मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 15 ☆ श्रीमंती ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

 

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनका  एक भावप्रवण  आलेख  श्रीमंती। )

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 15 ☆

☆ श्रीमंती ☆

घराबाहेर पडले अन् चालायला सुरुवात केली तेवढ्यात ‘ आवं ताई..! आवाजाच्या दिशेनं पाहिलं तर रस्त्याकडेला कधीमधी बसणारी वयस्कर बाई मला बोलावीत होती.मी म्हटलं, कां हो..?

तशी ती जरा संकोचल्यासारखी झाली न् म्हणाली..”ताई तुमच्या अंगावरलं लुगडं लयी झ्याक दिसतया बगा.!”

मी हसून पुढं चालायला लागले तशी ती पट्कन म्हणाली मला द्याल कां वं ह्ये लुगडं..?अक्षी म ऊशार  सूत हाय असलं मला कुनीबी देत न्हाई वं ! हे थंडीच्या दिसांत लयी छान..! आन् आमाला ही असली देत्यात असं म्हणून तिनं अंगावरची सिंथेटिक साडी दाखवली.

मी थोडी विचारात पडले कारण मी नेसलेली साडी एका भव्य प्रदर्शनातल्या आंध्रप्रदेश स्टाॅलमधून मी नुकतीच खरेदी केली होती.आणि माझ्या आवडीचा ग्रे कलर,साडीचं सूत पोत अतिशय सुरेख मस्त कांबिनेशनची साडी मिळाल्याने मी हरकून गेले होते.आणि मी आज पहिल्यांदाच नेसले होते.

मी विचारात पडलेली पाहून ती बाई म्हणाली ताई तुमची इच्छा असल तरच द्या.

मी आता वेगळ्याच विचारात होते.मी अंगावरची साडी तिला कशी द्यावी. म्हणून तिला म्हटलं माझ्याकडे आणखी छान साडी आहे तुला आणून देते.तशी ती म्हणाली दुसरी नको..हीच …

तुमच्या अंगावर कायम सुती लुगडी असत्यात मला लयी आवडत्यात.पन् ही आजची माझ्या मनात भरलीया..!

मग मी म्हटलं हो हीच देईन पण अशीच कशी देऊ धुवून नंतर देते.

नंतरच्या रविवारी ती बसलेली मला दिसली मग मी घरुन धुवून इस्त्री करुन ठेवलेली ती साडी त्यावरचं ब्लाऊज व त्यावर  एक नवीन ब्लाऊजपीस असं तिच्या हातावर ठेवलं व तिला वाकून नमस्कार केला.तशी ती थोडी मागे सरकून म्हणाली हे काय वं ताई..? मला नमस्कार करताय.?

मग मी तिला म्हटलं मी तुला खूप वर्षापासून ओळखते.आज तू खूप दिवसांनी दिसलीस .पण पंचवीस तीस वर्षांपूर्वी आमचं हे घर शेणामातीच्या भिंतींचं होतं तेव्हा तूंच मला ते सारवण्यासाठी शेण आणून द्यायचीस.मला भिंती सावरायला घर साफ करायला मदत करायचीस.हे मी विसरले नाही.तेव्हा मी तुला नमस्कार करण्यात  वेगळं  काहीच नाही.

मी स्वत: नोकरी करत असल्याने मी तशी साडी केव्हाही घेऊ शकले असते पण आज तिला त्या साडीची जास्त गरज होती व तिच्या मनात ती भरली होती.

पुढच्या रविवारी जाताना माझं सहज लक्ष गेलं तर ती साडी नेसून मॅचिंग ब्लाऊज घालून उभी होती.मी तिच्याकडे पाहिलं तर तिच्या चेहऱ्याची श्रीमंती काही वेगळंच सांगत होती.मी भरुन पावले.

©®उर्मिला इंगळे

सातारा.

दिनांक:-२८-११-१९

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 17 ☆ समय की रेत ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

((सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित एक भावप्रवण कविता  “समय की रेत।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 17 ☆

☆ समय की रेत

समय की रेत छूटती जाए,
रे मनुज तेरे हाथों से…!
ये तो पल पल घटता जाए,
कण कण तेरे हाथों से….!

चढ़ता सूरज ढलता जाए,
तू क्यों सोचे बीता कल?
वर्तमान को देख ज़रा,
कण कण बीता तेरा कल।

तू समेट ले अपना मन,
अग्रसर हो ध्येय की ओर,
समय समय की राह चलेगा,
तू समय की राह पर चल।

© सुजाता काळे,

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोब – 9975577684

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हिन्दी साहित्य – साहित्य निकुंज # 24 ☆ कविता ☆ परिभाषित ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  उनकी कविता परिभाषित। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 24  साहित्य निकुंज ☆

☆ परिभाषित

 

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित

मन की क्या भाषा लिखूं।

प्रेम की क्या परिभाषा लिखूं।

चिंतनता का बिंदु क्या

सागर का सिंधु क्या

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित

 

आत्मा की गहराई में तुम

प्यार की ऊंचाई क्या?

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित

 

तुम ही हो देवत्व स्वरूप

देवत्व की पहचान क्या?

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित।

 

लिख रहे है खुशबुओं से

मन के मीत हो तुम ही

जीवन का संगीत तुम ही

कैसे करूं

तुम्हें परिभाषित ।

 

जीवन की आभा तुम ही

सुर की साधना तुम ही

प्रेम का संगीत तुम ही

कर दिया तुम्हें परिभाषित।

 

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

wz/21 हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व ), नई दिल्ली –110056

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 14 ☆ चलो मिलकर सरकार बनाएं  ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी एक सामायिक कविता  “चलो मिलकर सरकार बनाएं ”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़ सकेंगे . ) 

 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 14 ☆

☆ चलो मिलकर सरकार बनाएं   ☆

चलो मिलकर सरकार बनाएं

भानुमति का आकार बनाएं  ।।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।

 

झूठ,कपट,धोखा,मक्कारी ।

घात,आघात की तैयारी ।।

स्वयं की जय जयकार लगाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

जनता को दे झूठ दिलासा ।

आगे रख खुद की अभिलाषा ।।

जोड़ तोड़ कर दरबार सजाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

राजनीति की अलग चाल है ।

यहां बस झूठ का धमाल है ।।

सत्ता अब मक्कार चलाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

यहां न कोई सगा संबंधी ।

राजनीति की रीति है गन्दी ।।

सत्ता से सरोकार बनाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

कोर्ट कचहरी आम बात है ।

यहां न कोई जाति पांति है ।।

कुर्सी के ब्यवहार बनाएँ ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

यहां सभी हैं धुन के पक्के ।

एक दूजे को देते गच्चे  ।।

इन्हें कौन संस्कार पढ़ाए ।।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

जागो जागो हे मतदाता ।

तुम्ही सब के भाग्य विधाता ।।

यह अवसर ना हर बार लाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

राजनीति में “संतोष” कहाँ ।

इक दूजे को दें दोष यहाँ ।।

पर खुद को खुद्दार बतायें ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

सपने सभी साकार बनाएं ।

चलो मिलकर सरकार बनाएं ।।

 

© संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 8 ☆ लघुकथा – आईने में माँ ☆ – डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है.  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी . उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं.  अब आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे. आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण  लघुकथा “ आईने  में माँ ”)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद – # 8 ☆

☆ लघुकथा – आईने में माँ  ☆ 

 

आईने के सामने खड़ी होती हूँ तो मुझे उसमें माँ का चेहरा नजर आता है, ये आँखें देखो…..माँ की ही तो हैं — वही ममतामयी पनीली आँखें, कुछ सूनापन लिए हुए। बार-बार पीछे पलटकर देखती हूँ – नहीं, कहीं नहीं है माँ आसपास, फिर ?

फिर देखा आईने की ओर, आँखें कुछ कह रही थीं मुझसे – रह गई न तुम भी अकेली अपने घर में ? बच्चे पढ़ लिखकर अपने काम में लग गए होंगे, किसी दूसरे शहर में या क्या पता विदेश में? आजकल तो एजूकेशन लोन लेकर बड़े गर्व से तुम लोग बच्चों को विदेश भेज देते हो। बच्चे विदेश पढने जाते हैं और वहीं बस जाते हैं फिर जिंदगी भर राह तकते बैठे रहो उनके आने की।

आँखें बिना रुके निरंतर बोल रही थीं मानों आज सब कुछ कहे बिना चुप ही न होंगी – जय तो शाम को ही आता होगा ? उसके आने के बाद तुम बहुत कुछ कहना चाहती होगी, दिन भर की बातें, जो तुमने मन ही मन बोली हैं अकेले में,  लेकिन वह सुनता है क्या ?

हमारे समय में तो मोबाईल भी नहीं था फिर भी तेरे  पिता के पास समय नहीं होता था मेरी बातें सुनने का। क्या पता इच्छा ही न होती हो मेरी बात सुनने की ? चाय-नाश्ता करके फिर निकल पड़ते थे अपने दोस्त यारों से गप्पे मारने। अरे हाँ ! अब तो व्हाट्सअप का समय है। खासतौर से पतियों को इसने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। अच्छा लगता है उन्हें अपनी दूर की भाभियों को मैसेज फारवर्ड करते रहना,  पत्नी की क्या सुने ? घर में ही तो है कहाँ जाने वाली है? फारवर्डेड मैसेज से दूसरों पर इम्प्रेशन डालना जरुरी है, भई।

बोलते-बोलते आँखें आँसुओं से लबालब हो रही थीं। शादी के बाद बच्चों और परिवार में औरतें अपने को भूल ही जाती हैं और जब उसका पूरा अस्तित्व  परिवार में समा जाता है तब उसे अकेला छोड़ दिया जाता है यह कहकर – बहुत शिकायत करती थीं ना ‘समय नहीं मिलता अपने लिए’ ? अब लो समय ही समय है ? करो, क्या करना चाहती थीं अपने लिए ?

औरत मूक भाव से देखती रह जाती है पति और बच्चों के चेहरों को किसी अबूझ पहेली की तरह। जब परिवार को जरूरत थी एक माँ की, पत्नी की, तब सब कुछ भूलकर जुट रही, जरूरत खत्म होने पर आदेश- अब जियो जैसे जीना चाहती हो। कैसे बताए कि जिम्मेदारियों की बेड़ियों ने खुलकर जीने की आदत ही नहीं रहने दी अब। ऐसे में घर के हर कमरे में बिखरा समय, सिर्फ सन्नाटा और सजा है एक औरत के लिए।

खाली घर में चादर की सलवटें ठीक करती, कपड़े सहेजती, डाइनिंग टेबिल साफ करती बंद होठों वाली औरत कभी बुदबुदाती है अपने आप से, कभी पाती है अपने सवालों के जवाब खुद से, कभी कमरों में बिखरी बच्चों की खट्टी मीठी यादों के साथ मुस्कुराती है तो कभी आँसुओं की झड़ी गालों को तर कर देती है – पर कोई नहीं है इसे देखने वाला, ना आँसू पोंछनेवाला, ना साथ बैठ यादों को ताजा कर मुस्कुराने वाला।

आईने में दिखती आँखें मानों गुस्से में बरस पड़ीं – ना – ना रोना मत, बतियाना मत अकेले में खुद से, बाहर निकल इस सन्नाटे से, अकेलेपन से  वरना तेरे अपने तुझे पागल करार देंगे।

बेसिन में पानी बह रहा था, हाथों में लेकर मुँह पर ठंडा पानी डाला,  छपाक  – आईने में मेरा चेहरा था, मेरी आँखें ?

कहाँ गई माँ ? उसकी पनीली आँखे ? मैंने फिर पलटकर देखा, वह कहीं नहीं थी।

मेरे चेहरे पर माँ की आँखें उग आई थीं ?

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 2 ☆ गीत – मीरा प्रेम दिवानी है ☆ – डॉ. राकेश ‘चक्र’

डॉ. राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक लाख पचास हजार के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि डॉ राकेश ‘चक्र’ जी ने  ई- अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से अपने साहित्य को हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर लिया है। इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं उनका एक गीत   “मीरा प्रेम दिवानी है.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 2 ☆

☆  मीरा प्रेम दिवानी है ☆ 

 

रोम-रोम में

श्याम बस गए

मीरा प्रेम दिवानी है

पावन अमर कहानी है

 

अन्तःपुर में ब्याह रचाया

प्रियतम कृष्ण सलोने से

कभी झुलाया कभी रिझाया

खेली प्रेम खिलौने से

 

रचे प्रेम के गीत बन गए

गीता  अमृत वाणी है

 

तुम अजेय हो

तुम विजेय हो

तुम हो पावन धरणी-सी

तुम्हीं नर्मदा, गंगा मैया

पाप,ताप दुख हरनी-सी

 

शिव-सी है श्रद्धा की देवी

सत की देव पुराणी है

 

हँसना-रोना आभूषण थे

जीवन के संग्रामों में

ऋतुओं ने भी राग सुनाए

भोर-दुपहरी-शामों में

 

नाची-गाई रीझी हरदम

दे दी प्रीत जवानी है

 

मेरे उर में मीरा तुम हो

प्यार मुझे भी दे जाना

विषय-वासना हर तापों को

श्याम सखा को दे जाना

 

मैं भी नाचूँ गाऊँ बेसुध

तू ही मेरी सानी है

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी,  शिवपुरी, मुरादाबाद 244001, उ.प्र .

मोबाईल –9456201857

e-mail –  rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य – # 22 ☆ व्यंग्य – हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा  रचनाओं को “विवेक साहित्य ”  शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  सामयिक व्यंग्य  लोकतंत्र तो क्या घोड़ों को भी  शर्मसार करता हुआ लगता है। खैर, जिसने भी ये शब्द हॉर्स ट्रेडिंग इज़ाद किया हो  या तो वो लोकतंत्र का बिका हुआ घोडा रहा होगा या फिर बिकने को तैयार। बड़ा ही अजीब व्यापार है भाई साहब। वैसे यदि गलत नहीं हूँ तो हॉर्स ट्रेडिंग घोड़ों द्वारा घोड़ों का व्यापार  लगता है। बाकी आप श्री विवेक जी के हॉर्स ट्रेडिंग सम्बन्धी इस  व्यंग्य को पढ़कर कमेंट बॉक्स में बताइयेगा ज़रूर। श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेबाक  व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 22 ☆ 

☆ हार्स ट्रेडिंग जिंदाबाद ☆

 

अचानक 2000 रुपयो की गड्डियां बाजार से गायब होने की खबर आई, मैं अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा हूं कि 2000 के गुलाबी नोट धीरे धीरे  काले हो रहे हैं.   अखबार में पढ़ा था, गुजरात के माननीय 10 ढ़ोकलों  में बिके. सुनते हैं महाराष्ट्र में पेटी और खोको में बिकते हैं.  बिहार वालों का रेट अभी पत्रकारो को मालूम नहीं हो पाया है, वहां सबकी हमेशा से सोती हुई अंतर आत्मायें एक साथ जाग गईं थी और चिल्ला चिल्लाकर माननीयो को सोने नही दे रहीं. माननीयो ने दिलों का चैनल बदल लिया है, किसी स्टेशन से खरखराहट भरी आवाजें आ रही हैं तो  किसी एफ एम  से दिल को सुकून देने वाला मधुर संगीत बज रहा है, सारे जन प्रतिनिधियो ने वही मधुर स्टेशन ट्यून कर लिया. लगता है कि क्षेत्रीय दल, राष्ट्रीय दल से बड़े होते हैं, सरकारो के लोकतांत्रिक तख्ता पलट, नित नये दल बदल, इस्तीफे,के किस्से अखबारो की सुर्खियां बन रहे हैं.

रेस कोर्स के पास अस्तबल में घोड़ों की बड़े गुस्से, रोष और तैश में बातें हो रहीं थी. चर्चा का मुद्दा था हार्स ट्रेडिंग ! घोड़ो का कहना था कि कथित माननीयो की क्रय विक्रय प्रक्रिया को हार्स ट्रेडिंग  कहना घोड़ो का  सरासर अपमान है. घोड़ो का अपना एक गौरव शाली इतिहास है. चेतक ने महाराणा प्रताप के लिये अपनी जान दे दी,टीपू सुल्तान, महारानी लक्ष्मीबाई  की घोड़े के साथ  प्रतिमाये हमेशा प्रेरणा देती है. अर्जुन के रथ पर सारथी बने कृष्ण के इशारो पर हवा से बातें करते घोड़े,  बादल, राजा,पवन, सारंगी, जाने कितने ही घोड़े इतिहास में अपने स्वर्णिम पृष्ठ संजोये हुये हैं. धर्मवीर भारती ने तो अपनी किताब का नाम ही सूरज का सातवां घोड़ा रखा. अश्व शक्ति ही आज भी मशीनी मोटरो की ताकत नापने की इकाई है.राष्ट्रपति भवन हो या गणतंत्र दिवस की परेड तरह तरह की गाड़ियो के इस युग में भी, जब राष्ट्रीय आयोजनो में अश्वारोही दल शान से निकलता है तो दर्शको की तालियां थमती नही हैं.बारात में सही पर जीवन में कम से कम एक बार हर व्यक्ति घोड़े की सवारी जरूर करता है. यही नही आज भी हर रेस कोर्स में करोड़ो की बाजियां घोड़ो की ही दौड़ पर लगी होती हैं. फिल्मो में तो अंतिम दृश्यो में घोड़ो की दौड़ जैसे विलेन की हार के लिये जरूरी ही होती है, फिर चाहे वह हालीवुड की फिल्म हो या बालीवुड की. शोले की धन्नो और बसंती के संवाद तो जैसे अमर ही हो गये हैं. एक स्वर में सभी घोड़े हिनहिनाते हुये बोले  ये माननीय जो भी हों घोड़े तो बिल्कुल नहीं हैं. घोड़े अपने मालिक के प्रति  सदैव पूरे वफादार होते हैं जबकि प्रायः नेता जी की वफादारी उस आम आदमी के लिये तक नही दिखती जो उसे चुनकर नेता बना देता है.

वाक्जाल से, उसूलो से उल्लू बनाने की तकनीक नेता जी बखूबी जानते हैं.  अंतर्आत्मा की आवाज  वगैरह वे घिसे पिटे जुमले होते हैं जिनके समय समय पर अपने तरीके से इस्तेमाल करते हुये वे स्वयं के हित में जन प्रतिनिधित्व करते हैं और अपने किये गलत को सही साबित करने के लिये इस्तेमाल करते हैं.  नेताजी बिदा होते हैं तो उनकी धर्म पत्नी या पुत्र कुर्सी पर काबिज हो जाते हैं. पार्टी अदलते बदलते रहते हैं  पर नेताजी टिके रहते हैं. गठबंधन तो उसे कहते हैं जो सात फेरो के समय पत्नी के साथ मेरा, आपका हुआ था. कोई ट्रेडिंग इस गठबंधन को नही  तोड़ पाती.  यही कामना है कि हमारे माननीय भी हार्स ट्रेडिंग के शिकार न हों आखिर घोड़े कहां वो तो “वो” ही  हैं !

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #25 ☆ गिरगिट ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक अतिसुन्दर लघुकथा  “गिरगिट ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #25 ☆

☆ गिरगिट ☆

 

“सरजी! एक समय वह था जब उस ने आप से आप का कार्यालय खाली करवा कर कब्जा जमा लिया था. आज वह समय है कि जब आप के अधीन उसे काम करना पड़ रहा है.” महेश ने प्रधानाध्याक को प्राचार्य का प्रभार मिलते ही कहा, “वह अध्यापक हो एक साल तक एक प्रशासकीय अधिकारी के ऊपर रौब झाड़ता रहा था. अब उसे मालुम होगा कि नौकरी करना क्या होता है?”

“यह तो प्रशासकीय प्रक्रिया है. ऐसा होता ही रहता है,” प्रभारी प्राचार्य ने कहा तो महेश बोला, “आप उसे सबक सीखा कर रहना. उस ने आप को बहुत जलील किया था.”

“उस वक्त आप भी तो उस के साथ थे.”

“अरे नहीं साहब! उस वक्त उस की चल रही थी. अधिकारियों से उस की बनती थी. वह दलाली कर रहा था. मजबूरी में उस का साथ देना पड़ा. आप जैसे इमानदार आदमी से दुनिया चलती है. आप उस की दलाली बंद करवा ​दीजिए साहब,” यह सुनते ही प्राचार्य ने महेश को घूरा, “और उस वक्त ! आप भी तो तमाशा देख रहे थे. जब उस ने दादागिरी से मेरा कार्यालय खाली करवाया था.”

“उस वक्त चुप रहना मेरी मजबूरी थी सर,” महेश ने कहा, “मगर, इस वक्त आप साहब है. आप का हम पूरा साथ देंगे.”

उस की बात सुन कर प्राचार्य हंसे, “वाकई सही कहते हो. जब समय किसी से डांस करवाता है तो गाने बजाने वाले अपने ही होते हैं.”

यह सुन कर महेश चौंका, “क्या कहा साहब जी!” यह बोल कर वह चुप हो गया. शायद इस का आशय उस के दिमाग ने पकड़ लिया था.

इधर प्रधानाध्यापक उस की चेहरे का रंग बदलते देख उस में कुछ ढूंढने का प्रयास कर रहे थे.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 24 – बरं आहे मना तुझं… ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर कविता बरं आहे मना तुझं… )

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #24☆ 

 

☆  बरं आहे मना तुझं… ☆ 

 

बरं  आहे मना तुझं

सदा राही रूबाबात

ताबा घेऊनीया माझा

राही तिच्या घरट्यात. . . . !

 

बरं आहे मना तुझं

जमे हासू आणि आसू

कधी  इथे, कधी तिथे

आठवांचे रंग फासू . . . !

 

बरं आहे मना तुझं

खर्च नाही तुला काही

अन्न पाण्या वाचूनीया

तुझे अडते ना काही .. . !

 

बरं आहे मना तुझं

माझी खातोस भाकरी

माझ्या घरात राहून

तिची करशी चाकरी. . . !

 

बरं आहे मना तुझं

असं तिच्यात गुंतण

ठेच लागताच मला

तिच्या डोळ्यात झरणं.. . !

 

© सुजित कदम, पुणे

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 25 – घर बदलताना ….☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी एक कविता  “घर बदलताना …..    सुश्री प्रभा जी की कविता की एक एक पंक्तियाँ हमें एक चलचित्र का अहसास देती हैं।  यह सच है अक्सर युवती ही पदार्पण करती है अपने नए घर में ।  फिर एक एक क्षण बन जाता है इतिहास जो  स्मृति स्वरुप आजीवन साथ रहता है अश्रुपूरित उस घर को बदलते तक।  या तो  घर बदलता है  जिसमें हम रहते हैं या फिर शरीर जिसमें हमारी आत्मा रहती है।  अतिसुन्दर रचना एक मधुर स्मृति  की तरह संजो कर रखने लायक।  मैं यह लिखना नहीं भूलता कि  सुश्री प्रभा जी की कवितायें इतनी हृदयस्पर्शी होती हैं कि- कलम उनकी सम्माननीय रचनाओं पर या तो लिखे बिना बढ़ नहीं पाती अथवा निःशब्द हो जाती हैं। सुश्री प्रभा जी की कलम को पुनः नमन।

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 24 ☆

☆ घर बदलताना …. ☆ 

 

खुप आठवणी आहेत गं

या घराच्या !

इथेच तर सुरू झाला

नवा संसार –

उंबठ्यावरचं माप ओलांडून

आले या घरात तेव्हा-

कुठे ठाऊक होते ??

पुढे काय वाढून ठेवलंय

ताटात !!

“हक्काचं छप्पर ” एवढीच

ओळख नाही या घराची !!

केवढा मोठा कालखंड काढलाय याच्या कुशीत ?

पूजाअर्चा, तुळशीला पाणी घालणं,दारात रांगोळी रेखणं  पाहिलंय!

कांकणाची कीणकीण पैंजणाची छुनछुन ,सारं ऐकलंय या घरानं !

बदलत गेलेली प्रतिमा पाहिली

आहे !

उंबरठा ओलांडताना झालेली

घालमेल पाहिली आहे !

तोलून धरली आहेत यानंच ,

कित्येक वादळं ,

ऐकले आहेत वाद विवाद आणि वादंग !

सोसले आहेत पसारे –

कागदा  -कपड्यांचे ,

अस्ताव्यस्त बेशिस्तपणाचे

शिक्के ही बसले आहेत !

तरी ही इतक्या वर्षाच्या सहवासाचे बंध जखडून ठेवताहेत !

मनाच्या टाईम मशिन मधे जाऊन अनुभवतेय ते जुने पुराणे क्षण ….

सोडून ही वास्तु नव्या घरात ,जाताना आठवतंय सारं भलं बुरं !

जुनंपानं फेकून देताना

हाताशी येतंय काही हरवलेलं !

जुनं घर सोडताना दाटून येतंय  मनात बरचं काही !

खुप आठवणी आहेत गं

या घराच्या !!

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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