हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #42 – गीत – अमराइयों के गाँव… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतअमराइयों के गाँव

? रचना संसार # 42 – गीत – अमराइयों के गाँव…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

 गीत

 प्राण से प्यारे हमें सच्चाइयों के गाँव।

गंग से पावन सुनो अच्छाइयों के गाँव।।

 

प्रेम अरु करुणा भरी सदभाव की है तान,

मील के पत्थर बने हैं देख इसकी शान।

खोट वादों में नहीं छल छंद से हैं दूर,

नित नयी सौगात मिलती प्रेम से भरपूर।।

भोर की उतरी किरण अँगनाइयों के गाँव,

 *

मीत चहके कोकिला मधुकर करे गुंजार।

खिल रहा कचनार है फागुन करे मनुहार।।

फूलती सरसों यहाँ धरती करे शृंगार।

झूमता महुआ बड़ा मादक हुआ संसार।।

अब महकते देखिए अमराइयों के गाँव।

 *

प्रीति की गागर लिए वह रूपसी गुलनार।

लाज – बंधन में बँधी भूले नहीं संस्कार।।

सभ्यता जीवित अभी होता सदा आभास।

हैं शिवाला भी यहाँ पर और है विश्वास।।

आस की गठरी लदी पुरवाइयों के गाँव।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- [email protected], [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #269 ☆ गीत – यही जज्बात दिल में हैं… ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपका एक भावप्रवण गीत यही जज्बात दिल में हैं…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 269 – साहित्य निकुंज ☆

☆ गीत – यही जज्बात दिल में हैं… ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

मुझे मजबूर करते हो

मगर तुम सुन नहीं सकते।

मेरे नैनों की भाषा को ,

कभी तुम पढ़ नहीं सकते।

*

यही जज्बात दिल में हैं,

जिसे समझा नहीं तुमने।

तुम्हारी राह तकती हूँ,

मगर तुम आ नहीं सकते।

*

मुझे अब दर्द सहना है,

जिसे तुम छू नहीं सकते।

मेरी गलियों से गुजरे हो,

मगर तुम रुक नहीं सकते।।

*

मुझे मिलना है तुमसे अब,

कभी क्या मिल नहीं सकते।

ख्वाबों में ही मिलते हो,

जिन्हे हम पा नहीं सकते।।

*

मिलन के रंग लाया हूँ ।

मगर तुम छू नहीं सकते।

तेरी बातों में जादू है

मुझे बहला नहीं सकते।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ~ ‘बदली सी परछाईं…’ ~ ☆ डॉ अंशु शर्मा ☆

डॉ अंशु शर्मा

 

(डॉ अंशु शर्मा नई दिल्ली की निवासी, एक सरकारी सेवा निवृत्त एलोपैथिक चिकित्सक हैं। उन्होंने दिल्ली के प्रख्यात लेडी हार्डिंग कॉलेज से स्नातक और दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की, तत्पश्चात् सीजीएचएस में क़रीब ३० वर्ष, एवं केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा निदेशालय में Public health officer के पद पर ९ वर्ष कार्यरत रहने के बाद २०२२ में निजी कारणों से सेवानिवृत्ति ले ली थी। उन्हें द्विभाषीय कविताये ( हिन्दी और अंग्रेजी में ) लिखने में क़रीब १२ वर्षो का अनुभव हैं और उनकी हिन्दी कविताओं की पुस्तक “अंतर्मन के संवाद” २०२० में प्रकाशित हो चुकी है।)

☆ ~ ‘बदली सी परछाईं…’ ~ ☆ डॉ अंशु शर्मा ? ☆

(लिटररी वारियर्स ग्रुप द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में पुरस्कृत कविताप्रतियोगिता का विषय था >> “परछाइयां” /Shadows”।)

मेरी परछाईं कुछ बदल सी गई है,

यह भी ज़िंदगी की मानिंद कुछ ठहर सी गई है ।

अब मैं भी अपनी परछाईं को अधिक अनुभव कर पाती हूँ,

आत्मचिंतन के लिये समय निकाल पाती हूँ।

 

पहले सबके खुश होने का इंतज़ार रहता था,

तब सुपरवुमन बनने का जुनून रहता था।

अब मैंने अपनी गति से समझौता कर लिया है,

सबको हर वक्त खुश न रख पाने के भाव को मान लिया है

 

पहले मेरा अपने शरीर के हर उतार- चढ़ाव पर ध्यान रहता था,

अब मन के हर कोने में झांकने का प्रयास है बना रहता।

मैं कब उम्र के इस मुक़ाम पर आ पहुँची , पता ही नहीं चला,

कब मेरी परछाईं मुझे पीछे छोड़ आई, पता ही नहीं चला।

 

कब ये वक़्त की गहरी लकीरें , चेहरे पर छा गयीं,

कब रिश्तों की नाज़ुक ज़ंजीरें, हाथ छुड़ा आगे निकल गईं।

कहाँ रह गए सपनों से सुहाने वो हसीन पल,

कब बदला सब, समझा नहीं अंतर्मन ये कोमल।

 

शायद समय का नियम है ये पूरा बदलाव ,

पर मन कहाँ माने, यह सूना सा ठहराव ।

तलाशता रहता है वही पुरानी कहानी, वो प्यारी अंगड़ाई,

वो मीठी सी चुभन, वो लम्हे, वो भावनाओं की गहरायी।

 

किंतु, आज तो हुई अपनी ही परछाईं पराई,

मैं ख़ुद बदल गई या फिर हम से सभी लोगों की है क़िस्मत यही ।

आज हो गई है अपनी ख़ुद की परछाईं मुझसे अनजान,

और लगती है कुछ अजनबी सी, मुझसे पराई!

 

कल जो थी रौशनी में जगमग, आज है अंधेरे में गुम तन्हाई,

जिन साथियों संग चली थी मैं, पीछे चली थी परछाई ।

आज उन सबके साथ हुआ मेरा, समय का उलटफेरा,

परछाई भी नहीं देती साथ, बदलाव का रंग ऐसा बिखेरा ।

~ डॉ अंशु शर्मा

© डॉ अंशु शर्मा

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #251 ☆ एक बाल गीत – हमें गधा कहते हैं सारे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका – एक बाल गीत – हमें गधा कहते हैं सारे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

 ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 251 ☆

☆ एक बाल गीत – हमें गधा कहते हैं सारे ☆ श्री संतोष नेमा ☆

हमें  गधा  कहते   हैं   सारे

हम  हैं  लम्बी   मूंछों   बारे

सहज सरल स्वभाव हमारा

हम  पर  बोझा  डालें  सारे

*

गधा हमें  धोबी का  समझें

कान  हमारे  जबरन  उमठें

ढेंचू  ढेंचू कह कर  फिर भी

लाद  पीठ  पर  चलते प्यारे

हमें   गधा   कहते   हैं  सारे

*

रखता  सबसे  वो   है  यारी

पर अफसोस गधा को भारी

एक अरज करता  है  सबसे

कहिए गधा मुझे  मत  प्यारे

हमें   गधा   कहते   हैं  सारे

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शब्दकोश ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शब्दकोश ??

वह लिखती रही विरह,

मैं बाँचता रहा मिलन,

चलो शोध करें,

दृष्टि बदलने से

शब्द का अर्थ

बदल जाता है क्या?

…और पता नहीं कैसे

मेरे पास बदले अर्थों का

एक शब्दकोश

संचित हो गया है..!

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ ‘“अभिमन्यु ” श्री संजय भारद्वाज (भावानुवाद) – ‘Abhimanyu…’ ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi poem “अभिमन्यु.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

English Version by – Captain Pravin Raghuvanshi

?~ Abhimanyu… ~??

I am indebted to  those

who wove an intricate web,

— a Chakravyuh, the

proverbial labyrinth

around me

to hold me back…!

For, in doing so,

unwittingly, they forged

the indomitable

Abhimanyu inside me…!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

~ Pravin Raghuvanshi

24 February 2025

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

श्री संजय भारद्वाज जी की मूल रचना

? संजय दृष्टि – अभिमन्यु  ? ?

कृतज्ञ हूँ

उन सबका,

मुझे रोकने

जो रचते रहे

चक्रव्यूह..,

और परोक्षतः

शनैः- शनैः

गढ़ते गए

मेरे भीतर

अभिमन्यु..!

?

♥ ♥ ♥ ♥

© संजय भारद्वाज  

मोबाइल– 9890122603, संजयउवाच@डाटामेल.भारत, [email protected]

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ~ ‘परछाइयां…’ ~ ☆ सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री ☆

सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री 

संक्षिप्त परिचय

आप भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की प्रतिनिधित्व में  कई अंतर बैंक, अंतर संस्था आयोजित स्पर्धाओं में आपके सभी सहभाग पुरस्कार से सम्मानित है । विभिन्न बैंक की पत्रिकाओं में आपके लेख और कविताएं प्रकाशित हैं। आकाशवाणी पुणे में आपके काव्यपाठ सत्र प्रसारित हैं। अनुवाद विधा में भी आपका सराहनीय योगदान है।

LWG. मंच से लिटफेस्ट 2.0 से आप जुड़ी है। इस मंच से लिटफेस्ट की हिंदी काव्य स्पर्धा, जनवरी माह की ऑनलाइन काव्य स्पर्धा , फरवरी माह की  हिंदी काव्य लाइव प्रस्तुति, मार्च महीने की ऑनलाइन काव्य स्पर्धा  में आपकी प्रविष्टियों को पुरस्कार और सम्मान प्राप्त है।

☆ ~ ‘परछाइयां…’ ~ ☆ सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री ? ☆

(लिटररी वारियर्स ग्रुप द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार प्राप्त कविता। प्रतियोगिता का विषय था >> “परछाइयां” /Shadows”।)

जिंदगी की दौड़ धूप में चलते-चलते,

मैंने देखा कोई मेरे

कभी साथ तो कभी पीछे और कभी आगे

चल रहा है।

वो अनजाना, अनदेखा था ज़रूर 

पर मित्र और हितैषी सा लगा,

लगा जैसे उसको परवाह है मेरी,

ख्याल मेरा रखना

अपना फ़र्ज़ मान रहा है जो..

 

आश्चर्य हुआ मुझे इस अद्भुत बंधु से,

जो अनेक रूप धारण करते-करते,

ढलती सूरज और दिन की पूर्ति में

कभी अदृश्य भी हो जाता, मानो,

चांद की ठंडक का आनंद मैं लूट सकूं,

प्यार के पलों को पूरी तरह जी सकूं,

चमकती तारों के बीच

खुद की रोशनी मैं जान सकूं,

अपना प्रकाश मैं औरों में बांट सकूं..

 

धूप- छांव का वस्त्र बदलता आसमां,

मेरे इस सखा से भी वस्त्र बदलवाता, 

जो कभी लम्बा और कभी बौना होता,

जताता अपनी कद और आकार से,

जिंदगी के उतार -चढ़ाव का तत्व-

 

मंजिल दूर हो और मार्ग में तपन, 

मुझे चलना है फिर भी ,तो

हो लेता मेरे साथ, मेरी परछाईं बन,

मेरी पहरेदारी के लिए।

मेरी सफलता दर्ज़ करने के लिए…!!

मेरी सफलता दर्ज़ करने के लिए !!!

~ सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री 

© सुश्री सीतालक्ष्मी खत्री 

पुणे 

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 243 ☆ बाल गीत – मीठी स्वाद निराला… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 243 ☆ 

☆ बाल गीत – खट्टी – मीठी स्वाद निराला…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।

झटपट खाएँ मटकू लाला।।

 *

नाम अनेकों इसके भइया।

इमली , अम्बा जीभ चटइया।

चटनी से खुल जाता ताला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

दही – भल्ले का स्वाद बढ़ाती।

आलू टिक्की भी गुण गाती।

चाट में चटनी गरममसाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कच्ची – पक्की खूब सुहाती।

सुमन , सुनीता चट कर जाती।

लटक डाल ललचाए माला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

बील , आमिला , कल्ली , खट्टा।

चटनी पीसे सिल का बट्टा।

दिल को करती है मतवाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

 *

कई विटामिन की है थाती।

दर्द , शुगर , पाचन में साथी।

सबका पड़ता इससे पाला।

खट्टी – मीठी स्वाद निराला।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #272 – कविता – ☆ आत्म शुद्धि की राह कठिन है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता आत्म शुद्धि की राह कठिन है…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #272 ☆

☆ आत्म शुद्धि की राह कठिन है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

अहं भाव श्रेष्ठत्व कुलीनता भेद

भरा जब तक इस मन में

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

संकीर्णता सोच मन में, जब-जब भी आये

अहमन्यता पथिक को, सत्पथ से भटकाये

यदि बिगड़े संतुलन, सहारा कौन बनेगा

सोचें, सम्मुख जब दुर्दिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

ग्रन्थि श्रेष्ठता की, तुलनात्मक भाव जगाए

अस्थिर चित्त, न रिश्तों को दुलार दे पाए

दर्प भरे घेरों में बँधे, अतृप्त विकल जन

मन, दोषों से ग्रस्त मलिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

परछाई के सदृश, दोष यदि अपनायेंगे

सहज सरलता, संतुष्टि कैसे पायेंगे,

कृतज्ञता आभार भाव उपजाएँ मन में

हो प्रयास, साधन अनगिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

 

आत्मोन्नति के सूत्र, सादगी में ही मिलते

हर मौसम से मेल, पुष्प तब ही हैं खिलते

भेद मिटे आपस के, हो निर्लिप्त आचरण

जैसे जल में, खिले नलिन है

आत्म शुद्धि की राह कठिन है।

☆ 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 96 ☆ भाग्य हमारा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “भाग्य हमारा” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 96 ☆  एक नवगीत-  भाग्य हमारा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

अब तो मौसम के हाथों में

सब कुछ है भाई

देखो भाग्य हमारा

कैसी करवट लेता है।

 

जोड़ तोड़ कर बीज जुटाया

सपनों को बोया

आँखों के पानी से काली

रातों को धोया

 

कुछ कुछ आशा हुई बलवती

मंगरे पर कागा

रहा उचार सगुन बैठा

जाने कब सुधि लेता है।

 

ब्याह गई घर की है मैना

छोड़ गई करजा

और महाजन की ड्योढ़ी पर

हाथ जोड़ परजा

 

खड़ी हुई उम्मीदें सारी

खेतों के आँगन

दगा न दे निष्ठुर मौसम

शंकालू मन होता है।

 

अबके सब त्योहार देहरी

पूजेंगे मिलकर

धरा आत्मा में बैठी

गाएगी संवत्सर

 

फसल रचेगी राँगोली

हर द्वारे बंदनवार

चल कर आँयेगीं ख़ुशियाँ

उल्लास सगुन बोता है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

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