हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ एक सच ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

( डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक बेहद आत्मीय कहानी एक सच।  यह एक कटु सत्य है कि सेल्फ पब्लिशिंग  एक व्यापार बन गया है। यदि अपवाद स्वरुप कुछ प्रकाशकों को छोड़ दें तो अक्सर लेखक  स्वयं को लेखक-प्रकाशक-पुस्तक विक्रेता चक्रव्यूह  में स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस करता है। संवेदनशीलता से लिखा हुआ साहित्य बिना पैसे खर्च किये जमीनी स्तर तक पहुँचाना  इतना आसान नहीं रहा। आज लेखक अपनी पुस्तक अपनी  परिश्रम से कमाई हुई पूँजी लगाकर प्रकाशित तो कर लेता है किन्तु ,वह उन्हें बेच नहीं पाता। इस बेबाक कहानी के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कथा-कहानी –  एक सच ☆ 

आज से दस साल पहले मोनिका अपने घर की बाल्कनी में बैठकर कुछ सोच रही थी । मंद-मंद हवा बह रही  थी । रोज़ वह हवा बहुत अच्छी लग रही थी । आज उस हवा में कुछ सूनापन नज़र आ रहा था । मोनिका को कुछ अजीब लग रहा था । आसमान में घने बादल भी छाये थे । लग रहा था कि अभी ज़ोरो की बारिश होगी । जैसे ही सोच रही थी कि बारिस भी शुरु हो गई । उस दिन घर में कोई भी नहीं था । उसके पति और बेटा दोनों काम पर गए थे । उसने सोचा कि क्यों न पकौडे खाये जाय ? यह सोचकर वह रसोईघर में गई ही थी कि दरवाज़े पर घंटी बजती है । उसे अजीब लगता है कि इतनी बारिश में कौन आया होगा ? सोचकर दरवाज़ा खोलती है । देखती है रेवती आधी भीगी हुई छाता लेकर खडी है । तुरंत उसने उसके लिए तौलिया दिया और कहा अरी! रेवती तुम इस वक्त यहाँ? बहुत ही बारिश हो रही है  । फोन पर ही हम बात कर लेते।

अच्छा तो तुम्हें मेरा इस वक्त आना पसंद नहीं आया । कहते हुए तौलिये से अपने बालों को सुखाती है ।

अरी! तुम भी ना!  हमेशा मुझे गलत समझती हो । मैंने तो इसलिए कहा था कि इतने ज़ोर की बारिश में ऐसे भीगकर आने से अच्छा होता कि हम फोन पर बातें कर लेतें । मैं वैसे भी अकेली हूँ । कुछ काम नहीं था, सोचा पकौडे बनाकर खाती हूँ । पता नहीं, आज मुझे अच्छा नहीं लग रहा है । वैसे तो अच्छा हुआ कि तुम भी आ गई, पकौडे खाने के लिए साथ मिल जाएगा । कहते हुए मोनिका रसोईघर की ओर जाती है ।

पीछे-पीछे रेवती भी जाती है और कहती है, तुमने मेरी कहानी पढी । जो मैंने तुम्हें दो दिन पहले भेजी थी ।

कौन -सी ? अरे! हाँ, वक्त ही नहीं मिलता । घर के काम से फुर्सत कहाँ रहती है । हम तो ठहरे घर में काम करनेवाले । कहते हुए वह मोनिका को प्लेट में पकौडे देती है ।

मुझसे वक्त की बात मत करो । बस आप लोगों ने अपना एक दायरा बना लिया है ।  हमेशा कहते रहना कि वक्त नहीं मिलता है । वक्त का अर्थ भी आप लोग जानते हो । हाँ, मेमसाब वक्त मिलता नहीं है, निकालना पडता है । अगर कुछ करना हो जिंदगी में तो वक्त निकालकर काम करना पडता है । मैंने कभी कोई भी काम रोते-रोते नहीं किया है । सुबह से लेकर रात तक हँसते हुए सारे काम करती हूँ । पता नहीं क्यों, आप लोग ऐसे सोचते हो कि आप सबसे अधिक काम कर रहे हो । आप ही हो जो घर को बनाती हो । अरे! हम बाहर और घर दोनों जगह काम करते है । फिर भी किसी से कोई शिकायत नहीं करते । आपको क्या लगता है कि हम घर पर काम नहीं करते । हम भी आप की ही तरह सारा काम करते है । सोचते है अब तक जो ज्ञान हासिल किया है वह दूसरों को दे तो अच्छा रहेगा । वैसे तो पकौडे तो अच्छे बने है । कहते हुए पकौडे की प्लेट को  सिंक में रखती है ।

तुम सही कह रही हो । शायद हम लोग ही आलसी बन गये है । करनेवाला कोई हो तो लगता है क्यों न हम भी आराम से काम करें । बाहर जाने का मात्र मर्द का काम है । यही सोचकर हम भी अपने आप को समझा लेते है । इसका मतलब यह नहीं कि हम बाहर जाकर काम करना नहीं जानते । हम भी स्वतंत्र रहना चाहते थे । हमारे पति राजेश ने मना कर दिया । शादी के बाद सारे परिवार को देखना ही तुम्हारा काम है, ऐसे अधिकार से कहा कि सब कुछ पीछे छुट गया । खैर, अब तो जिंदगी भी खत्म हो गई है । कहने का मतलब है कि आज तो सब अनुभव मांगते है, जो हमारे पास नहीं है । अच्छा तुम बताओ । तुम कुछ परेशान लग रही हो । क्षमा करना, मैंने भी तुम्हें कुछ कहकर परेशान कर दिया है । इतनी बारिश में तुम मुझसे बात करने के लिए आई हो । कहते हुए मोनिका अदरकवाली चाय अपनी दोस्त रेवती को देती है।

नहीं तो, क्षमा तो मुझे मांगनी चाहिए । मैंने तुम्हें नाहक ही ऐसे सवाल करके परेशान कर दिया । तुम तो जानती हो कि मैं कहानियाँ लिखती हूँ । मैं कविता भी लिखती हूँ । मेरा मन आजकल कुछ भी लिखने को नहीं कर रहा है । मुझे लगता है कि हर कोई सिर्फ व्यापार करने बैठा है । पता है जब हम समाज को कुछ लिखकर उससे चेतना जागृत करने की कोशिश करते है, तो प्रकाशक साथ नहीं देते है । यह सच है कि वे व्यापार कर रहे है । फिर भी उनको भी समझना चाहिए कि हर साहित्यकार के पास इतने पैसे नहीं होते । माना कि उनको प्रिंटिग के लिए रुपये चाहिए  । उसमें भी एथिक्स नाम की कोई भी चीज नहीं रही है । कहते हुए रेवती चाय का प्याला भी रखकर बाल्कनी में बैठ जाती है ।

तुम भी ना ऐसे ही परेशान हो रही हो । अब बता कि तुम्हारे मुँह बोले भाई भी तो प्रकाशक है । तुम अपना काम उनसे क्यों नहीं करवाती हो? उनके बच्चे कैसे है? वे तो तुम्हें बहुत पसंद करते है। जब बारिश होती है, तो मिट्टी की खुश्बू बहुत अच्छी लगती है । कहते हुए मोनिका बाहर आकर रेवती के साथ बाल्कनी में बैठती है ।

सब ठीक ही होंगे । मैंने भी उनसे बात किए बहुत दिन हो गए । पता नहीं आजकल उनसे भी बात करना अच्छा नहीं लग रहा है । वह भी तो व्यापार ही कर रहे है । उन्होंने बच्चों को भी बहुत सीखा दिया है । अरे! व्यापार ही करना था । मुझसे कह देते । उन्होंने ऐसा नहीं किया । मैं हर बार कहती रही कि भाई कुछ पैसे चाहिए, कुछ परेशानी है । उन्होंने उस वक्त कुछ नहीं कहा । फिर अचानक एक दिन फोन करके कहा कि आप पांच हज़ार रुपये भेज दिए । मेरे लिए भी रुपये जुटाने आसान नहीं थे । कहते हुए रेवती ने अपने आंसू पौंछे ।

तुरंत मोनिका पानी देती है । इस बारे में तुम ज्यादा मत सोचो । तुम्हारी सेहत  पर असर पडेगा । कहते हुए मोनिका उसे शांत करती है ।

फिर भी उसने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा,  मैंने सोचा कि शायद उनको बहुत ज़रुरत होगी । रुपये भेजने के बाद भी काम नहीं हुआ । मैं भी इंतज़ार करती रही । उनको यह लगा कि मैं जल्दी कर रही हूँ । मेरी कोई और भी परेशानी थी । वह सब मैं उनको नहीं बता सकती थी । वहां से यह सुनने को मिला कि आप मुझे बहुत परेशान कर रही हो । यह तो गलत ही है ।  मुझे उनका यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा । मुझे उनको किताब छपवाने के लिए देना ही नहीं था ।

अच्छा, तो तुम किसी और प्रकाशक के पास अपनी किताब छपवा सकती हो । तुम्हारी कहानी तो बहुत अच्छी होती है, माना कि हमने दो कहानी नहीं पढी है । तुम्हारी पहली किताब की हर कहानी को मैंने पढा है । तुम सच बताने से डरती नहीं हो । जो है उसे वैसे ही प्रस्तुत करती हो । तुम्हारी वही सच बातें मुझे अच्छी  लगती है । विषय का  जानकार हर कोई रहता है । बेबाकी से उसे प्रस्तुत तुम करती हो । सच,  तुम्हारी कोई ऐसे ही तारीफ़ नहीं कर रही हूँ। अच्छा लगता है, तुम्हारी कहानी पढकर कि तुम सच बताती हो । कहते हुए रेवती के हाथ पर अपना हाथ रखती है ।

अरे! दूसरे प्रकाशक तो और भी ज्यादा मांग करते है । कई प्रकाशक तो सिर्फ जाने-माने लेखकों की ही किताब छापते है । हम जैसे उभरते नये लेखकों की किताब नहीं छापते है । मुझे सच में बहुत बुरा लगता है । एक प्रकाशक ने तो चालीस हज़ार की मांग की, दूसरे ने दस हज़ार एक पुस्तक छापने के लिए मांगा था । मुझे लगा, यह लोग कर क्या रहे है?  मेरे पास तो रुपये नहीं थे तो कहने लगे कि घर में किसी से भी लेकर दे दीजिए ।

अरे! यह भी कोई बात हुई । यह तो गलत ही है । ऐसे कोई मांगता है क्या ? सही में मुझे भी बुरा लग रहा है । कहते हुए मोनिका ने अपने बेटे रोहित को फोन किया । बेटा आप कब आ रहे हो ? जल्दी लौट आना, देर मत करना । हाँ, अब बताओ । क्या हुआ ? सॉरी, मुझे रोहित की चिंता हो गई, इसलिए कोल किया ।

कोई बात नहीं है । अरे! मैंने कहा उनसे कि, आप मुझे मत बताइए कि मुझे रुपये किससे मांगने है  । घर चलाने के लिए भी रुपये चाहिए, ऐसे कैसे उनसे मांग लू । सच में प्रकाशक का ये काम कुछ ज्यादा ही हो रहा है । ऊपर से वे लोग मार्केटिंग भी नहीं करते है । पता है, अपनी चीज हो तो खुलकर सबको बताते है । अब बात तो हमारी किताब की थी, क्यों करते मार्केटिंग ? छी, सच में किससे रिश्ता निभाए ? आज तो बाज़ार में रिश्ते भी बिक रहे    है । रिश्तों का भी व्यापार हो चुका है । अब तो लिखने का भी मन नहीं करता । हम तो बस समाज में जो सच्चाई है उसे लोगों के सामने लाने का साहस कर रहे है । कोई हमारा साथ नहीं देता । कहते हुए उसकी आवाज़ रुँध जाती है ।

तुमने सही कहा रेवती । यह भूमंडलीकरण है, यहां पर कोई अपना नहीं है । अगर तुम उनके दृष्टिकोण से देखोगी तो वह भी गलत नहीं है । मैं किसी का भी पक्ष नहीं ले रही हूं । बस, तुम्हारी बातों को सुनकर बता रही हूँ । अन्यथा, नहीं लेना । प्रकाशक के लिए भी जिंदगी जीने के लिए पैसों की ज़रुरत होती है । शायद इसी वजह से वे पैसा मांगते है । उनके पास भी कितना पैसा बचता होगा । अपना व्यापार बढाने के लिए कई प्रकाशक ज्यादा मांगते  है । हां, मानती हूँ  कि उनको भी कई बाते सोचनी  चाहिए । तुम भी उनकी कोई सगी बहिन तो हो नहीं । व्यापार में अगर वह सबको बहन बनाकर ऐसे ही रुपये कम लेते रहे तो हो चुकी उनकी जिंदगी । तुम बुरा मत मानना । आज तुम्हारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए ऐसा सोच रही हो । वक्त आते ही सब ठीक हो जाएगा । चिंता मत करना । थोडा पानी पी लो । कहते हुए मोनिका फिर से रेवती को पानी देती है ।

कुछ ठीक नहीं होगा । सब ऐसा ही चलता रहा है, चलेगा भी । सब ऐसे ही लोगों को लूटेंगे । कहते हुए रेवती लंबी सांस लेती है । मुझे लिखना ही नहीं चाहिए । कहते हुए खुद उठकर पानी का बोतल रसोईघर में रखकर आती    है ।

अरे! ऐसे कैसे चलेगा ? तुम्हारी जैसी लेखिका कैसे निराश हो सकती है । तुम पहले एक काम करना कि अपनी कहानियों को ऑनलाइन मेगेज़ीन के लिए देना । लोग तुम्हारी लेखनी को पहचानेंगे । फिर प्रकाशक भी जानेगा । कोई तो अच्छा इन्सान होगा, जो सिर्फ तुम्हारी लिखावट को ही ध्यान देगा । कहते हुए मोनिका घर में बिखरे कपड़े ठीक करने लगती है । तभी दरवाज़े पर घंटी बजती है । रेवती की गहरी सोच टूटती है । मोनिका देखती है कि उसका बेटा रोहित काम से लौट आया है । मोनिका ने रोहित को हाथ-मुँह धोकर आने के लिए कहा ।

फिर रेवती भी घडी की ओर देखकर कहती है, अरे ! यह रात के नौ बज गये है ।  बारिश भी रुक गई है । तुम भी रोहित को खाना दे दो । यह तो चलता ही रहेगा । कभी भी प्रकाशक और साहित्यकार के बीच का यह माजरा खत्म नहीं होगा । कहते हुए रेवती वहाँ से जाने के लिए उठती है । जाते हुए मोनिका से कहती है,  तुमने जैसी सलाह दी है, मैं और भी कहानी लिखूंगी । जितना हो सके, समाज को सच से अवगत कराना चाहूँगी।

 

© डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

२७२, रत्नगिरि रेसिडेन्सी, जी.एफ़.-१, इसरो लेआउट, बेंगलूरु-७८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 42 ☆ कितना बदल गया इंसान ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनकी  दो जमानों को जोड़ती और विश्लेषित करती एक  लघुकथा   “कितना बदल गया इंसान” । आप प्रत्येक सोमवार उनके  साहित्य की विभिन्न विधाओं की  रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे ।) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 42

☆ लघुकथा – कितना बदल गया इंसान ☆ 

गांव का खपरैल स्कूल है ,सभी बच्चे टाटपट्टी बिछा कर पढ़ने बैठते हैं।  फर्श गोबर से बच्चे लीप लेते हैं,  फिर सूख जाने पर टाट पट्टी बिछा के पढ़ने बैठ जाते हैं।  मास्टर जी छड़ी रखते हैं और टूटी कुर्सी में बैठ कर खैनी से तम्बाकू में चूना रगड़ रगड़ के नाक मे ऊंगली डालके छींक मारते हैं, फिर फटे झोले से सलेट निकाल लेते हैं। बड़े पंडित जी जैसई पंहुचे सब बच्चे खड़े होकर पंडित जी को प्रणाम करते हैं।  हम सब ये सब कुछ दूर से खड़े खड़े देख रहे हैं। पिता जी हाथ पकड़ के बड़े पंडित जी के सामने ले जाते हैं ,पहली कक्षा में नाम लिखाने पिताजी हमें लाए हैं अम्मा ने आते समय कहा उमर पांच साल बताना ,  सो हमने कह दिया  पांच साल………….बड़े पंडित जी कड़क स्वाभाव के हैं पिता जी उनको दुर्गा पंडित जी कहते हैं । दुर्गा पंडित जी ने बोला पांच साल में तो नाम नहीं लिखेंगे।  फिर उन्होंने सिर के उपर से हाथ डालकर उल्टा कान पकड़ने को कहा  कान पकड़ में नहीं आया।  तो कहने लगे हमारा उसूल है कि हम सात साल में ही नाम लिखते हैं।  सो दो साल बढ़ा के नाम लिख दिया गया।  पहले दिन स्कूल देर से पहुंचे तो घुटने टिका दिया गया।  सलेट नहीं लाए तो गुड्डी तनवा दी, गुड्डी तने देर हुई तो नाक टपकी, मास्टर जी ने खैनी निकाल कर चैतन्य चूर्ण दबाई फिर छड़ी की ओर और हमारी ओर देखा बस यहीं से जीवन अच्छे रास्ते पर चल पड़ा।  अपने आप चली आयी नियमितता, अनुशासन की लहर, पढ़ने का जुनून, कुछ बन जाने की ललक। पहले दिन गांधी को पढ़ा। कई दिन बाद परसाई जी का “टार्च बेचने वाला” पढ़ा,  फिर पढ़ते रहे और पढ़ते ही गए ………

गांव के उसी स्कूल की खबरें अखबारों में अक्सर पढने मिलती हैं कि

“मास्टर जी ने बच्चे का कान पकड़ लिया तो हंगामा हो गया ….. स्कूल का बालक मेडम को लेकर भाग गया………. स्कूल के दो बच्चों के बीच झगड़े में छुरा चला”

आज के अखबार में उसी स्कूल की ताजी खबर ये है कि स्कूल के मास्टर ने कोरोना वायरस के कारण बंद स्कूल के क्लासरूम में ग्यारहवीं में पढ़ने वाली छात्रा की इज्जत लूटी और लाॅक डाऊन का उल्लंघन किया…….

अखबार को दोष दें या ऐन वक्त पर कोरोना को दोष दें या अपने आप को दोष दें कि ऐसे समाचार रुचि लेकर हर व्यक्ति क्यों पढ़ता है।

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 43 – वाचन संस्कृती ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

 

(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आज  प्रस्तुत है  आपकी एक अत्यंत शिक्षाप्रद एवं प्रेरक कविता ” वाचन संस्कृती”।  आज वास्तविकता यह है  कि वाचन संस्कृति रही ही नहीं । न पहले जैसे पुस्तकालय रहे  न पुस्तकें और न ही पढ़ने वाले।  आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। )

☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 43 ☆

☆ वाचन संस्कृती ☆

 

वाचन संस्कृती । बाणा नित्य नेमे । आचरावी प्रेमे । जीवनात ।1।

 

संपन्न जीवना । ज्ञान एक धन । सुसंस्कृत मन । वाचनाने ।2।

 

शब्दांचे भांडार । समृद्धी अपार । चढतसे धार । बुद्धीलागी ।3।

 

मधुमक्षी परी । वेचा ज्ञान बिंदू । जीवनाचा सिंधू । होई पार ।4।

 

अज्ञान अंधारी । लावा ज्ञान ज्योती । वाचन संस्कृती । तरणोपाय ।5।

 

ज्ञानाची संपत्ती । लूटू वारेमाप । चातुर्य अमाप । गवसेल ।6।

 

वाचा आणि वाचा । ध्यानी ठेवा मंत्र । व्यासंगाचे तंत्र । फलदायी ।7।

 

जपा जिवापाड । वाचन संस्कृती । नुरेल विकृती । जीवनात ।8।

 

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Talk on Happiness – III : Creating your Happiness: Positive Psychology Exercises that work: What-went-well Exercise – Video # 3 ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  Talk on Happiness – III ☆ 

Positive Psychologists have chosen evidence-based happiness-increasing strategies whose practice is supported by scientific research. One such activity is described here.

Video Link >>>>

Talk on Happiness: VIDEO #3

Happiness consists in activity. It is a running stream, not a stagnant pool.
Action may not always bring happiness but there is no happiness without action.
Positive Psychologists have chosen only evidence-based happiness-increasing strategies whose practice is supported by scientific research.

HAPPINESS ACTIVITY: WHAT WENT WELL
“Every night, for the next week, set aside 10 minutes before you go to sleep.

WRITE DOWN 3 THINGS THAT WENT WELL AND WHY THEY WENT WELL.
You may use a journal or your computer to write about the events, but it is important that you have a physical record of what you wrote.”
Martin Seligman/ FLOURISH

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email [email protected] if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (40) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना)

 

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ।। 40 ।।

 

आगे , पीछे , सब तरफ से प्रभु तुम्हें प्रणाम

परम पराक्रम आपका , आप ही पूरन काम ।। 40 ।।

 

भावार्थ :  हे अनन्त सामर्थ्यवाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं।। 40 ।।

 

Salutations to Thee from front and from behind! Salutations to Thee on every side! O All! Thou infinite in power and prowess, pervadest all; wherefore Thou art all.।। 40 ।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #45 ☆ दान : दर्शन और प्रदर्शन (कोरोनावायरस और हम – 7) ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 45 – दान : दर्शन और प्रदर्शन  ☆

(कोरोनावायरस और हम, भाग-7)

कोरोना वायरस से उपजे कोविड-19 से भारत प्रशासनिक स्तर पर अभूतपूर्व रूप से जूझ रहा है। प्रशासन के साथ-साथ आम आदमी भी अपने स्तर पर अपना योगदान देने का प्रयास कर रहा है। योगदान शब्द के अंतिम दो वर्णो पर विचार करें। ‘दान’अर्थात देने का भाव।

भारतीय संस्कृति में दान का संस्कार आरंभ से रहा है। महर्षि दधीचि, राजा शिवि जैसे दान देने की अनन्य परंपरा के असंख्य वाहक हुए हैं।

हिंदू शास्त्रों ने दान के तीन प्रकार बताये हैं, सात्विक, राजसी और तामसी। इन्हें क्रमशः श्रेष्ठ, मध्यम और अधम भी कहा जाता है। केवल दिखावे या प्रदर्शन मात्र के लिए किया गया दान तामसी होता है। विनिमय की इच्छा से अर्थात बदले में कुछ प्राप्त करने की तृष्णा से किया गया दान राजसी कहलाता है। नि:स्वार्थ भाव से किया गया दान सात्विक होता है। सात्विक में आदान-प्रदान नहीं होता, किसी भी वस्तु या भाव के बदले में कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं होती।

हमारे पूर्वज कहते थे कि दान देना हो तो इतना गुप्त रखो कि एक हाथ का दिया, दूसरे हाथ को भी मालूम ना चले। आज स्थितियाँ इससे ठीक विपरीत हैं। हम करते हैं तिल भर, दिखाना चाहते हैं ताड़ जैसा।

सनातन दर्शन ने कहा, ‘अहम् ब्रह्मास्मि’, अर्थात स्वयं में अंतर्निहित ब्रह्म को देखो ताकि सूक्ष्म में विराजमान विराट के समक्ष स्थूल की नगण्यता का भान रहे। स्थूल ने स्वार्थ और अहंकार को साथ लिया और ‘मैं’ या ‘सेल्फ’ को सर्वोच्च घोषित करने की कुचेष्टा करने लगा। ‘सेल्फ’ तक सीमित रहने का स्वार्थ ‘सेल्फी कल्चर’ तक पहुँचा और मनुष्य पूरी तरह ‘सेल्फिश’ होता गया।

लॉकडाउन के समय में प्राय: पढ़ने, सुनने और देखने में आ रहा है कि किसी असहाय को भोजन का पैकेट देते समय भी सेल्फी लेने के अहंकार, प्रदर्शन और पाखंड से व्यक्ति मुक्त  नहीं हो पाता। दानवीरों (!) की ऐसी तस्वीरों से सोशल मीडिया पटा पड़ा है। इसी परिप्रेक्ष्य में एक कथन पढ़ने को मिला,..”अपनी गरीबी के चलते मैं तो आपसे खाने का पैकेट लेने को विवश हूँ  लेकिन आप किस कारण मेरे साथ फोटो खिंचवाने को विवश हैं?”

प्रदर्शन की इस मारक विवशता की तुलना रहीम के दर्शन की अनुकरणीय विवशता से कीजिए। अब्दुलरहीम,अकबर के नवरत्नों में से एक थे। वे परम दानी थे। कहा जाता है कि दान देते समय वे अपनी आँखें सदैव नीची रखते थे। इस कारण अनेक लोग दो या तीन या उससे अधिक बार भी दान ले जाते थे। किसी ने रहीम जी के संज्ञान में इस बात को रखा और आँखें नीचे रखने का कारण भी पूछा। रहीम जी ने उत्तर दिया, “देनहार कोउ और है , भेजत सो दिन रैन।लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥”

विनय से झुके नैनों की जगह अब प्रदर्शन और अहंकार से उठी आँखों ने ले ली है। ये आँखें  वितृष्णा उत्पन्न करती हैं। इनकी दृष्टि दान का वास्तविक अर्थ समझने की क्षमता ही नहीं रखतीं।

दान का अर्थ केवल वित्त का दान नहीं होता। जिसके पास जो हो, वह दे सकता है। दान ज्ञान का, दान सेवा का, दान संपदा का, दान रोटी का, दान धन का, दान परामर्श का, दान मार्गदर्शन का।

दान, मनुष्य जाति का दर्शन है, प्रदर्शन नहीं। मनुष्य को लौटना होगा दान के मूल भाव और सहयोग के स्वभाव पर। वापसी की इस यात्रा में उसे प्रकृति को अपना गुरु बनाना चाहिए।

प्रकृति अपना सब कुछ लुटा रही है, नि:स्वार्थ दान कर रही है। मनुष्य देह प्रकृति के पंचतत्वों से बनी है। यदि प्रकृति ने इन पंचतत्वों का दान नहीं किया होता तो तुम प्रकृति का घटक कैसे बनते?

और वैसे भी है क्या तुम्हारे पास देने जैसा? जो उससे मिला, उसको अर्पित। था भी उसका, है भी उसका। तुम दानदाता कैसे हुए? सत्य तो यह है कि तुम दान के निमित्त हो।

नीति कहती है, जब आपदा हो तो अपना सर्वस्व अर्पित करो। कलयुग में सर्वस्व नहीं, यथाशक्ति तो अर्पित करो। देने के अपने कर्तव्य की पूर्ति करो। कर्तव्य की पूर्ति करना ही धर्म है।

स्मरण रहे, संसार में तुम्हारा जन्म धर्मार्थ हुआ है।… और यह भी स्मरण रहे कि ‘धर्मो रक्षति रक्षित:।’

*’पीएम केअर्स’ में यथाशक्ति दान करें। कोविड-19 से संघर्ष में सहायक बनें।*

 

©  संजय भारद्वाज

रात्रि 11.09 बजे, 11.4.2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 45 ☆ लघुकथा – आचार्य का हृदय-परिवर्तन ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है लघुकथा  ‘आचार्य का हृदय-परिवर्तन ’। डॉ परिहार जी ने प्रत्येक चरित्र को इतनी खूबसूरती से शब्दांकित किया है कि हमें लगने लगता  है जैसे हम भी पूरे कथानक में  कहीं न कहीं मूक दर्शक बने खड़े हैं। ऐसी अतिसुन्दर लघुकथा के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 45 ☆

☆ लघुकथा – आचार्य का हृदय-परिवर्तन ☆

 

हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान, भाषा-शास्त्र में डी.लिट.,आचार्य रसेन्द्र झा मेरे शहर में एक शोध-छात्र का ‘वायवा’ लेने पधारे थे। पता चला कि वे मेरे गुरू डा. प्रसाद के घर रुके थे जो उस छात्र के ‘गाइड’ थे। उनकी विद्वत्ता की चर्चा से अभिभूत मैं उनके दर्शनार्थ सबेरे सबेरे डा. प्रसाद के घर पहुँचा। देखा तो आचार्य जी गुरूजी के साथ बैठक में नाश्ता कर रहे थे।

मैं आचार्य जी और गुरूजी को प्रणाम करके बैठ गया। गुरूजी ने आचार्य जी को मेरा परिचय दिया।कहा, ‘यह मेरा शिष्य है। बहुत कुशाग्र है। इसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है।’

आचार्य जी ने उदासीनता से सिर हिलाया, कहा, ‘अच्छा, अच्छा।’

मैंने कहा, ‘आचार्य जी, आपकी विद्वत्ता की चर्चा बहुत सुनी थी। आपके दर्शनों की बड़ी इच्छा थी, इसी लिए चला आया।’

आचार्य जी ने जमुहाई ली,फिर कहा, ‘ठीक है।’

इसके बाद वे डा. प्रसाद की तरफ मुड़कर अपने दिन के कार्यक्रम की चर्चा करने लगे। मेरी उपस्थिति की तरफ से वे जैसे बिलकुल उदासीन हो गये। मुझे बैठे बैठे संकोच का अनुभव होने लगा।

बात चलते चलते उनके यूनिवर्सिटी के टी.ए.बिल पर आ गयी।

डा. प्रसाद ने मेरी तरफ उँगली उठा दी। कहा, ‘यह सब काम देवेन्द्र करेगा। यह टी.ए.बिल निकलवाने से लेकर सभी कामों में निष्णात है। आप देखिएगा कि आपका भुगतान कराने से लेकर आपको ट्रेन में बैठाने तक का काम किस कुशलता से करता है।’

आचार्य जी का मुख मेरी तरफ घूम गया। अब उनके चेहरे पर मेरे लिए असीम प्रेम का भाव था। उदासीनता और अजनबीपन के सारे पर्दे एक क्षण में गिर गये थे और वे बड़ी आत्मीयता से मेरी तरफ देख रहे थे।

उन्होंने अपनी दाहिनी भुजा मेरी ओर उठायी और प्रेमसिक्त स्वर में कहा, ‘अरे वाह! इतनी दूर क्यों बैठे हो बेटे? इधर आकर मेरी बगल में बैठो।’

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 29 – दाना – पानी ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है  स्त्री जीवन के कटु सत्य को उजागर कराती एक सार्थक रचना ‘दाना – पानी। आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़  सकते हैं । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 29 – विशाखा की नज़र से

☆ दाना – पानी ☆

नित रखती हूँ परिंदों के लिए दाना – पानी

वो करते हैं मेरी आवाजाही पर निगरानी

मैं रखती हूँ दाना

 

निकलती हूँ घर से , जुटाने दाना – पानी

दिखतें है कई बाजनुमा शिकारी

वो भी रखतें है मेरी आवाजाही पर निगरानी

मैं बन जाती हूँ दाना और

लोलुप जीभ का पानी

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 2 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

 ☆ Anonymous Litterateur of Social  Media # 2/ सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 2☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का अंग्रेजी भावानुवाद  किया है।  इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

ज़रा सी कैद से ही

घुटन होने  लगी…

तुम तो पंछी पालने

के  बड़े  शौक़ीन थे…

 

Just a little bit of confinement

Made you feel so suffocated

 But keeping the birds caged

 You were so very fond of…!

§

अधूरी कहानी पर ख़ामोश

लबों का पहरा है

चोट रूह की है इसलिए

दर्द ज़रा गहरा है….

 

 Silent lips are the sentinels

 Of  the  unfulfilled fairytale…

 Wound is of the spirited soul

 So the pain is rather intense….

§

हंसते हुए चेहरों को गमों से

आजाद ना समझो साहिब

मुस्कुराहट की पनाहों में भी

हजारों  दर्द  छुपे होते  हैं…

 

O’ Dear, Don’t even consider that

Laughing faces are free of sorrow

Innumerable  pains are  hidden

Even behind the walls of a smile…

§

चुपचाप चल रहे थे

ज़िन्दगी के सफर में

तुम पर नज़र क्या पड़ी

बस  गुमराह  हो  गए…

 

  Was walking peacefully

  In  the  journey of the life

  Just casting a glance on you

  Made my journey go astray…

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बस यूं ही ,,,,,,, ☆ डॉ रानू रूही

डॉ रानू रूही

( ई- अभिव्यक्ति में डॉ रानू रूही जी का हार्दिक स्वागत है। वर्तमान में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत। कविता, गीत, ग़ज़ल, आलेख, कहानी आदि विभिन्न साहित्यिक विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर। देश प्रदेश की विभिन्न प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर की   पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । अब तक 4 पुस्तकें प्रकाशित एवं 15 पुस्तकें सम्पादित। अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्मेलनों  / मुशायरों में प्रस्तुति। राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों / अलंकरणों  से  पुरस्कृत /अलंकृत।  आज प्रस्तुत है एक भावपूर्ण गीत  बस यूं ही ,,,,,,,. हम भविष्य में आपसे ऐसे ही उत्कृष्ट रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।)

☆ गीत – बस यूं ही ,,,,,,, ☆

सुन लो ना सुन लो ना

तुम घर पर ही हो ना

जाने  दो होने दो

जो भी होगा होना

 

सुबह की आहट से

सूरज को चुन लेना

खिड़की से छनती सी

किरणों को बो लेना

 

ना मिलना तड़पाए

दिल जो भर भर आए

चुप चुप से छुप छुप के

खुद ही से कह लेना

 

गुन गुन सी आंगन में

किरणें जो छा जाएं

चेहरे को झटपट से

आंसू से धो लेना

 

भावों की आहो से

दीवारें रंग लेना

दर पर उम्मीदों की

आंखों से सो लेना

 

यादों के सिरहाने

बातें भी रख लेना

रातों के ख्वाबों में

ग़म सारे भर लेना

 

सुन लो ना सुन लो ना

तुम घर पर ही हो ना

जाने दो होने दो

जो भी होगा होना।

 

© डॉ रानू रूही

माढ़ोताल, जबलपुर (म प्र)

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