हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 270 ☆ व्यंग्य – पान और पीकदान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘पान और पीकदान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 270 ☆

☆ व्यंग्य ☆ पान और पीकदान

कई बरस पहले मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में नीदरलैंड्स के कुछ मसखरे कलाकार आये। उन्होंने ‘कला’ के कुछ ऐसे नमूने पेश किये जो पवित्रतावादियों के लिए खासे तकलीफदेह थे। उन्होंने गैलरी में एक साफ सफेद कपड़ा रख दिया,  उसके बाद अपने खर्चे पर दर्शकों को पान पेश किये, और कपड़े पर थूकने को कहा । इस तरह कला की रचना हुई और बहुत से ‘आशु’ कलाकार पैदा हुए। मुश्किल यह हुई कि उत्साही दर्शकों की पीकें कपड़े की सीमा का अतिक्रमण करके गैलरी की दीवारों पर चित्रकारी करने लगीं। तब गैलरी के प्रबंधक को यह अभिनव कला-प्रयोग रोक देना पड़ा।

हमारे देश में भी लोगों को चीज़ों को बिगाड़ने का शौक कम नहीं है, यह बात अलग है कि गरीब देश होने की वजह से हम विदेश में घूम कर अपनी कला का प्रदर्शन नहीं कर पाते। देश के भीतर हमसे जितना बनता है अपना विनम्र योगदान देते रहते हैं। यहां आदमी बड़े शौक से घर की पुताई कराता है और तीन दिन बाद दीवार पर लिखा होता है, ‘जन-जन के चहेते पाखंडीलाल की पेटी में वोट देना न भूलें’ या ‘मर्दाना कमजोरी से छुटकारा पाने के लिए खानदानी हकीम निर्बलशाह के शफाखाने पर तशरीफ लायें’। भीतर बढ़िया बंगला बना होता है और सामने चारदीवारी पर भद्दी लिखावट में दस चीज़ों के विज्ञापन लिखे होते हैं। मुफ्त विज्ञापन का मौका कोई छोड़ना नहीं चाहता। आजकल मकान अपना होता है और चारदीवारी जनता जनार्दन की। चाहे वह उस पर लिखे, चाहे पान थूके।

यहां लोग खड़ी फसल के बीच में घुसकर, बेशर्मी से दांत निपोरते, फसल को रौंदते, चने के झाड़ उखाड़ लाते हैं। सार्वजनिक टोटियों को तोड़ देते हैं और फिर प्रशासन पर चढ़ बैठे हैं कि वह उन्हें ठीक नहीं करता और अमूल्य पानी का ‘अपव्यय’ हो रहा है। आगरा जाकर हम ताजमहल की दीवारों पर कोयले से अपना और अपनी महबूबा का नाम लिख आते हैं ताकि सनद रहे और इतिहास के काम आवे।

नीदरलैंड्स के कलाकारों ने गलती की जो दर्शकों को अपने पास से पान दिये। अगर वे दर्शकों से कह देते कि अपने पैसे से पान खाओ और फिर थूको, तब भी उन्हें हज़ारों स्वयंसेवक मिल जाते, क्योंकि इस देश में थूकने और चीज़ों को बिगाड़ने का शौक जुनून की हद तक है। यहां लोग अकारण ही इतना थूकते हैं कि देखकर ताज्जुब होता है। यहां लोग हर चीज़ पर थूकते चलते हैं— परंपराओं पर, ईमानदारी पर, न्याय पर और इंसानियत पर।

हमारे देशवासियों को यह भी याद नहीं रहता कि अब सड़क पर साइकिलों के अलावा मोटर और स्कूटर भी चलते हैं। साइकिल वाला चलते-चलते अपने दाहिने तरफ जगह खाली पाकर मुंह घुमा कर थूक देता है, तभी किस्मत का मारा स्कूटर वाला उसके बगल में पहुंचता है। आगे क्या होता है इसकी कल्पना आप पर छोड़ता हूं। साइकिल वाले का प्रेमोपहार पाने के बाद स्कूटर वाला सिर्फ उससे सड़क पर कुश्ती लड़कर हास्यास्पद ही बन सकता है। साइकिल वाले महाशय का तीर तो कमान से छूट चुका होता है, वापस नहीं हो सकता।

मैंने एक बार अपने घर की छत सौजन्यवश एक विवाह-भोज के लिए अर्पित की थी। बारातियों ने ऊपर भोजन किया और ऊपर ही पान खाये, जो आतिथ्य का ज़रूरी अंग है। लड़की वालों को चाहिए यह था कि वे पान बारातियों को नीचे उतरने पर पेश करते, लेकिन इतनी दूर तक उनका दिमाग नहीं गया। नतीजा वही हुआ जो होना था। बारातियों ने उतरते वक्त सीढ़ी के मोड़ पर मुक्त भाव से थूका। वैसे भी बाराती लड़की वाले की हर चीज़ को इस्तेमाल या नष्ट करने का अपना पुश्तैनी हक मानते हैं, भले ही वह चीज़ किराये की हो। सवेरे सीढ़ी का कोना पान की पीक से दमक रहा था। कई बार पुताई कराने पर भी वे पीक के दाग पेन्ट की सब तहें फोड़कर झांकते रहे।

वैसे थूकने पीकने की परंपरा हमारे देश में बहुत पुरानी है। राजाओं नवाबों के ज़माने में पान का खासा चलन था। हर दरबार और संभ्रांत घर में गिलौरीदान, पीकदान और उगालदान ज़रूरी थे। ज़्यादातर राजाओं नवाबों को कुछ काम धंधा होता नहीं था, इसलिए गिलौरी चबाना और पीक करना अनवरत चलते थे। कहते हैं कि नवाब वाजिदअली शाह का पान खाकर लोग बौरा जाते थे। उन दिनों पान का उपयोग प्रेम-आदर दिखाने के लिए भी होता था और ज़हर देने के लिए भी। अब न वे पान रह गये, न वे  पीकदान। रह गये नमक तेल लकड़ी के लिए भागते हम जैसे नामुराद लोग। इसीलिए अगर कुछ लोग पुराने ज़माने को याद करके अब तक सिर धुनते हैं तो कोई ग़लत काम नहीं करते।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 271 – एकोऽहम् बहुस्याम् ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 271 ☆ एकोऽहम् बहुस्याम्… ?

शहर में ट्रैफिक सिग्नल पर बल्ब के हरा होने की प्रतीक्षा में हूँ। लाल से हरा होने, ठहराव से चलायमान स्थिति में आने के लिए संकेतक 28 सेकंड शेष दिखा रहा है। देखता हूँ कि बाईं ओर सड़क से लगभग सटकर  पान की एक गुमटी है। दोपहर के भोजन के बाद किसी कार्यालय के चार-पाँच कर्मी पान, सौंफ आदि खाने के लिए निकले हैं। एक ने सिगरेट खरीदी, सुलगाई, एक कश भरा और समूह में सम्मिलित एक अपने एक मित्र से कहा, ‘ले।’  सम्बंधित व्यक्ति ने सिगरेट हाथ में ली, क्षण भर ठिठका और मित्र को सिगरेट लौटाते हुए कहा, “नहीं, आज सुबह मैंने अपनी छकुली (नन्ही बिटिया)  से प्रॉमिस की है कि आज के बाद कभी सिगरेट नहीं पीऊँगा।” मैं उस व्यक्ति का चेहरा देखता रह गया जो संकल्प की आभा से दीप्त हो रहा था। बल्ब हरा हो चुका था, ठहरी हुई ऊर्जा चल पड़ी थी, ठहराव, गतिमान हो चुका था।

वस्तुत: संकल्प की शक्ति अद्वितीय है। मनुष्य इच्छाएँ तो करता है पर उनकी पूर्ति का संकल्प नहीं करता। इच्छा मिट्टी पर उकेरी लकीर है जबकि संकल्प पत्थर पर खींची रेखा है। संकल्प, जीवन के आयाम और दृष्टि बदल देता है। अपनी एक कविता स्मरण हो आती है,

कह दो उनसे,

संभाल लें

मोर्चे अपने-अपने,

जो खड़े हैं

ताक़त से मेरे ख़िलाफ़,

कह दो उनसे,

बिछा लें बिसातें

अपनी-अपनी,

जो खड़े हैं

दौलत से मेरे ख़िलाफ़,

हाथ में

क़लम उठा ली है मैंने

और निकल पड़ा हूँ

अश्वमेध के लिए…!

संकल्प अपनी साक्षी में अपने आप को दिया गया वचन है। संकल्प से बहुत सारी निर्बलताएँ तजी जा सकती हैं। संकल्प से उत्थान की गाथाएँ रची जा सकती हैं।

संकल्प की सिद्धि के लिए क्रियान्वयन चाहिए। क्रियान्वयन के लिए कर्मठता चाहिए। संकल्प और तत्सम्बंधी क्रियान्वयन के अभाव में तो सृष्टि का आविष्कार भी संभव न था। साक्षात विधाता को भी संकल्प लेना पड़ा था, ‘एकोऽहम् बहुस्याम्’ अर्थात मैं एक से अनेक हो जाऊँ। एक में अनेक का बल फूँक देता है संकल्प।

संकल्प को सिद्धि में बदलने के लिए स्वामी विवेकानंद का मंत्र था, ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ अर्थात् उठो, जागो, और ध्येय की प्राप्ति तक  मत रुको

संकल्प मनोबल का शस्त्र है, संकल्प, असंभव से ‘अ’ हटाने का अस्त्र है। उद्देश्यपूर्ण जीवन की जन्मघुट्टी है संकल्प, मनुष्य से देवता हो सकने की बूटी है संकल्प।

… इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥  मार्गशीर्ष साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 💥 🕉️ 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of social media # 217 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain (IN) Pravin Raghuvanshi, NM

 

? Anonymous Litterateur of social media # 217 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 217) ?

Captain Pravin Raghuvanshi NM—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad was involved in various Artificial and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. He is also the English Editor for the web magazine www.e-abhivyakti.com

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc.

Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi. He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper. The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his Naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Awards and C-in-C Commendation. He has won many national and international awards.

He is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves writing various books and translation work including over 100 Bollywood songs for various international forums as a mission for the enjoyment of the global viewers. Published various books and over 3000 poems, stories, blogs and other literary work at national and international level. Felicitated by numerous literary bodies..! 

? English translation of Urdu poetry couplets of Anonymous litterateur of Social Media # 217 ?

☆☆☆☆☆

जरा छू लूँ तुमको..

कि मुझको यकीं आ जाये

वरना लोग कहते हैं कि…

मुझे साये से मोहब्बत है…!

☆☆

Let me just touch you…

So that I become sure

Otherwise people say that

I’m in love with the shadow…

☆☆☆☆☆

गर दोबारा इश्क़ हुआ…

तो भी तुमसे ही होगा..

ख़फा हूँ मै….

बेवफा नहीं…!

☆☆

If ever I fall in love again…

Then also it’ll be you only

I’m may be upset…

But never unfaithful…!

☆☆☆☆☆

ये नज़ारे चुराने की आदत

आज भी नही बदली उनकी

पहले हमारे लिए ज़माने से

और अब ज़माने के लिए हमसे..

☆☆

Knack of avoiding exchange of looks

She hasn’t changed even today

Earlier from the world for me

And now for the world from me!

☆☆☆☆☆

मुद्दतों से लापता थे…

जिंदगी के कारवां में हम कहीं

आज फुर्सत से बैठे ज़रा

तो खुद से मुलाक़ात हुई…

☆☆

Was missing since long…

Somewhere in the caravan of life

Sat leisurely today, then only

I could meet myself…!

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # 217 कविता – मनमोहन जी मौन हुए… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता मनमोहन जी मौन हुए…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 217 ☆

☆ कविता – मनमोहन जी मौन हुए… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

मन मोहन जी मौन हुए

दे गए विरासत मूल्यों की।

कम से कम कहते

ज्यादा से ज्यादा करते थे हर दम।

शिष्ट और ईमानदार इंसां होते हैं उन सम कम।

बड़बोले भी देख योग्यता उनकी चुप रह जाते थे।

सब जग में मनमोहन जी

भारत का मान बढ़ाते थे।

वे कहते तो

जग सुनता था।

अर्थ तंत्र सपने बुनता था।

कायाकल्प किया भारत का

नीति-योजना नई बना।

सोना गिरवी पड़ा न रखना

सफल योजना चक्र बुना।

‘सिंह’ दहाड़ा नहीं, मौन रह

करता पल पल काम रहा।

अपनों से उपहास अवज्ञा

निंदा पाई, मौन कहा।

काश सियासत सीख सके

मनमोहन जी से सज्जनता।

पद-मद से हो मुक्त रख सके

सभी दलों में समरसता।

आम आदमी की हितरक्षक

हो पाएँ सरकारें अब।

धनपतियों की बनें न चारण

जनहित अंगीकारें सब।

मन मोहन मनमोहन ही थे

उन सम कोई अन्य नहीं।

समय लिखेगा कीर्ति कथाएँ

जो न अभी तक गईं कहीं।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२७.१२.२०२४

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/स्व.जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (30 दिसंबर 2024 से 5 जनवरी 2025) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (30 दिसंबर 2024 से 5 जनवरी 2025) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

समय की गणना में ग्रेगॅरियन कैलेंडर जिसे की बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी कैलेंडर कहते हैं का 1 और वर्ष इस साप्ताहिक राशिफल के साथ-साथ समाप्त हो जाएगा और नया वर्ष 2025 का आगमन हो जाएगा। मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपको वर्ष 2024 के अंतिम दो दिन और वर्ष 2025 के प्रथम पांच दिवस के सम्मिलित साप्ताहिक राशिफल बताने के लिए उपस्थित हूं।

सबसे पहले आप सभी को अंग्रेजी नव वर्ष की ढेर सारी बधाई। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आप पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।

इस सप्ताह बुध 4 तारीख के 12:34 दिन से वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश करेगा। अन्य ग्रह जैसे कि सूर्य धनु राशि में, बक्री मंगल कर्क राशि में, वक्री गुरु वृष राशि में, शुक्र कुंभ राशि में, शनि कुंभ राशि में और राहु मीन राशि में पूर्ववत गोचर करेंगे। बुध का यह गोचर बड़े विकट प्रभाव दिखाएगा इसके असर के बारे में हम आगे राशिवार चर्चा करेंगे।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने के अच्छे योग बनेंगे। भाग्य साथ देगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कचहरी के कार्य सावधानी पूर्वक करें। इस सप्ताह आपके लिए 1 जनवरी 2 जनवरी और 3 जनवरी की दोपहर तक का समय किसी भी कार्य को करने के लिए उत्तम है। रविवार को सांयकाल में कोई नया काम करना उचित नहीं है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य पिछले सप्ताह जैसा ही रहेगा। भाई बहनों से आपके संबंध ठीक रहेंगे। कार्यालय में आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से आपको लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 3 तारीख की दोपहर से बाद से लेकर 4 और 5 तारीख किसी भी कार्य को करने के लिए उपयुक्त हैं। 30 और 31 दिसंबर को आपको सचेत रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान सूर्य को स्नान की उपरांत तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर सूर्य मन्त्रों के साथ में जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आ सकता है। कचहरी के कार्य में सावधान रहें। कार्यालय में लड़ाई से बचें। इस सप्ताह भाग्य आपका साथ देगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 दिसंबर किसी भी कार्य को करने के लिए उपयुक्त हैं। एक, दो और तीन तारीख को आपको सावधानी पूर्वक कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन किसी भी मंदिर में जाकर बाहर बैठे हुए गरीब लोगों के बीच में चावल का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। भाग्य से आपको मदद नहीं मिल पाएगी। आपको अपने पुरुषार्थ पर भरोसा करना पड़ेगा। अगर आप प्रयास करेंगे तो आप अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए एक, दो और तीन जनवरी के दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। सप्ताह के बाकी दिन आपको सावधान रहकर कोई भी कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप गरीब लोगों के बीच में कंबल का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

अविवाहित जातकों के विवाह के अच्छे सहयोंग बनेंगे। प्रेम संबंधों को बल मिलेगा। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक-ठाक रहेगी। शत्रु अपने आप पराजित होंगे। आपकी संतान आपका सहयोग करेगी। विद्यार्थियों का समय अच्छा चलेगा। इस सप्ताह आपके लिए 3 जनवरी के दोपहर से लेकर 4 और 5 जनवरी किसी भी कार्य को संपन्न करने के लिए लाभदायक है। एक दो और तीन जनवरी के दोपहर तक का समय सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपको धन प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। उसमें आपको सफलता मिल सकती है। समाज में आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर आप प्रयास करेंगे तो आपके शत्रु निश्चित रूप से परास्त हो जाएंगे। कार्यालय में आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 दिसंबर कार्यों को करने के लिए परिणाम दायक हैं। 3 जनवरी के दोपहर से लेकर 4 और 5 जनवरी को आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाई बहनों से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। भाग्य भी आपका अनुकूल रहेगा। संतान से आपके सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई उत्तम चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 1, 2 और 3 जनवरी किसी भी कार्य को करने के लिए शुभ फलदायक हैं। 5 जनवरी के दोपहर के बाद से आपको सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य पिछले सप्ताह जैसा ही रहेगा। आपके सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। कार्यालय में आपको थोड़ी परेशानी हो सकती है। भाग्य का आपके सहयोग प्राप्त होगा। धन आने की अच्छी संभावना है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 3 तारीख के दोपहर के बाद से चार और पांच तारीख किसी भी काम को करने के लिए उपयुक्त हैं। आपको चाहिए कि आप इस सप्ताह प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। कार्यालय में आपकी स्थिति सामान्य रहेगी। दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करें। पेट के रोगों से सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 दिसंबर किसी भी कार्य को करने के लिए लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिन सामान्य हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। धन आने की अच्छी उम्मीद है। कचहरी के कार्यों में सावधानी के साथ सफलता मिल सकती है। आप और आपके जीवन साथी में से एक का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। लंबी यात्रा का योग भी बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक, दो और तीन जनवरी किसी भी काम को करने के लिए उपयुक्त हैं। 30 और 31 दिसंबर को आपको कोई भी कार्य बहुत सतर्कता पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। जीवनसाथी के स्वास्थ्य में समस्या हो सकती है। अविवाहित जातकों के विवाह के उत्तम प्रस्ताव आ सकते हैं। धन लाभ होने की पूर्ण संभावना है। आप अपने दुश्मनों को परास्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 3 जनवरी के दोपहर के बाद से लेकर चार और पांच जनवरी मंगलदायक है। एक, दो और तीन जनवरी के दोपहर तक का समय किसी भी कार्य को करने के लिए कम उपयुक्त है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

अगर आप ढंग से प्रयास करेंगे तो इस सप्ताह आपको कचहरी के कार्यों में लाभ प्राप्त हो सकता है। अपने कार्यालय में आपको प्रतिष्ठा मिल सकती है। भाग्य से आपके सहयोग प्राप्त होगा। । भाई बहनों के साथ आपके संबंध ठीक रहेंगे। पिताजी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। माता जी का स्वास्थ्य भी ठीक-ठाक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 और 31 दिसंबर किसी भी कार्य को करने के लिए अनुकूल है। 3 जनवरी के बाद से लेकर चार और पांच जनवरी को आपको बड़े सावधानी से कोई भी कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन घर की बनी पहली रोटी गौ माता को दें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ “डोंगराला आग लागली पळा रे पळा…” ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ “डोंगराला आग लागली पळा रे पळा…” ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

“रे बाबल्या खयं असा तू?… रे मेल्या घरात असा कि खयं बाहेरच खपलसं!… आणि मंदा वहिनी घरात असात का रे. ?.. “

” व्हयं ता आम्ही दोघेवं बी या टायमाक घरात असा नाय तर काय शांता दुर्गेच्या राउळात झांज वाजवूक बसतत!… काय तरी इचारतस!… ता जाऊ दे.. तू फोन कित्येक केलसं ता सांग आधी?… एकाच वाडीतले शेजारी असां तरी तुका घराक येऊन बोलू झाला असताना… घराक आग लागल्याची वार्ता अर्जंट देयाला फोन केलसं काय मरे!… वश्या !काय झाला ता आधी इस्कटून सांग?… शिरा पडली तुझ्या तोंडावर ती!… “

” रे बाबल्या आग माझ्या घराक नाय तर तुझ्या घराक लवकरच लागतली समजला!… मी तुका आधीच सावध करान राहिलो… तू येळेलाच शाना झालसं तर तुझो घरदार आबाद रव्हता… मंगे तू आनी तुझा नशीब!… “

“वश्या! आज जरा जादाच घेतलसं काय?… अजून बी तू कोड्यात बोलून रव्हलसं!… रे मी मंत्रालयातला पट्टेवालो असा तुझ्या सारखो पिऊन नाही.. तेवा माझ्या खोबडीला समजेल असा बोल ना रे… काय तुका बोनस मिळालो!, का महागाईभत्याचा डिफरन्स गावलो!.. का तुका चायपानीची लाटरी लागली!… काय असेल ते सांगून टाक ना लवकर…”

“रे बाबल्या!… काय सांगू तुका? अरे तू म्हणतसं ता सगळा माका कालच हाती मिळाला… अरे ता हिन्दी पिक्चर मधे नाय का बोलत भगवान जब भी देता है तो छप्पर फाडके देता है… साला माझा नशिब बघ तसाच फळफळला… घरी बाईल एव्हढी खूश झाली म्हनुन सांगू… तिने माका तसाच बाजारात घेवोन गेला… आनि बाबल्या तुका सांगतय तिने डझनावारी साड्या, ड्रेसेस, बेडशीटा, चादरी.. काय नि काय इतकी खरेदी केलीन कि सगळो भरलेलो खिसो सुफडा साफ झाल्यावरच घराकडे परत इली… एक तांबडो पैसौ देखील त्यातला तिने शिल्लक तर ठेवलो नाय.. ना माका एक चड्डी बनियन घेतल्यान… वर माका नाकाचा मुरका मारून बोलला लगीन झाल्या पासून आज माझी होसमौज काय ता पुरी झाली… जल्माचा दळिंदर ता गेला… आता ह्या घेतलेल्या सगळ्या साड्या, ड्रेसेस, समंधा आधी त्या मंदेक दाऊन आल्याशिवाय माझो जीव शांत व्हायचो नाय… नाकझाडी मेली.. दर महिन्याला साडी ड्रेस आणल्यावर मला दाखवायला घेऊन येऊन मला जळवायची… आमच्या ह्यांका पट्टेवाले असले तरी रोजचो खुर्द्याने खिसो भरान घरी येततं… भावजी पिऊन असतले तरी त्यांका एक दमडीची चायपानी कसा मिळना नाय… असा महणून माका चिडवून जाता काय… आता तिका इतकी गाडाभर खरेदी घरी जाऊन दावतयं नि तिची अशी जिरवतयं कि त्येचा नावं ते… पुन्हा म्हणून या विमलाच्या नादी लागू नको असा तिका धडा शिकवूनच येतेयं… बघाच तुम्ही… असा माका टेचात बोलून सगळी खरेदी कमरेला धरून तुझ्या घरा कडे निघाली असा… माका इचारशील तर तू आनि मंदा वहिनी जसे असाल तसे घराबाहेर पडान खरा खराच शांता दुर्गाच्या राउळात जा… तुम्ही घरी नाय बघून विमला घरी रागे रागे परत येतली.. नि मगे तिचो राग शांत झाल्यावर मीच तुमका घरी बोलवेन… तसा तुका जमना नसेल तर माका माफ कर… नि घे मंगे घराक आग लावून… एक इमानदार दोस्ताचो सल्लो असा… बघ तुका किती पटता ता…

©  नंदकुमार पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –[email protected]

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 146 ☆ लघुकथा – विडंबना ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा विडंबना। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 146 ☆

☆ लघुकथा – विडंबना ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

“बहू! गैस तेज करो, पूरियाँ तेज आँच पर ही फूलती हैं” यह कहकर सास ने गैस का बटन फुल के चिन्ह की ओर घुमा दिया| पूरियाँ तेजी से फूलकर सुनहरी हो रही थी और घरवाले खा- खाकर। कढ़ाई से निकलता धुआँ पूरियों को सुनहरा बना रहा था और मुझे जला रहा था। मेरी छुट्टियाँ पूरी-कचौड़ी बनाने में खाक हो रही थीं। बहुत दिन बाद एक हफ्ते की छुट्टी मिली थी। कई काम दिमाग में थे, सोचा था छुट्टियों में निबटा लूंगी। लेकिन एक-एक कर सातों दिन नाश्ते- खाने में हवन हो गए।

पति का अनकहा आदेश- “तुम्हारी छुट्टी है अम्मा को थोड़ा आराम दो अब।” बच्चों की फरमाइश – “मम्मी ! अपनी छुट्टी में तो मेरे प्रोजेक्ट में मदद कर सकती हैं ना ?”

बस! बाकी सारे कामकाज चलते रहे, मेरे कामों की फाइलें खुल ही न सकीं। कॉलेज में परीक्षाएँ खत्म हुई थीं, जाँचने के लिए कॉपियों का बंडल मेरी मेज पर पड़ा मेरी राह तकता रह गया। घर भर मेरी छुट्टी को एन्जॉय करता रहा। “बहू की छुट्टी है” का भाव सासू जी को मुक्त कर देता। पति जो काम खुद कर लेते थे अब उन छोटे-मोटे कामों के लिए भी वे मुझे आवाज लगाते।

मन में झुंझलाहट थी, छुट्टी खत्म होने को आई थी। छुट्टी के पहले जो थकान थी, वह छुट्टी खत्म होने तक और बढ़ गई। कल से फिर वही सुबह की भागम-भाग— यह सब बैठी सोच ही रही थी कि पति ने बड़ी सहजता से मेरी पीठ पर हाथ मारते हुए कहा- “बड़ी बोर हो यार तुम? कभी तो खुश रहा करो? छुट्टियों में भी रोनी सूरत बनाए रहती हो।” आराम से सोफे पर लेटकर क्रिकेट मैच देखते हुए उन्होंने अपनी बात पूरी की- “एन्जॉय करो लाइफ को यार!”

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 225 ☆ कहानियों से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना कहानियों से जुड़ाव। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 225 ☆ कहानियों से जुड़ाव

कैसी भी घटना हो, समझाने हेतु आस पास से जुड़ी कहानियाँ ही सबसे सरल माध्यम होतीं हैं। जो कुछ हम देखते हैं उसे अपने शब्दों में ढाल कर सरलतम रूप से कहने पर बात हृदय में घर कर जाती है।

यही कारण है कि जब से बच्चा कुछ समझने लायक होता है हम उसे छोटी- छोटी प्रेरक कहानियों के द्वारा शिक्षा देते हैं। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी वे आसपास देखते हैं उसे अवलोकन के द्वारा सीख कर आपको वापस लौटाते हैं।

अतः आप बच्चों में जो संस्कार देखना चाहते वो पहले आपको पालन करना होगा तभी उनसे ये उम्मीद की जा सकेगी कि वो भी रिश्तों के महत्व को समझें और जीवन रूपी किताब के पन्ने न बिखरने दें।

समय- समय पर हम महान व्यक्तियों की जयंती मनाते हैं इस अवसर पर उनके गुणों पर प्रकाश डालना, जीवनचर्या, समाज को उनका योगदान इन पहलुओं पर चर्चा आयोजित करते हैं।

अपने कार्यस्थल पर ऐसे फ़ोटो रखना, डायरी में उनके चित्र और तो और अपने बच्चों के नाम भी उनके ही नाम पर रखकर हम वही गुण उनमें देखना चाहते हैं। ये तो सर्वथा सत्य है कि हम जो देखते हैं सोचते हैं वैसे ही अनयास बनते चले जाते हैं, हमारा मनोमस्तिष्क उसे ग्रहण कर लेता है और उसे ही आदर्श बना कर श्रेष्ठता की ओर बढ़ चलता है।

***

तिनकों को जोड़कर

धीरज को धर कर

छत हो उम्मीद वाली

कार्य ऐसे कीजिए।। 

*

पास व पड़ोस होना

कोई भी कभी न रोना

सबका विकास होवे

ध्यान यही दीजिए।। 

*

चलिए तो हौले- हौले

मीठे बोल बोले- बोले

कड़वे वचन छोड़

क्रोध सारा पीजिए।।

*

परिवेश रूप ढलें

खुशियों के दीप जलें

प्रेम की दीवाल जहाँ

ऐसा घर लीजिए।।

***

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 33 – गाँव के चौराहे पर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं। आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना गाँव के चौराहे पर)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 33 – गाँव के चौराहे पर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाँव के चौराहे पर ‘शहरी विकास योजना’ की चर्चा के नाम पर एक भव्य सभा का आयोजन किया गया। अध्यक्ष महोदय अपने फोल्डिंग कुर्सी पर विराजमान थे, जबकि बाकी जनता खड़े-खड़े ताली बजाने में व्यस्त थी। “दोस्तों,” अध्यक्ष ने माइक संभालते हुए कहा, “हमारा गाँव अब विकास की ओर अग्रसर है।” पीछे से किसी ने व्यंग्य में फुसफुसाया, “हाँ, विकास की ओर तो जा रहे हैं, पर पैर में जूते कहाँ हैं?”

सभा में पहली पंक्ति में बैठे रामलाल, जो चाय की दुकान के मालिक थे, अपनी बहादुरी के किस्से सुनाने में व्यस्त थे। “भाई, मैंने तो दिल्ली जाकर देखा, वहाँ की लड़कियाँ जीन्स पहनती हैं। हमारे गाँव में तो अब भी घूँघट में ही दुनिया बसी है।” उनकी बात सुनकर सामने बैठा नत्थू हँस पड़ा, “अरे भाई, दिल्ली की लड़कियाँ तो इतनी समझदार हैं कि अंग दिखाने और छिपाने दोनों में पारंगत हैं। तुम तो चाय बेचते रहो।”

चाय की दुकान पर दूसरा मुद्दा था, जानवरों के नाम पर होने वाले ताने। मुनिया ने बड़े गुस्से से कहा, “अगर कोई मुझे कुत्ता कहे तो मैं उसे थप्पड़ मार दूँगी, लेकिन शेरनी कहे तो गर्व महसूस होगा।” चमेली ने तुरंत जवाब दिया, “अरे मुनिया, तू ये क्यों भूलती है कि शेरनी भी जानवर ही है? तारीफ चाहिए, सच्चाई से डर लगता है।”

दूसरी तरफ, ठाकुर साहब अपनी नई गाड़ी लेकर गाँव में घूम रहे थे। उनके हाथ में हीरे जड़ी अंगूठी चमक रही थी। गाड़ी रोककर उन्होंने जेब से छोटा सा दर्पण निकाला और खुद को निहारने लगे। “ठाकुर साहब, हीरा धारण किया है, फिर बार-बार दर्पण क्यों देखते हैं?” रामलाल ने पूछ लिया। ठाकुर साहब हँसते हुए बोले, “हीरा तो दूसरों को दिखाने के लिए है, लेकिन अपनी शक्ल देखने के लिए दर्पण चाहिए।”

शांता, जो शादी के बाद गाँव लौटी थी, अपनी सहेली से कह रही थी, “पिता की गरीबी सह ली, पर पति की गरीबी बर्दाश्त नहीं होती। हर दिन उधार का रोना लेकर आते हैं।” उसकी सहेली ने मुस्कुराते हुए कहा, “बहन, यही तो हमारी संस्कृति है। शादी के बाद औरतों का अधिकार है कि पति की गरीबी पर व्यंग्य करें।”

सभा के पीछे एक शराब की दुकान पर लंबी लाइन लगी थी। वहीं पास में एक खंडहर पड़ा था, जहाँ कभी अस्पताल हुआ करता था। नत्थू ने रामलाल से कहा, “अगर इस खंडहर को फिर से अस्पताल में बदल दिया जाए, तो गाँव का जीवन बदल जाएगा।” रामलाल ने चाय का कप उठाते हुए कहा, “तू सही कहता है। लेकिन लोग डॉक्टर को भगवान मानते हैं और शराब को दोस्त। दोस्त को कौन छोड़ता है?”

अध्यक्ष महोदय ने सभा के अंत में घोषणा की, “हम गाँव में पाँच नई शराब की दुकानें खोलेंगे।” जनता ने जोरदार तालियाँ बजाईं। पीछे से किसी ने चुटकी ली, “और अस्पताल का क्या?” अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए कहा, “अस्पताल की जरूरत तभी पड़ती है, जब शराब नहीं होती।”

सभा खत्म हुई, पर नत्थू वहीं खड़ा सोच रहा था। “हम सब कितने अजीब हैं। दूसरों की गलतियाँ गिनाने में माहिर, पर अपनी कमियों को छिपाने में और भी ज्यादा।” और चौराहे पर विकास का तमाशा जारी रहा।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 323 ☆ आलेख – “ऐप्स की दुनिया…” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 323 ☆

?  आलेख – ऐप्स की दुनिया…  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हमारे जीवन को आसान, सुविधाजनक और मनोरंजक बनाती , हर मोबाईल की सर्वाधिक जरूरत है ऐप्स की दुनिया। आप सोचिए भर और सर्च कीजिए , आपकी आवश्यकता का कोई ना कोई ऐप सुलभ होगा। नहीं हो तो भी सरलता से डेवलप किया जा सकता है। ऐप्स की दुनिया हमें विभिन्न प्रकार के ऐप्स प्रदान करती है जो हमारी विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।

सोशल मीडिया ऐप्स हमें अपने दोस्तों और परिवार, समाज के साथ जुड़ने की अवसर देते हैं। आज हम सब फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और व्हाट्सएप जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपने प्रियजनों के साथ जुड़ सकते हैं। गेमिंग ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें मनोरंजन प्रदान करते हैं। पबजी, क्लैश ऑफ क्लैन्स, कैंडी क्रश और फॉर्टनाइट जैसे ऐप्स का उपयोग करके हम अपने खाली समय को मनोरंजक बना सकते हैं।

ऐप्स की दुनिया में हमें शिक्षा और ज्ञान के ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें विभिन्न विषयों में जानकारी प्रदान करते हैं। हम डुओलिंगो, कोर्सेरा, एडएक्स अकादमी जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपने विषय ज्ञान को और बढ़ा सकते हैं।

ऐप्स की दुनिया में हमें स्वास्थ्य और फिटनेस के ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें स्वस्थ और फिट रहने में मदद करते हैं। हम मायफिटनेसपैल, हेडस्पेस, कैलम और नाइके ट्रेनिंग क्लब जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपने स्वास्थ्य और फिटनेस को बेहतर बना सकते हैं।

ऐप्स की दुनिया में हमें वित्तीय ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें अपने वित्त को प्रबंधित करने में मदद करते हैं। हम पेटीएम, गूगल पे, फोनपे, और ज़िप जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपने वित्त को प्रबंधित कर सकते हैं।

इसके अलावा, ऐप्स की दुनिया में हमें यात्रा ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें यात्रा करने में मदद करते हैं। हम गूगल मैप्स, उबर, ओला, और मेकमायट्रिप जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपनी यात्रा को आसान बना सकते हैं।

ऐप्स की दुनिया में हमें खाना ऑर्डर करने के लिए ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें अपने पसंदीदा खाने को घर पर मंगाने में मदद करते हैं। हम जोमाटो, स्विगी, फूडपांडा, और उबर ईट्स जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपने पसंदीदा खाने को घर पर मंगा सकते हैं।

ऐप्स की दुनिया में हमें मनोरंजन के लिए ऐप्स भी मिलते हैं जो हमें विभिन्न प्रकार के मनोरंजन प्रदान करते हैं। हम नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम वीडियो, हॉटस्टार, और यूट्यूब जैसे ऐप्स का उपयोग करके अपने पसंदीदा टीवी शो और मूवीज़ देख सकते हैं।

इस प्रकार, ऐप्स की दुनिया हमें विभिन्न प्रकार के ऐप्स प्रदान करती है जो हमारे जीवन को आसान, सुविधाजनक और मनोरंजक बनाता है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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