हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 94 ⇒ निवासी… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “निवासी।)  

? अभी अभी # 94 ⇒ निवासी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

~~ resident of ~~

निर्गुण कौन देस को बासी ? हमें कुछ लोगों का नाम तो पता होता है, लेकिन उनका पता नहीं मालूम होता। अक्सर सभी दस्तावेजों में नाम और पते का कॉलम हुआ करता है, जिसे अंग्रेजी में name and address कहते हैं। कल का तस्वीर वाला पहचान पत्र आज का आधार कार्ड बन गया है। पूरा नाम, यानी पुरुष हुआ तो पिता का नाम, और अगर स्त्री हुई तो पति अथवा पिता का नाम।

पुरुष का क्या है, समाज ही पितृसत्तात्मक है, बचपन से बुढ़ापे तक वह कागज़ों, दस्तावेजों में son of ही रहेगा यानी किसी का पुत्र ही रहेगा। वह कभी ऑन रेकाॅर्ड किसी का पति नहीं हो सकता। ।

ले जाएंगे, ले जाएंगे, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे, और सबसे पहले दस्तावेजों में उसका नाम चेंज करवाएंगे। पत्नी के पिता की जगह अपना नाम जुड़वाएंगे। स्त्री को अधिकार है, वह शादी के बाद भी अपनी वही पहचान बनाए रखे, लेकिन दस्तावेजों में अब आपको किसी की पत्नी होना ही होगा।

अगर एक पुरुष की पहचान उसके पिता से है तो क्या एक स्त्री की पहचान उसकी मां से नहीं हो सकती। कौन पूछता है किसी से उसकी मां का नाम। सब जगह बाप का ही राज है।।

भूलिए मत, आप यह भी बताएं, आप पुरुष हैं या स्त्री ! फिर आप जिस देश के वासी हैं, वह आपकी राष्ट्रीयता होगी। होगा ईश्वर का वास सब जगह, आपको अपना वर्तमान निवास भी दर्शाना होगा। शपथ पत्र, एग्रीमेंट, वसीयत और संपत्ति के दस्तावेजों में पहले निवासी यानी resident of की जगह पूरा पता लिखा जाता था।

आप जहां जन्मे, वह अगर आपका ननिहाल होगा। आपकी पत्नी तो अपने बाबुल का घर छोड़ अपने ससुराल आई। आप जहां जाते हैं, वहां आपका निवास हो जाता है। जिनका निवास स्थायी होता है, वे उसे एक सुंदर नाम भी देते हैं। एक बंगला बने न्यारा। । ।

सूरज निवास, कल्याण भवन, सीता बिल्डिंग और संतोष कुटी। सेठ साहूकारों की कोठी और राजा महाराजाओं के तो महल होते थे। समय ने कई महलों को मटियामेट कर दिया तो कुछ ही हेरिटेज होटल में परिवर्तित हो गए। आज लाल बाग, और राजवाड़ा अगर दर्शनीय स्थल है, तो शिव विलास पैलेस का कहीं कोई पता नहीं।

आम आदमी का भी अपना सपनों का महल होता है, एक आशियाना होता है। मातृ छाया, मातृ स्मृति, परिश्रम, पुण्याई, तुलजाई, संकल्प, ईश कृपा और साईं निवास भी देखे जा सकते हैं। ।

व्यापार व्यवसाय, नौकरी धंधा और उच्च अध्ययन के लिए लोग पहले परदेस जाते थे, आजकल विदेश जाते हैं, और वहीं बस जाते हैं। वर्षों से लोग विदेशों में रह रहे हैं, उन्हें वहां की नागरिकता भी मिल चुकी है, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।

पहले एक भारतीय के लिए विदेश आकर्षण था, समय की मांग थी, वहां उसका उज्ज्वल भविष्य था। आज यह आकर्षण आवश्यकता में बदल चुका है, बेटे, बेटी, बहू, दामाद और नाती पोते भी जब वहीं होंगे तो आपको भी वहीं जाना होगा, वह भी एक निश्चित समय के लिए। ।

जो कभी विदेश प्रवास कहलाता था, आज एक भारतीय वहां का नागरिक बन चुका है। आज जब वह अपने देश आता है तो प्रवासी भारतीय कहलाता है। सरकार उसके लिए रेड कार्पेट बिछाती है, उद्यम और व्यापार के लिए सभी सुविधाएं मुहैया करवाती है। लेकिन घर वापसी इतनी आसान नहीं होती।

अपने घर से, अपने देश की मिट्टी से प्रेम किसे नहीं होता। एक आम इंसान अविनाशी नहीं, जो घट घट व्यापक अंतर्यामी है। वह तो आज जहां रह रहा है, वही उसका घर है, वही उसका निवास है, कोई भारतीय है तो कोई प्रवासी भारतीय। सबकी एक ही मजबूरी है। रहना यहां, और अब जाना कहां। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 93 ⇒ अबला और बलमा… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अबला और बलमा।)  

? अभी अभी # 93 ⇒ अबला और बलमा? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हर औरत अबला नहीं होती, विशेष कर, वह तो कभी नहीं, जिसका बलमा उसके लिए मोटर कार लेकर आया हो। बला की खुशनसीब औरतें होती हैं वे महिलाएं, जिनके अपने बलम होते हैं। बालम कहें, बलम कहें, अथवा बालमा। कुछ रसिक, तो कुछ, जुल्मी भी होते हैं।

इश्क की ही तरह भाषा पर भी किसी का जोर नहीं चलता। बला और अबला में भले ही जमीन आसमान का अंतर हो, सनम और सजन में भला क्या भेद हो सकता है। सनम ही की तरह केवल सजन अथवा साजन नहीं होते, सजनी भी होती है। हमें नहीं पता था, बम्बई के बाबू ऐसे भी होते थे ;

चल री सजनी अब काहे सोचे

कजरा ना बह जाए रोते रोते

हमने तो ऐसे भी साजन देखे हैं जो बड़े प्यार से अपनी सजनी से कहते हैं ;

एक बात कहता हूं तुमसे

ना करना इन्कार !

क्या ?

आ तोहे सजनी, ले चलूं नदिया के पार ;

और सजनी को भी देखिए जरा ;

तेरे बिना साजन,

लागे ना जिया हमार। ।

स्त्री के प्यार और समर्पण की तुलना कभी पुरुष के प्यार अथवा निष्ठा से नहीं की जा सकती। कितनी भोली होती होगी वह नायिका जो अपने नायक के लिए ऐसे भाव रखती होगी ;

बलमा अनाड़ी मन भाए

काह करूं, समझ न आए

लेकिन इस स्वार्थी पुरुष अथवा तथाकथित मर्द की पसंद कोई अबला, अभागी, दुखियारी नारी नहीं होती। उसे तो बस उसकी रेशमी जुल्फें, गुलाबी गाल और शराबी आंखें ही पसंद आती हैं।

ताली हमेशा दो हाथों से बजती है। क्या आपने सुना नहीं !

भंवरा बड़ा नादान रे। फिर भी जाने ना, कलियन की पहचान रे।

और उधर पुरुष को देखिए ;

कलियों ने घूंघट खोले

हर फूल पे भंवरा डोले ;

यानी हिसाब बराबर, इधर मन डोले, तन डोले, और उधर, ये कौन बजाए बांसुरिया। ।

पुरुष के लिए प्यार हमेशा जिंदाबाद रहा है और रहेगा लेकिन अगर एक बार औरत ने अपनी दास्तान सुनाई, तो आप रो पड़ेंगे।

साहिर तो हमेशा मर्दों के पीछे हाथ धोकर ही पड़े रहते हैं ;

औरत ने जनम दिया मर्दों ने उसे बाजार दिया।

जब जी चाहा, मचला कुचला

जब जी चाहा दुत्कार दिया। ।

साहिर और निराला की वह तोड़ती पत्थर वाली औरत अब समय के साथ चलना सीख चुकी है। मां, बहन, बेटी और पत्नी के अलावा आज उसके कई रंग रूप हैं, कई उत्तरदायित्व हैं। आज वह परिस्थितियों से लोहा लेना सीख गई है।

त्याग और समर्पण के साथ संस्कार परम्परा और संस्कृति का निर्वाह आज भी वह वैसे ही कर रही है, जैसा सदियों से करती आ रही है। कभी पुरुष के हाथ में हाथ, तो कभी मां के रूप में आंचल का प्यार और सर पर हाथ, तो कभी प्रेमिका के रूप में, शायद यह शुभ संकेत देती हुई ;

तुम्हारे संग मैं भी चलूंगी

जैसे पतंग संग डोर ..

रोज एक नई सुबह,

नया रंग, नया रूप

कहीं जीवन संगिनी

तो कहीं जीवन डोर। ।

♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #190 ☆ मौन भी ख़लता है ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख मौन भी ख़लता है। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 190 ☆

☆ मौन भी ख़लता है 

‘ज़रूरी नहीं कि कोई बात ही चुभे/ बात न होना भी बहुत चुभता है।’ यह हक़ीकत है आज के ज़माने की… आजकल हर इंसान एकांत की त्रासदी से जूझ रहा है। पति-पत्नी भले ही एक छत के नीचे रहते हैं, परंतु उनमें अजनबीपन का एहसास चरम सीमा पर व्याप्त है। सिंगल पेरेंट का प्रचलन बढ़ने के कारण बच्चे नैनी व घर की बाईयों की छत्रछाया में रहते हैं और वे मां की ममता और पिता की छत्रछाया से महरूम रहते हैं। आजकल अक्सर बात होती ही नहीं, फिर उसके चुभने का प्रश्न ही कहाँ होता है?

संवादहीनता की स्थिति वास्तव में अत्यंत घातक होती है, जो संवेदनहीनता का प्रतिफलन है। आजकल पति-पत्नी लोगों की नज़रों में तो पति-पत्नी दिखाई पड़ते हैं, परंतु उनमें दांपत्य संबंध नदारद रहता है। अक्सर बच्चों के कारण वे एक घर की चारदीवारी में रहने को विवश होते हैं। इस प्रकार समाज में बढ़ती विसंगतियों को देख कर हृदय आहत हो उठता है। बच्चों से उनका बचपन छिन रहा है। वे नशे के शिकार हो रहे हैं और उनके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। लूटपाट, अपहरण व फ़िरौती आदि उनके मुख्य शौक हो गए हैं। इस कारण दुष्कर्म जैसे हादसे भी सामान्य हो गए हैं और इन जघन्य अपराधों में उनकी लिप्तता का पता उन्हें एक लंबे अंतराल के पश्चात् लगता है। ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ इस प्रकार उनके तथाकथित माता-पिता हाथ मलते रह जाते हैं।

‘रिश्ते कमज़ोर नहीं होने चाहिएं। यदि एक ख़ामोश हो, तो दूसरे को आवाज़ देनी चाहिए।’ परंतु कहाँ हो पाता है यह सब? आजकल ‘तू नहीं और सही’ का प्रचलन बेतहाशा जारी है। अक्सर अपने ही अपने बनकर अपनों को छलते हैं। इसलिए कुंठा व तनाव का होना स्वाभाविक है। वैसे भी आजकल पहाड़ियों से खामोश हो गये हैं रिश्ते/ जब तक न पुकारो, आवाज़ ही नहीं आती। सो! आत्मकेंद्रिता के कारण पारस्परिक दूरियाँ बढ़ती जा रही है। सब अपने-अपने अहं में मग्न हैं। सो! कोई भी पहल नहीं करना चाहता और उनके मध्य बढ़ती खाइयों को पाटना असंभव हो जाता है।

आजकल संयुक्त परिवार व्यवस्था के स्थान पर एकल परिवार व्यवस्था काबिज़ है। इसलिए रिश्ते एक निश्चित दायरे में सिमट कर रह गये हैं और कोई भी संबंध पावन नहीं रहा। नारी अस्मिता हर पल दाँव पर लगी रहती है। खून के रिश्तों पर विश्वास रहा नहीं । पिता-पुत्री के संबंधों पर भी क़ालिख पुत गयी है। हर दिन औरत की अस्मत शतरंज की बिसात पर बिछाई जाती है तथा चंद सिक्कों के लिए चौराहे पर नीलाम की जाती है। माता-पिता भी उसका सौदा करने में कहां संकोच करते हैं? इन विषम परिस्थितियों में मानव-मूल्यों का पतन होना स्वाभाविक है।

शब्द-बाण बहुत घातक होते हैं। संस्कार व जीवन-मूल्य हमारी संस्कृति के परिचायक होते हैं। यदि आप मौन रहकर मात्र सहन करते हैं, तो रामायण लिखी जाती है वरना महाभारत का सृजन होता है। ‘अंधे का पुत्र अंधा’ महाभारत युद्ध का कारण बना, जिसका अंत विनाश में हुआ। दशरथ का कैकेई के वचन मांगने पर राम, सीता व लक्ष्मण के वनवास-गमन के पश्चात् दशरथ को प्राण त्यागने पड़े… ऐसे असंख्य उदाहरण इतिहास में हैं। सो! मानव को सोच- समझ कर बोलना व वचन देना चाहिए। मानव को बोलने से पहले स्वयं को उस सांचे में रखकर देखना चाहिए, क्योंकि शब्दों के भी ज़ायके होते हैं। इसलिए सदैव चख कर बोलना कारग़र है, अन्यथा वे नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं और प्राण-घातक भी हो सकते हैं। अक्सर दिलों में पड़ी दरारें इतनी गहरी हो जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। सो! मानव का मौन रहना भी उतना ही कचोटता है; जितना बिना सोचे-समझे अनर्गल वार्तालाप करना। आइए! संवाद के माध्यम से जीवन में स्वस्थता, समन्वय, सामंजस्यता व अलौकिक आनंद लाने का भरपूर प्रयास करें।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 92 ⇒ फार्म हाउस और रिजॉर्ट… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फार्म हाउस और रिजॉर्ट”।)  

? अभी अभी # 92 ⇒ फार्म हाउस और रिजॉर्ट? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हमारे पारंपरिक उत्सव और शादी ब्याह समय के साथ चलते हुए अपने रंग आज भी बिखेरते हुए चलते हैं। दीपावली का त्योहार हो या घर में कोई शादी का प्रसंग, वही उत्साह, वही उमंग ! वार त्योहार तो हर वर्ष आते हैं, लेकिन शादी ब्याह, और मंगल प्रसंग का योग कहां रोज रोज आता है। अपनी हैसियत और उत्साह में कभी कोई कमी नहीं आती।

पहले शादियां अक्सर घर में ही हुआ करती थी। घर के आगे ही एक छोटा सा टेंट लगा लिया, आड़ कर ली, तब कहां इतनी आबादी और आवक जावक। राहगीर और साइकिल वालों के आने जाने के लिए रास्ता दे दिया, और धूमधाम शुरू!

कहां का कैटरर और कहां की इवेंट, एक हलवाई और पंडित के अलावा दर्जनों रिश्तेदार कई दिनों पहले से ही डेरा डाल देते थे। घर की महिलाएं, घर में ही सजती, संवरती थी, हल्दी, मेंहदी के गीत गाती रहती थी, हंसी खुशी के माहौल में हर व्यक्ति बड़ा व्यस्त नजर आता था। ।

फिर धर्मशालाओं का दौर शुरू हुआ। आयोजन में कुछ सुविधा और आसानी हुई। टेंट हाउस से सभी सामान उपलब्ध होने लगा। बिस्तर, रजाई, गद्दे, कुर्सियां और बड़े बड़े बर्तन, जब वापस किए जाते, तो उनकी गिनती होती। बारह ग्लास कम हैं, चार चद्दर नहीं मिल रही। विवाह आनंद संपन्न हो गया, बारात विदा हो गई, अब चैन की सांस ली जा सकती है।

सब दिन कहां एक समान होते हैं। शिक्षा, सुविधा और तकनीक में इज़ाफ़ा हुआ, और धर्मशालाओं की जगह मैरिज गार्डन का प्रचलन शुरू हुआ। शहर से दूर, दूर के रिश्तेदार और मेहमान घर नहीं, गार्डन में ही आने लगे, रिटर्न टिकट की व्यवस्था के साथ। एक दो रोज ही में, मंडप, हल्दी, महिला संगीत और रिसेप्शन के साथ समापन। अच्छे अच्छे हलवाई नहीं, कैटरर ढूंढे जाने लगे, कहीं पर, पर प्लेट का हिसाब, तो कहीं पूरा ही पैकेज, चाय कॉफी, नाश्ता, और सभी समय का भोजन समग्र। ।

हमारे रहने के स्तर के अनुसार ही हमें अपने रीति रिवाजों में भी बदलाव लाना पड़ता है। एक अच्छे घर से ही कुछ नहीं होता आजकल, बच्चों को अगर अच्छा पढ़ा लिखाकर विदेश भेजा है, तो उसको भी रिटर्न तो मिलना ही है।

अगर यहीं कोई व्यवसाय है तो दिन दूने, रात चौगुनी की भी संभावना तो रहती ही है। सरकारी नौकरी और अगर वह भी ओहदे वाली हुई, तो मत चूके चौहान।

ईमानदारी और नैतिकता के साथ इंसान को थोड़ी समझदारी और व्यवहार कुशलता भी रखनी ही पड़ती है। आती लक्ष्मी को कभी ठुकराया नहीं जाता।

संक्षेप में, बरसात के दिनों, यानी rainy days के लिए कुछ बचाया नहीं जाता, इन्वेस्ट करना पड़ता है आजकल। एक जमीन का टुकड़ा, कब सोना उगलने लग जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। अच्छा हुआ, शहर से दूर, समय रहते दो बीघा जमीन हाथ लग गई थी, फॉर्म हाउस भी बन गया और खेती किसानी भी चल रही है। ईश्वर देता है, तो छप्पर फाड़कर देता है। ।

आजकल न तो शादियां घर में होती हैं, और न ही पारंपरिक वार त्योहार ! जन्मदिन, शादी की सालगिरह और उद्यापन तक होटलों में किए जाने लग गए हैं। अगर भगवान का दिया सब कुछ है, तो अपना फॉर्म हाउस कब काम आएगा। छोटी सी डेयरी और ऑर्गेनिक फार्मिंग आज समय की आवश्यकता है। पर्यावरण का प्रदूषण ही नहीं, खाद्य पदार्थों का प्रदूषण भी आज के आधुनिक समाज की दुखती रग है।

भूल जाइए कल की धर्मशालाएं, बड़ी बड़ी होटलें और मैरिज गार्डन, आजकल शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर, अच्छे अच्छे रिजॉर्ट आपके मांगलिक प्रसंग में चार चांद लगाने के लिए उत्सुक और उधार बैठे हैं।

आपको सिर्फ अपने मेहमानों की सूची उन्हें सौंप देना है। पूरी इवेंट वे ही ऑर्गेनाइज करेंगे, आधुनिक चकाचौंध वाली साज सज्जा, पधारने वाले मेहमानों के लिए सर्व सुविधायुक्त एसी कमरे ही नहीं, एक बड़ा सा स्विमिंग पूल, और मनमोहक बाग बगीचे, हरियाली, क्या तबीयत हरी करने के लिए काफी नहीं है। ।

पैसा कभी हाथ का मैल था, लेकिन जब से सब कुछ डिजिटल हुआ है, सब के हाथ पाक साफ हैं। व्यवहार और लेन देन में इतनी पारदर्शिता है कि विवाह में ५०-६० लाख जो खर्च हुए, वे कहां से आए, और कैसे सब काम सानंद संपन्न हो गया, कुछ पता ही नहीं चला। ऐसे यादगार प्रसंग कहां जीवन में बार बार आते हैं।

बच्चे भी भाई साहब, कितने संस्कारी हैं हमारे, बड़ी मुश्किल से आठ रोज की छुट्टी लेकर आए हैं विदेश से। उनके चार पांच मित्र भी मेहमान बनकर ही साथ आए हैं।

कितना एंजॉय करती है आज की पीढ़ी और हमारी परंपराओं का सम्मान भी करती है। समधी, समधन भी महिला संगीत में स्टेज पर परफॉर्म कर रहे हैं, पल्लो लटके औरओ मेरी जोहरा जबीं पर। ।

आप इसे पूरब और पश्चिम का फ्यूजन कहें, अथवा स्वदेशी और विदेशी का कॉकटेल, लेकिन भारतीय परम्परा पूरी तरह कायम है यहां। मेहमानों में डॉक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, सरकारी अफसर, वकील, जज, विधायक, सांसद, सभी कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे हैं। कुछ समय के लिए सी एम साहब की दूल्हा दुल्हन को आशीर्वाद देकर गए हैं। यही हमारा आज का विकासशील समाज है, हमारे कदम समृद्धि और खुशहाली की ओर बढ़ रहे हैं। आज भी अपना है, और कल भी हमारा ही है। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #143 – “आलेख – सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर सुधरता है” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आलेख – “सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर सुधरता है)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 143 ☆

 ☆ “आलेख – सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर सुधरता है” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

यह प्रश्न जटिल है कि क्या सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर सुधरता है, इसका कोई आसान उत्तर नहीं है। इस मुद्दे के दोनों पक्षों में मजबूत तर्क दिए जाने हैं।

जो लोग मानते हैं कि सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर गिरता है, उनका तर्क है कि इससे लेखक न्यायाधीशों या दर्शकों को खुश करने के लिए अपनी कलात्मक अखंडता का त्याग कर सकते हैं। उनका यह भी तर्क है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव रचनात्मकता को दबा सकता है और फॉर्मूलाबद्ध लेखन की ओर ले जा सकता है।

दूसरी ओर, जो लोग मानते हैं कि सम्मान के लिए लिखने से साहित्य के स्तर में सुधार हो सकता है, उनका तर्क है कि यह लेखकों को अपना सर्वश्रेष्ठ काम करने के लिए आवश्यक प्रेरणा और फोकस प्रदान कर सकता है। उनका यह भी तर्क है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव लेखकों को अपने काम के प्रति अधिक आलोचनात्मक होने और उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने के लिए मजबूर कर सकता है।

मेरे विचार में, सच्चाई इन दोनों चरम सीमाओं के बीच में कहीं है। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव कुछ लेखकों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, लेकिन यह दूसरों के लिए एक शक्तिशाली प्रेरक भी हो सकता है। अंततः, सम्मान के लिए लिखने से साहित्य के स्तर में सुधार होता है या नहीं, यह व्यक्तिगत लेखक और शिल्प के प्रति उनके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

अपने तर्क का समर्थन करने के लिए, मैं खेल और साहित्य दोनों से दो उदाहरण प्रदान करूंगा। खेल की दुनिया में, हम अक्सर देखते हैं कि जब एथलीट प्रमुख प्रतियोगिताओं में प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं तो वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रतिस्पर्धा का दबाव उन्हें खुद को अपनी सीमा तक धकेलने और अपना सब कुछ देने के लिए मजबूर करता है। उदाहरण के लिए, माइकल जॉर्डन एनबीए फ़ाइनल में अपने अविश्वसनीय प्रदर्शन के लिए जाने जाते थे। वह अक्सर कहा करते थे कि उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ बास्केटबॉल तब खेला जब दांव सबसे ऊंचे थे।

साहित्य की दुनिया में, हम ऐसे लेखकों के उदाहरण भी देख सकते हैं जिन्होंने दबाव में होने पर भी अपना सर्वश्रेष्ठ काम किया है। उदाहरण के लिए, चार्ल्स डिकेंस धारावाहिक उपन्यास के उस्ताद थे। वह अक्सर समय सीमा के दबाव में लिखते थे और इस दबाव ने उन्हें नियमित आधार पर उच्च गुणवत्ता वाले काम करने के लिए मजबूर किया। उनके उपन्यास, जैसे “ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़” और “ग्रेट एक्सपेक्टेशंस”, अंग्रेजी साहित्य के क्लासिक्स माने जाते हैं।

निःसंदेह, सम्मान के लिए लिखने वाले सभी लेखक महान कार्य नहीं करते। हालाँकि, मेरा मानना ​​है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव कई लेखकों के लिए एक शक्तिशाली प्रेरक हो सकता है, और इससे बेहतर काम का उत्पादन हो सकता है।

जिन उदाहरणों का मैंने पहले ही उल्लेख किया है, उनके अलावा, कई अन्य लेखक भी हैं जिन्होंने दबाव में महान कार्य किया है। उदाहरण के लिए, विलियम शेक्सपियर ने सार्वजनिक मंच के लिए नाटक लिखे, और वह जानते थे कि उनके काम का मूल्यांकन दर्शकों द्वारा किया जाएगा। इस दबाव ने उन्हें ऐसे नाटक लिखने के लिए मजबूर किया जो मनोरंजक और विचारोत्तेजक दोनों थे। उनके नाटक, जैसे “हैमलेट” और “किंग लियर”, आज भी साहित्य के अब तक लिखे गए सबसे महान कार्यों में से एक माने जाते हैं।

मेरा मानना ​​है कि लेखकों की अगली पीढ़ी को सम्मान के लिए लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे उन्हें बेहतर काम करने में मदद मिलेगी और लेखक के रूप में सफल करियर बनाने में भी मदद मिलेगी।

अंत में मेरा मानना ​​है कि सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर सुधर सकता है। प्रतिस्पर्धा के दबाव से बेहतर लेखन हो सकता है, और मान्यता की इच्छा लेखकों को लिखते रहने की प्रेरणा प्रदान कर सकती है। साहित्य और खेल से ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस तर्क का समर्थन करते हैं।

हालाँकि, मेरा यह भी मानना ​​है कि लेखकों के लिए अपनी कलात्मक अखंडता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। उन्हें जजों या दर्शकों को खुश करने के लिए अपने दृष्टिकोण का बलिदान नहीं देना चाहिए। अंततः, सबसे अच्छा काम तब होता है जब लेखक प्रतिस्पर्धा के दबाव और अपनी आवाज के प्रति सच्चे बने रहने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने में सक्षम होते हैं।

यहां उन लेखकों के कुछ अतिरिक्त उदाहरण दिए गए हैं जिन्होंने दबाव में भी बेहतरीन काम किया है:

जेन ऑस्टेन: ऑस्टिन ने अपने उपन्यास वित्तीय ज़रूरत के दबाव में लिखे। वह जानती थी कि पैसा कमाने के लिए उसका काम अच्छा होना चाहिए और इस दबाव ने उसे अपना सर्वश्रेष्ठ काम करने के लिए मजबूर किया।

लियो टॉल्स्टॉय: टॉल्स्टॉय ने अपने उपन्यास अपनी पूर्णतावाद के दबाव में लिखे। वह अपने काम से कभी संतुष्ट नहीं थे और इस दबाव ने उन्हें अपने लेखन को लगातार संशोधित और सुधारने के लिए मजबूर किया।

फ्रांज काफ्का: काफ्का ने अपने उपन्यास अपनी मानसिक बीमारी के दबाव में लिखे। वह गंभीर चिंता और अवसाद से पीड़ित थे और इस दबाव ने उन्हें अपने काम में मानव स्वभाव के अंधेरे पक्ष का पता लगाने के लिए मजबूर किया।

ये उन लेखकों के कुछ उदाहरण हैं जिन्होंने दबाव में भी बेहतरीन काम किया है। हालाँकि लेखकों के लिए अपनी कलात्मक अखंडता बनाए रखना महत्वपूर्ण है, मेरा मानना ​​है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव कई लेखकों के लिए एक शक्तिशाली प्रेरक हो सकता है, और इससे बेहतर काम का उत्पादन हो सकता है।

मुझे आशा है कि इस लेख से इस बहस पर कुछ प्रकाश डालने में मदद मिली होगी कि सम्मान के लिए लिखने से साहित्य का स्तर सुधरता है या नहीं। मेरा मानना ​​है कि उत्तर हां में है, और मैं सभी लेखकों को अपना सर्वश्रेष्ठ काम करने का प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं, भले ही वे पुरस्कार के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हों या नहीं।

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

04-07-2023 

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 91 ⇒ मोहल्ले का कुत्ता… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मोहल्ले का कुत्ता”।)  

? अभी अभी # 91 ⇒ मोहल्ले का कुत्ता? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

शहरों की सड़कों और गलियों में आजादी से घूमने वाली इस प्रजाति को अक्सर आवारा अथवा सड़क छाप कुत्ता कहकर ही संबोधित किया जाता है। अन्य समस्याओं की तरह इस समस्या का भी सामना करते हुए एक आम आदमी अपनी जिंदगी काट ही लेता है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब उसे कोई कुत्ता काट लेता है।

Barking dogs seldom bite. लेकिन कोई भी कुत्ता काटने के पहले अनुमति नहीं लेता।

एक राहगीर के लिए भले ही वह आवारा सड़क छाप कुत्ता हो, लेकिन उसका भी एक मोहल्ला होता है, उसके भी कुछ संगी साथी होते हैं। ।

सुबह जो लोग टहलने जाते हैं, उन्हें मोहल्ले के ये कुत्ते अक्सर नजर आ जाते हैं इनका एक झुंड होता है, जिसमें बच्चे बूढ़े सभी शामिल होते हैं जिनमें एक बूढ़ी कुतिया भी शामिल होती है। हर घर का बचा भोजन और रोटी इनके लिए सांझा चूल्हा होता है।

इनके छोटे छोटे पिल्लों के साथ मोहल्ले के बच्चे खेला करते हैं, कोई भी पिल्ला मुंह उठाए आपके साथ हो लेता है, भले ही आपको कुत्तों से नफरत हो।

घर की महिलाओं और बच्चों को मोहल्लों के इन कुत्तों से अनायास ही लगाव हो जाता है। केवल सूंघने मात्र से एक अपरिचित, इनके लिए परिचित हो जाता है। कभी कभी कोई परिचित कुत्ता अनायास ही आपके साथ हो लेता है, मानो आप धर्मराज हों। लेकिन इनका एक दायरा होता है, हद होती है, ये उसे क्रॉस नहीं करते। ।

दुश्मन कुत्तों से इन्हें भी खतरा होता है। ये बिना वेतन के अपने मोहल्ले की चौकीदारी करते रहते हैं, कोई बाहरी आदमी आए, तो भौंकना शुरू कर देते हैं, और अगर उसने प्रतिरोध किया अथवा लकड़ी और पत्थर उठाया, तो फिर ये भी अपनी वाली पर आ जाते हैं। भौंकना इनका हथियार है। जब ये समूह में होते हैं, तो रात भर भौंक भौंककर लोगों की नींद हराम कर देते हैं।

हमारी रहवासी मल्टी पूरी तरह सुरक्षित है, वहां आवारा कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। यह अलग बात है कि कुछ रहवासी सदस्यों ने ही विदेशी नस्ल के कुत्ते पाल रखे हैं। एक बच्चे से अधिक प्यार और देखभाल उसे लगती है। उसका भी घर के अन्य सदस्यों की तरह एक प्यारा सा नाम होता है। वह भी बीमार पड़ता है, उसका डॉक्टर अलग है, उसका भी अपना एक अलग पार्लर है। ।

सुबह वह बलात् अपने मालिक/मालकिन को टहलने ले जाता है। वह उसका दिशा मैदान का समय होता है। उसके गले में पट्टा और चेन भी होती है। वह अपने मालिक को इतनी फुर्ती से बाहर खुले में ले जाता है, मानो कोई ट्रेन छूट रही हो। लघु शंका के लिए तो प्रशासन ने उसके लिए स्थायी रूप से बिजली के खंभे खड़े कर ही दिए हैं, जिसमें कुछ योगदान सड़क के पास खड़ी आयातित कारों का भी हो जाता है, लेकिन फिर भी दीर्घ शंका के लिए स्वच्छ शहर में मनमाफिक जगह ढूंढना इतना आसान नहीं। जगह जगह, जमीन को सूंघा जाता है, परखा जाता है, उसके बाद ही नित्य कर्म को अंजाम दिया जाता है। स्वच्छ भारत में इनके योगदान से प्रशासन भी अपरिचित नहीं, लेकिन समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून इन पर तो लागू नहीं हो सकता न।

आज स्थिति यह है कि कुछ लोग सुबह अपने पालतू कुत्तों के कारण टहल रहे हैं तो कुछ सड़क के आवारा कुत्तों के कारण नहीं टहल पा रहे हैं। आपको तो कुत्ता कभी भी काट सकता है, लेकिन आप तो कुत्ते को नहीं काट सकते। नेताओं के भाषण सुन सुनकर कान इतने पक गए हैं कि मोहल्ले के कुत्तों का भौंकना अब इतना बुरा भी नहीं लगता लेकिन कुत्ते की समस्या को लेकर न तो हम जागरूक हैं और न ही हमारे कर्णधार। किससे करें शिकायत, कि कुत्तों के शोर ने, हमें और पूरे परिवार को, रात भर सोने भी ना दिया।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 73 – पानीपत… भाग – 3 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

 

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज प्रस्तुत है आपके एक विचारणीय आलेख  “पानीपत…“ श्रृंखला की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 73 – पानीपत… भाग – 3 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

Nostalgia का हिंदी में अर्थ है अतीत की सुनहरी यादों में खोना और वर्तमान की उपेक्षा कर उदासीनता में डूब जाना. पर अभी तो बात उस दौर की है जब मुख्य प्रबंधक अपनी पुरानी शाखा से रिलीव नहीं हुये थे.

पदोन्नति आत्मविश्वास देती है और अगर पहले से हो तो उसमें वृद्घि करती है. ये समय होता है अपेक्षाओं को, निंदकों को शब्दहीन उत्तर देने का. वो जो आपको हल्के में लेते रहे, मजाक उड़ाते रहे उनको यह समझाने कि बंदे को “एवंई” में लेने की भूल का वो प्रायश्चित कर लें, निंदकों को यह बोलने का कि, “सॉरी” जल्दी बोल दो क्योंकि रिलीव कभी भी हो सकते हैं”. जो कट्टर निंदक होते हैं वो बैंक की प्रमोशन पॉलिसी में ही लूपहोल्स ढूंढते हैं और उनका बड़ी निर्दयता से ये मानना होता है कि “क्या जमाना आ गया है, कैसे कैसे लोग प्रमोट हो रहे हैं या “ऐसे वैसे, कैसे भी”लोग प्रमोट हो रहे हैं. तो ऐसे लोग तो न तो सॉरी बोलते हैं न ही नज़रें चुराते हैं. उनकी उद्दंडता और धृष्टता जारी रहती है, कई तो “तुसी वडे मजाकिया हो”वाले होते हैं जिनके कमेंट्स के एक दो नमूने पेश हैं;

  1. कैसा लगा आपको सर!!!जब रात को सोये तो स्केल थ्री थे और सुबह नींद खुली तो स्केल फोर. क्या भाभी साहिबा ने भी कुछ फर्क महसूस किया.
  2. सर जी!!!आप स्केल फोर प्रमोट तो बैकडेट से हुये हैं, एरियर्स भी उसी डेट से लेंगे पर काम तो स्केल थ्री का करते रहे. तो क्या रिकवरी भी होगी. इस पर उनका सहायक निंदक कटाक्ष करता कि काम तो न पहले किया न अब करने वाले हैं.

पदोन्नत पात्र शाखास्तरीय लिहाज पालने के कारण सिर्फ मुस्कुराता है और आने वाले समय से अनजान होकर भी मन ही मन सोचता है कि अब कम से कम इन ‘धतूरों’से छुटकारा मिलेगा.

शाखा में सिर्फ निंदक ही नहीं होते बल्कि आउटडोर पार्टियों का मौका तलाशने वाले लोग भी होते हैं जो परनिंदा जैसी क्षुद्र दुर्बलता से ऊपर उठकर पदोन्नत पात्र से आउटडोर पार्टियों की खर्च के अलावा सारी व्यवस्था का उत्तरदायित्व स्वंय लेकर पार्टी सेट करने में लग जाते हैं. पार्टी का मेन्यू डिसाइड करने में यहाँ चलती तो इन्हीं लोगों की है और पदोन्नत पात्र का काम सिर्फ पेमेंट करने का होता है.

पदोन्नति का आनंद क्षणिक होता है और ये अक्सर उसी शाखा तक ही सीमित रहता है जहाँ से प्रमोशन की घोषणा प्राप्त की जाती है. क्योंकि प्रमोशन के कारण नये उत्तरदायित्व, नई ब्रांच, नये परिवेश, नये लोगों से सामना नहीं होता. वैसे शिफ्टिंग तो परिवार की भी होती है जो फिलहाल इस प्रकरण में नहीं थी वरना नई जगह नया सर्वसुविधायुक्त आवास, अच्छे स्कूलों में एडमीशन पाना, सहृदय और हेल्पिंग पड़ोसी का मिलना भी किस्मत की बात होती है.

फिलहाल हमारे नवपदोन्नत मुख्य प्रबंधक शाखा से औपचारिक फेयरवेल लेकर और कुछ स्टाफ को उनकी डिमांडेड पार्टियां देकर प्रस्थान करने की तैयारी करते हैं. औपचारिक फेयरवेल में उनकी परंपरागत प्रशंसा और उनके असीम योगदान की महत्ता प्रतिपादित की गई जिसे सुनकर उन सहित कई लोग उनकी खूबियों से पहली बार परिचित हुये. चूंकि वो साइलेंट वर्कर थे तो किसी ने यह तो नहीं कहा कि उनके जाने से शाखा में सूनापन आ जायेगा पर उनके “Obediently yours and always available on need or even without any need ” इस गुण या दोष की उनके निंदकों ने भी तहेदिल से तारीफ की.

पानीपत का युद्ध जारी रहेगा.

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 89 ⇒ आज का अर्जुन… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आज का अर्जुन”।)  

? अभी अभी # 89 ⇒ आज का अर्जुन? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

कल के अर्जुन को तो कुरुक्षेत्र में कृष्ण जैसे सारथी और द्रोणाचार्य जैसे गुरु नसीब हो गए, लेकिन हमारे कलयुग के अर्जुन को तो आज अपने जीवन के संघर्ष रथ को खुद ही हांकना है, हमारा आज का अर्जुन एक ओला ऑटो चालक है।

हम आज महाभारत की नहीं भारत के ही एक ऐसे अर्जुन की बात कर रहे हैं, जो कल रात आकस्मिक रूप से हमारा सारथी बना और हमें बातों बातों में ही अपनी राम कहानी सुना गया। ।

एक शोक प्रसंग में जाना अनिवार्य होने से तपते जेठ की अंतिम शाम में ही बारिश और आंधी तूफान ने आषाढ़ के एक दिन का नजारा पेश कर दिया, तो हमें भी मजबूरन एक ऑटो को अनुबंधित कर गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान करना पड़ा। बारिश और आंधी के चलते ही शहर की बत्ती गुल होना, और शहर की प्रमुख सड़कों पर पानी भर जाना, और ट्रैफिक जाम का नजारा हम इंदौर वासियों के लिए आम है। सिर्फ आठ किलोमीटर का रास्ता हमने ट्रैफिक जाम में ५० मिनिट में राम राम करके आखिर तय कर ही लिया।

एक घंटे की शोक बैठक के पश्चात् वही वापसी का सवाल आ गया। आसमान अब भी गरज रहा था, हमारा भीगना तय था।

वापसी में ऑन लाइन ओला बुक किया तो ओटीपी बताने पर जो चालक उपलब्ध हुए, वे ही हमारे आज के अर्जुन निकले। महज तेईस वर्ष की उम्र, देवास का रहने वाला। हमारी जीवन संगिनी भी ऑटो में साथ ही थी, एकाएक पूछ बैठी, क्या तुम राजपूत हो। अर्जुन बेचारा एकाएक सकपका गया और बोल पड़ा, नहीं हरिजन हूं। ।

मुझे लगा अब शायद अर्जुन संवाद के मूड में नहीं है, क्योंकि उसके उत्तर ने मुझे हतप्रभ कर दिया था। मैने परिस्थिति संभालने की कोशिश की, अर्जुन, तुम कहां तक पढ़े हो, उसने फिर रास्ता रोका, कहां पढ़ा लिखा साहब। बस समझो, अनपढ़ हूं। मैने फिर कोशिश की, तुम अपने नाम के आगे क्या लगाते हो। उसने जवाब दिया सोनगरा। तो ऐसे कहो ना, तुम सोनगरा हो, आजकल अपने आप को कोई हरिजन नहीं कहता। मेरे इतना कहने से वह सेफ जोन में पहुंच गया था और उत्साह से बताने लगा, देवास में हमारे पास दो घोड़ियां हैं, जो शादियों के सीजन में बारात में चलती हैं। बाकी समय में ऑटो चला लेता हूं।

कहां इंदौर और कहां देवास, वहीं ऑटो चला लिया करो, रोज आते हो, रोज जाते हो। ऑटो यहीं मांगल्या में रख जाता हूं। रात को देवास जाता हूं, सुबह इंदौर आ जाता हूं। आठ साल हो गए, कोई परेशानी नहीं होती। ।

लगता है, अभी शादी नहीं हुई, इसीलिए घर जाने की जल्दी नहीं है। उसने हां में सर हिलाया। जब कहा, शादी साल भर में कर लो, तो खुश हो गया हमारा अर्जुन। हमारा गंतव्य आ रहा था और अर्जुन की महाभारत अब शुरू हुई।

साहब शहरों में तो कोई परेशानी नहीं, लेकिन गांवों में आज भी हरिजनों को घोड़ी पर नहीं बैठने देते।

कई बार तो हमारे पैसे भी डूब जाते हैं।

देवास बहुत बड़ा जिला है। आगे आगर, सुसनेर, सारंगपुर,

पचोर और पूरे राजगढ़ जिले की भी यही हालत है। पैसा सिर्फ व्यापारियों के पास और नौकरीपेशा लोगों के पास है, बाकी कोई धंधा रोजगार नहीं, कोई इंडस्ट्री नहीं। वही पुरानी परंपराएं और एकरस जीवन। इंदौर जैसे शहर में आकर, आदमी सांस लेता है। ।

बातों बातों में हमारी मंजिल आ चुकी थी।

आज का अर्जुन हमें सुरक्षित छोड़ जीवन समर में फिर से शामिल हो गया होगा। छोटे लोग, छोटी सोच, ऊंचे लोग, ऊंची पसंद। आज हमारे बीच कौन सूत पुत्र है, कौन अर्जुन है और कौन एकलव्य, कहना मुश्किल है। सब हरि के जन हैं, हरिजन कोई नहीं।

लेकिन हमारे आज के अर्जुन को कौन समझाए, जो खुद ही अपने समर का सारथी बना बैठा है।

क्या पता आज के अर्जुन की ही तरह कई अभिमन्यु भी जाति, वर्ण, रूढ़ि, परंपरा और राजनीति के चक्रव्यूह में एक बार प्रवेश तो कर जाते हैं, लेकिन वहां से बाहर निकलना उनके बस में नहीं।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 41 – देश-परदेश – लपकों ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 41 ☆ देश-परदेश – लपकों ☆ श्री राकेश कुमार ☆

विगत दिन “तीर्थराज पुष्कर” जाना हुआ था।  परिवार के एक सदस्य के अस्थि विसर्जन के सिलसिले में जब कार से बाहर आए तो करीब आठ सौ मीटर के मार्ग से सरोवर तक पहुंचने के दौरान अनेक व्यक्ति अपने आप को महापंडित, अधिकृत, वास्तविक, सबसे पुराने ना जाने कितने अलंकारों से अपना परिचय देकर हमें प्रभावित करने का प्रयास करते रहे। परिवार के दो अन्य सदस्य भी हमारे साथ  उसी प्रकार से अपने मार्ग पर अग्रसर होते रहे, जिस प्रकार से जल की धारा अपने मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर गंतव्य तक पहुंच जाती हैं।

इस प्रकार की “लपको” गतिविधियां प्रयागराज पहुंचने से पूर्व भी होती हैं।  प्रयागराज से पहले नैनी स्टेशन पर भी ट्रेन रुकने से पूर्व ही ट्रेन के डिब्बों में कमांडो कार्यवाही कर प्रवेश कर बैठे हुए यात्रियों  को अपना-अपना यजमान घोषित कर देते हैं।

ये लपको प्रकार की प्रजाति ना सिर्फ धार्मिक स्थानों पर वरन दैनिक जीवन में प्राय प्रतिदिन हम सब को प्रभावित करते हैं। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी हमारे फिल्मी कलाकार, नामी गिरामी क्रिकेट के खिलाड़ी भी तो मन लुभावन विज्ञापनों के माध्यम से उनके द्वारा प्रायोजित वस्तुएं खरीदने के लिए बाध्य कर अपना शिकार बना लेते हैं, और हमें इस बात का आभास भी नहीं हो पाता है। आखिर कब तक बचेंगे इन जालसाजों की दुनिया में, आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे को ठगने/ छलने में व्यस्त हैं। 

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 88 ⇒ अंग्रेजी की टांग… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंग्रेजी की टांग।)  

? अभी अभी # 88 ⇒ अंग्रेजी की टांग? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हमारे हिंदी के एक अध्यापक थे, उनका तकिया कलाम था, पिताजी की टांग। वे पढ़ाते पढ़ाते, अचानक ही किसी सुस्त और अलसाये से छात्र को खड़ा कर कोई कठिन सा प्रश्न दे मारते। उसे महसूस होता, मानो किसी ने पानी के छींटे मारकर उसे जबर्दस्ती उठा दिया हो। वह बेचारा हड़बड़ाया, सकपकाया, क्या जवाब देता, बगलें झांकने लगता। बस, वे शुरू हो जाते ! मलाई में पड़े हो, कहां है तुम्हारा ध्यान।

परीक्षा में क्या लिखोगे, पिताजी की टांग ?जाओ, पहले मुंह धोकर आओ।

हमारी दो टांगें हैं, जिनके सहारे ही हम खड़े हो पाते हैं और चल पाते हैं। आजकल चलना भी व्यायाम की श्रेणी में आ गया है। एक समय था, जब इंसान थक जाता था, तो किसी सवारी की सहायता लेता था। घोड़ा, तांगा, बैलगाड़ी और घोड़ा गाड़ी पर चलते चलते वह कब साइकिल, साइकिल से स्कूटर और स्कूटर से कार और कार से हवाई जहाज तक पहुंच गया, कुछ पता ही नहीं चला, और उसने दुनिया नाप ली। ।

जो टांग सिर्फ चलने के काम आती थी, इंसान उससे और भी कई काम लेने लग गया। सबसे पहले, सबसे बड़ा काम उसने यह किया, दूसरे के काम में टांग अड़ाना शुरू कर दिया। हो सकता है, टांग अड़ाने का यह अभ्यास उसने फुटबॉल के मैदान से सीखा हो।

यह खेल ही टांगों से खेला जाता है। पेले, सबसे पहला फुटबॉल का प्रसिद्ध खिलाड़ी हुआ। एक और खेल है हॉकी, कौन भूल सकता है हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को। इसमें एक स्टिक ही सब काम करती है, लेकिन दौड़ना तो इसमें भी टांगों के सहारे ही पड़ता है। जब तक गोल ना हो जाए, तसल्ली नहीं होती। ।

यही हॉकी की स्टिक खेल के मैदान के बाहर भी टांग तोड़ने के काम आती है। कॉलेज के दो गुटों में झगड़ा हुआ, उठाई हॉकी की स्टिक और निकल पड़े कल के छेनू और श्याम। याद कीजिए गुलजार और मीनाकुमारी की मेरे अपने। बड़बोले शत्रुघ्न सिन्हा और छैल छबीले, गठीले विनोद खन्ना।

हमारी भी टांगें भी आज तक सिर्फ इसीलिए ही साबुत बची हैं कि बचपन में अम्मां और बाबूजी ने कई बार लाख शैतानी करने पर टांगें तोड़ने की चेतावनी जरूर दी, लेकिन कभी तोड़ी नहीं। उनकी सीख और सबक के कारण ही आज हम अपने पैरों पर खड़े हुए हैं। आज तो हमें मास्टर जी की छड़ी भी, बरसात की झड़ी नजर आती है। उधर छड़ी की छमछम इधर बारिश भी झमाझम। ।

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, राष्ट्रभाषा भी है। हिंदी का अपमान हमारी मां का और मातृ भूमि का अपमान है। कोई हिंदी की टांग तोड़े, हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते लेकिन अंग्रेजी का क्या है, वह तो उन अंग्रेजों की भाषा है, जिन्होंने कभी हम पर राज किया था। हम आज भी उनसे नाराज हैं। काले गोरे में भेद करने वालों की

मैकाले की पद्धति हमें वैसे भी कभी रास नहीं आई।

भला हो लोहिया जी का, जो उन्होंने हमें अंग्रेजी विरोध का एक मौका तो दिया। हमने तबीयत से अंग्रेजी की बारह बजाई। जितने भी बाजारों में, शहरों में, कस्बों में गांवों में, दीवारों पर अंग्रेजी में विज्ञापन और अंग्रेजी के साइनबोर्ड की हमने तोड़फोड़ कर, वो दुर्गति की कि हमने अंग्रेजी को उसकी सात पुश्तें याद दिला दी। ।

इतना ही नहीं, तिरंगे झंडे तले, हमने अंग्रेजी नहीं सीखने की कसम भी खा ली। लेकिन सबै दिन एक ना होय गोपाला। हमारी लाख कोशिशों के बावजूद, हमारी इच्छा के खिलाफ हमें अपने बच्चों के भविष्य के कारण टूटी फूटी अंग्रेजी सीखनी ही पड़ी।

जब बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए कॉन्वेंट स्कूल में गए, तो वे हमारा ही अंग्रेजी में साक्षात्कार लेने लग गए। मत पूछिए, हमें तो साक्षात भगवान ही याद आ गए। लेकिन हमने भी हार नहीं मानी और कपिल देव वाला रेपीडेक्स इंग्लिश वाला कोर्स कर लिया। तब से आज का दिन है, हमने अंग्रेजी की टांग तोड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ा। ।

जैसे फिल्म शोले में, गब्बर से बदला लेने के लिए, ठाकुर के पांव ही काफी थे, उसी प्रकार अंग्रेजी की टांग खींचने के लिए हमारा तो सिर्फ मुंह ही काफी है। वैसे मौके और दस्तूर को देखते हुए अंग्रेजी की टांग तोड़ने के साथ साथ ही अगर कांग्रेस की टांग भी खींच ली जाए तो एक पंथ दो काज हो जाए। हर बात के लिए नेहरू जिम्मेदार, अगली सरकार, मोदी सरकार।

जी हां, वह कांग्रेस का ही जमाना था। एक स्वास्थ्य मंत्री थे, जब उन्हें किसी अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग का उद्घाटन करने बुलाया तो वे बड़े खुश हुए। बोले, चलो अच्छा हुआ, अब मरीजों के मनोरंजन के लिए रेडियो का इंतजाम भी हो गया। ।

हमारा एक मित्र था, बेचारा आज इस दुनिया में नहीं है,

जब भी परेशान होता, मुझसे अपना दर्द बयां करता। दोस्त, जीवन में सेटिस्फिकेशन नहीं है, कभी कभी तो मन करता है, स्लीपिंग पाइल्स खाकर आत्महत्या कर लूं। वैसे यह नौबत ही नहीं आई, दिल का दौरा ऐसा आया, हमारा सबका दिल तोड़ गया।

अंग्रेजी की टांग हम जान बूझकर नहीं तोड़ते। हम नहीं मानते, हमारी अंग्रेजी कमजोर है, हमारा यह मानना है कि इंग्लिस में ही कम ज़ोर है। कहीं P साइलेंट तो कहीं L साइलेंट। यानी लिखो talk और बोलो टॉक। डरावनी फिल्म psycho को हम पहले पिस्को ही कहते थे। बस वहीं से शायद अंग्रेजी का डर अंदर समा गया है, लेकिन अंग्रेजी का भूत फिर भी ऐसा सर चढ़ा हुआ है कि हर हिंदी वाक्य में अंग्रेजी शब्द आ धमकते हैं। परमानेंट को प्रेगनेंट कहना तो खैर स्लिप ऑफ

टंग्यू हो सकता है, लेकिन जब डेथ (death) देठ हो जाती है और शिक्षक महोदय के ट्रांसफर पर बैन (ban) की जगह बैंड लग जाता है, तो अंग्रेजी की आत्मा मुक्ति के लिए छटपटाने लगती है, लेकिन अंग्रेजी जीये या मरे, हम तो उसकी टांग तोड़कर ही रहेंगे। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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