हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 2 – सजल – उजियारे की राह तकें जो… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ ” मनोज साहित्य“ में आज प्रस्तुत है सजल “उजियारे की राह तकें जो…”। अब आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 2 – सजल – उजियारे की राह तकें जो… ☆ 

सजल

सीमांत – ओते

पदांत- हैं

मात्राभार- 16

मात्रा-पतन- निरंक

 

पथ में काँटे जो बोते हैं।

जीवन भर खुद ही रोते हैं।।

 

राज कुँवर बनकर जो रहते,

चौबिस घंटों तक सोते हैं ।

 

अकर्मण्य ही बैठे रहते,

सारे अवसर वे खोते हैं।

 

धन का लालच जब भरमाए,

गहरी खाई के गोते हैं।

 

उजियारे की राह तकें जो,

अपनी किस्मत को खोते हैं ।

 

कर्मठता से दूर हटें जब,

जीवन खच्चर बन ढोते हैं।

 

आशा की डोरी जब टूटे, 

नदी किनारे ही होते हैं।

 

श्रम के पथ पर हैं जो चलते,

भविष्य सुनहरा संजोते हैं।

 

विजय श्री का वरण जो करते,

मन चाहे फूल पिरोते हैं।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल ” मनोज “

18 मई 2021

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 99 – “हम इश्क के बंदे हैं” – स्व रामानुजलाल श्रीवास्तव ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका पारिवारिक जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है  स्व रामनुजलाल श्रीवास्तव जी के कथा संग्रह “हम इश्क के बन्दे हैं” – की समीक्षा।

 पुस्तक चर्चा


पुस्तक : हम इश्क के बंदे हैं (कहानी संग्रह)

लेखक : स्व रामानुजलाल श्रीवास्तव

प्रकाशक : त्रिवेणी परिषद, यादव कालोनी जबलपुर

मूल्य : २०० रु ,

पृष्ठ : १५०

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 99 – “हम इश्क के बंदे हैं” – स्व रामानुजलाल श्रीवास्तव ☆ 

स्व रामानुजलाल श्रीवास्तव ‘ऊंट’ जी ने हिन्दी गीत , कवितायें , उर्दू  गजलें , कहानियां , लेख ,पत्रकारिता , प्रकाशन आदि बहुविध साहित्यिक जीवन जिया . उन्होंने प्रेमा प्रकाशन के माध्यम से  साहित्यिक में महत्वपूर्ण योगदान दिया .  तत्कालीन साहित्यिक पत्रिकाओं में  ‘प्रेमा’ की बडी प्रतिष्ठा रही है . उन की धरोहर कहानी कृति “हम इश्क के बंदे हैं ” जिसका प्रथम प्रकाशन १९६० में हुआ था , उसे त्रिवेणी परिषद के माध्यम से साधना उपाध्याय जी ने संस्कृति संचालनालय म प्र के सहयोग से पुनर्प्रकाशित किया है . इस कहानी संग्रह में शीर्षक कहानी हम इश्क के बंदे हैं , बिजली , कहानी चक्र , मूंगे की माला , क्यू ई डी , मयूरी , जय पराजय , वही रफ्तार , भूल भुलैया , बहेलिनी और बहेलिया , आठ रुपये साढ़े सात आने , तथा माला नारियल कुल १२ कहानियां संग्रहित हैं .

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी की पंक्तियां हैं

सुख दुखो की आकस्मिक रवानी जिंदगी

हार जीतो की बड़ी उलझी कहानी जिंदगी

भाव कई अनुभूतियां कई , सोच कई व्यवहार कई

पर रही नित भावना की राजधानी जिंदगी .

ये सारी कहानियां सुख दुख , हार जीत , जीवन की अनुभूतियों , व्यवहार , इसी भावना की राजधानी के गिर्द बड़ी कसावट और शिल्प सौंदर्य से बुनी गई हैं . ये सारी ही कहानियां पाठक के सम्मुख अपने वर्णन से हिन्दी कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानियों जैसा दृश्य उपस्थित करती हैं .  कहानी “वही रफ्तार” को ही लें …

कहानी १९५७ के समय काल की है अर्थात १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के सौ बरस बाद का समय . तब के जबलपुर का इतिहास , भूगोल , अर्थशास्त्र , समाज शास्त्र , राजनीति सब कुछ मिलता है कहानी में . सचमुच साहित्य समाज का दर्पण है .

कहानी से ही उधृत करता हूं ” अरे अब तो अंग्रेजी राज्य नहीं है . अब तो अपना राज्य है . अपना कानून है . अब तो होश में आओ रे मूर्खो . “

हम आप भी तो यही लिख रहे हैं , मतलब साहित्यकार पीढ़ी दर पीढ़ी लिख रहा है , वह लिख ही तो सकता है . पर लगता है मूर्ख होश में आने से रहे .

एक दूसरा अंश है , जिसमें रिक्शा वाला सवारी से संवाद करते हुये कहता है ” दिन भर में रुपया डेढ़ रुपया मार कूट कर बचा भी तो मंहगाई ऐसी लगी है कि पेट को ही पूरा नहीं पड़ता ” . कहानी का यह अंश बतलाता है १९५७ में रिक्शा वाला दिन भर में रुपये डेढ़ रुपये कमा लेता था. जो उसे कम पड़ता था . कमोबेश यही संवाद आज भी कायम हैं . यह जरूर है कि अब रिक्शे की जगह आटो ने ले ली है , रुपये डेढ़ रुपये की बचत तीन चार सौ में बदल गई है .

इस कहानी में तत्कालीन जबलपुर का वर्णन  भी बड़ा रोचक है ” देवताल के नुक्कड़ पर , गढ़ा की संकरी सड़क में कुछ घुस कर एक मोटर दीख पड़ी ” या “ग्वारी घाट सड़क पर रिक्शेवाला दाहिने मुड़ने लगा तभी सवारी ने कहा सीधे चलो चौथे पुल से इधर दो दो रेल्वे फाटक पड़ेंगे ” छोटी लाइन की समाप्ति और शास्त्री ब्रिज के निर्माण ने यह भूगोल अवश्य बदल दिया है .

अब आपके सम्मुख इस कहानी का कथानक बता देने का समय आ गया है . जो आपको निश्चित ही चमत्कृत कर देगा , यही कहानीकार की विशिष्ट कला है .  

आज भी रोज कमाने खाने वाले मजदूर में यह प्रवृत्ति देखने में आती है कि यदि  किसी तरह उनके पास अतिरिक्त कमाई हो जावे तो बजाय उसे संग्रह करने के वह अगले दिन काम पर ही नही जाते .  वही रफ्तार कहानी में एक रिक्शे वाले जग्गू को उसके चातुर्य से , एक प्रेमी जोड़े से अतिरिक्त आय हो जाती है . वह स्वयं साहब बनकर मजे करना चाहता है और एक सरल हृदय बारेलाल के रिक्शे पर सवारी करता है . साहबी स्वांग करते हुये जग्गू बारेलाल के रिक्शे से अपने मित्र तीसरे रिक्शेवाले मनसुख के घर पहुंचता है . जब बारेलाल पर यह भेद खुलता है कि उस पर अकड़ दिखाता रौब झाड़ता जो उसके रिक्शे की सवारी कर रहा था वह स्वयं भी एक  रिक्शेवाला ही है , तो वह भौंचक रह जाता है . किन्तु फिर भी वह उससे किराया लेने से मना कर देता है तब तीसरा रिक्शे वाला मनसुख जिसके घर जग्गू पहुंचता है वह कहता है ” भाई बारेलाल , यह सच है कि नाई नाई से हजामत की बनवाई नही लेता . पर मैने जो रूखी सूखी बनाई है , आओ हम तीनो बांटकर खा लें और इस सालेसे पूछें कि आज क्या स्वांग किया है .
बारेलाल कहता है , हाँ यह हो सकता है .
 
बारे लाल जग्गू से कहता है ” साले बेईमान एक दिन की बादशाहत में जिंदगी कट जायेगी ? गधे , घोड़े बैल का काम करो , आधा पेट खाओ . फैक्टरी की छंटनी के मारे ऐसी भीड़ कि रिक्शा मिलना भी हराम है . ….

मनसुख बोला धीरज धरो भैया सब ठीक हो जायेगा .

कैसे ?

ऐसे कि जैसे जग्गू बाबू बना था . समय आने पर नकली बाबू का भेद खुल गया न . इसी तरह नकली स्वराज्य और असली स्वराज्य का भेद खुल जायेगा . और समय आते क्या देर लगती है ?

आ ही तो गया सत्तावन गदर का साल .

सत्तावन अत्ठावन सब बीत गये परन्तु गरीबों के लिये तो वही रफ्तार बेढ़ंगी जो पहले थी सो अब भी है .

इस वाक्य से कहानी पूरी होती है . स्व रामानुज लाल श्रीवास्तव की अभिव्यक्ति भारत के अधिकांश गरीब तबके की मन की स्थिति का निरूपण है  . कहानियां सत्य घटनाओ पर आधारित अनुभूत समझ आती हैं .  

प्रश्न है कि क्या राजनीती की लकड़ी ही हांड़ी आज भी वैसे ही चुनाव दर चुनाव नही चढ़ाई जा रही . जग्गू , मनसुख और बारेलाल की पीढ़ीयां बदल चुकी हैं , पर समाज की विसंगतियों की वही रफ्तार कायम है .

सभी कहानियां भी ऐसी ही प्रभावकारी हैं . किताब जरूर पढ़िये . सत्साहित्य के पुनर्प्रकाशन की जो ज्योति त्रिवेणी परिषद ने प्रारंभ की है , वह प्रशंसनीय है . ऐसा पुराना साहित्य जितना अधिक प्रचारित प्रसारित हो बढ़िया है . यह नई पीढ़ी को दिशा देता है . स्वागतेय है .

समीक्षक .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 98 – लघुकथा – मेहमानवाजी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है पर्यटन स्थल के अनुभवों पर आधारित एक संवेदनशील लघुकथा  “मेहमानवाजी। इस विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 98 ☆

? लघुकथा – मेहमानवाजी ?

सृष्टि की सुंदर मनमोहक और प्राकृतिक अनुपम सुंदरता लिए कश्मीर और श्रीनगर। श्रीनगर की शोभा बढ़ाती डल झील, पहलगाम, सोनमर्ग और गुलमर्ग । सभी एक से बढ़कर एक आंखों को सुकून देने वाले दृश्य और बर्फ से ढकी चोटियां। जहां तक नजर जाए मन आनंदित हो जा रहा था।

मनोरम वातावरण में घूमते घूमते मोनी और श्याम ने वहां पर एक कार घूमने के लिए लिया गया था। उस पर चले जा रहे थे। रास्ता बहुत ही खुशनुमा। कश्मीर का कार  ड्राइवर बीच-बीच में सब बताते चला जा रहा था’ सजाद’ नाम था उसका।

हालात के कारण सभी के मुंह पर मास्क लगे हुए थे अचानक गाड़ी रोक दी गई, देखा फिर से चेकिंग शुरू। हर पर्यटक को थोड़ी- थोड़ी दूर पर चेक करते थे। गाड़ियां एक के बाद एक लगी थी। करीब एक घंटे खड़े रहे। अचानक आगे से गाड़ियां सरकती दिखी। सजाद ने भी गाड़ी बढा ली।

परंतु यह क्या पूरा रास्ता जाम हो गया, अचानक बीस पच्चीस पुलिस वाले दौड़ लगाते भागने लगे। एक पुलिस वाला गाड़ी के पास आया।

डंडे से कांच को मारकर कांच नीची करवाया और जोर से बोला… “तैने दिखाई नहीं देता के? ऐसी तैसी करनी है क्या? एंबुलेंस कहां से निकलेगी?” और वह कुछ कहता इसके पहले ही सिर पर एक कस के डंडा और सजाद के गोरे- गोरे गाल पर एक तड़ाक का चांटा!!!!!

पांच ऊंगलियों के निशान लग गए, लाल होता देख मोनी और उसके पति देव ने पुलिस वालों को सॉरी कहना चाह रहे थे कि रास्ता खाली हुआ और गाड़ियां चल पड़ी।

कार में तीनों चुपचाप थे अचानक सजाद ने कहा… “आप क्यों सॉरी बोल रहे थे? आपकी कोई गलती थोड़ी ना है। आप कोई गिल्टी फील ना करें मैडम जी। हम लोग इस के आदी हो गए हैं। “

मोनी ने कहा.. “यदि कुछ हो जाता तो ..?” बीच में बात काटकर सजाद बोला… “मैडम जी हम अपने  मेहमानों को भगवान समझते हैं और भगवान को कुछ ना होने देंगे।“

खिलखिलाते हंस पड़ा मासूम सा चौबीस साल का युवा सजाद कहने लगा… “कभी-कभी एक, दो सप्ताह तक कुछ भी नहीं मिलता। कश्मीर बड़ा खुशनुमा है पर रोटी के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है।“ वह रूआँसा हो चुका था। “आप चिंता ना करें। यह सजाद आप लोगों को कुछ होने नहीं देगा। खुदा कसम हम मेहमानवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। खुदा की रहमत हैं सभी का भला होगा।“

गाड़ी अपनी रफ्तार से चली जा रही थी और सजाद की मुस्कुराहट बढ़ने लगी थीं। यह कैसी मेहमानवाजी मन में विचार करने लगे मोनी और उसके पति देव।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 106 ☆ उधारी ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 106 ☆

☆ उधारी ☆

पसरून पंख दोन्ही घेतोय तो भरारी

आव्हान देत आहे सूर्यास भर दुपारी

 

ऋण वाटतो जगाला मी सावकार आहे

आई तुझ्या ऋणाची फेडू कशी उधारी

 

डोळ्यांत धाक आहे हृदयात प्रेम माया

तो बाप फक्त दिसतो वरवर जरा करारी

 

काळीज पोखरोनी घेतोय उंच डोंगर

अंधार पांघरोनी रस्ता उभा भुयारी

 

पाहून मत्स्यकन्या  मी भाळलो तिच्यावर

प्रेमात सागराच्या येऊ कसा किनारी ?

 

अन्याय वाढलेला डोळ्यासमोर दिसतो

दुष्टास गाडण्याची नाही तरी तयारी

 

शस्त्रास दुःख होते पाहून रक्त धारा

माणूस होत आहे आता इथे दुधारी

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

[email protected]

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की#58 – दोहे – ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  लेखनी सुमित्र की #58 –  दोहे 

आंसू बहते रात दिन, चिथड़ा हुआ नसीब ।

कोई धनी धोरी नहीं, कितना सही गरीब।।

 

आंसू बहते हैं मगर के, पहचानेगा कौन।

नेता आंसू बाज हैं, तुरत बदलते ‘टोन’।।

 

आंसू को मोती कहें, और आंख को सीप।

उसकी उतनी अहमियत, जितना रहे समीप।।

 

गर्व गरूरी को लगे, तृण भी तीर समान ।

इसीलिए तो कर रहे, आंसू का अपमान।।

 

कोहिनूर है आंख का, आंसू है अनमोल ।

तीन लोक की संपदा, सके न इसको तोल।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत # 58 – खोजते हैं दूर तक सम्भावनायें …. ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवणअभिनवगीत – “खोजते हैं दूर तक सम्भावनायें ….। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 58 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ खोजते हैं दूर तक सम्भावनायें …. ☆

ये फटे घुटने

तुम्हारी जीन्स के

स्नेह बिन सन्दर्भ

सोया बीन्स के

 

खोजते हैं दूर

तक सम्भावनायें

बताते हैं परस्पर

की भावनायें

 

जो नवीना प्रथाओं

में बदलते हैं

मुक्त जैसे आचरण

हों टीन्स के

 

कुछ अनिर्णित

बिन्दु हैं सभाओं में

तैरते जो विफल

होती हवाओं में

 

बिन खुले बाजार

भावों से अनिश्चित

मूल्यअनगढ लगें

खुदरा मीन्स के

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

22-09-2021

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 104 ☆ डर ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है भाई – भाई और पिता के संबंधों पर आधारित एक विचारणीय  व्यंग्य ‘डर).   

☆ व्यंग्य # 104 ☆ डर ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

ट्रेन फुल स्पीड से भाग रही है।

– कहां जा रहे हैं?

– प्रयागराज… अस्थि विसर्जन के लिए।

थोड़ी देर में दोनों भाई खर्चे के तनाव में लड़ पड़े। 

हमने समझाया- देखो भाई, जमाना बदल गया है, रिश्तों का स्वाद हर रोज बदलता है; कभी मीठा, कभी नमकीन कभी खारा…

– पिता के अस्थि विसर्जन के लिए जा रहे हो तो छोटी-छोटी बातों में लड़ना नहीं चाहिए।

– आपका कहना सही है, पर ये छोटा भाई नहीं समझता ,जब पिताजी जिंदा रहे तब उनसे बात बात में खुचड़ करता था।

– हमें एक मुहावरा याद आ गया, ‘जियत बाप से दंगमदंगा, मरे हाड़ पहुंचावे गंगा….  

– छोटा भाई बोला… हम इनसे कहे थे कि बबुआ के हाड़ गांव की नदिया मे सिरा देओ, खर्चा बचेगा।

– काहे झूठ बोलते हो छोटे भाई… तुम्हीं ने तो कहा था कि बबुआ की हड्डी गंगा-जमुना संगम में डालने से हड्डी पानी में जल्दी घुल जाएगी, नहीं तो हड्डी कोई वैज्ञानिक के हाथ पड़  जाएगी तो बाप की हड्डी से फिर वही बाप बनाकर खड़ा कर देगा, तो और मुश्किल हो जाएगी।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #48 ☆ जमीन ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी एक  समसामयिक भावप्रवण कविता “# जमीन #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 48 ☆

☆ # जमीन # ☆ 

आकाश में उड़ने वाले

पक्षियों के घोंसले भी

जमीन पर ही होते हैं

हाथ ठेले पर, दिनभर

पसीना बहाने वालें मजदूर

रात को जमीन या

हाथ ठेले पर ही सोते हैं

मीठे मीठे स्वादिष्ट फल खाकर

उनके बीज या पौधे

जमीन में ही लगाते है

भूख मिटाने वाले अनाज

कृषि भूमि मे ही तो बोते हैं

अपनी जिंदगी विपन्नता में

जीने वाले लोग

अपनी गृहस्थी जमीन पर ही

जमाते हैं

समस्याओं से हारे हुए लोग

जमीन पर ही तो

अपना सर पटकते है

वर्षा की रिमझिम फुहारें

धरती के तपते तन-मन को

बरसात में भिगोते है

प्रेमी युगल माटी की

सौंधी सौंधी खुशबू में

मस्त होकर

एक दूसरे में समाते है

हम जमीन पर ही

जन्म लेते है

हम जमीन में ही

दफ़न होते हैं

यह जमीन हमारे

जीवन का आधार है

इसमें संसार की

सारी खुशियां अपार है

फिर भी हम ऊंचाईयों पर ही

क्यों रहना चाहते हैं?

क्या जमीन पर रहने वाले

हमसे कमतर होते है ?

यह जमीन ही अपने जड़ों की

असली पहचान है

गर पैरों से जमीन फिसली

तो वह भटका हुआ इंसान है 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ अप्रूप पाखरे – 15 – रवींद्रनाथ टैगोर ☆ प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

? वाचताना वेचलेले ?

☆ अप्रूप पाखरे – 15 – रवींद्रनाथ टैगोर ☆ प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆ 

[७७]

हे संध्याकाळचं आकाश

या क्षणी माझ्यासाठी

एक प्रचंड खिडकी आहे

दिवा पेटवून ठेवलेली

आणि त्यामागे  आहे

एक सोशीक प्रतीक्षा

           *

[७८]

प्रमदेच्या हास्यातून

खळखळते उसळते

संगीत….

जीवन प्रवाहाचे

         *

[७९]

रिकामा…निर्जल

शरदातला मेघ आहे मी

मला पहायचं आहे?

मग पहा ना

पिकलेल्या भातशेतातून

सळसळत चमचमणार्‍या

या सोनेरी चैतन्यातून

           *

[८०]

स्वर्गामध्ये डोकावणारी

धरतीची आसक्तीच

उसळते आहे

या उत्तुंग वृक्षांमधून

गगनचुंबी

 

मूळ रचना – स्व. रविंद्रनाथ टैगोर 

मराठी अनुवाद – रेणू देशपांडे (माधुरी द्रवीड)

प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #107 ☆ व्यंग्य – ‘एक सपूत का कपूत हो जाना’ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  एक सपूत का कपूत हो जाना। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 107 ☆

☆ व्यंग्य – ‘एक सपूत का कपूत हो जाना’

गप्पू लाल पप्पू लाल के सुपुत्र हैं। बाप की नज़र में गप्पू लाल सुपुत्र होने के साथ साथ ‘सपूत’ भी हैं क्योंकि वे घर के बाहर भले ही साँड़ की तरह सींग घुमाते हों, घर में गऊ बन कर रहते हैं। बाप के सामने इतने विनम्र और आज्ञाकारी बन जाते हैं कि बाप कुछ पूछते हैं तो इस तरह मिनमिनाकर जवाब देते हैं कि शब्द कान तक नहीं पहुँचते। कई बार बाप गुस्सा हो जाते हैं। कहते हैं, ‘क्या बकरी की तरह मिमियाता है। साफ साफ बोल।’ गप्पू लाल और ज़्यादा सिकुड़ जाते हैं। पुत्र की इस आज्ञाकारिता को देखकर पप्पू लाल गद्गद हो जाते हैं।

गप्पू लाल अपने लिए रूमाल भी नहीं ख़रीदते। चड्डी बनयाइन भी पिताजी ही ख़रीदते हैं। कपड़े-जूते जो बाप पसन्द कर लेते हैं, स्वीकार कर लेते हैं। बाप की अनुमति के बिना कहीं नहीं जाते। जहाँ के लिए बाप मना कर देते हैं, वहाँ नहीं जाते। जिस लड़के या लड़की को बाप दोस्ती के लायक नहीं समझते, उससे दोस्ती नहीं करते। अगर दोस्ती हो गयी तो उसे कभी घर नहीं बुलाते।

पप्पू लाल बड़े  किसान हैं। काफी ज़मीन है। आटा-चक्की और तेल-मिल है। गप्पू उनके इकलौते पुत्र हैं। तीन बेटियाँ शादी करके विदा हो चुकी हैं। गप्पू लाल तीस पैंतीस किलोमीटर दूर शहर में बी.ए. पढ़ रहे हैं। पढ़ने में सामान्य हैं लेकिन ज़्यादा पढ़ कर करना भी क्या है?

बाप की छत्रछाया में पल कर गप्पू लाल सयाने हो गये। ओठों पर मूँछों की रेख उभर आयी। बाप की नज़र में वे शादी के काबिल हो गये। पैसे वाली पार्टियाँ बाप को घेरने लगीं। जो सीधे गप्पू लाल तक पहुँचते उनसे गप्पू शर्मा कर कह देते, ‘बाबूजी जानें। हम क्या बतायें।’

पप्पू लाल ने एक दो जगह दहेज की अच्छी संभावनाओं को समझते हुए लड़की को देखने की सोची। पत्नी से बोले, ‘गप्पू तो अभी नालायक है। वह क्या लड़की देखेगा। हम तुम चल कर देख लेते हैं।’ गप्पू ने सुना तो मिनमिनाकर रह गये।

पप्पू लाल पत्नी को लेकर गये और दो तीन जगह देखकर एक जगह लड़की पसन्द कर आये। गप्पू लाल फोटो देखकर संतुष्ट हो गये। कॉलेज के दोस्तों को दिखाया। हर वक्त तकिये के नीचे रखे रहते थे।

शादी धूमधाम से हो गयी। पप्पू लाल बहू के साथ पर्याप्त माल-पानी लेकर लौटे। गप्पू लाल बीवी पाकर मगन हो गये। लेकिन बाप से उनका सुख नहीं देखा गया। एक दिन कुपित होकर बोले, ‘हो गयी शादी वादी। अब वापस कालेज जाकर पढ़ लिख। दिन रात बहू के पास घुसा रहता है। बेशरम कहीं का।’

गप्पू लाल गाँव से शहर खदेड़ दिये गये।  उनके ताजे ताजे बसे सुख के संसार में नेनुआँ लग गया। अब कॉलेज में पढ़ने में मन नहीं लगता था। किताब के हर पन्ने पर प्रिया का मुख बैठ गया था।

एक दिन कॉलेज में दो दिन की छुट्टी घोषित हो गयी। गप्पू लाल घर पहुँचने का बहाना ढूँढ़ रहे थे। सिर पर पैर रखकर भागे। दुर्भाग्य से एक दिन पहले हुई तेज़ बारिश के कारण शहर और गाँव के बीच के नाले में पूर आ गया था। रास्ता बन्द था। गप्पू ने एक मल्लाह के हाथ जोड़े और उसकी डोंगी पर बैठकर नाले की उत्ताल तरंगों पर उठते गिरते तुलसीदास की तरह आधी रात को घर पहुँचे। विरह-व्यथा में वे उस दिन जान पर खेल गये। घर पहुँचकर दरवाज़ा खटखटाया तो नींद में पड़े ख़लल से कुपित पिताजी ने दरवाज़ा खोला। दरवाज़े पर पुत्र को देखकर उन्होंने डपट कर पूछा, ‘इस वक्त कहाँ से आया है?’ गप्पू लाल मिनमिनाकर चुप हो गये।

पिताजी बोले, ‘अब आधी रात को सारे घर को जगाएगा। यहीं सोजा।’ उन्होंने गप्पू को अपने पास सुला लिया। गप्पू मन मसोसकर रह गये।

सबेरे पिताजी ने नाश्ता-पानी के बाद फिर शहर खदेड़ दिया। बोले, ‘तेरी अनोखी शादी हुई है क्या?बीवी के बिना नहीं रहा जाता?आगे इस तरह आया तो दरवाजे से ही भगा दूँगा।’

गप्पू लाल भारी मन से बैरंग वापस हो गये।

बहू डेढ़ दो महीने रहकर मायके विदा हो गयी। पप्पू लाल अब उसे दुबारा जल्दी नहीं बुलाना चाहते थे। वजह यह थी कि समधी साहब ने दहेज में एक ट्रैक्टर देने का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हुआ था। समधी साहब ने कहा था कि नंबर लगा है, जल्दी आ जाएगा। पप्पू लाल को डर था कि कहीं धोखाधड़ी न हो जाए, इसलिए वे चाहते थे कि अब बहू ट्रैक्टर के पीछे पीछे ही आये।

बहू को गये तीन चार महीने हो गये। समधी साहब बार बार विदा के बारे में पूछते। पप्पू लाल जवाब देते कि अभी मुहूर्त नहीं है। फिर यह भी पूछ लेते कि ट्रैक्टर कब तक मिलने की उम्मीद है। समधी साहब बात को समझ रहे थे, लेकिन मजबूर थे।

एक दिन समधी साहब का पत्र आया। पप्पू लाल पढ़कर आसमान से गिरे। समधी साहब ने लिखा था, ‘कुँवर साहब आये। चार दिन रहे। बहुत अच्छा लगा। इसी प्रकार आना जाना बना रहे।’

पप्पू लाल दो क्षण तो हतबुद्धि बैठे रहे, फिर गुस्से में फनफनाकर पत्नी से बोले, ‘यह देखो। यह जोरू का हमें बिना बताये ससुराल पहुँच गया। लिखा है कुँवर साहब आये थे। यह नालायक कुँवर नहीं, सुअर है।’

गुस्से में पागल शहर दौड़े गये। गप्पू की पेशी हुई—‘क्यों रे कुलबोरन!हमें बिना बताये ससुराल पहुँच गया?कुछ शर्म हया बाकी है या नहीं?’

गप्पू लाल ने मिनमिनाकर जो बताया उसका मतलब यह निकला कि वह तो घूमने बाँदकपुर गया था। वहाँ से ससुराल पास था, सोचा कुछ देर के लिए हो लें।

पप्पू लाल बोले, ‘हमें पढ़ाता है!कहाँ बाँदकपुर और कहाँ ससुराल। कुछ देर के लिए गये और चार दिन पड़े रहे। आगे हमसे बिना बताये गया तो हमसे बुरा कोई न होगा।’

आज्ञाकारी पुत्र ने सिर झुका लिया। डेढ़ दो महीने फिर बीत गये। पप्पू लाल बिना ट्रैक्टर हथियाये बहू को नहीं लाना चाहते थे। एक बार बाजी हाथ से गयी तो गयी। बेटे से इस मामले में सहयोग की कोई उम्मीद नहीं थी। अभी से बहू के लिए दीवाना हो रहा था।

फिर एक पत्र आ टपका। मज़मून वही कि कुँवर साहब फिर आये, बहुत अच्छा लगा। पन्द्रह दिन से टिके हैं। अभी कुछ दिन और रहेंगे। इसी तरह मेलजोल बना रहे।

पप्पू लाल माथा पकड़ कर बैठ गये। यह लड़का कंट्रोल में नहीं है। ऐसे ससुराल की तरफ भाग रहा है जैसे दुनिया में सिर्फ इसी की शादी हुई हो।

पत्नी से बोले, ‘इस लौंडे ने तो नाक कटा दी। उधर वाले क्या सोचते होंगे। लगता है घरजमाई बन कर बैठ जाएगा।’

पत्नी ने सलाह दी, ‘भलाई इसी में है कि लालच छोड़कर बहू को बुला लो। इकलौता लड़का है। हाथ से निकल गया तो बुढ़ापे में कौन सहारा देगा?’
पप्पू लाल ने सुनकर अनसुनी कर दी।

पन्द्रह दिन बाद फिर पत्र आया। लिखा था—‘कुँवर साहब बेटी अंजना को विदा कराके ले गये हैं। कह रहे थे कि आपसे पूछ लिया है। सकुशल पहुँच गये होंगे। कुशल समाचार दें।’

पप्पू लाल बदहवास शहर भागे। शाम को थके हारे, उदास लौटे। पत्नी को बताया, ‘उस बेशरम ने पहले ही एक किराये का मकान ले लिया था। हमें बताया नहीं था। तीन चार दिन में आएगा। बिलकुल ढीठ हो गया है। उसकी हिम्मत तो देखो।’

फिर समधी साहब को पत्र लिखा—

‘परमप्रिय समधी साहब, आपका पत्र मिला। चि.गप्पू लाल और बहू सकुशल पहुँच गये हैं। चिन्ता की कोई बात नहीं।
ट्रैक्टर मिलते ही खबर करें। खबर मिलते ही मैं यहाँ से ड्राइवर भेज दूँगा। आप पर पूरा भरोसा है। अपने वचन की रक्षा करें ताकि हमारे संबंध और गाढ़े हों।

                                    आपका समधी,

                                      पप्पू लाल’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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