हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 30 – इमोशनल आईसीयू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना इमोशनल आईसीयू)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 30 – इमोशनल आईसीयू ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

यह कहानी उस दिन की है जब पीताम्बर चौबे अपनी आखिरी सांस लेने के लिए जिले के सबसे ‘प्रसिद्ध’ सरकारी अस्पताल, भैंसा अस्पताल में भर्ती हुए। डॉक्टरों ने कहा था, “बस कुछ और दिनों की बात है, इलाज जरूरी है।” चौबे जी ने सोचा था, चलो सरकारी अस्पताल में जाकर इलाज करवा लेते हैं, पैसे भी बचेंगे और सरकारी व्यवस्था का लाभ भी मिलेगा। मगर क्या पता था कि यहाँ ‘एक्सपायर्ड’ का भी सरकारी प्रोटोकॉल है!

चौबे जी जब अस्पताल के वार्ड में पहुंचे, तो पहले ही दिन डॉक्टर साहब ने बताया, “ये सरकारी अस्पताल है, इमोशन्स का कोई स्कोप नहीं है। हम यहां इलाज करते हैं, बस।”

फिर वह दिन आया, जब पीताम्बर चौबे जी ने अस्पताल के बिस्तर पर आखिरी सांस ली। उनके बगल में खड़ी उनकी गर्भवती पत्नी, संध्या चौबे की दुनिया मानो थम सी गई। लेकिन अस्पताल में तो हर चीज़ ‘मैनेज’ होती है, और इमोशन्स का यहाँ कोई ‘कंसर्न’ नहीं होता। इधर चौबे जी का प्राणांत हुआ और उधर हेड नर्स, शांता मैडम, स्टाफ की भीड़ के साथ वार्ड में आ धमकीं। चेहरा ऐसा, मानो कोई ‘अल्टीमेट हाइजीन चेक’ करने आई हों।

“अरे संध्या देवी! ये बिस्तर साफ करो पहले। यहाँ पर्सनल लूज़ मोमेंट्स का कोई कंसेप्ट नहीं है, ओके? जल्दी क्लीनिंग करो,” नर्स ने एकदम हुक्मनामा सुना दिया। मानो चौबे जी ने सिर्फ एक बिस्तर गंदा किया हो, न कि अपनी जान गंवाई।

संध्या चौबे, जो अपने पति की मौत के गम में डूबी थीं, पर अस्पताल में संवेदनाएँ सिर्फ पब्लिक डिस्प्ले ऑफ इमोशन्स होती हैं। वह तो सरकारी दस्तावेज़ों में एक ‘इवेंट’ हैं, जिसे खत्म होते ही हटा देना होता है। नर्स ने जैसे ही अपना ‘ऑर्डर’ दिया, संध्या की आँखों से आँसू निकल पड़े। उसने बिस्तर की तरफ देखा, मानो अपने पति की आखिरी निशानी को आखिरी बार देख रही हो। लेकिन अस्पताल का स्टाफ मानो एकदम प्रोग्राम्ड मशीन हो, जिसका इमोशन्स से कोई वास्ता ही नहीं।

“मैडम, आँसू बहाने से कुछ नहीं होगा। ये सरकारी अस्पताल है, यहाँ आप ‘एमोशनल अटैचमेंट’ भूल जाइए,” हेड नर्स शांता बोलीं, मानो हर दिन किसी को उसकी भावनाएँ गिनाना उनका रोज का ‘डिपार्टमेंटल प्रोटोकॉल’ हो।

तभी डॉक्टर नंदकिशोर यादव साहब आते हैं, अपने हाथ में नोटपैड लिए हुए, और ऐलान करते हैं, “हमें यहाँ बिस्तर की क्लीनिंग चाहिए। इमोशन्स का यहाँ कोई स्कोप नहीं है। सरकारी बिस्तर पर बस पसीने और खून के दाग चलेंगे, आँसुओं का कोई प्लेस नहीं है।”

संध्या ने डॉक्टर की तरफ देखा। शायद कुछ कहने का प्रयास किया, लेकिन एक ऐसा दर्द, जो शब्दों में नहीं आ सकता। और डॉक्टर यादव ने एक और ‘प्रोफेशनल’ गाइडलाइन दी, “देखिए, यहाँ नया पेशेंट एडमिट करना है। ये अस्पताल है, आपका पर्सनल इमोशनल जोन नहीं!”

तभी सफाई कर्मी हरिचरण सिंह आते हैं, अपने कंधे पर झाड़ू और हाथ में एक पुरानी बाल्टी लिए हुए। “अरे भाभीजी! चलिए, जल्दी फिनिश करें, हमें भी अपना काम निपटाना है। यहाँ ये ‘इमोशनल ड्रामा’ का टाइम नहीं है।”

हरिचरण सिंह का डायलॉग सुनते ही नर्स शांता जोर से हंस पड़ीं, “देखो भई, हार्डवर्किंग स्टाफ है हमारा। भाभीजी, ये आँसू आपकी अपनी ‘पर्सनल केमिकल’ हैं, लेकिन यहाँ पब्लिक हाइजीन का प्रोटोकॉल है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो ये अस्पताल एक ‘इमोशनल पार्क’ बन जाएगा!”

संध्या चौबे को यह भी फरमान सुनना पड़ा कि उनके आँसू इस सरकारी बिस्तर की ‘प्योरिटी’ को खराब कर सकते हैं। मानो उनके पति की मौत और इस बिस्तर का ‘सैनिटाइजेशन’ एक ही मुद्दा हो। “ये बेड क्या मंदिर की मूर्ति है, जो उसकी पवित्रता बनाए रखनी है?” संध्या सोचने लगीं। लेकिन कौन सुने? यहाँ सबको सिर्फ काम का ‘आउटकम’ चाहिए था।

बिस्तर, जो किसी के आखिरी पल का गवाह बना, अब उसकी पहचान एक ‘डर्टी गारमेंट’ के रूप में बदल गई। चौबे जी का दुःख, उनकी मौत का दर्द, बस स्टाफ की भाषा में एक ‘मैनेजमेंट टास्क’ था, जिसका निपटारा भी उतनी ही बेरुखी से होना था। मानो बिस्तर पर कोई इंसान नहीं, बल्कि बस एक ‘ट्रॉले की एक्सपायर्ड प्रोडक्ट’ पड़ा हो।

यह समाज, यह व्यवस्था – जहाँ संवेदनाएँ सरकारी फाइल में ‘फॉर्मेलिटी’ बनकर रह जाती हैं, और लोग इस तरह की घटनाओं को मानो मनोरंजन की तरह देखते हैं। जैसे ही बिस्तर खाली हुआ, वैसे ही नए मरीज़ के लिए ‘स्पेस’ तैयार हो गया। आखिर सरकारी अस्पताल का काम चलता रहे, पीताम्बर चौबे का ‘इमोशनल केस’ यहाँ का मुद्दा नहीं था।

संवेदनाओं की ऐसी सरकारी व्यवस्था ने जैसे हर इंसान के भीतर एक ‘इमोशनल आईसीयू’ बना दिया है, जिसमें संवेदनाएँ तोड़ दी जाती हैं, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 228 – “बैठे ठाले – एक ठो व्यंग्य – ‘ऐसा भी होता है’” ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय ☆

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है। आज प्रस्तुत है पितृपक्ष में एक विचारणीय व्यंग्य  – “बैठे ठाले – ‘एक ठो व्यंग्य – ‘ऐसा भी होता है”।)

☆ व्यंग्य जैसा # 228 – “बैठे ठाले – ‘एक ठो व्यंग्य – ‘ऐसा भी होता है☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

एक ही शहर के तीन विधायक बैठे हैं एमएल रेस्ट हाऊस के एक बंद कमरे में। चखने के साथ कुछ पी रहे हैं, ठेकेदार दे गया है ऊंची क्वालिटी की। पीते पीते एक नेता बोला – ये अपने शहर से ये जो नया लड़का धोखे से इस बार जीत क्या गया है, बहुत नाटक कर रहा है, लोग जीतने के बाद अपनी कार के सामने बड़े से बोर्ड में लाल रंग से ‘विधायक’ लिखवाते हैं इस विधायक ने अपनी कार में ‘सेवक’ लिखा कर रखा है, अपना इम्प्रेशन जमाने के लिए हम सबकी छबि खराब कर रहा है, ठीक है कि चुनाव के समय हम सब लोग भी वोट की खातिर हाथ जोड़कर जनता के सामने कभी ‘सेवक’ कभी ‘चौकीदार’ कहते फिरते हैं पर जीतने के बाद तो हम उस क्षेत्र के शेर कहलाते हैं और रोज नये नये शिकार की तलाश में रहते हैं, रही विकास की बात तो विकास तो नेचरल प्रोसेस है होता ही रहता है, उसकी क्या बात करना, विकास के लिए जो पैसा आता है उसके बारे में सोचना पड़ता है।

दूसरे विधायक ने तैश में आकर पूरी ग्लास एक ही बार में गटक ली और बोला –  तुम बोलो तो…उसको अकेले में बुलाकर अच्छी दम दे देते हैं, जीतने के बाद ज्यादा जनसेवा का भूत सवार है उसको, हम लोग पुराने लोग हैं हम लोग जनता को अच्छे से समझते हैं जनता की कितनी भी सेवा करो वो कभी खुश नहीं होती। अरे धोखे से जीत गए हो तो चुपचाप पांच साल ऐश कर लो, कुछ खा पी लो, कुछ आगे बढ़ाकर अगले चुनाव की टिकट का जुगाड़ कर लो। मुझे देखो मैं चार साल पहले उस पार्टी से इस पार्टी में आया, मालामाल हो गया, बीस पच्चीस तरह के गंभीर केस चल रहे थे, यहां की वाशिंग मशीन में सब साफ स्वच्छ हो गए, वो पार्टी छोड़कर आया था तो यहां आकर मंत्री बनने का शौक भी पूरा हो गया, इतना कमा लिया है कि सात आठ पीढ़ी बैठे बैठे ऐश करती रहेगी, जनता से हाथ जोड़कर मुस्कुरा कर मिलता हूं, चुनाव के समय कपड़ा -लत्ता सोमरस और बहुत कुछ जनता को सप्रेम भेंट कर देता हूं, जनता जनार्दन भी खुश, अपन भी गिल्ल…. और क्या चाहिए। ये नये लड़के कुछ समझते नहीं हैं, राजनीति कुत्ती चीज है, ऊपर वाला नेता कब आपको उठाकर पटक दे कोई भरोसा नहीं रहता, कितनी भी चमचागिरी करो ऐन वक्त पर ये सीढ़ी काटकर नीचे गिरा देते हैं। अभी छोकरा नया नया है  हम लोग सात आठ बार के विधायक हैं हम लोग अनुभवी लोग हैं खूब राजनीति जानते हैं, लगता है एकाद दिन अकेले में कान उमेठ कर छोकरे को राजनीति और कूटनीति समझाना पड़ेगा।

तीसरा मूंछें ऐंठते हुए बोला – यंग छोकरा है  ज्यादा होशियार बनने की कोशिश कर रहा है अपन वरिष्ठों की इज्जत नहीं कर रहा है सबकी इच्छा हो तो विरोधी पार्टी की यंग नेत्री (जो अपनी खासमखास है) को भिजवा देते हैं एकाद दिन… पीछे से कोई वीडियो बना ही लेगा, फिर देखना मजा आ जायेगा। पहला वाला बोला – होश में आओ अपनी ही पार्टी से जीता है, गठबंधन सरकार में एक एक विधायक का बहुत महत्व होता है। अकेले में समझा देना नहीं तो नाराज़ होकर दूसरी पार्टी ज्वाइन कर लेगा, सुना है आजकल एक विधायक की कीमत पचीस से चालीस करोड़ की चल रही है। नया खून है, जल्दी गरम हो जाता है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – हास्य-व्यंग्य ☆ “इच्छाधारी नाग के साथ रेल यात्रा…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक हास्य व्यंग्य  “इच्छाधारी नाग के साथ रेल यात्रा…”)

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “इच्छाधारी नाग के साथ रेल यात्रा…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं मुम्बई से जबलपुर लौट रहा था, रात्रि में ट्रेन पूरी गति से दौड़ रही थी।

अचानक मेरी नजर अपने बाजू वाली बर्थ पर लेटे व्यक्ति की चमकदार गोल आंखों पर पड़ी। मुझे थोड़ा अजीब लगा फिर सोचा दुनिया में तरह तरह की आंखों वाले लोग हैं। नीली, लाल, भूरी, काली आंखों वाले लोग। मछली, हिरनी, उल्लू, सांप जैसी आंखों वाले लोग। होगा कोई, मुझे क्या। तभी अचानक गोल चमकदार आंखों वाला वह व्यक्ति मुझसे बोला श्रीवास्तव जी आपका शक सही है। मैंने कहा भाई आप मुझे कैसे जानते हैं और कौन से शक की बात कर रहे हैं? वह बोला भाई परेशान न हों मैं सब को पहचान लेता हूं। मैं इच्छाधारी नाग हूं, मुझे कुछ विशिष्ट शक्तियां प्राप्त हैं। रात के समय ट्रेन की बत्तियां बंद थीं उसकी चमकती आंखें देखकर और बातें सुनकर मैं थोड़ा घबरा गया। उसने कहा श्रीवास्तव जी घबराएं नहीं आपका धर्म भी फुफकारना और डसना है और मेरा भी यही धर्म है, इसीलिए मैंने आपको अपना परिचय दिया। मैंने कहा यह कैसे हो सकता है, मैं सांप नहीं आदमी हूं। आदमी के वेश में ट्रेन की सीट पर लेटे इच्छाधारी सांप ने पहले मेरी ओर जहरीली मुस्कुराहट फेंकी फिर हंसा और कहा आदमी तो हो लेकिन व्यंग्यकार हो न इसीलिए तो कहा कि हम दोनों का फुफकारने और डसने का धर्म एक ही है। इच्छाधारी अचानक कुछ उदास हो गया।

मैंने कहा भाई क्या बात है? इतने शक्ति सम्पन्न होने के बाद भी तुम्हारे चेहरे पर उदासी? वह बोला सही बात है, जब भी किसी व्यंग्यकार को देखता हूं तो उदास हो जाता हूं क्योंकि आप लोग मुझसे ज्यादा शक्तिशाली हैं। मैंने कहा – इच्छाधारी जी क्यों मजाक कर रहे हो! वह बोला – व्यंग्यकारों की नजर और सूंघने की शक्ति मुझसे बहुत तेज होती है उन्हें न जाने कहां से लोगों के बारे में सब जानकारी हो जाती है और वे लिखकर फुफकार भी मारते रहते हैं और डस भी लेते हैं। भाई जी हम तो जिसे डसते हैं वह मात्र कुछ क्षण छटपटा कर मर जाता है, लेकिन जब आप अपनी कलम से किसी को डसते हैं तो उसे आजीवन अपमान का मृत्यु तुल्य दर्द झेलना पड़ता है। अब बताइए आप बड़े की मैं? मैंने कहा – इच्छाधारी जी जब आप सब जानते हैं तो यह भी जानते होंगे कि मैं सिर्फ व्यंग्यकार हूं बड़ा नहीं। इच्छाधारी मुस्कुराया और बोला श्रीवास्तव जी आज लेखन की हर विधा में दो प्रकार के लोग हैं, एक वे जो वास्तव में जानकार और विद्वान हैं, जिनके पास प्रशंसक तो हैं पर चापलूस नहीं  दूसरे वे जो स्वयं को बड़ा समझते हैं और अपने बड़े होने का निरंतर प्रचार प्रसार कराते रहते हैं इनके पास प्रशंसक तो नहीं होते,चापलूस होते हैं। ये सृजन से अधिक जुगाड़ की शक्ति पर भरोसा करते हैं और सरकारी गैर- सरकारी सम्मान, पुरस्कार लेकर स्वयं पर श्रेष्ठ होने का ठप्पा लगवा लेते हैं। इच्छाधारी जी आगे बोले – श्रीवास्तव जी रामधारी सिंह “दिनकर”, मन्नू भंडारी, परसाई जी आदि की बात अलग थी उन्हें छोड़िए और बताइए की आज जितने भी कथाकार, कवि, नाटककार अथवा व्यंग्यकार हैं अथवा जो भी राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए छटपटा रहे हैं उनमें से कितने लोगों का लिखा हुआ आपकी समझ में आता है?

इच्छाधारी के प्रश्न पर मैंने मौन रहना उचित समझा। सोचा कोई टिप्पणी करके क्यों आज के बड़े तथाकथित रचनाकारों से बुराई लूं, वे सब लोग ही तो पुरस्कार और सम्मान समितियों के चयनकर्ता बने बैठे हैं। हो सकता है किसी के दिमाग में अगले बड़े सम्मान के लिए मेरा नाम चल रहा हो।

मेरी चुप्पी से इच्छाधारी ने मेरा मन पढ़ लिया वह मुस्कुराते हुए बोला – व्यर्थ उम्मीद न लगाएं आपको सम्मान दिलाने में किसी की रुचि नहीं है। मैंने कहा क्यों भाई मुझमें क्या कमी है? उसने कहा – क्योंकि आप सिर्फ व्यंग्यकार हैं, सम्मान प्राप्त करने के लिए व्यंग्य बाणों के साथ – साथ “चापलूसी का हथियार” चलाना भी आना चाहिए। मैंने प्रश्न किया इच्छाधारी जी कृपया बताएं मुझे चापलूसी नामक हथियार चलाना कौन सिखा सकता है? वह जोर से हंसा फिर सांसों पर नियंत्रण करके बोला – यह जन्मजात गुण है प्यारे भाई, इसे सिखाया नहीं जा सकता। इच्छाधारी ने आगे कहा आप तो अपने साथियों को रचनाएं सुना – सुना कर प्रसन्न रहें।

मैंने चौंकते हुए कहा – अरे आप मेरे साथियों के बारे में भी जानते हैं! वह बोला, भाई जी मैं सबको जनता हूं, आप कहें तो नाम गिना दूं। आखिर आप सब फुफकारने – डसने वाले मेरे ही धर्म के लोग हैं। मैंने कहा भाई जी जब आप सबको जानते हैं तो इतना बता दें कि हमारे साथियों में से कौन भाग्यशाली बड़ा सम्मान पाने की योग्यता रखता है? इच्छाधारी हंसा फिर बोला – अच्छे रचनाकार तो सभी हैं लेकिन सभी नर्मदा का पानी पीकर अक्खड़ हो गए हैं, चापलूसी का हथियार चलाना कोई नहीं जानता अतः आप सब बड़े सम्मान की उम्मीद न करें और निःस्वार्थ नगर के बाहर के रचनाकारों का सम्मान करके उन्हें बड़ा बनाने की संस्कारधानी की परम्परा निभाएं।

मैंने निराश होते हुए कहा – क्या हममें से किसी को राष्ट्रीय स्तर का कोई सम्मान नहीं मिल सकता? इच्छाधारी कुछ सोचता हुआ बोला – मिल सकता है, यदि पुरस्कार चयन समिति के सदस्यों को कोई यह ज्ञान दे दे कि इनमें से किसी को सम्मान के लिए चुन लेने पर चयन समिति पर लगा यह धब्बा मिट जायेगा कि समिति के सदस्य सिर्फ चमचों को ही पुरस्कृत करते हैं। मैंने कहा – इच्छाधारी जी चयन समिति के सदस्यों के दिमाग में इस बात को आप ही प्रविष्ट करा सकते हैं कृपया मदद करें।

वह बोला, मुझे आप लोगों से हमदर्दी है किंतु क्या करूं पहले नाग वेश में ट्रेन में घुसकर मुफ्त यात्रा कर लेता था किंतु विगत दिवस आपके मित्रों ने मेरे गरीबरथ में यात्रा करने का इतना हल्ला मचा दिया कि अब मुझे आदमी के वेश में टिकट लेकर रेल यात्रा करना पड़ रही है। आप लोगों के काम से न जाने कहां कहां जाना पड़ेगा, न जाने कितना पैसा खर्च होगा? बातों बातों में रास्ता काट गया, जबलपुर आने वाला था। मैंने मनुष्य रूपी उस इच्छाधारी नाग से प्रार्थना करते हुए कहा कि भाई आप ही ने तो कहा था कि हम लोग फुफकारने – डसने वाले एक ही धर्म के लोग हैं। वह मुस्कुराया, हाथ मिलाकर विदा लेता हुआ बोला कि ठीक है प्रयत्न करूंगा।

वह नाग रूप धारण कर पटरियों के बीच गायब हो गया।

अब मुझे घर पहुंचने की जल्दी थी अतः मैंने आटो रिक्शा पकड़ने प्लेटफार्म से बाहर का रुख किया।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 29 – सिस्टम की सवारी, जनता की बेज़ारी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना सिस्टम की सवारी, जनता की बेज़ारी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 29 – सिस्टम की सवारी, जनता की बेज़ारी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

किसी ने सही कहा है, “नेताओं का सबसे बड़ा काम यह है कि वे जनता की आँखें जनता के द्वारा फुड़वाते हैं।” और यह काम हमारे सच्चे नायक, श्रीमान रामानंद जी ने बखूबी किया। वह एक राजनेता नहीं, बल्कि एक ‘मसीहा’ थे। उनके पास हर समस्या का समाधान था—बस उसे किसी न किसी तरीके से ‘घुमा-फिरा’ कर पेश करना होता था।

रामानंद जी का कार्यक्षेत्र बड़ा था, हालांकि यह कार्यक्षेत्र केवल उन्हीं के घर तक सीमित था। उनका बड़ा आदर्श वाक्य था, “हम जो कहें, वही सच है। और सच को समझने के लिए हमें हमेशा थोड़ी देर रुककर उसका पुनः मूल्यांकन करना चाहिए।” इस वाक्य को सुनकर तो लोग चकरा जाते थे, लेकिन इसका मतलब बहुत गहरा था, यह वही बानी थी, जिससे लोग उन्हीं को समझते थे, बिना समझे।

एक दिन रामानंद जी अपने कार्यलय में व्यस्त थे। उनके पास कुछ बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे थे—मसलन, सड़क के गड्ढे भरवाने का निर्णय और नल के पानी को इतना साफ करने का ऐतिहासिक निर्णय, जिससे लोग उसका रंग देख सकें। इन मुद्दों के साथ वे एक बेहद अहम बैठक करने वाले थे। पर एक अजीब घटना हुई, जो ना तो रामानंद जी की योजना का हिस्सा थी, और ना ही किसी के लिए सहज रूप से समझी जा सकती थी।

दरअसल, रामानंद जी के पास एक फाइल आई थी, जो एक नई सड़क के निर्माण से संबंधित थी। सड़क की डिजाइन इतनी अद्भुत थी कि किसी को समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सड़क किसे जोड़ी जाए—क्या यह स्कूल के बच्चों के लिए थी, या फिर वो रास्ता था, जिस पर राजनेताओं के काफिले को तेजी से गुजरना था। जैसे ही फाइल पर एक नजर डाली, रामानंद जी ने कहा, “ये सड़क तो हमें खुद बनाने की जरूरत नहीं है, ये तो खुद बनाई जाएगी।”

और फिर, जैसे ही बैठक खत्म हुई, एक नया फॉर्मूला सामने आया: “जनता के मुद्दे पर इतना विचार करने की कोई जरूरत नहीं, अगर उनके पास सड़क नहीं है, तो चलने का क्या फायदा।” इस महान विचार को सुनकर उनके सभी कर्मचारी भौंचक्के रह गए, लेकिन वे जानते थे कि यह एक गहरी राजनीति का हिस्सा था।

इसी बीच, रामानंद जी की टीम ने एक नया विकास कार्यक्रम प्रस्तुत किया—”भारत स्मार्ट बनेगा, अगर हम इसे थोड़ा और स्मार्ट बना लें।” यह विचार उन्होंने खुद ही खड़ा किया था, और अब इसे लागू करने का वक्त था। इसका पहला कदम था ‘स्मार्ट वॉटर सप्लाई’। स्मार्ट वॉटर सप्लाई का मतलब था कि पानी में कुछ न कुछ ऐसी सामग्री मिलाई जाएगी, जिसे पीकर लोग खुद को स्मार्ट महसूस करेंगे, और उनकी अज्ञानता भी घट जाएगी। पानी में कुछ जड़ी-बूटियों का मिश्रण करने के लिए एक वैज्ञानिक को नियुक्त किया गया, जो इस उपक्रम में सफलता पाने के लिए न जाने कितनी रातें जागता रहा। अंततः, जब पानी का टेस्ट हुआ, तो लोग इसको पीने के बाद, स्मार्ट तो क्या, अपनी नाक से ही परेशान हो गए।

रामानंद जी के दृष्टिकोण में परिवर्तन आ चुका था। अब उन्होंने एक नया कदम उठाया—’जनता की शिकायतें दूर करना’। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने एक विशाल कंट्रोल रूम स्थापित किया, जहां सभी शिकायतें दर्ज की जाती थीं। यह कंट्रोल रूम इतना बड़ा था कि किसी भी शिकायत को पंजीकरण से पहले, उन पर सिर्फ एक लकीर खींची जाती थी। रामानंद जी ने इसका नाम दिया “लकीरी व्यवस्था”। इसके बाद, किसी भी शिकायत के समाधान से पहले, वे शिकायतकर्ताओं को बुलाकर एक प्रेरक भाषण देते थे, ताकि वे समझ सकें कि आखिर क्यों उनकी समस्या इतनी महत्वपूर्ण नहीं है। यह तरीका बड़ा कारगर साबित हुआ, क्योंकि अब शिकायतें आई ही नहीं।

एक दिन रामानंद जी के सामने एक और समस्या आई—विकास कार्यों के लिए धन की कमी। पर वे निराश नहीं हुए। “धन की कमी से कोई फर्क नहीं पड़ता,” उन्होंने कहा, “हमारे पास हर समस्या का समाधान है, बशर्ते उसे सही तरीके से घुमाया जाए।” और फिर, उन्होंने ‘विकास की गति’ को धीमा कर दिया। यह तरीका इतना सटीक था कि अब सब कुछ स्थिर था—न कोई सड़क बन रही थी, न कोई पानी साफ हो रहा था, लेकिन सब लोग बहुत खुश थे।

आखिरकार, रामानंद जी ने एक और बेमिसाल घोषणा की: “हम विकास के नाम पर किसी भी उन्नति की जरूरत नहीं समझते। हम जो हैं, उसी में खुश हैं।” यह घोषणा सुनकर जनता भी खुश हो गई। अब वे विकास के बारे में चिंता नहीं करते थे, क्योंकि रामानंद जी का भरोसा था—”जिसे जो चाहिए, वो यही कर सकता है।”

और इस तरह, रामानंद जी ने अपने कार्यकाल को सफलतापूर्वक पूरा किया, बिना किसी परिणाम के। यह कहानी एक सच्चे नेता की है, जो सच में जानता था कि कैसे झूठ को इतने सफाई से पेश किया जाए कि वह सच जैसा लगे।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 314 ☆ व्यंग्य – “हुनरमंद हो, तो सरकारी नौकरी से बचना !” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 314 ☆

?  व्यंग्य – हुनरमंद हो, तो सरकारी नौकरी से बचना ! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 हुनरमंद हो, तो सरकारी नौकरी न करना वरना लोकायुक्त धर लेगा। हुनरमंद होना भी कभी मुश्किल में डाल देता है। मेरा दोस्त बचपन से ही बड़ा हुनरमंद है। स्कूल के दिनों से ही वह पढ़ाई के साथ साथ छोटे बच्चों को ट्यूशन देकर अपनी फीस और जेब खर्च सहज निकाल लेता था। जब कभी कालेज में फन फेयर लगता तो वह गोलगप्पे और चाय की स्टाल लगा लेता था। सुंदर लड़कियों की सबसे ज्यादा भीड़ उसी की स्टाल पर होती और बाद में जब नफे नुकसान का हिसाब बनता तो वह सबसे ज्यादा कमाई करने वालों में नंबर एक पर होता था।

कालेज से डिग्री करते करते वह व्यापार के और कई हुनर सीख गया। दिल्ली घूमने जाता तो वहां से इलेक्ट्रानिक्स के सामान ले आता, उसकी दिल्ली ट्रिप तो फ्री हो ही जाती परिचितों को बाजार भाव से कुछ कम पर नया से नया सामान बेचकर वह कमाई भी कर लेता। बाद में उसने सीजनल बिजनेस का नया माडल ही खड़ा कर डाला।  राखी के समय राखियां, दीपावली पर झिलमिल करती बिजली की लड़ियां, ठंड में लुधियाना से गरम कपड़े, चुनावों के मौसम में हर पार्टी के झंडे, टोपियां, गर्मियों में लखनऊ से मलमल और चिकनकारी के वस्त्र वह अपने घर से ही उपलब्ध करवाने वाला टेक्टफुल बंदा बन गया। दुबई घूमने गया तो सस्ते आई फोन ले आया मतलब यह कि वह हुनरमंद, टेक्टफुल और होशियार है।

इस सबके बीच ही वह नौकरी के लिये कांपटेटिव परीक्षायें भी देता रहा। जैसा होता है, स्क्रीनिग, मुख्य परीक्षा, साक्षात्कार, परिणाम पर स्टे वगैरह की वर्षौं चली प्रक्रिया के बाद एक दिन एक प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम आया और हमारा मित्र द्वितीय श्रेणि सरकारी कर्मचारी बन गया। अब अपने हुनर से वह दिन भर का सरकारी काम घंटो में निपटा कर फुर्सत में बना रहता। बैठा क्या न करता उसने अपना साइड बिजनेस, पत्नी के नाम पर कुछ और बड़े स्तर पर डाल दिया। उसके पद के प्रभाव का लाभ भी मिलता चला गया और वह दिन दूना रात चौगुना सफल व्यापार करने लगा। कमाई हुई तो गहने, प्लाट, मकान, खेत की फसल भी काटने लगा। जब तब पार्टियां होने लगीं।

गुमनाम शिकायतें, डिपार्टमेंटल इनक्वायरी वगैरह शुरु होनी ही थीं, किसी की सफलता उसके परिवेश के लोगों को ही सहजता से नहीं पचती। फिर एकदिन भुनसारे हमारे मित्र के बंगले पर लोकायुक्त का छापा पड़ा। दूसरे दिन वह अखबार की सुर्खियों में सचित्र छा गया। अब वह कोर्ट, कचहरी, वकीलों, लोकायुक्त कार्यालय के चक्कर लगाता मिला करता है। हम उसके बचपन के मित्र हैं। हमने उसके हुनर को बहुत निकट से देखा समझा है, तो हम यही कह सकते हैं कि हुनरमंद हो, तो सरकारी नौकरी न करना वरना लोकायुक्त धर लेगा।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 527 ⇒ एक फूफा का दर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक व्यंग्य – “एक फूफा का दर्द ।)

?अभी अभी # 527 ⇒ एक फूफा का दर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम अच्छी तरह जानते हैं कि एक फूफा जगत फूफा होता है और वह जहां भी शादियों में जाता है, लोग उसे आंखें फाड़ फाड़कर देखते हैं, लेकिन इसमें उसका कोई दोष नहीं। वह ना तो आसमान से टपका है और ना ही जन्म से फूफा पैदा हुआ है। परिस्थितियों ने उसे फूफा बनाया है और उससे अधिक, आपकी बुआ ने ही उसे फूफा बनाया है। वह भी कभी आपकी तरह एक अच्छा भला, खाता पीता इंसान था।

वैसे पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती, लेकिन जब फूफा फूफा में भेद होने लगता है तो हम भी अपनी फूफागिरी पर आ जाते हैं।

जब बड़ी बुआ से छोटी बुआ को अधिक महत्व दिया जाता है, तो हमसे बर्दाश्त नहीं होता। जिस जगह बुआ का ही मान ना हो, वहां एक फूफा आखिर किस मुंह से पांव रखे। ।

हम पर अक्सर आरोप लगाया जाता है कि हम किसी से बात ही नहीं करते। जरा अपनी बुआ से पूछकर तो देखिए, कभी उसने किसी के सामने अपना मुंह खोलने दिया है। आप तो बस चुप ही रहा करिए, हर जगह मेरी नाक कटाया करते हो। क्या होता है यह मान सम्मान और मनुहार, अब गिद्ध भोज में क्या कोई आकर अपने हाथ से आपके मुंह में गुलाबजामुन ठूंसेगा। और वैसे भी आप इसकी भी नौबत ही कहां आने देते हो। पहले से ही प्लेट में चार पांच गुलाब जामुन सजा लेते हो, मानो बाद में कभी खाने को मिले ना मिले। और उधर मुझे सुनना पड़ता है, लो देखो बुआ जी, आप कहते हो, फूफा जी को शुगर है, पूरी प्लेट में चाशनी चू रही है और उधर फूफा जी की लार टपक रही है। कल से उन्हें कुछ हो गया, तो ठीकरा तो हमारे माथे ही फूटेगा ना।

वैसे आपकी बुआ भी कम नहीं है, चुपके से हमारी प्लेट में दो कचोरियां रख जाती हैं, जल्दी खा लो, गर्मागर्म हैं, फिर खत्म हो जाएंगी। तुम काजू को छूना भी मत। मैने तुम्हारे लिए मुठ्ठी भर भरकर काजू निकाल रखी है, इनका क्या है, भगवान ने बहुत दिया है इन भाइयों को। ।

यकीन मानिए, हम पहले ऐसे नहीं थे। बढ़ती उम्र ने हमें ऐसा बना दिया है। एक जमाना था, जब हमारे भी जलवे थे। खूब दबा दबाकर खाते थे, और चोरी छुपे सोमरस पीने वाली युवा पीढ़ी की पूंछ पर पांव धर देते थे, फिर उन्हें ब्लैकमेल कर उनकी जमात में शामिल हो जाते थे। अच्छे भले दिन गुजर रहे थे कि किसी दिलजले ने बुआ से हमारी चुगली कर दी।

बस वह दिन है और आज का दिन, तुम्हारी बुआ ही हमारी नंबर एक की दुश्मन है। हमें जगह जगह बदनाम करती है, हमारी चादर मैली करती है और खुद तो जैसे दूध की धुली नजर आती है। ।

समय ने हमें क्या से क्या बना दिया, किडनी, बीपी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल और भूलने की बीमारी ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। बुआ तो खैर हमारी आवश्यक बीमारी है, क्योंकि वही तो हमें समय समय पर दवा की खुराक और मुफ्त का डोज़ पिलाते रहती है।

अब हम फूफा हैं तो हैं, अच्छे बुरे जैसे भी हैं, फूफा ही रहेंगे। यही हमारी और आपकी नियति है। आखिर हमसे बच के कहां जाओगे। अगर शादी में नहीं आए, तो लोगों को क्या जवाब दोगे, क्या बात है, वे ललितपुर वाली बुआ और फूफा जी कहीं नजर नहीं आ रहे..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 526 ⇒ डिक्टेशन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डिक्टेशन।)

?अभी अभी # 526 ⇒ डिक्टेशन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर इस अंग्रेजी शब्द का डिसेक्शन अथवा चीर फाड़ की जाए तो आप किसी को डिक्टेट भी कर सकते हैं। समझने वाले भले ही इसे तानाशाही समझें, लेकिन साधारण शब्दों में आप जैसा बोल रहे हैं, वैसा अगर सामने वाला लिखता जाए, तो यह डिक्टेशन हो जाए।

डिक्टेशन शब्द में आदेश देने की बू भी आती है। जब कि अगर प्रेम से बोला जाए, तो मैं बोलूं, तू लिखते जा, ही इस अंग्रेजी शब्द का हिंदी अर्थ होता है।।

आज तो हर बोला हुआ आसानी से रिकॉर्ड हो जाता है, वॉइस स्पीच विधा भी हमारे पास उपलब्ध है, मैं तब की बात कर रहा हूं, जब कक्षा में नोट्स लिखवाए जाते थे। बस उधर से आदेश होता था, चुपचाप बैठे मत रहो, कॉपी कलम निकालो, और जो हम बोल रहे हैं, उसे नोट करो। इट्स इंपॉर्टेंट।

डिक्टेशन हिंदी में भी हो सकता है और अंग्रेजी में भी। जिसे जो भाषा आती है, वह उसी में डिक्टेशन ले सकता है। यह संभव नहीं कि कोई अंग्रेजी में बोल रहा हैं, आपको अंग्रेजी नहीं आती, तो आप हिंदी, उर्दू, मराठी अथवा गुजराती में ही डिक्टेशन ले लो।।

जैसा बोला जाए, वैसा ही सुना जाए, समझा जाए, और लिखा जाए, यानी सुनो, समझो और नोट करो, यही डिक्टेशन का अर्थ हुआ। लेकिन इतनी कसरत क्यों, क्या डिक्टेशन के लिए क्या हिंदी में कोई शब्द नहीं है।

किसी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना अथवा मिलकर गीत गाना, जितना आसान है, उतना ही कठिन है, किसी के बोले हुए को उसी गति में लिखते जाना, शायद इसीलिए पिटमैन ने शॉर्ट हैंड यानी आशु लिपि का आविष्कार किया। कुछ कुछ उर्दू जैसी सांकेतिक भाषा में द्रुत गति में पहले लिखना और बाद में उसे टाइपिंग करना ही एक स्टेनोग्राफर का मुख्य दायित्व होता था।।

आज की तारीख में यह विधा तो छोड़िए, मोबाइल में गूगल आपको अनुवाद भी कर देगा, भाषा उसके लिए कोई समस्या नहीं। अनुवाद की समस्या पर एक जमाने में कई ग्रंथ लिखे गए हैं, लेकिन डिक्टेशन की समस्या का निदान कभी किसी ने नहीं सुझाया।

महाभारत महाकाव्य के लिपिबद्ध होने की कहानी भी बड़ी रोचक है। कुछ कुछ, जब तक आप बोलते जाओगे, मेरी कलम चलेगी, की तरह। इधर वेदव्यास जी महाराज रुके, और उधर गणेश जी का फाइनल फुल स्टॉप।।

हिंदी में डिक्टेशन लेने में शायद इतनी समस्या नहीं आती है, जितना अंग्रेजी में आती है। हां अगर बोलने वाले का ही अगर उच्चारण दोष है तो डिक्टेशन लेने वाले का नहीं दोष गुसाईं।

सबकी अंग्रजी इतनी अच्छी भी नहीं होती। जैसा सुनते हैं, समझते हैं, वैसा लिख लेते हैं। अगर कोई, I have to say को eye have two say लिख मारे तो आप अपना सर कहां दे मारेंगे।।

हमारे कॉलेज में अंग्रेजी की कक्षा में ऐसी कई कॉपियां मौजूद थीं, अगर उनको चेक किया जाए, क्या सुना, क्या, समझा, और क्या लिखा तो समझिए बस महाभारत शुरू हो जाए।

लव की स्पेलिंग luv भी हो सकती थी और मैरिज की mirage. Come here को come hear लिखने वाले भी कम नहीं थे। अगर किसी ने, I don’t know को, I don’t no लिख दिया, तो क्या आप उसे फांसी पर चढ़ा दोगे।

कुछ छात्र, जिनके लिए अंग्रेजी किसी ग्रीक और लैटिन भाषा से कम नहीं थी, वे निश्चिंत होकर कॉपी में कुछ कविता, शायरी अथवा चित्र बनाया करते थे। बाद में यही विधा उन्हें आगे काम आई, अंग्रेजी नहीं।

हम भले ही भाषा को भासा बोलें, लेकिन हमारे भाव शुद्ध हैं और हमें अपनी मातृ भाषा से बहुत प्रेम है। अगर कोई विदेशी भाषा हम पर जबरदस्ती थौंपी जाएगी, तो हम इसी तरह उसकी ऐसी तैसी, क्या कहते हैं उसे हिंदी में, Teeth for tat, यानी जैसे को तैसा करते ही रहेंगे।

Eye loves you. Thank you.

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 28 – आदर्शलोक का असली चेहरा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना अगला फर्जी बाबा कौन)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 28 – आदर्शलोक का असली चेहरा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

आदर्शलोक की कहानी आज से कुछ साल पहले की है। एक दिन, वहाँ के राजमहल के मुख्य दरवाज़े पर एक नोटिस टांगा गया – “नया राजा चुना जाएगा। जो भी राजा बनना चाहता है, उसे बिना झूठ बोले, बिना चोरी किए, और बिना रिश्वत लिए पाँच साल तक इस राज्य को चलाना होगा।”

लोगों ने पढ़ा और हँस दिए। क्योंकि यहाँ तो हर कोई जानता था कि बिना इन तीनों के कोई भी राजा बन ही नहीं सकता। खैर, एक दिन एक महात्मा जी आए, जिनका नाम था सत्यानंद। उन्होंने कहा, “मैं ये चुनौती स्वीकार करता हूँ। मुझे राजा बनाइए, और देखिए कैसे मैं आदर्शलोक को सच में आदर्श बनाऊँगा।”

सत्यानंद जी राजा बने। पहले ही दिन उन्होंने मंत्रियों की सभा बुलाई और कहा, “अब से कोई भी झूठ नहीं बोलेगा। सभी लोग सच्चाई के साथ चलेंगे।”

मंत्री हक्का-बक्का रह गए। “महाराज,” एक ने कहा, “झूठ तो हमारी सरकारी नीतियों का आधार है। अगर हम सच्चाई बोलने लगे तो जनता जान जाएगी कि हम कुछ काम नहीं करते। फिर तो हमें कुर्सी से हाथ धोना पड़ेगा।”

“तो धो लो,” सत्यानंद ने आदेश दिया।

अब झूठ बंद हो गया, और राज्य की सच्चाई सामने आ गई। किसान बोले, “हमारी फसलें सूख गई हैं, और सरकारी मदद कागजों में ही मिल रही है।” व्यापारी बोले, “टैक्स इतना ज्यादा है कि हमें चोरी करनी पड़ती है।” अफसर बोले, “हमारी तनख्वाह में भ्रष्टाचार शामिल है, बिना रिश्वत के हम गुजारा नहीं कर सकते।”

राज्य में हड़कंप मच गया। जनता सड़कों पर आ गई। सभी अपनी सच्चाई बयां करने लगे। सत्यानंद जी ने सोचा कि अब कुछ और सुधार करना चाहिए। उन्होंने आदेश दिया, “अब से कोई चोरी नहीं करेगा।”

मंत्रियों ने माथा पकड़ा, “महाराज, अगर चोरी बंद हो गई, तो हम क्या खाएँगे?”

“सचाई से पेट भरो,” सत्यानंद ने फिर आदेश दिया।

अब बिना चोरी के मंत्री और अफसर भूखे मरने लगे। उन्हें याद आने लगा कि पहले के राजा कितने समझदार थे, जो चोरी को अनकहा अधिकार मानते थे। एक मंत्री ने कहा, “महाराज, जनता तो खुश है, लेकिन हम क्या करें? हमारे घरों में चूल्हा तक नहीं जल रहा।”

सत्यानंद बोले, “भ्रष्टाचार भी बंद करना पड़ेगा।”

यह सुनते ही पूरे दरबार में चुप्पी छा गई। भ्रष्टाचार बंद! मंत्रियों की आत्माएँ काँप उठीं। एक ने हिम्मत जुटाकर कहा, “महाराज, अगर रिश्वत लेना बंद कर दिया, तो हम राजमहल तक पहुँचेंगे कैसे? हमारी गाड़ियाँ तो जनता के पैसों से चलती हैं।”

“पैदल चलो, स्वास्थ्य अच्छा रहेगा,” सत्यानंद ने हंसते हुए कहा।

अब मंत्री और अफसर पैदल चलने लगे। राज्य की सड़कों पर उन्हें देखकर लोग हँसते और कहते, “देखो, ये हैं हमारे राजा के सुधार।”

आखिरकार, पाँच साल बाद चुनाव का समय आया। सत्यानंद ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियाँ गिनाईं – “राज्य में सच्चाई है, कोई चोरी नहीं करता, और रिश्वतखोरी खत्म हो गई है।”

लेकिन जनता का धैर्य अब टूट चुका था। किसान, व्यापारी, मजदूर सब भूखों मर रहे थे। राजमहल के गेट पर भीड़ जमा हो गई और नारे लगे, “हमें हमारा पुराना राजा वापस चाहिए!”

सत्यानंद जी का आदर्शलोक अब स्वप्नलोक बन चुका था। लोग हंसते हुए बोले, “राजा का आदर्शवाद हमारे पेट नहीं भर सकता। हम मिलावटी दूध पीने वाले शुद्ध दूध खाक पचायेंगे?”

अगले चुनाव में एक नया राजा चुना गया। उसने आते ही घोषणा की, “मैं फिर से सबकुछ वैसे ही करूँगा, जैसा पहले था। झूठ, चोरी, और रिश्वत का राज वापस आएगा। और हम फिर से खुशहाल होंगे।”

आदर्शलोक वापस अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया। लोग खुश थे, मंत्री अमीर थे, और अफसर फिर से मोटी गाड़ियों में घूमने लगे।

और सत्यानंद? वह राज्य छोड़कर जंगल में ध्यान करने चले गए। कहते हैं, अब वो भी झूठ बोलते हैं कि “आदर्शलोक एक दिन आएगा।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # 47 ☆ व्यंग्य – “सेलेब्रिटी बनने के शॉर्टकट्स…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

 

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  सेलेब्रिटी बनने के शॉर्टकट्स…” ।)

☆ शेष कुशल # 47 ☆

☆ व्यंग्य – “सेलेब्रिटी बनने के शॉर्टकट्स…” – शांतिलाल जैन 

अगर आप सेलेब्रिटी बनने के शॉर्टकट्स खोज रहे हैं तो यह पेशकश खास आपके लिए है. ग्यारंटीड सक्सेज सिरीज़ में आज हम लाए हैं कुछ जाने-परखे उपाय…

पहला शॉर्टकट चमकदार, चिकने, रंगीन पन्नों से होकर गुजरता है. मीडिया तक पहुँचते हुए आपको कुछ बकवास करनी है. किसी मशहूर हस्ती की शान में गुस्ताखी कर देना है. खजुराहो की प्रतिमाओं टाईप के कुछ पोज देने हैं. देह पर से कपड़ों का बोझ कम करना है और मन से नैतिकता का. पद्मिनी कोल्हापुरे ने जो नज़ीर कायम की है उसे निभाते रहिए. जब आप किसी प्रिंस चार्ल्स को जबरन चूम रही होंगी, सफलता आपके कदम चूम रही होगी. अगर आप मर्द हैं तो भी राह बहुत अलग नहीं है. नायक खजुराहो के प्रस्तर खण्डों में ही नहीं उतरते जॉन अब्राहम सी देहयष्टि में भी उभरते हैं. बस एक बार सिक्स पैक एब में ढ़ली देह ‘जीक्यू इंडिया’ के कवर पेज पर आ जाए कि आप हुए फुलटू सेलेब्रिटी.

कुकुर झौं झौं कुत्तों में ही नहीं होती, सेलेब्रिटीज में भी होती है. डॉग-डॉगिनी की नॅशनल फाईट का मुज़ाहिरा बिग बॉस के घर से निकलता है तो हमारे आपके घरों के ड्राईंग रूम में उतरता है. कुकुर झौं झौं सेलेब्रिटी स्टेटस में सीमेंट लगाती है. तो नियमित अंतराल पर पिछली से अधिक गिरी हुई कोई हरकत कीजिए और अपने लिए दीवानगी का बढ़ता आलम देखिए. है ना बेहद आसान और शॉर्टकट भी.

एक शॉर्टकट सरकारी बैंक की तिज़ोरी के रास्ते से हो कर भी गुजरता है. फैन्स आपसे क्या चाहते हैं ? क्रूज़ की डेक पर मौज उड़ाते बालाओं संग आपका एक रंगीन कैलेण्डर. इनफ़. लोन का माल खुसा हो अंटी में तो पार्टी समंदर के अन्दर भी की जा सकती है और आकाश के ऊपर भी. पूरे पेज थ्री पर बस आप ही आप. पक्षी तो आप किंगफिशर प्रजाति के हैं ही, खतरा भाँपकर उड़ जाईए सात समंदर पार. फिरंगियों के देश में लेंडिंग के बाद आर्यावर्त की दिशा में पैर करके सोईएगा भी नहीं. सेलेब्रिटी आप वहाँ भी बने रहेंगे.

सेलेब्रिटी बनने का एक और शॉर्टकट अपराधी बन जाना भी है या फिर आप बाबाजी बन जाएँ. एक ही बात है. सुर्ख़ियों में बाहर भी, सुर्ख़ियों में अन्दर भी. दोनों में इंसान को बैकुंठ के लिए रवाना करने की क्षमता होती है. दोनों अपना अपना नेटवर्क जेल के अन्दर रह कर ऑपरेट करते हैं. इस मेथड में आप को छुरा लेकर खुद नहीं निकलना पड़ता, रिमोट से मरवा सकते हैं. जेल पूरब के देश में, वध पश्चिम के देश में, और सुर्खियाँ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में. या फिर परोल, फर्लो में कारा से मुक्ताकाश मंच तक कथा, दर्शन, आशीर्वाद और फिर कारा में लौट जाने की यात्रा करते रहिए. सुर्ख़ियों को आपका इंतज़ार रहता है.

शॉर्टकट एक और भी है मगर उसके लिए फादर का दी अमीरेस्ट होना जरूरी है. ब्याह में पप्पा के चार हज़ार करोड़ लगाकर मीडिया में महीनों दीवानगी पैदा की जा सकती है. शादी बेगानी अब्दुल्लाह बेशुमार. बहरहाल, आप हर दिन रंगीन तस्वीरों में पेज थ्री पर नमूदार हो सकते हैं. अखबार का हर पन्ना पेज थ्री. ये बात और है कि चलें तो बदन से चर्बी झरे और ज़ेब से मुद्राएँ. न काया संभाली जा रही हो न माया मगर इनायत कुबेर की हो तो सेलेब्रिटी बनते देर नहीं लगती. धन के देवता से बड़ी बड़ी सेलेब्रिटीज को अँगुलियों पर नचाने का वरदान पा जाते हैं आप. ‘ये चमक, ये दमक, फूलवन मा महक सब कुछ, सरकार, तुम्हई से है’ गाते-ठुमकते स्टार-स्टारनियाँ.  ठुमकता तो ताकतवर निज़ाम भी है, उसके सामने आपको गुनगुनाते रहना है – ‘मैं कहाँ जा कर सौदा बेचूँ? मेरा सब व्यापार तुम्हई से है.’ इसके बाद सब कुछ आसान है.

चलिए सेलेब्रिटी तो बन लिए आप. एक सावधानी रखिएगा, आपको कब, कहाँ और क्या नहीं बोलना है. कभी निज़ाम की ज्यादतियों पर किसी नामचीन को कुछ कहते सुना है आपने? किसान आंदोलन हो, पहलवानों का प्रदर्शन हो, श्रमिकों की छटनीं हो, बुलडोज़र का कहर हो, मॉब लिंचिंग हो, मणिपुर हो, अंडमान हो, बेरोज़गारी हो, महंगाई की मार हो, मुँह पर लगी ज़िप खोलिएगा नहीं. निवेश आपने सेलेब्रिटी बनने के लिए किया है संवेदनशील मुद्दों पर मुँह खोलकर डुबाने के लिए नहीं.

शीघ्र सेलेब्रिटी भवः||

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© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 264 ☆ व्यंग्य – राजनीति के रंगरूटों के लिए प्रशिक्षण योजना ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘राजनीति के रंगरूटों के लिए प्रशिक्षण योजना। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 264 ☆

☆ व्यंग्य ☆ राजनीति के रंगरूटों के लिए प्रशिक्षण योजना

होशियार सिंह ‘देशप्रेमी’ अपनी ज़िन्दगी में बहुत से धंधे कर चुके हैं। धन भी काफी कमाया है। अब उनका रुझान राजनीति में प्रवेश के इच्छुक लोगों के लिए एक ट्रेनिंग स्कूल खोलने की तरफ है। उनका कहना है कि लोग बिना राजनीति की तबियत और उसके लिए ज़रूरी खूबियों को समझे उसमें जगह बनाने की कोशिश करते हैं और इसीलिए सारी ज़िन्दगी एक ही जगह पांव पीटते रह जाते हैं। हासिल कुछ नहीं होता।

एक मुलाकात में होशियार सिंह ने अपनी योजना पर तफ़सील से प्रकाश डाला। बताया कि पॉलिटिक्स का बुनियादी उसूल यह है कि कोई उसूल नहीं होना चाहिए। पॉलिटिक्स में उसूल पालने का मतलब अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना। उसूल वाला आदमी पॉलिटिक्स में नाकारा और नालायक माना जाता है।  कोई उसे सीरियसली नहीं लेता, न कोई उसकी बातों को तरजीह देता है। इसलिए पॉलिटिक्स के प्रवेशार्थी को जल्दी से जल्दी उसूलों की बीमारी से मुक्त हो जाना चाहिए। ‘उसूल उतारे, भुइं धरे, तब पैठे (राजनीति के) घर माहिं।’

होशियार सिंह ने दूसरी बात बतायी कि पॉलिटिक्स के प्रवेशार्थी को रीढ़ झुकाने और पावरफुल लोगों के चरण छूने में कोताही नहीं करना चाहिए। सामने वाला भ्रष्ट है या बलात्कारी, चरण छूने  वाले से उम्र में छोटा है या बड़ा, ये सब बातें मायने नहीं रखतीं। प्रवेशार्थी का लक्ष्य अर्जुन की तरह सब कुछ भूल कर चिड़िया की आंख पर होना चाहिए।

उनके अनुसार राजनीति के आदमी को अपने चेहरे को ऐसा रखना सीखना होगा कि कोई उसके मन का भाव न पढ़ सके। राजनीतिज्ञ का जीवन बहता पानी होता है। आज इस पार्टी के किनारे हैं, कल दूसरी पार्टी के किनारे। मन के भाव और इरादे छिपाने के लिए राजनीतिज्ञ को ‘पोकर फेस्ड’ होना चाहिए, यानी उसे जुआड़ी की तरह अपने चेहरे को भावशून्य रखना सीखना चाहिए ताकि अन्य खिलाड़ी उसके हाथ के पत्तों का अन्दाज़ न कर सकें।

आगे होशियार जी ने बताया कि राजनीति में आदमी को ‘थिक स्किन्ड’ यानी कुछ मोटी चमड़ी का होना चाहिए। कई बार ऊपर के नेताओं या जनता के हाथों अपमानित होना पड़ता है, अर्श से फर्श पर उतरना पड़ता है, लेकिन राजनीतिज्ञ को अपमान को दिल पर नहीं लेना चाहिए। ‘कभी न छोडें खेत’ की नीति पर चलना चाहिए। खुद्दारी और आत्मसम्मान को उठाकर परे रख देना चाहिए।

होशियार जी ने यह भी बताया कि वे प्रवेशार्थियों की ट्रेनिंग के लिए कुछ नाट्य-कर्मियों को भी बुलाएंगे जो उन्हें ज़रूरत पड़ने पर तुरन्त आंसू बहाने और बिना लज्जा के जनता के सामने झूठे वादे करने का अभ्यास कराएंगे। वे विपक्षियों के सच को तत्काल झूठा साबित करने का भी  अभ्यास करेंगे।

एक और बात होशियार जी ने कृपापूर्वक बतायी कि पॉलिटिक्स में ‘वफादारी’ का रोग नहीं पालना चाहिए। पार्टी में रहो, लेकिन जब छोड़ना फायदे का सौदा लगे, एक  झटके में, बेदिली से छोड़ दो। फिर पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं। ऐसा ही पुराने दोस्तों के मामले में भी करना चाहिए।

होशियार जी के हिसाब से एक बहुत ज़रूरी बात यह है कि राजनीतिज्ञ जब भी कहीं मुंह खोले, अपनी पार्टी के सर्वोच्च नेता की तारीफ में कसीदे ज़रूर पढ़े। यह उसके पद की सुरक्षा का रामबाण नुस्खा है। कई लोग भाषण देने से पहले प्रभु की स्तुति में श्लोक पढ़ते हैं। राजनीतिज्ञ के लिए हाई कमांड ही प्रभु होती है, उसी के हाथ में राजनीतिज्ञ का कैरियर, उसकी  सुख-समृद्धि होती है। इसलिए ऊपर वालों (भगवान नहीं) से हमेशा सुर मिलाकर चलना चाहिए।

सावधानी  हटते ही दुर्घटना घटती है और आदमी संसद से सड़क पर आ जाता है। इसलिए राजनीतिज्ञ को चौबीस घंटे चौकन्ना और जागरूक रहना चाहिए।

भाई होशियार सिंह ने अन्त में बताया की कई प्रवेशार्थी ‘जागृत अन्तरात्मा सिंड्रोम’ नामक रोग से पीड़ित होते हैं। उनकी अन्तरात्मा में बीच-बीच में पीड़ा होती है। ऐसे लोगों की अन्तरात्मा को सुलाने और शान्त करने के लिए देश के बड़े ‘एनेस्थीसिया’ विशेषज्ञों की राय ली जा रही है।

मैंने होशियार सिंह को उनकी योजना की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं कि वे भावी राजनीतिज्ञों में ज़रूरी खूबियां पैदा करके देश का भविष्य उज्ज्वल बनाने के अपने मिशन में कामयाब हों। साथ ही उन्हें आगाह किया कि राजनीति के रंगरूटों को ट्रेनिंग देते वक्त वे यह कभी न भूलें कि हमें जल्दी से जल्दी विश्वगुरू का दर्ज़ा प्राप्त करना है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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