हिन्दी साहित्य- संस्मरण ☆ संस्मरणात्मक आलेख – पूरा हिन्दुस्तान जगमगाया ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

मानवीय एवं राष्ट्रीय हित में रचित रचना

डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक कई महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है। आज प्रस्तुत है उनका संस्मरणात्मक आलेख  “पूरा हिन्दुस्तान जगमगाया ” जिसमें  उनके व्यक्तिगत विचार उनकी मनोभावनाओं के रूप में प्रदर्शित हो रहे हैं। यह आलेख समस्त देशवासियों की किसी भी आपदा के विरुद्ध  राष्ट्रीय एकता एवं  उनकी मनोभावनाओं को प्रकट करता है जो प्रधानमन्त्री जी के आह्वान पर एकजुट होकर खड़े हो गए थे। )

☆ संस्मरणात्मक आलेख  – पूरा हिन्दुस्तान जगमगाया   ☆  

श्रीराम जी जब लंका दहन कर लौटे तब पूरा अयोध्या जगमग जगमग कर रहा था. दीपोत्सव था वह. अयोध्या के अस्तित्व का सवाल था वह.

अभी अभी पांच अपरैल को पूरा हिन्दुस्तान जगमग जगमग हुआ था. महादीपोत्सव था यह. हमारे देश के अस्तित्व का सवाल था यह भी.

कोरोना अपने दहशत के भयंकर दाईने डैने फैलाकर  हमें डरा रहा था. विदेशों में इटली, जापान, अमेरिका, के इरादों को कुचलता हुआ आगे बढकर वह भारत में  भी  अपने भयंकर डैने फैलाना चाहता था.

कोरोना भूल गया था कि यहाँ सवा करोड़  जनता का राज है. ऐसॆ मौकों पर एकजुट होना इसकी आदत में शुमार है. अजीब दृश्य था. शहर-गावं सब मिलकर  दिये जला रहे थे. इन सांकेतिक दियों के पीछे देशवासी  कितना सुरक्षित महसूस कर रहे थे. यह जानने-समझने कि बात है. जैसे ये दिए, दिए न  होकर रक्षा करने वाले सिपाही हों, उन्हीं सिपाहियों के सम्मान में जो चौबीसों घंटे मानवता के लिए सतत सेवाएँ दे रहे हैं.

देशवासियों ने अपने अति उल्हास में फटाके भी फोड़े. दियों ने जनमानस को विश्ववास दिलाकर कहा – हमारा प्रकाश पुंज है न आप के साथ.

टीवी में से झांककर एक  अनुकरणीय चेहरा बार-बार भरोसा दे रहा था कि हम हैं न  आपके साथ. कही वह चेहरा हमारे दादा परदादा का तो नहीं जो प्रधानमंत्री का चेहरा लेकर आ खड़ा हुआ है. ये चेहरा अपने परिवार के मुखिया का सा क्यों लग रहा है भला?

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल
एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 30 ☆ कोरोनाची ऐशी तैशी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

मानवीय एवं राष्ट्रीय हित में रचित रचना

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  कोरोना विषाणु  पर  एक समसामयिक रचना  “कोरोनाची ऐशी तैशी”। उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 30 ☆

☆ कोरोनाची ऐशी तैशी ☆ 

(काव्यप्रकार:-अभंग रचना)

कोरोनाच्या मुळे !

जग थांबलया !

विश्रांती घेतया !

शांतपणे !!१!!

 

अनेक वर्षांची !

रेल्वेची ती सेवा !

घेतीये विसावा !

मनसोक्त !!२!!

 

वाहणारे रस्ते !

घेतात आराम !

कधीच विश्राम !

नसे त्यांना !!३!!

 

जाहलिये थंड !

वाहनांची गर्दी !

पोलीसांची वर्दी !

जागोजागी !!४!!

 

हात ते हातात !

घेत नाही आम्ही!

म्हणतो हो आम्ही !

रामराम !!५!!

 

हात धुण्यासाठी !

सॅनिटायझर !

हो वापरणार !

घरोघरी !!६!!

 

कोरोना रोखण्या !

डॉक्टर धावती !

सिस्टर पळती !

मदतीला !!७!!

 

घरात बसुनी !

पाळुया नियम !

शासना मदत !

करुयाहो !!८!!

 

घरात राहूनी !

खेळ आम्ही खेळू !

साखर ती दळू !

जात्यावर !!९!!

 

सागर गोट्यांच्या !

खेळात हातांना !

व्यायाम डोळ्यांना !

छान होई !!१०!!

 

सागर किनारी !

स्वच्छंदपणाने !

आनंदे हरिणे !

बागडती !!११!!

 

पिसारा फुलवी !

मोर तो सुंदर !

नाचे रस्त्यावर !

बिनधास्त !!१२!!

 

उर्मिला म्हणते !

नियम ते पाळा !

आरोग्य सांभाळा !

आपुलाले !!१३!!

 

©️®️ उर्मिला इंगळे, सातारा

दिनांक:-११-४-२०

!! श्रीकृष्णार्पणमस्तु !!

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मराठी साहित्य – कविता ☆ ज्योती म्हणजेच क्रांती ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे 

(युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटतेआज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय  एवं प्रेरक कविता ज्योती म्हणजेच क्रांती। 

☆ ज्योती म्हणजेच क्रांती☆

 

अखंड क्रांतीची ज्योत पेटवली

धाडसाने आद्य क्रांतिकारका

विचारांच्या तेजाने उजळवली

धरती सवे असंख्य तारका

तू जन्मला सत्य शोधण्यासाठी

माता बघिणींच्या शिक्षणासाठी

जाहलास ज्ञानाची अखंड गंगा

लढला असप्रुश्यता घालवण्यासाठी

शिक्षणाची देवता तूच ज्योती

धन्य तुझ्या अंगणातली ती हौद जाहली

महाराष्ट्रासवे ही भारत माता

नमन करून तुज महात्मा म्हटली

किती वंदावे तुज महात्मा

मानव धर्माचा पुरस्कर्ता

न्याय दिधला विधवा कूमारी

अनाथ बालकांचा पालनकर्ता

© कपिल साहेबराव इंदवे

मा. मोहीदा त श ता. शहादा, जि. नंदुरबार, मो  9168471113

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Talk on Happiness – I : Recipe for Happiness – Video # 1 ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  Talk on Happiness – I ☆ 

A Short and simple video that gives you the recipe for happiness.

Video Link >>>>

Talk on Happiness: VIDEO #1

When asked for his recipe for happiness, Sigmund Freud gave a very short and sensible answer: “Work and love.”

Studies on flow have demonstrated repeatedly that more than anything else, the quality of life depends on two factors: how we experience work, and our relations with other people.

Engagement, or flow, is one of the strongest pillars around which Positive Psychology is built. Here, one is fully in the present, immersed in something worthwhile.

Flow is a state of joy, creativity and total involvement, in which problems seem to disappear and there is an exhilarating feeling of transcendence.

According to Mihaly Csikszentmihalyi, flow is what we feel when we are fully alive, involved with what we do, and in harmony with the environment around us.

It is something that happens most easily when we sing, dance, do sports – but it can happen when we work, read a good book, or have a good conversation.

When asked for his recipe for happiness, Sigmund Freud gave a very short and sensible answer: “Work and love.”

Most people spend the largest part of their lives working and interacting with others, especially with members of their families. Therefore, it is crucial that one can learn to transform job into flow-producing activities, and to think of making relations with parents, spouses, children, and friends more enjoyable.

Studies on flow have demonstrated repeatedly that more than anything else, the quality of life depends on two factors: how we experience work, and our relations with other people.

It is true that if one finds flow in work, and in relations with other people, one is well on the way toward improving the quality of life as a whole.

We each have the potential to experience flow, whether at work, at play or in our relationships.

One thing I can say for sure – flow brings true happiness! The experience becomes its own reward.

– Mihaly Csikszentmihalyi / Flow

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email [email protected] if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (38) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना)

 

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।। 38 ।।

 

आदि देव इस जगत के , परम विश्व आधार

तुम्हीं व्याप्त सब सृष्टि में तुमसे जग विस्तार  ।। 38 ।।

 

भावार्थ :  आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं।। 38 ।।

 

Thou art the primal God, the ancient Purusha, the supreme refuge of this universe, the knower,  the  knowable  and  the  supreme  abode.  By  Thee  is  the  universe  pervaded,  O  Being  of infinite forms।। 38 ।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 42 ☆ सत्य और कानून ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का सत्य के धरातल पर लिखा गया  महत्वपूर्ण आलेख नारी आंदोलन पर आपके व्यक्तिगत विचारों से परिपूर्ण एक दस्तावेज है। नारी शक्ति विमर्श की प्रणेता डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 42 ☆

☆ सत्य और कानून 

‘फैसला जो भी सुनाया जाएगा / मुझको ही मुजरिम बताया जाएगा/ आजकल सच बोलता फिरता है वह/ देखना सूली पर चढ़ाया जाएगा’ अर्चना ठाकुर जी की यह पंक्तियां हांट करती हैं और वर्तमान परिस्थितियों पर बखूबी प्रहार करती हैं। यह शाश्वत सत्य है कि हर अपराध के लिए दोषी औरत को  ठहराया जाता है; भले वह अपराध उसने किया ही न हो। इतना ही नहीं, उसे तो अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्रदान नहीं किया जाता। सतयुग में अहिल्या त्रेता में सीता, द्वापर में द्रौपदी और कलयुग में निर्भया जैसी हज़ारों महिलाएं आपके समक्ष हैं। निर्भया के दुष्कर्मी, जिनहें सात वर्ष गुज़र जाने और बार-बार फांसी व डैथ-वारंट जारी होने का फरमॉन सुना देने के पश्चात् भी, बचाव के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं, मनोमस्तिष्क  को आहत करते हैं और कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं और सोचने को विवश करते हैं कि अपराधियों को बार-बार क्यूरेटिव-याचिका या गत वर्षों की मार-पीट के केस दर्ज  करवाने की अनुमति क्यों?

वैसे तो कहा जाता है ‘इग्नोरेंस ऑफ ला इज़ नो ऑफेंस’ अर्थात् कानून की अनभिज्ञता व अज्ञानता बेमानी है, अपराधी के बचने का विकल्प अथवा साधन नहीं है। क्या यह कानून सामान्यजनों के लिए है, दुष्कर्मियों व अपराधियों के लिए कारग़र नहीं;  शायद मानवाधिकार आयोग भी जघन्य अपराधियों की सुरक्षा के लिए बने हैं; उनके हितों की रक्षा करना उनका प्रथम व प्रमुख दायित्व है। जी हां! यही सब तो हो रहा है हमारे देश में। एक प्रश्न मन को बार-बार कचोटता है कि यदि बीजिंग में तीस मिनट में दुष्कर्मी को तलाश कर, जनता के हवाले करने के पश्चात् फांसी पर लटकाया जा सकता है, फिर हमारे देश में यह सब संभव क्यों नहीं है?

वास्तव में हमारा कानून अंधा और बहरा है। यहां निर्दोष व औरत को अपना पक्ष रखने व न्याय पाने का अधिकार कहां है? प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है? आपके समक्ष है… निर्भया व उन्नाव की पीड़िता व दुष्कर्म का शिकार होती महिलाओं के साथ होते संगीन अपराधों के रूप में… दुष्कर्म के पश्चात् उन्हें तेज़ाब डालकर ज़िंदा जला डालने, ईंटों से प्रहार कर सबूत मिटाने व शव को गंदे नाले में फेंक बहा देने के हादसे। सो! मस्तिष्क में यह प्रश्न बार-बार उठता है कि किस कसूर की सज़ा दी जाती है उन मासूम बालिकाओं-युवतियों; उनके माता-पिता व परिवारजनों को… जो वर्षों तक कचहरी में ज़लील होने के पश्चात् मन मसोस कर निराश लौट आते हैं, क्योंकि वहां अपराधियों को नहीं; शिकायत-कर्त्ताओं को कटघरे में खड़ा किया जाता है… हर बार नयी कहानी गढ़ी जाती है तथा अपराधियों को बचाव का हर अवसर प्रदान किया जाता है। क्यों..क्यों..आखिर  क्यों? ऐसे संगीन अपराधियों व दुष्कर्मियों को छोड़ दिया जाता है ज़मानत पर…शायद एक नया ज़ुर्म करने को… एक नया अपराध करने को… उदाहरण आपके समक्ष हैं; उन्नाव की पीड़िता का, जहां ऐसे अपराधी उसके प्रियजनों पर दबाव डालते हैं या उन्हें किसी हादसे में मार गिराते हैं अथवा पुन:उस पीड़िता को सामूहिक दुष्कर्म का शिकार बनाते हैं।

सो! अर्चना जी की यह पंक्तियां सत्य व सार्थक प्रतीत होती हैं। अपराधिनी तो हर स्थिति में महिला को ही ठहराया जाता है, क्योंकि वह हर जुल्म सहती है… ‘सहना और कुछ न कहना’ औरत की नियति है, जिसे वह युग-युगांतर से सहन करती आ रही है। हमारे शास्त्रों में संविधान रचयिता भी तो पुरुष ही थे। सो! सभी कायदे-कानून उनके पक्ष में बनाए गए हैं और औरत को सदा कटघरे में खड़ा कर, दोषारोपण नहीं किया गया, उसे प्रताड़ित व तिरस्कृत किया गया है। मुझे 2007 में स्व-प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की ‘संस्कृति की धरोहर’ की पंक्तियां– ‘अधिकार हैं/ पुरुष के लिए/ नारी के लिए मात्र कर्त्तव्य/ इसमें आश्चर्य क्या है/ यह तो है युगों युगो की परंपरा/ संस्कृति की धरोहर।’ सतयुग में अहिल्या को शाप दिया गया था। अहिल्या कविता में ‘दोष पुरुष का/ सज़ा स्त्री को/ यही नियति है/ तुम्हारी युगों-युगों से।’ गांधारी कविता की– ‘गांधारी है/ आज की हर स्त्री/ खिलौना है पति के हाथों का/ कठपुतली है/ जो नाचती है इशारों पर/ घोंटती है गला/ अपनी इच्छाओं का/उसकी खुशी के लिए/ सामंजस्यता के लिए/ करती है होम/आकांक्षाओं का/ समरसता के लिए/ देती है बलि सपनों की/ करती है नष्ट अपना वजूद/ सब की इच्छाओं के प्रति सदैव समर्पित/—-और यदि ऐसा ना करे/ तो राह देख रहा होता है/ कोई तंदूर/ बिजली का नंगा तार/ मिट्टी के तेल का डिब्बा/ पंखे से झूलती रस्सी/ मन में भावनाओं ने/ अंगड़ाई ली नहीं/ तैयार हैं/ बंदूक की गोलियां/ या तेज़ाब की बोतल/ तेज़ाब… परिणाम उसके सपनों का/ जीवन के रूप में खौफ़नाक/ ऐसे ही भय या विवशता से/ मूंद लेती है/ वह निज आंखें/ और बन जाती है/गांधारी।’

शायद उपरोक्त पंक्तियां समर्थन करती हैं कि मुज़रिम सदैव औरत ही होती है। मुझे याद आ रही हैं, इसी पुस्तक की यशोधरा की ये पंक्तियां–’शायद भगवान भी क्रूर है/ कानून की तरह/ जो अंधा है, बहरा है/ जो जानता है/ केवल कष्ट देना/ ज़ुल्म करना/ उसके शब्दकोश में/ समस्या शब्द तो है/ परंतु निदान नहीं।’ रावण कविता की ये पंक्तियां आज भी समसामयिक हैं, सार्थक हैं। ‘सीता/ सुरक्षित थी/ राक्षसों की नगरी में/ उनके मध्य भी/ नारी सुरक्षित नहीं/ आज परिजनों के मध्य भी/ परिजन/ जिनके हृदय में बैठा है शैतान/ वे हैं नर पिशाच।’ क्या यह सत्य नहीं कि कानून और सृष्टि-नियंता ने भी दुष्टों के सम्मुख घुटने टेक दिए हैं।

औरत को हर पल अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है और सज़ा सदैव औरत को ही दी जाती है… दोषी भी वही ठहराई जाती है– ‘है यहां अंधा कानून/ चाहता है ग़वाह/ चश्मदीद ग़वाह/ जो बयां कर सके आंखों-देखी/ वह ग़वाह तो/-अस्मत लूटने वाला/

दरिंदा है/ जो कटघरे में खड़ा है/ कह रहा है निर्दोष स्वयं को/ और लगा रहा है तोहमत/ उस मासूम पर/ जिसकी अस्मत का/ सौदा हो रहा है/ कटघरे से बाहर/ कानून की/ बंद आंखों की/ पहुंच से परे/और परिणाम/ सब ग़वाहों और बयानों को/ मद्देनज़र रखते हुए/ अपराधी को बेग़ुनाह/ साबित करते हुए/ बा-इज़्ज़त/ बरी किया जाता है/ हंस रही है/ व्यंग्य से / वह फर्श पर/ टूटी हुई चूड़ियां/ यह अनकही /दास्तान हैं/ दर्द का बयान हैं।’

‘सच बोलता फिरता है वह/ देखना सूली पर चढ़ाया जाएगा’ कोटिश: सत्य कथन है। अनेक प्रश्न उठते हैं मन में– ‘कानून!/ रक्षक समाज का/ मनुष्य-मात्र का/ कर लेता नेत्र बंद/ बलात्कार का इल्ज़ाम/ सिद्ध होने पर/ क्यों नहीं चढ़ा दिया जाता/ उसे फांसी पर/ या बना दिया जाता है/ नपुंसक/ एहसास दिलाने को/ वह घिनौना कृत्य/ जिसे अंजाम दे/ कर दिया नष्ट/ जीवन उस मासूम का/ नोच डाला/ अधखिली कली को/ और  छीन लिया/ उसका बचपन।’

सत्य भले ही लंबे समय के पश्चात् उजागर होता है, परंतु उससे पहले ही आजकल उसे सूली पर चढ़ा दिया जाता है। यही है आज के युग का सत्य… झूठ उजागर होना चाहता है, क्योंकि अपराधियों को किसी का भय नहीं,  जिसका प्रमाण है—देश में बढ़ती दुष्कर्म की घटनाएं, मानव अंगों की तस्करी के लिए अपहरण की घटनाएं, सरे-आम भीड़ में तलवार लहराते और हवा में गोलियां चलाते दहशतगर्दों के  बुलंद हौसले, जिन्हें देखकर हर इंसान भयभीत व  आक्रोशित है, क्योंकि वह स्वयं को असुरक्षित  अनुभव करता है। काश! हमारे संविधान में संशोधन हो पाता; कानून की लचर धाराओं को बदला जाता और अपराधियों के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा का प्रावधान होता। ‘जैसा जुर्म, वैसी सज़ा दी जाती, तो दरिंदों के हौसले पस्त रहते और वे उसे अंजाम देने से पहले लाख बार विचार करते। परंतु जब तक हमारा ज़मीर नहीं जागेगा, सब ऐसे ही चलता रहेगा। इसके लिए औरत को इंसान समझने की दरक़ार है। जब तक उसे दलित, दोयम दर्जे की प्राणी व उपभोग की वस्तु-मात्र समझा जाएगा, तब तक यह भीषण हादसे घटित होते रहेंगे…देह-व्यापार पर अंकुश नहीं लग पायेगा…दुष्कर्म होते रहेंगे और हर अपराध के लिए औरत को ही मुज़रिम करार किया जायेगा। लोग मुखौटा धारण कर, औरत की अस्मत से खिलवाड़ करते रहेंगे और वह महफ़िलों की शोभा बन उन्हें रोशन करती रहेगी। आवश्यकता है– सामंजस्य की, जिसका सिंचन संस्कारों द्वारा ही संभव है। हमें जन्म से ही लड़के-लड़की को समान समझ उन्हें संस्कारित करना होगा… मर्यादा व संयम का पाठ पढ़ाना होगा। बेटियों को आत्मरक्षा हित जूडो-कराटे सिखाना होगा; आत्मनिर्भर बनाना होगा, ताकि उसे कभी भी दूसरों के सामने हाथ न पसारने पड़ें। इतना ही नहीं, हमें उन्हें यह एहसास दिलाना होगा कि विवाहोपरांत भी इस घर के द्वार उसके लिए खुले हैं। वह उस घर का हिस्सा थीं और सदैव रहेंगी।

वैसे तो दुष्कर्म के हादसों के संदर्भ में चश्मदीद गवाह की मांग करना हास्यास्पद है। इस स्थिति में साक्ष्यों के आधार पर तुरंत निर्णय लेना ही कारग़र है ताकि अपराधियों को सबूत मिटाने, परिवारजनों को धमकी देने व उस दुष्कर्म-पीड़िता को ज़िंदा जलाने जैसे अपराधों की पुनरावृत्ति न हो। आज कल के युवा बहुत सचेत व इस तथ्य से अवगत हैं कि ‘एक व दस अपराधों की सज़ा समान होती है।’ सो! वे दुष्कर्म के करने के पश्चात् पीड़िता की हत्या कर निश्चिंत हो जाते है, क्योंकि ‘न होगा बांस, न बजेगी बांसुरी’ अर्थात्  पीड़िता के ज़िंदा न बचने पर, उन्हें साक्ष्य जुटाने में वर्षों गुज़र जायेंगे।

आधुनिक युग में हर इंसान बिकता है। हमारे नुमाइंदे भी सत्ता का दुरुपयोग कर आरोपियों को संरक्षण प्रदान कर, अपनी पीठ थपथपाते हैं और पीड़िता के परिजन दहशत के साये में जीने को विवश होते हैं। अक्सर तो वे मौन धारण कर लेते हैं, क्योंकि उनके कारनामों की रिपोर्ट दर्ज कराना तो उनसे पंगा लेने के समान है–’आ! बैल, मुझे मार’ की स्थिति को आमंत्रण देने, मुसीबतों व दुश्वारियों को आमंत्रण देने जैसा है।

आश्चर्य होता है, अपने देश की कानून-व्यवस्था को देख कर–यदि वे शिकायत दर्ज कराने कि साहस जुटाते हैं, तो कोई साक्ष्यकर्त्ता ग़वाही देने की जुर्रत नहीं करता क्योंकि कोई भी अपनी हंसती-खेलती गृहस्थी की खुशियों में सेंध नहीं लगाना चाहता। ‘भय बिनु होत न प्रीति’ बहुत सार्थक उक्ति है। सो! हमें कानून को सख्त बनाना होगा, ताकि समाज में अव्यवस्था व जंगल-राज न फैले। वास्तव में त्वरित न्याय-व्यवस्था वह रामबाण औषधि है, जो कोढ़ जैसी इस लाइलाज बीमारी पर भी विजय प्राप्त कर सकती है।

आइए! गूंगी-बहरी व्यवस्था को बदल डालें। लोगों में आधी आबादी में विश्वास जाग्रत करें ताकि उनमें सुरक्षा का भाव जाग्रत हो व भ्रूण-हत्या जैसे अपराध समाज में न हों और लिंगानुपात बना रहे। समन्वय, सामंजस्य व समरसता हमारी संस्कृति की अवधारणा है, जो समाज में सत्यम् शिवम् व सुंदरम् की स्थापना करती है। सज़ा अपराधी को ही मिले और सत्यवादी को न्याय प्राप्त हो…उसे सूली पर न चढ़ाया जाए…यही अपेक्षा है कानून-व्यवस्था से। सत्य का पक्षधर को सदैव यथासमय, शीघ्र न्याय प्राप्त होना चाहिए। सो! समाज में राग-द्वेष, स्व-पर आदि का स्थान न हो और संसार का हर बाशिंदा स्नेह, प्रेम, सौहार्द, करुणा, त्याग आदि की भावनाओं से आप्लावित हो, सकारात्मक सोच का धनी हो। ‘जो हुआ,अच्छा हुआ/ जो होगा,अच्छा होगा…यह नियम सच्चा है।’ सो! जो अच्छा व शुभ नहीं, त्याज्य है; उसका विरोध करना अपेक्षित है। द्वंद्व संघर्ष का परिणाम है और संघर्ष ही जीवन है। जब तक मानव में सत्य को स्वीकारने का साहस नहीं होगा, ज़ुल्म होते ही रहेंगे। सो! धैर्य वह संजीवनी है, जो वर्तमान व भविष्य को सुखद बनाने में समर्थ है…आनंद-प्रदाता है। आइए! विश्व-कल्याण हेतु इस यज्ञ में समिधा डालें ताकि वायु प्रदूषण ही नहीं; मानसिक व सांस्कृतिक प्रदूषण का अस्तित्व भी न रहे और प्राणी-मात्र सुक़ून की सांस ले सके।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ ज़मीन ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

( ई- अभिव्यक्ति में डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी का हार्दिक स्वागत है।  आप बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक बेहद खूबसूरत और संजीदा कहानी ज़मीन। जीवन के कई सत्य और पुरस्कारों के संसार की ज़मीन के सत्य को उजागर करती इस बेबाक कहानी के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सदर नमन।)  

☆ कथा-कहानी ☆ ज़मीन ☆

चारु संमुदर के किनारे बैठकर अपनी बीती जिंदगी को याद कर रही है । चारु अपने यौवन में बहुत ही सुंदर दिखाई दे रही थी । उसके चेहरे पर तेज भी सूरज को कमज़ोर और चांद भी उसके सामने फीके पड जाते है । आप सोच नहीं सकते इतनी सुंदर थी । विश्वसुंदरी को भी मात देनेवाली एक लड़की चारु थी । उसके परिवार के लोगों ने उसे कभी भी विश्वसुंदरी की प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए सहायता नहीं की थी । उसका परिवार परंपरागत रुढिवादी से भरा था । उसके पिता जी की बात पूरे परिवार में चलती थी । चारु को कुछ भी काम होता तो वह पहले अपने पिताजी को मनाती थी । घर में पुरुष का वर्चस्व अधिक था । रमेश रोज सुबह पूजा करते थे । उसकी माँ चांदनी उनके लिए पूजा की सामग्री सब सजाकर रखती थी । एक दिन भी उनसे नहीं होता तो रमेश चिल्लाते थे । चारु को कॉलेज में आगे पढ़ना था ।

रमेश ने साफ मना कर दिया था कि अब आगे चारु पढाई नहीं करेगी । चांदनी मुझे लगता है कि उसे घर के काम सीखने चाहिए । उसे सारी औरतों के काम सीखा देना । अपना फैसला सुनाकर  वे अपने ऑफिस के लिए निकल गए ।

उनके जाते ही चारु उनकी नकल करते हुए अपनी माँ से पूछती है, माँ, आप इस इन्सान के साथ कैसे रह लेती हो?  मेरे लिए कभी भी ऐसा पति मत ढूँढना । माँ मुझे आगे पढना है । आप लोग क्यों नहीं समझ रहे हो? मुझे समाज में बहुत सारे काम करने है । आप बताइए माँ, क्या मैं घर की चाहरदीवारी में बैठकर चूल्हा चौका करने ही पैदा हुई हूँ ? आप बताइए । अगर ऐसा ही था तो मुझे पैदा ही क्यों किया ? माँ…माँ… बात क्यों नहीं कर रही हो, कहते हुए चारु अपनी माँ को ज़ोर से हिलाती है ।

चांदनी की आँखों में आंसू बह रहे थे । उसने आंसू पौंछाकर कहा, सही कहा तुमने । सबसे परे मैं माँ हूँ । मैं कैसे अपनी फूल सी बच्ची को किसी कसाई के हवाले कर देती, बताओ । बडी आई कहनेवाली कि मुझे मार दिया होता तो अच्छा होता कहनेवाली । तुम तो बहुत बड़ी हो गई हो बिटिया ।  हाँ, मानती हूँ  कि  तुम्हारे पिताजी को लड़की पहले से पसंद नहीं है । वह हंमेशा लड़की को जिम्मेदारी ही समझते है । मतलब यह तो नहीं कि बच्ची को मार दिया जाय । रमेश डरते है कि उनकी सुंदर बच्ची पर किसीकी नज़र न पड़ जाय । उन्होंने तुम्हें गंदी नज़रों से बचाकर रखा है । तुम यह सोच रही होगी कि पापा को क्या लेना-देना जब वह लड़की का पैदा होना ही पसंद नहीं है, तुम्हें पता है… दुखी ज़रुर हुए थे जब तुम पैदा हुई थी । धीरे-धीरे तुम्हारे प्यार ने ही उन्हें बदल दिया है । यह ज़रुर है कि हमारे घर में उनका शासन चलता है । घर में किसी एक शासन चलना ज़रुरी होता है । रमेश की बातें मुझे भी चुभती है फिर भी मैं सुन लेती हूं । क्यों पता है? वे हमारे लिए जीते है । क्या ज़रुरत है उनको बाहर जाकर काम करने की ? क्या ज़रुरत हैं कि वे अपना परिवार छोडकर शहर में आकर कमा रहे है? क्या उनको इतनी मेहनत करने की ज़रुरत है कि वे हमारे लिए मकान और गहने बनाये? नहीं । फिर… हमें भी समझना चाहिए । कह देना आसान है कि उनके जैसा पति नहीं चाहिए । सच बताऊँ तो उनके जैसा पति मिलना भी मुश्किल है ।

चारु अपनी माँ की बात सुनकर कहती है, अच्छा माँ यह सोच लिया जाय कि वे बहुत अच्छे है । जो भी कर रहे है, मात्र अपने परिवार की सुरक्षा के लिए कर रहे है । पर माँ प्यार नाम भी कुछ होता है । जो इन्सान के लिए महत्वपूर्ण है । रोज की इस मशीन की जिंदगी में अगर कोई प्रेम से बतिया दे तो कितना अच्छा लगता है । हंमेशा चिल्लाना और सिर्फ अपनी बात को मनवाना यह भी कोई बात हुई ।

चांदनी भी सोचते हुए कहती है, हां बिटिया, लगता तो पहले मुझे भी तुम्हारे जैसा ही था । अब हर व्यक्ति का जीने का तरीका अलग होता है । हम अगर उसे अपनाकर उनके साथ रहेंगे तो अच्छा है । वरना रोज रोते रहेंगे । अपनी ही जिंदगी से ऊब जाएंगे । रमेश हम लोगों को बहुत चाहते है, पर वह दिखाते नहीं है ।

माँ आप कुछ भी कह लीजिए, मुझे आगे पढना है । मैं पापा को मनवाकर रहूंगी । आखिर मैं भी उनकी बेटी हूं । देख लेना।

रमेश के ऑफिस से लौटते ही चारु ने उनके लिए अदरकवाली चाय पेश की । रमेश ने कहा, आज क्या नई योजना हमारी बिटिया ने बनाई है ? वैसे चाय बहुत अच्छी है । अब बताइए क्या बात है ।

वो…पापा….वो …..पापा..मैं..मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ । मैं आपको वादा करती हू कि आपको किसी भी प्रकार की परेशानी मुझसे नहीं होगी । धीरे-धीरे कहती है, पापा मैं अपने ज़मीन की तलाश कर रही हूं । मुझे आपका सहारा चाहिए । मैंने आज तक कोई भी शिकायत का मौका नहीं दिया । आपने जैसा कहा वैसे करती गई । आज मैं सिर्फ अपने लिए कुछ करना चाहती हूँ । सच में पापा, प्लीज। इस दुनिया में थोड़ी सी जगह चाहती हूँ । आप मेरा साथ दोगे ना पापा कहते हुए अपने घुटनों के बल चारु रमेश  के पैर के पास बैठ जाती है ।

रमेश उसकी ओर देखते है फिर चांदनी की ओर । ठीक है, थोडी देर सोचकर कहते है, एक काम करना कल जाकर तुम बीएमएस वुमन्स कॉलेज का फॉम लेकर आना । अभी आखिरी तारीख बाकी है ।

चारु बहुत खुश हो जाती है और देखना पापा मैं मन लगाकर पढाई करुगी और आपको कभी भी शिकायत का मौका नहीं दूंगी । कहते हुए चारु अपनी दोस्त नीतु को फोन करके बताती है ।

चारु स्वतंत्र विचारोंवाली थी । वह अपने पैरों पर खडे होना चाहती थी । वह पढ़ाई में हमेशां से अव्वल आई है । भगवान ने जैसा रुप दिया वैसी ही बुद्धिमान और प्रतिभाशाली भी बनाया है । वह थोड़ी शरारती किस्म की थी । वह लड़कों को फेसबुक और बोट्‍सएप के माध्यम से उल्लू भी बनाती थी । उसे लगता था कि लोग उसे जाने और सराहे । बस उसमें एक जुनून था । उसने अपनी पढ़ाई पूरी की और रमेश ने उसकी शादी एक सम्पन्न परिवार कर दी थी । उसने वहां पर अपने पति से कहा कि उसने इतनी पढाई की है अब वह पढाना चाहती है । उनके पति किरण भी उसकी बातों को स्वीकार कर लिया । यही सारी बातों को सोचते हुए चारु समुंदर के किनारे बैठी हुई छोटे पत्थरों को पानी में फेंक रही थी । मंद-मंद हवा बह रही थी, उसका आनंद ले रही थी ।

अचानक पीछे से एक आवाज़ आती है । अरी ओ! चारु मैं तो पुकारकर थक गई । तुम यहाँ बैठी हो । तुम्हारा फोन कहाँ है ? मैं तो तुम्हें फोन करके भी थक गई । अब तुम चलो। कहते हुए उसका हाथ नीतु पकडती है ।

अरे!  नीतु तुम ? ऐसे  कैसे और क्यों? देखो न! यहाँ पर कितना अच्छा लग रहा है । कभी-कभी एकांत भी कितना अच्छा लगता है । देखो थोडी देर के लिए बैठोगी तो इन लहरों को भी सुन पाओगी । कहकर नीतु को  भी पास बिठाती है ।

नीतु जिद्द पर अड़ी थी । उसकी जिद्द को देखकर चारु कहती है, कहाँ जाना है हमें और क्यों?

नीतु ने कहा उसे बधाई देते हुए कहा, देखो तो तुम कैसे अनजान बनी बैठी हो ? तुम्हें इतने सारे सम्मान मिले अब तो हमे पार्टी चाहिए । नीतु चारु का हाथ पकडते हुए कहती है, अच्छा अब बताओ तुम्हें किस किताब के लिए सम्मानित किया गया । मैं बहुत खुश हूँ । अगर तुम मुझे किताब का नाम बताओगी तो मैं भी उसे पढूंगी । मुझे भी पढ़ने का बहुत शौक है ।

अरी! वो सम्मान मुझे कोई किताब के लिए नहीं दे रहे है । वो तो मेरे प्रपत्र वाचन के लिए दे रहे है । किताब तो मैंने अभी तक नहीं छपवाई । लेकिन हम आपको पार्टी ज़रुर देंगे । कहते हुए चारु अपनी दोस्त के साथ पानी-पुरी खाने चलती है ।

पानी-पुरी खाते हुए नीतु अपनी सहेली चारु से कहती है, मैं एक बात पूछू। बुरा मत मानना । तुम्हारे जैसे कितने ही लोगों ने प्रपत्र लिखें होंगे । तो उनको क्यों नहीं सम्मानित कर रहे है ?

पानी-पुरी अच्छी है अब गोल-गप्पे खाएगी? मुझे नहीं पता कि दूसरों को क्यों नहीं सम्मानित कर रहे है ? मुझे तो इतना पता है कि वे मुझे बुलाते है और सम्मान करते है ।

नीतु उसकी ओर देख रही थी कि उसने कितनी आसानी से अपनी बात रख दी उसे बुरा तक नहीं लगा । उसके चेहरे पर कुछ भी ऐसे भाव नहीं लग रहे थे कि उसे बुरा लगा हो । नीतु यही बात सोचते हुए अपनी सहेली के साथ उसके घर जाती है । नीतु को लगता है कोई बिना कुछ किए कैसे सम्मान ले लेता है । तो क्या किसीको सम्म्मान हासिल करने के लिए कुछ लिखने की ज़रुरत नहीं है । लोग मेहनत करके कविता या कहानी या साहित्य में कुछ लिखते ही क्यों है? बस कुछ प्रपत्र लिख दिए सम्मान मिल गया ।

चारु अपनी सहेली को हिलाती है और कहती है मेमसाब घर आ गया है । क्या इतना सोच रही हो । देखो अपना दिमाग यों नाहक खराब नहीं करते । जिंदगी में कुछ बातों को ऐसे रहने में ही सबकी भलाई है ।

फिर भी चारु तुमने यह सब कितनी आसानी से कह दिया । सच बताऊँ तो सब जो प्रपत्र लिख रहे है, सबको सम्मानित करना चाहिए । तुम अकेली नहीं हो ।

थोड़ी देर के लिए चारु चुप हो जाती है । नीतु की इस बात का उसके पास कोई उत्तर नहीं था । उसने कहा ठीक अब मैं अदरकवाली चाय बनाकर लाती हूँ । तुम्हें पता है, मैं बहुत अच्छी चाय बनाती हूँ । कहते हुए रसोईघर में चली जाती है ।

नीतु भी कहानी और कविता लिखती है । आज तक उसने जो भी सम्मान हासिल किया, उसकी लेखनी के लिए  था । वह अपने नियमों की पक्की थी । उसे बुरा लग रहा है क्योंकि दुनिया में ऐसे लोग भी रहते है । सिर्फ अपना नाम कॉलेज में कमाने के लिए ऐसे सम्मान लेते है । नीतु सोच रही थी कि अचानक चारु के फोन की घंटी बजती है । चारु चाय बनाने में व्यस्त थी । नीतु ने चारु का फोन उठाया ।नीतु बताने जा रही थी कि पता चला कि उसके धर्म भाई बात कर रहे है ।

धीरज भाई साब आप? हाँ, नीतु बहिना कैसी हो? अरी! बहिना आप ने बहुत ही अच्छी कविता लिखी है । हमने कविता पढ़कर चयन समिति को भेजा था । उन्होंने आपको श्री श्री श्री सम्मान के चयन किया है । बाकायदा आपको पत्र भी मिल जाएगा । आप २५ मई को भोपाल में आइएगा । भोपाल में आपका स्वागत है ।

भैया, शायद पारिवारिक परेशानियों की वजह से मैं नहीं आ पाऊँगी । तो क्या आप मेरा सम्मान घर पर भिजवा सकते है ? जी,बहिना मैं समिति से बात करके चारु के साथ भिजवा दूंगा । चिंता की कोई बात नहीं है । उनको भी सम्मानित किया जा रहा है । नीतु को अजीब लगा और बता दिया, कि भैया उन्होंने कोई किताब अभी तक छपवाई नहीं है और कोई कविता भी उनकी प्रकाशित नहीं हुई है । क्षमा कीजिएगा, लेकिन उनको ….मतलब….।

तो क्या हुआ बहिना कि उन्होंने कुछ नहीं लिखा है । आप जानती हो वह हमारी जगह से है । फलस्वरुप उनको सम्मानित करते है । लेकिन भैया यह तो गलत तरीका ही है। मतलब जो कोई आपकी जगह् से होगा या फिर रुपया देंगे तो आप उनको सम्मानित कर देंगे । यह भी कोई बात हुई । यह तो अन्याय है । जो सच में साहित्य की रचना कर रहे है, उसका कोई मूल्य ही नहीं रहेगा । जो सच में सम्मान के योग्य है, उनके साथ तो अन्याय ही हो रहा है । हमारे यहां पर भी साहित्य की चोरी करके खुद का नाम लिख देते है । ऐसी गलत हरकतों पर मुझे बहुत गुस्सा भी आता है । लेकिन मैं अकेली क्या कर सकती हूँ । सिर्फ लिख सकती हूँ । और हम भी किन-किनको रोकेंगे । आजकल विश्वविद्यालय में अपना नाम और स्थान बनाने हेतु लोग ऐसा कर रहे है। आप भी क्या कर सकते है? भैया आपने अपना बडप्पन ही दिखाया है । अब सोचना तो उनको है जो सम्मान ऐसे हासिल कर रहे है । अच्छा, भैया इस बार तो मैं नहीं आ पाऊँगी लेकिन अगली बार अवश्य आने की कोशिश करुँगी । कहते हुए नीतु फोन रख देती है ।

चारु अपनी सहेली के लिए चाय और बिस्कुट भी लेकर आती है । नीतु का मन नहीं करता, फिर भी वह चाय पीती है । फिर कहती है आपके भाई का फोन आया था । ऐसे ही बात कर रही थी । वे मेरे भी धर्म भाई है। फिर चाय का एक घूंट पीकर कहती है, मेमसाब आपका अगला पड़ाव कहाँ पर है । चारु कहती है, अगला पडाव मैं कुछ समझी नहीं । अरे! मैं सम्मान की बात कर रही थी ।

पता नहीं । कब, कौन बुलाएगा ? पता है तुम्हें मेरे पति भी मेरे साथ आते है । उनको भी मुझे सम्मानित होते देख बहुत अच्छा लगता है ।

यह तो बहुत अच्छी बात है । तुम्हें अपने पैरों तले की ज़मीन मिल गई ना चारु। कहते हुए नीतु व्यंग्य रुप से मुस्काती है । चारु उसके व्यंग्य को न समझने का अभिनय करती है । सही कहा तुमने मुझे थोडी ज़मीन तो मिल गई ।

 

© डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

२७२, रत्नगिरि रेसिडेन्सी, जी.एफ़.-१, इसरो लेआउट, बेंगलूरु-७८

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कालजयी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – कालजयी ☆

…कितना धीरे धीरे चढ़ते हैं आप! देखो, मैं कैसे फटाफट दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ चढ़ रहा हूँ..! लिफ्ट खराब होने के कारण धीमी गति से घर की सीढ़ियाँ चढ़ रहे दादा जी से नौ वर्षीय पोते ने कहा। दादा जी मुस्करा दिए। अनुभवी आँख के एक हिस्से में अतीत और दूसरे में भविष्य घूमने लगा।

अतीत ने याद दिलाया कि बरसों पहले, अपने दादा जी को मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ाते समय यही बात उन्होंने अपने दादा जी से कही थी। उनके दादा जी भी मुस्कुरा दिए थे।

भविष्य की पुतली दर्शा रही थी कि लगभग छह दशक बाद उनके पोते का पोता या पोती भी उससे यही कहेंगे। दादा जी दोबारा मुस्कुरा दिए।

जगत के पटल पर एक ही कथा का अनादि काल से मंचन हो रहा है। पात्र, श्रोता, दर्शक, पाठक निरंतर बदलते रहे हैं। कविता हो या कहानी, लघुकथा या  उपन्यास, जो सर्वदा समकालीन हो, वही साहित्य कालजयी कहलाता है।

 

# स्वस्थ रहें, घर पर रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

11.39 बजे, 8.4.2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ डायरी के पन्ने मात्र नहीं हैं जिंदगी ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की एक अत्यंत प्रेरक एवं शिक्षाप्रद लघुकथा डायरी के पन्ने मात्र नहीं हैं जिंदगी। निःशब्द, अतिसुन्दर लघुकथा, कथानक एवं कथाशिल्प। यह सत्य है कि यदि हम डायरी लिखते हैं ,तो वे दो डायरियां होती हैं। एक वह जो हम  कागज के पन्नों पर लिखते हैं और उसे आप पढ़ सकते हैं। दूसरी वह जो हम ह्रदय के पन्नों पर लिखते हैं जिसे सिर्फ हम ही पढ़ सकते हैं । ऐसी शख्सियत बिरली होती है जिनकी दोनों डायरियां एक सी होती हैं।  इस अतिसुन्दर रचना के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन। )

☆ लघुकथा – डायरी के पन्ने मात्र नहीं हैं जिंदगी

सामने रखी पुरानी डायरी के पन्ने फड़ फडा़ रहे थे और जबरन दबाई गयी यादें उससे भी अधिक उफन रहीं थीं।

ऐसा लगा अभी कल ही की तो बात है जब पिताजी ने कक्षा एक में नाम लिखवाया था – – कुछ दिनों पहले ही तो भैय्या ने रिजल्ट्स के पहले ही दोस्तों के पूछने पर कह दिया था कि राजी तो फ़र्स्ट क्लास पास हो गई है – कई बार ऊंचे खानदानों के रिश्ते  – -पिताजी ने लौटा दिए यह  कह कर कि “मेरी होनहार मेरिट वाली बिटिया है उसे चूल्हे चौके की भट्टी में नहीं झोंकना है उसे तो मैं बडी अफसर बनाऊंगा” – – – इतना भरोसा, इतना विश्वास, इतनी तमन्नाएं जहां जुड़ी हों वहां यकायक कैसे कह दे राजी कि वह पढाई अधूरी छोड़ कर दूसरी जाति के शिवम  के साथ सात फेरे ले चुकी है – – कि शिवम के वृद्ध बीमार माता-पिता की सेवा में उसे जीवन की रवानी मिल रही है

इसी उहापोह में एक दिन राजी ने डायरी में लिखा “भैय्या, मां और पिताजी बिस्तर पर पडे़ कराहते रहते हैं – टीनू मीनू गंदी यूनिफार्म में ही कई बार रोती हुई स्कूल चली जाती हैं। सबेरे नौ से पांच की ड्यूटी के बाद थक कर चूर भाभी बिखरे घर को समेटने में बेहाल सी लगी रहतीं हैं और रात को सोने से पहले पढीलिखी महिला की तरह डायरी लिखती हैं “आज का प्यारा दिन बीत गया – – आदि आदि। लेकिन भैया मैं ऐसा झूठा सच नहीं बनना चाहती। पढ लिख कर कामकाजी महिला की डायरी का झूठा पन्ना नहीं बनना चाहती। आप लोगों ने मुझे पढा लिखा कर बढ़िया पद पर कार्यरत महिला बनाने का सपना संजोया है लेकिन मखमली सपनों को कांटो के ताज में बदलते देखा है मैंने बुआ, भाभी और दीदी की जिंदगी में।

मैंने जीवन की डायरी का सच्चा पन्ना बनना स्वीकार किया है भैया। शिवम को उसके माता-पिता और बहन की चिंता से मुक्त करके उनके बिखरे घर को समेटने का संकल्प लिया है। आशीर्वाद दें कि मैं जिंदगी की इस परीक्षा में फर्स्ट क्लास फर्स्ट पास  होती रहूँ – – मैं डायरी का झूठा पन्ना नहीं बनना चाहती भैया आशीर्वाद दें कि जिंदगी का सच्चा प्रमाण पत्र बनूं”

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 42 ☆ समय की धार ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है एक सार्थक लघुकथा  समय की धार।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 42 – साहित्य निकुंज ☆

☆ समय की धार

इंदू की बाहर पोस्टिंग हो जाने बाद आज उसका फोन आया. वहां के सारे हालचाल सुनाए और निश्चितता से कहा बहुत मजे से जिंदगी चल रही है.

हमने ना चाहते भी पूछ लिया अब शादी के बारे में क्या ख्याल है यह सुनते ही उसका गला भर आया.

उसने कहा..” मां बाबूजी भी इस बारे में बहुत फोर्स कर रहे हैं लेकिन मन गवाही नहीं दे रहा कि अब फिर से वही जिंदगी शुरू की जाए पुराने दिन भुलाए नहीं भूलते.”

हमने समझाया ” सभी एक जैसे नही होते, हो सकता है कोई इतना बढ़िया इंसान मिले कि तुम पुराना सब कुछ भूल जाओ.”

“दी कैसे भूल जाऊं वह यादें… ,कितना गलत था मेरा वह निर्णय, पहले उसने इतनी खुशी दी और उसके बाद चौगुना दर्द , मारना -पीटना, भूखे रखना. उसकी मां जल्लादों जैसा व्यवहार करती थी.

मां बाप की बात को अनसुना करके बिना उनकी इजाजत के कोर्ट मैरिज कर ली और हमारे जन्म के संबंध एक पल में टूट गये.”

“देखो इंदु , अब तुम बीती बातों को भुला दो और अब यह आंसू बहाना बंद कर दो.”

दी यह मैं जान ही नहीं पाई कि जो व्यक्ति इतना चाहने वाला था वह शादी के बाद ही गिरगिट की तरह रंग कैसे बदलने लगा.”

“इंदु  अब तुम सारी बातों को समय की धार में छोड़ दो.”

“नहीं दी यह मैं नहीं भूल सकती मैंने अपने माता पिता को बहुत कष्ट दिया,

इसका उत्तर भगवान ने हमें दे दिया.”

“इंदु एक बात ध्यान रखना माता -पिता भगवान से बढकर है, वे अपनी संतान को हमेशा मांफ कर देते है.”

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : [email protected]

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