हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विट्ठल मंदिर

हम्पी का विशाल फैलाव तुंगभद्रा के घेरदार आग़ोश और गोलाकार चट्टानों की पहाड़ियों की गोद में आकृष्ट करता है। घाटियों और टीलों के बीच पाँच सौ से भी अधिक मंदिर, महल, तहख़ाने, जल-खंडहर, पुराने बाज़ार, शाही मंडप, गढ़, चबूतरे, राजकोष… आदि असंख्य स्मारक हैं। एक लाख की आबादी को समेटे बहुत खूबसूरत नगर नदी किनारे बसा था। एक दिन में सभी को देखना कहाँ संभव है। हम्पी में ऐसे अनेक आश्चर्य हैं, जैसे यहाँ के राजाओं को अनाज, सोने और रुपयों से तौला जाता था और उसे निर्धनों में बाँट दिया जाता था। रानियों के लिए बने स्नानागार, मेहराबदार गलियारों, झरोखेदार छज्जों और कमल के आकार के फव्वारों से सुसज्जित थे।

हम्पी परिसर में विट्ठल मंदिर एक बहुत प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। विट्ठल मंदिर और बाजार परिसर तुंगभद्रा नदी के तट के पास विरुपाक्ष मंदिर के उत्तर-पूर्व में 3 किलोमीटर से थोड़ा अधिक  दूर है। यह हम्पी में सबसे कलात्मक रूप से परिष्कृत हिंदू मंदिर अवशेष विजयनगर के केंद्र का हिस्सा रहा है। यह स्पष्ट नहीं है कि मंदिर परिसर कब बनाया गया था, और इसे किसने बनवाया था। अधिकांश विद्वान इसका निर्माण काल 16वीं शताब्दी के आरंभ से मध्य तक बताते हैं। कुछ पुस्तकों में उल्लेख है कि इसका निर्माण देवराय द्वितीय के समय शुरू हुआ, जो कृष्णदेवराय, अच्युतराय और संभवतः सदाशिवराय के शासनकाल के दौरान जारी रहा। संभवतः 1565 में शहर के विनाश के कारण निर्माण  बंद हो गया। शिलालेखों में पुरुष और महिला के नाम शामिल हैं, जिससे पता चलता है कि परिसर का निर्माण कई प्रायोजकों द्वारा किया गया था।

यह मंदिर कृष्ण के एक रूप विट्ठल को समर्पित है, जिन्हें  विठोबा भी कहा जाता था। मंदिर पूर्व की ओर खुलता है, इसकी योजना चौकोर है और इसमें दो तरफ के गोपुरम के साथ एक प्रवेश गोपुरम है। मुख्य मंदिर एक पक्के प्रांगण और कई सहायक मंदिरों के बीच में स्थित है, जो सभी पूर्व की ओर संरेखित हैं। मंदिर 500 गुणा 300 फीट के प्रांगण में एक एकीकृत संरचना है जो स्तंभों की तिहरी पंक्ति से घिरा हुआ है। यह एक मंजिल की नीची संरचना है जिसकी औसत ऊंचाई 25 मीटर है। मंदिर में तीन अलग-अलग हिस्से हैं: एक गर्भगृह, एक अर्धमंडप और एक महामंडप या सभा मंडप है।

विट्ठल मंदिर के प्रांगण में पत्थर के रथ के रूप में एक गरुड़ मंदिर है; यह हम्पी का अक्सर चित्रित प्रतीक है। पूर्वी हिस्से में प्रसिद्ध शिला-रथ है जो वास्तव में पत्थर के पहियों से चलता था। इतिहासकार डॉ.एस.शेट्टर के अनुसार रथ के ऊपर एक टावर था। जिसे 1940 के दशक में हटा दिया गया था। पत्थर रथ भगवान विष्णु के आधिकारिक वाहन गरुड़ को समर्पित है। जिसकी फोटो 50 के नोट के पृष्ठ भाग पर अंकित है। पर्यटक 50 का नोट हाथ में रख दिखाते हुए फोटो ले रहे थे। हमारे साथियों ने भी सेल्फ़ी फोटो खींच मोबाइल में क़ैद कर लिए।

पत्थर के रथ के सामने एक बड़ा, चौकोर, खुले स्तंभ वाला, अक्षीय सभा मंडप या सामुदायिक हॉल है। मंडप में चार खंड हैं, जिनमें से दो मंदिर के गर्भगृह के साथ संरेखित हैं। मंडप में अलग-अलग व्यास, आकार, लंबाई और सतह की फिनिश के 56 नक्काशीदार पत्थर के बीम से जुड़े स्तंभ हैं जो टकराने पर संगीतमय ध्वनि उत्पन्न करते हैं। स्थानीय पारंपरिक मान्यता के अनुसार, इस हॉल का उपयोग संगीत और नृत्य के सार्वजनिक समारोहों के लिए किया जाता था। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है।

मंदिर परिसर के बाहर, इसके दक्षिण-पूर्व में, लगभग एक किलोमीटर (0.62 मील) लंबी एक स्तंभयुक्त बाज़ार सड़क है। सभी कतारबद्ध दुकान परिसर अब खंडहर हो चुके हैं। अब बिना छत वाले पत्थरों के खंभे खड़े हैं। उत्तर में एक बाज़ार और एक दक्षिणमुखी मंदिर है जिसमें रामायण-महाभारत के दृश्यों और वैष्णव संतों की नक्काशी है। उत्तरी सड़क हिंदू दार्शनिक रामानुज के सम्मान में एक मंदिर में समाप्त होती है।  विट्ठल मंदिर के आसपास के क्षेत्र को विट्ठलपुरा कहा जाता था। इसने एक वैष्णव मठ की मेजबानी की, जिसे अलवर परंपरा पर केंद्रित एक तीर्थस्थल के रूप में डिजाइन किया गया था। शिलालेखों के अनुसार यह शिल्प उत्पादन का भी केंद्र था।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Travelogue ☆ Holy Dip of Faith: Mahakumbh 2025 : # 11 ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆

Shri Jagat Singh Bisht

 

☆ Travelogue Holy Dip of Faith: Mahakumbh 2025 : # 11 ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆

Standing at the confluence of the sacred rivers—the Ganga, Yamuna, and the mystical Saraswati—we felt an overwhelming sense of gratitude. The Mahakumbh Mela 2025 had beckoned us to Teerthraj Prayagraj, offering a once-in-a-lifetime opportunity to immerse ourselves in the celestial waters during the most auspicious planetary alignment, one that will reoccur only after 144 years.

(Beautiful sunrise as we move towards the Sangam during Mahakumbh 2025.)

As the first light of dawn painted the horizon, we embarked on our journey to the Sangam. An e-rickshaw carried us part of the way before we rode pillion on a bike, weaving through the throng of pilgrims making their way to the holy waters. The air was thick with devotion, the silent hum of prayers blending seamlessly with the awakening city.

(An early morning boat ride to the confluence of the holy rivers Ganga, Yamuna and Saraswati in Prayagraj during the Mahakumbh 2025.)

The boat ride to the Sangam was nothing short of enchanting. The river mirrored the sky, rippling with hues of crimson as the sun emerged from behind the clouds. Our boatman, a man of simple wisdom, had spent his life ferrying seekers to the confluence. His words carried the weight of timeless knowledge, as if the river itself spoke through him. Time seemed to dissolve as we floated over the vast, flowing expanse—deep, relentless, and eternal. The moment we reached the Sangam and took the sacred dip, an indescribable stillness embraced us. In that instant, all doubts and anxieties melted away. The water was cold, yet it carried a warmth that seeped into the soul, cleansing not just the body but the spirit. It was bliss—pure, untainted, divine.

(Siberian birds on the river Yamuna during Mahakumbh 2025.)

Emerging from the waters, we were awestruck by the endless procession of humanity moving patiently towards the holy confluence. Men, women, and children—many barefoot, many elderly—walked with unwavering faith, their hearts pulsating with devotion. Some had travelled for days with nothing but their trust in the divine to sustain them. What unseen force propels these millions to undertake such an arduous journey? What unshakable belief gives them the strength to surrender their worldly worries at the feet of the Almighty?

The administration had done its best to accommodate the vast influx of devotees. Temporary ‘raen baseras’ provided free lodging, while community-run ‘bhandaras’ ensured that no pilgrim went hungry. Rows of temporary toilets lined the pathways, a much-needed relief for the weary travellers. Yet, despite the meticulous planning, the sheer magnitude of over 550 million seekers compressed into a small town for a few weeks was beyond any human effort to fully contain. And yet, miraculously, the chaos found its own rhythm. Faith was the only guiding force—an invisible hand that organised the unorganisable.

We walked with the masses under the afternoon sun, attempting to understand the hearts of those around us. But the deeper we looked, the more elusive the answers became. The Maha Kumbh Mela is not merely an event—it is a phenomenon, a movement of the spirit that defies explanation. And in this realisation, our faith in the unseen deepened.

Later, seeking a different perspective, we visited the digital museum that beautifully encapsulated the grandeur of the Kumbh Mela through short films and immersive exhibits. As evening descended, the Boat Club at Kali Ghat came alive with a mesmerising laser and drone show, a fusion of technology and tradition that narrated the timeless story of the Kumbh.

Despite the overwhelming crowds at the Sangam and the tent cities, we were fortunate to find solace in the relatively peaceful Civil Lines locality. With its delightful eateries, shopping avenues, and even a PVR cinema, it provided a refreshing contrast to the spiritual intensity of the Mela. Our dinner at El Chico, an iconic restaurant, was a comforting end to an extraordinary day. Before departing, we planned to pay our respects at the Amar Shaheed Chandra Shekhar Azad Park, honouring the brave son of India who had once walked these very streets.

As we prepared to leave, a quiet prayer lingered in our hearts:

May the divine essence of the Maha Kumbh Mela cleanse not just our bodies, but our souls. May it remind us of the eternal truth—that we are but droplets in the great river of existence, flowing towards the infinite. May peace and harmony reign within us, now and always.

© Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Founder:  LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # 20 -दो देश – दो परिवार, एक संस्कृति एवं एक ही तीज त्यौहार ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री राजेश सिंह ‘श्रेयस’ जी का एक शोधपरक दस्तावेज़ दो देश – दो परिवार, एक संस्कृति एवं एक ही तीज त्यौहार।) 

☆  दस्तावेज़ # 20 – दो देश – दो परिवार, एक संस्कृति एवं एक ही तीज त्यौहार ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

तोर धानवा मोर धानवा एक में मिलाओ रे

मॉरीशस में गंगा तालाब पूज्य गंगा मां सी गयीं

भारतीय विवाह संस्कार में वर और बधु दो पक्ष होतें है l शादी के एक रस्म में जब पहली बार दोनो पक्ष यानि दो परिवार मिलते हैं तो भारतीय अन्न (धान) एवं शुभ प्रतीक (हल्दी) को दोनों पक्ष अपने-अपने घर से गमछे में बाँध कर लातें है l फिर शुरू होती है एक रस्म l जिसे हम हल्दी -धान बांटना कहते हैं l

शादी कराने वाले पुरोहित दोनों पक्ष द्वारा लाये हुए हल्दी और धान को पहले एक में मिलाते हैं और फिर आधा-आधा बाँट कर दोनों पक्ष को वापस दे देते हैं l

भारतीय संस्कृति में इस वैवाहिक विधि का क्या अर्थ क्या है, इस विषय पर हम चर्चा करते हैं l

इस वैवाहिक विधि के भाव को कुछ इस प्रकार समझें कि क्या चाह करके भी इन दोनों परिवार के लोग आपस में इस प्रकार मिल चुके हल्दी और धान में से अपने अपने हिस्से हल्दी और धान का बंटवारा अलग-अलग कर सकतें है?

जी बिल्कुल नहीं कर सकते है l

कहने का अर्थ यह है कि अब जब दो परिवार आपस में मिल गए lयह रिश्ता जन्म-जन्मांतर का हो गया l इन्हें अब अलग किया जाना मुश्किल ही नही असंभव है l

आज इस बात की चर्चा मैं मॉरीशस के साहित्यकार रामदेव जी से कर रहा था l इस बात की चर्चा मैंने क्यों किया इसको समझते हैं –

धुरंधर जी ने शिवरात्रि पर्व की बात की और पूछा कि आपके यहां शिवरात्रि कब है तो मैंने कहा कि मेरे यहां शिवरात्रि 26 फरवरी को है तो उन्होंने कहा कि मेरे यहां भी शिवरात्रि 26 फरवरी को है और मैं देख रहा हूं कि काफी युवा काँवर लेकर के गंगा तालाब की तरफ आगे बढ़ रहे हैं l यह गंगा तालाब जाएंगे और वहां से जल लेंगे और उस जल को शंकर जी के शिवलिंग पर चढ़ाएंगे l

गंगा तालाब क्या है ??

रामदेव धुरंधर कहते हैं – गंगा तालाब को शुरू में परी तालाब के नाम से जाना जाता था l भारतीय लोग उसे परी तालाब ही बोलते थे l मैंने अपने कई साहित्यिक ग्रंथों में उसे परी तालाब कहा है l कालांतर में भारतीय लोगों ने भारत से गंगाजल लाकर एक बड़े धार्मिक विधि विधान से परी तालाब के पानी में मिलाया और उसे उसका नामकरण कर दिया गया गंगा तालाब l

1- गंगा संगम तट प्रयागराज, उप्र (भारत)

2- गंगा तालाब (मारिशस)

चित्र साभार : गूगल

यानी परी तालाब के जल में गंगाजल मिल गया और दोनों एक दूसरे में इस तरह से घुल मिल गए कि मानो दोनों एक हो गए l

अब इन दोनों जल को पृथक कभी नहीं किया जा सकता और इसकी मान्यता एक धार्मिक सरोवर जैसी हो गई, मॉरीशस में गंगा तालाब पूज्य गंगा मां सी गईl

इसका तात्पर्य हुआ कि भारत और मॉरीशस की संस्कृतियों आपस में इस कदर मिल गई हैं कि वे युग युगांतर तक पृथक हो ही नहीं सकती l

रामदेव धुरंधर जी कहते थे कि हम युवा अवस्था में पैदल तो नहीं जाते थे लेकिन साइकिल से हम लोग थे 100 से कुछ काम किलोमीटर मेरे घर से वह जगह होगी वह हम कई लोग कई किलोमीटर की यात्रा कर पहुंचते थे l वहां से हम लोग वापस घर नहीं लौटते थे बल्कि वहां से कुछ दूर आगे एक जगह है त्रयोलेट l

इसके आसपास ही हिंदी के बड़े साहित्यकार अभिमन्यु अनत जी का घर भी है l त्रयोलेट में एक शिव मंदिर है जिसे महेश्वर नाथ जी का मंदिर कहते हैं l हम गंगा तालाब से जल भरकर उस शिव लिंग पर चढ़या करते थे l

(श्री रामदेव धुरंधर जी के फेसबुक पटल में एक पिन किया गया पोस्ट है l जिसमे एक फोटोग्राफ गंगा तालाब का है l इस फोटोग्राफ में माताजी यानी धुरंधर जी की पत्नी का भी चित्र है l यह चित्र गंगा तालाब के पास का ही लिया हुआ है l रामदेव धुरंधर जी इस चित्र से बहुत ही स्नेह करते हैं और इसके ही बहाने वे अपनी धर्मपत्नी स्व.देवरानी जी को याद करते हैं )

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – नरसिम्हा – भाग-१४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – नरसिम्हा – भाग-१४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विरुपाक्ष मंदिर दर्शन उपरांत हम लोग हम्पी के आइकोनिक पहचान वाले लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर पहुँचे। आप मुख्य सड़क मार्ग से इस स्थान तक पहुंच सकते हैं। यह मंदिर मुख्य सड़क पर मध्य में स्थित है जो इसको रॉयल सेंटर से जोड़ता है। कृष्ण मंदिर से लगभग 200 मीटर दक्षिण में मेहराब से होकर गुजरने वाली सड़क को पार करती हुई एक छोटी सी नहर दिखी।  दाहिनी ओर एक कच्चा रास्ता आपको नरसिम्हा प्रतिमा और उसके बगल से मंदिर तक ले जाता है। मंदिर तो पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया था। लेकिन खंडित लक्ष्मी नरसिम्हा मूर्तिभंजक अत्याचार की कहानी कहती खड़ी है।

हेमकुटा पहाड़ी के विरुपाक्ष मंदिर से लगभग 1 किलोमीटर दक्षिण में इसी रास्ते ओर दूसरी ओर कृष्ण मंदिर है, जिसे बालकृष्ण मंदिर भी कहा जाता है। हम्पी परिसर के इस हिस्से को शिलालेखों में कृष्णपुरा कहा गया है। खंडहर हो चुके मंदिर के सामने एक बाज़ार के बीच स्तंभयुक्त पत्थर की दुकान के खंडहरों के बीच एक चौड़ी सड़क है जो रथों को बाजार से सामान लाने और ले जाने के काम  आती थी। उत्सव समारोहों के जुलूस  निकला करते थे। इस सड़क के उत्तर में और बाजार के मध्य में एक बड़ी सार्वजनिक उपयोगिता वाली सीढ़ीदार पानी की टंकी है। टंकी के बगल में लोगों के बैठने के लिए एक मंडप है। मंदिर पूर्व की ओर खुलता है; इसमें नीचे मत्स्य अवतार से शुरू विष्णु के सभी दस अवतारों की नक्काशी वाला एक प्रवेश द्वार है। अंदर कृष्ण का खंडहर हो चुका मंदिर और देवी-देवताओं के छोटे-छोटे खंडहर हैं। मंदिर परिसर मंडपों में विभाजित है, जिसमें एक बाहरी और एक आंतरिक घेरा शामिल है। परिसर में दो गोपुरम प्रवेश द्वार हैं। इसके गर्भगृह में रखी बालकृष्ण  की मूल छवि अब चेन्नई संग्रहालय में है। पूर्वी गोपुरा के सामने से एक आधुनिक सड़क गुजरती है, जो हम्पी के सबसे नज़दीक बस्ती कमलापुरम को हम्पी से जोड़ती है। पश्चिमी गोपुरम में युद्ध संरचना और सैनिकों की भित्तिचित्र हैं।

कृष्ण मंदिर के बाहरी हिस्से के दक्षिण में दो निकटवर्ती मंदिर हैं, एक में सबसे बड़ा अखंड शिव लिंग है और दूसरे में विष्णु का सबसे बड़ा अखंड योग-नरसिम्हा अवतार है। 9.8 फीट का शिव लिंग एक घनाकार कक्ष में पानी में खड़ा है और इसके शीर्ष पर तीन आंखें बनी हुई हैं। इसके दक्षिण में 22 फीट ऊंचे नरसिम्हा – विष्णु के नर-शेर अवतार – योग मुद्रा में बैठे हैं। नरसिम्हा मोनोलिथ में मूल रूप से देवी लक्ष्मी भी थीं, लेकिन इसमें व्यापक क्षति के संकेत और कार्बन से सना हुआ फर्श दिखाई देता है – जो मंदिर को जलाने के प्रयासों का सबूत है। प्रतिमा को साफ कर दिया गया है और मंदिर के कुछ हिस्सों को बहाल कर दिया गया है।

नरसिम्हा हम्पी की सबसे बड़ी मूर्ति है। नरसिम्हा विशाल सात सिर वाले शेषनाग की कुंडली पर बैठे हैं। साँप का फन उसके सिर के ऊपर छत्र के रूप में है। भगवान घुटनों को सहारा देने वाली बेल्ट के साथ (क्रॉस-लेग्ड) पालथी योग मुद्रा में हैं। इसे उग्र नरसिम्हा अर्थात अपने भयानक रूप में नरसिम्हा भी कहा जाता है। उभरी हुई आंखें और चेहरे के भाव ही इस नाम का आधार हैं। तालीकोटा के युद्ध के बाद इस मूर्ति को पूरी तरह ध्वस्त करने के प्रयास  आयातितों ने किए। पत्थर को जब नहीं तोड़ा जा सका तो इसे गंदगी से अपवित्र किया गया। चारों तरफ़ आग लगाकर नष्ट करने के प्रयास हुए। फिर भी यह मूर्ति वर्तमान स्वरूप में बच गई।

मूल प्रतिमा में लक्ष्मी की छवि भी थी, जो उनकी गोद में बैठी थीं। लेकिन मंदिर तोड़ने के दौरान यह मूर्ति गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई। यहां तक कि उनकी गोद में उकेरी गई लक्ष्मी की मूर्ति का क्षतिग्रस्त हिस्सा गायब है। संभवतः यह छोटे-छोटे टुकड़ों में इधर-उधर बिखर गई होगी। लेकिन देवी का हाथ आलिंगन मुद्रा में देव की पीठ पर टिका हुआ दिखाई देता है। अगर आपको इस घेरे के अंदर जाने का मौका मिले तो देवी का हाथ दिख सकता है। यहां तक कि उसकी उंगलियों पर नाखून और अंगूठियां भी बहुत अच्छी तरह से बनाई गई हैं। किसी तरह यह अकेली मूर्ति एक ही समय में प्रदर्शित कर सकती है कि मानव मन कितना रचनात्मक और विनाशकारी हो सकता है। नरसिम्हा दर्शन करके दाहिनी तरफ़ देखा तो कुछ दुकानों के बीच से विट्ठल मंदिर गोपुर दिखा। कदम बरबस ही इस बिट्ठल मंदिर की ओर बढ़ गए। 

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

छोटे गोपुरम के बाद का प्रांगण शिव मंदिर के मुख्य मंडप की ओर जाता है, जिसमें मूल वर्गाकार मंडप और कृष्णदेवराय द्वारा निर्मित दो जुड़े हुए वर्गों और सोलह खंभों से बना एक आयताकार विस्तार शामिल है। मंदिर की सभी संरचनाओं में सबसे अलंकृत, केंद्रीय स्तंभ वाला हॉल इस यहीं है। इसी प्रकार मंदिर के आंतरिक प्रांगण तक पहुंच प्रदान करने वाला प्रवेश द्वार टॉवर भी है। स्तंभित हॉल के बगल में स्थापित एक पत्थर की पट्टिका पर शिलालेख मंदिर में उनके योगदान की व्याख्या करते हैं। जिसमें दर्ज है कि कृष्ण देवराय ने 1510 ई. में अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में इस हॉल का निर्माण करवाया था। उन्होंने पूर्वी गोपुरम का भी निर्माण कराया। मंदिर के हॉलों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता था। कुछ ऐसे स्थान थे जिनमें संगीत, नृत्य, नाटक आदि के विशेष कार्यक्रमों को देखने के लिए देवताओं की तस्वीरें रखी जाती थीं। अन्य का उपयोग देवताओं के विवाह का जश्न मनाने के लिए किया जाता था।

विरुपाक्ष में छत की पेंटिंग देखी जो चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी की हैं। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रमुख नवीकरण और परिवर्धन हुए, जिसमें उत्तरी और पूर्वी गोपुरम के कुछ टूटे हुए टावरों को पुनर्स्थापित किया गया। मंडप के ऊपर खुले हॉल की छत को चित्रित किया गया है, जो शिव-पार्वती विवाह को दर्शाता है। एक अन्य खंड राम-सीता की कथा को बताता है। तीसरे खंड में प्रेम देवता कामदेव द्वारा शिव पर तीर चलाने की कथा को दर्शाया गया है, और चौथे खंड में अद्वैत हिंदू विद्वान विद्यारण्य को एक जुलूस में ले जाते हुए दिखाया गया है। जॉर्ज मिशेल और अन्य विद्वानों के अनुसार, विवरण और रंगों से पता चलता है कि छत की सभी पेंटिंग 19वीं सदी के नवीनीकरण की हैं, और मूल पेंटिंग के विषय अज्ञात हैं। मंडप के स्तंभों में बड़े आकार के उकेरी आकृतियाँ हैं, एक पौराणिक जानवर जो घोड़े, शेर और अन्य जानवरों की विशेषताओं को समेटे है और उस पर एक सशस्त्र योद्धा सवार है – जो कि विजयनगर की एक विशिष्ट पहचान को दर्शाता है।

मंदिर के गर्भगृह में पीतल से उभरा एक मुखी शिव लिंग है। विरुपाक्ष मंदिर में मुख्य गर्भगृह के उत्तर में पार्वती-पम्पा और भुवनेश्वरी के दो पहलुओं के लिए छोटे मंदिर भी हैं। भुवनेश्वरी मंदिर चालुक्य वास्तुकला का है और इसमें  पत्थर के बजाय ग्रेनाइट का उपयोग किया गया है। परिसर में एक उत्तरी गोपुर है, जो पूर्वी गोपुर से छोटा है, जो मनमाथा टैंक की ओर खुलता है और रामायण से संबंधित पत्थर की नक्काशी के साथ नदी के लिए एक मार्ग है। इस टैंक के पश्चिम में शक्तिवाद और वैष्णववाद परंपराओं के मंदिर हैं, जैसे क्रमशः दुर्गा और विष्णु के मंदिर। कुछ मंदिरों को 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश भारत के अधिकारी एफ.डब्ल्यू. रॉबिन्सन के आदेश के तहत सफेद कर दिया गया था, जिन्होंने विरुपाक्ष मंदिर परिसर को पुनर्स्थापित करने की मांग की थी। तब से ऐतिहासिक स्मारकों के इस समूह की सफेदी एक परंपरा के रूप में जारी है।

स्थानीय परंपरा के अनुसार, विरुपाक्ष एकमात्र मंदिर है जो 1565 में हम्पी के विनाश के बाद भी हिंदुओं का जमावड़ा स्थल बना रहा और तीर्थयात्रियों का आना-जाना लगा रहा। यह मंदिर बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है; विरुपाक्ष और पम्पा के विवाह को चिह्नित करने के लिए रथ जुलूस के साथ एक वार्षिक उत्सव वसंत ऋतु में आयोजित किया जाता है, जैसा कि महा शिवरात्रि का पवित्र त्योहार है।

वर्तमान में, मुख्य मंदिर में एक गर्भगृह, तीन पूर्व कक्ष, एक स्तंभ वाला हॉल और एक खुला स्तंभ वाला हॉल है। इसे बारीक नक्काशी वाले खंभों से सजाया गया है। मंदिर के चारों ओर एक स्तंभयुक्त मठ, प्रवेश द्वार, आंगन, छोटे मंदिर और अन्य संरचनाएं हैं। दक्षिण वास्तुकला के इनके खम्भ और छत को देखते हुए हमने गर्भ गृह में पहुँच शिव लिंग के दर्शन किए।

गर्भ ग्रह से बाहर निकलने हेतु नौ-स्तरीय पूर्वी प्रवेश द्वार तरफ़ प्रवेश किया, जो सबसे बड़ा है, अच्छी तरह से आनुपातिक है और इसमें कुछ पुरानी संरचनाएं शामिल हैं। इसमें एक ईंट की अधिरचना और एक पत्थर का आधार है। यह कई उप-मंदिरों वाले बाहरी प्रांगण तक पहुंच प्रदान करता है। छोटा पूर्वी प्रवेश द्वार अपने असंख्य छोटे मंदिरों के साथ आंतरिक प्रांगण की ओर जाता है। तुंगभद्रा नदी का एक संकीर्ण चैनल मंदिर की छत के साथ बहता है और फिर मंदिर-रसोईघर तक उतरता है और बाहरी प्रांगण से होकर बाहर निकलता है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-१२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विरूपाक्ष मंदिर

बस से उतरकर सबसे पहले विरूपाक्ष मंदिर पहुंचे। विरुपाक्ष मंदिर खंडहरों के बीच बचा रह गया था। अभी भी यहाँ पूजा होती है। यह भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें यहां विरुपाक्ष-पम्पा पथी के नाम से जाना जाता है। शिव “विरुपाक्ष” के नाम से जाने जाते हैं। यह मंदिर  तुंगभद्रा नदी के तट पर है। विरुपाक्ष अर्थात् विरूप अक्ष, विरूप का अर्थ है कोई रूप नहीं, और अक्ष का अर्थ है आंखें। इसका अर्थ हुआ बिना आँख वाली दृष्टि। जब आप थोड़ा और गहराई में जाते हैं, तो आप देखते हैं कि चेतना आँखों के बिना देख सकती है, त्वचा के बिना महसूस कर सकती है, जीभ के बिना स्वाद ले सकती है और कानों के बिना सुन सकती है। ऐसी चीजें गहरी ‘समाधि’ में सपनों की तरह ही घटित होने लगती हैं। चेतना अमूर्त है। आप पांच इंद्रियों में से किसी के भी बिना सपने देखते हैं; सूंघते हैं, चखते हैं, आप सब कुछ करते हैं ना? तो विरुपाक्ष वह चेतना है जिसकी आंखें तो हैं लेकिन मूर्त आकार नहीं है।  समस्त ब्रह्मांड में शिव चेतना बिना किसी आकार के जड़ को चेतन करती है, जैसे बिजली दिखाई नहीं देती मगर पंखे को घुमाने लगती है। छठी इंद्रिय का अतीन्द्रिय अहसास ही विरूपाक्ष है। इंद्र की पाँच इन्द्रियों से परे छठी इन्द्रिय का मनोवैज्ञानिक सिद्धांत तो बहुत बाद उन्नीसवीं सदी में सिग्मंड फ्रॉड के अध्ययन के बाद आया। उसके बहुत पहले विरुपाक्ष चेतन शिव की मूर्ति बन चुकी थी।

विरूपाक्ष मंदिर का इतिहास लगभग 7वीं शताब्दी से अबाधित है। विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण कल्याणी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य-2 ने करवाया था जो इस वंश का सबसे प्रतापी शासक था। पुरातात्विक अध्ययन से इसे बारहवीं सदी के पूर्व का बताया गया है। विरुपाक्ष-पम्पा विजयनगर राजधानी के स्थित होने से बहुत पहले से अस्तित्व में था। शिव से संबंधित शिलालेख 9वीं और 10वीं शताब्दी के हैं। जो एक छोटे से मंदिर के रूप में शुरू हुआ वह विजयनगर शासकों के अधीन एक बड़े परिसर में बदल गया। साक्ष्य इंगित करते हैं कि चालुक्य और होयसल काल के अंत में मंदिर में कुछ अतिरिक्त निर्माण किए गए थे, हालांकि अधिकांश मंदिर भवनों का श्रेय विजयनगर काल को दिया जाता है। विशाल मंदिर भवन का निर्माण विजयनगर साम्राज्य के शासक देव राय द्वितीय के अधीन एक सरदार, लक्कना दंडेशा द्वारा किया गया था।

विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने समय-समय पर इस मंदिर का निर्माण और विस्तार किया। मंदिर के हॉल में संगीत, नृत्य, नाटक, और देवताओं के विवाह से जुड़े कार्यक्रम आयोजित होते थे। विरुपाक्ष मंदिर में  शिव, पम्पा और दुर्गा मंदिरों के कुछ हिस्से 11वीं शताब्दी में मौजूद थे। इसका विस्तार विजयनगर युग के दौरान किया गया था। यह मंदिर छोटे मंदिरों का एक समूह है, एक नियमित रूप से रंगा हुआ, 160 फीट ऊंचा गोपुरम, अद्वैत वेदांत परंपरा के विद्यारण्य को समर्पित एक हिंदू मठ, एक पानी की टंकी, एक रसोई, अन्य स्मारक और 2,460 फीट लंबा खंडहर पत्थर से बनी दुकानों का बाजार, जिसके पूर्वी छोर पर एक नंदी मंदिर है।

विरुपाक्ष मंदिर को द्रविड़ शैली में बनाया गया है। द्रविड़ शैली के मंदिरों की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं कि ये मंदिर आमतौर पर आयताकार प्रांगण में बने होते हैं। इन मंदिरों का आधार वर्गाकार होता है और शिखर पिरामिडनुमा होता है। इन मंदिरों के शिखर के ऊपर स्तूपिका बनी होती है। इन मंदिरों के प्रवेश द्वार को गोपुरम कहते हैं। इस मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में, इसे बनाने और सजाने के लिए गणितीय अवधारणाओं का उपयोग हुआ है। मंदिर का मुख्य आकार त्रिकोणीय है। जैसे ही आप मंदिर के शीर्ष को देखते हैं, पैटर्न विभाजित हो जाते हैं और खुद को दोहराते हैं। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यहां का शिवलिंग है जो दक्षिण की ओर झुका हुआ है। इसी प्रकार यहां के पेड़ों की प्रकृति भी दक्षिण की ओर झुकने की है।

तुंगभद्रा नदी से उत्तर की ओर एक गोपुरम जिसे कनकगिरि गोपुर के नाम से जाना जाता है। हमने तुंगभद्रा नदी की तरफ़ से कनकगिरि गोपुर से मंदिर प्रांगण में प्रवेश किया। द्वार पर द्वारपालों की मूर्तियां हैं। मंदिर का मुख पूर्व की ओर है, जो शिव और पम्पा देवी मंदिरों के गर्भगृहों को सूर्योदय की ओर संरेखित करता हैं। एक बड़ा पिरामिडनुमा गोपुरम है। जिसमें खंभों वाली मंजिलें हैं जिनमें से प्रत्येक पर कामुक मूर्तियों सहित कलाकृतियां हैं। गोपुरम एक आयताकार प्रांगण की ओर जाता है जो एक अन्य छोटे गोपुरम में समाप्त होता है। इसके दक्षिण की ओर 100-स्तंभों वाला एक हॉल है जिसमें प्रत्येक स्तंभ के चारों तरफ हिंदू-संबंधित नक्काशी है। इस सार्वजनिक हॉल से जुड़ा एक सामुदायिक रसोईघर है, जो अन्य प्रमुख हम्पी मंदिरों में पाया जाता है। रसोई और भोजन कक्ष तक पानी पहुंचाने के लिए चट्टान में एक चैनल काटा गया है। छोटे गोपुरम के बाद के आंगन में दीपा-स्तंभ  और नंदी हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासी ☆ महाकाय कुंभलगड ☆ प्रा. भरत खैरकर☆

प्रा. भरत खैरकर

🌸 मी प्रवासी 🌸

☆ महाकाय कुंभलगड ☆ प्रा. भरत खैरकर 

बनास नदीच्या काठावर वसलेलं हे माउंट आबू हिल स्टेशन.. खूप दिवसापासून माउंटआबूबद्दल ऐकलं वाचलं होतं.. अरवली पर्वतरांगात वसलेलं माउंट आबू हे सर्वात उंच शिखर!

भारतात उत्तरेला हिमालय.. दक्षिणेला निलगिरी आणि मध्यभागी अरवली म्हणजेच माउंट आबू आहे! तलहाथीवरून गाडी वळणवळण घेत माउंटआबूवर म्हणजे अरवली पर्वत रांगातून चालली होती. अप्रतिम सौंदर्य!

आम्ही सरळ ‘गुरुशिखर’ साठीच निघालो. तिथलं सर्वात उंच ठिकाण! सकाळी सकाळी ह्या ठिकाणी पोहोचल्याने गर्दी जमायला जेमतेम सुरुवात झाली होती. गाडी पार्क करून आम्ही भराभर पायऱ्या चढून दत्ताच दर्शन घेतलं. तिथल्या प्राचीन घंटेचा स्वर आसमंतात निनादला.. फोटो काढले आणि खाली आलो तर एवढ्या वेळात इतकी गर्दी झाली की गाडी काढायला जागा नाही. लोक वाटेल तशा गाड्या पार्क करून गुरुशिखरावर गेले होते. वर येणाऱ्या गाड्यांची अजूनच त्यात लगीनघाई चालली होती. मी शिताफीने ड्रायव्हरला गाडी काढायला सांगितली. अवघ्या अर्ध्या तासात पाच-सहा किलोमीटर लांब ट्रॅफिक जाम झालं होतं. आम्ही पटकन खाली येऊन गेलो, नाहीतर पुढचं सारं शेड्युल बिघडलं असतं.

वाटेवरचं दिलवाडा टेम्पल बघितलं. तिथे असलेल्या कल्पवृक्षासह फोटो काढले. दिलवाडा मंदिर हे संपूर्णपणे संगमरवरात बनविलेले उत्कृष्ट वास्तू रचना असलेले जैन मंदिर आहे. अकराव्या शतकात बांधलेलं हे मंदिर जैन लोकांशिवाय इतरांसाठी दुपारपासून सायंकाळी सहा पर्यंत खुलं असतं. जैन लोकांच्या महत्त्वाच्या तीर्थक्षेत्रामध्ये याचा समावेश होतो.

तिथून आम्ही ‘नक्की लेक’ला गेलो. तोवर चांगलीच गर्दी वाढली होती. आम्ही नक्की लेक बघितला. तिथे राजस्थानी ड्रेसवर फोटो काढता येत होते.. सर्वांनी आपापले ड्रेस निवडले.. राजस्थानी ड्रेस वर फोटो सेशन झालं. फोटो मिळायला अर्धा तास असल्याने पुन्हा नक्कीलेकवर टाईमपास केला. मेहंदी काढली.. नचिकेतसाठी उंदीर आणि टमाटर हे खेळणे घेतले.. जोरात फेकून मारले की ते पसरायचे व परत हळूहळू ‘टर्मिनेटर’ सारखे मूळ आकार घ्यायचे.. खूपच मजेशीर होते! खेळणी बनविणाऱ्याच्या कल्पनाशक्तीच कौतुक वाटलं! मुलांना काय हवं, त्यांना काय आवडेल हे अचूक हेरणारे ते डिझायनर असतात.

आम्ही फोटो घेऊन माउंटआबूवरून खाली तलहाथीला आलो.. तिथे प्रजापिता ब्रह्मकुमारी यांचा आश्रम आहे.. तेथील कार्यकर्त्याने कार्य समजावून सांगितले.. वेळ कमी असल्याने मिळाला तो ‘गुरुप्रसाद’ घेऊन आम्ही कुंभलगडकडे रवाना झालो.. लांबचा पल्ला होता..

रानकापूर फाटा उदयपूरहून जोधपुरला जाणाऱ्या हायवेवर आहे‌. म्हणजे उदयपूर साईडला आपणास जावं लागतं. त्या रस्त्यावर भरपूर सिताफळाचे बन आहे. आजूबाजूच्या गावातली शाळकरी मुलं वीस रुपयाला टोपलीभर सीताफळ विकत होती. हायवेला असल्याने लोकही गाड्या थांबवून सीताफळ घेत होती. रस्ता खूपच मस्त होता.. ट्राफिक मात्र काहीही नव्हते.. कुंभलगड रानकापूर फाटा आला. सुरुवातीला कुंभलगड बघून घ्यावा म्हणून रानकापूर डावीकडे सोडून आम्ही सरळ कुंभलगड कडे निघालो..

हा रस्ता खूपच खराब होता.. शिवाय मध्येच गाडीच्या टपावर बांधलेली ताडपत्री उडाली.. घाटात गाडी थांबवून ती बांधून घेतली.. मध्ये एक शेतकरी राजस्थानी पद्धतीच्या मोटने शेताला पाणी देत होता.. ते बघायला गाडी थांबविली. एक छोटीशी क्लिप तयार केली. फोटो घेतले. मोटेचा जुना मेकॅनिझम बघून फार छान वाटलं.. अजूनही कुंभलगड यायचं नाव घेत नव्हता.. म्हणजे खूप दूर होता. अंतर जवळचं वाटायच पण नागमोडी आणि जंगलचा बिकट रस्ता शिवाय हळूहळू होणारा सूर्यास्त यामुळे खूप वेळ झाला की काय असं वाटायचं.. एवढ्यातच गाडीचा मागचा टायर बसला!

पूर्ण गरम झालेला टायर रस्त्यावरील खाचखडग्याने व अती घाई ह्यामुळे तापला व फाटला होता! आता जंगलात फक्त आम्हीच आणि सामसूम! भराभर मागच्या बॅगा काढून स्टेफनी काढली. चाकाचे नट काही केल्या ढिले होईना! गरम होऊन ते जाम झाले होते. शिवाय स्पॅनर ही स्लिप होत होता. गाडी चालवायला मस्त पण प्रॉब्लेम आल्यावर सगळी हवा ‘टाईट’ होते.

तेवढ्यात एक इनोव्हा मागच्या बाजूने दोन फॉरेनर टुरिस्टना घेऊन आली. तिला थांबण्यासाठी आम्ही रिक्वेस्ट केली. ड्रायव्हर तरुण पंजाबी मुलगा होता. कुठल्यातरी फाईव्ह स्टार हॉटेलमधील फॉरेनर टुरिस्टला कुंभलगड, रानकापूर आणि जंगल सफारी करण्यासाठी साठी घेऊन जात होता. त्याने पंधरा-वीस फुटावर गाडी थांबवली. त्यातील परदेशी पाहुण्यांना विचारून त्याने पंधरा मिनिटे मागितले. पटकन त्याचा ‘टूलबॉक्स’ त्याने काढला. सुरुवातीला त्यालाही नट हलेना! मग त्याने त्यावर पाणी टाकायला सांगितले. गरम झाल्याने एक्सपांड झालेले नट.. थंड झाल्यावर पटकन खोलल्या गेले. मग आम्ही आमची स्टेफनी टाकून गाडी ‘ओके’ केली. त्याचे आभार मानले. तोवर बऱ्यापैकी वेळ झाला होता. पण संकट टळल होतं. निदान आम्ही आमच्या गाडीत होतो. जंगलातून बाहेर पडू शकत होतो. किंवा शेजारच्या कुठल्यातरी गावात जाऊ शकत होतो. भगवंताने मदतीला पाठविलेला तो पंजाबी मुलगा आम्ही आयुष्यभर विसरणं शक्य नाही!

शेवटी कुंभलगडला आम्ही पोहोचलो. तो भव्य दिव्य किल्ला बघून डोळे दिपले. महाराणा कुंभाने बांधलेला हा गड.. त्याचे बुरुज कुंभाच्या म्हणजे मोठ्या मडक्याच्या आकाराचे म्हणून हा कुंभलगड! इथे जंगल सफारी व व्हिडिओ शो पाहता येतो. ह्या किल्ल्यावर बादलमहल, सूर्य मंदिर, भव्य परकोट, मोठमोठे कुंभाच्या आकाराचे बुरुज आहेत. एवढा भव्य किल्ला शाबूत अवस्थेत अजून पर्यंत आम्ही पाहिला नव्हता. इथे रात्री गडाची माहिती देणारा शो असतो. तो पर्यटकांमध्ये नवीन उत्साह भरतो. अरवली पर्वतरांगांच्या पश्चिमेकडे हा किल्ला आहे. उदयपूरपासून अंदाजे ८४ किमी अंतरावर असलेला हा किल्ला राणा कुंभाने १५ व्या शतकात बांधला आहे. कुंभलगडची भिंत ३८ किलोमीटर पसरलेली, जगातील सर्वात लांब अखंड भिंतींपैकी एक आहे. मेवाडचे महाराणा प्रताप यांचे हे जन्मस्थान आहे. भराभर फोटो काढले. जमेल तेवढा डोळ्यात साठवून घेतला. आतुर नेत्रांनी त्या किल्ल्याचा निरोप घेतला. कारण रानकापूर गाठायचे होते.

बऱ्यापैकी अंधार झाला होता. जंगलची रात्र होती. पण पुन्हा एवढ्या बिकट वाटेने आम्ही रानकापुर कडे निघालो होतो. एक वेळ वाटलं की इथून पुढे आता काहीच असणार नाही. ‘हेअर पीन टर्न’ एवढा शार्प होता की थोडा जरी बॅलन्स गेला तरी गाडी उलटणार.. पण आमचा ड्रायव्हर अमोलच.. त्याच्या वयाच्या मानाने ड्रायव्हिंग स्किल अप्रतिम होतं.. त्याने सही सलामत त्या अंधाऱ्या जंगलातून गाडी बाहेर काढली.. तर आम्ही रस्ता चुकलो!.. उजवीकडे जाण्याऐवजी डावीकडे लागलो.. पाच-सहा किलोमीटर गेल्यावर काहीतरी चुकतंय‌.. असं वाटलं.. पण विचारणार कोणाला? तेवढ्यात समोरून एक कार येताना दिसली. त्यांना थांबून विचारल्यावर त्यांनी सांगितले, ” तुम्ही उदयपूरकडे चाललात.. उलट जा किंवा आमच्या मागे या. ” मग आम्ही गाडी वळविली. आठ दहा किलोमीटर त्यांच्या मागे गेल्यावर आम्हीच मग पुढे निघालो.. शेवटी ‘सादरी’ गावातून रानकापूर या ठिकाणी आलो.. तेव्हा रात्रीचे साडेसात वाजले होते. जैन मंदिर असल्याने अशा अवेळी ‘उघडे’ असण्याची शंकाच होती. पण देवाच्या कृपेने आरती सुरू होती.. भगवान महावीरांना मनोमन नमस्कार केला व बिकट प्रसंगात वाट दाखविली म्हणून आभार मानले. दर्शन झाल्याने फार आनंद झाला रात्री दिव्यांच्या उजेडात मंदिराची भव्यता दिसत नव्हती पण जाणवत होती. दिवसाच बघावं असं हे जगातलं सर्वात सुंदर जैन मंदिर वर्ल्ड हेरिटेजचा भाग आहे. पण रात्री बघावं लागलं..

पंधराव्या शतकात राणा कुंभाने दान केलेल्या जागेत बांधलेलं हे कोरीव मंदिर खूपच सुंदर आहे. ४८००० चौरस फुटामध्ये पसरलेलं आहे. जैनांच्या जगातल्या पाच मंदिरांपैकी ते एक आहे. मंदिराला २९ खांब किंवा पिलर असलेला गाभारा आहे. मंदिराला एकूण १४४४ कोरीव स्तंभ आहेत. पण एकही स्तंभ एक दुसऱ्या सारखा नाही. मुख्य चौमुख मंदिरात आदिनाथाची मूर्ती आहे. जे प्रथम जैन तीर्थकर होते. हेही नसे थोडके.. म्हणून आम्ही मंदिरा बाहेर पडलो.

आता मुक्काम कुठे करावा? कारण आजचा मुक्काम जोधपुरला होता. जे इथून 130 किलोमीटरवर होतं आणि रस्ता तर असा.. पण तीस किलोमीटर नंतर ‘एन एच ८’ लागणार होता. तिथवर जावं मग जोधपुर गाठता येईलच हा विचार आला.

रणकापूरला आम्हांला पुण्याजवळील रांजणगावच्या तरुण मुलांचा एक ग्रुप भेटला. त्यांनाही जोधपुरला जायचे होते. पण एवढ्या रात्री अनोळखी रस्त्याने एका मागे एक आपण तिन्ही गाड्या काढू, असं त्यांनी सुचवलं.. त्यानुसार दहा-बारा किलोमीटर अंतरावर गेल्यावर ते दुसऱ्या रस्त्याने निघाले.. आम्ही दुसऱ्या.. अर्ध्या तासानंतर फोन केल्यावर ते पालीला हायवेला टच होणार होते. आम्ही अलीकडेच हायवेला टच झालो होतो.. ठीक झालं.. आलो एकदाचे हायवेवर.. अन् सुरू झाला जोधपुर कडे प्रवास! रात्री बारा वाजता घंटाघर ह्या जोधपूरच्या प्रसिद्ध भागात आम्ही पोहोचलो. सगळीकडे सामसूम.. गल्लीबोळातून गाडी हॉटेलच्या दिशेने चालली होती.

“कहा जाना है? चलो, हम हॉटेल दिखाते है” म्हणून जवळपास अंगावर आल्यासारखे दोन तरुण बाईकवर आमच्या गाडीपाशी आले. ते बराच वेळ गाडीचा पाठलाग करत होते. असं लक्षात आलं.. दरम्यान बरेचशे सीआरपीएफचे जवान गल्लीबोळात रायफलसह उभे होते.. असे भारतीय जवान मी काश्मीरमध्ये श्रीनगरला बघितले होते. वाटलं इथे सेन्सिटिव्ह एरिया असावा.. तरी हिंमत करून त्यातल्या एकाला विचारलं की “हॉटेल खरंच इकडे आहे कां?” तर तो “असेल. ” म्हणून मोकळा झाला.. ती दोघं मात्र त्यांना भीकही घालत नव्हती. मग एका जागी अरुंद मोड आली. गाडी पुढे नेता येईना!. मग “ईथेच गाडी थांबवा. माझ्यासोबत तुमच्यातला कोणीतरी या, हॉटेल दाखवीतो. ” म्हटल्यावर मी उतरलो. म्हटलं बघू करतात तरी काय? किंवा काय होईल? तेवढ्यात माझा एक सहकारीही गाडीतून उतरला. आम्ही एका हॉटेलच्या बंद दरवाजावर पोहोचलो. आत गेट उघडून गेलो तर मंद मंदसा प्रकाश.. हॉटेल सारखं काही वाटतच नव्हतं.. जुन्या वाड्यात आल्यासारखे वाटले.. फोन केला.. तर हॉटेल मालक फोन घ्यायला तयार नाही.. खूप वेळाने कसं बस त्याने एका नोकराला खाली पाठवलं.. त्या नोकरासोबत ते दोघेजण बोलले.. ” हमने लाया है!” वगैरे.. मग लक्षात आले की हे “दलाल” आहेत.. वर गेलो तर मालक पूर्ण टल्ली होता.. म्हणजे दारू पिऊन मग्न होता.. शिवाय अर्ध नग्नही होता.. चार फॉरेनर मुलं मुली आणि हा मालक एकमेकांशी अश्लील चाळे करत होते.. मला बघून “कमॉन सर!” म्हणत ते फॉरेनर आवाज देत होते.. माझं डोकं सटकलं.. पण मी सावरत मालकाला म्हटलं

“अरे, हमारा रूम किधर है?” तर तो म्हणाला, ” यहा पर कमरा वगैरे नही है !लेकिन मैने मेरे दोस्त को बोला है उसके हॉटेल मे आप रह सकते हो. ” असं म्हणत त्याने आपल्या नोकराला आमच्याबरोबर पाठविले.. नशीब!

परत गाडीजवळ येऊन त्याला गाडीत बसवून बाजूच्या गल्लीत असलेल्या हॉटेल ‘किंग्स रिट्रीट’ मध्ये आम्ही आलो.. तिथल्याही नोकरालाही धड माहिती नव्हती.. त्याने दार उघडलं. मग त्याने एका मोठ्याशा हॉलमध्ये आम्हांला सामान ठेवायला सांगितले.. हॉटेलमध्ये सगळीकडे फॉरेनर होते.. मिळाली एकदाची रूम.. आता रात्रीचे दीड वाजले होते.. गल्लीत गाडी दाबून लावली.. आणि झोपलो.. राजस्थान टूरच्या पहिल्याच दिवशी.. एकाच दिवसात आलेला खूप मोठा हा जीवनानुभव होता.. माणसांची किती प्रकारची रूपं आज आम्ही बघितली होती.. तरीही ‘रात गयी बात गयी’ म्हणून झोपी गेलो.

© प्रा. भरत खैरकर

संपर्क – बी १/७, काकडे पार्क, तानाजी नगर, चिंचवड, पुणे ३३. मो.  ९८८१६१५३२९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-११ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-११ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हम्पी को कभी ‘मंदिरों का नगर’ (City of Temple) कहा जाता था, आज इसे ‘खंडहरों का शहर’ (City of Ruins) कहा जाता है। इसे 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Sites) घोषित किया गया था। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची  में शामिल इस स्थान को देखकर इसके अतीत के वैभव का अंदाजा लगाया जा सकता है।

भूगोल और इतिहास के गली-कूचों से होते हुए हम अब हम्पी की उस जगह पहुँच रहे हैं, जहाँ कभी रोमन साम्राज्य को टक्कर देते विजयनगर साम्राज्य की राजधानी के खंडहर एक लाख से अधिक मनुष्यों की चीत्कार के गवाह बने उस दुर्दांत कहानी को कहते खड़े हैं, जो क़हर इन पर 1565 में जनवरी से मई  तक आततायियों ने यहाँ बरपाया था। एडवर्ड गिब्बन ने  “राइज़ एंड फ़ाल ऑफ़ रोमन एम्पायर” लिखकर उसे इतिहास में अमर कर दिया। पता नहीं भारतीय इतिहासकार “राइज़ एंड फ़ाल ऑफ़ विजयनगरम” क्यों नहीं लिखते। जो राष्ट्र अपना इतिहास भुला देते हैं या झुठलाते हैं, वो उसे दोहराने को अभिशप्त होते हैं।

एक इतालवी व्यापारी और यात्री निकोलो डी कोंटी ने हम्पी का दौरा किया था। उन्होंने अपने संस्मरणों में शहर की अनुमानित परिधि 97 किमी बताई थी, और लिखा था कि नगर ने कृषि और बस्तियों को अपने किलेबंदी में घेरे में लिया था। 1442 में, फारस से आए अब्दुल रज्जाक ने इसे किलों की सात परतों वाला एक शहर बताया, जिसमें बाहरी चार परतें कृषि, शिल्प और निवास के लिए थीं, भीतरी तीसरी से सातवीं परतें दुकानों और बाज़ारों से बहुत भरी हुई थीं।

1520 में, एक पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस ने व्यापार दल के साथ विजयनगर का दौरा किया। उन्होंने अपना संस्मरण ‘क्रोनिका डॉस रीस डी बिसनागा’ के रूप में लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि विजयनगर “रोम जितना बड़ा, और देखने में बहुत सुंदर … दुनिया में सबसे अच्छा दिखने वाला शहर है। पेस के अनुसार, “इसके भीतर कई उपवन हैं, घरों के बगीचों में, पानी की कई नदियाँ हैं जो इसके बीच में बहती हैं, और कुछ स्थानों पर झीलें हैं…”।

1565 में विजयनगर साम्राज्य की हार और पतन के कुछ दशकों बाद, एक इतालवी व्यापारी और यात्री, सेसारे फेडेरिसी ने दौरा किया। सिनोपोली, जोहान्सन और मॉरिसन के अनुसार, फेडेरिसी ने इसे एक बहुत ही अलग शहर के रूप में वर्णित किया। उन्होंने लिखा, “बेज़ेनेगर (हम्पी-विजयनगर) शहर पूरी तरह से नष्ट नहीं हुआ है, घर अभी भी खड़े हैं, लेकिन खाली हैं, और जैसा कि बताया गया है, उनमें टाइग्रेस और अन्य जंगली जानवरों के अलावा कुछ भी नहीं है”।

इतिहासकार विल ड्यूरैंट ने अपनी ‘आवर ओरिएंटल हेरिटेज: द स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन’ में विजयनगर की कहानी का वर्णन किया है और इसकी विजय और विनाश को एक हतोत्साहित करने वाली कहानी कहा है। वह लिखते हैं, “इसकी स्पष्ट नैतिकता यह है कि सभ्यता एक अनिश्चित चीज़ है, जिसकी स्वतंत्रता, संस्कृति और शांति का नाजुक परिसर” किसी भी समय युद्ध और क्रूर हिंसा द्वारा उखाड़ फेंका जा सकता है।

हम्पी खंडहर ग्रेनाइट के पत्थरों से पटे पहाड़ी इलाके में स्थित है। यह पत्थरों के पहाड़ों की गोद में सांस लेता खंडहर है। दिन में तो यहाँ पर्यटकों की भीड़ से खुशनुमा वातावरण दिखता है। लेकिन रात होते ही एक भयावह सन्नाटा पसर जाता है। यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल में शामिल हम्पी विजयनगर खंडहरों का एक उपसमूह भर है। लगभग सभी स्मारक विजयनगर शासन के दौरान 1336 और 1565 ई. की कालावधि में बनाए गए थे। इस साइट पर लगभग 1,600 स्मारक हैं। यह 41.5 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। एक ऑटो आपको बीस रुपयों में बिठाकर तीन-चार किलोमीटर की सैर कराता है। आप बोलते खंडहरों के अवशेष देख सकते हैं।

हम्पी का अर्थ है, कूबड़ जैसा। तुंगभद्रा नदी के घेरे में यह उठा हुआ भाग नंदी के कूबड़ जैसा दिखता है। जिस पर विरूपाक्ष और पम्पा देवी आसीन हैं। हम्पी नाम तुंगभद्रा नदी के प्राचीन नाम पम्पा से विकसित हुआ है। सृष्टि के देवता ब्रह्मा के ‘मन से जन्मी’ बेटी पम्पा विनाश के देवता शिव की एक समर्पित उपासक थी। उसके द्वारा की गई तपस्या से प्रभावित होकर भगवान शिव ने उसे वरदान दिया। उसने शिव से विवाह करने का विकल्प चुन उन्हें ही माँग लिया।

दक्षिण भारत में प्रचलित मंदिर निर्माण की अनेक शैलियाँ इस साम्राज्य ने समेकित  कर विजयनगरीय स्थापत्य कला को एक नया स्वरूप प्रदान किया था।  दक्षिण भारत के विभिन्न सम्प्रदाय तथा भाषाओं के घुलने-मिलने के कारण इस नई प्रकार की मंदिर निर्माण की वास्तुकला को प्रेरणा मिली। स्थानीय कणाश्म पत्थर का प्रयोग करके पहले दक्कन तथा उसके पश्चात् द्रविड़ स्थापत्य शैली में मंदिरों का निर्माण हुआ।

हम्पी पूरी तरह से पकी हुई ईंटों से बना है, और उसमें स्थानीय ग्रेनाइट के साथ चूना मोर्टार भी लगाया गया है। यह माना जाता है कि हम्पी की वास्तुकला इंडो इस्लामिक वास्तुकला से प्रेरित है।  हम्पी की वास्तुकला की कई विशेषताएँ थीं, जो इसे अन्य प्राचीन शहरों से अलग करती थीं। हम्पी हजारों साल पुराना एक प्राचीन और अच्छी तरह से किलाबंद शहर था। भारत में हम्पी के खंडहर दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। हम्पी में कहीं-कहीं वास्तुकला या दीवारों में न तो मोर्टार और न ही सीमेंटिंग एजेंट पाए गए। उनका उद्देश्य उन्हें इंटरलॉकिंग के माध्यम से एक साथ जोड़ना था।

हम्पी में, कमल और अन्य  वनस्पतियों सहित मूर्तियों और रूपांकनों के साथ विस्तृत बाग और विभिन्न आनंद उद्यान बनाए। शाही परिसर की इमारतों में बहुत भव्य मेहराब, विशाल स्तंभों वाले हॉल और मूर्तियों को रखने के लिए गुंबद थे। यह एक सुंदर और समृद्ध शहर था जिसमें कई मंदिर, खेत और बाजार थे जो पुर्तगाल और फारस के व्यापारियों को आकर्षित करते थे। जो लोग यह कहते नहीं थकते कि भारत में नगरीय सभ्यता का विकास मुगलों/अंग्रेजों के आने के बाद हुआ था, वे  बादशाह अकबर के जन्म के दो सौ पहले आबाद इस करिश्मा को क्या नाम देंगे, जिसका नाम ही विजयनगर था।

अपने खंडहरों में भी हम्पी आकर्षक और सुंदर है। हम्पी का भूभाग उसके खंडहरों की तरह ही रहस्यमय है – यह अलग-अलग आकार के पत्थरों से घिरा हुआ है, जिन पर चढ़कर आप पूरे शहर और उसके आस-पास के इलाकों को देख सकते हैं। मंदिरों और बाज़ारों के साथ शहर का निर्माण जिस तरह पत्थरों से किया गया था, वह आश्चर्यजनक है।

क्रमशः… 

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Travelogue ☆ New Zealand: Where the Tasman Meets the Pacific: A Journey to Cape Reinga: # 11 ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆

Shri Jagat Singh Bisht

 

☆ Travelogue Where the Tasman Meets the Pacific: A Journey to Cape Reinga: # 11 ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆

The Northland unfolded before us like a vast emerald carpet, a tapestry woven from endless grasslands dotted with grazing sheep and cattle. Our journey began at dawn, the car a nimble steed traversing this seemingly endless golf course of a landscape.

Whangarei beckoned with the promise of a hearty vegan breakfast, a welcome respite before embarking on our historical immersion at the Waitangi Treaty Grounds. Our knowledgeable guide, a young woman with a captivating narrative, wove a tale of the treaty’s significance, leading us through poignant museums and culminating at the awe-inspiring sight of the world’s largest ceremonial waka.

Paihia, our coastal haven for the next two nights, exuded a timeless charm. The resort, perched on the edge of the Bay of Islands, offered breathtaking views and whispered tales of Charles Darwin’s own sojourn during his Beagle voyage.

The allure of Cape Reinga, the northernmost tip of the North Island, proved irresistible. The journey was a solitary one, the landscape gradually transforming into a more rugged terrain. As we neared our destination, where the Tasman Sea and the Pacific Ocean converge, a fierce downpour descended. Undeterred, we pressed on, reaching the lighthouse amidst the tempest. The treacherous weather conditions forced us to forgo the nearby sand dunes, the risk of getting bogged down in the sand too great.

Retracing our steps towards Paihia, we indulged in scenic detours, stopping at the captivating 90 Mile Beach and numerous pristine stretches of sand. The Green’s Indian Restaurant, a familiar haven, awaited us in Paihia, its aromatic curries a comforting end to the day.

The following morning, a half-day cruise beckoned, taking us on a captivating voyage through the Bay of Islands. We sailed past Russell, Keri Keri, and the enchanting islands of Urupukapuka and Motuarohia, each offering unique vistas and captivating stories. The “Hole in the Rock,” a natural marvel, remained etched in our memory, as unforgettable as the island’s breathtaking beauty. The cruise was further enlivened by the wit and humor of our Kiwi captain, who compensated for the elusive dolphins with his captivating commentary.

Our return journey included a stop at the Kauri Reserves, where we marveled at the ancient and majestic Kauri trees. As dusk settled, we finally arrived back in Auckland, our spirits still soaring from the Northland adventure. A late-night feast of chole-bhature at Chatori Gali provided a fitting finale to this unforgettable journey through the heart of New Zealand.

© Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Founder:  LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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English Literature – Travelogue ☆ New Zealand: A Spirit Unbroken: # 10 ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆

Shri Jagat Singh Bisht

☆ Travelogue – New Zealand: A Spirit Unbroken: # 10 ☆ Mr. Jagat Singh Bisht ☆

In the heart of New Zealand’s verdant wilderness, where ancient trees stood as silent witnesses to the passage of time, we found ourselves meandering along a narrow trail in a serene reserve. The air was cool, rich with the fragrance of damp earth and blooming ferns. It was here that we met her—a lady of serene countenance, her silver hair gleaming like spun moonlight, and a smile that carried the warmth of a hundred summers.

“Are you visiting New Zealand?” she inquired, her tone bright and lilting.

“Yes,” we replied, pausing to reciprocate her kindness.

“And where are you from?”

When we told her we hailed from India, her eyes lit up with a spark of recognition. “Ah, India! I thought as much. I spent my childhood there, you know. It is a land that stays with you—its colours, its chaos, its soul.”

Her voice carried a peculiar blend of nostalgia and reverence, as though she spoke not merely of a place, but of an intimate companion. She must have been in her seventies, yet her vibrancy belied her years. It was then that her story began to unfurl, a tale that seemed plucked from the realm of miracles and destiny.

She was born in a small country in Western Europe, she explained, but her father’s profession had brought their family to India during the twilight of colonial rule. Her childhood in India had been a mosaic of vivid memories—the monsoon rains drumming against the tiled roofs, the scent of jasmine in the evening air, the call of distant temple bells. But as adulthood beckoned, her family returned to Europe, leaving behind the land that had cradled her earliest dreams.

Years passed, life took its turns, and she found herself yearning to revisit the land of her childhood. So one monsoon season, she arrived in Bombay, now Mumbai. The city was drenched in a torrential downpour, the streets awash with rainwater. As she navigated the chaos, she caught sight of something caught in the eddies of a small stream by the roadside. Her heart lurched—a tiny bundle, motionless and soaked.

Without hesitation, she waded into the water and retrieved the bundle. It was a newborn baby, abandoned and barely alive. As she cradled the child, a strange sensation rippled through her body—a warmth in her chest, an ache both physical and spiritual. She hurried to her lodging, where to her astonishment, she discovered she could breastfeed the infant. Though she had never borne children of her own, her body responded as though it had awaited this moment all its life.

The path that followed was arduous. She navigated a labyrinth of legalities to adopt the child, a process that demanded every ounce of her resolve and a significant sum of money. But she prevailed, returning to her homeland with the baby girl she now called her daughter.

Years later, compelled by an inexplicable pull, she returned to India once more. This time, her journey took her to an orphanage. As fate would have it, she arrived just as someone left a newborn in a cradle at the orphanage’s gate. Drawn to the tiny, wailing figure, she picked up the child—and again, the sensation returned. The mysterious flow of milk, the unbidden maternal bond.

“I couldn’t turn away,” she told us, her eyes shimmering with the memory. “It was as if the universe whispered, ‘They are yours.’” She adopted the second baby too, overcoming the same hurdles with unrelenting determination.

Life, however, was not without its trials. Her husband, unable to comprehend the depth of her choices, left her for another. Yet she pressed on, a woman unyielding, carrying her daughters to a distant Pacific island. There, she built a life from the ground up, working tirelessly to provide them with education and opportunities.

Today, her daughters thrived—women of strength and compassion, with families of their own. “My girls,” she said with a radiant smile, “are my greatest triumph.”

As she recounted her journey, we stood in awe of the woman before us—a tapestry of grit and grace, of wounds and wonders. Her story was not merely of survival, but of a spirit that embraced the extraordinary, transforming it into purpose.

“Do you ever wonder why it all happened?” we asked softly.

She paused, gazing into the emerald expanse of the forest. “Oh, I stopped questioning long ago. Some things are not for us to understand, only to live. Perhaps I was meant to be their mother. Perhaps they were meant to save me as much as I saved them.”

And with that, she bid us farewell, her steps light, her heart indomitable. As she disappeared into the dappled shade of the trees, we were left with a profound sense of awe—of destiny’s strange, wondrous design, and the boundless resilience of the human spirit.

#newzealand #india #mother

© Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Founder:  LifeSkills

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≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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