हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 115 ☆ ग़ज़ल – “खून के रिश्तों में भी अब खून की गर्मी नहीं…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक ग़ज़ल – “खून के रिश्तों में भी अब खून की गर्मी नहीं …” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ काव्य धारा #115 ☆  ग़ज़ल  – “खून के रिश्तों में भी अब खून की गर्मी नहीं…” ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

दूर अपनों से ही अपने हो गये अब इस कदर

सुख-दुखों की उनकी खबरों तक का होता कम असर।

 

दुनिया तो छोटी हुई पर बटीं दिल की दूरियाँ

रिश्तेदारों को बताने के लिये है नाम भर।

 

नहीं रह गई रिश्तेदारों की कोई परवाह अब

अकेले ही चल रहा है हरेक जीवन का सफर।

 

खून के रिश्तों में भी अब खून की गर्मी नहीं

फोन पर भी बात करने की न कोई करता फिकर

 

दरारें दिखती हैं हर परिवार की दीवार में

दूर जाकर बस गये हैं लोग इससे छोड़ घर।

 

अपनी-अपनी राह सब चलने लगे नई उम्र के

बड़े बूढ़ों का न ही आदर रहा न कोई डर।

 

हर एक का आहत है मन संबंधियों की चाल से

सह रहे चुपचाप पर मन मारके करके सबर

 

समय संग है फर्क आया सभी के व्यवहार में

हर जगह चाहे हो कस्बा, गाँव या कोई शहर।

 

जमाने की हवा नें बदला है सबको बेतरह

होके नाखुश भी किसी से कोई नहीं सकता बिफर

 

मानता मन जब नहीं उठती है ममता की लहर

पूंछ लेते दूसरों से अपनों की अच्छी खबर। 

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ साहित्य की दुनिया ☆ प्रस्तुति – श्री कमलेश भारतीय ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 साहित्य की दुनिया – श्री कमलेश भारतीय  🌹

(साहित्य की अपनी दुनिया है जिसका अपना ही जादू है । देश भर में अब कितने ही लिटरेरी फेस्टिवल आयोजित किये जाने लगे हैं । यह बहुत ही स्वागत् योग्य है । हर सप्ताह आपको इन गतिविधियों की जानकारी देने की कोशिश ही है – साहित्य की दुनिया)

साहित्य की दुनिया में नयी से नयी किताबें आती रहती हैं । इस सप्ताह जिस किताब को सबसे ज्यादा चर्चा मिली वह है -जादूनामा ! फिल्मी गीतकार जावेद अख्तर के जीवन की रोचक घटनाओं पर आधारित । बचपन में जावेद अख्तर का घर का नाम जादू ही था, इसलिए इस किताब का नाम जादूनामा रखा गया, जो उचित ही है । इसमें जावेद अख्तर के जीवन के अनेक रोचक प्रसंग हैं । अभिषेक ने यह जीवनी लिखी है । प्रसिद्ध गीतकार /लेखक गुलज़ार ने इसका विमोचन किया । पिछले वर्ष प्रसिद्ध अभिनेत्री दीप्ति नवल की पुस्तक आई थी – ए कंट्री दैट काल्ड चाइल्डहुड ! अंग्रेजी में 350 पन्नों में फैली हुई । इसमें अमृतसर में बिताये अपने अठारह वर्षों की यादें लिखी गयी हैं जो न केवल रोचक है, बल्कि अपने समाज, अपने समय और फिल्म की यात्रा भी करवाती हैं । इसके प्रचार में भी शर्मिला टैगोर से लेकर शबाना आजमी तक साथ आ खड़ी हुई थीं ।

अब सवाल यह उठता है कि फिल्मी सेलिब्रिटीज या राजनेताओं की पुस्तकें प्रकाशित होने पर मीडिया ही नहीं प्रकाशक भी रूचि लेते हैं इसके प्रचार प्रसार में ! प्रमुखता से समाचार, फोटोज और मुख्य बातें प्रकाशित की जाती हैं । दीप्ति नवल को प्रकाशक न केवल अमृतसर, लुधियाना , जालंधर दिल्ली , रायपुर और दो दो बार चंडीगढ़ लेकर गये काॅफी विद दीप्ति कार्यक्रम बनाकर । बहुत ही अच्छी बात लेकिन हिंदी प्रकाशक किसी किताब को इतने भव्य स्तर पर प्रचारित क्यों नहीं करते ? मुझे याद आते हैं दो उदाहरण । एक योजना रावत के कथा संग्रह का विमोचन और चर्चा वाणी प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी ने पंजाब विश्वविद्यालय में आयोजित की थी जिसमें राजी सेठ और निर्मला जैन आई थीं । दूसरा रेणु हुसैन के कथा संग्रह का दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल हाउस में उनके कथा संग्रह ‘गुण्टी’ का विमोचन जो उन्होंने अपने स्तर पर आयोजित किया और प्रकाशक भी मौजूद रहा । इसका विमोचन प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा , लक्ष्मी शंकर वाजपेयी , ममता किरण, सुमन केशरी ने किया और मुझे भी इसमें शामिल किया गया था । यही नहीं सबसे ताजा उदाहरण प्रलेक प्रकाशन और संपादक डाॅ प्रेम जनमेजय का है जो धर्मवीर भारती : धर्मयुग के झरोखे से पुस्तक का विमोचन मुम्बई में पुष्पा भारती के हाथों भव्य ढंग से हुआ । इनके अतिरिक्त हिंदी पुस्तक के प्रकाशन पर कोई ढंग का समारोह कम ही होता है । यह बहुत दुखद है । हिंदी प्रकाशकों को अपने तौर तरीके बदलने चाहिए।

साहित्य अमृत उत्सव : हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डाॅ चंद्र त्रिखा ने आजादी के अमृत महोत्सव को साहित्य के अमृत महोत्सव में बदलने का अच्छा प्रयास किया । इसके डिजीटल मंच पर प्रदेश के महत्वपूर्ण कवियों का एकल पाठ आयोजित किया जा रहा है जो धीरे धीरे लोकप्रिय होता जा रहा है और इसमें काव्य पाठ करने की होड़ बढ़ती जा रही है ।

हिसार में हरियाणवी काव्य गोष्ठी : हरियाणा में हिसार साहित्यिक दृष्टि से बहुत समृद्ध है और यहां हर सप्ताह निरंतर काव्य गोष्ठियां व अन्य आयोजन होते रहते हैं । सर्वोदय भवन में पिछले पचास वर्ष से ऊपर साप्ताहिक गोष्ठी होती है जो बहुत ही चर्चित है । यहां पिछले वर्ष भगत सिंह के भांजे प्रो जगमोहन सिंह को भी व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया था । कभी यहां योगेन्द्र यादव, श्रीकांत आप्टे और न जाने कितने विचारक यहां आते रहे हैं । इसी सर्वोदय भवन में हर वर्ष के अंतिम रविवार को काव्य गोष्ठी आयोजित करने की शानदार परंपरा है । इसके अतिरिक्त हरियाणवी काव्य गोष्ठी भी नगर में हुई जिसमें जयभगवान लाडवाल , कृष्ण इंदौरा , शर्मा बंधु , कमलेश भारतीय, वीरेंद्र कौशल, सरफराज और ऋषि कुमार सक्सेना आदि ने काव्य पाठ किया ।

सरस्वती सुमन का कथा विशेषांक : जहां व्यावसायिक पत्रिकायें अपने पन्ने राजनिति को दे रही हैं, वहीं देहरादून से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका सरस्वती सुमन साहित्यिक विशेषांक दे रही है । दिसम्बर अंक कथा विशेषांक है जो प्रसिद्ध रचनाकार शशि पुरवार के अतिथि संपादन में आया है । इसमें रवींद्रनाथ टैगोर की पोस्टमास्टर, मुंशी प्रेमचंद की बड़े घर की बेटी और फणीश्वरनाथ रेणु की ठेस कहानियां भी दी गयी हैं तो चित्रा मुद्गल की ताजमहल, सुधा अरोड़ा की उधड़ा हुआ स्वैटर, कमलेश भारतीय की नदी और लहरें, सुधा ओम ढींगरा की मकड़जाल, खुद संपादिका शशि पुरवार की वो 21 दिन सहित कुल अट्ठाइस कहानियां अपने आप में एक कथा संग्रह का स्वाद देती हैं । पिछले वर्ष ही शशि पुरवार के अतिथि संपादन में इसी पत्रिका का नारी विशेषांक भी खूब चर्चित रहा । इसी पत्रिका ने किन्नर विशेषांक भी दिया । इधर मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका साक्षात्कार की ओर से पहले लघुकथा विशेषांक और अब गीत विशेषांक प्रकाशित किये गये हैं । ये संपादक विकास दवे की कोशिशों के चलते संभव हुआ । रश्मि अभय ने अपनी संस्था देवशील मेमोरियल की ओर से दिसम्बर में स्पर्शिका स्मारिका का प्रकाशन की । ये प्रयास सराहनीय हैं । दिनेशपुर से पलाश विश्वास के संपादन में प्रेरणा अंशु भी लगातार विशेषांक देकर अच्छा काम कर रही है । अभी इसका गजल विशेषांक आया और पहले ग्रामीण विशेषांक दिया । यही नहीं पिछले वर्ष दिनेशपुर में लघु पत्रिका सम्मेलन भी आयोजित किये । सभी के प्रयासों को सलाम !

अगले सप्ताह फिर मिलेंगे नयी गतिविधियों के साथ ।

साभार – श्री कमलेश भारतीय, पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क – 1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

(आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी द्वारा साहित्य की दुनिया के कुछ समाचार एवं गतिविधियां आप सभी प्रबुद्ध पाठकों तक पहुँचाने का सामयिक एवं सकारात्मक प्रयास। विभिन्न नगरों / महानगरों की विशिष्ट साहित्यिक गतिविधियों को आप तक पहुँचाने के लिए ई-अभिव्यक्ति कटिबद्ध है।)  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 135 – बाळ गीत –  शाळेत जाऊ द्याल का ? ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे ☆

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 135 – बाळ गीत –  शाळेत जाऊ द्याल का ?  ☆

आई बाबा आई बाबा

पाटी पेन्सिल घ्याल का!

पाटीवरती घेऊन दप्तर

शाळेत जाऊ द्याल का!

 

भांडी कुंडी भातुकली

आता नको मला काही।

दादा सोबत एखादी

द्याल का घेऊन वही।

 

नका ठेऊ मनी आता

मुले मुली असा भेद।

शिक्षणाचे द्वार खोला

भविष्याचा घेण्या वेध।

 

कोवळ्याशा मनी माझ्या

असे शिकण्याची गोडी।

प्रकाशित जीवन होई

ज्योत पेटू द्या ना थोडी।

 

पार करून संकटे

उंच घेईल भरारी।

आव्हानांना झेलणारी

परी तुमची करारी।

 

सार्थ करीन विश्वास

थोडा ठेऊनिया पाहा।

थाप अशी कौतुकाची

तुम्ही देऊनिया पाहा

 

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ ‘आयुष्याचं गणित’ (कवितासंग्रह)  – डाॅ. मिलिंद विनोद ☆ परिचय – श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ ‘आयुष्याचं गणित’ (कवितासंग्रह)  – डाॅ. मिलिंद विनोद ☆ परिचय – श्री अरविंद लिमये ☆

कवी : डॉ. मिलिंद विनोद. 

प्रकाशक : नवचैतन्य प्रकाशन, बोरिवली. 

अर्थवित्त क्षेत्रासारख्या रुक्ष कार्यक्षेत्रात प्रदीर्घ काळ वाटचाल करतानाही जगण्याकडे पहाण्याची सजगदृष्टी अतिशय जाणीवपूर्वक जपणाऱ्या डाॅ .मिलिंद विनोद यांचा  ‘आयुष्याचं गणित ‘ हा विविध बाजाच्या, शैलीतल्या,

कधी मिष्किल तर कधी उपरोधिक भाष्य करत अंतर्मुख करणाऱ्या कवितांचा संग्रह.       

डाॅ. विनोद यांची कविता आजवर ‘कविता’ या साहित्यप्रकाराला अपेक्षित असणाऱ्या मापदंडांच्या बंधनात अडकून न पडता मोकळेपणाने व्यक्त होऊ पहाणारी कविता आहे. प्रत्येकीचा आशय, विषय, रुप, शैली सगळं वेगळं तरीही तिचं स्वरूप मात्र हे वैशिष्ट्य ल्यालेलंच.

आयुष्यात सहज जाताजाताही खुपणाऱ्या बोचणाऱ्या विसंगती कवितांच्या रूपात व्यक्त करतानाही मिष्किलता जपणाऱ्या, तरीही ती बोच बोथट होऊ न देणाऱ्या यातील कविता मनात रेंगाळत रहाणाऱ्या आहेत.

खुमासदार, गंमतीशीर, विषय-आशयाचे थेट अधोरेखन न करणाऱ्या, चटकन् अर्थबोधही न होणाऱ्या  शीर्षकांमागचं रहस्य जाणून घेण्यासाठी ती कविता वाचायला रसिकांना उद्युक्त करते, हे या काव्यसंग्रहाचं मला प्रथमदर्शनी जाणवलेलं खास वैशिष्ट्य ! ‘ मापट्याच्या अल्याड मापट्याच्या पल्याड ‘, ‘ बत्ती गुल’, ‘शेखचिल्ली’,’आर आर आर चा पाढा ‘, ‘रम आणि राम’  ही अशा खुमासदार शीर्षकांची कांही प्रातिनिधिक उदाहरणे !

या संग्रहात मराठी आणि हिंदी अशा दोन विभागात एकूण सत्तर+ कविता आहेत. काही अल्पाक्षरी तर काही दीर्घ.

प्रारंभ होतो ‘हेरंब’ आणि ‘गणराया’ या गणेश-वंदनेच्या रूपातल्या श्री गणेशाला अर्पण केलेल्या दोन काव्यरूपी भावफुलांनी !

त्यानंतरचा एखाददुसरा अपवाद वगळता बाकी कविता मात्रांच्या हिशोबात स्वतःची ओढाताण करुन न घेणाऱ्या, तरीही आपली अंगभूत लय अलगदपणे जपणाऱ्या आहेत. अत्यावश्यक तिथेच आणि तेवढेच इंग्रजाळलेले शब्द पण तेही कवितेला आवश्यक म्हणून आलेले आणि तिला वेगळंच रुप बहाल करुन जाणारे. इतर सर्वच कविता न् शायरींमधे अनुक्रमे मराठी आणि हिंदी/उर्दू  भाषांवरील प्रभुत्त्व खास जाणवणारे ! प्रदीर्घकाळ परदेशात व्यतीत करूनही त्या वातावरणाचा कणभरही परिणाम होऊ न देता मराठी भाषेवरील प्रभुत्व अबाधित राखणं आवर्जून कौतुक करावं असंच आहे. याचं प्रत्यंतर सुरुवातीच्याच ‘ मापट्याच्या अल्याड मापट्याच्या पल्याड’ ही कविता देते. मीठमोहरीचं पंचपाळं, मोहरीसारखं तडतडणं,नवऱ्याला कणकेसारखं तिंबणं, पोळीला सुटणारा छानसा पापुद्रा यासारख्या या कवितेला अभिप्रेत असणारं मराठमोळं वातावरण जपणाऱ्या  प्रतिमा, तसेच चपखल म्हणी आणि वाक्प्रचार यांचा या कवितेतील वापर हे सगळं आवर्जून दखल घ्यावी असंच.

यात  रेखाटलेले सासूसुनेचे नाते आणि त्या नात्यातले संबंध न् संघर्ष, ही कविता टोकदार होऊ  देत नाही तर ती त्यातील सामंजस्य जपू पहाते हे तिचे वेगळेपण !

‘माझ्या पोटच्या गोळ्याला कणकेसारखा तिंबून, पोळीला छानशा सुटलेल्या पापुद्रयाप्रमाणे

अलगद वेगळीही झालीस ‘ असं म्हणणाऱ्या सासूला ‘मायेच्या उबेत सतत जपलंत त्याला, आता सळो की पळो करून सोडलंय त्यानं मला’ असं म्हणत नवऱ्याच्या वागण्याचा दोष सासूलाच देणारी सून. या दोघींचे पुढचे सगळेच खरपूस संवाद मुळातूनच वाचण्यासारखे आहेत. ‘ मापट्याच्या पलीकडची तू सुपातली अन् मापट्याच्या अलीकडची मी– जात्यातली. भरडणं चुकलं नाहीये ते दोघींच्या कपाळी..’ हे सासूचे  शब्द सुनेला स्त्री म्हणून समजून घेताना तिला स्त्री जन्माच्या वास्तवाची वेळीच ओळख करून देतात. दोघींनीही नेहमीच फणा न काढता मायेचा गोफही  विणावा हे सांगणारी ही कविता आशयाला वेगळेच परिमाण देते.

यानंतर लगेचच येणारी ‘कार्टं ऑफ हॅविंग टू आर्ट ऑफ लव्हिंग ‘ ही कविता परस्परभिन्न जातकुळीतली.

‘आमच्या वेळी सर्रास होते मराठी माध्यम, कळलेच नाही केव्हा झाले त्याचे मराठी मिडियम ‘ अशी विषयाची थेट सुरुवात असणारी ही कविता.ती त्या विषयास आवश्यक अशा इ़ंग्राजळेल्या मराठी भाषेतली प्रदीर्घ कविता आहे.ही एकच कविताही कवीच्या अनुभवविश्वाच्या विस्तृत परिघाचा प्रत्यय देण्यास पुरेशी ठरावी.

बदलत्या काळानुसार शिक्षणपद्धतीत आणि एकंदरीत जीवनशैलीत झालेल्या बदलांमुळे होत गेलेली सर्वदूर पडझड ‘जनरेशन नेक्स्ट’, ‘आजचा सुविचार-मिली भगत’, ‘बत्तीगुल’ अशा अनेक कवितांमधून दृश्यरुप होते.

निसर्ग उद्ध्वस्त करीत विकासाची स्वप्ने पहाणाऱ्या माणसामुळे अस्वस्थ झालेल्या प्राण्यांच्या मनातली घुसमट त्यांना असह्य होते तेव्हा ते प्राणी माणसाला कसा धडा शिकवतात याचे प्रत्यंतर देणाऱ्या भयप्रद स्वप्नातून जाग येताच माणूस खऱ्या अर्थाने कसा जागा होतो याचे अस्वस्थ कल्पनाचित्र रेखाटणारी ‘आर आर आर चा पाढा ‘ ही कविता या शीर्षकाचा अर्थ समजून घ्यायला मुळातूनच वाचायला हवी.

‘अक्कलखाते’ मधील माणसांचे विविध नमुनेही आवर्जून पहाण्यासारखे आहेत. ‘प्रिप्रे ते प्रप्र तत पप ते तप्त- प्रवास तीन तपांचा’ ही गंमतीशीर लांबलचक आणि चटकन् अर्थबोध न होणाऱ्या शीर्षकाची  मिष्किल,विनोदी शैलीतली कविता म्हणजे तीन तपातील प्रचंड बदल आणि पडझडी पचवलेल्या प्रदीर्घ प्रवासातील विविध स्क्रिनशाॅटस् म्हणता येतील.वाचताना हसवणारे न् हसवता हसवता नकळत फसवत वाचकांना स्वत:चं जगणंही एकदा तपासून पहायला प्रवृत्त करणारे! यातील ‘तोंडसुख’ या शब्दातील  श्लेषार्थ, तसेच इतरही अनेक शब्दांत लपलेल्या विविध छटांचा वेध हे सगळं वेगळ्या, अनोख्या शैलीने अधिकच सजलेलं!

‘पॉलिटिशिअन स्पीक्स् ‘ मधे माणसाची होत गेलेली अधोगती ‘स्फटिकासारखा स्वच्छ होता पांढरा माझा पैसा, कळलंच नाही कधी झाला काळा त्याचा कोळसा ‘ अशा थेट वास्तवाला भिडणाऱ्या कथनाद्वारे ठळकपणे अधोरेखित होते.

‘मिस्टर पर्सेंटेज’ ही कविता व्यवस्थेला लागलेली कीड रोखठोकपणे चव्हाट्यावर आणते.यातील भ्रष्टाचाराला लावलेली ‘एजन्सी हँडलिंग चार्जेस’ , ‘फास्टट्रॅक प्रोसेसिंग फीज ‘, यासारखी नवीन शिष्टसंमत लेबल्स त्या किडीचं पोखरणं किती सर्रास सराईतपणे सुरु आहे हे सांगण्यास पुरेशी आहेत.

आवर्जून उल्लेख करावासा वाटतो तो ‘ सल ‘या कवितेचा! या संग्रहातील स्वतःच्या वेगळेपणामुळे उठून दिसणारी ही कविता मला विशेष भावली.

समुद्रकिनारा, लाटा, पायाखालची सरकणारी.. पावलाना गुदगुल्या करणारी वाळू, विशाल विस्तीर्ण क्षितिज, अशा प्रतिमांच्या विविध रंगांच्या शिडकाव्यांनी  धुंद होत गेलेल्या वातावरणाचाच एक भाग बनून गेलेली ‘ती’ आणि ‘तो’ यांच्या मनासारख्या कधीच न फुललेल्या नात्याची ‘सल’ ही अनोखी कविता! एखादी रूपक कथा अलगद उलगडत जावी तशी ही कविता उमलत जाते.त्याच्या विशीपासून जीर्ण, जर्जर,  विकारग्रस्त वृद्धापकाळपर्यंत त्याला सतत अस्वस्थ करीत राहिलेल्या तिच्या अलवार आठवणींनी व्याकुळ झालेला तो !आणि त्याच्या मनातील भावनांचा कोंडमारा व्यक्त करणाऱ्या या कवितेचा उलगडत गेलेला पट!

‘तो’ म्हणजे कवी पण ‘ती’ म्हणजे नेमकी कोण या प्रश्नाचं कवितेच्या आस्वादकांना गवसणारं उत्तर प्रत्येकाच्या विचारांच्या दिशेनुसार वेगवेगळे असू शकेल कदाचित, पण कवीच्या शब्दातून स्पष्टपणे व्यक्त न केलेली तिची ओळख मला अंधूक का होईना जाणवली ती ‘कवीची प्रतिभा’ या रुपातली! ही ओळख मनात जपत कविता पुन्हा वाचताना तिच्या पाऊलखुणा याच रुपात अधिक स्पष्ट होत गेल्या एवढं खरं!

‘शायरी’ विभागातील उर्दू मिश्रित हिंदी काव्यरचनाही आवर्जून दखल घ्याव्यात अशा आहेत. विषयवैविध्य, व्यंगात्मक शैली, थेट, रोखठोक आणि सुलभ रचनाकौशल्य ही वैशिष्ट्ये इथेही दिसून येतात.

प्रेम, विरह, सहजीवन या विषयांवरील बहुतांशी कवितांचा विषय तोच असला तरी त्या रचनांमधल्या वैविध्यामुळे त्या लक्ष वेधून घेतात.या दृष्टीने परायी काया,एहसास-ए-रुह, गुस्ताखी माफ,शबनबी थी सारी राते, कब्र, जुनून-ए -मजनूॅं, खुदकुशी, जले शोले राख तले, अशा अनेक कवितांचे उल्लेख करता येतील.हिंदी-उर्दूच्या लहेजामुळे तर यातील आशय अधिक तीव्रतेने भिडतो.

वेगळ्या आशय- विषयांमुळे उठून दिसणाऱ्या काही खास कवितांचा इथे आवर्जून उल्लेख करायला हवा.        पाण्याच्या एका थेंबाची पाऊस,अश्रू,घाम अशी विविध रुपांमधली भावना व्यक्त करणारी ‘बूॅंद’ ही कविता हे एक प्रातिनिधिक उदाहरण.

‘सत्ता संपत्ती संततीने बदले तेरे नूर,बनकर मगरूर तू हुआ अपनोंसे दूर’ हे ‘बुराई अच्छाई का राही ‘ या कवितेतील भरकटलेल्या माणसाचे वर्णन असो, की ‘मुजरा आणि मुशायरा’ मधे कवी आणि अदाकारा या शायरीच्या एकाच नाण्याच्या दोन बाजूंची तुलना करताना ‘जवानी का ढलना मुजरेका मुरझाना, जवानी पलभर शब्द निरंतर’ हे वास्तव अधोरेखित करणारा निष्कर्ष असो, दोन्हीही त्या त्या कविता लक्षवेधी बनवतात.

जीवनाचं अस्वस्थ करणारं बोचरं सत्य व्यक्त करणाऱ्या ‘दो गज जमीन’, ‘शहादत की कुर्बानी’, ‘चादर ए आसमान’ या कविताही दीर्घकाळ मनात रेंगाळतील अशाच!

सहज जाणवलेला एक योगायोग म्हणजे यातील मराठी व हिंदी या दोन्ही विभागात असलेल्या ‘जनरेशन नेक्स्ट’ या एकाच शीर्षकाच्या दोन कविता ! विशेष हे की या दोन्ही कवितांचा आशय आणि विषय एकच असला तरी त्यांची मांडणी मात्र सर्वस्वी भिन्न तरीही भावणारी !

या कवितासंग्रहाचं मला जाणवलेलं वेगळपण ध्वनित करण्यापुरता वानगीदाखल घेतलेला त्यातील काही मोजक्या कवितांचा हा प्रातिनिधिक आढावा आहे.         

मा.लक्ष्मीकांत देशमुख यांनी त्यांच्या प्रस्तावनेत उल्लेख केल्याप्रमाणे यातील बहुतेक सर्व दीर्घ कविता वाचनापेक्षाही त्यांचे मंचीय सादरीकरण अधिक परिणामकारक ठरेल अशा आहेत.

‘आयुष्याचं गणित’ या संग्रहातील कविता आयुष्याच्या गणितांची मांडणी, ती गणिते सोडवण्याची प्रत्येकाची वेगवेगळी रीत, आणि हाती लागलेल्या उत्तरांची अचूकता ताळा करून पहाण्याची प्रेरणा, या तीनही अंगांनी आकाराला येताना आशय-विषयांनुरुप आपापले वेगळे रूप घेऊन व्यक्त होताना दिसतात. आणि त्यामुळेच त्या रसिकांना काव्यानंद देतानाच विचारप्रवृत्त करणाऱ्याही ठरतील असा विश्वास वाटतो.

पुस्तक परिचय – श्री अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #165 ☆ परिस्थिति बनाम मन:स्थिति ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  मानवीय जीवन पर आधारित एक अत्यंत विचारणीय आलेख परिस्थिति बनाम मन:स्थिति। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 165 ☆

☆ परिस्थिति बनाम मन:स्थिति  ☆

‘जब परिस्थिति को बदलना मुमक़िन न हो, तो मन की स्थिति बदल लीजिए; सब कुछ अपने आप बदल जाएगा।’ परिस्थितियां सदैव हमारे अनुकूल व इच्छानुसार काम नहीं करती और आपदाएं व विपरीत हवाएं अक्सर हमारे पथ में अवरोधक बन कर आती हैं। ऐसी स्थिति में मानव हैरान-परेशान हो जाता है, क्योंकि जीवन में ‘नहीं’ शब्द सुनना किसी को नहीं भाता। जब मानव परिस्थितियों को बदलने में स्वयं को असमर्थ पाता है, तो उसके लिए अपनी मन:स्थिति अर्थात् सोच को बदल लेना बेहतर विकल्प है। नकारात्मक सोच के कारण उसे हर वस्तु में केवल दोष ही दोष नज़र आते हैं और हर व्यक्ति उसे निपट स्वार्थी व आत्मकेंद्रित भासता है। उसके हृदय में शक़, संदेह व संशय का भाव इस क़दर घर कर जाता है कि वह विश्वास से स्वयं को कोसों दूर पाता है। परंतु जब मानव अपनी मन:स्थिति व सोचने का ढंग बदल लेता है, तो उसे वीराना भी गुलशन भासता है और वह जीवन में अभाव व शून्यता को नकार संपूर्णता के दर्शन पाता है। उसे गिलास आधा खाली नहीं; भरा दिखाई देता है। बस अपनी सोच और नज़रिया बदलने से यह संसार हमें ख़ुशनुमा प्रतीत होता है। पल-पल रंग बदलती प्रकृति हमारे हृदय को आंदोलित व आनंदोल्लास से आप्लावित करती है। उस स्थिति में प्रकृति हमें ‘माया महा-ठगिनी’ नहीं प्रतीत होती, बल्कि संगिनी-सम भासती है।

‘सौंदर्य व्यक्ति के नेत्रों में नहीं, उसके नज़रिया में होता है’ वर्ड्सवर्थ का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि सौंदर्य व्यक्ति में नहीं, दृष्टा के नेत्रों में होता है। इसलिए कहा जाता है नज़रें बदलिए, नज़ारे स्वयं बदल जाएंगे अर्थात् नज़रिया बदलने से मानव का जीने का ढंग स्वत: परिवर्तित हो जाएगा। समय और समझ दोनों एक साथ किस्मत वालों को ही मिलते हैं, क्योंकि अक्सर समय रहते मानव को समझ नहीं आती और समझ आने पर समय हाथ से निकल जाता है। सो! समय और समझ का छत्तीस का आँकड़ा है। दोनों निर्धारित समय पर दस्तक नहीं देते, क्योंकि हम आजीवन मायाजाल में फंसे रहते हैं और अहं के जंजाल से मुक्त नहीं हो पाते। इसका मुख्य कारण है कि हम स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझते हैं और अन्य लोगों से अलग-अलग पड़ जाते हैं।

परंतु एक अंतराल के पश्चात् जब हमें समझ आती है, तो एकांत हमें सालने लगता है और हम उन सबके सानिध्य में रहना चाहते हैं, जिनसे हम वर्षों पूर्व किनारा कर आए थे। परंतु अब उन्हें हमारी दरक़ार नहीं होती और वे हमसे मुंह फेर लेते हैं। उन असामान्य परिस्थितियों में हमारी स्थिति ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ जैसी हो जाती है। हम चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि परिस्थितियों पर हमारा वश नहीं रहता। ऐसे समय में यदि मानव अपनी मन:स्थिति परिवर्तित कर लेता है, तो वह तनाव या अवसाद की स्थिति से मुक्त रह पाता है, अन्यथा वह उस चक्रव्यूह में फंस स्वयं को असहाय दशा में पाता है। इसके विपरीत यदि मानव समय के प्रभाव व महत्ता को अनुभव करते हुए सही निर्णय लेकर अपना जीवन बसर करता है, तो उसकी जीवन रूपी गाड़ी सीधी-सपाट दिशा में चलती रहती है, अन्यथा वह स्वयं को सुनामी की गगनचुंबी लहरों में कैद अनुभव करता है। लाख प्रयास करने पर भी वह उस चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हो पाता और उसकी दशा पंखहीन पक्षी जैसी हो जाती है।

‘भाग्य कोई लिखा हुआ दस्तावेज़ नहीं है। उसे तो रोज़-रोज़ स्वयं लिखना पड़ता है’ अर्थात् मानव ख़ुद अपना भाग्य-निर्माता है। मुझे स्मरण हो रही हैं वे पंक्तियाँ ‘जैसे कर्म करेगा, वैसा फल पायेगा इंसान’ अर्थात् मानव को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है। सो! मानव अपने नित्य कर्मों परिश्रम, साहस, लगन व धैर्य द्वारा अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। उसे कभी भी ज़िद्दी नहीं होना चाहिए, बल्कि समय व परिस्थितियों के अनुसार अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहिए। जो व्यक्ति समयानुसार समझ से अपने कार्य को अंजाम देता है; सफलता सदैव उसके कदम चूमती है। सो! मानव का स्वभाव लचीला व दृष्टिकोण समझौतावादी होना चाहिए, क्योंकि अकड़ व अभिमान एक मानसिक रोग है, जिसका इलाज क़ुदरत समय पर अवश्य करती है। ऐसा व्यक्ति अक्सर आत्मकेंद्रित होता है और दूसरों के अस्तित्व को अहमियत नहीं देता। परिणामतः वह नकारात्मकता का भाव उसे पतन की राह की ओर अग्रसर करता है।

‘वह शख्स जो झुक के तुमसे मिला होगा/ यक़ीनन उसका क़द तुमसे बड़ा होगा’ मानव में निहित विनम्रता के सर्वश्रेष्ठ भाव को दर्शाता है। जो व्यक्ति अहंनिष्ठ नहीं है और ज़मीन से जुड़ा हुआ है; वह दूसरों से सदैव झुक कर मिलता है; दुआ सलाम करता है। वास्तव में उसका क़द दूसरों से बड़ा होता है, क्योंकि मीठे फल उन डालियों पर लगते हैं, जो झुकी रहती हैं। इसलिए मानव को सदैव विनम्र व मौन रहने की सीख दी जाती है, क्योंकि मौन उसका सबसे बड़ा आभूषण है। मौन और मुस्कान दोनों का प्रयोग कीजिए, क्योंकि मौन रक्षा-कवच है और मुस्कान स्वागत-द्वार। मौन से आगामी आपदाओं को रोका जा सकता है, तो मुस्कान से कई समस्याओं का हल निकाला जा सकता है–उक्त कथन अत्यंत कारग़र है। इसलिए मानव को सदैव प्रसन्न रहने का संदेश दिया जाता है। वास्तव में मौन एक संजीवनी है, तो मुस्कान बंद द्वारों को खोलने की चाबी है, जिसके द्वारा आप सबके प्रिय बन सकते हैं। वे मानव को काम क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि से दूर रखते हैं और उस स्थिति में स्व-पर व राग-द्वेष उसके निकट आने से क़तराते हैं।

‘अंधेरों की साज़िशें रोज़-रोज़ होती हैं/ फिर भी उजाले की/ हर सुबह जीत होती है।’ यह कथन मानव के आत्मविश्वास की ओर इंगित करता है कि रात्रि के समय अंधकार का पदार्पण होता है और उसके पश्चात् सुबह का आगमन अवश्यंभावी  है। अंधकार पर प्रकाश की विजय होना निश्चित् है। ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ यह समां बदलता है/ जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ दिल को/ मिलता नहीं सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात् बदलते हैं’  स्वरचित मुक्तक यह संदेश देता है कि समय परिवर्तनशील है और उसके साथ हमारी मन:स्थिति भी बदलती रहती है। जिस प्रकार सुरों के साथ संगीत के होने से सोने पर सुहागा हो जाता है और वह गीत अमर हो जाता है। इसलिए ऐ मानव! धैर्य और भरोसा रख; समय व परिस्थिति के अनुकूल अपनी मन:स्थिति को बदलने का उपक्रम कर, तो कोई भी आपदा तेरे जीवन में दस्तक नहीं दे पाएगी और सफलता तेरे कदमों में आँचल बिछाए प्रतीक्षारत रहेगी।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #164 ☆ भावना के दोहे – मकर सक्रांति /लोहड़ी ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है  “भावना के दोहे – मकर सक्रांति /लोहड़ी।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 164 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मकर सक्रांति /लोहड़ी ☆

लोहड़ी की धूम मची, नाच रहे है यार।

मिलजुल कर सब झूमते, बांट रहे हैं प्यार।।

ढोल नगाड़े बज रहे, मनता है त्योहार।

पर्व लोहड़ी का मने, हर्षित होते यार।।

गीत पर्व के गा रहे, महफिल चारों ओर।

होम लगाते रेवड़ी, शोभा है घनघोर।।

सुबह सबेरे कर रहे, संक्रांति का स्नान।

हर्षित मन अब हो गया, करते पूजा ध्यान।।

मकर संक्रांति मन रही, मंगलमय त्योहार।

लड्डू बने तिल गुड़ के, पतंग उड़ी हजार ।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #151 ☆ एक पूर्णिका – “रिश्तों में अब हो गईं तल्खियाँ…” ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक पूर्णिका – “रिश्तों में अब हो गईं तल्खियाँ। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 151 ☆

☆ एक पूर्णिका – रिश्तों में अब हो गईं तल्खियाँ ☆ श्री संतोष नेमा ☆

आदमी अब परेशान बहुत हैं

अंदर उसके अरमान बहुत हैं

डरता है अब यहाँ वो इश्क से

इश्क़ में गम दर्दे-जान बहुत हैं

रिश्तों में अब हो गईं तल्खियाँ

फासले  अब  दरम्यान बहुत हैं

उन  पर  यूँ  तोहमत न लगाइए

हम पर उनके अहसान बहुत हैं

कम कीजिये अब बोझ सफर का

पास  आपके   सामान  बहुत   हैं

खामोशी  से  करें  बात  किसी से

दीवारों  के  यहाँ   कान  बहुत   हैं

“संतोष”  जाने  क्या हुआ  उनको

हम  पर  वो   मेहरवान  बहुत   हैं

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य #157 ☆ स्वामी विवेकानंद – तेजोमयी दीपस्तंभ ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # 157 – विजय साहित्य ?

☆ स्वामी विवेकानंद – तेजोमयी दीपस्तंभ ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(स्वामी विवेकानंद जयंती निमित्त) 

बंधु आणि भगिनीनो

त्रिखंडात बोल गाजे

कलागुणी वक्तृत्वाने

युवकांचे झाले राजे…….१

 

ध्येय वादी संघटन

युवकांना दिशादायी

रूजविली अंतर्यामी

नीतिमत्ता ठायी ठायी…….२

 

सा-या विश्वाला प्रेरक

अशी शक्ती शब्दांकित

स्वामी विवेकानंदांचे

कार्य झाले मानांकित ……..३

 

काव्य, शास्त्र विनोदाचे

अलौकिक संकलन

रामकृष्ण हंस ज्ञानी

ज्ञानमयी संचलन……..४

 

शिकागोची परिषद

कार्य कर्तुत्वाला गती

ज्ञानयोगी नरेंद्राची

तेजोमय कळे मती………५

 

हिंदू धर्म प्रचारक

युवकांना दिले बल

तत्वज्ञान, आत्मज्ञान

संस्कारीत कर्मफल…….६

 

रामकृष्ण मिशनने

व्यक्तीमत्व घडविले

तेजोमयी दीपस्तंभ

अंतरात जडविले …….७

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ गीत ऋग्वेद – मण्डल १ – सूक्त १४ (विश्वेदेव सूक्त) ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ गीत ऋग्वेद – मण्डल १ – सूक्त सूक्त १४ (विश्वेदेव सूक्त) ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

ऋग्वेद – मण्डल १ – सूक्त १४ (विश्वेदेव सूक्त)

ऋषी – मेधातिथि कण्व : देवता – विश्वेदेव 

ऋग्वेदातील पहिल्या मंडलातील चौदाव्या सूक्तात मेधातिथि कण्व या ऋषींनी विश्वेदेवाला आवाहन केलेले आहे. त्यामुळे हे सूक्त  विश्वेदेव सूक्त म्हणून ज्ञात आहे. 

मराठी भावानुवाद : –

ऐभि॑रग्ने॒ दुवो॒ गिरो॒ विश्वे॑भिः॒ सोम॑पीतये । दे॒वेभि॑र्याहि॒ यक्षि॑ च ॥ १ ॥

सिद्ध करुनिया सोमरसा ठेविले अग्निदेवा

यज्ञवेदिवर सवे घेउनी यावे समस्त देवा 

सोमरसासह स्वीकारुनिया अमुच्या स्तोत्रांना

सफल करोनी अमुच्या यागा सार्थ करा अर्चना ||१||

आ त्वा॒ कण्वा॑ अहूषत गृ॒णन्ति॑ विप्र ते॒ धियः॑ । दे॒वेभि॑रग्न॒ आ ग॑हि ॥ २ ॥

आमंत्रित केले कण्वांनी अग्ने प्रज्ञाशाली

तुझ्या स्तुतीस्तव मनापासुनी स्तोत्रे ही गाईली

प्रसन्न होई अग्नीदेवा अमुच्या स्तवनांनी

झडकरी येई यज्ञाला या सकल देव घेउनी ||२||

इ॒न्द्र॒वा॒यू बृह॒स्पति॑म् मि॒त्राग्निं पू॒षणं॒ भग॑म् । आ॒दि॒त्यान्मारु॑तं ग॒णम् ॥ ३ ॥

इंद्र वायू अन् बृहस्पतींना सवे घेउनी या

सूर्य अग्नि सह पूषालाही सवे घेउनी या

मरुद्गणांना भगास आदित्यासी घेउनी या

सर्व देवता यज्ञासाठी सवे घेउनी या ||३||

प्र वो॑ भ्रियन्त॒ इन्द॑वो मत्स॒रा मा॑दयि॒ष्णवः॑ । द्र॒प्सा मध्व॑श्चमू॒षदः॑ ॥ ४ ॥

सोमरसाचे चमस भरुनिया आम्हि प्रतीक्षेत 

विशाल तरीही पात्रे भरली पूर्ण ओतप्रोत 

मधूर सोमरसाचे प्राशन सुखदायी होत

याचे करिता सेवन होते उल्हसीत चित्त ||४||

ईळ॑ते॒ त्वाम॑व॒स्यवः॒ कण्वा॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः । ह॒विष्म॑न्तो अर॒ंकृतः॑ ॥ ५ ॥

मुळे काढुनी सोमलतेची चविष्ट हवि बनविला

कण्वऋषींनी तुजसाठी हा सिद्ध सोमरस केला

आर्त होऊनी तुझी प्रार्थना मनापासुनी करिती

रक्षण करी रे तुझ्या आश्रया ऋषीराज येती ||५||

घृ॒तपृ॑ष्ठा मनो॒युजो॒ ये त्वा॒ वह॑न्ति॒ वह्न॑यः । आ दे॒वान्सोम॑पीतये ॥ ६ ॥

तुकतुकीत पृष्ठाने शोभत तुझे अश्व येती

स्वतः येउनी रथा जोडूनी प्रतीक्षा तुझी करिती

तुला आणखी समस्त देवा घेउनि यायाला

भावुक होऊन यजमान तया ठायी कृतार्थ झाला ||६||

तान्यज॑त्राँ ऋता॒वृधोऽ॑ग्ने॒ पत्नी॑वतस्कृधि । मध्वः॑ सुजिह्व पायय ॥ ७ ॥

समस्त विधी संपन्न व्हावया अश्वची हो कारण

त्यांच्या ठायी बहुत साचले कार्य कर्माचे पुण्य

कृतार्थ करी रे त्यांना देवुनि त्यांची अश्विनी

तृप्त करी रे देवा त्यांना सोमरसा देवुनी ||७||

ये यज॑त्रा॒ य ईड्या॒स्ते ते॑ पिबन्तु जि॒ह्वया॑ । मधो॑रग्ने॒ वष॑ट्कृति ॥ ८ ॥

अग्नीदेवा देवतास ज्या यज्ञा अर्पण करणे 

ऐकवितो हे स्तोत्र तयांसी करुनी त्यांची स्तवने

जिव्हा होवो त्या सर्वांची सोमरसाने तुष्ट

त्या सकलांना अर्पण करि रे हविर्भाग इष्ट ||८||

आकीं॒ सूर्य॑स्य रोच॒नाद्विश्वा॑न्दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुधः॑ । विप्रो॒ होते॒ह व॑क्षति ॥ ९ ॥

जागृत झाल्या सर्व देवता अरुणोदय समयी

प्रकाशित त्या रविलोकातुन सर्वां घेऊन येई

विद्वत्तेने प्रचुर असा हा कर्ता यज्ञाचा

पूजन करुनी त्या सर्वांचे धन्य धन्य व्हायचा ||९||

विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ इन्द्रे॑ण वा॒युना॑ । पिबा॑ मि॒त्रस्य॒ धाम॑भिः ॥ १० ॥

उजळुन येता वसुंधरा ही प्रभातसूर्य किरणे

वायूसह देवेंद्राला त्या अमुचे पाचारणे

सवे घेउनी उभय देवता आता साक्ष व्हावे

मधुर अशा या सोमरसाला प्राशन करुनी घ्यावे ||१०||

त्वं होता॒ मनु॑र्हि॒तोऽ॑ग्ने य॒ज्ञेषु॑ सीदसि । सेमं नो॑ अध्व॒रं य॑ज ॥ ११ ॥

अर्पण केला हवी स्विकारुनी अपुल्या ज्वालांत

सुपूर्द करिशी देवतांप्रती देऊनी हातात

तू हितकर्ता अमुच्या यज्ञी हो विराजमान 

अमुच्या यज्ञा प्रसन्न होउन सिद्ध करी संपन्न ||११||

यु॒क्ष्वा ह्यरु॑षी॒ रथे॑ ह॒रितो॑ देव रो॒हितः॑ । ताभि॑र्दे॒वाँ इ॒हा व॑ह ॥ १२ ॥

अग्नीदेवा सिद्ध करूनी रथा अश्व जोड 

प्रसन्न करुनी देवतांसी रे करी त्यात आरूढ

आतुर आम्ही त्यांच्यासाठी येथे तिष्ठत

झणि घेउनि ये सर्व देवतांना या यज्ञात ||१२||

(हे सूक्त व्हिडीओ  गीतरुपात युट्युबवर उपलब्ध आहे. या व्हिडीओची लिंक येथे देत आहे. हा व्हिडीओ ऐकावा, लाईक करावा आणि सर्वदूर प्रसारित करावा. कृपया माझ्या या चॅनलला सबस्क्राईब करावे.) 

https://youtu.be/GEmOUqbE9Wk

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Rugved 1 14

© डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ हसताय ना! ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ हसताय ना! ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

…. काय मंडळी हसताय ना? हसलेच पाहिजे. तुमच्या टेन्शन वरची मात्रा,  ईनोदाचे चारवार हास्याचा चौकार. चमत्कृतीचा ईनोद नि शाब्दिक कसरतीवर शारीरिक चमत्कारिक अंगविक्षेप अश्या अनेक क्लुप्त्या दाखवून हसायला लावणारे अनेक टि. व्ही. कार्यक्रम सतत चौवीस तास डोळ्याना सुखवत मुखाला हसवत असतात… दुसऱ्याच्या व्यंगावर (वर्मावर टिप्पणी करून) केलेला विनोदाला हसणे हा मनुष्याचा नैसर्गिक स्वभावच असतो नाही का? रस्त्यावरुन चालणारा अचानक पाय घसरुन पडला तर सगळया पहिले हासतो ते आपण… फजिती, विचका झाल्याचा विकृत आनंदच तो असतो आपल्या हास्यातून बाहेर पडतो.. पण ते का खरे निखळ हसणे असते..पू्र्वी सर्कस येत असत त्यात विविध जोकर उलट्या सुलट्या उड्या आणि कसरती द्वारे प्रेक्षकांना हसवत असत… मेरा नाम जोकर सिनेमा पाहिलेला तुम्हाला आठवत असेलच.. जो माणूस आतून खरोखर दुःखात बुडालेला असतो तोच चेहऱ्यावर आपलं दुख लपवून दुसऱ्याला जास्त हसवत असतो हे ही आपल्याला ठाऊक आहेच की… पण खरी गोष्ट अशी आहे की तो आपल्याला हसवत नसून तो आपल्या आतल्या दु:खावरच हसण्याचा उपाय करत असतो.. हसण्यासाठी जन्म आपुला हे वाक्य जो सतत जपत राहतो त्याच्या पुढे सगळी संकटे दु:ख चार हात लांबच राहू पाहतात. साहित्यिक हलके फुलके नर्म विनोद सगळ्या वाचकांना हसवत असतात, व्यंग चित्र, अभिनयातून साधलेले विनोद, ही सारी उदाहरणे निखळ हास्य निर्माण करतात.. ती अक्षर कलाकृती अक्षय आनंदाचं हास्य फुलवित असते. म्हणून आजही भाईंची सगळी पुस्तकं तेच हास्य देत असतात.. धीरगंभीर प्रवृत्तीच्या लोकांना  विनोदाचं वावडे असल्याने ते तर कधीच हासत नाहीत नि दुसऱ्यालाही हसवत नाहीत.. पण काही काही वेळा तीच माणसं हसण्याचा विषय होउन बसतात… मग हिच माणसं टवाळा आवडे विनोद म्हणून हाकाटी पिटत बसतात…दैनंदिन जीवनातील कंटाळवाणे, नीरस धबगडयात मनोरंजनासाठी चार हास्याचे कण मिळावेत म्हणून तर सिनेमा,नाटक, टि. व्ही. वरील कार्यक्रम  पाहिले जातात..तसं पाहिलं तर विनोदाला कुठलाच विषय वर्ज्य नाही..आदी नाही अंतही नाही… पण ताळतंत्र सुटलेला विनोद हास्य निर्माण करत नाही तर त्या विनोदाची कीव करायला लावतो… हसणं हा जन्मजात गुण मानवाला मिळालेला असून तो आबालवृद्धा़ना  तितकाच हवाहवासा असतो..स्त्रियांवर तर विनोदाला कळस गाठला जातो.तसा नवरोजीही यातून सुटलेला नसतो बरं… थोडक्यात काय विनोदाला जळी स्थळी काष्ठी पाषाणी सर्व स्पर्शी असल्याने ते ज्याला लुभावते तोच त्यातून हासू निर्माण करतो… स्वता हसतो नि दुसऱ्याला हसवतो..

… आताच्या काळात तो जूना शब्द प्रयोग ‘हसावे कि रडावे’ आता कुचकामी ठरला आहे.. आता फक्त हसतच राहावे असे वाटते…हल्लीचे राजकारण त्यात अग्रेसर आहे.. त्यामुळे सर्कस, सिनेमा, नाटक बंद पडली आहेत… एकापेक्षा एक धुरंधर विदूषक आपली विनामूल्य मनोरंजनातून हसवत असतात.. मेडिया त्याचं विस्ताराने प्रसिद्धी करण करत असतो, पेपर तर पहिल्या पानापासून ते शेवटच्या पाना पर्यंत विनोदाची विविधता पेरूनच असतो..

… एव्हढी सगळी साधने तुम्हा आम्हाला सतत हसत राहा म्हणून कानीकपाळी ओरडून सांगत असताना आपण हसयाचं नाही?…टिआरपी वाढण्यासाठी तरी आपल्याला हसायला हवं ना?… मग

…. काय मंडळी हसताय ना? हसलेच पाहिजे. तुमच्या टेन्शन वरची मात्रा,  ईनोदाचे चारवार हास्याचा चौकार…

©  नंदकुमार पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470.

ईमेल –[email protected]

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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