(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चोट्टा, चुगलखोर”।)
अभी अभी # 188 ⇒ चोट्टा, चुगलखोर… श्री प्रदीप शर्मा
ये शब्द बाल साहित्य के हैं। नंद और यशोदा के लाल के लिए भक्त शिरोमणि सूरदास जी छलिया और माखनचोर जैसे शब्दों का प्रयोग करते नजर आते हैं, जब कि हमारे जमाने के बाल गोपाल एक दूसरे के लिए चोट्टा और चुगलखोर जैसे शब्दों से ही काम चला लेते थे।
जो अंतर चोर और चोट्टे में है, वही अंतर शिकायत और चुगली में है। जागो ग्राहक जागो, अपने अधिकारों के प्रति सजग हों। मिलावट, और चोर बाजारी के खिलाफ आवाज उठाना और शिकायत करना, हर उपभोक्ता का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जब चोर चोर मौसेरे नहीं, सगे भाई बहन हों, तो जागा नहीं जाता, शिकायत नहीं की जाती। वहां तो बस मिलीभगत ही काम आती है। ।
वैसे हमारे वयस्क समाज में ये दोनों शब्द ही शोभनीय नहीं हैं। हमारे संत भी चोर मन की ही बात करते हैं, चोट्टे मन की नहीं। एक भक्त को यह अधिकार तो है कि वह अपने आराध्य से शिकायत करे, अनुनय विनय करे, गिड़गिड़ाए, लेकिन भगवान से भी कभी किसी की चुगली नहीं की जाती।
मैया मोहि दाऊ मोहे बहुत खिझायों
मो से कहत मोल को लीन्हौ
तू जसुमति कब जायौं ?
लेकिन महाराज, यह तो सरासर चुगली है और मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो, तो चोरी और सीना जोरी ! बिल्कुल ऐसा ही हमारे साथ बचपन में होता था। बड़े भाई साहब तो हमेशा डांटते और खाने को दौड़ते थे, लेकिन दीदी से हमारी बहुत घुटती थी। घुटने का मतलब ही होता है, एक दूसरे के काम आना, एक दूसरे की कमजोरियों को छुपाना।
स्कूल में, इंटरवल में कौन गोली, बिस्किट और बर्फ के लड्डू नहीं खाता। जब गला खराब होता तो घर जाकर शामत आ जाती। जरूर कुछ उल्टा सुल्टा खाया होगा। जवाब दो !
मां तो सिर्फ डांटती थी। लेकिन बड़े भैया और पिताजी से बहुत डर लगता था। बहुत कुछ छुपाना पड़ता था एक दूसरे के लिए।।
कभी कभी जब किसी बात पर लड़ाई हो जाती, तो छोटी मोटी गलतियों और वारदातों की चुगली भी कर दी जाती। साथ साथ दूध और दही की मलाई चोरी से खाने का मजा ही कुछ और था। थोड़ी किसी बात को लेकर अनबन हुई, और चुगली शुरू! मां ये भैया चोट्टा है, चोरी से मलाई खाता है।
मां को ऊंठे जूठे से बहुत चिड़ थी, वह भी भड़क उठती, ठहर चोट्टे, तुझे बताती हूं। बेचारा हम जैसा कमजोर इंसान क्या कर सकता था। जब कि मलाई तो हम दोनों भाई बहन मिलकर ही चुराते और खाते थे। मन मसोसकर दीदी को यही कह पाते थे, दीदी आप चुगलखोर हो। आगे से मैं भी आपकी इसी तरह हर बात पर चुगली करूंगा। आपसे कट्टी। ।
इसे मानवीय कमजोरी कहें, अथवा भाई बहन का प्रेम, संकट में वैसे भी सगे ही काम आते हैं। बहुत जल्द हमारा समझौता हो जाता। केवल चोर चोर ही मौसेरे भाई नहीं होते, बचपन में, चोट्टे और चुगलखोर, आपस में भाई बहन भी होते हैं।
आज जब भी बचपन की ऐसी छोटी मोटी घटनाएं याद आ जाती हैं, मन करता है, आज फिर कोई हमारी चुगली करे, हमें चोट्टा कहे। बहुत अर्सा हुआ, चोरी से मलाई नहीं खाई। ।
(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज से प्रस्तुत है आलेखों की एक नवीन शृंखला “प्रमोशन…“ की अगली कड़ी। )
☆ आलेख # 88 – प्रमोशन… भाग –6 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆
आखिर कुछ महीनों और कुछ दिनों के इंतजार के बाद बहुप्रतीक्षित रिजल्ट आ ही गया और सारे कि सारे ही पास हो गये. अब इंटरव्यू फेस करना था तो उसकी तैयारियां शुरु हो गईं. तैयारी का पहला चरण इंटरव्यू के लिये पहनी जानी वाली ड्रेस का चयन करना था. इंटरव्यू की अनुमानित तिथि तक ग्रीष्म ऋतु के पूरे शबाब में होने के कारण फुल शर्ट और पैंट ही मुफीद माना गया. कंठलंगोट पहनने का प्रशिक्षण शुरु हो गया जो कि साक्षात्कार से दस मिनट पहले भी पहनी जा सकती है. शुक्र है कि उस वक्त सीसीटीवी का अविष्कार नहीं हो पाया था वरना बाहर की रिकार्डिंग देखकर ही अंदरवाले कुछ लोगों को सिलेक्ट लिस्ट से बाहर कर देते. जो रोजमर्रा के जीवन में पहने जाते हैं उन्हें जूते कहा जाता है पर इंटरव्यू में चरणों की शोभा “शूज़” से बढ़ती है इसका पूरा खयाल रखा जाता है कि ये साउंड प्रुफ हों और इन शूज़ को कुत्तों के समान काटने का शौक न हो. शहर इतना बड़ा तो था कि वहाँ बैंक में पहले प्रमोशन के हिसाब से सब कुछ मिल जाता था तो बाहरी डेकोरेशन की तैयारी पूरी थी.
अब इंटरनल डेकोरेशन के लिये तैयारी करनी थी. उस समय मॉक इंटरव्यू नामक सुविधा उपलब्ध नहीं थी. जिन लोगों ने फिर से वही किताबें उठा लीं, उनको सलाह दी गई कि इन किताबों पर आधारित ज्ञान की परीक्षा तो हो गई. अब इंटरव्यू का मतलब पर्सनैलिटी परीक्षण से होता है. बात करने का तरीका, समस्याओं पर प्रत्याशी का नजरिया, जो भी आसपास घट रहा है याने करेंट अफेयर्स, उसकी अपडेट्स, और सबसे कठिन प्रश्न कि “Why you should be promoted” वैसे इसके बहुत सारे सरल जवाब हैं पर ये इंटरव्यू में दिये नहीं जा सकते, उद्दंडता प्रकट होने का खतरा होता है. जो इसका जवाब बड़ी चतुराई से दे पाते हैं वो बोर्ड के सामने सिक्का जमा लेते हैं. ये बोर्ड कैरमबोर्ड नहीं बल्कि शतरंज का बोर्ड होता है जिसमें सारे शक्तिशाली मोहरे, दूसरी तरफ बैठे प्यादे की वजीर बनने की क्षमता भांपते हैं या अपने मानदंडों पर नापते हैं. इंटरव्यू कक्ष में नॉक करने और कक्ष में प्रवेश करते समय की बॉडी लेंग्वेज से लेकर वापस जाने तक की बॉडीलैंग्वेज का बड़ी बारीकी से परीक्षण किया जाता है. लिपिकीय स्टाफ क्या आसानी से अपनी कंफर्ट ज़ोन से बाहर आ पायेगा या फिर शाखाप्रबंधक बनकर भी बाबू बनकर ही बचा हुआ या छोड़ा हुआ काम करता रहेगा. प्रबंधन भले ही कनिष्ठ हो पर चयन, उपलब्ध में से ही सबसे बेहतर लोगों को चुनने की प्रक्रिया ही इंटरव्यू कहलाती है जिसकी गुणवत्ता और श्रेष्ठता प्रबंधन के बढ़ते लेवल के साथ बढ़ती जाती है. इंटरव्यू के दौरान कॉन्फिडेंस तो कम होता है पर हाथों, और चेहरे पर पसीना आना, गला सूखने पर भी सामने रखे पानी के गिलास का अनुमति लेकर प्रयोग नहीं करना, आवाज़ कांपना, बहुत धीरे बोलना, जानते हुये भी खुद को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त नहीं कर पाना ये सब व्यक्तित्व की कमजोरियों में शुमार होते हैं. हर अर्जुन, कर्ण और एकलव्य के समान कुशल धनुर्धर नहीं होता पर काबलियत से जो इंटरव्यू बोर्ड को आश्वस्त करदे वही सिलेक्ट लिस्ट में जगह पाता है. मि. 100% जब इंटरव्यू कक्ष में गये और फिर जब वापस निकले तो उनकी nervousness में अप्रत्याशित वृद्धि नजर आ रही थी जबकि बाकी चार तो “हुआ तो हुआ वरना कौन सी नौकरी जाने वाली है” वाले मूड में प्रफुल्लित नजर आ रहे थे.
रिजल्ट का इंतजार कीजिये, ये मेरी नहीं हमारी कहानी है.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तीन पत्ती …“।)
अभी अभी # 187 ⇒ तीन पत्ती… श्री प्रदीप शर्मा
तीन पत्ती – (वैधानिक स्पष्टीकरण ; यह शरीफों का नहीं, बुद्धिमानों का खेल है।)
शुद्ध हिंदी में आप इसे जुआ कह सकते हैं, और शिष्ट भाषा में फ्लैश। मैं एक शरीफ इंसान हूं, इसलिए कोशिश करके भी तीन पत्ती नहीं खेल सकता। यह फूल पत्तियों का नहीं, ताश के बावन पत्तों का खेल है। जो मुझ जैसे लोग तीन पत्ती का मतलब नहीं जानते, वे सत्ते पे सत्ता और नहले पर दहला का अर्थ जरूर जानते हैं। ये दोनों बॉक्स ऑफिस की किसी जमाने की हिट फिल्म थी। वैसे सन् १९७३ में गुलाम बेगम बादशाह फिल्म भी आई थी, अच्छी भली शान से चल रही थी, अचानक चली गई।
जानकर सूत्रों के अनुसार तीन पत्ती केवल दस पत्तों का ही खेल है, और जिसके पास तीन इक्के, वह मुकद्दर का सिकंदर। जो ताश नहीं खेलते, वे भी जानते हैं, तीन इक्का क्या होता है। रेडियो पर कभी अमीन सयानी की आवाज गूंजती थी, मोटा दाना, मीठा स्वाद, तीन इक्का तुअर दाल, महादेव सहारा एंड सन्स, इंदौर। तब रेडियो पर इंदौर का नाम सुन बड़ा गर्व होता था।।
तीन का संबंध पत्ती से ही नहीं, बत्ती से भी है। इंदौर में पहला ट्रैफिक सिग्नल यानी तीन बत्ती, जेलरोड चौराहे पर लगी थी, और लोग उसे उत्साह में तीन बत्ती चौराहा कहने लगे थे। आज भी इंदौर में तीन पुलिया भी है और तीन इमली चौराहा भी। पोलोग्राउंड पर तीन बड़ी बड़ी चिमनियाँ कभी इंदौर की पहचान थी। आज उसी शहर में कपड़ा मिलों की चिमनियों का धुआं नहीं, चारों ओर वाहनों का धुआं और ध्वनि प्रदूषण व्याप्त है।
छोटी मोटी बुराई हर इंसान में होती है। हमारी मोटी बुद्धि में भी ताश जैसी बुराई बचपन से ही मौजूद थी। हम भाई बहन, रंग मिलावनी, सत्ती लगावनी, और तीन दो पांच से कभी आगे नहीं बढ़ पाए। बड़ों के सत्संग ने हमें आगे चलकर चौकड़ी और छकड़ी के लायक भले ही बना दिया हो, लेकिन चतुराई और हाथ की सफाई में हमने सबको निराश ही किया। इस निराश नर को कोई अपना पार्टनर बनाने को ही तैयार नहीं होता था।।
वे दिन भी क्या दिन थे। अक्सर ऑफिस और दफ्तरों में ट्रिप, पिकनिक और बगीचों में दाल बाफले की फेयरवेल पार्टियां हुआ करती थी। कभी मांडू जा रहे हैं तो कभी उदयपुर !
सफर तो अंताक्षरी से कट जाता था, लेकिन वहां जाकर दो ग्रुप हो जाते थे। एक शरीफ गृहस्थों का तंबोला ग्रुप और एक सयानों का तीन पत्ती ग्रुप।
एक माचिस की काड़ी से लोग फुल हाउस खेल जाते थे, और हम जैसे लोग two fat ladies सुनकर आपस की महिलाओं को देखा करते थे और हमारी एक भी लाइन क्लियर नहीं हो पाती थी।
बहुत क्लब हैं हमारे शहर में लायंस और रोटरी के अलावा भी। एक यशवंत क्लब भी है, जहां राजा महाराजा, ओल्ड डेलियन्स और नामी गिरामी क्रिकेट खिलाड़ियों के अलावा कई प्रसिद्ध उद्योगपति, व्यापारी और सेलिब्रिटीज सदस्य होते हैं। खेलों की कोई सीमा नहीं होती। कई हेल्दी गेम्स खेले जाते हैं यहां, जिनमें एक गेम ब्रिज भी अधिक प्रचलित है। जिसका दिमाग फ्लैश में ही नहीं चलता, उसके दिमाग की बत्ती ब्रिज जैसे गेम में कैसे चलेगी। चैस यानी शतरंज जैसा ही दिमाग का खेल है ब्रिज।
हम तो हावड़ा ब्रिज देखकर ही निहाल हो गए।।
आज की युवा पीढ़ी और कम उम्र के बच्चों को जब डेस्कटॉप और मोबाइल पर सभी आउटडोर और इनडोअर गेम्स खेलते देखता हूं, तो अपनी बुद्धि पर तरस आता है। हम जीवन भर बादाम खाते रहे और लगड़ी, खो खो, कबड्डी और सितोलिया खेलते रहे, और आज की पीढ़ी मैग्गी, पास्ता, बर्गर और चाइनीज खा खाकर भी हमसे कई किलोमीटर आगे निकल गई।
अगर हमें आगे बढ़ना है तो समय के साथ तो चलना ही पड़ेगा। तीन पत्ती जैसे वाहियात खेलों से ही दिमाग की बत्ती नहीं जलती। राजनीति भी एक अच्छा खेल है। खेल का एक ही नियम, उगते सूरज को सलाम।। शुभ नवरात्र !
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 56 ☆ देश-परदेश – आज का मक्खन ☆ श्री राकेश कुमार ☆
आज सांय रेडियो पर एक गीत “ओ मेरे मखना मेरी सोनिए” बज रहा था, तो मक्खन शब्द पर मन में अनेक विचार आने लगे। हमारे परिवार में एक बुजुर्ग भी “मक्खन लाल” के नाम से जाने जाते थे। जब नौकरी आरंभ हुई तो वरिष्ठ साथी कहने लगे मक्खन लगाना सीख लो, तभी ऊंचाई तक पहुंच पाओगे।
अब तो नाश्ते में भी “ब्रैड बटर” को प्रमुखता दी जाती हैं।
विगत दो दशकों से “ढाबा” संस्कृति का चलन बहुत अधिक हो गया हैं। घर का भोजन छोड़ बाहर के भोजन को प्राथमिकता दी जाने लगी है। आजकल किसी भी ढाबे पर जाओ मक्खन दिल खोल कर खिला रहा है। खाने के साथ कटोरी में या परांठों के ऊपर मक्खन के बड़े से क्यूब रख दिए जाते हैं या फिर इस मक्खन को दाल और सब्जियों के ऊपर गार्निश की तरह डाल दिया जाता है।
खाने वाले गदगद हो जाते हैं कि देखो क्या कमाल का होटल है पूरा पैसा वसूल करवा रहा है।
ये मक्खन नहीं सबसे घटिया पाम आयल से बनी मार्जरीन है।
बटर टोस्ट, दाल मखनी, बटर ऑमलेट, परांठे, पाव भाजी, अमृतसरी कुल्चे, शाही पनीर, बटर चिकन और ना जाने कितने ही व्यंजनों में इसे डेयरी बटर की जगह इस्तेमाल किया जा रहा है और आपसे दाम वसूले जा रहे हैं डेयरी बटर के।
कुछ लोगों को ढाबे पर दाल में मक्खन का तड़का लगवाने और रोटियों को मक्खन से चुपड़वा कर खाने की आदत होती है। उनकी तड़का दाल और बटर रोटी में भी यही घटिया मार्जरीन होती है।
लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए इसे जीरो कोलेस्ट्रॉल का खिताब भी हासिल है। क्योंकि मेडिकल लॉबी ने लोगों के दिमाग में ठूंस दिया है कि बैड कोलेस्ट्रॉल ह्रदय आघात का प्रमुख कारण है। इसीलिये आजकल जिस भी चीज पर जीरो कोलेस्ट्रॉल लिखा होता है जनता उसे तुरंत खरीद लेती है। इस प्रकार के उत्पाद जो किसी असली चीज का भ्रम देते हैं उनपर सरकार को कोई ठोस नियम बनाना चाहिए।
सरकार को चाहिये इस मार्जरीन का रंग डेयरी बटर के रंग सफ़ेद और हल्के पीले के स्थान पर भूरा आदि करने का नियम बनाये जिससे लोगों को इस उत्पाद को पहचानने में सुविधा हो ताकि उन्हें मक्खन के नाम पर कोई मार्जरीन ना खिला सके… आप मार्जरीन के बारे मे और अधिक गूगल पर सर्च कर सकते है यह मक्खन नहीं है।
इसलिए बाज़ार के मक्खन का उपयोग दूसरों को लगाने में ही करें। आपके अटके हुए कार्य इत्यादि जल्द पूरे हो जाएंगे। यदि मक्खन खाना है, तो घर में बनाया हुआ ही खाए और स्वस्थ रहें।
मदनगंज किशनगढ़ (राजस्थान) में “पहाड़िया” के मक्खन वड़े बहुत प्रसिद्ध होते हैं। कहते हैं, सबके साथ खाने से जल्दी हजम हो जाते हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आंख से टपकी जो चिंगारी”।)
अभी अभी # 186 ⇒ आंख से टपकी जो चिंगारी… श्री प्रदीप शर्मा
सुबह सुबह विविध भारती लगाया, तो ये शब्द कानों में पड़े;
आंख से टपकी जो चिंगारी
हर आंसू में छवि तुम्हारी।
ऐसा लगा आंसू आंख से नहीं, आकाश से टपका हो। मेरा पूरा ध्यान केवल एक शब्द “टपकी” पर टिक गया। मेरे कानों ने टपकने की आवाज साफ सुनी, क्योंकि यह शब्द रफी साहब ने टपकाया था।
गीतकार तो गीत लिख देता है, फिर उसकी धुन संगीतकार बनाता है और गायक उसको गाता है।
यह एक शब्द की यात्रा है, जो जब किसी धुन में बांधकर किसी गायक के गले से बाहर निकलता है, तो अमर हो जाता है। ये आंसू मेरे दिल की जुबान है।।
अक्सर जब हम किसी गीत को सुनते हैं, तो अनायास ही बहते बहते किसी जगह ठहर जाते हैं, कभी कोई शब्द हमें छू जाता है, तो कभी कोई धुन। और कहीं गायक का अंदाज हमें मंत्रमुग्ध कर देता है।
रफी साहब के बारे में कहा जाता है कि वे गीत को अपनी स्टाइल में नहीं, अदाकार की स्टाइल में गाया करते थे। उनके मन में सभी संगीतकारों के लिए सम्मान था, और उन्हें भी इतनी छूट थी कि वे गाने को अपने हिसाब से गाएं। और शायद इसी कारण जब उनकी आवाज में आंख से चिंगारी टपकी, तो उस पर मेरा ध्यान चला गया। “टपकी” उन्होंने जिस अंदाज़ में गाया, यह उनका अपना अंदाज था, अपना प्रयोग था।।
पूरा गीत एक ठहराव लिए हुए है। लगता है मानो पूरा गीत रफी साहब ने आंसुओं में डूबकर ही गाया है। और अगर संगीत की भाषा में कहें तो आंसुओं में बहते बहते गाया है। धुन भी इतनी प्यारी और दर्द भरी, कि बस सुनने और गुनगुनाने का मन करे।
गीत में केवल तीन अंतरे हैं, लेकिन पूरे आंसुओं की दास्तान कह जाते हैं। जो आंसुओं की जबान जानता है, वही इस दर्द को महसूस कर सकता है, जब आंख से आंसू नहीं चिंगारी टपकती है। रफी साहब उस दर्द को महसूस करते हुए जब अपना सारा गायकी का हुनर “टपकी” पर लगा देते हैं, तो यह गीत अमर हो जाता है। ऐसे कमाल रफी साहब अक्सर अपने गीतों में किया करते हैं ;
आंख से टपकी जो चिंगारी
हर आंसू में छवि तुम्हारी।
चीर के मेरे दिल को देखो
बहते लहू में प्रीत तुम्हारी।।
ये जीवन जैसे सुलगा तूफान है …
हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन और इनके हमराही रफी साहब ने मिलकर ये आंसुओं का सैलाब जो बहाया है, उसके बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि ये गीत मानो बहते आंसुओं का प्रवाह है …!!
☆ आलेख ☆ नवरात्रि पर्व विशेष – नवरात्रि पर्व – घटस्थापना, दर्शन और विज्ञान ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
इस वर्ष 15 अक्टूबर से 2023 से नवरात्रि पर प्रारंभ हो रहा है जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है यह 9 रातों का त्यौहार है। हम सभी जानते हैं कि इस त्यौहार में हम दुर्गा मां और उनके विभिन्न रूपों का अध्ययन एवं आराधना करते हैं। मां दुर्गा की आराधना का यह त्यौहार वर्ष में 4 बार आता है। दो बार गुप्त नवरात्रि और दो बार नवरात्रि के रूप में।
विक्रम संवत के वर्ष का प्रारंभ चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की परिवा से होता है। और इसी दिन से चैत्र मास की नवरात्रि भी प्रारंभ होती है। ऐसा माना जाता है कि चैत्र शुक्ल पक्ष के नवमी के दिन भगवान राम का धरती पर अवतरण हुआ था। इस नवरात्रि को वासंतिक नवरात्रि कहते हैं।
दूसरी प्रकट नवरात्रि को हम शारदीय नवरात्रि कहते हैं। यह अश्वनी माह के शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। इस वर्ष यह 15 अक्टूबर से प्रारंभ हो रही है।
पहली गुप्त नवरात्रि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से तथा दूसरी गुप्त नवरात्रि माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होती है।
नवरात्रि घटस्थापना के नियम :-
1-देवी भागवत के अनुसार अगर अमावस्या और प्रतिपदा एक ही दिन पड़े तो उसके अगले दिन पूजन और घट स्थापना की जाती है।
2-विष्णु धर्म नाम के ग्रंथ के अनुसार सूर्योदय से 10 घटी तक प्रातः काल में घटस्थापना शुभ होती है।
3-रुद्रयामल नाम के ग्रंथ के अनुसार यदि प्रातः काल में चित्रा नक्षत्र या वैधृति योग हो तो उस समय घट स्थापना नहीं की जाती है अगर इस चीज को टालना संभव ना हो तो अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना की जाएगी।
4- देवी पुराण के अनुसार देवी की देवी का आवाहन प्रवेशन नित्य पूजन और विसर्जन यह सब प्रातः काल में करना चाहिए।
5-निर्णय सिंधु नाम के ग्रंथ के अनुसार यदि प्रथमा तिथि वृद्धि हो तो प्रथम दिन घटस्थापना करना चाहिए।
वर्ष 2023 के शारदीय नवरात्र के घट स्थापना का मुहूर्त:-
उपरोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुए हम घटस्थापना के मुहूर्त का शोध करेंगे। नियम क्रमांक 2 विष्णु धर्म ग्रंथ के अनुसार 10 घड़ी के अंदर घटस्थापना की जानी चाहिए। 15 अक्टूबर को सूर्योदय 6:21 पर होगा अतः 10 घड़ी 10: 21 मिनट पर समाप्त होगी। अतः इस नियम के अनुसार घटस्थापना 10:21 के पहले कर लेनी चाहिए।
15 अक्टूबर को चित्रा नक्षत्र है और नियम तीन के अनुसार घट स्थापना का कार्य चित्रा नक्षत्र में नहीं करना चाहिए। अतः 10:21 तक घट स्थापना करना संभव नहीं है। इसी नियम के अनुसार घटस्थापना का कार्य अभिजीत मुहूर्त में करना चाहिए जो की सागर के पंचांग के अनुसार 11:38 से 12:24 तक है। अतः सागर में घटस्थापना 11:38 से 12:24 दोपहर के बीच में किया जाना चाहिए। अन्य स्थानों के लिए अक्षांश देशांतर के अनुसार समय में थोड़ा सा परिवर्तन होगा।
नवरात्रि का दार्शनिक पहलू:-
देवी भागवत के अनुसार देवी मां ने सबसे पहले महिषासुर के सेना का वध किया था। उसके बाद उन्होंने महिषासुर का वध किया। महिषासुर का अर्थ होता है ऐसा असुर जोकि भैंसें के गुण वाला है अर्थात जड़ बुद्धि है। महिषासुर का विनाश करने का अर्थ है समाज से जड़ता का संहार करना। समाज को इस योग्य बनाना कि वह नई बातें सोच सके तथा निरंतर आगे बढ़ सके।
समाज जब आगे बढ़ने लगा तो आवश्यक था कि उसकी दृष्टि पैनी होती तथा वह दूर तक देख सकता। अतः तब माता ने धूम्रलोचन का वध कर समाज को दिव्य दृष्टि दी। धूम्रलोचन का अर्थ होता है धुंधली दृष्टि। इस प्रकार माता जी ने धूम्र लोचन का वध कर समाज को दिव्य दृष्टि प्रदान की।
समाज में जब ज्ञान आ जाता है उसके उपरांत बहुत सारे तर्क वितर्क होने लगते हैं। हर बात के लिए कुछ लोग उस के पक्ष में तर्क देते हैं और कुछ लोग उस के विपक्ष में तर्क देते हैं। समाज की प्रगति और अवरुद्ध जाती है। चंड मुंड इसी तर्क और वितर्क का प्रतिनिधित्व करते हैं। माता ने चंड मुंड का संहार कर समाज को बेमतलब के तर्क वितर्क से आजाद कराया।
समाज में नकारात्मक ऊर्जा के रूप में मनोग्रंथियां आ जाती हैं। रक्तबीज इन्हीं मनोग्रंथियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार एक रक्तबीज को मारने पर अनेकों रक्तबीज पैदा हो जाते हैं उसी प्रकार एक नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने पर हजारों तरह की नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है। जिस प्रकार सावधानी से रक्तबीज को मां दुर्गा ने समाप्त किया उसी प्रकार नकारात्मक ऊर्जा को भी सावधानी के साथ ही समाप्त करना पड़ेगा।
नवरात्र के 9 दिन अलग-अलग देवियों की आराधना की जाती है। नवरात्र का हर दिन मां के विशिष्ट स्वरूप को समर्पित होता है और हर स्वरूप की महिमा अलग-अलग होती है। आदि शक्ति के हर स्वरूप से अलग-अलग मनोरथ पूर्ण होते हैं। यह पर्व नारी शक्ति की आराधना का पर्व है।
नवरात्रि और विज्ञान
हमारे पुराने ऋषि मुनियों ने हर चीज को बड़ी सोच समझ कर बनाया था हमारे जो भी त्यौहार हैं उनके पीछे एक वैज्ञानिक महत्व भी है नवरात्र त्यौहार के पीछे भी वैज्ञानिक महत्व है जिसको मैं आपको आगे बताऊंगा।
15 अक्टूबर 2023 से शारदीय नवरात्रि का पर्व प्रारंभ हो रहा है और इन नौ दिनों में निम्न अनुसार देवियों की पूजा की जावेगी। :-
15 अक्टूबर – घटस्थापना, मां शैलपुत्री की पूजा
16 अक्टूबर दूसरे दिन – मां ब्रह्मचारिणी
17 अक्टूबर तीसरे दिन – मां चंद्रघंटा
18 अक्टूबर चौथे दिन – मां कूष्मांडा
19 अक्टूबर पांचवे दिन – मां स्कंदमाता
20 अक्टूबर छठवें दिन – मां कात्यायनी
21 अक्टूबरसातवें दिन – मां कालरात्रि
22 अक्टूबर आठवें दिन – मां महागौरी
23 अक्टूबर नवें दिन – मां सिद्धिदात्री
आइये अब हम इसके वैज्ञानिक पक्ष पर चर्चा करते हैं।
नवरात्र के वैज्ञानिक पक्ष की तरफ अगर हम ध्यान दें तो हम पाते हैं कि दोनों प्रगट नवरात्रों के बीच में 6 माह का अंतर है। चैत्र नवरात्रि के बाद गर्मी का मौसम आ जाता है तथा शारदीय नवरात्रि के बाद ठंड का मौसम आता है। हमारे महर्षियों ने शरीर को गर्मी से ठंडी तथा ठंडी से गर्मी की तरफ जाने के लिए तैयार करने हेतु इन नवरात्रियों की प्रतिष्ठा की है। नवरात्रि में व्यक्ति पूरे नियम कानून के साथ अल्पाहार एवं शाकाहार या पूर्णतया निराहार व्रत रखता है। इसके कारण शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन होता है। अर्थात शरीर के जो भी विष तत्व है वे बाहर हो जाते हैं। पाचन तंत्र को आराम मिलता है। लगातार 9 दिन के आत्म अनुशासन की पद्धति के कारण मानसिक स्थिति बहुत मजबूत हो जाती है। जिससे डिप्रेशन, माइग्रेन, हृदय रोग आदि बीमारियों के होने की संभावना कम हो जाती है।
वर्ष के बीच में जो हम एक-एक दिन का व्रत करते हैं उससे मानसिक स्थिति मजबूत नहीं हो पाती है केवल पाचन तंत्र पर ही उसका प्रभाव पड़ता।
नवरात्रि में दिन से ज्यादा रात्रि का महत्व है:-
नवरात्रि में दिन से ज्यादा रात्रि के महत्व होने का विशेष कारण है। नवरात्रि में हम व्रत संयम नियम यज्ञ भजन पूजन योग साधना बीज मंत्रों का जाप कर सिद्धियों को प्राप्त करते हैं। हम देखते हैं अगर हम दिन में आवाज दें तो वह कम दूर तक जाएगी परंतु रात्रि में वही आवाज दूर तक जाती है। दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों को और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोकती है। अगर हम किसी रेडियो से दिन में गाने सुने सुन तो वह रात्रि में उसी रोडियो से उसी स्टेशन के गाने से कम अच्छा सुनाई देगा। दिन में वातावरण में कोलाहल रहता है जबकि रात में शांति रहती है। इसी शांत वातावरण के कारण नवरात्रि में सिद्धि हेतु रात का ज्यादा महत्व दिया गया है।
हमारे शरीर में 9 द्वार हैं। 2 आंख, दो कान, दो नाक, एक मुख, एक मलद्वार, तथा एक मूत्र द्वार। नौ द्वारों को सिद्ध करने हेतु तथा पवित्र करने हेतु नवरात्रि के पर्व का विशेष महत्व है। नवरात्रि में किए गए पूजन अर्चन तप यज्ञ हवन आदि से यह नौ द्वार शुद्ध होते हैं।
नवरात्रि हमें यह भी संदेश देती है की सफल होने के लिए सरलता के साथ ताकत भी आवश्यक है जैसे माता के पास कमल के साथ चक्र एवं त्रिशूल आदि हथियार भी है समाज को जिस प्रकार कमलासन की आवश्यकता है उसी प्रकार सिंह अर्थात ताकत, वृषभ अर्थात गोवंश, गधा अर्थात बोझा ढोने वाली ताकत, तथा पैदल अर्थात स्वयं की ताकत सभी कुछ आवश्यक है।
मां दुर्गा से प्रार्थना है कि वह आपको पूरी तरह सफल करें। आप इस नवरात्रि में जप तप पूजन अर्चन कर मानसिक एवं शारीरिक दोनों रुप में आगे के समय के लिए पूर्णतया तैयार हो जाएं।
आपसे अनुरोध है कि इस आलेख के बारे में आपके विचारों से हमें अवश्य अवगत कराएं।
मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें।
जय मां शारदा।
निवेदक:-
ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय
(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)
सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल
संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 213☆ सार्थक
जीवन मानो एक दौड़ है। जिस किसी से पूछो, कहता है; वह दौड़ना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है। फिर बताता है कि अब तक जीवन में कितना आगे बढ़ चुका है। अलबत्ता कभी विचार किया कि आगे यानी किस ओर बढ़ रहे हैं? मनुष्य प्रतिप्रश्न दागता है कि यह कैसा निरर्थक विचार है? स्वाभाविक है कि जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि प्रश्न तो सार्थक ही था पर मनुष्य का उत्तर नादानी भरा है। जीवन की ओर नहीं बल्कि मनुष्य मृत्यु की ओर बढ़ रहा होता है।
भयभीत या अशांत होने के बजाय शांत भाव से तार्किक विचार अवश्य करना चाहिए। मनुष्य चाहे न चाहे, कदम बढ़ाए, न बढ़ाए, पहुँचेगा तो मृत्यु के पास ही। मनुष्य के वश में यदि पीछे लौटना होता तो वह बार-बार लौटता, अनेक बार लौटता, मृत्यु तक जाता ही नहीं, फिर लौट आता, चिरंजीवी होने का प्रयास करता रहता।
स्मरण रखना, मृत्यु का कोई एक गंतव्य नहीं है, बल्कि यात्रा का हर चरण मृत्यु का स्थान हो सकता है, मृत्यु का अधिष्ठान हो सकता है। विधाता जानता है मनुष्य की वृत्ति, यही कारण है कि कितना ही कर ले जीव, पीछे लौट ही नहीं सकता। जिज्ञासा पूछती है कि लौट नहीं सकते तो विकल्प क्या है? विकल्प है, यात्रा को सार्थक करना।
सार्थक जीने का कोई समय विशेष नहीं होता। मनुष्य जब अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य होता है, फिर वह अवस्था का कोई भी पड़ाव हो, उसी समय से जीवन सार्थक होने लगता है।
एक बात और, यदि जीवन में कभी भी, किसी भी पड़ाव पर मृत्यु आ सकती है तो किसी भी पड़ाव पर जीवन आरंभ क्यों नहीं हो सकता? इसीलिए कहा है,
कदम उठे,
यात्रा बनी,
साँसें खर्च हुईं
अनुभव संचित हुआ,
कुछ दिया, कुछ पाया
अर्द्धचक्र पूर्ण हुआ,
भूमिकाएँ बदलीं-
शेष साँसों को
पाथेय कर सको
तो संचय सार्थक है
अन्यथा
श्वासोच्छवास व्यर्थ है..!
ध्यान रहे, जीवन में वर्ष तो हरेक जोड़ता है पर वर्षों में जीवन बिरला ही फूँकता है। आपका बिरलापन प्रस्फुटन के लिए प्रतीक्षारत है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
आज दि. 15 अक्टूबर 2023 से नवरात्रि साधना आरंभ होगी। इस साधना के लिए मंत्र इस प्रकार होगा-
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
🕉️ 💥 देवीमंत्र की कम से कम एक माला हर साधक करे। अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे। सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा ध्यानसाधना तो चलेंगी ही। मंगल भव। 💥 🕉️
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दर और द्वार”।)
अभी अभी # 185 ⇒ दर और द्वार… श्री प्रदीप शर्मा
किसी के दर तक तो पहुंच गए, लेकिन अगर द्वार ही बंद हो, तो दस्तक तो देनी ही पड़ती है ;
आशिक हूं तेरे दर का
ठुकरा मुझे ना देना।
आया हूं बन भिखारी
झोली तो भर ही देना।।
अतिथि तो भगवान होता है। पता पूछते पूछते घर तक तो आ गए, द्वार भी खुले मिले, फिर भी आपको देहरी तो लांघनी ही पड़ेगी। देहरी को ड्यौढ़ी भी कहते हैं। दर और द्वार की यह लक्ष्मण रेखा है। वहीं पहले स्वागत होता है, उसके पश्चात् ही गृह प्रवेश होता है।
मंदिर की भी चौखट होती है, मंदिर के द्वार भी होते हैं, और ठाकुर जी के पट जब खुलते हैं, तब ही दर्शन हो पाते हैं। जब उनसे कुछ मांगना होता है, तो चौखट पर नाक भी रगड़नी पड़ती है। परमात्मा से कैसी लाज, कैसी शरम।।
कभी कभी उल्टी गंगा भी बह जाती है। तेरे द्वार खड़ा भगवान, भगत भर दे रे झोली। यह जीव नहीं जानता, उसके दर पर जो खड़ा है, वह दाता है या भिखारी। जब कि सच तो यह है, भिखारी सारी दुनिया, दाता एक राम।
आजकल द्वार, door अथवा दरवाजा कहलाता है, देहरी का भी कुछ पता नहीं, बस एक डोअरमेट नजर आती है, घर के बाहर। कोई कुंडी नहीं, कोई सांकल नहीं, डोअरबेल बजाई जाती है।। दरवाजे के पहले दो पाट होते थे, दरवाजा आधा भी खोला जा सकता था, आज का द्वार वन पीस होता है।
जिसमें सुरक्षा के लिए ना केवल एक की होल बना होता है, बाहर सीसीटीवी कैमरे और डोअर अलार्म आगंतुक की पूर्व सूचना भी दे देता है। कहीं कोई साधु के वेश में रावण ना हो।।
लेकिन इसी जीव की कभी ऐसी भी अवस्था आती है जब सजन के लिए द्वार नहीं खोलना पड़ता और ना ही अपने प्रीतम प्यारे के लिए दर दर भटकना पड़ता है। जब खिड़की है तो द्वार का क्या काम ;
जरा मन की किवड़िया खोल
सैंया तोरे द्वारे खड़े …
मीरा जानती थी, इस भेद को, और शायद इसीलिए वह इतने सरल शब्दों में गूढ़ ज्ञान की बात कर पाई ;
घूंघट के पट खोल रे
तोहे पिया मिलेंगे।
धन जोबन का गरब ना कीजे
झूठा इनका मोल रे
तोहे पिया मिलेंगे।।
अज्ञान, अस्मिता और अहंकार का पर्दा ही तो वह घूंघट है, जिसे हमें हटाना है। अगर हमारे मन का द्वार खुला है, तो मन के मीत को क्या जरूरत हमारे दर पर आकर, द्वार पर दस्तक देने की। बैक डोअर एंट्री कहें, अथवा इमरजेंसी डोअर, मकसद तो दीदारे यार से है। जरा हसरत तो देखिए इस दीवाने की ;
मन मंदिर में तुझको बिठा के
रोज करूंगा बातें।
शाम सवेरे हर मौसम में
होगी मुलाकातें।।
यह हर पल जागने का, इंतजार का खेल है।
दर हो या द्वार, अंदर हो या बाहर, बस एक आस, एक विश्वास ;
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किलकारी”।)
अभी अभी # 184 ⇒ किलकारी… श्री प्रदीप शर्मा
बहुत दिनों बाद एक बच्चे की किलकारी सुनी। किसी के लिए भले ही यह एक रोजमर्रा का अहसास हो, जो बच्चों के बीच रहते हैं, उन्हें संभालते, पालते पोसते रहते हैं, कई नर्सरी और केजी स्कूल होते हैं, बाग बगीचे होते हैं, जहां बच्चों को हंसते खेलते, मुस्कुराते, किलकारी मारते देखा जा सकता है।
आपको अगर प्रकृति के करीब जाना है, तो कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, बस पास के किसी बच्चे के पास चले जाइए। हम जब बच्चे थे, तो यही हमारी दुनिया थी, जैसे जैसे हम बड़े होते चले गए, बचपन दूर होता चला गया। बच्चों से जुड़ना, अपने बचपन से जुड़ना है।।
कल ही निदा फाजली का जन्मदिन था। उनकी ही गजल के कुछ शब्द हैं ;
फूलों से न तितली को उड़ाया जाए
अगर मस्जिद बहुत दूर है,
क्यूं न किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।।
बच्चे हमारी नकल करते हैं, वे हमसे ही तो सीखते हैं। लेकिन इनका बाल स्वरूप, लीला स्वरूप होता है, हम बच्चों को नहीं खिलाते, वे हमें खिलाते हैं। खेलने खाने में बहुत अंतर होता है। हमने जब से तमीज से खाना सीख लिया, हम खेलना ही भूल गए। एक बच्चे को खेलना सिखाना नहीं पड़ता, हां भूख लगने पर कुछ जबरदस्ती खिलाना जरूर पड़ता है।
बात किलकारी की हो रही थी। कोयल की कूक नहीं, लता की सुरीली आवाज नहीं, उन सबसे अलग होती है, बच्चे की एक किलकारी। अक्सर जॉन कीट्स की एक कविता Ode to a Nightingale से लिए गए वाक्यांश full throated ease का जिक्र होता है।
हिंदी में अगर उसे अभिव्यक्त किया जाए तो, पूरी सहजता, ही कहा जाएगा।।
सहजता और सरलता ही तो प्रकृति है।
इसीलिए एक बच्चे के मुख में प्रकृति ही नहीं, पूरा ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, जिसका दर्शन सिर्फ यशोदा कर सकती है, लेकिन माया उसे वापस ढंक लेती है। प्रकृति और ईश्वर के कुछ रहस्य जाने तो जा सकते हैं, लेकिन किसी को बताए नहीं जा सकते। कह लीजिए इसे गूंगे का गुड़।
लेकिन बच्चे के साथ ऐसा कहां ! जिसे कीट्स full throated ease कहते हैं, वही पूरी सहजता एक बच्चे की किलकारी में समाई हुई है, लेकिन बच्चा कोई चाबी का खिलौना नहीं, कि इधर चाबी भरी, और उधर उसने किलकारी भरी। वह अपनी मर्जी का मालिक है, सभी हठ, अलग हट, यही तो है बालहठ।।
मंदिर जाकर बच्चा क्यों मांगा जाए, जब अपने आसपास ही किसी के घर में नन्हा बच्चा मौजूद हो।
बच्चा अमीर गरीब नहीं होता, न ही उसकी कोई जात पात होती है। वह तो स्वयं ईश्वर स्वरूप होता है।
काग के भाग तो तब ही जाग गए थे, जब वह हरि हाथ से माखन रोटी ले गया था। अगर आपके भाग भी जाग गए, तो शायद आप भी सुन लें, उसकी सहज, सरल, अकस्मात् विस्मित और चकित कर देने वाली मनमोहक किलकारी।।
डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख औरत की नियति। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 204 ☆
☆ औरत की नियति☆
‘दिन की रोशनी ख्वाबों को बनाने में गुज़र गई/ रात की नींद बच्चों को सुलाने में गुज़र गई/ जिस घर में मेरे नाम की तख्ती भी नहीं/ मेरी सारी उम्र उस घर को सजाने में गुज़र गई।’ जी हां! यह पंक्तियां हैं अतुल ओबरॉय की,जिसने महिलाओं के दर्द को आत्मसात् किया; उनके दु:ख को समझा ही नहीं,अनुभव किया और उनके कोमल हृदय से यह पंक्तियां प्रस्फुटित हो गयीं; जो हर औरत के जीवन का सत्य व कटु यथार्थ हैं। वैसे तो यदि हम ‘औरत’ शब्द को परिभाषित करें तो उसका शाब्दिक अर्थ जो मैंने समझा है– ‘औरत’ औ+रत अर्थात् जो औरों की सेवा में रत रहे; जो अपने अरमानों का खून कर दूसरों के लिए जिए और उनके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर प्रसन्नता का अनुभव करे।
यदि हम ‘नारी’ शब्द को परिभाषित करें, तो उसका अर्थ भी यही है– ना+अरि, जिसका कोई शत्रु न हो; जो केवल समझौता करने में विश्वास रखती हो; जिसमें अहं का भाव न हो और वह दूसरों के प्रति समर्पित हो। वैसे तो समाज में यही भावना बलवती होती है कि संसार में उसी व्यक्ति का मान-सम्मान होता है,जिसने जीवन में सर्वाधिक समझौते किए हों और औरत इसका अपवाद है। जीवन संघर्ष का पर्याय है। परंतु उसे तो जन्म लेने से पूर्व ही संघर्ष करना पड़ता है,क्योंकि लोग भ्रूण-हत्या कराते हुए डरते नहीं–भले ही हमारे शास्त्रों में यह कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति को कुम्भीपाक नरक प्राप्त होता है। दुर्भाग्यवश यदि वह जन्म लेने में सफल हो जाती है; घर में उसे पग-पग पर असमानता-विषमता का सामना करना पड़ता है और उसे बचपन में ही समझा दिया जाता है कि वह घर उसका नहीं है और वह वहां चंद दिनों की मेहमान है। तत्पश्चात् उसे स्वेच्छा से उस घर को छोड़कर जाना है और विवाहोपरांत पति का घर ही उसका घर होगा। बचपन से ऐसे शब्द-दंश झेलते हुए वह उस चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हो पाती। पति के घर में भी उसे कहाँ मिलता है स्नेह व सम्मान,जिसकी अपेक्षा वह करती है। तदोपरांत यदि वह संतान को जन्म देने में समर्थ होती है तो ठीक है अन्यथा वह बाँझ कहलाती है और परिवारजन उसे घर से बाहर का रास्ता दिखाने में तनिक भी संकोच नहीं करते। उसका जीवन साथी मौन रह कर कठपुतली की भांति उस अप्रत्याशित हादसे को देखता रहता है, क्योंकि उसकी मंशा से ही उसे अंजाम दिया जाता है। इतना ही नहीं,वह मन ही मन नववधु के स्वप्न संजोने लगता है।
सृष्टि-संवर्द्धन में योगदान देने के पश्चात् उसे जननी व माता का दर्जा प्राप्त होता है और वह अपनी संतान की अच्छी परवरिश हित स्वयं को मिटा डालती है। उसके दिन-रात कैसे गुज़र जाते हैं; वह सोच भी नहीं पाती। वास्तव में दिन की रोशनी तो ख़्वाबों को सजाने व रातों की नींद बच्चों को सुलाने में गुज़र जाती है। उसे आत्मावलोकन करने तक का समय ही नहीं मिलता। परंतु वह खुली आंखों से स्वप्न देखती है कि बच्चे बड़े होकर उसका सहारा बनेंगे। सो! उसका सारा जीवन इसी उधेड़बुन में गुज़र जाता है। दिन भर वह घर-गृहस्थी के कार्यों में व्यस्त रहती है और परिवारजनों के इतर कुछ भी सोच ही नहीं पाती। उसकी ज़िंदगी ता-उम्र घर की चारदीवारी तक सिमट कर रह जाती है। परंतु जिस घर को अपना समझ वह सजाने-संवारने में लिप्त होकर अपने सुखों को तिलांजलि दे देती है; उस घर में उसे लेशमात्र भी अहमियत नहीं मिलती तो उसका हृदय चीत्कार कर उठता है और वह सोचने पर विवश हो जाती है कि ‘जिस घर में उसकी उसके नाम की तख्ती भी नहीं; उसकी सारी उम्र उस घर को सजाने-संवारने में गुज़र गयी।’
वास्तव में यही नियति है औरत की– ‘उसका कोई घर नहीं होता और वह सदैव परायी समझी जाती है। उन विषम परिस्थितियों में वह विधाता से प्रार्थना करती है कि ऐ मालिक! किसी को दो घर देकर उसका मज़ाक मत उड़ाना। पिता का घर उसका होता नहीं और पति के घर में वह अजनबी समझी जाती है। सो! न तो पति उसका हो पाता है; न ही पुत्र।’ अंतकाल में कफ़न भी उसके मायके से आता है और मृत्यु-भोज भी उनके द्वारा–यह देखकर हृदय चीत्कार कर उठता है कि क्या पति व पुत्र उसके लिए दो गज़ कफ़न जुटाने में अक्षम हैं? जिस घर के लिए उसने अपने अरमानों का खून कर दिया; अपने सुखों को तिलांजलि दे दी; उसे सजाया-संवारा– उस घर में उसे आजीवन अजनबी अर्थात् बाहर से आयी हुई समझा जाता है।
मुझे स्मरण हो रही हैं मैथिलीशरण गुप्त की वे पंक्तियां ‘अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी/ आँचल में है दूध और आँखों में पानी।’ इक्कीसवीं सदी में भी नब्बे प्रतिशत महिलाओं के जीवन का यही कटु यथार्थ है। वे मुखौटा लगा समाज में खुश रहने का स्वाँग करती हैं। अवमानना, तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार बन जाते हैं और उसे आजीवन उस अपराध की सज़ा भुगतनी पड़ती है; जो उसने किया ही नहीं होता। इतना ही नहीं,उसे तो जिरह करने का अवसर भी प्रदान नहीं किया जाता,जो हर अपराधी को कोर्ट-कचहरी में प्राप्त होता है– अपना पक्ष रखने का अधिकार।
धैर्य एक ऐसा पौधा होता है,जो होता तो कड़वा है,परंतु फल मीठे देता है। बचपन से उसे हर पल यह सीख जाती है कि उसे सहना है, कहना नहीं और न ही किसी बात पर प्रतिक्रिया देनी है,क्योंकि मौन सर्वोत्तम साधना है और सहनशीलता मानव का अनमोल गुण। परंतु जब निर्दोष होने पर भी उस पर इल्ज़ाम लगा कटघरे में खड़ा किया जाता है, वह अपने दिल पर धैर्य रूपी पत्थर रख चिन्तन करती है कि मौन रहना ही श्रेयस्कर है,क्योंकि उसके परिणाम भी मनोहारी होते है। शायद! इसलिए ही लड़कियों को
प्रतिक्रिया न देने की सीख दी जाती है और वे मासूम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आजीवन कोसों दूर रहती हैं। बचपन में वे पिता व भाई के सुरक्षा-दायरे तथा विवाहोपरांत पति व पुत्र के अंकुश में रहती हैं और अपनी व्यथा-कथा को अपने हृदय में दफ़न किए इस बेदर्द जहान से रुख़्सत हो जाती हैं। नारी से सदैव यह उम्मीद की जाती है कि वह निष्काम कर्म करे और किसी से अपेक्षा न करें।
परंतु अब ज़माना बदल रहा है। शिक्षित महिलाएं सशक्त व समर्थ हो रही हैं; परंतु उनकी संख्या नगण्य है। हां! उनके दायित्व अवश्य दुगुन्ने हो गए हैं। नौकरी के साथ उन्हें पारिवारिक दायित्वों का भी वहन पूर्ववत् करना पड़ रहा है और घर में भी उनके साथ वैसा ही अमानवीय व्यवहार किया जाता है। फलत: उन्हें मानसिक प्रताड़ना सहन करनी पड़ती है।
परंतु संविधान ने महिलाओं के पक्ष में कुछ ऐसे कानून बनाए गए हैं, जिनके द्वारा वर पक्ष का उत्पीड़न हो रहा है। विवाहिता की दहेज व घरेलू-हिंसा की शिकायत पर उसके पति व परिवारजनों को जेल की सीखचों के पीछे डाल दिया जाता है; जहाँ उन्हें अकारण ज़लालत व मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इसलिए लड़के आजकल विवाह संस्था को भी नकारने लगे हैं और आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प कर लेते हैं। इसे हवा देने में ‘लिव इन व मी टू’ का भी भरपूर योगदान है। लोग महिलाओं की कारस्तानियों से आजकल त्रस्त हैं और अकेले रहना उनकी प्राथमिकता व नियति बन गई है। सो! वे अपना व अपने परिजनों का भविष्य दाँव पर लगाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते।
‘अपने लिए जिए तो क्या जिए/ तू जी ऐ दिल! ज़माने के लिए।’ यह पंक्तियां औरत को हरपल ऊर्जस्वित करती हैं और साधना,सेवा व समर्पण भाव को अपने जीवन में संबल बना जीने को प्रेरित करती हैं।’ यही है औरत की नियति,जो वैदिक काल से आज तक न बदली है, न बदलेगी। सहसा मुझे स्मरण हो रही हैं वे पंक्तियां ‘चुपचाप सहते रहो तो आप अच्छे हो; अगर बोल पड़ो,तो आप से बुरा कोई नहीं।’ यही है औरत के जीवन के भीतर का कटु सत्य कि जब तक वह मौन रहकर ज़ुल्म सहती रहती है; तब तक सब उसे अच्छा कहते हैं और जिस दिन वह अपने अधिकारों की मांग करती है या अपने आक्रोश को व्यक्त करती है, तो सब उस पर कटाक्ष करते हैं; उसे बुरा-भला कहते हैं। परंतु ध्यातव्य है कि रिश्तों की अलग-अलग सीमाएं होती हैं,लेकिन जब बात आत्म-सम्मान की हो; वहाँ रिश्ता समाप्त कर देना ही उचित है,क्योंकि आत्मसम्मान से समझौता करना मानव के लिए अत्यंत कष्टकारी होता है। परंतु नारी को आजीवन संघर्ष ही नहीं; समझौता करना पड़ता है–यही उसकी नियति है।