हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – हे बापू ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की  एक  समसामयिककविता कैसा होने लगा अब संसद में व्यवहार? हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष ☆ 

☆ हे बापू ☆

 

हे सत्य अहिंसा आराधक गंभीर विचारक व्याख्याता

हे कर्मवीर कृषकाय वृति क्या ग्रह के सत्याग्रह के उद्गगाता

हे सबल आत्मविश्वासी निर्भय युगदृष्टा युग निर्माता

कर याद तुम्हारी बार-बार आंखें रोती मन भर आता

तुमने दी जग को नई दृष्टि मानव को एक जीवन दर्शन

तुम बने रहे सारे जीवन नई राजनीति के आकर्षण

तुमने की मानव से ममता , पर दुराचार का तिरस्कार

संयमी तपस्वी किया सदा तुमने संशोधन परिष्कार

एक आंधी सी बन आये तुम सारे जग को झकझोर गए

बापू तुम तो भारत ही क्या दुनिया का  रुख मोड़ गए

तुम थे भारत के प्राण तुम्हारी वाणी भारत की वाणी

तुमको पा भारत धन्य हुआ हे संत तत्वदर्शी ज्ञानी

कुछ समझ ना पाए लोग कि तुम थे मानव या अवतारी

जो भी थे पर यह तो सच है तुम हो पूजा के अधिकारी

तुम नवल शक्ति लेकर आए आजादी देकर चले गए

सब रहे देखते ठगे हुए मानो जादू से हों छले गए

तुम तो दे गए वरदान मगर हमने कि तुमसे नादानी

है अभी सीखना बहुत हमें हम जो अज्ञानी अभिमानी

है ऋणी तुम्हारी यह दुनिया जिसको तुमने पथ दिखलाया

जिसको थी ममता सिखलाई बन्धुत्व प्रेम था सिखलाया

करती है बापू याद तुम्हें हर रोज तुम्हारी वह वाणी

जो आग बुझाकर चंदन लेप  लगा जाती थी कल्याणी

हम क्षमा प्रार्थी अभिलाषी तव कृपा करो हे सिद्धकाम

हैं विनत तुम्हारे चरणों में शत-शत वंदन शत-शत प्रणाम

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

[email protected]

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 63 ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  महात्मा गाँधी जी के जन्मदिवस पर “गांधी जी के संदर्भ  – दोहे । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 63– साहित्य निकुंज ☆

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष  – दोहे ☆

 

बलिदानों के बाद ही, आया नवल विहान।

तिमिर पाश को चीरकर, निकला हिंदुस्तान।

*

संत महात्मा आदमी, राजा रंक फकीर।

गांधी जी के रूप में, पाई एक नजीर।।

*

 आने वाली पीढ़ियाँ, भले करें संदेह ।

किंतु कभी यह देश था, गांधीजी का गेह ।

*

बापू, गांधी, महात्मा, जन के मुक्ति मुकाम।

मुक्ति मंत्र तुमने दिया, तुमको विनत प्रणाम।

*

देश कहाँ पर जा रहा, जाएगा किस ओर।

आशाओं के धनुष की, खींची हुई है डोर।

*

संकल्पों की साधना, कब होती आसान।

बलिवेदी पर देश की, करो समर्पित प्राण।

*

जय भारत जय हिंद का, गूंज रहा जयघोष

जय बोलो जय मातरम, मन में भरकर जोश।

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : [email protected]

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – 2 अक्टूबर ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आज प्रस्तुत है आपकी महात्मा गाँधी जयंती के अवसर पर एक कविता  “2 अक्टूबर ”। इस रचना में व्यक्त विचार साहित्यकार के व्यक्तिगत विचार हैं। )

श्री श्याम खापर्डे जी ने  इस कविता के माध्यम से लॉकडाउन की वर्तमान एवं सामाजिक व्याख्या की है जो विचारणीय है।) 

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – कविता – 2 अक्टूबर  ☆ 

पिछले वर्ष–

2 अक्टूबर के दिन

नेताओं को राजघाट पर

सत्य, अहिंसा और देशप्रेम के प्रति

कसमे खाते देखकर

हमारे एक मित्र ने

हमारे सामने  कसम खाई

नैतिक मूल्यों के प्रति

अपनी वचन बद्धता दोहराई

कि, आज से हम

शुध्द, सात्विक जीवन जियेंगे

इस कलमुंही शराब को

कभी नहीं पीयेंगे

 

इस वर्ष–

जब 2 अक्टूबर को

वह रास्ते मे मिला

उसे देख हमारा हृदय

अंदर तक हिला

वह हाथ में बोतल लिए

घूम रहा था

शराब के नशे में

झूम रहा था

हमे देख वह रुका

अभिवादन के लिए झुका

बोला–

मै वाकई तुम्हारा गुनहगार हूं

कसम तोड़ने को लाचार हूं

 

मैने उन सभी नेताऔं को

साल भर,

हर पल,

उन कसमों को तोड़ते देखा है

असत्य, हिंसा और पाखंड से

इस देश को जोड़ते देखा है

इनके अंदर की इंसानियत

मर गई है

इनके शरीर में शैतान की आत्मा

भर गई है

ये  किसी दिन

अपने स्वार्थ के लिए

बापू के आदर्शो को बेच डालेंगे

 

मित्र ,

आज प्रातःकाल मैने राजघाट पर

उन्हीं नेताऔं को फूल चढ़ाते देखा है

फिर वही कसमें खाते देखा है

तब से मै बड़ी बेचैनी मे जी रहा हूं

यार,

मजबूरी मे कसम तोड़कर

शराब पी रहा हूं .

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 54 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत हैं  “संतोष के दोहे। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 54☆

☆ संतोष के दोहे ☆

 

गुलाब

होरी मन महुआ हुआ, महका बदन गुलाब

पिया मिलन की लालसा, पल पल पलते ख्वाब

 

प्रफुल्लित

हृदय प्रफुल्लित देख कर, मन माँ का हर्षाय

बच्चों से माँ की खुशी, दुख में बने सहाय

 

कमान

बच्चों के हाथों लगे, अक्सर हाथ कमान

देख बुढ़ापे में यही, जीवन की पहिचान

 

क्वाँर

क्वाँर माह जस गाइये, माँ का कर गुणगान

माँ की महिमा जगत में, अजब निराली शान

 

करार

प्रियतम को देखे बिना, दिल में नहीं करार

जैसे चाँद-चकोर बिन, पाता नहीं करार

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 42 ☆ पाँच दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  “पाँच दोहे .)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 42 ☆

☆ पाँच दोहे ☆ 

चिंतन वो ही श्रेष्ठ है, करे जगत उद्धार।

खुद को दे विश्वास जो, यही सत्य है सार।।

 

उत्सव मेरा नित्य है, देता नव उपहार।

मन में नव ऊर्जा भरे, करता प्रेम अपार।।

 

संशय-विस्मय मत करो, मन में भरो उमंग।

जीवन तो है बाँसुरी, रहकर सदा अनंग।

 

काम सदा वे ही करें, रहकर आत्म यथेष्ट।

जीवन पुष्पों-सा खिले, हरदम रहें सचेष्ट।।

 

चपल कौमुदी खिल गई, शशि ने किया उजास।

तन-मन आनन्दित हुआ, कण – कण प्रकृति हुलास ।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 64 – होकर खुद से अनजाने ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना होकर खुद से अनजाने। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 64 ☆

☆ होकर खुद से अनजाने ☆  

 

पल पल बुनता रहता है ताने-बाने

भटके ये आवारा मन चौसर खाने।

 

बीत रहा जीवन

शह-मात तमाशे में

सांसे तुली जा रही

तोले माशे में

अनगिन इच्छाओं के

होकर दीवाने……..।

 

कुछ मिल जाए यहाँ

वहाँ से कुछ ले लें

रैन-दिवस मन में

चलते रहते मेले

रहे विचरते खुद से

होकर अनजाने……।

 

ज्ञानी बने स्वयं

बाकी सब अज्ञानी

करता रहे सदा ये

अपनी मनमानी

किया न कभी प्रयास

स्वयं को पहचानें……।

 

अक्षर-अक्षर से कुछ

शब्द गढ़े इसने

भाषाविद बन अपने

अर्थ मढ़े इसने

जांच-परख के नहीं

कोई हैं पैमाने…….।

 

रहे अतृप्त सशंकित

सदा भ्रमित भय में

बीते समूचा जीवन

यूं ही संशय में

समय दूत कर रहा

प्रतीक्षा सिरहाने…..।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ भगवत गीता ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की श्रीमद भगवतगीता  पर आधारित कविता भगवत गीताई-अभिव्यक्ति  प्रतिदिन सतत  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  द्वारा रचित  श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद  महाकाव्य से एक श्लोक, उसका पद्यानुवाद एवं अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कर रहा है। वर्तमान में 18 वे अध्याय के श्लोक का प्रकाशन हो रहा है। आप उन्हें प्रतिदिन आत्मसात कर  सकते हैं ।  ) 

☆ भगवत गीता ☆

श्री कृष्ण का संसार को वरदान है गीता

निष्काम कर्म का बडा गुणगान है गीता

दुख के महासागर मे जो मन डूब गया हो

अवसाद की लहरो मे उलझ ऊब गया हो

तब भूल भुलैया मे सही राह दिखाने

कर्तव्य के सत्कर्म से सुख शांति दिलाने

संजीवनी है एक रामबाण है गीता

पावन पवित्र भावो का संधान है गीता

है धर्म का क्या मर्म कब करना क्या सही है

जीवन मे व्यक्ति क्या करे गीता मे यही है

पर जग के वे व्यवहार जो जाते न सहे है

हर काल हर मनुष्य को बस छलते रहे है

आध्यात्मिक उत्थान का विज्ञान है गीता

करती हर एक भक्त का कल्याण है गीता

है शब्द सरल अर्थ मगर भावप्रवण है

ले जाते है जो बुद्धि को गहराई गहन मे

ऐसा न कहीं विष्व मे कोई ग्रंथ ही दूजा

आदर से जिसकी होती है हर देष मे पूजा

भारत के दृष्टिकोण की पहचान है गीता

 

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 15 – आजाद हो गए मोती ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता आजाद हो गए मोती) 

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 15 – आजाद हो गए मोती

 

खुल गयी गांठ आजाद हो गए मोती,

बिखर कर चारों और फ़ैल गए सब, ठहर गए जिसको जहां जगह मिली ||

 

गिरते मोती इधर-उधर फुदक रहे थे,

जश्न मना रहे थे सब फुदक-फुदक कर, धागे से आजादी जो मिली ||

 

उतर गया मुंह सबका जब जमीन पर धड़ाम से गिरे,

कोई  इस तो कोई उस कोने में गिरा, किसी को कचरे मे जगह मिली ||

 

कुछ मोती तो ज्यादा उतावले थे आजादी के जश्न में,

ऐसे औंधे मुंह गिरे, सबसे बिछुड़ ना जाने किसको कहाँ जगह मिली ||

 

पहले सब खुश थे एक मुद्द्त बाद आजादी जो मिली,

अब सब अपनी-अपनी जगह दुबक गए जहां भी उन्हें जगह मिली ||

 

सब एक दूसरे को जलन ईर्ष्या करने लगे,

सब एक दूसरे को तिरछी नजर से देखते रहे मगर आँखे नहीं मिली ||

 

कुछ मोती समझदार थे जो एक जगह इकट्ठे थे,

कुछ खुद को ज्यादा होशियार समझते थे, वे इधर-उधर बिखरे मिले ||

 

सबको समझ आया बंद गांठ में कितने मजबूत थे,

चाह कर भी मोती धागे में खुद को पिरो वापिस माला नहीं बन सकते ||

 

बिखरे मोतियों को देख खुला धागा भी रोने लगा,

धागे को देख सब अतीत में खो गए काश कोई हमें एक सूत्र में बांध दे ||

 

धीरे-धीरे धागा भी वर्तमान से अतीत हो गया,

धागा ठोकरे खा अदृश्य हो गया, मोती धुंधला कर एक दूसरे को भूल गए ||

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 52 ☆ सो जाएँ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  एक भावप्रवण रचना “ सो जाएँ”। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 52 ☆

☆  सो जाएँ ☆

 

चलो गहरी रात हो गयी, सो जाएँ

उदासी की गोद में ही सही, सो जाएँ

 

खामोश दीवारें बुला रही हैं प्यार से

उनकी ही आरज़ू पूरी करने, सो जाएँ

 

मकड़ी जाला बुन रही होगी उजाले का

उससे मूंह फेर कर आओ ना, सो जाएँ

 

शब् भर कुछ ख्वाब देख लें जुस्तजू के

ज़रीं उम्मीद दिल में छुपाये, सो जाएँ

 

फिर सुबह आ ही जायेगी नाउम्मीदी लिए

आज रात के दामन में छुपकर, सो जाएँ

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ तो चलूँ….! ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ तो चलूँ….!

 

जीवन की वाचालता पर

ताला जड़ गया

मृत्यु भी अवाक-सी

सुनती रह गई

बगैर ना-नुकर के

उसके साथ चलने का

मेरा फैसला…,

जाने क्या असर था

दोनों एक साथ पूछ बैठे-

कुछ अधूरा रहा तो

कुछ देर रुकूँ…?

मैंने कागज़ के माथे पर

कलम से तिलक किया

और कहा-

बस आज के हिस्से का लिख लूँ

तो चलूँ…!

 

©  संजय भारद्वाज 

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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