हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 50 ☆ रिश्ते नहीं रिसते ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख रिश्ते नहीं रिसते।  यह आलेख  रिसते हुए रिश्तों  पर एक शोधपरक आलेख है।  टूटते – बिखरते रिश्तों के कारणों का  यह दस्तावेज सिर्फ कारण की विवेचना ही नहीं करता अपितु उन्हें संजोने के उपाय भी बताता है। इस आलेख के कई महत्वपूर्ण कथन हमें विचार करने के लिए उद्वेलित करते हैं। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 49 ☆

☆ रिश्ते नहीं रिसते

इक्कीसवीं सदी में संबंध व रिश्तों की परिभाषा बदल गई है। कोई संबंध पावन रहा नहीं; न ही रही  उसकी अहमियत व मर्यादा। रिश्ते आजकल दरक़ रहे हैं– उस इमारत की भांति, जो खंडहर के रूप में खड़ी तो दिखाई पड़ती है, परंतु उसके गिरने का अंदेशा सदा बना रहता है। यही दशा है– आज के संबंधों की। संबंध अर्थात् सम+बंध, समान रूप से बंधा हुआ अर्थात् दोनों पक्ष के लोग उसकी महत्ता को समान रूप से समझें व स्वीकारें। परंतु आजकल तो संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। वैसे तो कोई हैलो- हाय करना भी पसंद नहीं करता। इसमें दोष हमारी सोच व तीव्रता से जन्मती-पनपती आकांक्षाओं का है; जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जा रही हैं और मानव उनकी पूर्ति हेतु जी-जान से स्वयं अपने जीवन को खपा देता है। उस स्थिति में उसे न दिन की परवाह रहती है; न ही रात की। वह तो प्रतिस्पर्द्धा के चलते; दूसरे को पछाड़ आगे बढ़ने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाता है। इस परिस्थिति में वह रिश्ते-नातों को भुला कर: दोस्ती को दांव पर लगा, निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहता है और अपने आत्मजों व प्रियजनों से बहुत दूर निकल जाता है…सांसारिक चकाचौंध में वह सबको भुला बैठता है। उसे दिखायी पड़ता है–केवल-मात्र अपना स्वार्थ-सिक्त लक्ष्य; जो पुच्छल तारे की भांति उसके विनाश का कारण बनता है। इस स्थिति में उसके पास पीछे मुड़कर देखने का समय भी नहीं होता।

‘रिश्तों की माला जब टूटती है, तो दोबारा जोड़ने से छोटी हो जाती है, क्योंकि कुछ जज़्बात के मोती बिखर जाते हैं।’ यह कथन कोटिश: सत्य है–इसलिए उन्हें बहुत प्यार व सावधानी से सहेजने व संजोने की दरक़ार है। ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।’ सो! रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं; किसी भी पल दरक़ जाते हैं और रिश्तों में आयी दरार कहीं खाई न बन जाए; उसका ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है। एक फिल्म की ये पंक्तियां, ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ व ‘ताल्लुक बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा’ इन्हीं भावों को परिपुष्ट करती हैं। हृदय में संशय, संदेह, अविश्वास से अति-विषाक्त हो जाने से पूर्व अजनबी बन जाना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, ताकि संबंधों को पुन: स्थापित करने की संभावना बनी रहे। इसी संदर्भ में मेरे मनो-मस्तिष्क में दस्तक दे रही हैं वे पंक्तियां, ‘दुश्मनी इतनी करो कि पुन: दोस्त बनने की संभावना शेष बनी रहे।’ सो! संभावना जीवन में अपना अहम् दायित्व निभाती है और वह सदैव बनी रहनी चाहिए। रहीम जी का दोहा ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय/ जोरे से पुनि न जुरै, जुरै गांठ परि जाइ’ भी यही संदेश देता है… जैसे धागे के टूटने पर, वह दोबारा जो नहीं जुड़ पाता; उसमें गांठ पड़ना अवश्यंभावी है। उसी प्रकार रिश्तों में भी शक़, आशंका, संशय व ग़लतफ़हमी ऐसी दरारें उत्पन्न कर देते हैं; जिन्हें पाटना अत्यंत दुष्कर होता है।

परंतु आजकल माधुर्यपूर्ण रिश्ते तो गुज़रे ज़माने की बात हो गए हैं। संबंध-सरोकार शेष बचे ही नहीं। हर रिश्ते में अजनबीपन का अहसास व्याप्त है। रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या भाई-भाई का हो; पिता- पुत्र का हो या मां बेटी का– सब एकांत की त्रासदी झेल रहे हैं; यहां तक कि बच्चे भी अकेलेपन से जूझ रहे हैं। पति-पत्नी में स्नेह, प्रेम, त्याग व समर्पण के अभाव होने का ख़ामियाज़ा सबसे अधिक बच्चे भुगत रहे हैं तथा उनके हृदय में अनगिनत प्रश्न ग़ाहे-बेग़ाहे कुनमुनाते हैं और वे अपने माता-पिता को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जिसे सुन वे स्तब्ध रह जाते हैं। ‘यदि उनके पास उनके पालन-पोषण करने का समय ही नहीं था, तो उन्होंने उन्हें जन्म ही क्यों दिया?’

अक्सर माता-पिता बच्चों को खिलौने व सुख- सुविधाएं प्रदान कर, अपने दायित्वों की इति-श्री समझ लेते हैं; परंतु बच्चों को उनकी दरक़ार नहीं होती, बल्कि उन्हें तो माता-पिता के प्यार-दुलार व सान्निध्य-साहचर्य की आवश्यकता होती है; जिसके अभाव में उन मासूमों के हृदय में आक्रोश की स्थिति पनपने लगती है– जिसका परिणाम हमें बच्चों के नशे के आदी होने व अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त होने के रूप में दिखने को मिलता है। इस स्थिति में उनका सर्वांगीण विकास कैसे संभव हो सकता है? मोबाइल, टी•वी• व मीडिया से उनका जुड़ाव व सर्वाधिक प्रतिभागिता सर्वत्र झलकती है; जो उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है, जिसके परिणाम- स्वरूप वे मानसिक रोगी बन जाते हैं।

आजकल अहंनिष्ठता के कारण माता-पिता में अलगाव की स्थिति पनप रही है, जिसके कारण सिंगल-पेरेंट का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। सो! बच्चों को माता का स्नेह-दुलार व पिता का सुरक्षा- दायरा नसीब नहीं हो पाता और वे कुंठा-ग्रस्त हो जाते हैं। उनके जीवन से आस्था व विश्वास के भाव नदारद हो जाते हैं और जीवन के प्रति उनका नज़रिया अथवा दृष्टिकोण सदैव नकारात्मक रहता है। सब्र, संतोष, करुणा, सहानुभूति, त्याग व  सहनशीलता से उनका दूर का नाता भी नहीं रहता। वे उसके श्रेय-प्रेय व शुभ-अशुभ पक्षों की ओर ग़ौर नहीं फ़रमाते; न ही निर्णय लेने व उसे कार्यान्वित करने में समय लगाते हैं; जिसका परिणाम हमें उनके प्रतिदिन फ़िरौती, अपहरण, लूटपाट, दुष्कर्म आदि के हादसों में लिप्त होने के रूप में दिखाई पड़ता है।

आज की युवा-पीढ़ी चार्वाक दर्शन से प्रभावित है तथा हर क्षण का तुरंत उपभोग कर लेना चाहती है। वे अगले पल अर्थात् कल व भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करते। सो! युवावस्था में पदार्पण करने से पूर्व ही वे मासूम बच्चियों की अस्मत लूटने, एकतरफ़ा प्यार में तेज़ाब फेंकने व सरे-आम गोलियां चलाने से गुरेज़ नहीं करते। दुष्कर्म करने के पश्चात् उसकी दर्दनाक हत्या कर देना भी आजकल सामान्य सी घटना स्वीकारी जाती है, क्योंकि वे अपनी सुरक्षा-हेतु कोई भी सबूत छोड़ना नहीं चाहते। इस स्थिति में बहन, बेटी व मां के संबंध की सार्थकता उनकी दृष्टि में कहां महत्व रखती है? पहले पत्नी को छोड़कर हर महिला को मां, बहन, बेटी के रूप में मान्यता प्रदान की जाती थी और उनके आत्म-सम्मान पर आंच आने की स्थिति में; वे अपने प्राणों की बाज़ी तक लगा देने को तत्पर रहते थे। परंतु आजकल तो दुधमुंही मासूम बच्चियां भी अपने माता-पिता के आंचल तले महफूज़ नहीं हैं… गिद्ध नज़रें हर-पल उनके चारों ओर मंडराती दिखाई पड़ती हैं।

चलिए! प्रकाश डालते हैं– पति-पत्नी के विवाहेतर संबंधों पर– पति-पत्नी और वो अर्थात् पर-स्त्री-गमन आज के समाज का फैशन हो गया है। ‘लिव-इन’ व ‘मी-टू’ के दुष्परिणाम तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष हैं, जिसके कारण परिवार टूट रहे हैं। वैसे पैसा भी रिश्तों में दरार उत्पन्न करने में अहम् भूमिका अदा करता है। भाई-भाई, भाई-बहन, पिता-पुत्र व मां-बेटी के पावन संबंध भी दांव पर लगे रहते हैं।अक्सर वे एक-दूसरे की जान लेने पर सदैव आमादा रहते हैं। संतान द्वारा माता-पिता की हत्या के किस्से सामान्य हो गये हैं। पहले संयुक्त परिवार-प्रथा का प्रचलन था। एक कमाता था, दस खाते थे। परंतु आजकल हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने में व्यस्त है, परंतु स्थिति सर्वथा भिन्न है। परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं और संवादहीनता के कारण  पनप रही संवेदनशून्यता की स्थिति के परिणाम-स्वरूप रिश्तों में ग्रहण लग गया है …माता- पिता को वृद्धाश्रमों में शरण लेनी पड़ रही है। वे कमरे के बंद दरवाज़ों व शून्य छत की ओर ताकते; उन आत्मजों की प्रतीक्षा में रत रहते हैं; जिनके लौटने की संभावना नगण्य होती है। अक्सर बच्चों के विदेश-गमन के पश्चात् वे जीवन में अकेले जूझते व संघर्ष करते रहते हैं; जिसका परिणाम दस माह पश्चात् एक फ्लैट में महिला का कंकाल प्राप्त होना है। यह आधुनिक समाज के सभी वर्ग के लोगों को कटघरे में खड़ा कर प्रश्न करता है– ‘क्या बच्चों का माता-पिता के प्रति कोई दायित्व नहीं है?’

वैसे इस अप्रत्याशित व भयावह स्थिति के लिए अपराधी केवल बच्चे नहीं; उनके माता-पिता भी हैं, जो उनके विदेश में होने पर फ़ख्र महसूस करते हैं। परंतु जब बच्चे वहां से लौट कर नहीं आते, तो उनकी जान पर बन आती है। सो! मैं अमुक घटना पर आपकी तवज्जो चाहूंगी; जिसे सुनकर आपके पांव तले से ज़मीन खिसक जाएगी। चंद दिन पहले पिता ने अपने बेटे को उसकी मां की गंभीर बीमारी के बारे में सूचित करते हुए कहा कि वह उसे बहुत याद करती है। एक बार आकर वह उसे मिल जाए। परंतु वह नहीं आया। इतना ही नहीं– उसका अपने भाई से यह आग्रह करना कि भविष्य में मां के निधन पर वह चला जाए और पिता के निधन पर वह चला जाएगा। क्या यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं है?

आजकल तो लहू का रंग लाल ही नहीं रहा; श्वेत हो गया है। संवेदना-सरोवर सूख चुके हैं। अब उनमें कोई हलचल नहीं रही। संवाद संबंधों की जीवन- रेखा हैं। जब आप बात करना बंद कर देते हैं; अमूल्य संबंध खोने लगते हैं। उन्हें जीवित रखने के लिए आवश्यकता है– विवाद से बचने की और संबंधों को शाश्वत बनाए रखने की…जिसकी शर्त है, झुकना; सहन करना व प्रसन्नता से खुद पराजय स्वीकार कर, दूसरों को विजयी बनाने की बलवती इच्छा होना। सच्चे संबंध जीवन की वास्तविक पूंजी व धरोहर होते हैं, जो विषम परिस्थितियों में भी सहायक सिद्ध होते हैं। इनसे निबाह करने के लिए मानव को अहम् का त्याग करना अनिवार्य होता है, अन्यथा उसी के बोझ से वे टूट जाते हैं। ‘तूफ़ान में किश्तियों का बचना तो संभव है, परंतु अहं से हस्तियों का डूबना अनिवार्य है, निश्चित है।’

सो! आजकल सब संबंध दिखावे के हैं, जो मात्र छलावा हैं। वास्तव में हर शख्स भीतर से अकेला है। यही है, जिंदगी की कशमकश; जिससे जूझता हुआ इंसान आवागमन के चक्र से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता, बल्कि उसे आजीवन सुनामी की आशंका बनी रहती है। वह हर पल इसी आशंका में जीता है कि वे रिश्ते किसी पल भी दरक़ सकते हैं, क्योंकि अविश्वास, संदेह व शंका रूपी दीमक उसे खोखला कर चुकी होती है और वे संबंध नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु फिर भी एक आशा; एक उम्मीद अवश्य बनी रहती है।

आइए! पारस्परिक मनोमालिन्य को तज, सहज रूप से जीवन जीएं व अहं का त्याग कर मंगल-कामना करें और ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठें। संसार में जो सत्य है; वह सुंदर व कल्याणकारी है। सो! सत्य को सदैव संजो कर रखना व विषम परिस्थितियों में सम बने रहना श्रेयस्कर है।। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि वह पल-भर में सब रिश्तों में सेंध लगाकर, उन्हें नष्ट कर देता है। सो! दूसरों की भावनाओं का सदैव सम्मान करें व  उनसे वैसा व्यवहार करें; जिसकी अपेक्षा हम उनसे करते हैं। पहले लोग भावुक होते थे; भावना में बह कर रिश्ते निभाते थे। फिर लोग प्रैक्टिकल हुए–भावना का कोई स्थान नहीं रहा; रिश्तों से फायदा उठाने लगे और अब प्रोफेशनल हो गए हैं और वही रिश्ते निभाने लगे हैं; जिनसे अपने स्वार्थ साधे जा सकें। ‘रिश्ते नम्रता से निभाए जा सकते हैं; छल-कपट से तो केवल महाभारत रची जा सकती है।’ इसलिए बुरा मत मानिए–अगर लोग आपको ज़रूरत के समय याद करते हैं, बल्कि गर्व कीजिए, क्योंकि मोमबत्ती की याद तभी आती है; जब अंधेरा होता है। सो! रिश्तों की गहराई को अनुभव कीजिए-समझिए। सहृदय बनिये और स्नेह-सौहार्द बनाए रखिए। रिश्तों में प्रतिदान की अपेक्षा मत रखिए; केवल देना सीखिए अर्थात् समर्पण व त्याग की महत्ता व अहमियत स्वीकारिए, ताकि रिश्ते स्वस्थ बने रहें और उनमें ताज़गी बरकरार रहे। रिश्ते रिसते न रहें। रिश्तों का अहसास बना रहे और वे जीवन को आंदोलित करते रहें; जिससे जीवन-बगिया महकती रहे; लहलहाती रहे और वहां चिर-वसंत का वास हो… मलय वायु के झोंके सभी दिशाओं को आलोड़ित व अलौकिक आनंद से सराबोर करते रहें– यही अनमोल रिश्तों की सार्थकता है।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 3 ☆ कोरोना से संदर्भित : वह पीड़ा जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। आज से आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सकारात्मक आलेख  ‘कोरोना से संदर्भित : वह पीड़ा जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं’।)

☆ किसलय की कलम से # 3 ☆

☆ कोरोना से संदर्भित : वह पीड़ा जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं ☆

(यह आलेख लॉक डाउन के प्रथम चरण से संदर्भित है किन्तु, इसके तथ्य आज भी विचारणीय हैं जिन्हें आत्मसात करने की आवश्यकता है।) 

लगभग सौ वर्ष पूर्व का भारतीय सामाजिक परिवेश देखें तो हम पाएँगे कि समाज में वर्ण व्यवस्था जीवित तो थी लेकिन शिथिल भी होती जा रही थी। लोग वर्ण से इतर कामकाज और व्यवसाय-धंधे अपनाने लगे थे। धीरे-धीरे रूढ़िवादियाँ और असंगत प्रथाएँ समाप्त हो रहीं थी, वहीं पाश्चात्य की दस्तक से जीवनशैली बदलने लगी थी। जो समाज छुआछूत, ऊँच-नीच अथवा निम्न जातियों से परहेज करता था, उनके भी मायने बदलने लगे थे। लोगों में रहन-सहन, खान-पान और मेलजोल बढ़ने लगा था। यह कितना उचित था, कितना प्रासंगिक था? अथवा कितना आवश्यक था? ये सब वक्त और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है।

पहले स्नान-ध्यान, पूजा-भक्ति, नियम-संयम अथवा जाति-धर्म का बहुत महत्त्व होता था। जहाँ तक मैंने अध्ययन एवं चिंतन किया है, ये सब बातें कपोलकल्पित नहीं थीं। हर व्यवस्था अथवा कार्य के पृष्ठ में एक तर्क, सत्यता, व्यवस्था अथवा सुरक्षा का भाव निश्चित रूप से होता था। स्वस्थ जीवन के इस रहस्य को युगों-युगों से भारतीय जानते हैं। आज भी स्नान, स्वच्छता, शुद्धता, सद्भावना आदि का पहले जैसा ही महत्त्व है। आज बदलते परिवेश और प्रगति की अंधी दौड़ में हमारी दिनचर्या इतनी अनियमित व असुरक्षित हो गई है, जिस पर चिंतन किया जाए तो उसे कोई भी स्वीकार्य नहीं कर पायेगा।

घर में लाया गया खाद्यान्न हो अथवा कोई भी सीलबंद सामग्री, उसकी विश्वसनीयता हमेशा से संदेह के घेरे में रही है, आज के समय में क्या आप बाहर की किसी भी वस्तु या खाद्य पदार्थ घर में लाना चाहेंगे? शायद आज बिल्कुल नहीं, फिर भी हम विवश हैं। राम भरोसे सब कुछ ला रहे हैं और खा भी रहे हैं। वर्तमान में उत्पन्न हुईं ये परिस्थितियाँ हमारी महत्त्वाकांक्षाओं का ही कुपरिणाम है। आज आदमी आदमी के निकट आने से घबरा रहा है। हाथ मिलाने के स्थान पर दूर से नमस्ते करने लगा है। आज सुरक्षा की दृष्टि से दूसरे के हाथों बने भोजन से परहेज करने लगा है। कुछ ही महीने पहले ऐसा लगता था कि इन सबके बिना आदमी जिंदा नहीं रह पाएगा परन्तु अब ऐसा लगने लगा है जैसे नए रूप में ही सही कुछ पुरानी प्रथाएँ पुनर्जीवित हो उठीं हों।

आज ट्रेनें बंद हैं। बाजार बंद हैं। आवश्यक सेवाएँ तक न के बराबर हैं, फिर भी सभी जिंदा हैं। इसका मतलब यही हुआ कि आदमी चाह ले तो सब संभव है। इसी को वक्त का बदलना कहते हैं। आज हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर आदमी अपने घरों को लौट रहे हैं। घर से बाहर निकला मजदूर अपने शहर और गाँव की ओर भाग रहा है। उसके मन में बस एक ही बात है कि जो भी हो, जैसे भी रहेंगे, अपने घर और अपनों के बीच में रहेंगे। इसीलिए कहा गया है कि-

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’

सुख हो अथवा दुख अपनी माटी, अपने लोक और अपनी संस्कृति में आसानी से कट जाते हैं। आज जब आदमी अपने घरों की ओर भाग रहा है, तब उन उद्योगों-धंधों और व्यवसाय का क्या होगा? जहाँ बहुतायत में बाहरी मजदूर व कर्मचारी काम करते थे। उन मजदूरों, छोटे व्यापारियों और कुटीर उद्योगों का क्या होगा, जिनसे लोगों की रोजी-रोटी चलती थी। कुछ ही समय में ऐसे अनेक परिवर्तनों का खामियाजा हमारा समाज भुगतेगा,  जिन पर अभी तक किसी ने सोचा भी नहीं है। बड़े उत्पादों हेतु जब कर्मचारियों की कमी होगी तो उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ेगा ही। क्या उत्पाद महँगे नहीं होंगे? जब मजदूरों को मजदूरी नहीं मिलेगी तो क्या उनकी दिनचर्या में फर्क नहीं पड़ेगा? उनकी रोजी रोटी कैसे चलेगी? जब रोजी रोटी नहीं चलेगी तो बेरोजगारी, भूखमरी और अराजकता नहीं फैलेगी?  क्या निम्नवर्गीय बेरोजगार तबका न चाहते हुए भी अनैतिक और उल्टे-सीधे कार्य नहीं करेगा?

यदि समय रहते देश के जागरूक, बड़े उद्योगपति, देश के कर्णधार और प्रशासन देशहित में आगे नहीं आये, समृद्ध लोगों ने उदारता नहीं दिखलाई तो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, चोरी-डकैती, लूटमार की घटनाएँ बढ़ने में देर नहीं लगेगी। आज कोरोना-कहर ने सारे विश्व को स्तब्ध कर दिया है। कुछ ही महीनों में इस बीमारी के दुष्परिणाम दिखाई देने लगे हैं। अभी पूरा का पूरा निम्न वर्ग अपनी जमापूँजी के सहारे अपनी रोजी-रोटी जैसे-तैसे चला रहा है। जब पूँजी समाप्त हो जाएगी और रोजगार भी नहीं रहेगा, फिर क्या होगा? इसकी कल्पना ही भयावह लगती है।

कुछ लोगों की नासमझी, कुछ विवशताएँ एवं कुछ असावधानियाँ भी कोविड-19 को विकराल बनाने में सहायक हो रही हैं। आज वह चाहे छोटा हो या बड़ा, अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा, धनवान हो या निर्धन, जिस तरह बिजली और आग किसी में फर्क नहीं करती ठीक उसी तरह यह कोरोना किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, जो सामने पड़ा उस पर वार करेगा ही। गंभीरता से सोचने पर कहा जा सकता है कि यह वह पीड़ा है जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं।

अतः हमें स्वयं को, अपने परिवार को, अपने गाँव-शहर को या यूँ कहें कि अपने देश को इस संकट से उबारना है तो हमें प्रशासन व चिकित्सकों के सभी निर्देशों का स्वस्फूर्तभाव से पालन करना होगा। यदि हम सब कृतसंकल्पित होते हैं तो शीघ्र ही हमारी और हमारे देश की परिस्थितियाँ वापस सामान्य होने लगेंगी और एक बार पुनः निर्भय, स्वस्थ और सुखशांतिमय जीवन की शुरुआत हो सकेगी।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : [email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 40 ☆ जीवन पथ …. ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी  का  एक भावप्रवण रचना “ जीवन पथ …. ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 40 ☆

☆ जीवन पथ .... ☆

 

जीवन के पथ में मिले, तरह तरह के लोग

सीखा हमने भी बहुत, इनसे जग का योग

 

जीवन के हर मोड़ पर, काँटे मिले तमाम

आयेंगी मुश्किल कई, तभी बनेंगे काम

 

अपनी इक्छा शक्ति से, होगा पथ आसान

नहीं मुश्किलों से डरें, चलिए मन में ठान

 

घूम घूम अनजान पथ, उड़ कर चले पतंग

मन भँवरा सा घूमता, जैसे चले मतंग

 

पाता  मंजिल है वही, चलता पथ अविराम

जब हिय में “संतोष’हो, हुए सफल सब काम

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य – हरवलाय  मित्र माझा.  . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता  “हरवलाय  मित्र माझा.  . ! ,

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य ☆

☆ हरवलाय  मित्र माझा.  . ! ☆  

 

हरवलाय  मित्र माझा.  . !

त्याचा, …तिचा, . . .

ह्याचा,  … तुमचा …

जसा आहे ना  . . .

अगदी तसाच आहे . . .

जीवाभावाचा

मित्र माझा. पण .. .

सध्या. . . .  हरवलाय. . .

कुणी म्हणतं सोशल झालाय

कुणी म्हणतं लोकल झालाय.

वाॅटस्अप ,फेसबुक, वेबसाईट

दमलोय आता ,शोध घेऊन

कोण जाणे? कुठे बसलाय जाऊन ?

नाही म्हणायला. . . .  संवाद घडतोय

पण.. .

मेसेज मधुनच बोलतोय

ईमेल मधून भेटतो

सारख बदलतो स्टेटस

स्वतः  कधी , समोर येतच नाही

वाद नाही, . . विवाद  नाही

भांडण, तंटा . . काहीच नाही.

नुसता आपला .. . छापील संवाद

हाय,हॅलो, . . कसा आहेस?

गुडमाॅर्नींग .. . गुडनाईट. ..!

मिसिंग की . . मिस् प्लेस

काय झालंय ,? कळत नाही

पण….

हरवलाय मित्र माझा.

जिवंत, हाडामासाचा,संवेदनशील

विचारी, विवेकी संयमी

तर कधी

भांडखोर, चिडखोर. . .

हळवा , प्रेमळ,

अन  भावविभोर. .

समोर दिसताच धावणारा

गळाभेट घेणारा

मन मोकळे करणारा

हरवलाय मित्र माझा.

अरे,  तुमचा मोबाइल

नवीन दिसतोय

त्याच्यात आहे का हो

साॅफ्टवेअर एखादं

फेसबुक वरच अपडेट,

मिडियाच अपलोड

हार्ट वर्क मधे

डाऊनलोड करणारं

त्याची छबी ,छापील संवाद

चेहर्‍यावरचे हावभाव

काळजामधे उतरवणार

मनामनात रूजणारं

आहे का साॅफ्टवेअर एखाद?

या संगणकीय युगात

मशीन नको . . माणूस हवाय

कुठलीही कळ दाबताच

नव्या विश्वात नेणारा.

फक्त चेहरा बघताच

सारं मन वाचून घेणारा.

मनकवडा मित्र माझा

बघताय ना. ? प्लीज. . .

शोधताय ना.. . खरंच. . .

खरच. . .

हरवलाय मित्र माझा. . . !

(श्री विजय यशवंत सातपुते जी के फेसबुक से साभार)

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Happiness Activity: What determines HAPPINESS? ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity: What determines HAPPINESS? ☆ 

Video Link >>>>

Happiness Activity: What determines HAPPINESS?

CAN YOU MAKE YOURSELF LASTINGLY HAPPIER?

This video provides you answers to these questions based on POSITIVE PSYCHOLOGY – the modern Science of Happiness.

According to Positive Psychologists, the enduring level of happiness that you experience is determined by three factors: your biological set point, the conditions of your life, and the voluntary activities you do.

YES!! You can make yourself lastingly happier by practicing Happiness Activities that have been proven to work by Positive Psychologists.

It is worth striving to get the right relationships between yourself and others, between yourself and your work, and between yourself and something larger than yourself. If you get these relationships right, a sense of purpose and meaning will emerge.

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email [email protected] if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 33 ☆ लघुकथा – पंख होते तो उड जाते ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक अतिसुन्दर विचारणीय लघुकथा   “ पंख होते तो उड जाते”। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस प्रेरणास्पद  अतिसुन्दर शब्दशिल्प से सुसज्जित लघुकथा को सहजता से रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 33☆

☆  लघुकथा – पंख होते तो उड जाते

लॉन के कोने में  आम का एक घना पेड है. एक दिन पेड के बीचोंबीच एक चिडिया की आवाजाही जरा ज्यादा ही दिखी,  मैंने आम की डाल को हटा कर धीरे से देखा – अरे वाह ! चिडिया रानी घोंसला बना रही हैं, मन खुश हो गया. पक्षियों की चहल – पहल पूरे घर में रौनक ला देती है. चिडिया अपनी छोटी सी चोंच में घास – फूस, धागे का टुकडा तो कभी सुतली लेकर आती. धीरे – धीरे घोंसला बन रहा था , मैं चुपचाप जाकर उसकी बुनावट देखती कुछ पत्तों को धागे और  सुतली से ऐसे जोड दिया था मानों किसी इंसान ने सुईं धागे से सिल दिया हो, कैसी कलाकारी है इन पक्षियों में,  कौन सिखाता है इन्हें ये सब. इंसानों की दुनिया में दर्जनों कोचिंग क्लासेस हैं,जो चाहे सीख लो,  पर ये कैसे सीखते हैं ? नजरें आकाश की ओर उठ गईं.

चिडिया ने कब  घोंसला बना लिया और कब उसमें अंडे आ गए मुझे कुछ पता ही न चला.  एक दिन चूँ – चूँ   की मोहक आवाज ने लॉन को गूँजा दिया. चिडिया रानी अब नन्हें- नन्हें चूजों की माँ थी और अपना दायित्व निभा रही थीं. फुर्र से उडकर जाती और नन्हीं सी चोंच में दाने लाकर चूजों के मुँह में डाल देती. ना जाने कितने चक्कर लगाती थी वह. तीनों बच्चे चोंच  खोले चूँ- चूँ, चीं -चीं करते रहते. इनकी  मीठी आवाजों से आम का पेड  गुलजार  था और मेरा मन भी.

चिडिया रानी अब अपने बच्चॉं को उडना सिखाने लगी थी. वह उडकर पेड की एक  डाल पर बैठती और पीछे पीछे बच्चे भी आ बैठते. फिर पेड से उडकर छत की मुंडेर पर बैठने लगी. बच्चे कुछ उडते,  कुछ फुदकते उसके पीछे आ जाते. और फिर एक दिन  चिडिया ने लंबी उडान भरी, बच्चे उडना सीख गए थे, उनके पंखों में जान आ गई थी,  अब उनकी  अलग दिशाएं थीं, अपने रास्ते.  ना चिडिया लौटी, ना बच्चे. आम के पेड पर घोंसला अब भी वैसा ही था  पक्षियों के जीवन की कहानी कहता हुआ,  बच्चों को जन्म दिया, खिलाया, पिलाया, उडना सिखाया और बस. इंसानों की तरह ना अकेलापन, ना बेबसी, ना कोरोना,  ना रोना .

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

 

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ तंजखोर शब्दों की बीमारी ! ☆ श्री राकेश सोहम

श्री राकेश सोहम

( श्री राकेश सोहम जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है।  श्री राकेश सोहम जी  की संक्षिप्त साहित्यिक यात्रा कुछ इस प्रकार है – 

साहित्य एवं प्रकाशन – ☆ व्यंग्यकार प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं, कथाओं आदि का स्फुट प्रकाशन आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारण बाल रचनाकार प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका और दैनिक अखबार के लिए स्तंभ लेखन दूरदर्शन में प्रसारित धारावाहिक की कुछ कड़ियों का लेखन बाल उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन अनकहे अहसास और क्षितिज की ओर काव्य संकलनों में कविताएँ प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांग अड़ाने का सुख’ प्रकाशनाधीन।

पुरस्कार / अलंकरण – ☆ विशेष दिशा भारती सम्मान यश अर्चन सम्मान संचार शिरोमणि सम्मान विशिष्ठ सेवा संचार पदक

☆ व्यंग्य – तंजखोर शब्दों की बीमारी ! 

(हम आभारी है  व्यंग्य को समर्पित  “व्यंग्यम संस्था, जबलपुर” के जिन्होंने  30 मई  2020 ‘ की  गूगल  मीटिंग  तकनीक द्वारा आयोजित  “व्यंग्यम मासिक गोष्ठी’”में  प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की कृतियों को  हमारे पाठकों से साझा करने का अवसर दिया है।  इसी कड़ी में  प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध लेखक/व्यंग्यकार श्री राकेश सोहम जी का  एक  विचारणीय व्यंग्य – तंजखोर शब्दों की बीमारी !।  कृपया  रचना में निहित सकारात्मक दृष्टिकोण को आत्मसात करें )

कविता सृजन के मध्य कुछ शब्द व्यंग्य से निकल कर शरणागत हुए. वे उनींदे और परेशान थे. प्रतिदिन देर रात तक जागना. किसी पर पर तंज कसने के लिए अपने आप को तैयार करना. फिर अलसुबह निकल जाना. उनके चेहरों पर कटाक्ष से उपजीं तनाव की लकीरें स्पष्ट दिख रहीं थीं. व्यंग्य के पैनेपन को सम्हालते हुए वे भोथरे हो चले थे.

ये शब्द, ससमूह तकलीफों का गान करने लगे. कुछ ने कहा कि वे समाज को कुछ देने की बजाए कभी राजनीति को पोसते, और कभी कोसते है. व्यवस्थाओं पर राजनीतिक तंज और अकड़बाज़ी दिखाते-दिखाते उनकी तासीर ही अकड़कर कठोर हो चली है. वे प्रतिदिन सैकड़ों हज़ारों की संख्या में व्यंग्य के तीर बनकर निशाने से चूक जाते है. व्यवस्थाओं को सुधारने में असमर्थ पाते है. व्यवस्थाएं केवल और केवल राजनीतिक मुद्दा बन कर रह गयीं हैं. इन्हें चुनावों के दौरान भुनाया जाता है. ये शब्द प्रतिदिवस अखबारों में बैठकर केवल चटखारे बन कर रह गए है. उनके पैनेपन से, उनकी चुभन से जिम्मेदार आला दर्जे के लोग अब दर्द महसूस नहीं करते. अजीब तरह का आनंद अनुभव करते हैं. बल्कि ये लोग उम्मीद करते हैं कि अगली सुबह उन पर निशाना कसा जाएगा और वे चर्चा में बने रहने का सुख भोग पाएंगे.

कठोर मानसिकता से बीमार अनेक शब्द सीनाजोरी पर उतर आए. बहुत समझाने पर भी वे माने नहीं. मांगे मनवाने हेतु जोर आजमाईश पर उतारू हो गए. कवि विचलित हो गया. अतः उनकी इच्छा जाननी चाही. वे बोले कि उन्हें व्यंग्य से निजात दिला दी जाए और कविता में बिठा दिया जाए. उन्हें अपनी बीमार कठोरता से मुक्ति चाहिए.

‘ऐसा क्यों? कविता में क्यों बैठना चाहते है !’, कवि ने फिर पूछा. वे समवेत स्वर में बोल पड़े, ‘क्योंकि कविता स्त्रैण होती है. वह कोमल होती है. सुन्दर और सुवासित होती है. कविता में सरलता और तरलता दोनों होती है, इसलिए.’

कवि ने समझाया, ‘ऐसा नहीं है कि कविता स्त्रैण है इसलिए उसमें कठोरता का कोई स्थान नहीं है. वह कोमल है ज़रूर किन्तु कमज़ोर नहीं है. वह सबला है. आज की स्त्री पुरषोंचित सामर्थ्य जुटाने में सक्षम है. उसे अपना हक़ लेना आ गया है. ज्यादतियों के विरोध में स्वर सुनाई देने लगे है. कविता का तंज व्यंग्य की मार से कमतर नहीं है. कविता दिल से उपजती है और व्यंग्य दिमाग से. इसलिए तुम्हारी मांगें अनुचित है. व्यवस्थाओं के सुधार के लिए दिल-दिमाग दोनों चाहिए.’

व्यंग्य से पलायनवादी शब्द अपने भोथरेपन के साथ निशब्द होकर लौट गए.

 

©  राकेश सोहम्

एल – 16 , देवयानी काम्प्लेक्स, जय नगर , गढ़ा रोड , जबलपुर [म.प्र ]

फ़ोन : 0761 -2416901 मोब : 08275087650

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 30 ☆ पावन-सा चंदन ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण कविता  “पावन-सा चंदन.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 30 ☆

☆ पावन-सा चंदन ☆

 

प्रात मुझे सुखमय लगता है

चिड़ियों का वंदन

जीवन नित आशा से भरता

एक नया विश्वास बरसता

पावन-सा चंदन

 

कभी हँसूँ अपने पर मैं तो

कभी हँसूँ दुनिया पर

मुस्काती हैं दिशा-दिशाएँ

नई-नई धुन भरकर

 

प्रेम खोजता खुली हवा में

हर्षित जग-वंदन

 

तमस निशा-सा था यह जीवन

मरुथल-सा तपता मन

सूनापन घट-घट अंतर् का

करता मधु-गुंजन

 

दुख हरता है,सुख भरता है

भोर किरण स्यंदन

 

कितने जन्म लिए हैं मैंने

अब तो याद नहीं कुछ

अनगिन थाती और धरोहर

के संवाद नहीं कुछ

 

पल-छिन माया छोड़ रहा मैं

काट रहा बंधन

 

सन्मति की मैं करूँ प्रार्थना

इनकी-उनकी सबकी

मार्ग चुनूँ मैं सहज-सरल ही

मदद अकिंचन जन की

 

रसना गाती भजन राम के

जय-जय रघुनंदन

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 21 ☆ लॉक और अनलॉक के बीच झूलती जिंदगी☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय एवं प्रेरणास्पद रचना “लॉक और अनलॉक के बीच झूलती जिंदगी।  वास्तव में रचना में चर्चित ” हेल्पिंग  हैंड्स” और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। यदि समाज अपना कर्तव्य नहीं निभाएगा तो लोगों का मानवता पर से विश्वास उठ जायेगा। इस समसामयिक सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 21 ☆

☆ लॉक और अनलॉक के बीच झूलती जिंदगी

जबसे रमाशंकर जी ने अनलॉक -1 की खबर सुनी तभी से उन्होंने अपने सारे साठोत्तरीय दोस्तों को मैसेज कर दिया कि अब हम लोग आपस में मिल सकते हैं ;  मॉर्निंग वॉक पर, गार्डन में व चाय की चुस्कियों के साथ चाय वाले के टपरे पर,  जो बहुत दिनों से बंद था।

सभी दोस्तों की ओर से सहमति भी मिल गयी।

अब तो सुबह 5 बजे से ही सब लोग मास्क लगा कर, दूरी को मेंटेन करते हुए चल पड़े टहलने के लिए। अक्सर ही जब वे टहल कर थक जाते तो वहाँ पास में ही बने टपरे पर बैठकर चाय बिस्किट का आनंद लेते हुए नोक झोक करते थे। पर आज तो पूरा सूना सपाटा था। कहाँ तो लाइन से अंकुरित अनाज का ठेला, ताजे फलों के जूस का ठेला व और भी कई लोग आ जाते थे।

अब क्या करें यही प्रश्न भरी निगाहें एक दूसरे को देख रहीं थीं।

रमाशंकर जी ने कहा ” हम लोगों से चूक हो गयी, हमने सबके बारे में तो सोचा पर इधर ध्यान ही नहीं गया कि ये लोग बेचारे क्या करेंगे। हमारी सुबह को सुखद बनाने वाले परेशान होते रहे और हम लोग घरों में ही रहकर लॉक डाउन का आनंद लेते रहे।

हाँ, ये चूक तो हुयी, सभी ने एक स्वर से कहा।

अब चलो वहाँ बैठे गार्ड से पूछते हैं, ये लोग कहाँ मिलेंगे ?

सभी गार्डन की देखभाल करने वाले गार्ड के पास गए तो उसने बताया कि ये लोग अपने गाँव चले गए। जहाँ रहते थे,वहाँ मकान मालिक परेशान करते थे। खाना तो समाज सेवी संस्था से मिल रहा था किंतु रहने की दिक्कत के चलते क्या करते।

गार्डन भी तो कितना अस्त- व्यस्त लग रहा है, रमाशंकर जी ने कहा।

यही तो माली काका के साथ भी हुआ। उनको भी एक महीने का वेतन तो मिल गया था, उसके बाद का आधा ही मिला। वैसे तो कोई न कोई और भी काम कर लेते थे पर इस समय वो भी बंद, रहने की दिक्कत भी हो रही थी सो वे भी चले गए, गार्ड ने बताया।

क्या किया जाए, ये महामारी बिना लॉक डाउन जाती ही नहीं, इसलिए ये तो जरूरी था, रमाशंकर जी ने कहा।

आज देखो सब लोग घूमते दिख रहे हैं, बस वही लोग जो हमारे हेल्पिंग हैंड थे वे ही नहीं हैं क्योंकि जो मदद हम घरों में रहकर कर सकते थे उस ओर हमने ध्यान नहीं दिया,  रमाशंकर जी ने कहा।

कोई बात नहीं साहब, अब भी अगर आप लोग चाहें तो सब ठीक हो सकता है। इनका पता लगाइए, ये जहाँ रहते थे उनके पास इन लोगों का मो. न. अवश्य होगा, इन्हें फिर से हिम्मत दिलाइये कि ये शहर इनका अपना है, हम लोगों से भूल हुई है, इन्हें इनका व्यवसाय स्थापित करने में  सक्षम लोग यदि थोड़ी -थोड़ी भी मदद करें तो फिर से ये शहर चहकने – महकने लगेगा, गार्ड ने कहा।

तुमने तो हम सबकी आँखें खोल दी। तुम्हें सैल्यूट है। हम लोग मिलकर अवश्य ही अपना दायित्व निर्वाह करेंगे, सभी ने एक स्वर में कहा।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 51 – नकल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “नकल। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 51 ☆

☆ लघुकथा –  नकल ☆

 

परीक्षाहाल से गणित का प्रश्नपत्र हल कर बाहर निकले रवि ने चहकते हुए जवाब दिया, “निजी विद्यालय में पढ़ने का यही लाभ है कि छात्रहित में सब व्यवस्था हो जाती है.”

“अच्छा.” कहीं दिल में सोहन का ख्वाब टूट गया था.

“चल. अब, उत्तर मिला लेते है.”

“चल.”

प्रश्नोत्तर की कापी देखते ही रवि के होश के साथ-साथ उस के ख्वाब भी भाप बन कर उड़ चुके थे. वही सोहन की आँखों में मेहनत की चमक तैर रही थी.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

२०/०७/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

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