हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 233 ☆ सर्वे भवन्तु सुखिनः… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना सर्वे भवन्तु सुखिनः। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 233 ☆ सर्वे भवन्तु सुखिनः

लोगों के मेलजोल का पर्व महाकुम्भ है, अथक परिश्रम, लंबा जाम, कई किलोमीटर की पैदल यात्रा के वावजूद लोग सपरिवार आस्था की डुबकी लगाने प्रयागराज आ रहे हैं। धैर्य के साथ जब कोई कार्य किया जाएगा तो उसके परिणाम सुखद होंगे। भारत के कोने- कोने से आते हुए लोग एकदूसरे को समझने का भाव रखते हैं। वास्तव में भारत की यही सच्ची तस्वीर है। यही कल्पना हमारे ऋषिमुनियों ने की थी जिसे योगी सरकार ने साकार कर दिया है।

माना कि कुछ असुविधा हो रही है किंतु जब नियत अच्छी हो तो ये सब स्वीकार्य है।

हमारे आचरण का निर्धारण कर्मों के द्वारा होता है। यदि उपयोगी कार्यशैली है तो हमेशा ही सबके चहेते बनकर लोकप्रिय बनें रहेंगे। रिश्तों में जब लाभ -हानि की घुसपैठ हो जाती है तो कटुता घर कर लेती है। अपने आप को सहज बना कर रखें जिससे लोगों को असुविधा न हो और जीवन मूल्य सुरक्षित रह सकें।

कोई भी कार्य करो सामने दो विकल्प रहते हैं जो सही है वो किया जाय या जिस पर सर्व सहमति हो वो किया जाए। अधिकांश लोग सबके साथ जाने में ही भलाई समझते हैं क्योंकि इससे हार का खतरा नहीं रहता साथ ही कम परिश्रम में अधिक उपलब्धि भी मिल जाती है।

सब कुछ मिल जायेगा पर कुछ नया सीखने व करने को नहीं मिलेगा यदि पूरी हिम्मत के साथ सच को स्वीकार करने की क्षमता आप में नहीं है तो आपकी जीत सुनिश्चित नहीं हो सकती।

शिखर तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं होता किन्तु इतना कठिन भी नहीं होता कि आप के दृढ़संकल्प से जीत सके। तो बस जो सही है वही करें उचित मार्गदर्शन लेकर, पूर्ण योजना के साथ।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 609 ⇒ परीक्षा की घड़ी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परीक्षा की घड़ी।)

?अभी अभी # 609 ⇒ परीक्षा की घड़ी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आपने कलाई घड़ी देखी होगी, दीवार घड़ी देखी होगी, टेबल क्लॉक भी देखी होगी, जिसे अलार्म क्लॉक भी कहते थे। जिन्होंने कोई घड़ी नहीं देखी, उन्होंने नूरजहां और सुरैया – सुरेन्द्र की अनमोल घड़ी तो अवश्य ही देखी होगी। आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है।

समय गतिमान है, चलायमान है। घड़ी कहीं जाती नहीं, फिर भी चलती रहती है। टिक, टिक, टिक चलती जाए घड़ी। घड़ी समय बताती है। घड़ी के कांटे सेकंड, मिनिट व घंटा दर्शाते हैं जब कि एक कैलेंडर दिन, महीने और साल दर्शाता है। जब सब कुछ नहीं था, तब भी समय था। जब सब कुछ नहीं रहेगा, तब भी समय मौजूद रहेगा।।

हमें परीक्षा के समय, घड़ी की बहुत याद आती थी। परीक्षा की तैयारी के लिए प्रिपरेशन लीव लग जाती। समय के पांव लग जाते। जैसे जैसे परीक्षा की घड़ी नजदीक आती, हम लोग टाइम टेबल बनाने बैठ जाते। टेबल पर एक टाइम पीस की भी ज़रूरत पड़ती, रात को जल्दी सोने और सवेरे जल्दी उठकर पढ़ने के लिए। जागने के अलार्म से हमारे अलावा सब जाग जाते थे। जितनी नींद परीक्षा के दिनों में आती थी, उतनी बाद में जीवन में कभी नहीं आई।

और आखिर वह दिन आ ही जाता, जिसका साल भर से इंतज़ार था। परीक्षा की घड़ी। समय इतना कीमती कभी नहीं हुआ। एक घड़ी कलाई पर भी सुशोभित हो जाती थी। समय से पहले परीक्षा हॉल में पहुंचना, असली जियरा धक धक तो वहीं होता था, लेकिन तब आंखों के सामने धक धक गर्ल नहीं, परीक्षा पत्र घूम रहा होता था।।

समय २.३० घंटे। सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। सरसरी निगाह से प्रश्न पत्र को पढ़ा जाता फिर श्री गणेशाय नमः लिखकर प्रश्न पत्र हल किया जाता। बार बार घड़ी पर निगाह जाती। लगता, घड़ी बहुत तेज चल रही है। समय कम पड़ रहा है। इतने में एक सज्जन उठते, विजयी मुद्रा में सबको देखते हुए उत्तर पुस्तिका निरीक्षक महोदय को सौंप बाहर निकल जाते। सभी जानते थे, उन्हें सफाई के पूरे नंबर अवश्य मिलेंगे और अगले वर्ष भी वे इसी कक्षा में मिलेंगे।

प्रश्न हल हों, न हों, परीक्षा की घड़ी को तो समाप्त होना ही है। आखिर आगे जीवन का इम्तहान भी तो देना है। कभी सुख के पल, तो कभी दुख की घड़ी। सुख के पलों के तो पंख लगे होते हैं, लेकिन दुख के दिन, बीतत नाहिं।।

नेपथ्य में सचिन देव बर्मन की आवाज गूंज रही है ;

यहां कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहां !

दम ले ले घड़ी भर, ये छैंया पाएगा कहां।

परीक्षा की घड़ी में केवल धैर्य ही काम आता है। समय कब किसी के लिए रुका है। किसी ने सही कहा है ;

समय का पंछी उड़ता जाए।

एक काला, एक उजला, पर फैलाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रहस्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – रहस्य ? ?

– कितना गूढ़ रहस्य हो तुम? बार-बार बार पढ़ता हूँ और हर बार बदला हुआ अर्थ पाता हूँ।

– मैं तो खुली किताब हूँ। कहीं से भी पढ़ सकते हो। …हाँ, पर याद रहे, जब भी पढ़ोगे, एक नए अर्थ के साथ मिलूँगा।…और इसका कारण मैं नहीं, स्वयं तुम हो। जानते हो क्यों? …क्योंकि हर बार तुम्हारा अनुभव अधिक समृद्ध हो जाता है। हर बार तुम नई दृष्टि से मुझे पढ़ते हो और अर्थ नया हो जाता है।

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 मकर संक्रांति मंगलवार 14 जनवरी 2025 से शिव पुराण का पारायण महाशिवरात्रि तदनुसार बुधवार 26 फरवरी को सम्पन्न होगा 💥

 🕉️ इस वृहद ग्रंथ के लगभग 18 से 20 पृष्ठ दैनिक पढ़ने का क्रम रखें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 608 ⇒ पवन-मुक्तासन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पवन-मुक्तासन।)

?अभी अभी # 608 ⇒ पवन-मुक्तासन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पवन तो वैसे ही मुक्त है, हम उसे और मुक्त क्या करेंगे। पंच तत्वों में वायु भी एक प्रमुख तत्व है। हमारी सृष्टि और देह दोनों ही इन पंच-तत्वों से निर्मित हुई है। वायु जिसे आप हवा भी कह सकते हैं, मुक्त तो है ही, कलयुग होते हुए भी आज तक मुफ़्त भी है। हमने पानी तक तो बेच दिया, अब हवा की बारी है। मैंने एक पेट्रोल पंप पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा देखा, मुफ़्त हवा ! मुझे बड़ी खुशी हुई, सोचा चलो हवा तो मुफ्त है। ज़माने की हवा, और बढ़ते प्रदूषण में अगर कहीं ताज़ी हवा मिल जाए, तो मुँह से वाह नहीं, वाह वाह निकलता है।

ओ बसंती पवन पागल ! ना जा रे ना जा, रोको कोई। लेकिन कौन रोक पाया इस पागल पवन को ! इसे मुक्त ही रहने दो। योग के आठ अंगों में से एक अंग आसन है, वैसे तो इंसान की जितनी योनियाँ, उतने आसन, लेकिन एक आसन पवन-मुक्तासन भी है, जो शरीर की अपान वायु को मुक्त कर, पान-अपान का संतुलन बनाए रखता है।।

हमारे शरीर में पान अपान वायु का ही नहीं, व्यान, उदान और समान का भी अस्तित्व है। अपान वायु को बोलचाल की भाषा में वायु विकार कहते हैं। जो नियमित प्राणायाम नहीं कर पाते, वे पवन मुक्तासन से ही काम चला सकते हैं।

रात में जो अधिक देरी से भोजन करते हैं, देर रात की पार्टियों में गरिष्ठ, स्वादिष्ट और स्पाइसी खाना सूत लेते हैं, वे वायु-विकार को भी न्यौता दे चुके होते हैं। केवल एक पान खा लेने से अपान का तो बाल भी बाँका नहीं हो पाता।।

सुबह उठते ही अगर थोड़ा कुनकुना पानी पीकर पवन मुक्तासन कर लिया जाए, तो दिन भर के वायु विकार से कुछ हद तक मुक्ति तो मिल ही जाए। पुराने घरों में सुबह सुबह बुजुर्गों के मुँह से मंत्रों के बीच, वातावरण में एक आवाज़ और गूँजती थी, जिसका, घर का हर सदस्य आदी हो चुका होता था। हाँ, छोटे छोटे बच्चे कुछ समझ नहीं पाते थे।

आयुर्वेद के हिसाब से हमारे शरीर की हर बीमारी की जड़ पेट की खराबी है। पेट में रात का खाना जो पच नहीं पाता, वह अपच, खट्टी डकार, एसिडिटी और वायु विकार को जन्म देता है। वैद्यराज मरीज की नाड़ी देखते ही कोष्ठबद्धता घोषित कर देते हैं, और इसबगोल और एनीमा पर उतर आते हैं।।

पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख, जेब में हो माया ! जेब में तो बहुत माल भरा है, और पेट में कचरा, तो ऊपर से तो सब अच्छा अच्छा, यानी गुड गुड, और अंदर पेट में गुड़-गुड़। और ऐसे में अगर पवन मुक्त हो गई, तो शरमासन और मुक्त-हँसासन। इससे बेहतर सुबह कुछ समय हल्के व्यायाम, योगासन एवं प्राणायाम को दिया जाए, खुद भी खुली हवा में साँस लें और औरों को भी लेने दें।

कल शाम ही एक शोक-सभा में किसी ने गुप्त-पवन मुक्तासन कर दिया, कुछ ने आँखों के आँसू पोंछने के बहाने रूमाल निकाले, तो कुछ शोक सभा अधूरी छोड़कर ताज़ी बासंती हवा खाने हॉल के बाहर चले गए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ढाई आखर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ढाई आखर ? ?

प्रेम अबूझ, प्रेम अपरिभाषित…, प्रेम अनुभूत, प्रेम अनभिव्यक्त..। प्रेम ऐसा मोहपाश जो बंधनों से मुक्त कर दे, प्रेम क्षितिज का ऐसा आभास जो धरती और आकाश को पाश में आबद्ध कर दे। प्रेम द्वैत का ऐसा डाहिया भाव कि किसीकी दृष्टि अपनी सृष्टि में देख न सके, प्रेम अद्वैत का ऐसा अनन्य भाव कि अपनी दृष्टि में हरेक की सृष्टि देखने लगे।

ब्रजपर्व पूर्ण हुआ। कर्तव्य और जीवन के उद्देश्य ने पुकारा। गोविंद द्वारिका चले। ब्रज छोड़कर जाते कान्हा को पुकारती सुधबुध भूली राधारानी ऐसी कृष्णमय हुई कि ‘कान्हा, कान्हा’ पुकारने के बजाय ‘राधे, राधे’ की टेर लगाने लगी। अद्वैत जब अनन्य हो जाता है राधा और कृष्ण, राधेकृष्ण हो जाते हैं। योगेश्वर स्वयं कहते हैं, नंदलाल और वृषभानुजा एक ही हैं। उनमें अंतर नहीं है।

रासरचैया से रासेश्वरी राधिका ने पूछा, “कान्हा, बताओ, मैं कहाँ-कहाँ हूँ?” गोपाल ने कहा, “राधे, तुम मेरे हृदय में हो।” विराट रूपधारी के हृदय में होना अर्थात अखिल ब्रह्मांड में होना।..”तुम मेरे प्राण में हो, तुम मेरे श्वास में हो।” जगदीश के प्राण और श्वास में होना अर्थात पंचतत्व में होना, क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर में होना।..”तुम मेरे सामर्थ्य में हो।” स्रष्टा के सामर्थ्य में होना अर्थात मुरलीधर को गिरिधर करने की प्रेरणा होना। कृष्ण ने नश्वर अवतार लिया हो या सनातन ईश्वर होकर विराजें हों, राधारानी साथ रहीं सो कृष्ण की बात रही।

“लघुत्तम से लेकर महत्तम चराचर में हो। राधे तुम यत्र, तत्र, सर्वत्र हो।”

श्रीराधे ने इठलाकर पूछा, “अच्छा अब बताओ, मैं कहाँ नहीं हूँ?” योगेश्वर ने गंभीर स्वर में कहा, “राधे, तुम मेरे भाग्य में नहीं हो।”

प्रेम का भाग्य मिलन है या प्रेम का सौभाग्य बिछोह है? प्रेम की परिधि देह है या देहातीत होना प्रेम का व्यास है?

परिभाषित हो न हो, बूझा जाय या न जाय, प्रेम ऐसी भावना है जिसमें अनंत संभावना है।कर्तव्य ने कृष्ण को द्वारिकाधीश के रूप में आसीन किया तो प्रेम ने राधारानी को वृंदावन की पटरानी घोषित किया। ब्रज की हर धारा, राधा है। ब्रज की रज राधा है, ब्रज का कण-कण राधा है, तभी तो मीरा ने गुसाईं जी से पूछा था, “ठाकुर जी के सिवा क्या ब्रज में कोई अन्य पुरुष भी है?”

प्रेमरस के बिना जीवनघट रीता है। जिसके जीवन में प्रेम अंतर्भूत है, उसका जीवन अभिभूत है। विशेष बात यह कि अभिभूत करनेवाली यह अनुभूति न उपजाई न जा सकती है न खरीदी जा सकती है।

प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय

राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।

इस ढाई आखर को मापने के लिए वामन अवतार के तीन कदम भी कम पड़ जाएँ!

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© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 607 ⇒ निःशुल्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “निःशुल्क।)

?अभी अभी # 607 ⇒ निःशुल्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निःशुल्क कहें या मुफ़्त ! क्या कोई फर्क पड़ता है। मुफ़्तखोर पहले तो मुफ्त का माल ढूँढते हैं और बाद में निःशुल्क शौचालय तलाश करते हैं। 25 %डिस्काउंट और बिग बाजार के महा सेल में एक के साथ एक फ्री को आप क्या कहेंगे। वहाँ छूट भी है, मुफ्त भी है और शुल्क भी। लेकिन निःशुल्क कुछ भी नहीं है।

हमारे घर अखबार आता है, उस पर शुल्क लिखा होता है। वही अखबार अगर आप पड़ोसी के यहाँ अथवा वाचनालय में पढ़ते हैं, तो निःशुल्क हो जाता है।।

गर्मी में दानदाता और पारमार्थिक संस्थाएँ जगह जगह ठंडे पानी की प्याऊ खोलते थे,  वे निःशुल्क होती थी लेकिन उन पर ऐसा लिखा नहीं होता था, क्योंकि तब पीने के पानी के पैसे नहीं लिए जाते थे। जब से पीने का पानी बोतलों में बंद होने लगा है, वह बिकाऊ हो गया है।

घोर गर्मी और पानी के अभाव में नगर पालिका पानी के टैंकरों से निःशुल्क जल-प्रदाय करती थी। लोग पानी के टैंकर के आगे बर्तनों की लाइन लगा दिया करते थे। सार्वजनिक स्थानों के नल और ट्यूब वेल की भी यही स्थिति होती थी। लेकिन पानी बेचा नहीं जाता था।।

समय के साथ पानी के भाव बढ़ने लगे। नई विकसित होती कालोनियों के बोरिंग सूखने लगे। पानी बेचना व्यवसाय हो गया। प्राइवेट पानी के टैंकर सड़कों पर दौड़ने लगे। अब पानी निःशुल्क नहीं मिलता।

शहरों में चिकित्सा बहुत महँगी है ! एलोपैथी के डॉक्टर कंसल्टेशन फीस लेते हैं, वे मुफ्त में इलाज नहीं करते। आयुर्वेदिक चिकित्सा में निःशुल्क परामर्श उपलब्ध होता है। पातंजल औषधालय हो अथवा कोई आयुर्वेदिक दुकान, निःशुल्क चिकित्सा के बोर्ड लगे देखे जा सकते हैं। बस दवाइयों की कीमत मत पूछिए।।

कुछ नागरिक, समाजसेवी संस्थाओं को अपनी स्वैच्छिक सेवाएँ प्रदान करते हैं। मुफ़्त सलाह और निःशुल्क सेवाएं देने वाले को मानद भी कहते हैं। उनकी निःशुल्क सेवाओं को सम्मान प्रदान करने के लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द गढ़ा गया है,  ऑनरेरी।

समाज की विभिन्न विधाओं में निःस्वार्थ सेवाएं प्रदान करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों को ऑनरेरी डॉक्टर ऑफ लॉज़ की डिग्री से विभूषित किया जाता है। इनमें ललित कलाओं में पारंगत विद्वानों और कलाकारों को बिना डिग्री के डॉक्टर बना दिया जाता है। किसी भी सेलिब्रिटी को ऐसा डॉक्टर बनने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता।।

क्या मनुष्य जीवन हमें माँगने से मिला है,  या फिर हमने इसकी कोई कीमत चुकाई है ? मुफ़्त में कहें,  या निःशुल्क मिली यह ज़िन्दगी कितनी अनमोल है। ‌अक्सर लोग बड़े शिकायत भरे लहजे में कहते हैं, हमने पूरी ज़िंदगी निःस्वार्थ सेवा और त्याग में बिता दी और बदले में हमें क्या मिला।

‌वे भूल जाते हैं, इतना बहुमूल्य मानव जीवन उन्हें बिना कौड़ी खर्च किये मिला है। जिसने आपको यह जीवन दिया है, यह उसकी अमानत है। इसमें खयानत न करते हुए, कबीर की तरह इस चदरिया को ज्यों की त्यों रख देंगे तो यही एक बड़ा अहसान होगा। जो ज़िन्दगी आपको मुफ्त में मिली, आप उसकी क़ीमत लगा रहे हैं। मुझको क्या मिला।।

कुछ लोग निःशुल्क खुशियाँ बाँटते हैं। कितनी भी परेशानियां हों,  हमेशा मुस्कुराहट उनके चेहरे पर नज़र आती है। दो शब्द मीठा बोलने में पैसे नहीं लगते।

व्यक्तित्व की महक, तड़क-भड़क और महँगे प्रसाधनों से नहीं होती। प्रसन्नता travel करती है। बस में यात्रा करते समय,  किसी माँ की गोद में खिलखिलाता बच्चा,  बरबस सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह जिसकी ओर मुस्कान फेंकता है, वह मुग्ध हो जाता है। यह सब बस किराये में शामिल नहीं होता। निःशुल्क होता है।

गर्मियों में जब सुबह ठंडी हवा चलती है, और आप सैर के लिए निकलते हैं, तो वातावरण में रातरानी की खुशबू शामिल होती है। प्रकृति ने यह सब व्यवस्था आपके लिए निःशुल्क की है। आप इसकी कीमत केवल खुश रहकर, प्रसन्न रहकर,  और औरों को प्रसन्न रखकर ही चुका सकते हैं। जो निःशुल्क मिला है, उसे अपने पास नहीं रखें,  निःशुल्क ही आपस में बांट लें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 335 ☆ कविता – “मृत्यु का भय…” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 335 ☆

?  आलेख – मृत्यु का भय…  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भगवान गरुड़ उड़ान भरते हुये पाटिलपुत्र में एक विष्णु मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे उन्होने देखा कि  मंदिर की मुंडेर पर बैठा एक कबूतर कांप रहा था। गरुड़ जी को दया भाव जागृत हुआ, उन्होंने कबूतर से इसका कारण पूछ लिया। कबूतर ने बताया कि एक ज्योतिषाचार्य ने उसे बताया है कि कल प्रातःकाल उसकी मौत हो जाएगी। इसलिये अपनी आसन्न मृत्यु को सोचकर डर रहा हूं।

गरुड़ जी को कबूतर पर दया आ गई और उन्होंने कबूतर को यमदूतों से छिपा देने का निर्णय लिया। गरुड़ जी ने कबूतर को मलयगंध पर्वत की एक सुरक्षित गुफा में जाकर छिपा दिया, और उसे कहा कि अब तुम निश्चिंत रहो यहां यम दूत पहुंच ही नहीं सकते।

फिर गरुड़राज उड़कर यमलोक जा पहुंचे और हंसकर यमराज को बताया कि वे किस प्रकार कबूतर को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा चुके हैं। यमराज ने मुस्कराते हुये कबूतर का लेखा-जोखा मंगवाया। व्यवस्था थी कि पाटिलपुत्र के विष्णु मंदिर में रहने वाले कबूतर की मृत्यु अमुक तिथि को मलयगंध पर्वत की गुफा में सर्प द्वारा भक्षण किये जाने से होगी। गरुड़ जी विस्मित रह गए और तुरंत लौट कर पर्वत पर जा पहुंचे, उन्होने देखा कि एक सांप कबूतर को निगल रहा है। गरुड़ जी यह सोचकर बहुत दुखी हुये कि मैं रक्षा करने के उद्देश्य से इसे यहां लाया था, लेकिन अब मेरे ही कारण इसकी जान चली गई।

कलियुग में उस कबूतर ने अतीक अहमद नामक माफिया बनकर धरती पर जन्म लिया, वह अपने कुकर्मो की सजा भोगता साबरमती जेल में बन्द था। उसे नैनी जेल ले जाया जा रहा था। अतीक को जेल से जेल शिफ्ट करने वाली, माफिया विकास यादव के एनकाउंटर की कथा याद आ रही थी। वह डर से सारी राह कांप रहा था। जब वह सकुशल नैनी जेल की बैरक में पहुंच गया तो उसने भयग्रस्त होते हुये भी किंचित मुस्कराते हुये अपने आकाओ की  ताकत पर भरोसा कर चैन की सांस ली।

तभी पास ही कहीं लाउड स्पीकर पर भागवत की कथा चल रही थी। कथा वाचक बता रहे थे कि जब गरुड़ जी द्वारा कबूतर को मलय पर्वत पर छिपा देने और वहां उसकी मृत्यु की घटना की जानकारी भगवान विष्णु को हुई तो भगवान ने गरुड़ जी को समझाया कि जन्म की तरह सबका मरण भी सुनिश्चित है। नियत समय, स्थान और नियत कारक से मरने से कोई बचता नहीं।

पता नहीं कि माफिया डान यह सुन सका या नहीं कि कथा सार में यह भी बताया गया कि मृत्यु तो टाली नहीं जा सकती इसलिये समय रहते जीवन का सदुपयोग कर लेना चाहिये।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 606 ⇒ आनंद मठ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आनंद मठ।)

?अभी अभी # 606 ⇒ आनंद मठ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर आपसे पूछा जाए, आप सुखसागर में रहना पसंद करोगे अथवा आनंद मठ में, तो आपका क्या जवाब होगा। जाहिर है, सुखसागर में तो मोती ही मोती होंगे, और आनंद मठ में हो सकता हो, परमानंद हो, लेकिन वह एक मठ है, तो वहां का कुछ अनुशासन भी होगा, कानून कायदे भी होंगे। हमें स्वर्ग तो चाहिए, लेकिन अनुशासन नहीं। इसलिए किसी मठ से सुखसागर ही भला।

इसी तरह स्वर्ग और नर्क के ऑप्शन में सभी प्रविष्टियां स्वर्ग की ही पाईं जाती हैं, नर्क में तो लोगों को जबरदस्ती धकेला जाता है। रोजी रोटी के लिए कुछ कमाना और स्वर्ग के लिए पुण्य कमाना दोनों अलग अलग विषय हैं। सोचो साथ क्या जाएगा जो कहता है, वह क्या नेकी करके दरिया में बहा देता है। क्या करें, मरते दम तक नेकी नहीं छूटती।।

लेकिन हम चाहे किसी आनंद मठ में रहें अथवा सुखसागर में, ताजी हवा की तरह, दुख का झोंका भी जीवन में कभी कभी आता ही है। दुख अपना भी हो सकता है और पराए का भी। बिना बुलाया मेहमान होता है यह दुख, जो न समय देखता है न दिन रात। कोई आने की खबर, चिट्ठी पत्री नहीं, फोन, एसएमएस नहीं।

जब जीवन में सुख आता है तो हम उसका खुशी खुशी स्वागत करते हैं, हार फूल और बैंड बाजा बारात तक बात चली जाती है, लेकिन जहां अचानक गम की बदली छाई, हमें नानी याद आई। एकदम गले में सहगल उतर आते हैं, हाय हाय ये जालिम जमाना।।

लोगों ने उस दीनदयाल के दरबार में कितनी अर्जियां लगाई, दुख हरो द्वारकानाथ, कितनी आरतियां गाई, ओम जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे। प्रार्थना और प्रसाद से थोड़ा दुख जरूर कम हो जाता है लेकिन पूरी तरह जाने का नाम फिर भी नहीं लेता।

सुख पर दुख का शासन है अथवा दुख पर सुख का, यह जानना इतना आसान भी नहीं। लेकिन जहां भी सुखसागर अथवा आनंद मठ होगा, वहां दुख दर्द, करुणा, दया, और ममता का अनुशासन भी होगा। मीठे के साथ थोड़ा नमकीन भी। फूल के साथ कांटे भी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 232 ☆ व्यवहार का केंद्रीकरण… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना व्यवहार का केंद्रीकरण। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 232 ☆ व्यवहार का केंद्रीकरण

समय के साथ व्यवहार का बदलना कोई नयी बात नहीं है। परिवर्तन तो प्रकृति भी करती है, तभी तो दिन रात होते हैं, पतझड़ से हरियाली, फिर अपने चरम उत्कर्ष पर बहारों का मौसम ये सब हमें सिखाते हैं समय के साथ बदलना सीखो, भागना और भगाना सीखो, सुधरना और सुधारना सीखो।

ये सारे ही शब्द अगर हम क्रोध के वशीभूत होकर सुनेंगे तो इनका अर्थ कुछ और ही होगा किंतु सकारात्मक विचारधारा से युक्त परिवेश में कोई इसे सुने तो उसे इसमें सुखद संदेश दिखाई देगा।

जैसे भागना का अर्थ केवल जिम्मेदारी से मुख मोड़ कर चले जाना नहीं होता अपितु समय के साथ तेज चलना, दौड़ना, भागना और औरों को भी भगाना।

सबको प्रेरित करें कि अभी समय है सुधरने का, जब जागो तभी सवेरा, इस मुहावरे को स्वीकार कर अपनी क्षमता अनुसार एक जगह केंद्रित हो कार्य करें तभी सफलता मिलेगी।

***

नेह की डोरी सजोते, साथ जीवन भर चले।

सत्य की अनुपम कहानी, सुन सुनाकर ही पले।।

चेतनामय हो मधुरता, जोड़कर सबको रखे।

 राम सीताराम सीता, नित्य रसना यह चखे।।

***

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 605 ⇒ खेत और बागड़ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खेत और बागड़।)

?अभी अभी # 605 ⇒ खेत और बागड़ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

खेत अगर फसल है तो बागड़ उसकी हद और सुरक्षा। खेत बिना बागड़ के हो सकते हैं, घर बिना छत और दीवार के नहीं। ईश्वर की इस बेहद सुंदर वसुंधरा का कोई आदि नहीं, कोई अंत नहीं। ना कोई हद, ना कोई छत और ना कोई दरो दीवार। यह पृथ्वी स्वयं अपने आप में स्वर्ग का द्वार है। खुला आसमान ही इसकी छत है और सूरज, चांद सितारे, इसकी आंख के तारे।

हम बच्चे इसके आंगन में घर घर खेलते हैं। हम अपने घर, अपनी छत, अपनी दीवार, अपनी गृहस्थी अलग बना लेते हैं। जमीन को बांट लेते हैं, अपना देश, अपना संविधान और अपना झंडा बना लेते हैं और दुनिया में एकता, प्रेम, शांति और भाईचारे की बातें करते हैं। फिर भी भारत में महाभारत होता है और विश्व में विश्व युद्ध।।

जीवः जीवस्य भोजनं। इंसान जिंदा रहने के लिए कुछ तो खाएगा ही। कुछ खाने के लिए उसे कुछ बोना भी पड़ेगा। वनस्पति और प्राणी दोनों में जीव है, जिनके कारण ही यह सृष्टि सजीव है। यह सब इस पृथ्वी पर मौजूद पांच तत्वों का ही प्रताप है जिसे हम पंच तत्व कहते हैं।

आइए खेत पर चलें ! कृषि हमारा प्रमुख उद्योग रहा है। काम के बदले अनाज ही, कभी हमारी आर्थिक व्यवस्था थी। अनाज से आप कुछ भी खरीद सकते थे। हमने अन्न का अकाल भी देखा है और कृषि की क्रांति भी। आप जवाहर लाल को भले ही भूल जाएं, लाल बहादुर को नहीं भूल सकते। आज किसान के भले के लिए ही कानून बनाए और वापस लिए जा रहे हैं। खेत खामोश है, बागड़ परेशान।।

हमने भी एक खेत बोया है लोकतंत्र का, जहां संविधान के अनुसार ही फसल बोई और काटी जाती है। खेत का मालिक और किसान एक चुनी हुई सरकार होती है और उस खेत की सुरक्षा के लिए उसकी हद और बागड़ की भी संवैधानिक व्यवस्था है, जिसे आप चाहें तो विपक्ष कह सकते हैं।

जब तक खेत और बागड़ में आपसी समझदारी है, तालमेल है, खेत भी सुरक्षित है और फसल भी। बागड़ थोड़ी सूखी और कंटीली जरूर होती है, लेकिन जानवरों से खेत को दूर रखने में मदद करती है। कभी कभी जब बागड़ की नीयत हरी हो जाती है, यह फसल पर ही डोरे डालना शुरू कर देती है और खेत बागड़ एक हो जाते हैं।।

कोई बागड़, कोई दीवार, कोई सुरक्षा लोकतंत्र के इस खेत पर अगर मौजूद नहीं हुई तो फिर इसकी फसल का तो भगवान ही मालिक है। रासायनिक खाद का जहर वैसे ही लोगों की सेहत और खेत की मिट्टी खराब कर रहा है, बागड़ और खेत के बीच कोई नफरत के बीज ना फैलाए। खेत की फसल लोगों तक पहुंचे, किसान को उसका उचित मूल्य मिले, फिर से हो एक ही धरती और एक ही आसमां। कितना सुहाना हो वह समा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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