(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आस्था के आयाम…“।)
अभी अभी # 486 ⇒ आस्था के आयाम… श्री प्रदीप शर्मा
आस्था, आत्मा का आलंबन है ! अपने अलावा किसी और के अस्तित्व का इस्तेकबाल है आस्था। आस्था एक ऐसा कपालभाति व्यायाम है, जिसमें अपने आराध्य को सुबह-शाम श्रद्धा की अगरबत्ती लगाई जाती है, अनुलोम-विलोम की तरह उसका मन ही मन गुणगान किया जाता है, और जब यह आस्था भक्ति में परिवर्तित हो जाती है, तो भस्रिका की तरह साँसों में गतिशील हो जाती है।
आस्था आत्मा का सुबह का नाश्ता है। प्रातः उठते ही जब हम किसी अज्ञात शक्ति को नमन करते हैं, तो यह एक तरह से यह हमारी अस्मिता और अहंकार का समर्पण है। कोई तो है, जो हमारे हम से कम नहीं।।
यह आस्था की सुबह है ! एक बार मुँह धोने के बहाने देखा, और आस्था को आसक्ति ने ढँक लिया ! यह अनजाने ही होता है। अपना चेहरा किसी को बुरा नहीं लगता। बढ़ती उम्र के साथ चेहरे पर छाई झुर्रियों को, सौंदर्य प्रसाधनों से छुपाया जाता है, सफ़ेद होते बालों पर हिज़ाब लगाया जाता है। यह खुद पर खुद का विश्वास है। एक तरह का आत्म-विश्वास है, जिजीविषा है, जिसका एक ठोस आधार है, हम किसी से कम नहीं।
आस्था के कई सोपान हैं ! बचपन में जो माता-पिता, गुरुजन और अपने इष्ट के प्रति है वही आस्था उत्तरोत्तर विकसित व पल्लवित हो, आदर्श एवं संस्कार का रूप धारण कर लेती है। यही आस्था उसे आत्म-कल्याण हेतु किसी मार्गदर्शक, रहबर अथवा सद्गुरु के चरणों तक ले जाती है।।
जब जीवन में कभी आस्था पर चोट पहुँचती है, मनुष्य का नैतिक धरातल डगमगा जाता है। जब किसी की आस्था के साथ खिलवाड़ होता है, उसकी आत्मा पर ज़बर्दस्त आघात पहुंचता है। मनुष्य के नैतिक पतन का मुख्य कारण उसकी आस्था का कमज़ोर होना है।
ऐसी परिस्थिति में आस्था का स्थान अनास्था ले लेती है। जो आस्था दुःख के पहाड़ को गिरधर गोपाल की भाँति एक अंगुली पर धारण करने में सक्षम होती है, अनास्था के बादल के छाते ही रणछोड़ की तरह मैदान से भाग खड़ी होती है। आप सब कुछ करें, लेकिन जीवन में कभी किसी की आस्था के साथ खिलवाड़ ना करें। आस्था ही आकाश है, आस्था ही जीवन ! आस्था अमूल्य है, अमिट है। आस्था ही ईश्वर है।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सार्थक सोच बनाम सफलता। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(साहित्य वार्ता : जानिए राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त डॉ. मुक्ता जी के बारे मे श्री राजेंद्र आर्य जी द्वारा)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 251 ☆
☆ सार्थक सोच बनाम सफलता ☆
‘दु:ख के दस्तावेज़ हों या सुख के कागजा़त/ ध्यान से देखोगे तो नीचे ख़ुद के ही दस्तख़त पाओगे’ से स्पष्ट है कि मानव अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। दूसरे शब्दों में वह भाग्य-विधाता है। परंतु यदि वह सत्कर्म करता है तो उसे अच्छा फल मिलेगा और यदि वह किसी का अहित अर्थात् बुरे कर्म करता है तो उसका फल भी बुरा व हानिकारक होगा। उसकी निंदा होगी, क्योंकि जैसे वह कर्म करेगा, वैसा ही फल पाएगा। जीवन में यदि आप किसी का भला करेंगे, तो भला होगा, क्योंकि भला का उल्टा लाभ होता है। यदि जीवन में किसी पर दया करोगे तो वह याद करेगा, क्योंकि दया का उल्टा याद होता है। सो! यह आप पर निर्भर करता है कि आप परहित व करुणा की राह अपनाते हैं या दूसरों के अधिकारों का हनन कर गलत कार्यों की ओर प्रवृत्त होते हैं।
सो! अपने कर्मों के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं।
हमें सोच-समझकर यह देख लेना चाहिए कि जो कार्य हमारे लिए हितकारक हैं, उनसे किसी का अहित व हानि तो नहीं हो रही, क्योंकि अधिकार व कर्त्तव्य अन्योश्रित हैं। जो हमारे अधिकार हैं, दूसरों के कर्त्तव्य हैं और दूसरों के कर्त्तव्य हमारे अधिकार। सो! हमारे लिए मौलिक अधिकारों के सैद्धांतिक के पक्ष को समझना अत्यंत आवश्यक है।
सुख-दु:ख मेहमान हैं। थोड़ा समय ठहरने के पश्चात् लौट जाते हैं। इसलिए उनसे घबराना कैसा? ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं अर्थात् परिवर्तन सृष्टि का नियम है। प्रकृति के
सभी उपादान यथासमय अपने-अपने कार्य में रत रहते हैं। आवश्यकता है, इनसे प्रेरित होने की– सूर्य अकेला रोज़ चमकता है और उसकी आभा कभी कम नहीं होती। चांद-सितारे भी समय पर उदित व अस्त होते हैं तथा कभी थकते नहीं। मौसम भी क्रमानुसार बदलते रहते हैं। इसलिए मानव को कभी भी निराशा का दामन नहीं थामना चाहिए, क्योंकि जो आया है; उसका लौट जाना निश्चित् है।
महत्वपूर्ण सफलताएं ना तो भाग्य से मिलती हैं; ना ही सस्ती पगडंडियों के सहारे काल्पनिक उड़ान भरने से मिलती हैं। उसके लिए योजनाबद्ध ढंग से अनवरत पुरुषार्थ व परिश्रम करना पड़ता है। योग्यता बढ़ाना, साधन जुटाना और बिना थके साहस-पूर्वक अनवरत श्रम करते रहना– सफलता के तीन उद्गम स्त्रोत हैं। इसलिए कहा जाता है–हिम्मत से हारना, लेकिन हिम्मत कभी मत हारना अर्थात् अभिमन्यु की सोच आज भी सार्थक है। मूलत: दृढ़-निश्चय, अनवरत परिश्रम, योग्यता बढ़ाना व साधन जुटाना सफलता के सोपान हैं।
सीखना बंद मत करो, क्योंकि ज़िंदगी सबक देना कभी बंद नहीं करती– के माध्यम से मानव को निरंतर परिश्रम व अभ्यास करने का संदेश प्रेषित करती है। ‘नर हो, न निराश करो मन को’ उक्ति सदैव आशान्वित रहने का संदेश देती है और हमारी सोच ही हमारी सफलता की कारक है। ‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि’ हमारी सोच पर प्रकाश डालती है। इसलिए कहा जाता है कि ‘नज़र बदलिए, नज़ारे स्वयं बदल जाएंगे।’ सौंदर्य भी दृष्टा के नेत्रों में निहित होता है। इसलिए जो अच्छा लगे, उसे अपना लो; शेष को छोड़ दो। उस पर ध्यान व अहमियत मत दो तथा उसके बारे में सोचो व चिंतन-मनन मत करो। इस तथ्य से भी आप वाक़िफ़ होंगे कि ‘समय से पहले व भाग्य से अधिक इंसान को कभी कुछ नहीं मिलता।’ इसलिए सृष्टि नियंता के न्याय पर विश्वास रखो। उसके यहाँ न्याय व देर तो है; अंधेर नहीं और आपके भाग्य में जो लिखा है, आपको मिलकर ही रहेगा। ‘माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय’ उक्ति में अकाट्य सत्य समाहित है।
गीता में भी भगवान कृष्ण यही कहते हैं कि हमें अपने कर्मों का फल जन्म- जन्मांतर तक अवश्य झेलना पड़ता है और उसके प्रकोप से कोई भी बच नहीं सकता। स्वरचित पंक्तियाँ ‘प्रभु सिमरन कर ले बंदे/ सिर्फ़ यही तेरे साथ जाएगा। शेष सब इस धरा का, धरा पर धरा रह जाएगा’… और एक दिन यह हंसा देह को छोड़ उड़ जाएगा। कौन जानता है, मानव को इस संसार में कब तक ठहरना है? ‘यह किराए का मकाँ है, कौन कब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘जिंदगी का अजब फ़साना है/ इसका मतलब तो आना और जाना है’ मानव जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डालती हैं। यह सृष्टि का निरंतर क्रम है। सो! उसका शोक नहीं करना चाहिए। यदि कोई हमारी ग़लतियों निकलता है, तो हमें खुश होना चाहिए, क्योंकि कोई तो है जो हमें पूर्ण दोष-रहित बनाने के लिए अपना समय दे रहा है। वास्तव में वह हमारा सबसे बड़ा हितैषी है, क्योंकि वह स्वयं से अधिक हमारे हित की कामना करता है, चिंता करता है।
‘ऐ ज़िंदगी! मुश्किलों के सदा हल दे/ थक ना सकें हम/ फ़ुरसत के कुछ पल दे/ दुआ यही है दिल से/ कि जो सुख है आज/ उससे भी बेहतर कल दे।’ यही है जीवन जीने की कला, जिसमें मानव ज़िंदगी से मुश्किलों व आपदाओं का सामना करने का हल माँगता है और निरंतर परिश्रम करना चाहता है। वह सबके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है और अपने कल को बेहतर बनाने का हर संभव प्रयास करता व तमन्ना रखता है।
‘ख्वाब भले टूटते रहें/ मगर हौसले फिर भी ज़िंदा हों/ हौसला अपना ऐसा रखो/ कि मुश्किलें भी शर्मिंदा हों।’ मानव को साहसपूर्वक कठिनाइयों व आपदाओं का सामना करना चाहिए, क्योंकि ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ और कबीर के ‘मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारा बैठ’ में कितना भाव-साम्य है। ख्वाब भले पूरे न हों, मगर हौसला कभी भी टूटना नहीं चाहिए अर्थात् मानव को निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। ‘सोचने से कहाँ मिलते हैं तमन्ना के शहर/ चलने की ज़िद भी ज़रूरी है मंज़िलों के लिए।’ इसलिए मानव को सदैव दृढ़-प्रतिज्ञ होना चाहिए, क्योंकि कल्पना के महल बनाने से इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती। मंज़िल तक पहुंचने के लिए चलने की ज़िद व प्रबल इच्छा-शक्ति होनी आवश्यक है। सो! मानव को उचित दिशा में अपने कदम बढ़ाने चाहिए तथा सकारात्मक सोच रखते हुए सत्कर्म करने चाहिए, क्योंकि दु:ख के दस्तावेज़ों में सुख के कागज़ों पर उसी के हस्ताक्षर होते हैं अर्थात् हमारे कर्मों के लिए दूसरा उत्तरदायी कैसे हो सकता है? आवश्यकता है, आस्था व अगाध विश्वास की– जब हम अपना सर्वस्व उस प्रभु को समर्पित कर देते हैं तो अंतर्मन में आशा की किरण जाग्रत होती है, जो हमें सत्कर्म करने को, प्रेरित करती है, जिससे हमें मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जन्मजात बर्थ…“।)
अभी अभी # 485 ⇒ जन्मजात बर्थ… श्री प्रदीप शर्मा
Birth & Berth
रेल्वे तो हमें यात्रा के दौरान हमारी सुविधा हेतु, मांगने पर, बर्थ एलॉट करती है, लोअर मिडल अथवा अपर, लेकिन वह ऊपर वाला तो जन्म लेते ही हमें बर्थ एलॉट कर देता है, और वह भी, बिना मांगे ही, किसी को लोअर बर्थ, किसी को मिडिल बर्थ, तो किसी को अपर बर्थ।
ईश्वर द्वारा प्रदत्त बर्थ हमारे पूर्व जन्म के संस्कारों के आधार पर एलॉट की जाती है, वही लोअर, मिडिल और अपर का चक्कर। लोअर बर्थ में बीपीएल कार्ड और मुफ्त राशन की सुविधा होती है, अपर बर्थ वाला तो लोअर और मिडिल के सर पर पांव रखकर ऊपर जाकर आराम से लेट जाता है, लेकिन लोवर और मिडिल क्लास को कुछ समय तक तो मिलजुल कर ही यात्रा तय करनी पड़ती है। लोअर बर्थ और मिडिल बर्थ अपनी मेहनत मजदूरी और पसीने की कमाई का भोजन आपस में शेयर करते हैं सुख-दुख की बात करते हैं और बाद में, लोअर मिडल लोअर और मिडिल बर्थ वाले अपने अपनी सीट पर सो जाते हैं।।
लोवर और मिडिल बर्थ वालों को जिंदगी के सफर में, सिर्फ रात को ही नींद सुख चैन और आराम नसीब होता है। जिंदगी में अपर बर्थ, नसीब वालों को ही मिलती है। लेकिन रेल्वे के सफर में तो अपर बर्थ वाले भी लोअर बर्थ पर ही आना पसंद करते हैं। वरिष्ठ नागरिकों को लोअर बर्थ में प्राथमिकता भी मिलती है। मिडिल बर्थ वाले को तो जीवन में भी लोअर और अपर वाले के बीच सैंडविच बनना ही पड़ता है, वही सिंगल और डबल BHK अपार्टमैंट वाली जिंदगी। ना तू जमीं के लिए है ना तू आसमान के लिए।
वैसे भी देखा जाए तो जीवन की गाड़ी में भी आज लोअर बर्थ वाले ही ज्यादा सुखी हैं। होती होगी अपर बर्थ वाले को भी जिंदगी में परेशानी, लेकिन मिडिल बर्थ वाला, लोअर बर्थ वाले और अपर बर्थ वाले, दोनों को अपने से अधिक खुशनसीब समझता है। मिडिल क्लास की घुटन से तो लोअर बर्थ अथवा अपर बर्थ ही उसे अधिक सुविधाजनक प्रतीत होती है।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “चरण से आचरण तक…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # 216 ☆चरण से आचरण तक… ☆
शब्दों से पहले आचरण हमारी जीवन गाथा कह देता है, जिस माहौल में परवरिश होती है वही सब एक – एक कर सामने आते हैं। ऐसी कोशिश होनी चाहिए कि बोली और भावाव्यक्ति किसी को आहत न करे।
जब निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे तो अवश्य चिन्तन करें कि कहाँ भूल हो रही है कि लोग आपकी नीतियों का विरोध एक स्वर में कर रहें हैं। बिना प्रयोगशाला के विज्ञान का अध्ययन संभव ही नहीं। जैसे – जैसे उम्र बढ़ती जाती है वैसे- वैसे सोचने समझने की क्षमता भी सकारात्मक होने लगती है, लोग क्या सोच रहे हैं या क्या सोचेंगे ये भाव भी क्रमशः घटने लगता है।
जैसे हम तन – मन के सौंदर्य का ध्यान रखते हैं वैसे ही वैचारिक दृष्टिकोण का ध्यान रखें। नकारात्मक विचारों को हटा कर श्री चिंतन की ओर उन्मुख हों। स्पष्टवादिता से अक्सर विवाद खड़े होते हैं। उचित समय का ध्यान रखने वाला इससे साफ बचकर निकल सकता है।
श्री शब्द का अलग ही रुतबा है, जब नाम के आगे सुशोभित होता है तो एक सुखद अहसास जगाता है। एक श्रीमान बहुत ही न्याय प्रिय थे उनके इस गुण से सभी प्रसन्न रहते।
एक विवाद के सिलसिले में उनको समझ ही नहीं आ रहा था क्या फैसला किया जाए, सभी की दृष्टि उन पर थी। पर कहते हैं न समय के फेर से कोई नहीं बच सकता तो वे कैसे अछूते रहते उन्होंने वैसा ही निर्णय दे दिया जैसा कोई भी करता, कारण न्याय केवल तथ्य नहीं देखता वो व्यक्ति व उसकी उपयोगिता भी देखता है।
यदि वो हमारे काम का है तो पड़ला उसकी तरफ़ झुकना स्वाभाविक है।
खैर होता वही है जो श्री हरि की इच्छा, पर कहीं न कहीं सारे लोग जो आज तक आप की ओर आशा भरी निगाहों से देखा करते थे वे अब मुख मोड़कर जा चुके हैं, उम्मीद तो एक की टूटी जो जुड़ जायेगी वक्त के साथ-साथ किन्तु आपके प्रति जो विश्वास लोगों था वो धराशायी हुआ।
जो भी होता है वो अच्छे के लिए होता है बस आवश्यकता इस बात की है कि आप उसमें छुपे संदेशों को देखें।
कई बार संकोचवश भी आपको ऐसी नीतियों का समर्थन करना पड़ता है जो उसूलों के खिलाफ हों पर जब पानी सर के ऊपर जाने की स्थिति हो तो सत्य की राह पर चलना ही श्रेस्कर होता है। भले ही लोगों का साथ छूटे छूटने दो क्योंकि शीर्ष पर व्यक्ति अकेला ही होता है, वहाँ इतनी जगह नहीं होती की पूरी टीम को आप ले जा सकें और जो जिस लायक है वो वही करे तभी उन्नति संभव है।
वर्तमान को सुधारें जिसके लिए आज पर ध्यान देना जरूरी है। कार्य करते रहें बाधाएँ तो आपकी कार्य क्षमता को परखने हेतु आतीं हैं।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – चिंतन तो बनता है
बात पाँच वर्ष पुरानी है। सोमवार 16 सितम्बर 2019 को हिंदी पखवाड़ा के संदर्भ में केंद्रीय जल और विद्युत अनुसंधान संस्थान, खडकवासला, पुणे में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित था। कार्यक्रम के बाद सैकड़ों एकड़ में फैले इस संस्थान के कुछ मॉडेल देखे। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों के लिए अनेक बाँधों की देखरेख और छोटे-छोटे चेकडैम बनवाने में संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संस्थान चूँकि जल अनुसंधान पर काम करता है, भारत की नदियों पर बने पुल और पुल बनने के बाद जल के प्रवाह में आनेवाले परिवर्तन से उत्पन्न होनेवाले प्रभाव का यहाँ अध्ययन होता है। इसी संदर्भ में यमुना प्रोजेक्ट का मॉडेल देखा। दिल्ली में इस नदी पर कितने पुल हैं, हर पुल के बाद पानी की धारा और अविरलता में किस प्रकार का अंतर आया है, तटों के कटाव से बचने के लिए कौनसी तकनीक लागू की जाए, यदि राज्य सरकार कोई नया पुल बनाने का निर्णय करती है तो उसकी संभावनाओं और आशंकाओं का अध्ययन कर समुचित सलाह दी जाती है। आंध्र और तेलंगाना के लिए बन रहे नए बाँध पर भी सलाहकार और मार्गदर्शक की भूमिका में यही संस्थान है। इस प्रकल्प में पानी से 900 मेगावॉट बिजली बनाने की योजना भी शामिल है। देश भर में फैले ऐसे अनेक बाँधों और नदियों के जल और विद्युत अनुसंधान का दायित्व संस्थान उठा रहा है।
मन में प्रश्न उठा कि पुणे के नागरिक, विशेषकर विद्यार्थी, शहर और निकटवर्ती स्थानों पर स्थित ऐसे संस्थानों के बारे में कितना जानते हैं? शिक्षा जबसे व्यापार हुई और विद्यार्थी को विवश ग्राहक में बदल दिया गया, सारे मूल्य और भविष्य ही धुँधला गया है। अधिकांश निजी विद्यालय छोटी कक्षाओं के बच्चों को पिकनिक के नाम पर रिसॉर्ट ले जाते हैं। बड़ी कक्षाओं के छात्र-छात्राओं के लिए दूरदराज़ के ‘टूरिस्ट डेस्टिनेशन’ व्यापार का ज़रिया बनते हैं तो इंटरनेशनल स्कूलों की तो घुमक्कड़ी की हद और ज़द भी देश के बाहर से ही शुरू होती है।
किसीको स्वयं की संभावनाओं से अपरिचित रखना अक्षम्य अपराध है। हमारे नौनिहालों को अपने शहर के महत्वपूर्ण संस्थानों की जानकारी न देना क्या इसी श्रेणी में नहीं आता? हर शहर में उस स्थान की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहर से कटे लोग बड़ी संख्या में हैं। पुणे का ही संदर्भ लूँ तो अच्छी तादाद में ऐसे लोग मिलेंगे जिन्होंने शनिवारवाडा नहीं देखा है। रायगढ़, प्रतापगढ़ से अनभिज्ञ लोगों की कमी नहीं। सिंहगढ़ घूमने जानेवाले तो मिलेंगे पर इस गढ़ को प्राप्त करने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के जिस ‘सिंह’ तानाजी मालसुरे ने प्राणोत्सर्ग किया था, उसका नाम आपके मुख से पहली बार सुननेवाले अभागे भी मिल जाएँगे।
लगभग पाँच वर्ष पूर्व मैंने महाराष्ट्र के तत्कालीन शालेय शिक्षामंत्री को एक पत्र लिखकर सभी विद्यालयों की रिसॉर्ट पिकनिक प्रतिबंधित करने का सुझाव दिया था। इसके स्थान पर ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व के स्थानीय स्मारकों, इमारतों, महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों की सैर आयोजित करने के निर्देश देने का अनुरोध भी किया था।
धरती से कटे तो घास हो या वृक्ष, हरे कैसे रहेंगे? इस पर गंभीर मनन, चिंतन और समुचित क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
श्रीगणेश साधना सम्पन्न हुई। पितृ पक्ष में पटल पर छुट्टी रहेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुदामा चरित्र…“।)
अभी अभी # 483 ⇒ सुदामा चरित्र… श्री प्रदीप शर्मा
सुदामा भगवान कृष्ण के बचपन के सखा थे। वे श्री कृष्ण के अनन्य भक्त तो थे ही लेकिन कुछ कथा वाचकों और भजन गायकों ने उनके साथ गरीब ब्राह्मण का विशेषण भी लगा दिया। कृष्ण और सुदामा की कहानी सिर्फ एक अमीर और गरीब मित्र की दास्तान बनकर रह गई। आज भी हर सुदामा यही चाहता है उसे भी जीवन में कोई श्री कृष्ण जैसा सखा, मित्र अथवा दोस्त मिले।
सांसारिक मित्रता में दोस्ती तक तो ठीक है लेकिन किसी अमीर मित्र के प्रति सुदामा की तरह भक्ति भाव अथवा अनन्य भाव का होना बड़ा मुश्किल है। हमने तो मित्रता की एक ही परिभाषा बना रखी है सच्चा दोस्त वही जो मुसीबत में काम आए। ।
सुदामा चरित, कवि नरोत्तमदास द्वारा ब्रज भाषा में लिखा गया एक काव्य ग्रंथ है. इसमें निर्धन ब्राह्मण सुदामा की कहानी है, जो भगवान कृष्ण के बचपन के मित्र थे. सुदामा की कहानी श्रीमद् भागवत महापुराण में भी मिलती है।
आज की सांसारिक परिभाषा में सुदामा दीनता, निर्धनता, साधुता और सरलता का प्रतीक है। सुदामा के सखा श्रीकृष्ण की ऊंचाइयों तक तो खैर यह इंसान कभी पहुंच ही नहीं सकता, केवल उनके गुणगान कर, भक्ति भाव में आकंठ डूब, शरणागत हो सकता है।।
मेरे शहर में शिक्षक कल्याण संघ ने पहले एक गृह निर्माण संस्था बनाई और फिर शिक्षकों के लिए सुदामा नगर का निर्माण शुरू हो गया। सरकार भी इन शिक्षकों पर मेहरबान हुई और सस्ते दर पर इन्हें जमीन उपलब्ध करा दी गई और जल्द ही इस सुदामा नगर का नाम एशिया की सबसे बड़ी अवैध कॉलोनी के रूप में विख्यात हो गया।
वैसे तो हर भक्त पर द्वारकाधीश मेहरबान होते हैं, लेकिन जब उनके मित्र सुदामा की बारी आती है तब तो वे कुछ खास ही मेहरबान हो ही जाते हैं। आज की तारीख में सुदामा नगर एक सुव्यवस्थित, सुविधा संपन्न कॉलोनी है, जहां किसी तरह का अभाव नहीं। आपको लगेगा आप मानो कृष्ण की द्वारका में ही आ गए हैं। सुदामा नगर के बढ़ते प्रभाव के कारण पास की फूटी कोठी के भी भाग जाग गए, वह पुखराज कोठी हो गई।
और हमारे ठाकुर जी अपने परम मित्र सुदामा को तो महल में रखते हैं और खुद बालस्वरूप में मथुरा, वृंदावन गोकुल, नंदगांव और मथुरा में बाल लीलाएं करते हैं, गोपियों संग रास रचाते हैं, और बांसुरी बजाते हैं।
आज के कलयुग में भी अगर आपको कृष्ण और सुदामा की लीला देखना हो तो कभी सुदामा नगर चले जाएं, वहां आपको दिव्यता और भव्यता के ही दर्शन होंगे। उसी सुदामा नगर के आसपास एक द्वारकापुरी कॉलोनी भी है, जो सुदामानगर की तुलना में बहुत छोटी है। उस कृपानिधान की लीला ही कुछ ऐसी है। उसका बस चले तो अपने भक्त पर तीनों लोक वार दे। सुदामा नगर बनाना आसान है, सुदामा बनना नहीं।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डबल-बेड…“।)
अभी अभी # 482 ⇒ डबल-बेड… श्री प्रदीप शर्मा
आदमी शादीशुदा है या कुंवारा, यह उसके बेड से पता चल जाता है। अगर सिंगल है, तो सिंगल बेड, अगर डबल हो तो डबल- बेड ! क्या डबल से अधिक का भी कोई प्रावधान है हमारे यहाँ !
हमारे कमरे-नुमा घर में बेड की कोई व्यवस्था नहीं होती थी। परिवार बड़ा था, घर छोटा ! लाइन से बिस्तर लगते थे। बड़ों-बुजुर्गों के लिए एक खाट की व्यवस्था होती थी, जो गर्मी और ठण्ड में घर से बाहर पड़ी रहती थी। घर में प्रवेश केवल निवार के पलंग का होता था। परिवार में पहला लकड़ी का पलंग बहन की शादी के वक्त बना था, जो बहन के ही साथ दहेज में ससुराल चला गया। ।
कक्षा पाँच तक हमारे स्कूल में अंग्रेज़ी ज्ञान निषिद्ध था ! Bad बेड और boy बॉय के अलावा अंग्रेज़ी के सब अक्षर काले ही नज़र आते थे। अक्षर ज्ञान में जब bed बेड पढ़ा तो उसका अर्थ भी बिस्तर ही बताया गया, पलंग नहीं।
घर में जब पहला जर्मन स्टील का बड़ा बेड आया, तब भी वह पलंग ही कहलाया, क्योंकि उस बेचारे के लिए कोई बेड-रूम उपलब्ध नहीं था। एक लकड़ी के फ्रेम-नुमा स्थान को टिन के पतरों से ढँककर बनाये स्थान में वह पलंग शोभायमान हुआ और वही हमारे परिवार का ड्राइंग रूम, लिविंग रूम और बेड-रूम कहलाया। पलंग पिताजी के लिए विशेष रूप से बड़े भाई साहब ने बनवाया था, जिस पर रात में मच्छरदानी तन जाती थी। एक पालतू बिल्ली के अलावा हमें भी बारी बारी से उस पलंग पर सोने का सुख प्राप्त होता था। दिन में वही पलंग बैठक का काम भी करता था। आज न वह पलंग है, और न ही पूज्य पिताजी ! लेकिन आज, 40 वर्ष बाद भी सपने में वही घर, वही पलंग, और पिताजी नज़र आ ही जाते हैं। ।
आज जिसे हम बेड-रूम कहते हैं, उसे पहले शयन-कक्ष की संज्ञा दी जाती थी। कितना सात्विक और शालीन शब्द है, शयन-कक्ष, मानो पूजा-घर हो ! और बेड-रूम ? नाम से ही खयालों में खलबली मच जाती है। आप किसी के घर में ताक-झाँक कर लें, चलेगा। लेकिन किसी के बेडरूम में अनधिकृत प्रवेश वर्जित है। बेड रूम वह स्थान है, जहाँ व्यक्ति जो काम आज़ादी से कर सकता है, वही काम अगर वह खुले में करे, तो अशोभनीय हो जाता है।
आदमी जब नया मकान बनाता है, तब सबको शान से किचन के साथ अपना बेडरूम और अटैच बाथ बताना भी नहीं भूलता। ज़मीन से फ़्लैट में पहुँचते इंसान को आजकल सिंगल और डबल BHK यानी बेड-हॉल-किचन से ही संतोष करना पड़ता है। ।
आजकल के संपन्न परिवारों में व्यक्तिगत बेडरूम के अलावा एक मास्टर बैडरूम भी होता है जिस पर परिवार के सभी सदस्य बेड-टी के साथ ब्रेकफास्ट टीवी का भी आनंद लेते है, महिलाएँ दोपहर में सास, बहू और साजिश में व्यस्त हो जाती हैं, और रात का डिनर भी सनसनी के साथ ही होता है। बाद में यह मास्टर बैडरूम बच्चों के हवाले कर दिया जाता है और लोग अपने अपने बेडरूम में गुड नाईट के साथ समा जाते हैं।
नींद किसी सिंगल अथवा डबल-बेड की मोहताज़ नहीं ! गद्दा कुर्ल-ऑन का हो, या स्लीप-वेल का, कमरे में भले ही ए सी लगा हो, लोग रात-भर करवटें बदलते रहते हैं, ढेरों स्लीपिंग पिल्स भी खा लेते हैं, लेकिन तनाव है कि रात को भी चैन की नींद सोने नहीं देता। वहीं कुछ लोग इतने निश्चिंत और बेफ़िक्र होते हैं कि जब गहरी नींद आती है तो उन्हें यह भी होश नहीं रहता, वे कुंआरे हैं या शादीशुदा। उनका बेड सिंगल है या डबल। ऐसे घोड़े बेचकर सोने वालों की धर्मपत्नियों को भी मज़बूरी में ही सही, धार्मिक होना ही पड़ता है।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 102 ☆ देश-परदेश – Working Breakfast ☆ श्री राकेश कुमार ☆
प्रातः काल के समय खाए जाने वाले कलेवा/नाश्ता आदि को ब्रेकफास्ट कहा जाता है। सही भी है, पूरी रात्रि बिना खाए पिए रहकर, सुबह कुछ ग्रहण करने से “उपवास को तोड़ना” ही कह सकते हैं।
दफ्तर या किसी कारण जल्दी या कम समय में कुछ ग्रहण करने को वर्किंग ब्रेकफास्ट कहते हैं। फास्ट फूड भी इसी श्रेणी का हिस्सा है।
पूर्व में बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, हॉस्पिटल आदि के आस पास नाश्ता करने वालों की दुकानें होती थी। अब तो गलियों में भी नाश्ते की दुकानें सजी रहती हैं। घर का स्वच्छ और पौष्टिक नाश्ता छोड़ दिन का आरंभ ही गंदे बाजारू नाश्ते से होने लगी है।
प्रातः भ्रमण वाली टोलियां भी, प्रतिदिन चाय का स्वाद इन्हीं नाश्ता दुकानों से ग्रहण करते हैं। कुछ टोलियां प्रति रविवार या किसी साथी के जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ के नाम से सुबह सुबह ही सड़क किनारे समोसे, पोहा आदि का स्वाद लेते हुए दृष्टिगोचर हो जाती हैं।
हमारे गुलाबी शहर में तो वर्षों पुराने शहर वाले प्रसिद्ध प्रतिष्ठानों ने अपने नाम को भुनाने के लिए शहर के सबर्ब क्षेत्रों में भी अपनी शाखाएं स्थापित कर ली हैं।
जन साधारण नाश्ता करते हुए अपने परिवार के साथ मिल जायेंगे, पूछे जाने पर कहते है, कभी कभी “चेंज” (स्वाद परिवर्तन) के लिए बाहर आ जाते हैं।
प्रातः काल मंदिर जाने वालों से बाहर जाकर नाश्ता करने वालों की संख्या अधिक हो गई है। केमिस्ट की दुकानें भी नौ बजे से पहले नहीं खुलती है, परंतु ये नाश्ता विक्रेता सात बजे से पूर्व आपके स्वागत के लिए आतुर रहते हैं। पैसा और समय व्यय कर जिम से निकल वापसी में “जलेबी और कचौरी” खाकर अपनी मेहनत पर पानी फेर देना आज की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
प्रातः भ्रमण टोलियों की देखा देखी, हमारे व्हाट्स ऐप समूह के एडमिन भी “नाश्ते पर मिलते है”, मुहिम चला रहें हैं। आज ही एक ऐसे कार्यक्रम में हमने भी शिरकत कर गंदे तेल में बने हुए गरमा गर्म नाश्ते का मुफ्त में लुत्फ उठाया है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छत्तीस का आंकड़ा…“।)
अभी अभी # 481 ⇒ छत्तीस का आंकड़ा… श्री प्रदीप शर्मा
शुभ अशुभ की दुनिया में हमने आंकड़ों को भी नहीं छोड़ा। शादी की पत्रिका में जब गुण मिलाए जाते हैं तो बत्तीस शुभ माने जाते हैं और अगर यही गुण 36 हो गए तो समझिए पति पत्नी के बीच छत्तीस का आंकड़ा। भारतीय दंड संहिता में धोखाधड़ी और और बेईमानी की एक धारा है, ४२०। इसी से शब्द बन गया है चार सौ बीसी। महान राजकपूर ने इसके आगे भी श्री लगाकर इन्हें श्री 420 बना दिया। नौ और दो ग्यारह होते हैं, लेकिन यहां तो हमने लोगों को भी, रायता फैलाने के बाद, नौ दो ग्यारह होते देखा है।
परीक्षा में कभी 33 % पर छात्र को उत्तीर्ण घोषित किया जाता था। अगर किसी को छत्तीस प्रतिशत अंक आ गए, तो समझो बेड़ा पार। शादी के लिफाफे में कभी ग्यारह और 101 रुपए का रिवाज था। सिद्ध महात्माओं और जगतगुरू के आगे केवल 108 लगाने से काम नहीं चलता, श्री श्री 1008 लगाना ही पड़ता है। ।
मालवा के बारे में एक कहावत है, “मालव धरती गहन गंभीर, पग पग रोटी, डग डग नीर “।
प्रदेश का प्रमुख शहर इंदौर कभी मुंबई का बच्चा कहलाता था। यहां एक नहीं, छः छः टेक्सटाइल मिल्स थी, जो मजदूरों की रोजी रोटी का प्रमुख साधन था। शहर में तब नर्मदा नहीं थी, लेकिन एक नहीं चार चार तालाब थे, यशवंत सागर, पिपल्या पाला, सिरपुर और बिलावली। लेकिन केवल यशवंत सागर ही इतना सक्षम था, कि पूरे नगर की प्यास बुझा दे। सब तरफ हरियाली थी और कभी यहां नौलखा यानी एक ही इलाके में नौ लाख पेड़ थे।
मानसून इस शहर पर हमेशा मेहरबान रहा है। कभी 36 तो कभी 56 बस, इसी के बीच, यहां का औसत बारिश का आंकड़ा रहा है। कालांतर में कपड़ा मिले बंद जरूर हुई लेकिन शहर का विकास नहीं रुका। तीन चरणों में नर्मदा मैया के चरण इस अहिल्या की नगरी पर पड़े और उसके बाद इस शहर का मानो कायाकल्प हो गया। ।
आज यह महानगर स्मार्ट सिटी बनने जा रहा है। जिस शहर में कभी टेम्पो चला करते थे, अब वहां के लोग मेट्रो में सफर करेंगे। भाग तो सभी के जागे हैं लेकिन पानी की समस्या कम होने के बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। अप्रैल माह से ही बस्तियों में और सुदूर बहुमंजिला आवासीय परिसरों में पानी के टैंकर दौड़ने लग जाते हैं।
कल जहां खेत और गांव थे आज वहां कॉलोनियां बस गई हैं। ना तू जमी के लिए है और ना आसमान के लिए तेरा वजूद है सिर्फ 2BHK और 3 BHK के लिए। इस बार बारिश का आंकड़ा 36 इंच भी पार नहीं कर पाया है। आसमान से बारिश होती है, पानी जमीन में नहीं जाता सड़कों पर ही जमा हो जाता है। हमारा काम भी अब 36 इंच बारिश से नहीं, 56 इंच से होने लगा है। नरेंद्र नहीं इंद्र सुनें और योग्य कार्यवाही करें। हम तो सिर्फ यह प्रार्थना ही कर सकते हैं ;
अल्लाह मेघ दे, पानी दे, छाया दे रे रामा मेघ दे श्यामा मेघ दे
बुद्ध ने अपने पुत्र राहुल को दीक्षित करने के उपरांत जो शब्द कहे वो वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
एक दिन बुद्ध राहुल के पास पहुंचे और अपने कमंडल में शेष थोड़े से पानी की ओर इंगित करते हुए पूछा, “राहुल, क्या तुम इस कमंडल में पानी को देख रहे हो?”
राहुल ने कहा, “जी, हां!”
“जो जानबूझकर झूठ बोलता है, उसकी आध्यात्मिक उपलब्धि इतनी सी होती है।”
तत्पश्चात, बुद्ध ने पानी को फैंक दिया और कहा, “देख रहे हो, राहुल, पानी को कैसे त्याग दिया गया है? इसी तरह, जानबूझकर झूठ बोलने वाला आध्यात्मिक उपलब्धि, जो भी उसने अर्जित की हो, का परित्याग कर देता है।”
उन्होंने फिर पूछा, “क्या तुम देख रहे हो कि किस तरह यह कमंडल अब खाली हो गया? इसी तरह, जिसे झूठ बोलने में लज्जा नहीं आती, वह आध्यात्मिक उपलब्धि से रिक्त हो जाता है।”
इसके बाद, बुद्ध ने कमंडल को उल्टा कर दिया और कहा, “क्या तुम देख रहे हो, राहुल, कि कैसे कमंडल उल्टा हो गया? इसी तरह, जो जानबूझकर झूठ बोलता है, अपनी आध्यात्मिक उपलब्धि को उल्टा कर देता है और विकास के लिए अक्षम हो जाता है और अपनी उन्नति के सारे द्वार स्वयं बंद कर लेता है।”
निष्कर्ष में बुद्ध ने कहा, इसलिए जानबूझकर झूठ, मज़ाक में भी, नहीं बोलना चाहिए।
बुद्ध झूठ बोलने से बचने के लिए इसलिए कहते थे क्योंकि वो जानते थे कि झूठ फैलाकर सामाजिक सामंजस्य को भंग किया जा सकता है। समाज में सौहाद्र और सामंजस्य तभी होता है जब लोग एक दूसरे की बातों पर विश्वास करें।
झूठ बोलने वाला, झूठ बोलते बोलते अपने ही भ्रमजाल में फंसता जाता है। वह वास्तविकता से दूर होता जाता है और षड्यंत्रकारी चक्रव्यूह बुनने लगता है।
आज आध्यात्मिक उपलब्धियों की किसे फ़िक्र है, लोग अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाने के लिए मानसिक दिवालियेपन के द्वार पर खड़े हैं। आज प्रतिस्पर्धा है कि कौन कितना झूठ बोले और समाज के तानेबाने को तहस नहस कर दे।
प्रजातंत्र में आपको चुनने का अधिकार है। आप सामाजिक सौहाद्र और सद्भाव चुन सकते हैं। आप ही सामाजिक वैमनस्य और विभाजन का समर्थन भी कर सकते हैं। समाज में समरसता या अराजकता? निर्णय आपका है।
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈