हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “आप बुलाओ तो सही… दिल  से !” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कविता – आप बुलाओ तो सही… दिल  से ! ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

इतना खाली भी

नहीं हूं दोस्तो

कि जब पुकारा चला आया

इतना व्यस्त भी नहीं

कि आपकी आवाज को

अनसुनी कर दूं !

बस ! आप बुलाओ तो सही

दिल  से !

बेरुखी बर्दाश्त नहीं

और प्यार की अनदेखी नहीं

इतनी सी बात है

और कुछ भी नहीं !

,,,,,,,,

इतना बड़ा भी नहीं

कि किसी के आगे झुक न सकूं

इतना छोटा भी नहीं

कि हर कोई मुझे झुका ले !

बस !

आपके प्यार के आगे

नतमस्तक हूं

और किसी के भी

अहंकार के आगे डटा हूं !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रत्यक शनिवार प्रस्तुत है  यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा)

? यात्रा संस्मरण – हम्पी-किष्किंधा यात्रा – भाग-७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

बस में बैठे, किष्किंधा कांड याद आ रहा है। यह वही क्षेत्र है, जहाँ तुलसीदास ने तारा को विकल देख

तारा बिकल देखि रघुराया।

दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥

श्रीराम से कहलाया है,

छिति जल पावक गगन समीरा।

पंच रचित अति अधम सरीरा

तारा को व्याकुल देखकर श्री रघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- इन पाँच तत्वों से यह अत्यंत अधम शरीर रचा गया है। शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिए रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान् के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया।

अब हम हम्पी के खंडहरों के नज़दीक पहुँचने लगे हैं। थोड़ा इतिहास समझ लें। उत्तर भारत से दक्षिण भारत का भूगोल अलग तरह का रहा है। जब उत्तर में सोलह महाजनपद के माध्यम से राज्य आकार लेने लगे थे। उस समय दक्षिण में चेर, चोल, पांड्यन, त्रावणकोर, कोचीन, ज़ामोरिन, कोलाथुनाडु, चालुक्य, पल्लव, सातवाहन, राष्ट्रकूट अस्तित्व में थे।

दक्षिण भारत में इस्लाम प्रवेश उपरांत ख़िलजी वंश का अंत हो गया। तब गयासुद्दीन ने तुग़लक़ वंश की नींव रखी। गयासुद्दीन तुगलक के शासनकाल में ही जूना खां जो बाद में मुहम्मद तुगलक (1325-1351) के नाम से सुल्तान बना, उसने दक्षिण भारतीय राज्य वारंगल पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। इस प्रकार वारंगल की स्वतंत्रता समाप्त हो गयी और वह दिल्ली सल्तनत का अंग बन गया।

मुहम्मद बिन तुगलक की विस्तारवादी नीति से  दक्षिण भारत का इतना भाग सल्तनत के आधिपत्य में आ गया कि उसमें और अधिक विस्तार करने की इच्छा स्वाभाविक रूप से जाग उठी। मुहम्मद तुगलक ने दक्षिण भारत के द्वासमुद्र, मावर तथा अनैगोडी राज्यों के विरुद्ध अभियान किए और इस प्रकार दक्षिण का पूरा पश्चिमी तट उसके अधिकार में आ गया। परन्तु वह जीत अस्थायी सिद्ध हुई। जल्द ही इस क्षेत्र में में भयंकर विद्रोह हुए और अंत में दक्षिण के सम्पूर्ण क्षेत्र दिल्ली सल्तनत से स्वतंत्र हो गये।

सरहिंदी के अनुसार मुहम्मद तुगलक के शासनकाल का प्रथम विद्रोह सुल्तान के चचेरे भाई बहाउद्दीन ने किया जो दक्षिण में उसका हाकिम था। इब्नबतूता के अनुसार गयासुद्दीन की मृत्यु के बाद बहाउद्दीन ने मुहम्मद तुगलक के प्रति स्वामि-भक्ति की शपथ लेने से इंकार कर दिया। किन्तु इसामी का कहना है कि मुहम्मद तुगलक ने उसे गुर्शप की उपाधि दी और उसे फिर दक्षिण भेजा। जहां उसने बड़ा यश प्राप्त किया।

इसके अतिरिक्त राजधानी से दूर एक सम्पन्न व धन-धान्य से परिपूर्ण सूबे का शासक होना एक महत्त्वाकांक्षी सैनिक के लिए स्वतंत्र होने का समुचित प्रलोभन है। गुर्शप ने युद्ध की पूरी तैयारी की, बहुत सा धन जमा किया और दक्षिण के शक्तिशाली सामंतों को अपनी ओर मिलाया पराजय की संभावना से उसने अपने परिवार की रक्षा के लिए कंपिली के हिन्दू राजा से मित्रता कर ली। उसने ख़ुदमुख़्त्यारी घोषित करके उसने निकटवर्ती सामंतों से भूमि कर वसूलना आरंभ कर दिया।

मुहम्मद तुग़लक़ ने सूचना पाते ही गुजरात के सूबेदार ख्वाजा-ए-जहाँ अहमद अय्याज को प्रस्थान के लिए आदेश दिया। गुर्शप ने तुरंत गोदावरी पार की और देवगिरि से पश्चिम की ओर बढ़ा। अय्याज ने देवगिरि पर कब्जा कर लिया। अंत में गुर्शप ने पराजित होकर कंपिली के हिन्दू शासक के यहां शरण ली। कंपिली एक छोटा सा राज्य था जिसमें आधुनिक रायचूर, धारवाड़ बेल्लारी (हम्पी) तथा इसके आसपास के क्षेत्र सम्मिलित थे। प्रारम्भ में कंपिली के राजा देवगिरि के यादवों के अधीन उनके मित्र थे।

तुग़लक़ ने कंपिली पर विरुद्ध तीन बार आक्रमण किए। प्रथम आक्रमण में मुस्लिम सेना को पराजित होकर भागना पड़ा और कंपिली की सेना को अत्यधिक लूट का माल प्राप्त हुआ। सुल्तान की सैनिक पराजय से उसके गौरव को क्षति पहुंची और पहली बार हिन्दू जनता का यह भय समाप्त हो गया कि मुस्लिम सेना अजेय है। यह विदित हो गया कि दक्षिण के हिन्दू काफी शक्तिशाली है जिनको दबाना इतना सरल नहीं है। कंपिली के राजा ने भी राज्य की रक्षा की पूर्ण तैयारियाँ की और हुसदुर्ग तथा कूमर के किलों को पूरी तरह युद्ध सामग्री से भर दिया। दूसरी  बार भी मुस्लिम् सेना कुतुबुल्मुल्क के साथ जान बचाकर भाग गयी।

इसके बाद सुल्तान ने अपने विश्वसनीय मित्र मलिकजादा, ख्वाजा-ए-जहान की अध्यक्षता में विशाल सेना कंपिली राज्य के विरूद्ध भेजी। कंपिली के राजा ने एक महीने तक शत्रु का डटकर सामना किया। परन्तु जब बचने की कोई स्थिति न रही तो गुर्शप को द्वारसमुद्र के राजा बल्लाल तृतीय की रक्षा में परिवार सहित भिजवा दिया और शत्रु से अंतिम युद्ध करने का संकल्प किया गया। उसने जौहर सम्पन्न किया और अपनी समस्त सम्पत्ति, स्त्रियां और पुत्रियां अग्नि में भस्म कर दीं। स्वयं शस्त्र धारण करके शत्रु पर टूट पड़ा। कंपिली नरेश ने भयंकर युद्ध के बाद रणक्षेत्र में ही वीरगति प्राप्त की। मुहम्मद तुग़लक़ सेना का किले पर अधिकार हो गया।

दूसरी तरफ़ बल्लाल ने मलिक के आक्रमण के बाद थोड़े समय में सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ की प्रभुसत्ता से विद्रोह कर वार्षिक कर भेजना बंद कर दिया और इसी अवधि में कंपिली के राज्य को भी जीतने का विचार किया। उसकी तीव्र इच्छा थी कि होयसल राज्य का भाग जो सुदूर दक्षिण के पांड्य राजाओं के अधिकार में है, वापस ले लिया जाए। इसी उद्देश्य से 1316 ई. में पांड्य राजाओं से युद्ध आरम्भ किया। जब वह इस प्रकार आसपास के राजाओं के साथ युद्ध में व्यस्त था। इसी बीच मोहम्मद तुगलक की सेना ने द्वारसमुद्र की सेना पर आक्रमण कर दिया। मुहम्मद तुग़लक़ ने दक्षिण में देवगिरि को दौलताबाद का नाम देकर राजधानी बना लिया। इसे दक्षिण में एक प्रभावशाली प्रशासन केन्द्र स्थापित करने का प्रयास कहा जा सकता है। प्रो. हबीब के अनुसार “मुहम्मद तुगलक अपने किसी भी समकालीन से अधिक दक्षिण को जानता था।” उसका दक्षिणी प्रयोग एक विशेष सफलता थी। यद्यपि उत्तर को दक्षिण से विभाजित करने वाले अवरोध टूट गए थे तथापि दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक शक्ति दक्षिण में प्रसार में सफल सिद्ध नहीं हुई।

हम्पी विश्व विरासत क्यों है। इसे समझने हेतु हमें दक्षिण भारत की संक्षिप्त इतिहास को देखना आवश्यक है कि किस तरह धार्मिक उन्माद ने एक फलती फूलती सभ्यता को नेस्तनाबूद करने का पाप किया लेकिन फिर भी उसके अवशेष आज उन आततायियों के जुल्मों की कहानी कहते खड़े हैं। हम्पी के पचास किलोमीटर वर्गकिलोमीटर ने बिखरे क़िला, महल, मकान, दुकान, बाज़ार, बावड़ी, मंदिर और मूर्तियों के खंडित अवशेष गौरवशाली हिंदू सभ्यता की कहानी कहते खड़े हैं।

मुहम्मद तुगलक ने दक्षिण प्रदेशों की पांच प्रांतों में विभक्त कर दिया। (1) देवगिरि, (2) तेलंगाना, (3) माबर, (4) द्वारसमुद्र और (5) कंपिली। दिल्ली साम्राज्य के इन दक्षिण प्रदेशों में विंध्य पर्वत के दक्षिण से लगभग मदुरा तक की समस्त भूमि सम्मिलित थी। तेलंगाना को अनेक भागों में विभक्त करके उनके लिए अलग-अलग सूबेदार नियुक्त कर दिए गए। धीरे-धीरे इन हाकिमों ने स्थानीय हिन्दू राजाओं से संपर्क स्थापित करके अपना प्रभाव बढ़ाने की चेष्टा की। दक्षिण की दूरी दिल्ली से इतनी अधिक थी कि सुल्तान इच्छा रखते हुए भी दक्षिणी प्रांतों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख सकता था इसलिए दक्षिण के प्रांतपति अधिक स्वतंत्र रहे। दक्षिण के हाकिमों एवं स्थानीय हिन्दू शासकों के हृदय में सुल्तान के प्रति स्वाभाविक आज्ञाकारिता की भावना बहुत कम थी। अतः तुर्की सरदार स्वतंत्र शासक होने का स्वप्न देखा करते थे। केवल सुविधा और स्वार्थ का ध्यान रखकर ही वे अपनी राजभक्ति की मात्रा स्थिर करते थे। राजधानी परिवर्तन के पीछे यह भी एक महत्वपूर्ण कारण था। दुर्भाग्यवश सुल्तान अपनी नई राजधानी में उत्तरी भारत के विद्रोहों और अकालों के कारण अधिक समय तक नहीं टिक सका। दक्षिण के हिन्दू राजा अपने वंश तथा धर्म के अभिमान को भूले नहीं थे तथा अपनी स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए सदा अवसर की तलाश में रहा करते थे। यही कारण है कि दक्षिण समस्या का समाधान उचित ढंग से नहीं हो पाया और कालांतर में  कम्पिली स्वतंत्र हो गया।

अंत में मुहम्मद बिन तुगलक ने दक्षिण में साम्राज्य विस्तार के उद्येश्य से कम्पिली पर फिर आक्रमण कर दिया और कम्पिली के दो काबिल मंत्रियों हरिहर तथा बुक्का को बंदी बनाकर दिल्ली ले आया। इन दोनों भाइयों द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद इन्हें दक्षिण विजय के लिए भेजा गया। माना जाता है वे दोनों विद्यारण्य नामक सन्त के प्रभाव में आकर पुनः हिन्दू धर्म को अपना लिया। इस तरह हरिहर तथा बुक्का मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में ही भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कर दी। उसी विजयनगर की समृद्ध राजधानी के खंडहर हम्पी में हैं। विजयनगर की विरासत पर ही अठारहवीं सदी में शिवाजी ने हिन्द स्वराज की स्थापना की थी। हम्पी के विनाश तक पहुँचने हेतु बहमनी साम्राज्य की उत्पत्ति और विनाश से उपजे पाँच मुस्लिम राज्यों गोलकोण्डा, बीजापुर, बीदर, बिरार और अहमदनगर की कहानी भी समझनी होगी।

क्रमशः… 

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 141 ☆ मुक्तक – ।नूतन नवीन वर्ष संदेश देता कुछ नया करने का। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # 141 ☆

☆ मुक्तक – ।नूतन नवीन वर्ष संदेश देता कुछ नया करने का। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

किसी की हार   किसी की  जीत है।

कुछ दोस्तों की  जगह  नए मीत है।।

नई बात नया अंदाज  नए  साल में।

भरो मन प्रेम से जो रहा बिन प्रीत है।।

=2=

नववर्ष खत्म न हो ये  जीवन गीत है।

प्रेम की धुन ही तो   जीवन संगीत है।।

नव संकल्प आगाज  हो नए साल में।

चलना साथ समय के ही सही रीत है।।

=3=

अतीत नहीं भविष्य दर्पण  नया साल।

नए विचारों नव उत्साह  सा विशाल ।।

जीवन दिया एकऔर मौका नए साल सा।

नव वर्ष में सोचना है कुछ नए ख्याल।।

=4=

उम्र का वर्ष कम  नहीं  अनुभव बढ़ा है।

उत्साह का  पैमाना और  ऊपर चढ़ा है।।

नया साल पैगाम देता कुछ नया करने का।

वो जीता मुश्किलों सामने रहता खड़ा है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 207 ☆ कविता – क्यों है ?… ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – क्यों है । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # 207 ☆ कविता – क्यों है ? ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

जब जानते हैं, सब यह है चार दिन का जीवन

तब साथ-संग रहते भी द्वेष भाव क्यों है ?

 *

हिलमिल के साथ रहने में सबको मिलती खुशियाँ

तो रिश्तेदारों से भी मन में दुराव क्यों है ?

 *

सद्‌भाव ही हवा में खिलते हैं फूल मन के

तब दूरियाँ बढाते  मन‌ मुटाव क्यों है?

 *

खुद अपना मन जलाते औरों को भी दुखाते

अनुचित तथा अकारण टकराव भाव क्यों है?

 *

दुनियाँ समझ न आती बाहर दिखाव होते भी

नाखुरा बने रहने का कुछ का स्वभाव क्यों है

 *

जब अपने अपने  घर में, खुशहाल हैं सभी तब

 मन में खिंचाव क्यों है अनुचित तनाव क्यों है?

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #261 ☆ क्या प्रॉब्लम है? ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख क्या प्रॉब्लम है?। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 261 ☆

☆ क्या प्रॉब्लम है? ☆

‘क्या प्रॉब्लम है’… जी हां! यह वह शाश्वत् प्रश्न है, जो अक्सर पूछा जाता है छोटों से; बराबर वालों से– परंतु आजकल तो ज़माना बदल गया है। अक्सर हर उम्र के लोग इन प्रश्नों के दायरे में आते हैं और हमारे बुज़ुर्ग माता-पिता तथा अन्य परिवारजन– सभी को स्पष्टीकरण देना पड़ता है। सोचिए! यदि रिश्ते में आपसे बहुत छोटी महिला यह प्रश्न पूछे, तो क्या आप सकते में नहीं आ जाएंगे? क्या होगी आपकी मन:स्थिति… जिसकी अपेक्षा आप उससे कर ही नहीं सकते। वह अनकही दास्तान आपकी तब समझ में तुरंत आ जाती है, जब चंद लम्हों बाद आपका अहं/ अस्तित्व पलभर में कांच के आईने की भांति चकनाचूर हो जाता है और उसके असंख्य टुकड़े आपको मुंह चिढ़ाते-से नज़र आते हैं। दूसरे शब्दों में आपको हक़ीक़त समझ में आ जाती है और आप तत्क्षण अचंभित रह जाते हैं यह जानकर कि कितनी कड़वाहट भरी हुई है सोमा के मन में– जब आपको मुजरिम की भांति कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और इल्ज़ामों की एक लंबी फेहरिस्त आपके हाथों में थमा दी जाती है। वह सोमा, जो आपको मान-सम्मान देती थी; सदैव आपकी तारीफ़ करती थी; जिसने इतने वर्ष एक छत के नीचे गुज़ारने के पश्चात् भी पलट कर कभी जवाब नहीं दिया था। वह तो सदैव परमात्मा का शुक्र अदा करती थी कि उसने उन्हें पुत्रवधु नहीं, बड़ी शालीन बेटी दी थी। परंतु जब विश्वास टूटता है; रिश्ते सहसा दरक़ते हैं तो बहुत तकलीफ़ होती है। हृदय कुलबुला उठता है, जैसे अनगिनत कीड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हों और वह प्रश्नों के भंवर से चाह कर भी ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाती।

‘आपको क्या प्रॉब्लम है?’ यदि बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ एकांत में समय गुज़ारना चाहते हैं; खाने के लिए नीचे नहीं आते तो…परंतु हम सबके लिए यह बंधन क्यों? वह वर्षों से अपने कौन-से दायित्व का वहन नहीं कर रही? आपके मेहमानों के आने पर क्या वह उनकी आवभगत में वह कमी रखती है, जबकि वे कितने-कितने दिन तक यहाँ डेरा डाले रहते हैं? क्या उसने कभी आपका तिरस्कार किया है? आखिर आप लोग चाहते क्या हैं? क्या वह इस घर से चली जाए अपने बच्चों को लेकर और आपका बेटा वह सब अनचाहा करता रहे? हैरान हूं यह देखकर कि उसे दूध का धुला समझ उसके बारे में अब भी अनेक कसीदे गढ़े जाते हैं।

वह अपराधिनी-सम करबद्ध प्रार्थना करती रही थी कि उसने ग़लती की है और वह मुजरिम है, क्योंकि उसने बच्चों को खाने के लिए नीचे आने को कहा है। वह सौगंध लेती है कि  भविष्य में वह उसके बच्चों से न कोई संबंध रखेगी; न ही किसी से कोई अपेक्षा रखेगी। तुम मस्त रहो अपनी दुनिया में… तुम्हारा घर है। हमारा क्या है, चंद दिन के मेहमान हैं। वह क्षमा-याचना कर रही थी और सोमा एक पुलिस अफसर की भांति उस पर प्रश्नों की बौछार कर रही थी।

जब जिह्वा साथ नहीं देती, वाणी मूक हो जाती है तो अजस्र आंसुओं का सैलाब बह निकलता है और इंसान किंकर्त्तव्य- विमूढ़ स्थिति में कोई भी निर्णय नहीं ले पाता। उस स्थिति में उसके मन में केवल एक ही इच्छा होती है कि ‘आ! बसा लें अपना अलग आशियां… जहां स्वतंत्रता हो; मानसिक प्रदूषण न हो; ‘क्या और क्यों’ के प्रश्न उन पर न दाग़े जाएं और वे उन्मुक्त भाव से सुक़ून से अपनी ज़िंदगी बसर कर सकें। इन परिस्थितियों में इंसान सीधा आकाश से अर्श से फ़र्श पर आन पड़ता है; जब उसे मालूम होता है कि इस करिश्में की सूत्रधार हैं कामवाली बाईएं–जो बहुत चतुर, चालाक व चालबाज़ होती हैं। वे मालिक-मालकिन को बख़ूबी रिझाना जानती हैं और बच्चों को वे मीठी-मीठी बातों से खूब बहलाती हैं। परंतु घर के बुज़ुर्गों व अन्य लोगों से लट्ठमार अंदाज़ से बात करती हैं, जैसे वे मुजरिम हों। इस संदर्भ में दो प्रश्न उठते हैं मन में कि वे उन्हें घर से निकालना चाहती हैं या घर की मालकिन उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहती है? छुरी हमेशा खरबूज़े पर ही पड़ती है, चाहे किसी ओर से पड़े और बलि का बकरा भी सदैव घर के बुज़ुर्गों को ही बनना पड़ता है।

वैसे आजकल तो बाईएं ऐसे घरों में काम करने को तैयार भी नहीं होती, जहां परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य लोग भी रहते हों। परिवार की परिभाषा वे अच्छी तरह से जानती हैं… हम दो और हमारे दो, क्योंकि आजकल पति-पत्नी दोनों अक्सर नौकरी करते हैं। उनके घर से जाने के पश्चात् वे दिनभर अलग-अलग पोशाकों में सज-संवर कर स्वयं को आईने में निहारती हैं। यदि बच्चे छोटे हों, तो सोने पर सुहागा… उन्हें डाँट-डपट कर या नशीली दवा देकर सुला दिया जाता है और वे स्वतंत्र होती हैं मनचाहा करने के लिए। फिर वे क्यों चाहेंगी कि कोई कबाब में हड्डी बन कर वहां रहे और उनकी दिनचर्या में हस्तक्षेप करे? इस प्रकार उनकी आज़ादी में खलल पड़ता है। इसलिए भी वे बड़े बुज़ुर्गों से खफ़ा रहती हैं। इतना ही नहीं, वे उनसे दुर्व्यवहार भी करती हैं, जैसे मालिक नौकर के साथ करता है। जब उन्हें इससे भी उन्हें संतोष नहीं होता; वे अकारण इल्ज़ाम लगाकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर देती है और घर की मालकिन को तो हर कीमत पर उनकी दरक़ार रहती है, क्योंकि बाई के न रहने पर घर में मातम-सा पसर जाता है। उस दारुण स्थिति में घर की मालकिन भूखी शेरनी की भांति घर के बुज़ुर्गों पर झपट पड़ती है, जो अपनी अस्मत को ताक़ पर रख कर वहां रहते हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबीपन का एहसास उन्हें नासूर-सम हर पल सालता रहता है। उस घर का हर प्राणी नदी के द्वीप की भांति अपना-अपना जीवन ढोता है। वे अपने आत्मजों के साथ नदी के दो किनारों की भांति कभी मिल नहीं सकते। वे उनकी जली-कटी सहन करने को बाध्य होते हैं और सब कुछ देखकर आंखें मूँदना उनकी नियति बन जाती है। वे हर पल व्यंग्य-बाणों के प्रहार सहते हुए अपने दिन काटने को विवश होते हैं। उनकी यातना अंतहीन होती है, क्योंकि वहाँ पसरा सन्नाटा उनके अंतर्मन को झिंझोड़ता व कचोटता है। दिनभर उनसे बतियाने वाला कोई नहीं होता। वे बंद दरवाज़े व शून्य छतों को निहारते रहते हैं। बच्चे भी उन अभागों की ओर रुख नहीं करते और वे अपने माता-पिता से अधिक स्नेह नैनी व कामवाली बाई से करते हैं। 

‘हाँ! प्रॉब्लम क्या है’ ये शब्द बार-बार उनके मनोमस्तिष्क पर हथौड़े की भांति का प्रहार करते हैं और वे हर पल स्वयं को अपराधी की भांति दयनीय दशा में पाते हैं। परंतु वे आजीवन इस तथ्य से अवगत नहीं हो पाते कि उन्हें किस जुर्म की सज़ा दी जा रही है? उनकी दशा तो उस नारी की भांति होती है, जिसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है; जो उसने किया ही नहीं। उन्हें तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान ही नहीं किया जाता। कई बार ‘क्यों का मतलब’ शब्द उन्हें हांट करते हैं अर्थात् बाई का ऐसा उत्तर देना…क्या कहेंगे आप? सो! उनकी मन:स्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। सो! चिंतन-मनन कीजिए कि आगामी पीढ़ी का भविष्य क्या होगा?

वैसे इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है, क्योंकि जैसा वह करता है, वही लौटकर उसके पास आता है। लोग चिंतित रहते हैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में और यह सोचकर वे हैरान-परेशान रहते हैं। आइए! यह समझने का प्रयास करें कि प्रॉब्लम क्या है और क्यों है? शायद! प्रॉब्लम आप स्वयं हैं और आपके लिए उस स्थान को त्याग देना ही उस भीषण समस्या का समाधान है। सो! मोह-ममता को त्याग कर अपनी राह पर चल दीजिए और उनके सुक़ून में ख़लल मत डालिए। ‘जीओ और जीने दो’, की अवधारणा पर विश्वास रखते हुए दूसरों को भी अमनोचैन की ज़िंदगी बसर करने का अवसर प्रदान कीजिए। उस स्थिति में आप निश्चिंत होकर जी सकेंगे और ‘क्या-क्यों’ की चिंता स्वत: समाप्त हो जाएगी। फलत: इस दिशा में न चिंता होगी; न ही चिंतन की आवश्यकता होगी। 

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # 6 – हास्ययोग : एक विस्मयकारी जादू The Transformative Power of Laughter Yoga ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।

– श्री जगत सिंह बिष्ट 

(ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से “दस्तावेज़” श्रृंखला कुछ पुरानी अमूल्य यादें सहेजने का प्रयास है। दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित। इस शृंखला में अगला दस्तावेज़  “हास्ययोग : एक विस्मयकारी जादू The Transformative Power of Laughter Yoga।)

☆  दस्तावेज़ # 6 – हास्ययोग : एक विस्मयकारी जादू  ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

क्या आपको मालूम है कि निर्मल हंसी में एक खुशहाल, स्वस्थ और सौहाद्रमय जीवन की कुंजी छुपी हुई  है? लाफ्टर योग़ा (हास्ययोग) के साथ मेरी यात्रा, इस जिज्ञासा के साथ शुरू हुई और मेरे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन आ गया। इसके फलस्वरूप, मेरा और मेरे माध्यम से, जाने कितने अन्य लोगों का जीवन आनंद से भर गया!

डॉ. मदन कटारिया की परिकल्पना “लाफ्टर योग़ा” एक ऐसा अभ्यास है जो  हँसी को योग के साथ जोड़ता है। इससे प्रतिभागियों को बिना किसी कारण के हँसने में सक्षम बनाया जाता है। एक सचेत प्रयास के रूप में शुरू होकर, यह जल्द ही वास्तविक, हार्दिक और गहरी हँसी में परिवर्तित हो जाता है.  इससे शरीर ‘एंडोर्फिन’ से  लबालब हो जाता है और मन आनंदित हो उठता है। यह एक ऐसा सरल लेकिन गहन अभ्यास था जिसने मुझे और मेरी पत्नी राधिका को इसके जादू को फैलाने के लिए समर्पित कर दिया।

हास्ययोग – एक मिशन :

हमारी यात्रा इंदौर में विनम्रतापूर्वक शुरू हुई, जहां हमने एक सामुदायिक लाफ्टर क्लब की स्थापना की। यह प्रयास जल्दी ही खुशी और मेलजोल का केंद्र-बिंदु बन गया, जो जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों को आकर्षित करता है। हंसी के परिवर्तनकारी प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से देखते हुए, हमने अपने सत्रों को स्कूलों, कॉर्पोरेट वातावरण और यहां तक कि वंचित समुदायों तक विस्तारित करने की पहल की।

श्री शारदा रामकृष्ण विद्या मंदिर में, एक विशेष रूप से यादगार सत्र में, हमने शैक्षणिक तनाव से जूझ रही छात्रों को हास्ययोग का अमूल्य उपहार दिया।  इसका प्रभाव तत्काल और असाधारण था. मुस्कुराहट ने उनके तनावपूर्ण भावों को बदल दिया, और उनके उत्साह से कक्षा में ऊर्जा का संचार हुआ। शिक्षकों ने अभ्यास की सुगमता और प्रभावशीलता पर आश्चर्य व्यक्त किया जिसने बच्चों को एक नई ऊर्जा दी और उनका ध्यान पढाई पर केन्द्रित होने में सहायता मिली।

हास्ययोग से मेरे अपने जीवन में भी गहरा बदलाव आया। इसने मुझे गहरे, अधिक प्रामाणिक, स्तर पर लोगों से जुड़ना सिखाया। मेरी बातचीत और मेरा व्यवहार गर्मजोशी और आपसी सम्मान से ओतप्रोत हो गया। इस अभ्यास ने, न केवल मेरे अपने तनाव को कम किया, बल्कि जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाने  के लिए एक नई भावना को भी प्रेरित किया –  दूसरों के जीवन में खुशी भरने की भावना।

व्यापक  प्रभाव:

इन वर्षों में, हमारे हास्य योग सत्र विभिन्न समूहों तक पहुंचे हैं, गांवों के स्कूली बच्चों से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम में वरिष्ठ अधिकारियों तक। हमारे सबसे सुखद अनुभवों में से एक विशेष जरूरतों वाले बच्चों के साथ काम करना था। उनकी बेहिचक खुशी और हँसी को गले लगाने की इच्छा ने इस अभ्यास की असीम क्षमता की पुष्टि की।

लाफ्टर योगा के माध्यम से,  विश्व स्तर पर लोगों से जुड़ने के लिए मैं भाग्यशाली रहा हूं। ऋषिकेश में अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों को प्रशिक्षित करने से लेकर भारतीय स्टेट बैंक और नेस्ले में सत्र आयोजित करने तक, हर सत्र ने हंसी की सार्वभौमिकता में मेरे विश्वास को मजबूत किया। यह भाषा और संस्कृति से परे है, ऐसे बंधन बनाता है जो उतने ही स्थायी होते हैं जितने कि वे आनंद से परिपूर्ण होते हैं।

एक दिव्य अस्त्र :

हास्य योग ने मुझे सिखाया है कि खुशी सिर्फ एक व्यक्तिगत खोज नहीं है – यह साझा करने के लिए एक उपहार है। इस अभ्यास ने मुझे दूसरों में, विशेष रूप से युवा पीढ़ी और जरूरतमंद लोगों में सकारात्मकता को प्रेरित करने के लिए सशक्त बनाया है। इसने पारस्परिक कौशल को बढ़ाया है, रचनात्मकता को बढ़ावा दिया है, और अनगिनत जीवन को बदल दिया है, जिसमें मेरा अपना भी शामिल है।

मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे बेटे ने एक बार मुझसे कहा था, “पापा, आपके पास दूसरों को खुशी देने का एक दिव्य अस्त्र है।“ यह वाक्य मेरे लिए प्रेरणाश्रोत बन गया। यह भावना उस सार को पकड़ती है जो लाफ्टर योगा ने मुझे दिया है – खुशी बांटने का मिशन और आनंद की विरासत।

हास्ययोग आन्दोलन :

हास्य योग एक व्यायाम से कहीं अधिक है – यह जीवन जीने की एक कला है,  एक उत्सव है। यह हमें अपने भीतर बच्चों की मस्ती को फिर से खोजने, अपनी चिंताओं को दूर करने और एक दूसरे के साथ गहराई से जुड़ने के लिए आमंत्रित करता है।

हम एक साथ हंसते हैं तो उत्साह और उमंग का अनुभव करते हैं।  इस साझा आनंद में एक उज्जवल, करूणामय संसार की आकांक्षा निहित है। क्या आप  हास्ययोग के इस पुनीत आंदोलन में शामिल होकर हंसते-हंसते ज़िन्दगी बिताना चाहेंगे?

– जगत सिंह बिष्ट

लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर

☆ The Transformative Power of Laughter Yoga 

Have you ever wondered if a simple act of laughter could hold the key to a happier, healthier, and more connected life? My journey with Laughter Yoga began with this curiosity and unfolded into a life-transforming mission, bringing joy to myself and countless others.

Laughter Yoga, pioneered by Dr Madan Kataria, is a practice that combines intentional laughter with yogic breathing, enabling participants to laugh for no reason. What begins as a conscious act soon evolves into genuine, hearty laughter, flooding the body with endorphins and uplifting the spirit. It was this simple yet profound practice that drew my wife Radhika and me to dedicate ourselves to spreading its magic.

A Mission Rooted in Laughter:

Our journey started humbly in Indore, where we founded a community laughter club. This endeavour quickly blossomed into a hub of joy and connection, attracting people from all walks of life. Witnessing the transformative effects of laughter firsthand, we took the initiative to extend our sessions to schools, corporate environments, and even underprivileged communities.

In a particularly memorable session at Sri Sarada Ramakrishna Vidya Mandir, we introduced Laughter Yoga to students struggling with academic stress. The impact was immediate and extraordinary: smiles replaced their strained expressions, and their enthusiasm lit up the room. Teachers marvelled at the simplicity and effectiveness of the practice, which fostered a newfound energy and focus in the children.

Laughter Yoga also brought a profound change to my own life. It taught me to connect with people on a deeper, more authentic level. My interactions shifted from functional to personal, filled with warmth and mutual respect. This practice not only reduced my own stress but also inspired a renewed sense of purpose: to bring happiness to others.

Touching Lives Far and Wide:

Over the years, our laughter sessions have reached diverse groups, from schoolchildren in rural villages to senior executives in corporate boardrooms. One of our most heartening experiences was working with special needs children. Their uninhibited joy and willingness to embrace laughter reaffirmed the boundless potential of this practice to heal and uplift.

Through Laughter Yoga, I’ve been fortunate to connect with people globally. From training international participants in Rishikesh to conducting sessions at the State Bank of India and Nestlé, every session strengthened my belief in the universality of laughter. It transcends language and culture, creating bonds that are as enduring as they are joyful.

The Ripple Effect:

Laughter Yoga has taught me that happiness is not just an individual pursuit—it is a gift to be shared. The practice has empowered me to inspire positivity in others, especially the younger generation and those in need. It has enhanced interpersonal skills, fostered creativity, and transformed countless lives, including my own.

The compliment I hold closest to my heart came from my son, who once said, “Papa, you have the heavenly gift of bringing joy to others. It’s truly inspiring.” This sentiment captures the essence of what Laughter Yoga has given me: a mission to spread happiness and a legacy of joy.

A Call to Laugh:

Laughter Yoga is more than an exercise—it is a way of life, a celebration of the human spirit. It invites us to rediscover the childlike playfulness within, to let go of our worries, and to connect with one another in profound ways.

As we laugh together, we heal together. And in that shared joy lies the promise of a brighter, more compassionate world.

Will you join the movement and laugh your way to happiness?

♥♥♥♥

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email [email protected] if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #34 – गीत – कैसे पारावार लिखूँ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतगीत – कैसे पारावार लिखूँ

? रचना संसार # 34 – गीत – कैसे पारावार लिखूँ…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

 भावों की सूखी निर्झरिणी।

कैसे पारावार लिखूँ।

रंग बदलती इस दुनिया का,

कैसे जीवन सार लिखूँ।।

अवसर वादी मनुज हुआ है,

कलुषित विचार धारा है।

भेदभाव की कुटिल चाल से ,

प्रेम -भाव भी हारा है।।

मानवता पीड़ित घातों से,

भूले प्रभु उपकार लिखूँ।

*

भावों की सूखी निर्झरणी,

कैसे पारावार लिखूँ।।

 **

शोषित दैन्य दशा दीनों की,

है निराश तरुणाई भी।

पश्चिम की इस चकाचौंध में,

रोती है अरुणाई भी।।

व्याकुल है ये कवि मन मेरा,

क्या विरही शृंगार लिखूँ।

 *

भावों की सूखी निर्झरणी,

कैसे पारावार लिखूँ।।

 **

साये में बन्दूकों के अब

देख जिन्दगी पलती है।

खंडित प्रीति विकल मन विचलित

अँगड़ाई भी खलती है।

पथराई आँखे जन जन की ,

जलते हैं अंगार लिखूँ।

 *

भावों की सूखी निर्झरणी,

कैसे पारावार लिखूँ।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- [email protected], [email protected]

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #261 ☆ भावना के दोहे – नववर्ष ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं भावना के दोहे – नववर्ष )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 261 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नववर्ष ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कहते हैं हम अलविदा, जाने वाला साल।

मीठी यादें हैं बहुत, रखना इसे सम्भाल।।

*

अंतर कुछ भी है नहीं, मन में यही सवाल।

दिवस-रात चलते रहें, तभी बदलता साल।।

*

चन्दा-सूरज हैं वही, नहीं बदलती चाल।

दिवस-महीने बोलते, सज्जित होता साल।।

*

 कैलेंडर बदलाव से, कहाँ बदलते हाल।

बदलो अपनी सोच को, रहता यही सवाल।।

*

खुशियों की है पोटली, लेकर आया वर्ष।

बाँट रहा मुस्कान यों, दिल में छाया हर्ष।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #243 ☆ अब शहर में अखबार बहुत हैं… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी रचना  अब शहर में अखबार बहुत हैं आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

 ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 243 ☆

☆ कविता – अब शहर में अखबार बहुत हैं… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

खबरों   के   कारोबार   बहुत  हैं

अब  शहर में  अखबार  बहुत  हैं

होता है पढ़ कर मन भी विचलित

हिंसा , लूट,  बलात्कार   बहुत  हैं

*

खबरी   चैनलों   की   भरमार   है

खबरें   कैद    होती   बेशुमार   हैं

पर दिखती वह हैं जिन पर उनको

मिलता जिनसे माफिक इश्तहार है

*

रद्दी    चौकी    का   चौराहा

जो भी निकला वही  कराहा

बाएं मोड़ भी  गायब दिखते

चलते तब जिसने जब चाहा

*

लाल    बत्ती   ताकती   रहती

नियम यह कितनों ने निभाया

कुछ  केमरे  देख  कर  चलते

जिसने चालान  घर  पहुंचाया

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्रीमद्‌भगवद्‌गीता — अध्याय १८ — मोक्षसंन्यासयोगः — (श्लोक १ ते १0) – मराठी भावानुवाद ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्रीमद्‌भगवद्‌गीता — अध्याय १८ — मोक्षसंन्यासयोगः — (श्लोक १ ते १0) – मराठी भावानुवाद ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

श्रीमद्‌भगवद्‌गीता : शेवटचा अध्याय : १८ : मोक्षसंन्यासयोग 

श्रीमद्भगवद्गीतेचे मराठी श्लोकात पद्यरुपात भावानुवाद करून तुमच्यापुढे सादर करायचा वसा अंगिकारला. इ. स. २०२२ च्या उत्तरार्धात या अभियानाला प्रारंभ केला. उतणार नाही, मातणार नाही, घेतला वसा सोडणार नाही या नम्र निष्ठेने हे कार्य करीत आलो. भगवंतांची कृपा आणि त्यांचे पाठबळ याखेरीज हे शक्यच नव्हते. किंबहुने हे कार्य त्यांचेच आहे; मी तो केवळ त्यांच्या हातातील लेखणी! हे सद्भाग्य मला दिल्याबद्दल भगवंतांप्रती कृतज्ञता व्यक्त करून आता अठराव्या अध्यायातील अखेरच्या श्लोकांचा भावानुवाद आजपासून सादर करून या अभियानाचा समारोप करीत आहे. शुभं भवतु।

अर्जुन उवाच 

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ । 

त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥ 

कथित अर्जुन 

महाबाहो ऋषिकेषा केशिनिसूदना मनमोहना

सन्यास त्याग तत्व पृथक जाणण्याची मज कामना ॥१॥

श्रीभगवानुवाच 

काम्यानां कर्माणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । 

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ 

*
काम्य कर्माचा त्याग सांगती काही पंडित संन्यास

सर्वकर्मफलत्यागा इतर विचक्षण म्हणती संन्यास ॥२॥

*
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । 

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥ 

*
विद्वान काही म्हणती कर्मा दोषी

त्याग करावा कर्माचा सांगती मनीषी

ना त्यागावी कधी यज्ञ दान तप कर्म

दुजे ज्ञानी सांगती हेचि सत्य धर्माचे वर्म ॥३॥

*
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । 

त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ ४ ॥ 

*
प्रथम कथितो तुजसी विवेचन त्यागाचे

सात्विक राजस तामस प्रकार त्यागाचे

नरपुंगवा तुज माझे कथन दृढ निश्चयाचे

भरतवंशश्रेष्ठा घेई जाणुनी हे गुह्य त्यागाचे ॥४॥

*
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ । 

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌ ॥ ५ ॥ 

*
यज्ञदानतप नये त्यागू कर्तव्ये निगडित जीवनाशी

यज्ञदानतप तिन्ही कर्मे पावन करिती मतिमानाशी ॥५॥

*
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । 

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ॥ ६ ॥ 

*
कर्मांसह या अन्यही कर्मे करत राहणे कर्तव्य 

फल आसक्ती त्यागोनीया पार्था आचरी कर्तव्य ॥६॥

*
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । 

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥ 

*
नियतीदत्त कर्माचा संन्यास नाही योग्य 

मोहाने त्याग तयांचा हाचि तामस त्याग ॥७॥

*
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌ । 

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌ ॥ ८ ॥ 

*
समस्त कर्मे दुःखदायक पूर्वग्रहासी धरिले

होतिल तनुला क्लेश मानुनी कर्माला त्यागिले 

असेल जरी राजस त्याग अनुचित ही धारणा

फल त्या त्यागाचे कधिही प्राप्त तया होईना ॥८॥

*
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । 

सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥

*
विहित कर्मे आचरणे हे जाणुनी देहकर्तव्य

आसक्ती फल मनी न ठेवुनी करणे कर्मकर्तव्य

नाही वासना कर्मफलाची करितो त्यांचा त्याग

पार्था मानिती त्यासी बुधजन सात्विक त्याग ॥९॥

*
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते । 

त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥ 

*
कुशल अकुशल कर्मांसह त जो करी न भेदभाव

सत्त्वगुणी मेधावी त्यागी निःसंशय तो मानव ॥१०॥

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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