(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आकार को साकार करें”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 123 ☆
☆ आकार को साकार करें ☆
आभाषी सम्बन्धों की गर्मी समय के साथ बदलती जाती है। वैसे भी जब तक एक विचार धारा के लोग न हों उनमें दोस्ती संभव नहीं। जिस तरह कार्यों के संपादन हेतु टीम बनाई जाती है उसी तरह कैसे लोगों का सानिध्य चाहिए ये भी निर्धारित होता है। कार्य निकल जाने के बाद नए लोग ढूंढे जाते हैं। जीवन अनमोल है इसे व्यर्थ करने से अच्छा है कि समय- समय पर अपनी उपलब्धियों का आँकलन करते हुए पहले से बेहतर बनें और जोड़ने- तोड़ने से न घबराएँ। इन सब बातों से बेखबर सुस्त लाल जी एक ही ढर्रे पर जिए चले जा रहे थे। मजे की बात सबको तो डाँट- फटकार पड़ती पर उनका कोई बाल बांका भी नहीं कर पाता था क्योंकि जो कुछ करेगा गलती तो उससे होगी।
भाषा विकास के नाम पर कुछ भी करो बस करते रहो, सम्मान समारोह तो इस इंतजार में बैठे हैं कि कब सबको सम्मानित करें। कोई अपना नाम सम्मान से जोड़कर अखबार की शोभा बढ़ा रहा है तो कोई सोशल मीडिया पर रील वीडियो बनाकर प्रचार- प्रसार में लगा है। सबके उद्देश्य यदि सार्थक होंगे तो परिणाम अवश्य ही आशानुरूप मिलेंगे। सोचिए जब एक चित्र कितना कुछ बयान करता है तो जब दस चित्रों को जोड़कर रील बनेंगी तो मानस पटल कितना प्रभाव छोड़ेगी। इस के साथ वेद मंत्रों के उच्चारण का संदेश, बस सुनकर रोम- रोम पुलकित हो उठता है। हैशटैग करते हुए पोस्ट करना अच्छी बात है किंतु अनावश्यक रूप से अपने परिचितों की फेसबुक वाल पर घुसपैठ करना सही नहीं होता। हम अच्छा लिखें और अच्छा पढ़ें इन सब बातों के साथ- साथ जब कुछ नया सीखते चलेंगे तो मुंगेरीलाल के हसीन सपने अवश्य साकार होंगे। शब्द जीवंत होकर जब भावनाओं को आकार देते हैं तो एक सिरे से दूसरे सिरे अपने आप जुड़ते चले जाते हैं। सात समुंदर पार रहने वाले कैसे शब्दों के बल पर खिंचे चले आते हैं ये तो उनके चेहरों की मुस्कुराहट बता सकती है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – पड़ोसी के कुत्ते।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 178 ☆
व्यंग्य – पड़ोसी के कुत्ते
मेरे पड़ोसी को कुत्ते पालने का बड़ा शौक है. उसने अपने फार्म हाउस में तरह तरह के कुत्ते पाल रखे हैं. कुछ पामेरियन हैं, कुछ उंचे पूरे हांटर हैं कुछ दुमकटे डाबरमैन है, तो कुछ जंगली शिकारी खुंखार कुत्ते हैं.पामेरियन केवल भौंकने का काम करते हैं, वे पड़ोसी के पूरे घर में सरे आम घूमते रहते हैं. पड़ोसी उन्हें पुचकारता, दुलारता रहता है. ये पामेरियन अपने आस पास के लोगो पर जोर शोर से भौकने का काम करते रहते हैं, और अपने मास्टर माइंड से साथी खुंखार कुत्तो को आस पास के घरो में भेज कर कुत्तापन फैलाने के प्लान बनाते हैं.
पड़ोसी के कुछ कुत्ते बहुत खूंखार किस्म के हैं, उन्हें अपने कुत्ते धर्म पर बड़ा गर्व है, वे समझते हैं कि इस दुनिया में सबको बस कुत्ता ही होना चाहिये. वे बाकी सबको काट खाना जाना चाहते हैं.और इसे कुत्तेपन का धार्मिक काम मानते हैं. ये कुत्ते योजना बनाकर जगह जगह बेवजह हमले करते हैं.इस हद तक कि कभी कभी स्वयं अपनी जान भी गंवा बैठते हैं. वे बच्चो तक को काटने से भी नही हिचकते. औरतो पर भी ये बेधड़क जानलेवा हमले करते हैं. वे पड़ोसी के फार्म हाउस से निकलकर आस पास के घरो में चोरी छिपे घुस जाते हैं और निर्दोष पड़ोसियो को केवल इसलिये काट खाते हैं क्योकि वे उनकी प्रजाति के नहीं हैं. मेरा पड़ोसी इन कुत्तो की परवरिश पर बहुत सारा खर्च करता है, वह इन्हें पालने के लिये उधार लेने तक से नही हिचकिचाता. घरवालो के रहन सहन में कटौती करके भी वह इन खुंखार कुत्तो के दांत और नाखून पैने करता रहता है. पर पड़ोसी ने इन कुत्तो के लिये कभी जंजीर नही खरीदी. ये कुत्ते खुले आम भौकने काटने निर्दोष लोगो को दौड़ाने के लिये उसने स्वतंत्र छोड़ रखे हैं. पड़ोसी के चौकीदार उसके इन खुंखार कुत्तो की विभिन्न टोलियो के लिये तमाम इंतजाम में लगे रहते हैं, उनके रहने खाने सुरक्षा के इंतजाम और इन कुत्तो को दूसरो से बचाने के इंतजाम भी ये चौकीदार ही करते हैं. इन कुत्तो के असाधारण खर्च जुटाने के लिये पड़ोसी हर नैतिक अनैतिक तरीके से धन कमाने से बाज नही आता.इसके लिये पड़ोसी अफीम ड्रग्स की खेती तक करने लगा है. जब भी ये कुत्ते लोगों पर चोरी छिपे खतरनाक हमले करते हैं तो पड़ोसी चिल्ला चिल्लाकर सारे शहर में उनका बचाव करता घूमता है. पर सभ्यता का अपना बनावटी चोला बनाये रखने के लिए वह सभाओ में यहां तक कह डालता है कि ये कुत्ते तो उसके हैं ही नहीं. पड़ोसी कहता है कि वह खूंखार कुत्ते पालता ही नहीं है. लेकिन सारा शहर जानता है कि ये कुत्ते रहते पड़ोसी के ही फार्म हाउस में ही हैं. ये कुत्ते दूसरे देशो के देशी कुत्तो को अपने गुटो में शामिल करने के लिये उन्हें कुत्तेपन का हवाला देकर बरगलाते रहते हैं.
जब कभी शहर में कही भले लोगो का कोई जमावड़ा होता है, पार्टी होती है तो पड़ोसी के तरह तरह के कुत्तो की चर्चा होती है. लोग इन कुत्तो पर प्रतिबंध लगाने की बातें करते हैं. लोगो के समूह, अलग अलग क्लब मेरे पड़ोसी को समझाने के हरसंभव यत्न कर चुके हैं, पर पड़ोसी है कि मानता ही नहीं. इन कुत्तो से अपने और सबके बचाव के लिये शहर के हर घर को ढ़ेर सी व्यवस्था और ढ़ेर सा खर्च व्यर्थ ही करना पड़ रहा है. घरो की सीमाओ पर कंटीले तार लगवाने पड़ रहे हैं, कुत्तो की सांकेतिक भाषा समझने के लिये इंटरसेप्टर लगवाने पड़े हैं. अपने खुफिया तंत्र को बढ़ाना पड़ा है, जिससे कुत्तो के हमलो के प्लान पहले ही पता किये जा सकें. और यदि ये कुत्ते हमला कर ही दें तो बचाव के उपायो की माक ड्रिल तक हर घर में लोग करने पर विवश हैं. इस सब पर इतने खर्च हो रहे हैं कि लोगो के बजट बिगड़ रहे हैं. हर कोई सहमा हुआ है जाने कब किस जगह किस स्कूल, किस कालेज, किस मंदिर, किस गिरजाघर, किस बाजार , किस हवाईअड्डे, किस रेल्वेस्टेशन, किस मॉल में ये कुत्ते जाने किस तरह से हमला कर दें ! कोई नही जानता. क्योकि सारी सभ्यता, जीवन बीमा की सारी योजनायें एक मात्र सिद्धांत पर टिकी हुई हैं कि हर कोई जीना चाहता है. कोई मरना नही चाहता इस मूल मानवीय मंत्र को ही इन कुत्तों ने किनारे कर दिया है. इनका इतना ब्रेन वाश किया गया है कि अपने कुत्तेपन के लिये ये खुद मरने को तैयार रहते हैं. इस पराकाष्ठा से निजात कैसे पाई जावे यह सोचने में सारे बुद्धिजीवी लगे हुये हैं. कुत्ते की दुम टेढ़ी ही रहती है, उसे सीधा करने के सारे यत्न फिर फिर असफल ही होते आए हैं.खुद पड़ोसी कुत्तो के सामने मजबूर है, वह उन्हें जंजीर नही पहना पा रहा. अब शहर के लोगो को ही सामूहिक तरीके से कुत्ते पकड़ने वाली वैन लगाकर मानवता के इन दुश्मन कुत्तो को पिंजड़े में बंद करना होगा.
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – बा बा ब्लैक शीप।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 177 ☆
व्यंग्य – बा बा ब्लैक शीप
बचपन में हम भी बाबा हुआ करते थे ! हर वह शख्स जो हमारा नाम नहीं जानता था , हमें प्यार से बाबा कह कर पुकारता था . इस बाबा गिरी में हमें लाड़ , प्यार और कभी जभी चाकलेट वगैरह मिल जाया करती थी . “बाबा” शब्द से यह हमारा पहला परिचय था .अपनी इसी उमर में हमने बा बा ब्लैक शीप वाली राइम भी सीखी थी . जब कुछ बड़े हुये तो बालभारती में सुदर्शन की कहानी हार की जीत पढ़ी . बाबा भारती और डाकू खड़गसिंग के बीच हुये संवाद मन में घर कर गये . “बाबा ” का यह परिचय संवेदनशील था . कुछ और बड़े हुये तो लोगों को राह चलते अपरिचित बुजुर्ग को भी ” बाबा ” का सम्बोधन करते सुना . इस वाले बाबा में किंचित असहाय होने और उनके प्रति दया वाला भाव दिखा . कुछ दूसरे तरह के बाबाओ में कोई हरे कपड़ो में मयूर पंखो से लोभान के धुंयें में भूत , प्रेत , साये भगाता मिला तो कोई काले कपड़ो में शनिवार को तेल और काले तिल का दान मांगते मिला .कुछ वास्तविक बाबा आत्म उन्नति के लिये खुद को तपाते हुये भी मिले। कुछ तंत्र मंत्र के ज्ञानी निरभिमानी थे तो कुछ वेश भूषा आचार व्यवहार की मनमानी करते मिले। कष्टो दुखो से घिरे दुनिया वालो को बाबाओ की बड़ी जरूरत है . किसी की संतान नहीं है , किसी की संतान निकम्मी है , किसी को रोजगार की तलाश है , किसी को पत्नी या प्रेमिका पर भरोसा नही है , किसी को लगता है की उसे वह सब नही मिलता जिसके लायक वह है , कोई असाध्य रोग से पीड़ित है तो किसी की असाधारण महत्वाकांक्षा वह साधारण तरीको से पूरी कर लेना चाहता है , वगैरह वगैरह । हर तरह की समस्याओ का एक ही शार्ट कट निदान होता है ” बाबा” . इसलिये प्रायः लोगों को एक बाबा की तलाश होती है ,जो उन्हें विभ्रम की स्तिथि में राह बता सके , थोड़ा ढाड़स बंधा सके ।
एक अच्छे बाबा को किंचित कालिदास की तरह का गुणवान होना चाहिए , अच्छा हो की वह कुछ वाचाल हो , दुनियादारी से थोड़ा बहुत वाकिफ हो ,कुछ जुमले कहावतें उसे कंठस्थ हों , टेक्टफुल हो , थोड़ा बहुत आयुर्वेद और ज्योतिष जानता हो तो बेहतर , चाल चरित्र मे ठीक ठाक हो तो बात ही क्या। ऐसा बंदा सरलता से बाबा के रूप में महिमा मण्डित हो सकता है। बाबा बाजी वाले बाबाओ के रूप में चकाचौंध होती है . बड़े बड़े आश्रम , लकदक गाड़ियों का काफिला भगवा वस्त्रो में चेले चेलियों की शिष्य मंडली बन ही जाती है . ऐसे बनाओ के प्रवचन के पंडाल होते हैं , पंडालो के बाहर बाबा जी के प्रवचनो की डी वी डी , किताबें , देसी दवाईयां विक्रय करने के स्टाल लगाते हैं . टी वी चैनलो पर इन बाबाओ के टाईम स्लाट होते हैं . इन बाबाओ को दान देने के लिये बैंको के एकाउंट नम्बर होते हैं .कोई बाबा हवा से सोने की चेन और घड़ी निकाल कर भक्तो में बांटने के कारण चर्चित रहे तो कोई जमीन में हफ्ते दो हफ्ते की समाधि लेने के कारण , कोई योग गुरु होने के कारण तो कोई आयुर्वेदाचार्य होने के कारण सुर्खियो में रहते हैं . बड़े बड़े मंत्री संत्री , अधिकारी , व्यापारी इन बाबाओ के चक्कर लगाते हैं . ” ही ” बाबा और “शी” बाबा के अपने अपने छोटे बड़े ग्रुप सुर्खियों में रहे हैं . बाबाओ के रहन सहन आचार विचार के गहन अध्ययन के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि किसी को बाबा बनाने के लिये प्रारंभिक रूप से कुछ सकारात्मक अफवाह फैलानी होती है . आम आदमी की भीड़ चमत्कार को नमस्कार करते आई है . कुछ महिमा मण्डन , झूठा सच्चा गुणगान करके दो चार विदेशी भक्त या समाज के प्रभावशाली वर्ग से कुछ भक्त जुटाने पड़ते हैं . एक बार भक्त मण्डली जुटनी शुरु हुई तो फिर क्या है ,कुछ के काम तो गुरु भाई होने के कारण ही आपस में निपट जायेंगे , जिनके काम न हो पा रहे होंगे बाबा जी के रिफरेंस से मोबाईल करके निपटवा देंगे .
हमारे दीक्षित बाबा जी को हम स्पष्ट रूप से समझा देंगे कि उन्हें सदैव शाश्वत सत्य ही बोलना है ,कम से कम बोलना है . गीता के कुछ श्लोक ,और रामचरित मानस की कुछ चौपाईयां परिस्थिति के अनुरूप बोलनी है . जब संकट का समय निकल जायेगा और व्यक्ति की समस्या का अच्छा या बुरा समाधान हो जावेगा तो बोले गये वाक्यो के गूढ़ अर्थ लोग अपने आप निकाल लेंगे . बाबाओ के पास लोग इसीलिये जाते हैं क्योकि वे दोराहे पर खड़े होते हैं और स्वयं समझ नहीं पाते कि कहां जायें , वे नहीं जानते कि उनका ऊंट किस करवट बैठेगा , यह तो कोई बाबा जी भी नही जानते कि कौन सा ऊंट किस करवट बैठेगा , पर बाबा जी , ऊंट के बैठते तक भक्त को दिलासा और ढ़ाड़स बंधाने के काम आते हैं . यदि ऊंट मन माफिक बैठ गया तो बाबा जी की जय जय होती है , और यदि विपरीत दिशा में बैठ गया तो पूर्वजन्मो के कर्मो का परिणाम माना जाता है , जिसे बताना होता है कि बाबा जी ने बड़े संकट को सहन करने योग्य बना दिया , इसलिये फिर भी बाबा जी की जय जय . बाबा कर्म में हर हाल में हार की जीत ही होती है भले ही भक्त को बाबा जी का ठुल्लू ही क्यो न मिले . बाबा जी पर भक्त सर्वस्व लुटाने को तैयार मिलते हैं भले ही बाबा ब्लैकशीप ही क्यो न हों .
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक मज़ेदार व्यंग्य ‘मोटी किताब लिखने के फायदे ’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 165 ☆
☆ व्यंग्य – मोटी किताब लिखने के फायदे ☆
लेखकों-कवियों के ये दुर्दिन हैं। किताबें लिखी खूब जा रही हैं, छप भी रही हैं, लेकिन पढ़ने वाला कोई नहीं है। दूर-दूर तक बस धूल उड़ती दिखती है। कहाँ गया रे पाठक? कवि आँख मूँदे पुकार रहा है— ‘आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं’, लेकिन मीत यानी पाठक ‘डोडो’ पक्षी की तरह अंतर्ध्यान हो गया है।
वैसे लेखक और कवि अभी पूरी तरह मायूस नहीं हुए हैं। जेब से पैसे लगाकर अपनी किताबें छपवा रहे हैं और प्रकाशकों की जेब गर्म कर रहे हैं। कोई कन्या के दहेज के लिए रखे पैसे निकाल रहा है तो कोई बीमारी-विपदा के लिए रखे पैसे बढ़ा रहा है। कुछ ऐसे समर्पित लेखक हैं जो पत्नी के ज़ेवर बेचकर अमर होने का इंतज़ाम कर रहे हैं। लेकिन इन पुस्तकों को पढ़ने वाला कहाँ है? यानी पकवान तो बन रहे हैं लेकिन उनका स्वाद लेने वाला ग़ायब है। अब लेखक ही लिखे और लेखक ही पढ़े।
ज़्यादातर प्रकाशक भी पाठकों के बूते किताबें नहीं छापते। उनकी नज़र या तो थोक ख़रीद पर रहती है या पुरस्कारों पर। प्रकाशक सही कमीशन देने को तैयार हो तो कितनी भी मँहगी किताब कितनी भी संख्या में बिक जाएगी। साहब से लेकर मुसाहब तक सब का हिस्सा देने के बाद किताबें विभागों को ढकेल दी जाएंगीं जहाँ उन्हें शेल्फों में ठूँस कर अंतिम प्रणाम कर लिया जाएगा। पाठक को छोड़कर लेखक, प्रकाशक, अफसर, बाबू सब खुश क्योंकि सबको ज्ञान का प्रसाद मिल जाता है। यानी किताब की स्थिति यह होती है कि ‘आये भी वो,गये भी वो, ख़त्म फ़साना हो गया’। इसीलिए आजकल उन लेखकों की किताबें आसानी से छपती हैं जो ऊँचे ओहदे पर या ताकतवर हैं और किताबें बिकवाने की कूवत रखते हैं।
बहुत से लेखकों को सामान्य पाठक पसन्द नहीं आते। वजह यह है कि बहुत से पाठक कुछ नासमझ यानी खरी खरी बात करने वाले होते हैं। लेखक की रचना पढ़कर बेबाक आलोचना कर देते हैं जो लेखक के दिल पर चोट करती है। ये नादान पाठक यह नहीं समझते कि लेखक बेहद संवेदनशील होता है, आलोचना उसे बर्दाश्त नहीं होती। ‘फुलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट।’ ऐसे लेखक सामान्य पाठक को अपनी रचना के पास नहीं फटकने देते। दस बारह यारों को घर पर बुला लेते हैं और उच्च कोटि की जलपान व्यवस्था के बाद रचना पर अपनी बहुमूल्य राय प्रस्तुत करने का अनुरोध करते हैं। मित्रों को अपनी भूमिका मालूम होती है, अतः वे रचना का अंश कान में पड़ते ही सिर धुनना शुरू कर देते हैं। फिर वे गदगद स्वर में कहते हैं कि ऐसी महान रचना सुनकर वे स्तब्ध हैं और ऐसी रचना न पहले लिखी गयी, न भविष्य में लिखी जा सकती है।वे रुँधे कंठ से यह भी कहते हैं उन्हें पता नहीं था कि उनके बीच ऐसा गुदड़ी का लाल छिपा है। प्रशंसा से मगन लेखक अनुपस्थित आम पाठक को अँगूठा दिखा कर लंबी तान कर सो जाता है।
ताज्जुब है कि ऐसे शत्रु-समय में भी कुछ लेखक पूर्ण निष्ठा और मनोयोग से मोटी मोटी किताबें लिख कर साहित्य के प्रांगण में पटक रहे हैं। पृष्ठ संख्या पाँच सौ से हज़ार तक, कीमत पाँच सौ से छः सौ तक। हर साल ऐसे महाग्रंथ धरती पर उतर कर उस में कंपन उत्पन्न कर रहे हैं। ये कौन अटूट आशावादी लेखक हैं जो ज़माने की तरफ पीठ करके पोथे रचने में लगे हैं? उन्हें कौन पढ़ेगा? कौन खरीदेगा? लेखक से पूछिए तो उनका भोला सा उत्तर होगा कि विश्व के ज़्यादातर क्लासिक वज़नदार रहे हैं और जहाँ तक कीमत का सवाल है, महान साहित्य के लिए पाठकों को त्याग करना ही पड़ेगा।
ऐसी वज़नदार किताबें आते ही धड़ाधड़ उनकी समीक्षाएँ और लेखक के इंटरव्यू आना शुरू हो जाते हैं। इन समीक्षाओं और साक्षात्कारों को लिखने के लिए अनेक रिटायर्ड लेखक धूल झाड़ कर पुनः प्रकट हुए हैं और अनेक नये समीक्षकों का जन्म हुआ है। सभी समीक्षाओं से एक बात स्पष्ट होती है कि साहित्य में नयी ज़मीन टूट चुकी है और पवित्र जल फूटने को ही है।
इन पोथों का विमोचन भी कम दिलचस्प नहीं होता। हिन्दी के एक लेखक अपनी पुस्तकों के प्रकाशन की धीमी गति से ऐसे अधीर हुए कि उन्होंने अपना प्रकाशन गृह खोल डाला और अपना एक भारी-भरकम उपन्यास छाप दिया। उपन्यास के लिए वित्त कहांँ से आया होगा यह सोचकर ही रूह काँपती है क्योंकि लेखक लक्ष्मी जी के लाड़ले नहीं थे।
पुस्तक के विमोचन हेतु एक मशहूर बुज़ुर्ग लेखक आमंत्रित हुए। बुज़ुर्ग लेखक ने अपने भाषण में जो कहा वह आँख खोलने वाला था। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह पुस्तक तो नहीं पढ़ी थी, लेकिन लेखक की अन्य रचनाएं पढ़ी थीं जिनके आधार पर वह कह सकते थे कि—। यह बुज़ुर्ग लेखक की ईमानदारी थी कि उन्होंने स्वीकार कर लिया उन्होंने किताब पढ़ी नहीं थी, अन्यथा ऐसे वक्ता भी होते हैं जो पुस्तक को बिना पढ़े उस पर एक घंटा बोलने का माद्दा रखते हैं।
मोटी किताबों के प्रकाशन का गणित साफ है। यदि पाठक को खारिज कर दिया जाए तो मोटी और मँहगी किताबें लेखक, प्रकाशक और अफसरों-बाबुओं के लिए दुबली और सस्ती किताबों के मुकाबले ज़्यादा फायदेमन्द होती हैं। पच्चीस पचास किताबों की खरीद में ही वारे-न्यारे हो जाते हैं।
मोटी पुस्तकें पुरस्कार की दृष्टि से भी अच्छी होती हैं क्योंकि पुरस्कारों के सूत्र जिनके हाथों में होते हैं वे पुस्तकों को बाहर से ही देखते हैं। मोटी किताब रोब पैदा करती है और लेखक के दावे को पुख़्ता करती है। बाकी काम जुगाड़ से होता है जिसके लिए पुस्तक की उपस्थिति ही काफी होती है। पढ़कर विद्वान लेखक के प्रति अविश्वास कौन जताये? विश्वविद्यालयों में भी पीएच.डी. के लिए मोटा पोथा ज़रूरी माना जाता है।
वैसे पढ़ने की बात छोड़ दें तो मोटी पुस्तकों के बहुत से दीगर उपयोग हैं। घर में तकिया न हो तो मोटी किताब ख़ासा सुकून दे सकती है। आम लेखक अहिंसक होता है, घर में असलाह नहीं रखता, इसलिए घर में चोर-लुटेरा घुस आए तो पुस्तक फेंककर उसका जबड़ा तोड़ा जा सकता है। लेकिन इसके लिए पुस्तक का हार्ड बाउंड होना ज़रूरी है। पेपरबैक इस लिहाज से बेकार है।
चलते चलते आम लेखक के लिए यह नसीहत ज़रूरी है कि मोटी पुस्तक अपने खर्चे से न छपवाये वर्ना वह अपना जबड़ा भी तोड़ सकती है।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “जमीन से जुड़ाव”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 122 ☆
☆ जमीन से जुड़ाव ☆
प्रचार – प्रसार माध्यमों का उपयोग करते हुए रील / शार्ट वीडियो के माध्यम से अपनी बात कहना बहुत कारगर होता है। बात प्रभावी हो इसके लिए सुगम संगीत की धुन या कोई लोकप्रिय गीत की कुछ पंक्तियों को जोड़कर सबके मन की बात 60 सेकेंड में कह देना एक कला ही तो है। ज्यादा समय कोई देना नहीं चाहता। कम में अधिक की चाहत ने क्रिकेट को ट्वेंटी- ट्वेंटी का फॉर्मेट व सोशल मीडिया में रील को जन्म दिया है। एक बार रील देखना शुरू करो तो पूरा दिन कैसे बीत जाएगा पता ही नहीं चलता।
समय को पूँजी की तरह उपयोग करना चाहिए , जैसे ही इससे सम्बंधित वीडियो देखा तो झट से मन आत्ममंथन करने लगा। अब ऊँची उड़ान भरते हुए दिन भर जो सीखा था उसे झटपट डायरी में लिख डाला और रात्रि 11 बजे एक मोटिवेशनल पेज बनाकर दिन भर की जानकारी को जोड़कर एक सुंदर पोस्टर, पोस्ट कर दिया। अब तो लाइक और कमेंट की चाहत में पूरा दिन चला गया। तब समझ में आया कि अभाषी मित्र झाँसे में आसानी से नहीं आयेंगे। बस दिमाग ने तय किया कि अब तो बूस्ट पोस्ट करना है। कुछ भी हो 10 K से ऊपर लाइक होना चाहिए आखिर इतने वर्षों का तजुर्बा हार तो नहीं सकता था।बस देखते ही देखते प्रभु कृपा हो गयी अब तो उम्मीद से अधिक फालोअर होने लगे थे जिससे सेलिब्रिटी वाली फीलिंग आ रही थी। एक पोस्ट ने क्या से क्या कर दिया था। जहाँ भी निकलो लोग पहचान रहे थे। आभासी मित्रों को भी आभास होने लगा कि समय रहते इनसे दोस्ती बढ़ाई जाए अन्यथा आगे चलकर ये तो तो पहचानेंगे भी नहीं।
ऐसा क्यों होता है कि सारा समय व्यर्थ करने के बाद हम जागते हैं। दरसल किसी भी समय जागें पर जागना जरूर चाहिए। जो लोग कुछ करने के लिए निकल पड़ते हैं उनके साथ काफिला जुड़ता जाता है। यात्राओं का लाभ ये होता है कि इससे जमीनी तथ्यों की जानकारी के साथ ही लोगों से जुड़ाव भी बढ़ता है। जगह – जगह का पानी,भोजन, बोली, वातावरण व पहनावा ये सब अवचेतन मन को प्रभावित करते हैं। व्यक्ति की सोच बदलती है वो धैर्यवान होकर केवल अधिकारों की नहीं कर्तव्यों की बातें भी करने लगता है। उसे समाज से जुड़कर उसका हिस्सा बनने में ज्यादा आनंद आने लगता है। पाने और खोने का डर अब उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। धरती में इतनी ताकत है कि जिसने इसे माँ समझ कर उससे जुड़ने की कोशिश की उसे आकाश से भी अधिक मिलने लगा।
अपने को जमीन से जोड़िए फिर देखिए कैसे खुला आसमान आपके स्वागत में पलकें बिछा देता है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – व्यंग्य – रुपए का डालर में मेकओवर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 176 ☆
व्यंग्य – रुपए का डालर में मेकओवर
मेकओवर का बड़ा महत्व होता है। सोकर उठते ही मुंह धोकर कंघी कर लीजिए कपड़े ठीक कीजीए, डियो स्प्रे कर लीजिए फ्रेश महसूस होने लगता है। महिलाओं के लिए फ्रेशनेस का मेकओवर थोडी लंबी प्रक्रिया होती है, लिपस्टिक, पाउडर, परफ्यूम आवश्यक तत्व हैं। ब्यूटी पार्लर में लड़की का मेकओवर कर उसे दुल्हन बना दिया जाता है। एक से एक भी बिलकुल बदली बदली सी लगने लगती हैं। दुल्हन के स्वागत समारोह के बाद बारी आती है ससुराल में बहू के मेकओवर की। सास, ननदे उसे गृहणी में तब्दील करने में जुट जाती हैं। शनैः शनैः गृहणी से पूरी तरह पत्नी में मेकओवर होते ही, पत्नी पति पर भारी पड़ने लगती है।
हर मेकओवर की एक फीस होती है। ब्यूटी पार्लर वह फीस रुपयों में लेता है। पर कहीं त्याग, समर्पण, अपनेपन, रिश्ते की किश्तों में फीस अदा होती है।
एक राजनैतिक पार्टी से दूसरी में पदार्पण करते नेता जी गले का अंगोछा बदल कर नए राजनैतिक दल का मेक ओवर करते हैं। यहां गरज का सिद्धांत लागू होता है, यदि मेकओवर की जरूरत आने वाले की होती है तो उसे फीस अदा करनी होती है, और अगर ज्यादा आवश्यकता बुलाने वाले की है तो इसके लिए उन्हें मंत्री पद से लेकर अन्य कई तरह से फीस अदा की जाती है। नया मेकओवर होते ही नेता जी के सिद्धांत, व्यापक जन हित में एकदम से बदल जाते हैं। विपक्ष नेता जी के पुराने भाषण सुनाता रह जाता है पर नेता जी वह सब अनसुना कर विकास के पथ पर आगे बढ़ जाते हैं।
स्कूल कालेज कोरे मन के बच्चों का मेकओवर कर, उन्हें सुशिक्षित इंसान बनाने के लिए होते हैं। किंतु हुआ यह कि वे उन्हें बेरोजगार बना कर छोड़ देते, इसलिए शिक्षा में आमूल परिवर्तन किए जा रहे हैं, अब केवल डिग्री नौकरी के मेकओवर के लिए अपर्याप्त है। स्किल, योग्यता और गुणवत्ता से मेकओवर नौकरी के लिए जरूरी हो चुके हैं। अब स्टार्ट अप के मेकओवर से एंजल इन्वेस्टर आप के आइडिये के लिए करोड़ों इन्वेस्ट करने को तैयार हैं।
पिछले दिनों हमारा अमेरिका आना हुआ, टैक्सी से उतरते तक हम जैसे थे, थे। पर एयरपोर्ट में प्रवेश करते हुए अपनी ट्राली धकेलते हम जैसे ही बिजनेस क्लास के गेट की तरफ बढ़े, हमारा मेकओवर अपने आप कुछ प्रभावी हो गया लगा। क्योंकि हमसे टिकिट और पासपोर्ट मांगता वर्दी धारी गेट इंस्पेक्टर एकदम से अंग्रेजी में और बड़े अदब से बात करने लगा।
बोर्डिंग पास इश्यू करते हुए भी हमे थोड़ी अधिक तवज्जो मिली, हमारा चेक इन लगेज तक कुछ अधिक साफस्टीकेटेड तरीके से लगेज बेल्ट पर रखा गया। लाउंज में आराम से खाते पीते एन समय पर हैंड लगेज में एक छोटा सा लैपटाप बैग लेकर जैसे ही हम हवाई जहाज में अपनी फ्लैट बेड सीट की ओर बढ़े सुंदर सी एयर होस्टेस ने अतिरिक्त पोलाइट होकर हमारे कर कमलों से वह हल्का सा बैग भी लेकर ऊपर डेक में रख दिया, हमे दिखा कि इकानामी क्लास में बड़ा सा सूटकेस भी एक पैसेंजर स्वयं ऊपर रखने की कोशिश कर रहा था। बिजनेस क्लास में मेकओवर का ये कमाल देख हमें रुपयों की ताकत समझ आ रही थी।
जब अठारह घंटे के आराम दायक सफर के बाद जान एफ केनेडी एयरपोर्ट पर हम बाहर निकले, तब तक बिजनेस क्लास का यह मेकओवर मिट चुका था, क्योंकि ट्राली लेने के लिए भी हमें अपने एस बी आई कार्ड से छै डालर अदा करने पड़े, रुपए के डालर में मेकओवर की फीस कटी हर डालर पर कोई 9 रुपए मात्र। हमारे मैथ्स में दक्ष दिमाग ने तुरंत भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया लगभग पांच सौ रुपए मात्र ट्राली के उपयोग के लिए। हमें अपने प्यारे हिंदोस्तान के एयर पोर्ट याद आ गए कहीं से भी कोई भी ट्राली उठाओ कहीं भी बेतरतीब छोड़ दो एकदम फ्री। एकबार तो सोचा कितना गरीब देश है ये अमरीका भला कोई ट्राली के उपयोग करने के भी रुपए लेता है ? वह भी इतने सारे, पर जल्दी ही हमने टायलेट जाकर इन विचारों का परित्याग किया और अपने तन मन का क्विक मेकओवर कर लिया। जैकेट पहन सिटी बजाते रेस्ट रूम से निकलते हुए हम अमेरिकन मूड में आ गए। तीखी ठंडी हवा ने हमारे चेहरे को छुआ, मन तक मौसम का खुशनुमा मिजाज दस्तक देने लगा। एयरपोर्ट के बाहर बेटा हमे लेने खड़ा था, हम हाथ हिलाते उसकी तरफ बढ़ गए।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक मज़ेदार व्यंग्य ‘लेखक के पत्र, मित्र के नाम’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 164 ☆
☆ व्यंग्य – लेखक के पत्र, मित्र के नाम ☆
📩 पत्र क्रमांक – 1 📩
प्रिय बंधु,
मेरा पत्र पाकर आपको आश्चर्य होगा। याद दिला दूँ कि हम 2019 में लखनऊ के लेखक सम्मेलन में मिले थे। तब मैंने आपको अपनी सात किताबें भेंट की थीं। आपको जानकर खुशी होगी कि इस साल विविध विधाओं में मेरी 135 पुस्तकें लुगदी प्रकाशन संस्थान,दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। इन्हें देखकर आपको महसूस होगा कि मेरी प्रतिभा कैसे दिन दूनी,रात चौगुनी निखर रही है। कनाडा में निवासरत अंतर्राष्ट्रीय कवयित्री रेणुका देवी ने मेरी किताबों के आवरण पर ही तीन पेज का लेख लिखा है। उन्होंने लिखा है कि कवर इतने सुन्दर हैं कि किताबों को खोलने की इच्छा ही नहीं होती। मैं अपनी 135 किताबें आपके पास भेजना चाहता हूँ ताकि आप और आपके मित्र उन्हें पढ़कर आनन्द प्राप्त करें। आपका उत्तर प्राप्त होते ही पुस्तकें रवाना कर दी जाएँगीं।
आपका
प्रीतम लाल ‘निरंकुश’
📩 उत्तर क्रमांक – 1 📩
भाई साहब,
आपका पत्र प्राप्त हुआ। 135 पुस्तकों के प्रकाशन पर मेरी बधाई लें। आपने ये पुस्तकें भेजने की बात लिखी है। मेरी दिक्कत यह है कि मैं उच्च रक्तचाप का मरीज़ हूँँ और अचानक इतनी किताबों को सँभाल पाना मेरी कूवत से बाहर है। दूसरी बात यह कि मेरे पास लेखक-मित्रों से प्राप्त इतनी किताबें इकट्ठी हो चुकी हैं कि उन्हें रखने के लिए घर में जगह नहीं बची है। मेरी पत्नी अलमारी से बची किताबों को चार बोरों में भरकर स्टोर में रख चुकी है। मुझे डर है कि किसी दिन मेरी अनुपस्थिति में वे कबाड़ी को सौंप दी जाएँगीं। इसलिए आप फिलहाल किताबें भेजने के अपने इरादे को स्थगित रखें। स्थितियाँ अनुकूल होने पर मैं स्वयं आपको सूचित करूँगा।
आपका
सज्जन लाल
📩 पत्र क्रमांक – 2 📩
बंधुवर,
आपका पत्र मिला। आपके स्वास्थ्य का हाल जानकर चिन्ता हुई, लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि ब्लड-प्रेशर होने से किताबों को सँभालने में क्या दिक्कत हो सकती है। आप मेरे घर आएँगे तो देखकर ही आपका ब्लड-प्रेशर बढ़ जाएगा। सब तरफ मेरी किताबें अँटी पड़ी हैं। तिल धरने को जगह नहीं है। अतिथि आते हैं तो उन्हें किताबों के बंडल पर ही बैठाना पड़ता है। आपने किताबों के लिए स्थानाभाव की बात लिखी तो मेरा एक सुझाव है। मैं आपके पास एक अलमारी की कीमत भेज दूँगा। उस अलमारी में सिर्फ मेरी किताबें रखी जाएँ। उसमें किसी अन्य लेखक की घुसपैठ न हो। आपका उत्तर मिलते ही राशि भेज दूँगा।
आपका
प्रीतम लाल ‘निरंकुश’
📩 उत्तर क्रमांक – 2 📩
भाई साहब,
अलमारी के लिए पैसे भेजने के आपके प्रस्ताव के लिए आभारी हूँँ, लेकिन समस्या वह नहीं है। समस्या यह है कि अलमारी रखने के लिए जगह नहीं बची है। अतः एक ही रास्ता है कि ऊपर एक हॉल बनवाकर किताबों की सारी अलमारियाँ वहाँ प्रतिष्ठित कर दी जाएँ। इसमें कम से कम डेढ़ दो लाख का व्यय आएगा। यदि आप इसमें पच्चीस तीस हज़ार का योगदान कर सकें तो आभारी हूँगा। फिर आप अपनी कितनी भी पुस्तकें भेज सकेंगे। अन्य लेखक-मित्रों से भी अनुरोध कर रहा हूँ। मैं वादा करता हूँ कि चार छः साल में व्यवस्था करके सबके पैसे लौटा दूँगा। आप विचार करके यथाशीघ्र सूचित करें।
आपका
सज्जन लाल
📩 पत्र क्रमांक – 3 📩
भाई साहब,
मुझे इल्म नहीं था कि आप मेरे साथ मसखरी करेंगे। मैं भला आपको पच्चीस तीस हजार रुपये क्यों देने लगा? उतने में मैं अपनी दो किताबें और छपवा लूँगा। मैं आपको अपनी 135 किताबें मुफ्त में दे रहा हूँ, और आप मज़ाक कर रहे हैं! सो इट इज़ योर लॉस, नॉट माइन। आपको मेरी किताबों की कद्र नहीं है तो हज़ारों और कद्रदाँ हैं। अब ये किताबें किसी और भाग्यशाली को मिलेंगीं। नमस्कार।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सुधारीकरण की आवश्यकता”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 120 ☆
☆ वैचारिक तरक्की☆
युक्त, अभियुक्त, प्रयुक्त, संयुक्त, उपयुक्त ये सब कहने को तो आम बोलचाल के हिस्से हैं किंतु इनके अर्थ अनेकार्थी होते हैं। कई बार ये हमारे पक्ष में दलील देते हुए हमें कार्य क्षेत्र से मुक्त कर देते हैं तो कई बार कटघरे में खड़ा कर सवाल-जबाब करते हैं।
क्या और कैसे जब प्रश्न वाचक चिन्ह के साथ प्रयुक्त होता है तो बहुत सारे उत्तर अनायास ही मिलने लगते हैं। पारखी नजरें इसका उपयोग कैसे हो इस पर विचार- विमर्श करने लगतीं हैं। त्योहारों व धार्मिक किरदारों के साथ छेड़छाड़ मिथ्या कथानक बना देते हैं। क्रमशः विकास अच्छी बात है किंतु जो ऐतिहासिक धरोहर हैं, इतिहास हैं, हमारे संस्कार से जुड़े तथ्य हैं उनमें मनमानी करना किसी भी हद तक सही नहीं कहा जा सकता।
स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी लिखना व उसके अनुरूप चित्रांकन कर आम जनता को बरगलाना क्या सकारात्मक विचारधारा को तोड़ने जैसा नहीं होगा। सबका सम्मान हो इसके लिए किसी आधारभूत स्तम्भों को तोड़ना- मरोड़ना नहीं चाहिए। सूरज को पश्चिम से निकालना, धूप को शीतल करना, चंद्रमा को कठोर बताना क्या सही होगा। इससे हमारे आगे का भविष्य एक ऐसे दो राहे पर खड़ा मिलेगा जो ये नहीं समझ पायेगा की जो बातें हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं वो सही हैं या जो फिल्में दिखाती हैं वो? वैसे भी धार्मिक आदर्शों को कार्टून द्वारा मनोरंजन के नाम पर बदल कर रख दिया गया है। एक प्रश्न आप सभी से है कि क्या इस तरह के बदलाव हमारे लिए उचित होंगे। वैचारिक तरक्की के नाम पर कहीं हम अपना अस्तित्व तो नहीं खो देंगे?
खैर कुछ भी हो अपनी संस्कृति से अवश्य जुड़ें। अच्छा साहित्य पढ़ें और पढ़ाएँ क्योंकि यही आपको उचित- अनुचित का भान कराएगा।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “सुधारीकरण की आवश्यकता”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 119 ☆
☆ सुधारीकरण की आवश्यकता☆
दूसरों को सुधारने की प्रक्रिया में हम इतना खो जाते हैं कि स्वयं का मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में गलत रास्ते पर चल देना आजकल आम बात हो गयी है। पुरानी कहावत है चौबे जी छब्बे बनने चले दुब्बे बन गए। सब कुछ अपने नियंत्रण करने की होड़ में व्यक्ति स्वयं अपने बुने जाल में फस जाता है। दो नाव की सवारी भला किसको रास आयी है। सामान्य व्यक्ति सामान्य रहता ही इसीलिए है क्योंकि वो पूरे जीवन यही तय नहीं कर पाता कि उसे क्या करना है। कभी इस गली कभी उस गली भटकते हुए बस माया मिली न राम में गुम होकर पहचान विहीन रह जाता है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि एक ओर ध्यान केंद्रित करें। सर्वोच्च शिखर पर बैठकर हुकुम चलाने का ख्वाब देखते- देखते कब आराम कुर्सी छिन गयी पता ही नहीं चला। वो तो सारी साजिश तब समझ में आई कि ये तो खेला था मुखिया बनने की चाहत कहाँ से कहाँ तक ले जाएगी पता नहीं। अब पुनः चौबे बनना चाह रहे हैं, मजे की बात दो चौबे एक साथ कैसे रहें। किसी के नियंत्रण में रहकर आप अपना मौलिक विकास नहीं कर सकते हैं। समय- समय पर संख्या बल के दम पर मोर्चा खोल के बैठ जाने से भला पाँच साल बिताए जा सकेंगे। हर बार एक नया हंगमा। जोड़ने के लिए चल रहे हैं और स्वयं के ही लोग टूटने को लेकर शक्तिबल दिखा रहे हैं। देखने और सुनने वालों में ही कोई बन्दरबाँट का फायदा उठा कर आगे की बागडोर सम्भाल लेगा। वैसे भी लालची व्यक्ति के पास कोई भी चीज ज्यादा देर तक नहीं टिकती तो कुर्सी कैसे बचेगी। ऐसे में चाहें जितना जोर लगा लो स्थिरता आने से रही। हिलने- डुलने वाले को कोई नहीं पूछता अब तो स्वामिभक्ति के सहारे नैया पार लगेगी। समस्या ये है कि दो लोगों की भक्ति का परीक्षण कैसे हो, जो लंबी रेस का घोड़ा होगा उसी पर दाँव लगाया जाएगा। जनता का क्या है कोई भी आए – जाए वो तो मीडिया की रिपोर्टिंग में ही अपना उज्ज्वल भविष्य देखती है। ऐसे समय में नौकरशाहों के कंधे का बोझ बढ़ जाता है व उनकी प्रतिभा, निष्ठा दोनों का मिला- जुला स्वरूप ही आगे की गाड़ी चलता है। कुल मिलाकर देश की प्रतिष्ठा बची रहे, जनमानस इसी चाहत के बलबूते सब कुछ बर्दाश्त कर रहा है।
(श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ जी हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं (लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हायकु-चोका आदि) की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आप एक अच्छी ब्लॉगर हैं। कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित / पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपकी कई रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं एवं आकाशवाणी के कार्यक्रमों में प्रसारित हो चुकी हैं। ‘रोशनी के अंकुर’ लघुकथा एकल-संग्रह प्रकाशित| आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य ‘इससे अधिक ताजा क्या?‘. हम भविष्य में आपकी चुनिंदा रचनाएँ अपने पाठकों से साझा करने की अपेक्षा करते हैं।)
☆ व्यंग्य – इससे अधिक ताजा क्या? ☆ सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆
संपादक महोदय ने साहित्यकारों से ताजा-तरीन व्यंग्य ऐसे माँगा जैसे, फूल वाले से ग्राहक ताजा-तरीन फूल, सब्जी वाले से ताजा सब्जी, फल वाले से ताजे-ताजे फल, मिठाई वाले से ताजा-तरीन मिठाईयाँ। अब ये किसको पता चलता है कि ताजा चीज का दावा करने वाले उपर्युक्त लोग ताजा-ताजा का शोर मचा करके ग्राहक को चूना लगा देते हैं। तो भई व्यंग्यकार भला कैसे पीछे रहे, वह तो इन सब का बाप होता है। इन सबका क्या, वह तो सबका बाप बनने हेतु प्रयत्नशील रहता है, बन नहीं पाए ये और बात है। व्यंग्यकार से कवि बना मानुष से तो छुटंकी माचिस भी भय खाती है। अपनी हर रचना को ताजा-ताजा कहकर स्टेज पर खड़ा होकर धड़ल्ले से भीड़ के बीच, पुरानी छूटी-बिछड़ी पड़ी कविता को तड़का मारकर परोसकर आग लगा देता है| और बड़ी बेशर्मी से तालियों की माँग भी अपने लिए कर डालता है। जैसे गृहिणी बासी सब्जी को फ्रिज से निकालकर तड़का देकर ताजा कर देती है और घर वालों से तारीफ बटोर लेती है। कभी- कभी अपनी छूटी-बिछड़ी नहीं, बल्कि इधर-उधर से झपटी गयी रचनाएँ भी सुना मारता है| सोशल साइट पर बिखरे दो लाइनों के हास्य पर वह ऐसे झपट्टा मारता है कि बेचारी चील की प्रजाति देख ले तो शरमा जाय| उसकी यह निर्भीकता साहित्यिक क्षेत्र के उस शगूफे की राह से होकर आयी रहती है, जहाँ यह शोर छाया रहता है कि ‘कोई किसी को पढ़ता नहीं है’। बस इसी पूर्वाग्रह के जाल में मकड़ी की तरह फंस जाता है चौर्यकर्म करने वाला वह खिलाड़ी| क्योंकि चुपके-चुपके ही सही, दूसरों की रचनाओं को पढ़ने वालों की कमी नहीं है। सब एक दूजे को पढ़ते रहते हैं, न अधिक सही, थोड़ा बहुत ही सही| बस कभी-कभी चोरों की किस्मत साथ नहीं देती है तो वे ऐसे पढ़ाकूओं के हत्थे चढ़ जाते हैं, दूसरे की रचना को अपनी कहने वालों पर चुपके-चुपके, चोरी-चोरी पढ़ने वाले आखिरकार नकेल डाल ही देते हैं। यधपि ताजा कह अपनी रचना कहने वाला कवि तब भी अड़ा ही रहता है, अड़ियल बैल क्या अड़ेगा उसके सामने।
इस ताजे-ताजे की गुगली स्वप्रिय खेल तक सीमित नहीं है, इसका क्षेत्रफल उतना ही विशाल है जितना कि, हमारे देश में भ्रष्टाचार का खेल। इस ताजा के चक्कर में अपनी रचनाओं को ताजा अप्रकाशित कहकर पत्रिकाओं में ठिकाने लगाने वाले लोग पत्रिका तक नहीं रुकते हैं, बल्कि प्रतियोगिताओं में भी सेंध करने का प्रयत्न करते हैं। ताजा लिख न पाएं तो दूसरे साहित्यकारों की सोशल मीडिया पर घूमती रचनाओं को पकड़ते हैं, अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए उसके ढाँचे में फेरबदल करते हैं, और ताजा-तरीन कहकर पेश कर देते हैं सबके सामने।
मात वही खाते हैं जो इस क्षेत्र में नवागत होते हैं या फिर उनकी बुद्धि गधों से आयातित हुई होती है। कुछ बैल बुद्धि वाले भी प्रकट कृपालु की तरह प्रकट होते हैं और आरोप-प्रत्यारोप से आहत हुए बिना बैल से डटे रहते हैं कि भई रचना मेरी ही है। भले सबूत-दर-सबूत पेश किए जाते रहें। इस किस्म की प्रजाति झेंपने वाली जात-बिरादरी से नहीं होती है कि गदहे की तरह सब कुछ सुनकर चुप हो जाए| ये उस किस्म के गधे नहीं हैं जो धोबी के घर पाये जाते हैं, ये नेताओं के आगे-पीछे घूमने वाले गधे हैं| अतः प्रत्यारोप अधिक होने पर ‘क्या कर लोगे!’ कहकर दुलत्ती जमाकर अपने चौर्यकर्म में मेहनत और लगन पूर्वक पुनः जुट जाते हैं| आखिर परवाह क्योंकर करें, उन्हें भी तो किताबों के पहाड़ में अपनी आहुति डालनी होती है| पुस्तकों की गिनती बढ़ाने के लिए सबसे आवश्यक कार्य यह हेराफेरी ही तो है, और कई-कई गदहें इस अभूतपूर्व कार्य में लगे हुए हैं| उन्हें लगे रहने दीजिए साहेब, वैसे भी आप रोक भी नहीं सकते हैं| जब रोक नहीं सकते हैं तो फिर उन्हें बासी रचनाओं से ताजा रचनाएँ बनाने दीजिए| कभी न कभी धोबी उन्हें खुद ही धोबिया पछाड़ दे देगा|
हम कर रहे थे बैलों की बात और पहुँच गए फिर गदहों पर| समस्या वहाँ ही बार-बार पहुँचने की नहीं है, बल्कि समस्या प्रवृत्ति की है| इन्सान बलिष्ठ को छोड़कर कमजोर को सताने, उसकी किरकिरी करने में अपना समय अधिक खपाता है| यह पूर्वाग्रह नहीं है प्रत्युत सौ-प्रतिशत सच है| बैल बचकर निकल जाते हैं और बेचारे गदहों को सैकड़ों बातें सुनाई जाती हैं| बैल को छेड़ने की हिम्मत किसी में है ही नहीं| ‘बैल बुद्धि’ की कहावत न जाने क्यों कही गयी, ‘गदहा बुद्धि’ कहावत क्यों नहीं बनी| ये जो बैल, साहित्य के क्षेत्र में घूमते हुए दूसरों की ताजा-ताजा रचनाएँ चर ले रहे हैं खुल्लम-खुल्ला, उनका क्या! बैल बुद्धि के होते तो इतनी सफाई से चर लेते और पता भी न चलता? हमें लगता है जो बैल, साहित्य में विद्वान हैं वे गदहों को मात दे रहे हैं| डंके की चोट पर लोगों की रचना उड़ाते हैं, टोंको तो घुघुआते हैं। यही रुके तो भी ठीक परन्तु ये दो कदम और आगे बढ़ते हैं और उसे अपनी लेखन कला से तिकड़म करके उसमें अपना रंग भरते हैं कि कहीं से से भी चोरी की प्रतीत न हो| तदुपरांत ताजातरीन कहकर सोशल मीडिया पर बिखरा देते हैं| दूसरों के आँखों में धूल झोंकने की ये इनकी सामान्य प्रक्रिया हो गयी है। कोई बोले तो बैल तो हैं ही और उनका दबदबा होता ही है, अतः ये गदहे की तरह दुलत्ती मारकर चारों खाने चित्त करने में विश्वास नहीं रखते हैं बल्कि सीधे सामने वाले के दिमाग पर वार करते हैं| इनके सिंघ भी होती है, अब गधे की तो होती नहीं है! अतः इनका वार कभी खाली नहीं जाता, इन्सान का दिमाग सुन्न हो जाता है| वह या तो पीछे हट जाता है, या फिर ब्लैक होल में समा जाता है| बैल हुँकार भरता हुआ मैदान में डटा रहता है और साहित्य के बियाबान जंगल में विचरण करता है, इनका सानिध्य पाकर गधे भी खुल्लमखुल्ला विचरण करने से बाज नहीं आते हैं|
ताजा ताजा रचना है कहकर, दूसरे की बाग़ का फूल संपादक-प्रकाशक के चरणों में चढ़ाकर साहित्यकार बने फिरते हैं| और ईमानदार, स्वाभिमानी, असल साहित्यकार ब्लैक होल को ही अपनी दुनिया समझ कर कर्मठता से रचता रहता है भावनाओं का संसार या फिर सन्यास ले लेता है|
संपादक जी हम ताजा-ताजा रचना भेज रहे हैं, बासी होने और दूसरे के हाथ साफ़ करने से पहले आपसे विनम्र विनती है संपादक महोदय, कृपा करिए और अपने ताजा-ताजा अंक में इस ताजातरीन रचना को छाप दीजिए वरना बेचारी एक और कलमकार कहीं ब्लैक होल में न समा जाए| और यह हमारी ताजा रचना बासी होकर किसी और के हाथ में उछल-कूद करती हुई और अन्य पत्रिकाओं में छपके हमें ही दुलत्ती मारने लगे|