हिन्दी साहित्य☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 33 ☆ संतोष के शब्द आधारित दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी  के   “संतोष के शब्द आधारित दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर  सकते हैं . ) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 33 ☆

☆ संतोष के शब्द आधारित दोहे ☆

 

रामायण

रामायण से मिल रहा,सामाजिक संदेश

अनुशासन की सीख दे,सिखलाती परिवेश

 

रामनवमी

राम जन्म के शुभ दिवस,भरते मन उत्साह

रामनवमी के पर्व पर,हो आंनद अथाह

 

विज्ञान

नव निर्माण करता सदा,यह नवीन विज्ञान

कोरोना का करेगा,करके खोज  निदान

 

अरविंद

मन मनसिज हरते वही,सबके प्रभु गोविंद

खिलते जिनकी दया से,कीचड़ में अरविंद

 

अभिव्यक्ति

अभिव्यक्ति ही दर्शाती, मानव का व्यक्तित्व

वाणी में हो मधुरता,सुंदर रहे कृतित्व

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य – जाण ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक वात्सल्यमयी रचना ‘जाण’।  यह सत्य है कि  हम सब पैसों के लिए भागते हैं। जीवन में कई  क्षण आते हैं, जब लगता है कि पैसा ही  बहुत कुछ होता है । किन्तु, फिर एक क्षण ऐसा भी आता है जब लगता है कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य ☆

☆ जाण 

( करूण रस )

 

गेला लेक

दूर देशी

माऊलीचे

चित्त नेशी…….१

 

लागे मनी

हूर हूर

आठवांना

येई पूर…..२

 

एकुलता

लेक गेला

जीव झाला

हळवेला……३

 

पैशासाठी

गेला दूर

घरदार

चिंतातूर ….४

 

नाही वार्ता

नाही पत्र

अंतरात

चिंता सत्र…..५

 

एकलीच

वाट पाही

झाला  देह

भार वाही…..६

 

कोणे दिनी

पत्र आले

खूप सारे

पैसे  दिले…….७

 

हवा होता

त्याचा वेळ

लेकराने

केला खेळ……८

 

नाही तुला

काही कमी

देतो पैसे

दिली हमी ……९

 

वात्सल्याची

नाही जाण

माऊलीचा

गेला प्राण……१०

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य- कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे # 42☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

आचार्य सत्य नारायण गोयनका

(हम इस आलेख के लिए श्री जगत सिंह बिष्ट जी, योगाचार्य एवं प्रेरक वक्ता योग साधना / LifeSkills  इंदौर के हृदय से आभारी हैं, जिन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के महान कार्यों से अवगत करने में  सहायता की है। आप  आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के कार्यों के बारे में निम्न लिंक पर सविस्तार पढ़ सकते हैं।)  

आलेख का  लिंक  ->>>>>>  ध्यान विधि विपश्यना के महान साधक – आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी 

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  कविता / दोहे ☆ आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे # 42 ☆ प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(हम  प्रतिदिन आचार्य सत्य नारायण गोयनका  जी के एक दोहे को अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करने का प्रयास करेंगे, ताकि आप उस दोहे के गूढ़ अर्थ को गंभीरता पूर्वक आत्मसात कर सकें। )

आचार्य सत्य नारायण गोयनका जी के दोहे बुद्ध वाणी को सरल, सुबोध भाषा में प्रस्तुत करते है. प्रत्येक दोहा एक अनमोल रत्न की भांति है जो धर्म के किसी गूढ़ तथ्य को प्रकाशित करता है. विपश्यना शिविर के दौरान, साधक इन दोहों को सुनते हैं. विश्वास है, हिंदी भाषा में धर्म की अनमोल वाणी केवल साधकों को ही नहीं, सभी पाठकों को समानरूप से रुचिकर एवं प्रेरणास्पद प्रतीत होगी. आप गोयनका जी के इन दोहों को आत्मसात कर सकते हैं :

धर्म धर्म तो सब कहें, धर्म न समझे कोय

निर्मल मन का आचरण, सत्य धर्म है सोय  ।।

– आचार्य सत्यनारायण गोयनका

#विपश्यना

साभार प्रस्तुति – श्री जगत सिंह बिष्ट

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Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual ☆ श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – एकादश अध्याय (37) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

एकादश अध्याय

(भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना)

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ।। 37 ।।

ब्रम्हा देव से भी बड़े व्यापक देव महान

अक्षर आप ओंकार को , क्यों न करें प्रणाम  ।। 37 ।।

भावार्थ :  हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं।। 37 ।।

 

And why should they not, O great soul, bow to Thee who art greater (than all else), the primal cause even of (Brahma) the creator, O Infinite Being! O Lord of the gods! O abode of the universe! Thou art the imperishable, the Being, the non-being and That which is the supreme (that which is beyond the Being and non-being).।। 37 ।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

[email protected]

 

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Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 32 – Kindness ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem “Kindness .  This poem  is from her book “The Frozen Evenings”.)

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 32

☆ Kindness ☆

Kindness is an art

You were born with,

It was tattooed all over

On your nascent body;

After all, you were a child of grief!

 

There was so much

Heartlessness around,

That you kept rinsing

Your body with cheesy dips

Of kindness!

 

You will die

On the pyre of kindness,

Life has after all

Treated you with so much of callousness

That it needs to be balanced!

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 25 ☆ लघुकथा – सोच — ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक समसामयिक लघुकथा  “सोच —-”।  यह लघुकथा हमें  एक सकारात्मक सन्देश देती है।  परिवार के सभी सदस्यों को अपनी सोच बदलने की  आवश्यकता  है। वैसे  इस मंत्र को आज सभी  ने महसूस किया है एवं उसका अनुपालन भी हो रहा है। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस बेहद खूबसूरत सकारात्मक रचना रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 25 ☆

☆ लघुकथा – सोच —-

माँ ! भाभी की मीटिंग तो खत्म ही नहीं हो रही है.

तो तुझे क्या करना है? कुछ काम है भाभी से?

अरे नहीं,  लॉकडाउन की वजह से खाना बनानेवाली काकी तो नहीं आएगी ना? बर्तन, कपडे, झाडू-पोंछा सब करना पडेगा हमें?

हाँ, तो क्या हुआ? पहले नहीं करते थे क्या हम सब? कामवाली बाईयां तो अब कोरोना महामारी  खत्म होने के बाद ही आएगी. लॉकडाउन की वजह से कोई कहीं आ-जा नहीं सकता है.

हाँ वही तो मैं भी कह रही हूँ और भाभी हर समय अपने ऑफिस के काम में ही लगी रहती हैं, घर के काम कौन करेगा? निधि ने मुँह बनाते हुए कहा.

ओह, तो अब समझ आया कि तुझे भाभी की इतनी याद क्यों आ रही है – सुनयना मुस्कुराती हुई बोली- ये बता जब तक तेरे भैया की शादी नहीं हुई थी तो घर के काम कौन करता था ?

मैं और तुम, हाँ छुट्टी वाले दिन पापा और भैया भी हमारी मदद कर दिया करते थे.

तो आज भाभी का इतना इंतजार क्यों हो रहा है? हम सब आराम से घर में बैठे हैं और वो बेचारी सुबह से लैपटॉप पर आँखें गडाए काम कर रही है. उसमें से भी जब समय मिलता है तो उठकर घर के काम निपटा देती है. उसका भी तो मन करता होगा ना थोडा आराम करने का, वह इंसान नहीं है क्या ? चल उठ, हम दोनों जल्दी से रसोई का काम निपटा देते है. सबको मिलकर काम करना चाहिए,  बहू अकेले कितना काम करेगी?

शुभा आज बहुत थक गई थी, सिर में दर्द भी हो रहा था.  आठ दस घंटे काम करने के बाद भी मैनेजर का मुँह चढा ही रहता है, इसी बात को लेकर मैनेजर से झिक-झिक भी हो गई थी. कोरोना के कारण लोग घर बैठकर बिना काम के बोर हो रहे थे पर आई टी वालों को तो घर से काम करना था. वह अपने कमरे से निकल ही रही थी कि उसे अपनी सास और नंद निधि की बातचीत सुनाई दी. उसकी आँखें भर आईं वह सोचने लगी काश! ऐसी ही सोच समाज में सबकी हो जाए?

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – [email protected]  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जिजीविषा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – जिजीविषा ☆

संकट, कठिनाई,

अनिष्ट, पीड़ादायी,

आपदा, अवसाद,

विपदा, विषाद,

अरिष्ट, यातना,

पीड़ा, यंत्रणा,

टूटन, संताप,

घुटन, प्रलाप,

इन सबमें सामान्य क्या है?

क्या है जो हरेक में समाता है,

उत्कंठा ने प्रश्न किया..,

मुझे इन सबमें चुनौती

और जूझकर परास्त

करने का अवसर दिखता है,

जिजीविषा ने उत्तर दिया..!

घर में रहें। सकारात्मक रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

दोपहर 3: 24 बजे, सोमवार 9 मार्च 2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

[email protected]

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दुख की घड़ियां कटेंगी, मिलेगा जीवनदान ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

(प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा  रचित एक समसामयिक विशेष रचना ‘दुख की घड़ियां कटेंगी, मिलेगा जीवनदान। ) 

☆  दुख की घड़ियां कटेंगी, मिलेगा जीवनदान  ☆

करोना के कहर से कांप रहा संसार

हर चेहरा चिंतित दुखी देश और सरकार

रुकी है धड़कन विश्व की ठप्प है कारोबार

बंद सभी हैं घरों में बंद सकल व्यापार

 

सूनी सड़के बंद सब दफ्तर और स्कूल

स्थितियां सब बन गई जनजीवन प्रतिकूल

बच्चे  , बूढ़े कैद से है  हो रहे उदास

फिर भी कई एक मूर्ख हैं करने और विनाश

 

अपना खुद ही नासमझ करते सत्यानाश

शासन के आदेशों का करते जो उपहास

कैसे क्यों ? सहसा हुई बीमारी उत्पन्न

है दुनिया अनजान और वैज्ञानिक सब सन्न

 

शायद किया है मनुज ने कोई बड़ा अपराध

जिससे बढ़ती जा रही यह प्रतिदिन निर्बाध

आत्म निरीक्षण करें सब तथाकथित विद्वान

प्रकृति को छेड़ा है जिनने जैसे हों नादान

 

शायद मनुज की गलतियों का ही है परिणाम

जिसको देता रहा वह महाशक्ति का नाम

प्रेम भाव की हुई कमी बढा बैर विद्वेष

आपस के दुर्भाव को झेल रहा हर देश

 

बहुत जरूरी है बढ़े फिर ममता और प्रेम

अनुशासित हो कामना रीति नीति और नेम

यदि सचेत हो लोग सब तो न हो और बिगाड़

अनजानी कठिनाइयों के ना बढें पहाड़

 

यदि पनपे सद्भावना ना हो कोई निराश

क्रमशः बढ़ता जा सके आपस का विश्वास

धीरज से ही कटेगी यह अंधियारी रात

घना अंधेरा रात का देता नवल प्रभात

 

सब की गति मति एक हो तो मुश्किल आसान

कठिन तपस्या से सदा मिलते हैं भगवान

करो ना कुछ भी अटपटा तो ये करोना जाए

जीवन में संसार के फिर समृद्धि सुख आये

 

बढ़े न रोग ये इसका है एक ही सरल उपाय

स्वच्छ रहे , घर में रहे बाहर व्यर्थ न जाएं

दुख की घड़ियां कटेंगी मिलेगा जीवनदान

सबकी शुभ सदबुद्धि हो, विनय यही भगवान

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

[email protected]

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 43 – बुनियादी अंतर ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक व्यावहारिक लघुकथा  “बुनियादी अंतर। )

गौरव के क्षणयह हमारे लिए गर्व का विषय है कि – आदरणीय श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी को  हरियाणा में ‘आनंद सर की हिंदी क्लास’  नामक युटुब चैनल में आपका परिचय प्रसिद्ध साहित्यकार के रूप में छात्रों से कराया गया  जिसका प्रसारण गत रविवार  को हुआ।

स्मरणीय है कि आपकी रोचक विज्ञान की बाल कहानियों का प्रकाशन प्रकाशन विभाग भारत सरकार दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। वहीँ आपकी 121 ई बुक्स और इतनी ही लगभग कहानियां 8 भाषाओं में प्रकाशित और प्रसारित हो चुकी हैं और कई पुरस्कारों से नवाजा जा चूका है।

ई अभिव्यक्ति की और से हार्दिक शुभकामनाएं। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 43☆

☆ लघुकथा-  बुनियादी अंतर ☆

 

“जानते हो काका ! आज थानेदार साहब जोर-जोर से चक्कर लगा कर परेशान क्यों हो रहे है ?” रघु अपने घावों पर हाथ फेरने लगा, “मेरे रिमांड का आज अंतिम दिन है और वे चोरी का राज नहीं उगलवा सके.”

“तू सही कहता है रघु बेटा ! आज उन की नौकरी पर संकट आ गया है. इसलिए वे घबरा रहे है,” कह काका ने बीड़ी जला कर आगे बढ़ा दी.

“जी काका. इस जैसे-जलाद बाप ने मुझे मारमार कर बिगड़ दिया. वरना किसे शौक होता है, चोर बनने का.” यह कहते ही रघु ने अपना चेहरा घुमा लिया. उस के हाथ आंख पर पहुँच चुके थे.

मगर जैसी ही वह संयत हुआ तो काका की ओर मुड़ा, “काका हाथ पैर बहुत दर्द कर रहे है. यदि इच्छा पूरी हो जाती तो?”

“क्यों नहीं बेटा.” काका रघु के सिर पर हाथ फेर कर मुस्करा दिए. वे रघु की इच्छा समझ चुके थे.

कुछ ही देर में दारू रघु के हलक में उतर चुकी थी और ‘राज’ की मजबूत दीवार प्यार के स्नेहिल स्पर्श से भरभरा कर गिर चुकी थी .

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 42 ☆ मेरी रचना प्रक्रिया☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक आलेख  “ मेरी  रचना प्रक्रिया।  श्री विवेक जी ने  इस आलेख में अपनी रचना प्रक्रिया पर विस्तृत विमर्श किया है। आपकी रचना प्रक्रिया वास्तव में व्यावहारिक एवं अनुकरणीय है जो  एक सफल लेखक के लिए वर्तमान समय के मांग के अनुरूप भी है।  उनका यह लेख शिक्षाप्रद ही नहीं अपितु अनुकरणीय भी है। उन्हें इस  अतिसुन्दर आलेख के लिए बधाई। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 42 ☆ 

मेरी रचना प्रक्रिया

मूलतः व्यंग्य, लेख, विज्ञान, बाल नाटक,विज्ञान कथा, कविता आदि मेरी अभिव्यक्ति की विधायें हैं.

मेरे प्रिय व्यंग्य, रामभरोसे, कौआ कान ले गया, धन्नो बसंती और बसंत, खटर पटर, मिलीभगत, आदि मेरे लोकप्रिय व्यंग्य संग्रह हैं. जल जंगल और जमीन बाल विज्ञान की पुस्तक है जो प्रदेश स्तर पर प्राथमिक शालाओ में खूब खरीदी व सराही गई, हिंदोस्तां हमारा, जादू शिक्षा का, नाटक की पुस्तकें हैं.आक्रोश १९९२ में विमोचित पहला कविता संग्रह है.

मैं रचना को मन में परिपक्व होने देता हूं, सामान्यतः अकेले घूमते हुये, अधनींद में, सुबह बिस्तर पर, वैचारिक स्तर पर सारी रचना का ताना बाना बन जाता है फिर जब मूड बनता है तो सीधे कम्प्यूटर पर लिख डालता हूं. मेरा मानना है कि किसी भी विधा का अंतिम ध्येय उसकी उपयोगिता होनी चाहिये. समाज की कुरीतियो, विसंगतियो पर प्रहार करने तथा पाठको का ज्ञान वर्धन व उन्हें सोचने के लिये ही वैचारिक सामग्री देना मेरी रचनाओ का लक्ष्य होता है.

मेरी रचना का विस्तार कई बार अमिधा में सीधे सीधे जानकारी देकर होता है, तो कई बार प्रतीक रूप से पात्रो का चयन करता हूं. कुछ बाल नाटको में मैने नदी,पहाड़,वृक्षो को बोलता हुआ भी रचा है. अभिव्यक्ति की विधा तथा विषय के अनुरूप इस तरह का चयन आवश्यक होता है, जब जड़ पात्रो को चेतन स्वरूप में वर्णित करना पड़ता है.  रचना की संप्रेषणीयता संवाद शैली से बेहतर बन जाती है इसलिये यह प्रक्रिया भी अनेक बार अपनानी पड़ती है.

कोई भी रचना जितनी छोटी हो उतनी बेहतर होती है,न्यूनतम शब्दों में अधिकतम वैचारिक विस्तार दे सकना रचना की सफलता माना जा सकता है.  विषय का परिचय, विस्तार और उपसंहार ऐसा किया जाना चाहिये कि प्रवाहमान भाषा में सरल शब्दो में पाठक उसे समझ सकें.नन्हें पायको के लिये लघु रचना, किशोर और युवा पाठको के लिये किंचित विस्तार पूर्वक तथ्यात्मक तर्को के माध्यम से रचना जरूरी होती है. मैं बाल कथा ५०० शब्दों तक समेट लेता हूं, वही आम पाठको के लिये विस्तार से २५०० शब्दों में भी लिखता हूं. अनेक बार संपादक की मांग के अनुरूप भी रचना का विस्तार जरूरी होता है. व्यंग्य की शब्द सीमा १००० से १५००शब्द पर्याप्त लगती है. कई बार तो पाठको की या संपादक की मांग पर वांछित विषय पर लिखना पड़ा है. जब स्वतंत्र रूप से लिखा है तो मैंने पाया है कि अनेक बार अखबार की खबरों को पढ़ते हुये या रेडियो सुनते हुये कथानक का मूल विचार मन में कौंधता है.

मेरी अधिकांश रचनाओ के शीर्षक रचना पूरी हो जाने के बाद ही चुने गये हैं. एक ही रचना के कई शीर्षक अच्छे लगते हैं. कभी  रचना के ही किसी वाक्य के हिस्से को शीर्षक बना देता हूं. शीर्षक ऐसा होना जरूरी लगता है जिसमें रचना की पूरी ध्वनि आती हो.

मैंने  नाटक संवाद शैली में ही लिखे हैं. विज्ञान कथायें वर्णनात्मक शैली की हैं. व्यंग्य की कुछ रचनायें मिश्रित तरीके से अभिव्यक्त हुई हैं. व्यंग्य रचनायें प्रतीको और संकेतो की मांग करती हैं. मैं सरलतम भाषा, छोटे वाक्य विन्यास, का प्रयोग करता हूं. उद्देश्य यह होता है कि बात पाठक तक आसानी से पहुंच सके. जिस विषय पर लिखने का मेरा मन बनता है, उसे मन में वैचारिक स्तर पर खूब गूंथता हूं, यह भी पूर्वानुमान लगाता हूं कि वह रचना कितनी पसंद की जावेगी.

मेरी रचनायें कविता या कहानी भी नितांत कपोल कल्पना नही होती.मेरा मानना है कि कल्पना की कोई प्रासंगिकता वर्तमान के संदर्भ में अवश्य ही होनी चाहिये. मेरी अनेक रचनाओ में धार्मिक पौराणिक प्रसंगो का चित्रण मैंने वर्तमान संदर्भो में किया है.

मेरी पहचान एक व्यंग्यकार के रूप में शायद ज्यादा बन चुकी है. इसका कारण यह भी है कि सामाजिक राजनैतिक विसंगतियो पर प्रतिक्रिया स्वरूप समसामयिक व्यंग्य  लिख कर मुझे अच्छा लगता है, जो फटाफट प्रकाशित भी होते हैं.नियमित पठन पाठन करता हूं, हर सप्ताह किसी पढ़ी गई किताब की परिचयात्मक संक्षिप्त समीक्षा भी करता हूं. नाटक के लिये मुझे साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिल चुका है. बाल नाटको की पुस्तके आ गई हैं. इस सबके साथ ही बाल विज्ञान कथायें लिखी हैं . कविता तो एक प्रिय विधा है ही.

पुस्तक मेलो में शायद अधिकाधिक बिकने वाला साहित्य आज बाल साहित्य ही है. बच्चो में अच्छे संस्कार देना हर माता पिता की इच्छा होती है, जो भी माता पिता समर्थ होते हैं, वे सहज ही बाल साहित्य की किताबें बच्चो के लिये खरीद देते हैं. यह और बात है कि बच्चे अपने पाठ्यक्रम की पुस्तको में इतना अधिक व्यस्त हैं कि उन्हें इतर साहित्य के लिये समय ही नही मिल पा रहा.

आज अखबारो के साहित्य परिशिष्ट ही आम पाठक की साहित्य की भूख मिटा रहे हैं.पत्रिकाओ की प्रसार संख्या बहुत कम हुई है. वेब पोर्टल नई पीढ़ी को साहित्य सुलभ कर रहे हैं. किन्तु मोबाईल पर पढ़ना सीमित होता है, हार्ड कापी में किताब पढ़ने का आनन्द ही अलग होता है.  शासन को साहित्य की खरीदी करके पुस्तकालयो को समृद्ध करने की जरूरत है.

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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