हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 137 ⇒ जश्न और त्रासदी… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जश्न और त्रासदी “।)

?अभी अभी # 137 ⇒ जश्न और त्रासदी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 

जहाँ बजती है शहनाई,

वहाॅं मातम भी होते हैं …

सुख और दुख हमारे जीवन में साथ साथ चलते हैं। हमारा जीवन दर्शन सुखांत है, दुख झेलने के लिए हमारे पास मजबूत कंधे हैं, आंसू के साथ, पुनः खड़ा होने का हमारा संकल्प भी है। हमारी गीता हमें शोकग्रस्त होने से बचाती है, विषाद योग के बावजूद हम अनासक्त कर्म करने में सक्षम होते हैं, और इसीलिए शायद हम जश्न और त्रासदी के पल एक साथ हंसते हंसते गुजार देते हैं।

होती है त्रासदी कभी युद्ध की, कभी अकाल तो कभी सूखे और बाढ़ की। विश्व युद्ध, महामारी, बंटवारे का दर्द और अभी हाल ही में कोरोना वायरस ने हमें तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन हम पुनः उठ खड़े हुए, दो दो वेक्सीन और बूस्टर डोज से लैस, चेहरे पर कोई शिकन नहीं।।

प्रकृति हमें चुनौती भी देती है, और हमारी परीक्षा भी लेती है। इधर हम लाल किले पर आजादी का जश्न मना रहे थे और उधर हिमाचल और उत्तराखंड में पहाड़ खसक रहे थे। इधर हमारा चंद्रयान -३ सफलतापूर्वक चांद पर तिरंगा लहरा रहा था और उधर पूरा हिमाचल दहल रहा था। सदी की इतनी बड़ी त्रासदी के बीच भी आखिर सफलता के इतिहास तो रचे ही जाते हैं।

महाभारत के युद्ध के बीच ही सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण धनुर्धर अर्जुन को गीता का संदेश देते हैं, हमारे सभी महाकाव्य सुखांत ही रचे गए हैं, दुखांत नहीं। हमारे घरों में महाभारत नहीं गीता रखी जाती है। घर घर रामचरितमानस और सुंदरकांड का पाठ होता है, वाल्मीकि रामायण का नहीं, क्योंकि हम अपने आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम राम की लंका पर विजय और रावण के वध के पश्चात् विजया दशमी और दीपावली का पर्व तो उत्साह से मनाते हैं, लेकिन सीता की अग्निपरीक्षा और उनका त्याग हमें विचलित कर देता है। हम जीवन के अप्रिय प्रसंगों को भूल जाना चाहते हैं, क्योंकि हमारे जीवन का मूल उद्देश्य सकारात्मकता है।।

हमारे लिए तो मृत्यु भी एक उत्सव ही है। बारात भी बैंड बाजे से और शवयात्रा भी गाजे बाजे के साथ। भोग कभी हमारा आदर्श नहीं रहा। यम कुबेर होंगे अहंकारी रावण के दास, बजरंग बली हनुमान तो वनवासी राम के ही दास थे। इसीलिए हम भी यम, कुबेर की नहीं, यम की बहन यमुना की स्तुति करते हैं, जो हमें जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त कर, स्वर्ग से भी श्रेष्ठ, अपने वैकुंठ धाम में शरण देती है।

आज भी हम दुनिया के लिए आदर्श बने हुए हैं। बस जरूरत, अपनी गलतियों से सबक सीखने की है। जनसंख्या का विस्फोट और पर्यावरण का बिगड़ता स्वरूप आज की ज्वलंत समस्या है। विकास के वर्तमान मानदंड और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ एक गंभीर खतरे का संकेत दे रहे हैं, अगर हम अब भी नहीं चेते, तो आगे पाट और पीछे सपाट वाली स्थिति से हमें कोई नहीं बचा सकता।।

देश हमारा है, किसी आने जाने वाली सरकार का नहीं। जनता को ही जागरूक होना पड़ेगा। अगर कल कोई जबरन नसबंदी लागू कर दे, अथवा फिर कोई बहुगुणा, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए, पेड़ों से जाकर चिपक जाए, तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जब जागे, तभी सवेरा ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 206 – शून्योत्सव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 206 शून्योत्सव ?

शून्य उत्सव है। वस्तुतः महोत्सव है। शून्य में आशंका देखते हो, सो आतंकित होते हो। शून्य में संभावना देखोगे तो  प्रफुल्लित होगे। शून्य एक पड़ाव है आत्मनिरीक्षण के लिए। शून्य अंतिम नहीं है। वैसे प्रकृति में कुछ भी अंतिम नहीं होता। जीवन, पृथ्वी सब चक्राकार हैं। प्रकृति भी वृत्ताकार है। हर बिंदु, परिधि की इकाई है और हर बिंदु में नई परिधि के प्रसव की क्षमता है। प्रसव की यह क्षमता हर बिंदु के केंद्र बन सकने की संभावना है।

यों गणित में भी शून्य अंतिम नहीं होता। वह संख्याशास्त्र का संतुलन है। शून्य से पहले माइनस है। शून्य के बाद प्लस है। माइनस में भी उतना ही अनंत विद्यमान है, जितना प्लस में। शून्य पर जल हिम हो जाता है। हिम होने का अर्थ है, अपनी सारी ऊर्जा को संचित करके  सुरक्षित रखना ताकि काल, पात्र, परिस्थिति के अनुरूप दिशा की आवश्यकतानुसार प्रवहमान हुआ था सके। शून्य से दाईं ओर चलने पर हिम का विगलन होकर जल हो जाता है। पारा बढ़ता जाता है। सौ डिग्री पार होते- होते पानी खौलने लगता है। बाईं ओर की यात्रा में पारा जमने लगता है। एक हद तक के बाद हिमखंड या ग्लेशियर बनने लगते हैं। हमें दोनों चाहिएँ-खौलता पानी और ग्लेशियर। इसके लिए शून्य होना अनिवार्य है।

शून्य में गहन तृष्णा है, साथ ही गहरी तृप्ति है। शून्य में विलाप सुननेवाले नादान हैं। शून्य परमानंद का आलाप है। इसे सुनने के लिए कानों को ट्यून करना होगा। अपने विराट शून्य को निहारने और उसकी विराटता में अंकुरित होती सृष्टि देख सकने की दृष्टि विकसित करनी होगी।

स्मृति में अपनी एक रचना कौंध रही है-

शून्य अवगाहित / करती सृष्टि,

शून्य उकेरने की / टिटिहरी कृति,

शून्य के सम्मुख / हाँफती सीमाएँ,

अगाध शून्य की / अशेष गाथाएँ,

साधो…!

अथाह की / कुछ थाह मिली

या फिर शून्य ही / हाथ लगा?

शून्य के परमानंद को अनुभव करने के लिए शून्य में जाएँ। अपने अपने शून्य का रसपान करें। शून्य में शून्य उँड़ेलें, शून्य से शून्य उलीचें।…इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ महादेव साधना- यह साधना मंगलवार दि. 4 जुलाई आरम्भ होकर रक्षाबंधन तदनुसार बुधवार 30 अगस्त तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में इस बार इस मंत्र का जप करना है – 🕉️ ॐ नमः शिवाय 🕉️ साथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ  🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 136 ⇒ एवरफ्रेश… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एवरफ्रेश”।)  

? अभी अभी # 136 ⇒ एवरफ्रेश? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

 

एक टॉर्च अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है, जिसमें बैटरी वाले सेल भी उसी कंपनी के डाले जाते थे। निप्पो और ड्यूरोसेल के जमाने में भी तो टॉर्च की रोशनी में कैद, एक काली बिल्ली की तस्वीर वाले, एवरेडी EVEREADY के सेल आज भी भरोसेमंद हैं।

Ready यानी तैयार से बना है यह शब्द एवररेडी, यानी सदा सेवा के लिए तैयार, जो अब घिस घिसकर एवरेडी हो गया है। जो भी चीज चलेगी, वह घिसेगी भी जरूर। सेल घिसते नहीं, इनका मसाला खराब हो जाता है। आज वही टॉर्च के सेल बड़ी, छोटी साइज में घड़ी, रिमोट और बच्चों के खिलौनों में इस्तेमाल होते हैं। वैसे बैटरी कहां कहां नहीं इस्तेमाल होती, मोबाइल से लगाकर कार, स्कूटर तक। बैटरी लो होना, एक आम बात है। पहले एक चुस्की चाय की हो जाए।।

चाय चीज ही ऐसी है। क्या ऐसी भी कोई चीज है, जो आपको सदा तरो ताजा, एवरफ्रेश रखती है।

हमारे घर के पास एक बेकरी थी, उसका नाम ही एवरफ्रेश बेकरी था। क्या बनाती है बेकरी, ब्रेड, बिस्किट और केक वगैरा।

छोटे छोटे कस्बों और गांवों में लोग बेकरी का सामान नहीं खाते थे। बिस्किट भी तो मरे अंग्रेज ही लाए थे। पारसी, सिंधी और मुसलमान बेकरी का धंधा करते थे, अंडा तो डालते ही होंगे। राम, राम, हम तो हाथ भी नहीं लगाते।।

लेकिन छोटे छोटे शहरों में ऐसा नहीं था। ब्रेड, बिस्किट का उपयोग आम हो गया था। जगह जगह बेकरी खुलती जा रही थी। पार्ले जी, और ब्रिटेनिया बिस्किट चाय के साथ घुल मिल गए थे।

दबे पांव मॉडर्न और पॉपुलर ब्रेड ने आखिर घरों में पांव जमा ही लिया।

मुझे याद है, एवरफ्रेश की ब्रेड और भावे की मक्खन की टिकिया रोज घर में आती थी। एक अनार सौ बीमार वाला मामला था। फिर भी सबको प्रसाद मिल ही जाता था। बिस्किट हमारी पहुंच के बाहर थे। मां घर में ही शकरपारे बना देती थी।।

तब एवरफ्रेश बेकरी की एक स्कीम थी, आप आटा, घी, शकर इत्यादि घर से तौलकर ले आइए, हम बनवाई शुल्क लेकर आपको ताज़ा बिस्किट बनाकर दे देंगे। हमारे मुंह में पानी तो आना ही था। घर बैठे बेकरी आई। घी तेल के पुराने टिन के डब्बों में गर्मागर्म बिस्किट ठसाठस भर दिए गए।

जो जब आता, दो चार बिस्किट निकालकर भाग जाता। कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं, जो ताले में रखा जाए। बहुत हुए तो आठ पंद्रह दिन। घर वालों ने तौबा कर ली।

तुम तो चाय और रात की रोटी के लायक ही हो।।

इस चटोरी जबान को पहली बार बिना तले समोसे का चस्का भी एवरफ्रेश बेकरी ने ही लगाया। एम जी रोड, कोर्ट कंपाउंड के पास भी इनकी ही एवरफ्रेश शॉप थी, बड़ी रौनक रहती थी वहां, किसी जमाने में। शहर के सभी गणमान्य लोग वहां अक्सर शाम को दिखाई दे जाते थे।

आज एवरफ्रेश बेकरी का कोई पता नहीं, बेकरी प्रॉडक्ट आजकल कुकीज कहलाते हैं, आज की पीढ़ी भारी भरकम सैंडविच और पिज्जा, पास्ता, बर्गर की दीवानी है। पुराने इंदौरी आज भी पोहा जलेबी और कचोरी समोसे से आगे नहीं बढ़े। जिस घर में आज भी सेंव और नमकीन नहीं, वह इंदौर का रहवासी नहीं।।

आज भी जहां खाने पीने की फ्रेश, ताजा और जायकेदार वैरायटी उपलब्ध हो, शौकीन लोग एवरेडी टॉर्च की तरह, ढूंढते हुए पहुंच ही जाते हैं। जहां भी स्वाद, सुगंध और जायका, वहां हाज़िर एक इंदौरी ! एवरफ्रेश, इंदौर ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 135 ⇒ सच उगलवाने की मशीन… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सच उगलवाने की मशीन “।)  

? अभी अभी # 135 ⇒ सच उगलवाने की मशीन? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

 

कलयुग में हम झूठ बोलते हैं, और सच हमसे उगलवाया जाता है। वैसे शास्त्रों के अनुसार झूठ बोलना पाप है, लेकिन सत्यवादी हरिश्चंद्र बनना भी कोई समझदारी नहीं।

आज की मिलावट की दुनिया में सच और झूठ के अनुपात से ही दुनिया चलती है। इसीलिए अदालतों में सच बोलने के लिए भी कसम खानी पड़ती है, गीता पर हाथ रखना पड़ता है।

हमारे सच झूठ से कोई पहाड़ नहीं टूट जाता, लेकिन अपराधियों से सच उगलवाना बहुत जरूरी हो जाता है, जिसके लिए उनका lie detector test होता है, जिसे पॉलीग्राफ टेस्ट भी कहते हैं, जो शरीर के हाव भाव, दिल की धड़कन और सांस के चलने की गति के आधार पर झूठ को पकड़ता है और सच उगलवाता है।।

लेकिन कोई जरूरी नहीं कि इस तरीके से आदतन अपराधियों से सच उगलवा लिया जाए, और झूठ पकड़ में आ जाए। हमारी पुलिस की शुद्ध हिंदी और थर्ड डिग्री भी जब काम नहीं करती, तब इन अपराधियों का नार्को टेस्ट होता है, जिसमें इन्हें दवा के जरिए उस अर्ध – अचेतावस्था में लाया जाता हैं, जहां ये सच उगल दें।

आम जिंदगी में झूठ बोलना कोई अपराध नहीं !

तारीफ इसमें है कि झूठ इस तरीके से, आत्म विश्वास से, बार बार बोला जाए, कि वह सच की शक्ल अख्तियार कर ले।

जब पुख्ता सबूतों के साथ झूठ बोला जाता है, तो कभी कभी तो बेचारे सच को भी शर्मिंदा होना पड़ता है।।

सच बोलने के लिए आपको सिर्फ भगवान से डरना पड़ता है। जब एक बार वह डर भी गायब हो जाए, फिर तो झूठ का रास्ता साफ हो जाता है। लोग झूठे के मुंह ही नहीं लगते। वैसे भी, हट झूठे कहीं के, और खाओ मेरी कसम, तो हमारा आम तकिया कलाम है ही।

जिन लोगों में आत्म विश्वास की कमी है जिनकी याददाश्त कमजोर है, और जिनमें झूठ बोलने से अपराध बोध होता है, उन्हें झूठ बोलने से परहेज करना चाहिए। गप मारना और लंबी लंबी हांकने का जिनको अभ्यास होता है, वे बड़े लोकप्रिय होते हैं। दफ्तरों में उनके पास टाइम पास करने वालों की भीड़ लगी रहती है। जिस दिन वे दफ्तर नहीं आते, दफ्तर की रौनक गायब हो जाती है।।

झूठ अगर तेज है तो सच ओज है। झूठ अगर आडंबर, दिखावा और चमक दमक है, तो सच सादगी, ईमान और सरलता है। सच शाश्वत, सनातन है, झूठ नश्वर है, भ्रम जाल है।

सच वह टंच सोना है, जिससे आभूषण नहीं बनाए जा सकते। थोड़ा झूठ का खोट हो, तो सच भी आकर्षक बन जाता है। रोटी में नमक जितना झूठ तो सच में भी चल सकता है, लेकिन अधिक झूठ चरित्र के लिए घातक है।

हमारी दुआ में असर नहीं, और तो और बद्दुआ भी नहीं लगती। भगवान हमारी नहीं सुनता, सच का कोई साथ नहीं देता। शायद यह सत्य का ही प्रताप हो, जब किसी जमाने में, पीड़ित का दिया शाप फलीभूत हो जाता था। हाथ में लेकर जल छोड़ने के साथ जो संकल्प ले लिया, सो ले लिया, शाप दे दिया सो दे दिया। फिर भले ही आप भगवान ही क्यों न हो।।

हम पुण्यात्माओं के शाप से तो बच सकते हैं, लेकिन झूठ का अभिशाप फिर भी हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाला। जब नियति और प्रकृति आपको शाप देने लगे, तो आप कहां जाओगे। त्राहिमाम त्राहिमाम !

झूठ का दामन छोड़, जितनी जल्दी सच के रास्ते पर हम चल निकलें, इसी में हमारी और इस संसार की भलाई है ;

बहुत कठिन है

डगर पनघट की।

कैसे भर लाऊं,

मैं जमना से मटकी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 226 ☆ आलेख – बधाई इसरो… चांद पर भारत 🇮🇳 ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 226 ☆

? आलेख –बधाई इसरो… 🚀 चांद पर भारत 🇮🇳?

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेखबधाई इसरो… चांद पर भारत )

आजाद भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई हैं। उन्हीं के नाम पर इसरो ने चंद्र मिशन के चंद्रमा पर उतरने वाले लैंडर का नाम विक्रम रखा है। विक्रम शब्द का अर्थ होता है वीरता। बेहद तेज गति के राकेट से धरती से चंद्रमा तक की लम्बी यात्रा के बाद सधे हुये, धीमे धीमे, बिना टूट फूट के चंद्रमा की उबड़-खाबड़ सतह पर सफलता से उतरना सचमुच वीरता का काम है। इसरो का चंद्रयान -2 मिशन अपने इसी चरण में विफल रहा था क्योंकि उसका लैंडर 7 सितंबर 2019 को सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास करते समय लैंडर में ब्रेकिंग सिस्टम में विसंगतियों के कारण चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था।

  विक्रम अपने कोख में मिशन के लक्ष्य रोवर प्रज्ञान को संभाले हुये है। प्रज्ञान का अर्थ ज्ञान होता है। लैँडर से रिलीज होकर अब प्रज्ञान चंद्रमा की सतह पर धीमी गति से मजे में १४ दिनो तक लगभग आधा किलोमीटर घूमे फिरेगा। पृथ्वी के ये चौदह दिन चंद्रमा का महज एक दिन होगा।  प्रज्ञान एक रोबोटिक वेहिकल है, जिसमें कृत्रिम बुद्धि युक्त अनेक उपकरण लगे हैं। प्रज्ञान में ६ चके हैं, यह २७ किलो का है। यह मात्र ५० वाट की सौर उर्जा से संचालित होता है। प्रज्ञान,  विक्रम को स्पेक्ट्रो-पोलरिमेट्री तथा फोटो संदेशे देकर अपनी खोज से अवगत करायेगा। विक्रम वह सारी जानकारी चंद्रमा के गिर्द घूमते आर्बीटर के माध्यम से धरती पर इसरो को भेजेगा। चित्र तथा डाटा एनालिसिस से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के बारे में हम छिपे हुये रहस्य जान सकेंगे। अनुमान है कि इस क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में बर्फ हो सकती है। जिसका उपयोग भविष्य के मिशन में  ईंधन और ऑक्सीजन निकालने के साथ-साथ पीने के पानी के लिए भी किया जा सकता है।

आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से चंद्रमिशन ३ के लिये लॉन्च वेहिकल मार्क थ्री, अंतरिक्ष की यात्रा पर १४ जुलाई २३ को रवाना किया गया था। चंद्रमा की यात्रा पर भारत के इस सबसे भारी अंतरिक्ष यान, पर सामने की सीट पर सवार होकर चला विक्रम पहले धरती की परिक्रमा करता रहा। फिर पृथ्वी से सबसे दूरी वाली कक्षा से इसे चंद्रमा की ओर भेजा गया। चंद्रमा की कक्षा में पहुच जाने के बाद धीरे धीरे यान की कक्षा की परिधि छोटी की गईं। सबसे निचली कक्षा में विक्रम को प्रोपल्शन मॉड्यूल से अलग कर दिया गया था। बिलकुल तय योजना के अनुसार विक्रम चांद पर उतर गया।

 अन्य देशों के प्रयासों की चर्चा करे तो रॉयटर्स ने रूस की अंतरिक्ष एजेंसी  रोस्कोस्मोस के हवाले से बताया गया है कि लूना 25  नियंत्रण खोकर क्रेश हो चुका है। जापान भी  चंद्रमा की सतह पर उतरने की योजना के साथ लांच की तैयारी में है।

इस तरह भारत के चंद्र प्रोजेक्ट ने दुनियां में फिर से चांद पर खोज को हवा दी है। शीत युद्ध की समाप्ति तथा आर्थिक मंदी से ये अन्वेषण बरसों से बंद थे।

फिलहाल बधाई है बधाई।

भारत की सफलता के लाभ  दुनियां को और सारी मानवता को मिलने तय हैं।

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798

ईमेल [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आओ दिलदार चलें, चांद के पार चलें… ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरक संस्मरणात्मक प्रसंग ‘आओ दिलदार चलें, चांद के पार चलें…’।)

☆ आलेख – आओ दिलदार चलें, चांद के पार चलें… ☆  श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆

भारतीय सूचना सेवा की नौकरी में आने से कोई दो साल पहले और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से बी एस सी की पढ़ाई पूरी करने के दो साल बाद की एक घटना मेरे ज़हन में आज भी बसी हुई है।

कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में ही कुछ मित्रों के साथ रहते हुए मैं और मेरे कुछ दोस्त यू पी एस सी की परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते थे। कभी कभार मौज मस्ती के लिए पास के गांवों में रह रहे दोस्तों के पास भी चले जाते थे। ऐसी ही एक पार्टी हमने पास के गांव मिर्ज़ापुर में आयोजित की थी। 21 जुलाई का दिन था 54 साल पहले।

 उस दिन रेडियो पर आंखों देखा हाल  सुनाया जा रहा था। हम सभी ने कुछ ज़्यादा मौज मस्ती नहीं की। बस रेडियो से कान लगाए बैठे थे। टेलीविजन उस वक्त बस दिल्ली में था।

रेडियो सुनते सुनते आधी रात गुज़र गई। एक बज गया। डेढ़ बज गया। पर वो समाचार नहीं मिला जिसका इंतजार था।

और फिर अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग की आवाज़ आई …

… मानव के लिए यह छोटा सा कदम है, पर मानवता के लिए एक बड़ी छलांग…

जी हां पहला मानव चांद पर पहुंच चुका था। बहुत बड़ी घटना थी यह उस समय की। शायद सर्वकालिक।

और हां, कुछ लोग उस समय आदमी के चांद पर पहुंचने की बात को मानते भी नहीं थे।

नील आर्मस्ट्रांग कई साल बाद भारत भी आए थे।

बस भारत का चंद्रयान लैंडर विक्रम भी चांद पर सफलतापूर्वक उतर गया  है। आज भी मैं उतना ही उत्साहित हूं। इसी उत्साह ने पुरानी यादें मस्तिष्क पटल पर लाकर रख दी।

आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया….

© श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

23.08.2023

मो : 9466647037

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 134 ⇒ मस्ती की पाठशाला… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मस्ती की पाठशाला।)  

? अभी अभी # 134 ⇒ मस्ती की पाठशाला? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

 

बचपन एक ऐसी पाठशाला है, जहां मस्ती सिखाई नहीं जाती, लेकिन पाई जाती है। आप यह भी कह सकते हैं, मस्ती, बचपन का दूसरा नाम है। मस्ती हर भाषा में होती है, हर उम्र में होती है, लेकिन मस्ती शब्द, किसी शब्द कोश में नहीं, इस शब्द का कोई पर्याय नहीं, इस शब्द का कोई अनुवाद नहीं, तर्जुमा नहीं।

बच्चा मस्ती नहीं करता। बच्चा अपने आप में, मस्त रहता है। मैं अगर कहूं, मस्ती डिवाइन (divine) होती है, तो यह गलत है, क्योंकि डिवाइन तो बच्चा होता है। हां, हम यह जरूर कह सकते हैं, मस्ती का दूसरा नाम बचपना है।।

बच्चों के लिए खेल ही मस्ती है। जब कि हमारे लिए मस्ती एक खेल है।

दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। जो अंतर डिवाइन और वाइन में है, वही अंतर एक बच्चे की मस्ती और संसारी मस्ती में है।

एक बच्चा अपने खेल में मस्त रहता है। मुझे जब मस्ती करनी होती है, मैं एक बच्चे के साथ बच्चा बन जाता हूं, बच्चा खुश हो जाता है, एकदम चहक उठता है, आओ अपन मस्ती करें। उसका आशय उस खेल से होता है, जो आपको एक दूसरी ही दुनिया में ले जाता है। इस संसार में एक संसार बच्चों का भी होता है, जिसमें बड़ों का प्रवेश वर्जित होता है।

अपनी उम्र घटाइए, कभी बच्चा तो कभी घोड़ा और ऊंट बन जाइए, और आसानी से प्रवेश पा जाइए।।

मस्ती एक शारीरिक, सांसारिक नहीं, भौतिक और बाहरी नहीं, आंतरिक अवस्था है।

मस्ती कोई बच्चों का खेल नहीं, क्योंकि बच्चों का खेल तो खेलना हम जानते ही नहीं। बच्चों की दुनिया में राग द्वेष, भूख प्यास, अमीरी गरीबी, धर्म और मजहब तथा अपना पराया होता ही नहीं। हां, पढ़ लिखकर, अपने पांव पर खड़े होकर, वह भी जान जाता है, जिंदगी क्या है, दुनियादारी क्या है और बाहरी मस्ती क्या है।

कबीर साहब कह गए हैं ;

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले !

हीरा पाया गांठ गठियायो,

बार बार बाको क्यों खोले।

हलकी थी तब चढ़ी तराजू

पूरी भई, तब क्यों तौले।।

हंसा पाये मानसरोवर

ताल तलैया क्यों डोले।

तेरा साहिब घर माहीं

बाहर नैना क्यों खोले।।

कहै कबीर सुनो भाई साधो

साहब मिल गए तिल ओले।।

सत् चित् और आनंद ही तो वह मस्ती है, जिसे बचपन में पीछे छोड़ हम, तू चीज बड़ी है मस्त, मस्त में उलझे हैं। अब पुनः बालक बनने से तो रहे, तो क्यों न फिर कबीर की बात ही मान ली जाए।

तेरा साहिब घर माहीं

साहब मिल गए तिल ओले

जी हां वही ओले ओले ! सदगुरु कुछ नहीं करता, एक डॉक्टर की तरह आंख का भ्रम और माया रूपी तिल निकाल देता है, और आपको वह सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त हो जाती है, जिसे मस्ती कहते हैं। मस्ती की पाठशाला में आपका स्वागत है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #148 – आलेख – “सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक शिक्षाप्रद आलेख  “सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 148 ☆

 ☆ आलेख – “सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना” ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो हमें दुनिया भर के लोगों से जुड़ने, जानकारी साझा करने और अपनी राय रखने की अनुमति देता है. यह एक शक्तिशाली उपकरण है जिसका उपयोग अच्छे और बुरे दोनों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हमारी रचनात्मकता को खत्म कर सकता है.

सोशल मीडिया पर हम हर समय नई चीजें देख रहे होते हैं. हम दूसरों की पोस्ट देख रहे होते हैं, हम उनके विचारों और राय पढ़ रहे होते हैं, और हम उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह सब इतना अधिक हो सकता है कि हमें खुद के विचारों और राय उत्पन्न करने का समय नहीं मिलता है. हम दूसरों के विचारों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि हम अपनी रचनात्मकता को खो देते हैं.

सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हमारी एकाग्रता को भी प्रभावित करता है. जब हम सोशल मीडिया पर होते हैं, तो हम लगातार नए अपडेट देखने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं. इससे हमारा ध्यान भंग होता है और हम अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं. यह हमारी रचनात्मकता को भी प्रभावित करता है क्योंकि हम नए विचारों को उत्पन्न करने में सक्षम नहीं होते हैं.

यदि आप अपनी रचनात्मकता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है. आपको अपने समय को उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आपको रचनात्मक बनाती हैं, जैसे कि पढ़ना, लिखना, चित्र बनाना, या संगीत सुनना. आपको सोशल मीडिया पर केवल उन समयों पर जाना चाहिए जब आपको वास्तव में इसकी आवश्यकता हो.

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सोशल मीडिया आपकी रचनात्मकता को खत्म कर सकता है:

जब आप सोशल मीडिया पर होते हैं, तो आप लगातार नए अपडेट देखने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं. इससे आपका ध्यान भंग होता है और आप अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं.

सोशल मीडिया पर आप हर समय नई चीजें देख रहे होते हैं. आप दूसरों की पोस्ट देख रहे होते हैं, आप उनके विचारों और राय पढ़ रहे होते हैं, और आप उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह सब इतना अधिक हो सकता है कि आपको खुद के विचारों और राय उत्पन्न करने का समय नहीं मिलता है. आप दूसरों के विचारों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि आप अपनी रचनात्मकता को खो देते हैं.

सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग आपके तनाव और चिंता को भी बढ़ा सकता है. जब आप सोशल मीडिया पर होते हैं, तो आप लगातार दूसरों की तुलना कर रहे होते हैं. आप देख रहे होते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, वे क्या खरीद रहे हैं, और वे कहां जा रहे हैं. यह आपको असुरक्षित और तनावग्रस्त महसूस करा सकता है.

यदि आप अपनी रचनात्मकता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है. आपको अपने समय को उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आपको रचनात्मक बनाती हैं, जैसे कि पढ़ना, लिखना, चित्र बनाना, या संगीत सुनना. आपको सोशल मीडिया पर केवल उन समयों पर जाना चाहिए जब आपको वास्तव में इसकी आवश्यकता हो.

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© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

22-08-2023

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 133 ⇒ कुछ तो बोलो… ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुछ तो बोलो”।)  

? अभी अभी # 133 ⇒ कुछ तो बोलो? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

 

कुछ हमसे बात करो !

कुछ लोग बोलने को, बातें करने को तरस जाते हैं।

वे बोलते हैं, तो उन्हें कोई सुनने वाला नहीं होता, वे चाहते हैं, कोई उनसे सुख दुख की बात करें, लेकिन उन्हें कोई बात करने वाला ही नहीं मिलता।

बातों से हमारे जज्बात जुड़े रहते हैं। किसी की बात समझने के लिए, उसके दिल की गहराइयों तक जाना पड़ता है, लेकिन हम इतने खुदगर्ज होते हैं कि जब तक किसी से कोई फायदा मतलब ना हो, हम किसी को घास नहीं डालते। होती है एक उम्र बेफिक्री और नादानी की, जिसमें सब अपने ही नजर आते हैं। किसी से भी दिल खोलकर बातें करने की।।

बच्चा जब छोटे से बड़ा होने लगता है, तो सबसे पहले चलना और बोलना सीखता है। वह लगातार चलते ही रहना चाहता है, बिना रुके बोलते रहना चाहता है। वह सुनता है, समझता है और छोटे छोटे वाक्य बनाकर अपनी बातें समझाना चाहता है, कभी तुतलाता है, तो कभी हकलाता है।

कितनी प्यारी लगती है, बच्चों की बोली ! है न, है न, है न, के बिना गाड़ी ही स्टार्ट नहीं होती। और एक बार गाड़ी स्टार्ट हुई तो फिर जिंदगी भर रुकने का नाम नहीं लेती। बातों से पेट नहीं भरता, लेकिन बात है कि हजम भी नहीं होती।।

लेकिन अचानक क्या बात हो जाती है, कि कभी कभी बात ही नहीं बन पाती। कुछ बातें कही नहीं जाती, और कुछ बातें, कहे बिना रहा नहीं जाता। इंसान समझ ही नहीं पाता, जाएं तो जाएं कहां ! समझेगा, कौन यहां, दिल की जुबां।

कभी खुद पे, कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो, हर बात पे रोना आया !

अचानक उसे लगता है, वह बहुत अकेला है।।

उनको ये शिकायत है कि,

हम कुछ नहीं कहते।

अपनी तो ये आदत है कि

हम कुछ नहीं कहते।

लेकिन ऐसा होता क्यों है, क्योंकि कुछ कहने पे, तूफान उठा लेती है ये दुनिया। अब इस पे कयामत है कि, हम कुछ नहीं कहते।

यूं हसरतों के दाग, मुहब्बत में धो लिए। खुद दिल से दिल की बात कही, और रो लिए। होठों को सी चुके तो जमाने ने यूं कहा, यूं चुप सी क्यूं लगी है, अजी कुछ तो बोलिए।।

बोलने से इंसान हल्का होता है, जब कोई नहीं सुनता, तो इंसान खुद को ही सुनाता है, कभी खुद से बात करता है, कभी आईने से। कभी रूमाल गीले करता है तो कभी कागज़ रंग देता है। कभी गज़ल, रुबाई, कविता, तो कभी महाकाव्य प्रकट हो जाता है।

हम वही सुनना चाहते हैं जो कर्णप्रिय हो। बच्चों की मीठी बातें, कोयल की कूक, सुर संगीत की तान, किसी का दुखड़ा, किसी की कर्कश आवाज, क्रोध और अपमान भरे शब्द कौन सुनना चाहेगा।।

और आखिरकार उम्र का एक पड़ाव ऐसा भी आ जाता है कि आदमी अकेला पड़ जाता है ;

साथी ना कोई मंजिल

दीया है न कोई महफिल

चला मुझे लेके ऐ दिल

अकेला कहां …

और वह बेचारा कहता रह जाता है, बीती बातों का कुछ खयाल करो। कुछ तो बोलो, कुछ हमसे बात करो। तुम मुझे यूं भुला न पाओगे।।

अपनी अपनी सभी कहना चाहते हैं, दूसरों की कोई सुनना नहीं चाहता, फिर भी एक अदृश्य श्रोता है, जो सबकी सुनता भी है, और सबको समझता भी है, बस उसे ही सुनाएं अपना हाले दिल, करें अपनी दास्तान बयान, वह सुनेगा, मन लगाकर सुनेगा, आपके अंदर बैठकर सुनेगा। उसके रहते कभी आप अकेले नहीं, असहाय नहीं, बेचारे नहीं।

सुनता है गुरु ज्ञानी ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 80 – पानीपत… भाग – 10 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। आज प्रस्तुत है आपके एक विचारणीय आलेख  “पानीपत…“ श्रृंखला की अगली कड़ी।

☆ आलेख # 80 – पानीपत… भाग – 10 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

बैंक्स को नेटवर्किंग जिसे कोर बैंकिंग भी कहा गया, उसी तरह अटपटा लगा जैसे हायर सेकेंडरी तक हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ने के बाद महाविद्यालयीन शिक्षा अंग्रेजी में हो और समझने वाले और समझाने वाले अलग अलग पादान पर खड़े हों. इसी को “सर के ऊपर से निकलना” भी कहा जाता है. बदलते समय के साथ आधुनिकता को अपनाना हमेशा वाणिज्यिक अनिवार्यता रही है और इस परिवर्तन को सुगमतापूर्वक लागू करना भी उतना ही आवश्यक है. यहाँ कम्फर्ट ज़ोन में रहने का मतलब पाषाण युग में रहने जैसा पिछड़ापन माना जाता है. अगर रुक जायेंगे तो बदलाव आपको अकेला छोड़कर आगे बढ़ जायेंगे और यह अयोग्यता की पहचान बन जायेगी. कोर बैंकिंग प्रणाली को लागू करना बड़ी और जटिल शाखाओं के लिये उससे भी बड़ी और अनवरत चलने वाली जटिलताएं लेकर आया. इसे विशेषज्ञों की भाषा में “teething problems” कहा जाता है. विडंबना है कि जो इस तकलीफ से गुजरते हैं वो इस टर्मिनालाजी को नहीं समझ पाते और जो समझ पाते हैं, वे जटिलता किस चिड़िया का नाम है, ये समझ नहीं पाते. तो जो कुछ नहीं जानते थे और जिनके सर पर ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं थी, उनके लिये ये आम बात थी पर जिन्हें इस प्रणाली को शाखाओं में लागू करना था, उनके लिये ये भी एक तरह का पानीपत था. दिन हो या रात, जिस तरह बेटी के विवाह में पिता को कन्या के अलावा भी बहुत कुछ दान करना पड़ता है, छोड़ना पड़ता है, उसी तरह बेहाल थे वे सारे प्रबंधक जो इन जटिल शाखाओं के सिरमौर थे. उनकी हालत हाइवे या फ्लाईओवर से सटे घर के निवासी समान था जहाँ गुजरनेवाली हर बस हर ट्रक लगता है सीने पर से ही गुजर रही है.

पानीपत शाखा में भी यही जटिलता नजर आने लगी थी. नये सिस्टम को जानना और समझना शाखा के हर स्टाफ की इच्छा थी जो वक्त के साथ धीरे धीरे क्षमता में वृद्धि कर ही देता. पर कस्टमर्स की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप हर काम का होना धीरे धीरे ही संभव था, त्वरित निदान सपना था. शुरुआत में ऐसा ही लगा कि पहले से कच्चे रास्तों पर चलने वाली गाड़ी, रेतीले पथ पर चल कम और घिसट ज्यादा रही है.

दशहरा-दीपावली का अंतराल दैनिक कामों के अलावा फेस्टिवल बोनांजा भी लेकर आता है जो वाहन ऋणों के बजट को आसानी से पाने में मदद करता है. ये ऐसा समय भी होता है जब प्रवासी स्टाफ ये फेस्टिवल अपने परिवार के साथ मनाने के लिये अवकाश मांगता है. हमारे मुख्य प्रबंधक इन सबकी जिम्मेदारी अपने अधीनस्थ प्रबंधकों को सौंपकर, उनके कालातीत होने वाली यात्रा अवकाश सुविधा युक्त यात्रा पर रवाना हो चुके थे. कुरुक्षेत्र का युद्ध ऑफीशियेटिंग कर रहे योद्धाओं द्वारा लड़ा जा रहा था. शायद ये आत्मा की गहराइयों तक पहुंच रहे “स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति” के संकल्प का नतीजा था कि संस्था से विरक्ति की भावना उन्हें उत्तरदायित्व निर्वहन की चिंताओं से भी मुक्त कर रही थी. आई. सी. यू. से वेंटिलेटर की यात्रा का रिटर्न टिकट प्रबल जिजीविषा के बिना मिलता नहीं है. अंतत:वही हुआ जो ऐसी स्थिति में होता है. अर्जुन को गीता का ज्ञान देने वाले कृष्ण इस कुरुक्षेत्र में नहीं थे जो उन्हें रणभूमि के योद्धाओं के कर्तव्य और रणभूमि नहीं त्यागने की मजबूरी समझा पाते. पलायन दशहरे से दीपावली पर्व तक का अंतराल ले चुका था और देवउठनी एकादशी के साथ ही पानीपत के देव भी उठकर, मंद गति और तनाव से ध्वस्त मनोबल के साथ अवतरित हुए. अवकाश से वापसी, व्यक्तित्व में जोश, ताजगी और क्षमता में वृद्धि लेकर होती है जो यहाँ नदारद थी.

पुनः यह लिखना आवश्यक है कि इस श्रंखला का किसी व्यक्ति विशेष से कोई संबध नहीं है. पानीपत का सामना करना असाइनमेंट की अनिवार्यता होती है जो व्यक्ति पर ही निर्भर करती है. श्रंखला जारी रहेगी.

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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