सूचनाएँ/Information ☆ साहित्यिक गतिविधियाँ ☆ भोपाल से – सुश्री मनोरमा पंत ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 साहित्यिक गतिविधियाँ ☆ भोपाल से – सुश्री मनोरमा पंत 🌹

(विभिन्न नगरों / महानगरों की विशिष्ट साहित्यिक गतिविधियों को आप तक पहुँचाने के लिए ई-अभिव्यक्ति कटिबद्ध है।)  

🌹प्रवासी तथा विश्व  हिन्दी दिवस का आयोजन संपन्न🌹

प्रवासी भारतीय साहित्य  एवं संस्कृति शोध केन्द्र  एवं  रविन्द्र नाथ टैगोर  विश्व विद्यालय द्वारा प्रवासी तथा विश्व  हिन्दी दिवस का आयोजन किया गया।   

“हिंदी अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में भारत सहित विश्व के कई देशों में बोली जाने वाली एक महत्वपूर्ण भाषा के रूप में स्थापित हो गई है। हिंदी का विस्तार अनवरत जारी है। यहीं सही समय है जब हमें पूरी आधुनिकता के साथ वैश्विक स्तर पर हिंदी को रोजगार की भाषा के रूप में स्थापित करना चाहिए।” 

उक्त उद्गार लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल से भारत प्रवास पर आये डॉ. शिवकुमार सिंह ने प्रवासी दिवस एवं विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में प्रवासी भारतीय साहित्य एवं संस्कृति शोध केंद्र, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा ‘विश्व में हिंदी : हिंदी का विश्व’ विषय पर विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित ‘परिसंवाद’ को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एव॔ विश्व रंग के निदेशक श्री संतोष चौबे ने की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, नई दिल्ली के मानद निदेशक श्री नारायण कुमार ने कहा कि – “आज के समय में हिंदी विश्व के इतने देशों में बोली जा रही हैं कि हम गर्व से कह सकते है कि हिंदी के राज में अब सूर्यास्त नहीं होता।”

कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री संतोष चौबे ने  की ।

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भोपाल में पाँचवे लिटरेचर फेस्टिवल का शुभारंभ – इस फैस्टिवल का शुभारंभ चर्चित पुस्तक ‘डायमंडस आर फार एवर ‘सो आर मोरल्स’ के लेखक गोविन्द ढोलकिया, वास्तुकार क्रिस्टोफर बेनिंगर, राघव चन्द्रा, अभिलाष खांडेकर, डीके मेहता, और हजूर हबीब के द्वारा हुआ। फेस्टिवल में अनेक पुस्तकों पर चर्चा हुई ।

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दूसरा सत्र कहानी पाठ आदरणीय शंशाक जी की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें हरीश पाठक, नीलिमा शर्मा, और हरि भटनागर ने कहानी पाठ किया।

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तीसरा सत्र प्रबोध गोविल की अध्यक्षता में लघुकथा पाठ का रहा।

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भोपाल ‘लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल’ के तीन दिनी महाकुंभ का आगाज भारत भवन में हुआ जिसका दूसरा दिन – सेलेब्रिटी आनर्स के नाम रहा। कबीर बेदी, रंजीता दिवेकर आई सी आई सी आई संजय यादव, पूर्व हाई कमिश्नर, टीसीएस राघवन, व एक्स कैग मेम्बर विनोद राय, पद्मश्री सोवना नारायण के सेशनों एवं थैंक्स, क्रिटिक्स, पब्लिशर्स एवं लिटरेचर लवर्स से पूरा भारत भवन कैम्पस गुलजार रहा ।

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‘तुलसी साहित्य अकादमी’ की सृजन श्रंखला 29 की बांसतिक काव्यगोष्ठी वरिष्ठ साहित्यकार डा .गौरीशंकर गौरीश की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।

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हेमन्त फाउन्डेशन एवं अंतर्राष्ट्रीय विश्वमैत्री मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन दिनांक 15 जनवरी को सम्पन्न हुआ। पहला सत्र विधा पुरस्कार तथा सम्मान  का था जिसमें  विश्व मैत्री  मंच की संस्थापक संतोष श्रीवास्तव के दिवंगत पुत्र, युवा कवि हेमन्त को उनकी  कविताओं के पाठ से याद किया। युवा गजलकार सुभाष पाठक ‘जिया’ को उनके गजल संग्रह “तुम्हीं से जिया है” के लिये सम्मानित किया गया।

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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय  मानव संग्रहालय में ‘छत्तीसगढ का सांस्कृतिक भूगोल’ विषय पर डा. राहुल कुमार सिंह पुरातत्वविद एवं संस्कृतिकर्मी द्वारा व्याख्यान  का आयोजन  किया गया।

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अविरल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में यात्रा गोष्ठी का आयोजन किया गया।

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दुष्यन्त संग्रहालय में उषा सक्सेना की दो पुस्तकों ‘कामदेव’ – खंड काव्य तथा ‘आगड़ बम बागड़ बम‘, – बाल कविता का लोकार्पण साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के निदेशक श्री विकास दवे, वरिष्ठ साहित्यकार नरेन्द्र  दीपक एवं महेश सक्सेना द्वारा हुआ।

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‘सृजन ग्लोबल एवं त्रिवेणी’ संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में ‘विजयी विश्व तिरंगा’ पुस्तक  चर्चा एवं काव्य पाठ हुआ।

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‘लघुकथा शोध संस्थान’ की निदेशक कांता राय के निर्देशन में विगत सप्ताह निम्न लिखित पुस्तकों पर चर्चा हुई –

गोदान के बाद – डा.प्रभुदयाल मंढइया

चाँद की चाहत – डा.प्रभुदयाल मंढइया

खैर पता है हुजूर – उपन्यास – सुश्री उर्मिला शिरीष

जो देखा आपने – डा. अखिलेश वार्चे

आस तीस का लाडू – निमाड़ी लघुकथा – विजय जोशी

मिथ्या मंजिल और मौजूदगी – श्री अशोक मनवानी

🌹 पुस्तक पखवाड़े का समापन 🌹 

पुस्तक पखवाड़े के समापन सत्र में टैगोर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री संतोष चौबे की दो पुस्तकों ‘इस अ-कवि समय में’ कविता संग्रह तथा ‘दस कहानियाँ’ पर चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता मध्यप्रदेश साहित्य एवं संस्कृति परिषद के निदेशक श्री विकास दवे ने की। उन्होंने नई पीढी को पुस्तकों से जोड़ने के लिये ‘पुस्तक पखवाड़ा’ जैसे आयोजनों के महत्व को बताया।

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साभार – सुश्री मनोरमा पंत, भोपाल (मध्यप्रदेश) 

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ – क्षितिज – ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

सुश्री नीलांबरी शिर्के

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

?– क्षितिज – ? ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

वरती आकाश

खाली सागर

क्षितिजावरती

मिलन सुंदर

आकाशाच्या

प्रतिबिंबासह

लाटांचे लयदार

नृत्य  निरंतर

जल आकाश

शक्ति या तर

वंदन तयांना

जोडूनी दो कर

चित्र साभार –सुश्री नीलांबरी शिर्के

© सुश्री नीलांबरी शिर्के

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

 

१८/०१/२०२३

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आतिश का तरकश #173 – 59 – “अजब हो चला इस ज़माने का चलन…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। श्री सुरेश पटवा जी  ‘आतिश’ उपनाम से गज़लें भी लिखते हैं ।प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ आतिश का तरकशआज प्रस्तुत है आपकी ग़ज़ल “अजब हो चला इस ज़माने का चलन…”)

? ग़ज़ल # 59 – “अजब हो चला इस ज़माने का चलन…” ☆ श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’ ?

लँगड़े पर दौड़ने का आरोप लगाते हैं,

गंजे को कंघी का तोहफ़ा भिजवाते हैं।

अजब हो चला इस ज़माने का चलन,

अंधों को  नज़रों के चश्मे लगवाते हैं।

तिजोरी पूरी चुनावी अभियान में झोंकी,

नेता जी  बजट रिश्वत का बनवाते हैं।

नदियों पर क्रूज अभियान हो ज़रा तेज,

हज़ार करोड़ गंगा सफ़ाई पर लगाते हैं।

सौ स्मार्ट सिटी का लक्ष्य सध रहा है,

शहर की  गंदगी गाँव में फिकवाते हैं।

उल्टा सीधा खाने से किडनी हुई ख़राब,

आयुष्मान से दिल का इलाज कराते हैं। 

हिंदू हिंदी और हिंदुस्तान के नारे लगवा,

गाँव में अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल खुलाते हैं।

© श्री सुरेश पटवा ‘आतिश’

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 51 ☆ मुक्तक ।।कल का सुंदर संसार, मिलकर आज ही संवार।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

(बहुमुखी प्रतिभा के धनी  श्री एस के कपूर “श्री हंस” जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। आप कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं में आपका विशेष योगदान हैं।  आप प्रत्येक शनिवार श्री एस के कपूर जी की रचना आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण मुक्तक ।।कल का सुंदर संसार, मिलकर आज ही संवार।।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 51 ☆

☆ मुक्तक  ☆ ।।कल का सुंदर संसार, मिलकर आज ही संवार।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆ 

[1]

यदि  बनाना  है  कल  अच्छा तो करो  आज      तैयारी।

यदि पहुंचना मंजिल  पर कल तो करो आज होशियारी।।

भविष्य  का  निर्माण  प्रारंभ  ही  वर्तमान से     होता है।

यदि रहना है कल को खुश तो करो दूर आज लाचारी।।

[2]

तुम्हारी हर बात में हमेशा कुछ गहराई होनी चाहिये।

तुम्हारे काम   में सदा  ही कुछ भलाई होनी चाहिये।।

सुधार करते रहो हर गलती का भी   तुम  हर कदम।

टूटे रिश्तों   की भी    हमेशा से तुरपाई होनी चाहिये।।

[3]

जीवन प्रभु का   दिया       एक अनमोल सा उपहार है।

मूल उद्देश्य इसका रखना सबके ही  साथ   सरोकार है।।

एक ही मिला है जीवन जो फिर मिलेगा    न     दुबारा।

यही हो भावना कि सम्पूर्ण विश्व एक ही तो परिवार है।।

[4]

मिलकर बनायों संसार जिसमें बस अमन चैन सुख हो।

बस जाये ऐसा  भाई चारा कि  किसी को न दुःख  हो।।

भाषा संस्कार संस्कृति सबका  ही  होता रहे    संवर्धन।

दुनिया न   कहलाये    कलयुग बस मानवता का युग हो।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली

ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com

मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 116 ☆ ग़ज़ल – “परेशां देख के तुमको…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक ग़ज़ल – “परेशां देख के तुमको…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ काव्य धारा #116 ☆  ग़ज़ल  – “परेशां देख के तुमको…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

मुझे जो चाहते हो तुम, तुम्हारी ये मेहरबानी

मगर कोई बात मेरी तुमने अब तक तो नहीं मानी।

 

परेशां देख के तुमको मुझे अच्छा नहीं लगता

जो करते प्यार तो दे दो मुझे अपनी परेशानी।

 

तुम्हें संजीदा औ’ चुप देख मन मेरा तड़पता है

कहीं कोई कर न बैठे बख्त हम पर कोई नादानी।

 

मुझे लगता समझते तुम मुझे कमजोर हिम्मत का

तुम्हारी इस समझदारी में दिखती मुझको नादानी।

 

हमेशा अपनी कह लेने से मन का बोझ बँटता है

मगर मुझको बताने में तुम्हें है शायद हैरानी।

 

मुसीबत का वजन कोई सहारा पा ही घटता है

तुम्हारी बात सुनने से मुझे भी होगी आसानी।

 

जो हम तुम दो नहीं है, एक हैं, तो फिर है क्या मुश्किल?

नहीं होती कभी अच्छी किसी की कोई मनमानी।

 

नहीं कोई, जमाने में मोहब्बत से बड़ा रिश्ता

तुम्हरी चुप्पियां तो हैं मोहब्बत की नाफरमानी।

 

परेशां हूँ  तुम्हारी परेशानी और चुप्पी से

’विदग्ध’ दिल की बता दोगे तो हट सकती परेशानी।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ कृतार्थ वार्धक्य… डाॅ.विनिता पटवर्धन ☆ परिचय  – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

 

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ कृतार्थ वार्धक्य… डाॅ.विनिता पटवर्धन ☆ परिचय  – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

लेखिका : डॉ. वनिता पटवर्धन 

प्रकाशक : समीर आनंद वाचासुंदर, गोवा 

– हे पुस्तक पाहिलं, आणि नकळतच मनात प्रश्न उभा राहिला की… ‘‘वार्धक्य… आणि कृतार्थ…?” … आणि तेही आत्ता आजूबाजूला सातत्याने दिसणा-या परिस्थितीत? उत्सुकता स्वस्थ बसू देईना… मग लगेचच हे पुस्तक वाचायला सुरुवात केली. आणि अगदी प्रस्तावनेपासूनच पानागणिक मिळणारी वेगवेगळी शास्त्रीय माहिती वाचतांना, वृध्दत्त्वाशी निगडित असणा-या अनेक प्रश्नांचे वेगवेगळे आकृतीबंध डोळ्यासमोर उभे राहिले. 

माणसाचे सर्वसाधारण आयुष्यमान ७५ ते ८० वयापर्यंत वाढले आहे हे तर जाहीरच आहे… त्यामुळे या वयोगटातील माणसांची संख्याही वाढली आहे. आणि अर्थातच् वृध्दांसमोरची आव्हानेही वाढली आहेत. इथे वृध्दांसमोरच्या ‘समस्या’ न म्हणता ‘आव्हाने’ म्हणणे, इथेच लेखिकेचा या विषयाकडे बघण्याचा सकारात्मक दृष्टीकोन अधोरेखित झाला आहे. आणि मग टप्याटप्याने पुढे जात, ही आव्हाने यशस्वीपणे कशी पेलता येतात, याचे लेखिकेने सोदाहरण विवेचन केले आहे… अगदी पटलेच पाहिजे… आणि आचरणातही आणले पाहिजे असे. 

‘एखादी व्यक्ती वृध्द होते, म्हणजे नेमके काय होते? ’ हा पहिलाच प्रश्न… इथूनच या पुस्तकाला सुरुवात झालेली आहे. उमलणे… उभरणे… कोमेजणे… थोडक्यात उत्पत्ती-स्थिती-लय… यापैकी ‘ कोमेजत जाणे ’… हा तिसरा टप्पा वृद्धत्वाचा. हे जरी सत्य असले, तरी माणसाचे कोमेजत जाणे कसे असते, हे त्याच्या शारिरिक व मानसिक स्वास्थ्यानुसार, त्याच्या कार्यरत रहाण्याच्या क्षमतेनुसार, अंगभूत कौशल्यानुसार, आणि या अनुषंगानेच, त्याने आयुष्यभर केलेल्या व्यवसायानुसार, प्रत्येकाच्या बाबतीत वेगळे असते. म्हणूनच वय आणि कार्यमग्न रहाण्याची क्षमता, याचे कुठचेही ठाम गणित मांडता येत नाही, मांडले जाऊही नये, हा विचार नकळत वाचकाच्या मनात भुंग्यासारखा गुणगुणायला लागतो, याचे श्रेय लेखिकेला द्यायलाच हवे. इथेही…१)‘नववृध्द, म्हणजे तरूण जेष्ठ’, २)‘वृध्द किंवा ज्येष्ठ’ , ३) ‘अतिवृध्द किंवा अति ज्येष्ठ’, हे वृध्दत्त्वाचे तीन टप्पे असतात हे सांगतांना लेखिकेने… १ ला टप्पा म्हणणे शिशिरातील चांदणे, २ रा टप्पा म्हणजे हेमंत ऋतूतील पानगळती, आणि ३ रा टप्पा म्हणजे शिशिरातील गूढ शांतता… अशी अगदी सुंदर… सहजपणे पटणारी उपमा दिलेली आहे. आणि अशाच अनेक चपखल उपमा, प्रसिध्द लेखकांच्या साहित्यातले या विषयाला अचूक लागू होतील असे वेचे, काही सुंदर कविता, यांचा अगदी यथायोग्य उपयोग सहजपणे या पुस्तकात केलेला आहे. 

याच्याच जोडीने, आत्तापर्यंत विकसित झालेल्या ‘ वृध्दशास्त्राच्या ’ वेगवेगळ्या शाखांचा उहापोहही केलेला आहे, आणि त्याला सहाय्यभूत असणारे कितीतरी आलेख, लहान लहान तक्त्यांच्या माध्यमातून दिलेली प्रत्यक्षदर्शी माहिती, पूरक चित्रे, याद्वारे या विषयाची परिपूर्ण माहिती देण्याचा लेखिकेचा हेतू स्पष्टपणे जाणवतो. 

वृद्धत्वाचे स्वरूप, वृध्दांची मनोधारणा, बौध्दिक स्थिती, सामाजिक स्थिती, अशा अनेक गोष्टींचा मानसशास्त्रीय दृष्टिकोनातून विचार करतांना, वृध्दांनी ‘स्वयंशोध’ घेणे किती महत्त्वाचे आहे, यावर लेखिकेने आवर्जून भर दिला आहे, आणि त्यादृष्टीने मांडलेला प्रत्येक मुद्दा कोणत्याही ‘सजग’ वृध्दाला पटलाच पाहिजे असा आहे. कोणाचेही वय विचारायचे असेल तर ‘How old are you?’ असे विचारले जाते. पण वृध्दांच्या बाबतीत मात्र, त्याऐवजी ‘How young are you?’ हा प्रश्न विचारायला हवा, हे लेखिकेचे म्हणणे मला अतिशय आवडले… मनापासून पटले. कारण या प्रश्नाच्या उत्तरातच, माणूस स्वत:च्या वृध्दत्त्वाकडे कशाप्रकारे बघतो… किंवा स्वत:ची निराशेकडे झुकणारी मानसिकता बदलू इच्छितो की नाही, याचे उत्तर दडलेले आहे… वृध्द असणे आणि सारखे वृध्द असल्यासारखे वाटत रहाणे यातला फरक यामुळे आपोआपच ठळकपणे अधोरेखित होतो. 

याच अनुषंगाने पुढे वृद्धत्वाच्या गरजा आणि अपेक्षा, नकळतपणेच पण महत्त्वाची ठरणारी मानसिक निवृत्ती, अटळ असे शारीरिक आणि आर्थिक परावलंबन, हे सगळे निरोगी मनाने स्वीकारून, ते आपल्या परीने जास्तीत जास्त नियंत्रणात ठेवण्याची मानसिकता जोपासण्याची गरज, अशा अनेक अतिशय महत्त्वाच्या मुद्यांवर लेखिकेने परिपक्व म्हणावे असे भाष्य केले आहे. खरं तर ते फक्त भाष्य नसून, वाचकांच्या विचारांना अगदी योग्य आणि आवश्यक दिशा देणारे मार्गदर्शन आहे, ज्यातून प्रत्येकाने खूप काही शिकण्यासारखे, प्रत्यक्ष आचरणात आणण्यासारखे आहे. 

भूतकाळाच्या तुलनेत आत्ताच्या काळात वृध्दांच्या समस्या बदलल्याही आहेत आणि वाढल्याही आहेत हे तर खरेच. लेखिका स्वत: मानसशास्त्र तज्ञ आणि ख्यातनाम समुपदेशक असल्याने, वृद्धत्व या आयुष्याच्या अखेरच्या टप्प्यातली मानसिकता, झेपतील की नाही अशा वाटणा-या या वयातल्या समस्या, याबद्दल फक्त शास्त्रीय माहिती देऊन न थांबता, त्यावरच्या प्रत्यक्षात करता येणा-या उपाययोजनाही त्यांनी सहजपणे समजतील, आणि तितक्याच सहजपणे प्रत्यक्ष आचरणातही कशा आणता येतील, हे अगदी उत्तमपणे, गप्पा मारता मारता महत्त्वाचे काही आवर्जून सांगावे, अशा पध्दतीने अगदी सहजसोप्या भाषेत सांगितले आहे, असे मी ठामपणे म्हणू शकते. पुस्तकाच्या दुसऱ्या भागात असलेले उत्तम समुपदेशनपर  लेखही पुस्तकातील मार्गदर्शनाला अतिशय पूरक असेच आहेत.   

मीही आता “ 72 years young “ आहे, आणि हे पुस्तक वाचल्यानंतर आता  ‘ मीच माझा दिवा आहे ’ हे मला पूर्णपणे आणि मनापासून पटले आहे. अर्थात याचे सर्व श्रेय मी लेखिकेला द्यायलाच हवे. हे पुस्तक वाचल्यानंतर, त्यात केलेले समुपदेशन मनापासून आचरणात आणण्याचा निश्चय मी तरी नक्कीच केला आहे. आता माझे वार्धक्य नक्कीच “ कृतार्थ “ होईल हा विश्वास या पुस्तकाने मला दिला आहे, आणि तोच विश्वास या पुस्तकातून सर्वांना मिळेल, याची मला खात्री आहे. 

या अतिशय वाचनीय, आणि त्याहूनही मननीय अशा पुस्तकाबद्दल लेखिका डॉ.वनिता पटवर्धन यांचे मनापासून अभिनंदन आणि आभार !!! 

प्रस्तुती – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #166 ☆ अपेक्षा व उपेक्षा ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख अपेक्षा व उपेक्षा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 166 ☆

☆ अपेक्षा व उपेक्षा ☆

‘अत्यधिक अपेक्षा मानव के जीवन को वास्तविक लक्ष्य से भ्रमित कर मानसिक रूप से दरिद्र बना देती है।’ महात्मा बुद्ध मन में पलने वाली अत्यधिक अपेक्षा की कामना को इच्छा की परिभाषा देते हैं। विलियम शेक्सपीयर के मतानुसार ‘अधिकतर लोगों के दु:ख एवं मानसिक अवसाद का कारण दूसरों से अत्यधिक अपेक्षा करना है। यह पारस्परिक रिश्तों में दरार पैदा कर देती है।’ वास्तव में हमारे दु:ख व मानसिक तनाव हमारी ग़लत अपेक्षाओं के परिणाम होते हैं। सो! दूसरों से अपेक्षा करना हमारे दु:खों का मूल कारण होता है, जब हम दूसरों की सोच को अपने अनुसार बदलना चाहते हैं। यदि वे उससे सहमत नहीं होते, तो हम तनाव में आ जाते हैं और हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है; जो हमारे विघटन का मूल कारण बनता है। इससे पारिवारिक संबंधों में खटास आ जाती है और हमारे जीवन से शांति व आनंद सदा के लिए नदारद हो जाते हैं। सो! मानव को अपेक्षा दूसरों से नहीं; ख़ुद से रखनी चाहिए।

अपेक्षा व उपेक्षा एक सिक्के के दो पहलू हैं। यह दोनों हमें अवसाद के गहरे सागर में भटकने को छोड़ देते हैं और मानव उसमें डूबता-उतराता व हिचकोले खाता रहता है। उपेक्षा अर्थात् प्रतिपक्ष की भावनाओं की अवहेलना करना; उसकी ओर तवज्जो व अपेक्षित ध्यान न देना दिलों में दरार पैदा करने के लिए काफी है। यह सभी दु:खों का कारण है। अहंनिष्ठ मानव को अपने सम्मुख सब हेय नज़र आते हैं और  इसीलिए पूरा समाज विखंडित हो जाता है।

मनुष्य इच्छाओं, अपेक्षाओं व कामनाओं का दास है तथा इनके इर्द-गिर्द चक्कर लगाता रहता है। अक्सर हम दूसरों से अधिक अपेक्षा व उम्मीद रखकर अपने मन की शांति व सुक़ून उनके आधीन कर देते हैं। अपेक्षा भिक्षाटन का दूसरा रूप है। हम उसके लिए कुछ करने के बदले में प्रतिदान की अपेक्षा रखते हैं और बदले में अपेक्षित उपहार न मिलने पर उसके चक्रव्यूह में फंस कर रह जाते हैं। वास्तव में यह एक सौदा है, जो हम भगवान से करने में भी संकोच नहीं करते। यदि मेरा अमुक कार्य सम्पन्न हो गया, तो मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा या तीर्थ-यात्रा कर उनके दर्शन करने जाऊंगा। उस स्थिति में हम भूल जाते हैं कि वह सृष्टि-नियंता सबका पालनहार है; उसे हमसे किसी वस्तु की दरक़ार नहीं। हम पारिवारिक संबंधों से अपेक्षा कर उनकी बलि चढ़ा देते हैं, जिसका प्रमाण हम अलगाव अथवा तलाक़ों की बढ़ती संख्या को देखकर लगा सकते हैं। पति-पत्नी की एक-दूसरे से अपेक्षाओं की पूर्ति ना होने के कारण उनमें अजनबीपन का एहसास इस क़दर हावी हो जाता है कि वे एक-दूसरे का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते और तलाक़ ले लेते हैं। परिणामत: बच्चों को एकांत की त्रासदी को झेलना पड़ता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हुए अपने-अपने हिस्से का दर्द महसूसते हैं, जो धीरे-धीरे लाइलाज हो जाता है। इसका मूल कारण अपेक्षा के साथ-साथ हमारा अहं है, जो हमें झुकने नहीं देता। एक अंतराल के पश्चात् हमारी मानसिक शांति समाप्त हो जाती है और हम अवसाद के शिकार हो जाते हैं।

मानव को अपेक्षा अथवा उम्मीद ख़ुद से करनी चाहिए, दूसरों से नहीं। यदि हम उम्मीद ख़ुद से रखते हैं, तो हम निरंतर प्रयासरत रहते हैं और स्वयं को लक्ष्य की पूर्ति हेतू झोंक देते हैं। हम असफलता प्राप्त होने पर भी निराश नहीं होते, बल्कि उसे सफलता की सीढ़ी स्वीकारते हैं। विवेकशील पुरुष अपेक्षा की उपेक्षा करके अपना जीवन जीता है। अपेक्षाओं का गुलाम होकर दूसरों से उम्मीद ना रखकर आत्मविश्वास से अपने लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहता है। वास्तव में आत्मविश्वास आत्मनिर्भरता का सोपान है।

क्षमा से बढ़ कर और किसी बात में पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है। ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात्’ अर्थात् क्षमा सबसे बड़ा धन है, जो पाप को पुण्य में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। क्षमा अपेक्षा और उपेक्षा दोनों से बहुत ऊपर होती है। यह जीने का सर्वोत्तम अंदाज़ है। हमारे संतजन व सद्ग्रंथ इच्छाओं पर अंकुश लगाने की बात कहते हैं। जब हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेंगे, तो हमें किसी से अपेक्षा भी नहीं रहेगी और ना ही नकारात्मकता का हमारे जीवन में कोई स्थान होगा। नकारात्मकता का भाव हमारे मन में निराशा व दु:ख का सबब जगाता है और सकारात्मक दृष्टिकोण हमारे जीवन को सुख-शांति व आनंद से आप्लावित करता है। सो! हमें इन दोनों मन:स्थितियों से ऊपर उठना होगा, क्योंकि हम अपना सारा जीवन लगा कर भी आशाओं का पेट नहीं भर सकते। इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण व नज़रिए को बदलना होगा; चिंतन-मनन ही नहीं, मंथन करना होगा। वर्तमान स्थिति पर विभिन्न आयामों से दृष्टिपात करना होगा, ताकि हम अपनी संकीर्ण मनोवृत्तियों से ऊपर उठ सकें तथा अपेक्षा उपेक्षा के जंजाल से मुक्ति प्राप्त कर सकें। हर परिस्थिति में प्रसन्न रहें तथा निराशा को अपने हृदय मंदिर में प्रवेश ने पाने दें तथा प्रभु कृपा की प्रतीक्षा नहीं, समीक्षा करें, क्योंकि परमात्मा हमें वह देता है, जो हमारे लिए हितकर होता है। सो! हमें उसकी रज़ा में अपनी रज़ा मिला देनी चाहिए और सदा उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। हमें हर घटना को एक नई सीख के रूप में लेना चाहिए, तभी हम मुक्तावस्था में रहते हुए जीते जी मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे। इस स्थिति में हम केवल अपने ही नहीं, दूसरों के जीवन को भी सुख-शांति व अलौकिक आनंद से भर सकेंगे। ‘संत पुरुष दूसरों को दु:खों से बचाने के लिए दु:ख सहते हैं और दुष्ट लोग दूसरों को दु:ख में डालने का हर उपक्रम करते हैं।’ बाल्मीकि जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है। सो! अपेक्षा व उपेक्षा का त्याग कर जीवन जीएं। आपके जीवन में दु:ख भूले से भी दस्तक नहीं देगा। आपका मन सदा प्रभु नाम की मस्ती में खोया रहेगा–मैं और तुम का भेद समाप्त हो जाएगा और जीवन उत्सव बन जाएगा।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #165 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  “भावना के दोहे ।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 165 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

बीत गया पतझड़ अभी, छाने लगा बसंत।

अच्छे दिन अब आ गए, हुआ शीत का अंत।।

पौधे भी अब कर रहे, कलियों की ही आस।

देखो दस्तक दे रहा, खड़ा हुआ मधुमास।।

पीले खिलते फूल, सरसों पर छाने लगे।

है मौसम अनुकूल, रवि के दिन आने लगे।

सरसों पर छाने लगे, खिलते पीले फूल।

दिन रवि के आने लगे, है मौसम अनुकूल।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #152 ☆ ““युद्ध पर आधारित कुछ दोहे…” …” ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  “युद्ध पर आधारित कुछ दोहे। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 152 ☆

युद्ध पर आधारित कुछ दोहे ☆ श्री संतोष नेमा ☆

इस जग में सब चाहते,अपनी ऊँची नाक

रूस अमिरिका डरा कर,जमा रहे हैं धाक

चीन बढ़ाने में लगा, अपना साम्राज्य

ऊँच-नीच सब त्यागकर, करता सबको बाध्य

नौ महीने गुजर गए, अहम हुआ न शांत

रसिया का मन हो गया, अब तो खूब अशांत

ढेर तबाही के लगे, लोग हुये बेहाल

चले गए परदेश में, कह कर आया काल

रुकी उन्नति देश की, काम हुए अवरुद्ध

हिंसा,घृणा व क्रोध वश, छेड़ दिया है युद्ध

युद्ध बढ़ाता डर सदा, बन करके हैवान

पीड़ित होते आमजन, हमलावर शैतान

करें अमन की बात जो, वही बेचते शस्त्र

नव विध्वंसक बना कर, जमा करें नव अस्त्र

निर्धन को धमका रहा, कबसे पूँजीवाद

जमीं खनिज सब हड़प कर, करता खूब विवाद

दादा बनना चाहते, रूस अमरिका चीन

आज अहम की ये सभी, बजा रहे हैं बीन

महायुद्ध के शोर में, बचपन है खामोश

दिखें सशंकित आमजन, पनपे बस आक्रोश

कलियुग के इस युद्ध का, कोई नीति न धर्म

चाहें केवल जीत ही, उन्हें न कोई शर्म

रसिया केवल चाहता, दास बने यूक्रेन

उसकी मर्जी से चले, खोकर अपना चैन

नभ मंडल से बमों की, खूब करें बौछार

मानवता भी सिसकती, कैसा अत्याचार

तानाशाही बढ़ रही, केवल देखें स्वार्थ

जहाँ क्रूर शासक वहाँ, कहाँ रहे परमार्थ

करें वार्ता बैठकर, अंतस रहता रोष

चलें अमन की राह पर, कहता यह “संतोष”

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ गीत ऋग्वेद – मण्डल १ – सूक्त १५ (ऋतु सूक्त) ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ गीत ऋग्वेद – मण्डल १ – सूक्त १५ (ऋतु सूक्त) ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

ऋग्वेद – मण्डल १ – सूक्त १५ ( ऋतु सूक्त )

ऋषी – मेधातिथि कण्व : देवता – १- इंद्र; २- इंद्र; ३- त्वष्ट्ट; ४- अग्नि; ५- इंद्र; ६- मित्रावरुण; ७-१० द्रविणोदस् अग्निः; ११- अश्विनीकुमार; १२- अग्नि

ऋग्वेदातील पहिल्या मंडलातील पंधराव्या सूक्तात मेधातिथि कण्व या ऋषींनी इंद्र, त्वष्ट्ट, मित्र, वरुण, द्रविनोदस् अग्नि, अश्विनीकुमार आणि अग्नि या ऋतुकारक देवतांना आवाहन केलेले आहे. त्यामुळे हे सूक्त ऋतुसूक्त म्हणून ज्ञात आहे. 

मराठी भावानुवाद : 

इंद्र॒ सोमं॒ पिब॑ ऋ॒तुना त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः । म॒त्स॒रास॒स्तदो॑कसः ॥ १ ॥

ऋतुंसवे देवेंद्रा येउन सोमरसा प्राशुन घ्या  

तुमच्या उदरा सोमरसाने भरा तृप्त व्हावया 

प्राशन होता सोमरसाला बहू मोद लाभेल 

तुमच्या उदरी सोमरसही कृतार्थ तो होईल ||१||

मरु॑तः॒ पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद्य॒ज्ञं पु॑नीतन । यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः ॥ २ ॥

मरुत देवते सवे घेउनी ऋतू देवतांना 

सोमरसाला अर्पण करितो भक्तीने सर्वांना

पात्रातुनिया पान करावे मधूर सोमरसाचे

दानशूर तुम्ही दाना द्यावे यज्ञा साफल्याचे ||२||

अ॒भि य॒ज्ञं गृ॑णीहि नो॒ ग्नावो॒ नेष्टः॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑ । त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑ ॥ ३ ॥

यावे उभयता नेष्ट्र देवते अमुच्या यज्ञाला

धन्य करावे आम्हा अमुच्या प्रशंसून यज्ञाला

तुमचा  खजिना अमूल्य रत्ने वाहे ओसंडोनी

ऋतुसमवेत सोमरसाचे घ्यावे पान करोनी ||३||

 

अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह सा॒दया॒ योनि॑षु त्रि॒षु । परि॑ भूष॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑ ॥ ४ ॥

देवांना घेउनिया अग्निदेवा यागा यावे

तीन आसनांवरी तयांना विराजीतहि करावे

अलंकार त्यांवरी चढवुनी मोहक सजवावे

सर्व ऋतूंच्या संगे अनला सोमपाना करावे ||४||

ब्राह्म॑णादिंद्र॒ राध॑सः॒ पिबा॒ सोम॑मृ॒तूँरनु॑ । तवेद्धि स॒ख्यमस्तृ॑तम् ॥ ५ ॥

सोमपान करुनीया सारे ऋतू तुष्ट होता

प्राशन करि रे या कलशातुनी सोमरसा तू आता

हे देवेंद्रा तुझी कृपा तर शाश्वत अविनाशी  

प्रसन्न व्हावे आर्जव अर्पण तुमच्या पायाशी ||५||

यु॒वं दक्षं॑ धृतव्रत॒ मित्रा॑वरुण दू॒ळभं॑ । ऋ॒तुना॑ य॒ज्ञमा॑शाथे ॥ ६ ॥

सर्व तयारी यज्ञाची या झाली रे सिद्धता 

विघ्न आणण्या यासी कोणी समर्थ नाही आता 

सृष्टीपालक मित्रा वरुणा ऋतू घेउनी या

इथे मांडिल्या यज्ञाला स्वीकारायाला या ||६||

द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसो॒ ग्राव॑हस्तासो अध्व॒रे । य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते ॥ ७ ॥

हे द्रविणोदस अग्निदेवा आर्त ऋत्विज 

सोमरसाच्या निर्मीतीस्तव ग्रावा घेउनी सज्ज

यागयज्ञे तुम्हा आळवित भक्तीभावाने

वैभवाभिलाषा मनी धरुनी  अर्पीती अर्चने ||७||

द्र॒वि॒णो॒दा द॑दातु नो॒ वसू॑नि॒ यानि॑ श्रृण्वि॒रे । दे॒वेषु॒ ता व॑नामहे ॥ ८ ॥

दिगंत आहे महती थोर अशा वैभवाची

द्रविणोदस आम्हा होऊ द्यावी प्राप्ती त्याची

समस्त देवांना आळविले वैभवप्राप्तीस्तव

वैभव देण्या आम्हाला तू येई सत्वर धाव ||८||

द्र॒वि॒णो॒दाः पि॑पीषति जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत । ने॒ष्ट्रादृ॒तुभि॑रिष्यत ॥ ९ ॥

द्रविणोदाला सोमरसाचे प्राशन करण्याला 

आंस लागली पूर्ण कराया होऊ सिद्ध चला

नेष्ट्रा नि ऋतु यांचे झाले अजुनी हवी करा

द्रविणोदाग्नीच्या तुष्टीस्तव सोमा सज्ज करा ||९||

यत्त्वा॑ तु॒रीय॑मृ॒तुभि॒र्द्रवि॑णोदो॒ यजा॑महे । अध॑ स्मा नः द॒दिर्भ॑व ॥ १० ॥

हे द्रविणोदा हवी अर्पिण्या तुम्ही हो चवथे

सर्व ऋतूंच्या सवे तुम्हाला हविर्भाग अर्पिले

स्वीकारुनिया घेइ तयासी कृपावंत होउनी 

प्रसाद देई आम्हा आता तू प्रसन्न होवोनी ||१०||

अश्वि॑ना॒ पिब॑तं॒ मधु॒ दीद्य॑ग्नी शुचिव्रता । ऋ॒तुना॑ यज्ञवाहसा ॥ ११ ॥

दिव्य कांतिच्या पुण्यव्रता हे अश्विनी देवा

यज्ञसिद्धीचा पवित्र पावन वर आम्हा द्यावा

सवे घेउनीया ऋतुदेवा यागास्तव यावे

सोमरसाचे प्राशन करुनी आम्हा धन्य करावे ||११||

गार्ह॑पत्येन सन्त्य ऋ॒तुना॑ यज्ञ॒नीर॑सि । दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज ॥ १२ ॥

गार्ह्यपत्य हे अग्नीदेवा अमुचा गृहस्वामी तू 

सर्व ऋतुंच्या बरोबरीने अध्वर्यू  होशी तू  

मान देऊनी आर्जवासि या पाचारण हो करा 

हविर्भागासह यज्ञाला देवांना अर्पण करा ||१२||

(हे सूक्त व्हिडीओ  गीतरुपात युट्युबवर उपलब्ध आहे. या व्हिडीओची लिंक येथे देत आहे. हा व्हिडीओ ऐकावा, लाईक करावा आणि सर्वदूर प्रसारित करावा. कृपया माझ्या या चॅनलला सबस्क्राईब करावे.)

https://youtu.be/WWfSmTvHD3w

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Preview YouTube video Rugved Mandal 1 Sukta 22 Rucha 15 – 21

Rugved Mandal 1 Sukta 22 Rucha 15 – 21

© डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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