता वैसा ही है जैसा एक नन्हे शिशु का अपनी मां के आंचल से होता है पर विडंबना देखिए कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसी आंचल को तार-तार करना शुरू कर दिया है।  संवेनदनशील दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि पृथ्वी दिवस मनाना किसी त्यौहार की रस्म अदायगी नहीं बल्कि अपनी उस मां से माफी मांगना है जिसके धैर्य की परीक्षा हम सदियों से ले रहे हैं। विकास के नाम पर, युद्धों के नाम पर , हम पृथ्वी के प्रति अप्राकृतिक बर्ताव करते आ रहे हैं। जब हम कंक्रीट के जंगलों को विस्तार देते हैं और हरियाली को हाशिए पर धकेलते हैं तब हम दरअसल अपने और अपनी आने वाली नस्लों के  फेफड़ों के लिए हवा कम कर रहे होते हैं।

 यह दिन हमें ठिठक कर सोचने का मौका देता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ कभी समाप्त न किए जा सकने वाले प्लास्टिक के पहाड़ और जहरीली प्रदूषित नदियां ही सौंप कर जाएंगे।

भारतीय संस्कृति में तो भूमि को माता मानकर उसके वंदन की परंपरा रही है जहां सुबह उठकर पैर जमीन पर रखने से पहले भी क्षमा मांगी जाती है। इसी सांस्कृतिक बोध को आज के वैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ना ही इस दिवस की सार्थकता है।

हमें समझना होगा कि जब हम एक पौधा रोपते हैं तो हम केवल मिट्टी में एक बीज नहीं डाल रहे होते बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद की सांस बो रहे होते हैं। जल की एक बूंद को बचाना सागर की मर्यादा को बचाना है और बिजली की व्यर्थ खपत को रोकना सूरज की तपिश के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाना है।

आज जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी भारी-भरकम शब्दावलियां हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं तब समाधान किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली के बदलाव में छिपा है।आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आचरण को इतना सात्विक और प्रकृति अनुकूल बनाएं कि हर दिन पृथ्वी दिवस बन जाए। कूड़े का सही प्रबंधन और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का त्याग करना वह छोटी सी आहुति है जो इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक को देनी चाहिए। अंततः हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं बल्कि इस बात में है कि हम अपनी धरती की हरियाली और उसकी धड़कन को कितना सुरक्षित रख पाए।

हम सब मिलकर एक ऐसी सुबह का सपना देखें जहां हवाओं में सुगंध हो और नदियों में जीवन का संगीत बहता रहे।

सोलर पैनल से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर अब समय आ गया है कि हम हवा से बिजली बनाने वाले संयंत्र हर छत पर लगाएं। समुद्र की लहरों से बिजली बनाने को प्रोत्साहित किया जाए, बिजली से चलने वाली कारों को और बढ़ावा दिया जाए, यही विकल्प है जो पृथ्वी की नैसर्गिक रक्षा कर सकेंगे ।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८६ ☆ वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८६ ☆

☆ वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

भीषण गर्मी जब अपने चरम पर होती है, तब केवल शरीर ही नहीं, मन और समाज भी तपने लगते हैं। आज हम एयर कंडीशनर और कूलर की ओर भागते हैं, लेकिन कभी ठहरकर सोचें—हमारे पूर्वजों ने इस तपती ऋतु के लिए क्या उपाय बनाए थे?

वैसाख मास की परंपराएँ इसी प्रश्न का सजीव उत्तर हैं। जलदान, सत्तू का दान और मौसमी फलों का वितरण—ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थे, बल्कि एक सुविचारित सामाजिक और वैज्ञानिक व्यवस्था थी। गाँव-गाँव में मटके रखना, राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था करना—यह समाज को निर्जलीकरण और लू से बचाने का सामूहिक उपाय था।

सत्तू ( चने का चूर्ण) वास्तव में गर्मी के विरुद्ध शरीर का प्राकृतिक कवच है। यह ठंडक देता है, ऊर्जा बनाए रखता है और शरीर के संतुलन को बनाए रखता है। मौसमी फल—तरबूज, खीरा, आम—ये शरीर को जल और पोषण दोनों देते हैं। जब इन्हें दान के रूप में बाँटा जाता है, तो यह संदेश भी जाता है कि जो हमारे लिए उपयोगी है, वही समाज के लिए भी आवश्यक है।

इसी परंपरा का एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक रूप हमें जीव-जंतुओं के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। गाँवों, कस्बों और शहरों में बड़े-बड़े पात्र, नाद और टंकियाँ रखी जाती हैं, जिनमें पानी भरा जाता है ताकि पशु-पक्षी भी अपनी प्यास बुझा सकें। साल भर जिन पात्रों पर शायद ध्यान नहीं जाता, वे इस समय साफ किए जाते हैं, उनमें ताज़ा पानी भरा जाता है। यह केवल एक कार्य नहीं, बल्कि करुणा का विस्तार है।

दरअसल, जब इन कार्यों को धर्म और पुण्य से जोड़ा गया, तभी वे व्यापक रूप से समाज में स्वीकार्य हो पाए। यही कारण है कि हम न केवल स्वयं इनका पालन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। बचपन में जो दृश्य हमने सहज रूप से देखे—आज उन्हें करते हुए समझ में आता है कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और संवेदनशील व्यवस्था थी।

वैसाख हमें सिखाता है कि प्रकृति, समाज और समस्त जीवों के साथ संतुलन बनाकर ही हम इस भीषण गर्मी से लड़ सकते हैं। यही हमारे संस्कारों की सच्ची ठंडक है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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