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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #106 ☆ व्यंग्य – ‘मोहब्बतें’ और आर्थिक विकास ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘’मोहब्बतें’ और आर्थिक विकास’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 106 ☆

☆ व्यंग्य –  ‘मोहब्बतें’ और आर्थिक विकास

मैं अभी तक इस मुग़ालते में था कि भाववाचक संज्ञा का बहुवचन नहीं होता, लेकिन मरहूम यश चोपड़ा की फिल्म ‘मोहब्बतें’ का नाम सुनकर लगा कि शब्दों का हमारा ज्ञान बहुत सीमित है। अब आगे ऐसी फिल्में आएंगीं जिनके नाम ‘इश्कें’, ‘तबियतें’ और ‘नफरतें’ होंगे।

बहरहाल,आपसे गुफ्तगू करने का अपना मकसद कुछ और ही है। जो बात कुछ दिनों से शिद्दत से मुझे खल रही है वह यह है कि हमारे देश के विकास में योगदान देने वाले बहुत से तत्वों का ज़िक्र तो होता है, लेकिन एक ख़ास चीज़ जिसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जाता है और जिसका  हमारे देश की बहबूदी में अहम योगदान है, वह ‘मोहब्बत’ है। दूर क्यों जाएं, ताजमहल को लें, जिसने हिन्दुस्तान को दुनिया के नक्शे पर खड़ा किया और मुल्क के लिए करोड़ों रुपयों की कमाई का सिलसिला बनाया। ताजमहल के लिए सरकार का टूरिज़्म विभाग या पुरातत्व विभाग कितना भी  क्रेडिट ले, लेकिन हकीकत यही है कि ताजमहल शाहजहाँ और मुमताज की पाक मोहब्बत का नतीजा है। इसलिए ताजमहल की वजह से देश की झोली में जो भी पैसा आ रहा है वह शुद्ध प्यार-मुहब्बत की कमाई है। न शाहजहाँ-मुमताज का प्यार परवान चढ़ता, न मुल्क के लिए स्थायी मोटी कमाई का ज़रिया बनता। मोहब्बत तुझको मेरा सलाम।

हिन्दुस्तानी फिल्में शुरू से ही प्यार- मोहब्बत की कमाई पर पलती रही हैं। प्यार- मोहब्बत ने फिल्मों को कितनी कमाई दी इसका लेखा-जोखा ज़रूरी है। तभी लोगों को पता चलेगा कि करोड़ों में खेलने वाले फिल्म उद्योग को उसकी वर्तमान ऊँचाइयों तक पहुँचाने में मोहब्बतों का कितना बड़ा योगदान है।

पुरानी फिल्मों के हीरो प्यार को ही खाते- पीते और ओढ़ते-बिछाते थे। उन दिनों आशिक के बारह घंटे माशूक का मुँह देखने और बारह घंटे चाँद को घूरने में खर्च होते थे। प्यार का काम बहुत आराम और इत्मीनान से होता था। बिखरे बाल, बढ़ी दाढ़ी, फटे कपड़े और चेहरे पर बदहवासी सच्चे आशिक के ट्रेडमार्क होते थे। उन दिनों के आशिक त्यागी और बेहद शरीफ होते थे। आजकल के आशिकों की तरह रकीब के पीछे बन्दूक लेकर नहीं पड़ जाते थे। प्रेमिका को कोई दूसरा डोली में बैठाकर ले जाता था और आशिक मियाँ, जंगल की ख़ाक छानते, विरह-गीत गाते रहते थे। यकीन न हो तो दिलीप कुमार की फिल्म ‘देवदास’ देख लीजिए।

बीच में फिल्मवालों को भ्रम हुआ कि मारपीट वाली फिल्में ज़्यादा चल सकती हैं, लेकिन उन्हें जल्दी ही अपनी गलती महसूस हो गयी और वे वापस प्यार-मोहब्बत की पुख्ता ज़मीन पर लौट आये। अब जितनी फिल्में बन रही हैं उनमें से तीन-चौथाई का ताल्लुक दिल के कारोबार से है। जो हीरो ‘मार्शल आर्ट’ में माहिर माने जाते थे वे आजकल नज़र का मोटा चश्मा लगाकर ‘आर्ट ऑफ लव’ के पन्ने पलट रहे हैं।

इस बात पर ग़ौर फरमाया जाए कि मोहब्बत शुरू से देश के विभिन्न महकमों को मज़बूत करने में अपना योगदान देती रही है। एक ज़माना था जब प्रेमपत्र कबूतरों के मार्फत भेजे जाते थे। तब कबूतरों का कारोबार अच्छा ख़ासा पनपता होगा। मेरी दृष्टि में प्रेमपत्र की डिलीवरी के मामले में कबूतर, पोस्टमैन या टेलीफोन से ज़्यादा भरोसेमन्द होता है क्योंकि वह हमेशा महबूबा के कंधे पर बैठता रहा है, पोस्टमैन की तरह उसने कभी महबूबा के वालिद या अम्माँ के हाथ में ख़त नहीं सौंपा। कई पोस्टमैन तो रकीबों को ख़त सौंप देते हैं।

जब डाक का ज़माना आया तब प्रेमपत्रों  ने डाकतार विभाग को काफी काम मुहैया कराया। कागज़ और रोशनाई की बिक्री भी इश्क की बदौलत काफी बढ़ी क्योंकि ख़त बीस बीस पेज के लिखे जाते थे और उनमें काफी स्याही खर्च होती थी। कई आशिक लाल स्याही से ख़त लिखते थे और डींग मारते थे कि ‘ख़त लिख रहा हूँ ख़ून से, स्याही न समझना।’  उन दिनों आशिक- माशूक काफी रोमांटिक और नाजुक होते थे। आहें भरने, तारे गिनने और ख़त लिखने में काफी वक्त ज़ाया होता था। उन दिनों वाहनों का चलन कम था, प्रेमपत्रों को ढोने का काम पैदल ही होता था। यह कल्पना सिहराने वाली है कि कंधे पर प्रेमपत्र ढोने वाले पोस्टमैनों की हालत कैसी होती होगी।

अब टेलीफोन और इंटरनेट के कारोबार में भी इश्क अपना भरपूर योगदान दे रहा है। देश में मोबाइल का उत्पादन और उसकी खपत तेज़ी से बढ़ी है। इसमें प्रेमियों का कितना योगदान है यह अध्ययन का विषय है। मोबाइल के आने से प्रेमियों का सरदर्द ज़रूर कम हुआ है। लैंडलाइन के ज़माने में जब महबूब का प्रेम-सन्देश आता था तभी बगल के कमरे में पिताजी दूसरा चोंगा उठाकर सारी गुफ्तगू सुन लेते थे, भले ही वह उनके सुनने लायक न रही हो।

तब टेलीफोन-बूथ वाले, आशिकों के इंतज़ार में आँखें बिछाये रहते थे क्योंकि वे लंबी बात करते थे और कभी हिसाब देखने की घटिया बात नहीं करते थे। किसी पब्लिक टेलीफोन-बूथ में  आशिक का प्रवेश हो जाए तो बाहर खड़े लोगों की इंतज़ार करते करते हालत ख़राब हो जाती थी।

यह खुशी की बात है कि प्रेम में निहित संभावनाओं पर लोगों की नज़र जाने लगी है। जिस देश में प्यार-व्यार को तिरछी नज़र से देखा जाता था उसमें ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया जाने लगा है, यद्यपि अभी भी दकियानूसी लोग आशिक- माशूकों को खुलेआम प्यार का इज़हार करते देख मारपीट पर उतर आते हैं। ऐसे ही लोगों की वजह से अभी ‘डेटिंग’ जैसी प्रथा शुरू नहीं हो पायी है। सरकार को चाहिए कि प्यार के इन दुश्मनों से सख्ती से निपटे ताकि प्यार बन्द कमरों से निकल कर खुली हवा में साँस ले सके।

मेरा सुझाव है कि प्यार की एक वेबसाइट बनायी जानी चाहिए जिसमें मुल्क के जाँबाज़ आशिक-माशूकों के बारे में तफ़सील से जानकारी हो। अभी कितने लोगों को मालूम है कि लैला-मजनूँ, हीर-राँझा, शीरीं-फ़रहाद, सोहनी- महिवाल और सस्सी-पुन्नू किस देश के और किस जाति के थे, और इश्क के अलावा वे और क्या कारोबार करते थे?इस वेबसाइट में उन सभी जगहों का अता-पता होना चाहिए जो प्यार के लिए आदर्श हैं, जहाँ प्यार के मार्ग में कोई रोड़े नहीं हैं और जहाँ प्यार को पुष्पित-पल्लवित होने के लिए उपयुक्त वातावरण है।

सरकार को भी चाहिए कि वह प्यार में छिपी व्यापार की असीम संभावनाओं को पहचाने और प्यार करने वालों को वे सभी सुविधाएँ मुहैया कराए जिनके वे हकदार हैं। प्यार करने वालों के लिए ऐसी जगहों पर ख़ास होटल और रेस्ट-हाउस बनाए जाने चाहिए जहाँ की ज़मीन प्यार के हिसाब से मौजूँ है। अभी तो मुंबई में प्यार करने वाले जोड़ों को पुलिस मैरिन-ड्राइव से खदेड़ रही है, जिस पर मैं अपना सख़्त एतराज़ दर्ज़ कराना चाहता हूँ।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 105 ☆ समुद्र मंथन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # 105 ☆ समुद्र मंथन ☆

स्वर्ग की स्थिति ऐसी हो चुकी थी जैसे पतझड़ में वन की। सारा ऐश्वर्य जाता रहा। महर्षि दुर्वासा के श्राप से अकल्पित घट चुका था। निराश देवता भगवान विष्णु के पास पहुँचे।  भगवान ने समुद्र की थाह लेने का सुझाव दिया। समुद्र में छिपे रत्नों की ओर संकेत किया। तय हुआ कि सुर-असुर मिलकर समुद्र मथेंगे।

मदरांचल पर्वत की मथानी बनी और नागराज वासुकि बने रस्सी या नेती। मंथन आरम्भ हुआ। ज्यों-ज्यों गति बढ़ी, घर्षण बढ़ा, कल्पनातीत घटने की संभावना और आशंका भी बढ़ी।

मंथन के चरम पर अंधेरा छाने लगा और जो पहला पदार्थ बाहर निकला, वह था, कालकूट विष। ऐसा घोर हलाहल जिसके दर्शन भर से मृत्यु का आभास हो। जिसका वास नासिका तक पहुँच जाए तो श्वास बंद पड़ने में समय न लगे। हलाहल से उपजे हाहाकार का समाधान किया महादेव ने और कालकूट को अपने कंठ में वरण कर लिया। जगत की देह नीली पड़ने से बचाने  के लिए शिव, नीलकंठ हो गए।

समुद्र मंथन में कुल चौदह रत्न प्राप्त हुए। संहारक कालकूट के बाद पयस्विनी कामधेनु, मन की गति से दौड़ सकनेवाला उच्चैश्रवा अश्व, विवेक का स्वामी ऐरावत हाथी, विकारहर्ता कौस्तुभ मणि, सर्व फलदायी कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी, मदिरा की जननी वारुणी, शीतल प्रभा का स्वामी चंद्रमा, श्रांत को विश्रांति देनेवाला पारिजात, अनहद नाद का पांचजन्य शंख, आधि-व्याधि के चिकित्सक भगवान धन्वंतरि और उनके हाथों में अमृत कलश।

अमृत पाने के लिए दोनों पक्षों में तलवारें खिंच गईं। अंतत: नारायण को मोहिनी का रूप धारण कर दैत्यों को भरमाना पड़ा और अराजकता शाश्वत नहीं हो पाई।

समुद्र मंथन की फलश्रुति के क्रम पर विचार करें। हलाहल से आरंभ हुई यात्रा अमृत कलश पर जाकर समाप्त हुई। यह नश्वर से ईश्वर की यात्रा है। इसीलिए कहा गया है, ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय।’

अमृत प्रश्न है कि क्या समुद्र मंथन क्या एक बार ही हुआ था?  फिर ये नित, निरंतर, अखण्डित रूप से मन में जो मथा जा रहा है, वह क्या है? विष भी अपना, अमृत भी अपना! राक्षस भी भीतर, देवता भी भीतर!… और मोहिनी बनकर जग को भरमाये रखने की चाह भी भीतर !

अपनी कविता की पंक्तियाँ स्मरण आती हैं-

इस ओर असुर/ उस ओर भी असुर ही / न मंदराचल / न वासुकि / तब भी-/ रोज़ मथता हूँ / मन का सागर…/ जाने कितने/ हलाहल निकले/ एक बूँद/ अमृत की चाह में..!

इस एक बूँद की चाह ही मनुष्यता का प्राण है।   यह चाह अमरत्व प्राप्त करे।…तथास्तु!

 

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 59 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 59 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 59) ☆

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 59 ☆

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गुमसुम  ही  रहती  हैं

अब बवाल नही करतीं

वो दबी दबी सी ख्वाहिशें

अब सवाल नही करतीं…

They remain silent only and

don’t make ruckus anymore

Those suppressed desires

never ask questions anymore

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बस यही दो मसले कभी

जिंदगी  भर  हल  ना हुए,

ना  कभी  नींद  पूरी ही हुई,

ना ही ख़्वाब मुकम्मल हुए…

 

Only these two issues could

never be resolved in the life,

Neither could I get any sleep

nor did dreams ever realise..!

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अभी  जिंदा हूँ  तो थोड़ा

गुफ़्तगू भी कर  लिया करो…

अगर मेरे मरने के बाद किया

तो ताबीज ही बनवाते फिरोगे…

 

Do talk to me a bit till the

time I’m alive, if done after

My death, then you’ll be busy

in getting the amulet made

 

* Amulet= Taabiz

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© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈




हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 59 ☆ उषा का स्वागत गीत ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा  रचित  भावप्रवण कविता ‘उषा का स्वागत गीत। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 60 ☆ 

☆ उषा का स्वागत गीत ☆ 

*

एक नन्हीं परी का धरा अवतरण

पर्व उल्लास का ऐ परिंदो! उड़ो

कलरवों से गुँजा दो दिशाएँ सभी

लक्ष्य पाए बिना तुम न पीछे मुड़ो

*

ऐ सलिल धार कलकल सुनाओ मधुर

हो लहर का लहर से मिलन रात-दिन

झूम गाओ पवन गीत सोहर अथक

पर्ण दो ताल, कलियाँ नचें ताक धिन

*

ऐ घटाओं गगन से उतर आओ री!

छाँह पल-पल करो, वृष्टि कर स्नेह की

रश्मि ऊषा लिए भाल पर कर तिलक

दुपहरी से कहे आज जी जिंदगी

*

साँझ हो पुरनमी, हो नशीली निशा

आहना के कोपलों का चुंबन करे

आह ना एक भी भाग्य में हो लिखी

कहकहों की कहकशा निछावर करे

*

चाँदनी कज्जरी दे डिठौना लगा

धूप नजरें उतारे विहँस रूप की  

नाच राकेश रवि को लिए साथ में

ईश को शत नमन पूर्ण आकांक्षा की

*

देख मुखड़ा नया नित्य मुखड़ा बने

अंतरा अंतरा गीत सलिला बहे

आहना मुस्कुरा नव ऋचाएँ रचे

खिलखिला मन हरे, नव कहानी कहे

*

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य #89 ☆ कतरनें ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  श्री सूबेदार पाण्डेय जी की  एक भावप्रवण एवं विचारणीय कविता “#कतरनें #। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# #89 ☆ कतरनें ☆

१ –अनुरोध–

फुटपाथों की दुकानों पर टंगे,

गद्दों रजाइयों के खोल।

तकियों के गिलाफ,

और बच्चों के कपड़े।

मुझे बुला रहे थे,

अपनी राम कहानी सुना रहे थे।

मुझे देखो टुकड़ों के रूप में,

आपस‌ मे मिला हूं।

सही है सुइ‌‌ की चुभन और पीड़ा,

कपड़ों के रूप में सिला हूं ।।१।।

२–मोलभाव–

उनके रूप में कोई न था आकर्षण,

पर आग्रह में छलकी थी अपार‌ वेदनायें।

किसी ने उनको हिकारत से देखा,

किसी ने अपनी जरूरत से देखा।

लोग आते रहे लोग जाते रहे,

मोल करते रहे भाव खाते रहे।

अचानक से कपड़े बोल पड़े,

ओ बाबू जी आप क्यूं है खडे़ ।।

३–आग्रह–

मुझे खरीद लो तुम्हारे न सही,

नौकर के काम आ सकता हूं।

उसके बिस्तर की शान बढ़ा सकता हूं,

उसकी जरूरतें पूरी कर सकता‌हूं ।

अभी भी इन कतरनों में जान है बाकी,

आपकी चुकाई कीमत अदा कर सकता हूं।,

‌‌४–हकीकत–

मेरी जरूरत देखो मेरी बातें सुनो,

मेरे बिकने की बारी हकीकत सुनो।

मुझमें चश्में के पीछे ‌से झांकती,

‌ किसी बूढ़ी आंखों का सपना है।

किसी सेवा की जरूरत का सहारा है,

किसी भूखे बूढ़े के भोजन की थाली है।

छोटे छोटे बच्चों की टाफियां है,

और उनके खिलौने हैं।।

५–कौतूहल–

मैं ब्रांडेड कंपनी का उत्पाद नहीं,

सहायता समूहों की उपज हूं।

मैं बेसहारों की आस हूं ,

उनकी कामयाबी का बिश्वास हूं ।

मै गरीबों की जरूरते हूं ,

आप का कौतूहल हूं।।

आओ आओ खरीद लो,

ले चलो अपने घर।।

६–सपना रूठ जायेगा–

ओ बाबू मेरी बात का ऐतबार करो,

अगर खरीद न सको तो

रूको देखो थोड़ा सा प्यार करो।

मैं बिश्वास दिलाता हूं उनके सपने सजाऊंगा,

अगर आपके नौकर ने नहीं स्वीकारा तो,

दान देने के काम आऊंगा।

वरना मेरा दिल टूट जायेगा,

सैकड़ों बेसहारों का सपना रूठ जायेगा।।

 

© सूबेदार  पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈




हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 4 (41-45)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #4 (41-45) ॥ ☆

 

रघु ने किया कलिंग में दुर्दिन शर स्नान

तब आई जय लक्ष्मी, संपति यथ, सम्मान ॥ 41॥

 

पान लताओं में वहाँ बना उचित स्थान

‘नीरा’ सा योद्धाओं ने पिया शत्रु सम्मान ॥ 42॥

 

बंदी कर छोड़े गये झुके कलिंग के नाथ

धर्मी रघु ने धन लिया, रखी न धरती साथ ॥ 43॥

 

फिर दक्षिण की दिशा में रघु ने किया प्रयाण

छोड़ सुपारी तट समझ सहज विजय अभियान ॥ 44॥

 

राजदल औं सैनिको ने कर क्रीडा – स्नान

मद औं मल से कर दिया कावेरी जल म्लान ॥ 45॥

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मनं पाखरू! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक

श्री प्रमोद वामन वर्तक 

🦋 कवितेचा उत्सव 🦋

⭐ मनं पाखरू!….. 🙏 श्री प्रमोद वामन वर्तक ⭐

मनं पाखरू पाखरू

पर हलके पिसागत

जाई साता सुमद्रापार

क्षणी विलक्षण वेगात

 

          मनं पाखरू पाखरू

          सारा सयीचा खजिना

          इथे दुःखी जखमांना

          कधी जागा अपुरी ना

 

मनं पाखरू पाखरू

घर बांधे ना फांदीवर

नेहमी शोधित फिरे

वृक्ष साजिरा डेरेदार

 

          मनं पाखरू पाखरू

          पंख याचे भले मोठे

          दृष्टी आडचे सुद्धा

          क्षणात कवेत साठे

 

मनं पाखरू पाखरू

वारा प्याले वासरू

बसे ना त्या वेसण

सांगा कसे आवरू ?

 

© श्री प्रमोद वामन वर्तक

(सिंगापूर) +6594708959

मो – 9892561086

ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मैत्री ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी

सुश्री संगीता कुलकर्णी

🦋 कवितेचा उत्सव 🦋

☆ मैत्री ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆ 

 

ना किनारा समुद्राचा

ना क्षितिज आकाशाचे

ना हसू आनंदाचे

ना रडू दुःखाचे

ना तमा कशाची

ना भान जगाचे

स्वतःतचं हरवलेली

खोल खोल समुद्रासारखी

मुक्त आकाशात भरारी घेणारी

अविरत अशी जळणारी

जळून पण मागे

धूर व राख ठेवणारी

आठवणींच्या धुराने पाणी आणणारी

सोबत असते वर्तमानात

जोडून ठेवते भूत- भविष्याला

अस्तित्वातचं मनसोक्त रमणारी

मैत्री… !!

©  सुश्री संगीता कुलकर्णी 

लेखिका /कवयित्री

ठाणे

9870451020

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




मराठी साहित्य – विविधा ☆ देशाची समृद्धी भारतीय रेल्वे – भाग -1 ☆ सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

🌸  विविधा 🌸

☆ देशाची समृद्धी भारतीय रेल्वे – भाग -1 ☆ सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई ☆

(चरैवेति  चरैवेति)

[नागपूर येथून प्रसिद्ध होणा-या ‘राष्ट्रसेविका’ या अंकासाठी  सौ.पुष्पा प्रभू देसाई यांच्या भारतीय रेल्वेवरील लेखाची निवड झाली आहे. तो आपल्या वाचनासाठी चार भागात देत आहोत.]

भा–  र –त – ज्ञान आणि भक्ती मध्ये रमणारा, तो भारत. भारतीयांच्या चौकसबुद्धी मुळे भूमिती शास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, गणित ,रसायन शास्त्र, वैद्यकशास्त्र, संगीत, साहित्य, कला अशा अनेक शास्त्रांनी, भारताला सौंदर्य आणि संपन्न बनविले.  अनेक गोष्टीत भारत समृद्ध होता. आणि आहे .त्यापैकीच आजच्या काळातील समृद्धी म्हणजे भारतीय रेल्वे.

भारतीय रेल्वेचे जाळे म्हणजे देशातील रक्ताभिसरण संस्था.’ लाईफ लाईन ‘असे म्हणायला हरकत नाही .त्याचा श्रीगणेशा झाला तो इंग्रजांच्या कारकीर्दीत. ती एक इंग्रजांनी दिलेली  देणगी आहे असे म्हणायला हरकत नाही. पहिला आराखडा तयार झाला, तो     १८32 मध्ये. पुढे’,’ रेड हिल’ नावाची पहिली रेल्वे  १८ 37 साली धावली . १८४४  मध्ये लॉर्ड हार्डिंग यांनी खाजगी व्यावसायिक मंडळींना रेल्वे चालू करण्याची परवानगी दिली . दोन रेल्वे कंपन्यांना  इस्ट इंडिया मदत करायला लागली.१८५१मधे सोलनी अँक्वाडक्ट रेल्वे ,रुरकी येथे बांधण्यात आली.१८५६मधे मद्रास रेल्वे कंपनीची स्थापना झाली आणि दक्षिण भारतात रेल्वेचा विकास सुरू झाला .१८५७ मधे पहिली प्रवासी गाडी बोरीबंदर ते ठाणे (३४कि. मि.) अशी धावली. त्याची चर्चा ब्रिटनच्या वर्तमानपत्रातही आली. साहिब, सिंध ,आणि सुलतान अशी त्या वाफेच्या इंजिनांची छान नावे ठेवून बारसे झाले. आता रेल्वेच्या बाळाने बाळसे धरायला सुरुवात केली. पुढे हावडा ते हुगळी (२४कि.मी.) नंतर १८६४ मधे  कलकत्ता ते अलाहाबाद–दिल्ली असा लोहमार्ग पूर्ण करून १८७०मधे गाडी त्यावरून धावायला सुरुवात झाली .१८७५ मधे ९१०० कि.मि.चे अंतर स्वातंत्र्यापर्यंत४९३२३ कि.मि. पर्यंत पोचले.१८८५ मधे भारतीय बनावटीचे  इंजीन  बनविण्यास सुरुवात झाली. आणि बाळस  धरलेलं बाळ आता चालायला लागलं. १९४७ पर्यंत भारतात ४२ रेल्वे कंपन्या होत्या. स्वातंत्र्यानंतर १९५१मधे त्या सर्व संस्थांचे राष्ट्रीयीकरण करून, ताठ मानेने भारतीय रेल्वे मानाने मिरवू लागली. स्वातंत्र्यानंतरही तिच्या विस्ताराचा वेग फारसा वाढला नाही. तरी विकास कमी झाला नाही. भारतीय रेल्वे देशाच्या प्रगतीशी जोडली गेली आहे.

पूर्वीच्या वेगवेगळ्या भागांचे एकत्रीकरण करून, त्याचे सहा भाग पाडले गेले .तरीही इतक्या मोठ्या  पसार्याचे  व्यवस्थापन करणे कठीण, म्हणून त्याचे आणखी सोळा-सतरा भाग पाडले गेले.

1) उत्तर रेल्वे–मुख्य ठिकाण दिल्ली.२)उत्तर पूर्व –गोरखपूर. ३)उत्तर पूर्व सीमा -गोहाटी. ४) पूर्व रेल्वे- कलकत्ता. ५)दक्षिण पूर्व-कलकत्ता.६) दक्षिण मध्य-सिकंदराबाद.७) दक्षिण रेल्वे–चेन्नई.८) मध्य रेल्वे–पुणे.९)  दक्षिण पश्चिम–हुबळी.१०)उत्तर पश्चिम–जोधपूर.११) पश्चिम मध्य–जबलपूर.१२) उत्तर मध्य–अलाहाबाद.१३) दक्षिण पूर्व मध्य–बिलासपूर.१४) पूर्व तटीय–भुवनेश्वर.१५)  पूर्व मध्य–हाजिपूर.१६) कोकण रेल्वे–बेलापूर. कोकण रेल्वे भारतीय रेल्वे बोर्डाच्या नियंत्रणाखाली वेगळी संस्था आहे. सोयीसाठी प्रत्येक रेल्वे विभागाने पुन्हा ६४ भाग पाडले आहेत. उपनगरीय प्रवासी वाहतुकीसाठी स्वतंत्र रेल्वे प्रणाली वापरली जाते. मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई, हैदराबाद ,पुणे येथे ती कार्यरत आहे. मुंबई, कलकत्त्याच्या उपनगरीय वाहतूकीच्या गाड्या स्वतंत्र उड्डाण पुलासारख्या मार्गावरून धावतात. मुंबई हे ठिकाण पश्चिम मध्य आणि हार्बर वर येत असल्याने मुंबईकर उपनगरीय सेवेवर अवलंबून असतात. तिच्यावर त्यांचा खूप जीव आहे. त्यामुळे ही सेवा मुंबईची नस मानली जाते.

क्रमशः….

©  सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

बुधगावकर मळा रस्ता, मिरज.

मो. ९४०३५७०९८७

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈




मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ घेणेकरी… भाग १ ☆ सौ राधिका भांडारकर

सौ राधिका भांडारकर

💜 जीवनरंग ❤️

☆ घेणेकरी… भाग १ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

ज्या कारणासाठी मी दयाळकडे जाण्याचे ठरवले तेव्हां अशा प्रकारच्या कामासाठी मला त्याच्याकडे जावं लागेल असं वाटलंही नव्हतं ..!!

पपांनी तर प्रथम विरोधच केला.त्यांचं म्हणणं,

“हा मार्ग आपला नव्हे. कायद्याने जे करायचं ते आपण करु.कायदा हातात घेणं हे आपल्यासारख्यांचे काम नाही. तो आपला पिंडच नव्हे. विलंब लागेल पण सत्य उघडकीस येईल. सत्याचा विजय कधी ना कधी होतोच.”

“कधी ना कधी म्हणजे कधी? संपूर्ण आयुष्य गेल्यावर? आणि हे बघा, दयाळ माझा बालमित्र आहे.गेल्या काही वर्षात खूप काही बदललं असलं तरी तो मैत्री विसरणार नाही. शिवाय तसा एकेकाळी तो आपल्या कुटुंबाशी ही जवळचा होता…!”

“कर तुला काय करायचे ते..”

पपा एकच वाक्य म्हणाले आणि माझ्यासमोरुन उठून गेले मला माहीत होतं ,हा मार्ग खोटे पणाचा धोक्याचाही आहे.

पण ज्या गोपाळकाकांना धडा शिकवण्यासाठी मी दयाळकडे जाणार होते त्यांनी तर आपल्याशी खोटेपणाच केला नं..?धोका दिला..धोक्याला धोक्यानेच ऊत्तर. हेच बरोबर.चांगुलपणा शिष्टाचार नीतीमत्ता यांच्या व्याख्या बदलल्यात.आपल्याला जर दुनियेत टिकायचं असेल तर आपणही आपले मार्ग बदलले पाहिजेत.

त्यामुळे पपांच्या विरोधाला न जुमानता मी दयाळची भेट घ्यायचं ठरवलं.

जी. के. म्हणजेच गोपाळकाका पपा त्यांना म्हणायचे, “अरे जी.के. म्हटलं की कसं रुबाबदार वाटतं. तू एव्हढा बिझनेसमन, पैसेवाला. हाय स्टेटसवाला, अनेक संस्थांचा अध्यक्ष… आणि गोपाळ काय? छे! हे नाव नाही शोभत तुला..

जीकेंचा आमच्या घरात कुटुंबीयासारखाच वावर असायचा.पपांना तर हरघडी त्यांची गरज वाटायची.

अगदी घरातल्या शुभकार्यापासून ते आजारपणं, इतर अडीअडचणी, समस्या, प्रवासाला निघायचं असेल तर त्याची तयारी करण्यापासून सर्व कामात पपांना जीके हवे असायचे, आणि तेही हजर  असायचे तत्परतेने..

अर्थात हे एकतर्फी नव्हतं. पपांचेही तितकेच त्यांच्यासाठी सहकार्य असायचे. दोघांच्यात सामंजस्य,विश्वास प्रेम मैत्री होती…!!

पण जीकेंचा आमच्या घरातला वावर ,त्यांची दोस्ती जीजीला मात्र खटकायची.जीके आले की तिची आतल्या खोलीत धुसफुस सुरु व्हायची. पण जीके मात्र जीजीला विचारायचे, “काय आज्जी कशा आहात..? बरं आहे ना सगळं.?”

जीजी मात्र म्हणायची,हो.बराय् ..बरं नसायला काय झालय?..”

पण ती पपांना नेहमी म्हणायची,

“या माणसापासुन सावध रहा बरं.. मला काही तो दिसतो तसा वाटत नाही..”

जीजीचं खास नेटवर्क होतं.ती घरातच असायची पण तिच्या फ्रेंडसर्कलमधे फळवाले भाजीवाले ,रानभाज्या घेउन येणारे कातकरी आदीवासी असत.ते घरोघरी जात.

त्यांच्याकडुन जीजीला आतल्या गोटातल्या बातम्या मिळत.जीकेंबद्दल बरेच वेडेवाकडे तिला कळले होते..

म्हणून ती पपांना वेळोवेळी सावध करायची. पण परिणामी सगळं शून्य ठरलं… पपांची पाचपाखाडीची प्राॅपर्टी डेवलप करण्याची कल्पना जीकेंचीच.

“एखादी सोसायटी बनवू. नाहीतर शाॅपींग काॅम्प्लेक्स.. खाजगी कार्यालय.. अरे तुझी ही जागा सोन्याचा तुकडा आहे…”

पपा म्हणायचे ,”मला आता काही व्याप वाढवायचा नाही बाबा..मला वेळही नाही ..माझ्या व्यवसायाचं काम वाढलय्..शिवाय आता नवीन काही झेपेल असं वाटत नाही…”

“अरे! ती काळजी सोड. मी आहे ना! माझ्याकडे माणसं आहेत. तयार टीम आहेत आणि सुटसुटीत योजना आहेत..”

नंतर जीके म्हणाले, “हे बघ शासकीय धोरणांचा काही भरोसा नाही.रस्तारुंदीकरणाचा प्रस्ताव आला तर नगरपालिकेचच आक्रमण व्हायचं.बांधकाम असलेली जागा तशी सुरक्षित असते!”

क्रमश:….

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈