हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य#118 ☆ अभी थे वे, अब नहीं है…..☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  रात  का चौकीदार”  महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं एक भावप्रवण कविता “अभी थे वे, अब नहीं है…..”)

☆  तन्मय साहित्य  #118 ☆

☆ अभी थे वे, अब नहीं है….. ☆

अभी थे वे, अब नहीं है

जिंदगी का, सच यही है।

 

आज तो उनने, सुबह की चाय पी थी

और सब को, रोज जैसी राय दी थी

सुई-धागा हाथ में ले, सिल रहे थे,

बाँह कुर्ते की फटी, निरुपाय सी थी।

उलझते से, क्षुब्ध टाँके

कुछ कहीं, तो कुछ कहीं है

जिंदगी का सच यही है….

 

कह रहे थे, काम हैं कितने अधूरे

कामना थी, शीघ्र वे हो जाएँ पूरे

हैं सभी अंजान हम अगली घड़ी से,

एक पल में ध्वस्त सब मन के कँगूरे।

एषणाओं से भरा मन

अनगिनत खाते-बही है

जिंदगी का सच यही है….

 

कल नहा कर जब,अगरबत्ती जलाई

प्रार्थना के संग, फूटी थी रुलाई

बुदबुदाते से स्वयं, कुछ कह रहे थे,

किस अजाने से, उन्होंने लौ लगाई।

दिप्त मुखमुद्रा विलक्षण

जो दिखी वह अनकही है

जिंदगी का सच यही है….

 

बुलबुले हँसते-विहँसते जो खिले ये

कौन से पल बून्द बन जल में मिले ये

क्रम यही बनने-बिगड़ने का निरंतर,

जिंदगी के सर्वकालिक सिलसिले ये।

श्वांस सेतु, बटोही का

देहावरण शाश्वत नहीं है

जिंदगी का सच यही है

अभी थे वे, अब नहीं है।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलमा की कलम से#11 ☆ गीत – जाने किस गांव में ☆ डॉ. सलमा जमाल

डॉ.  सलमा जमाल

(डा. सलमा जमाल जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। रानी दुर्गावती विश्विद्यालय जबलपुर से  एम. ए. (हिन्दी, इतिहास, समाज शास्त्र), बी.एड., पी एच डी (मानद), डी लिट (मानद), एल. एल.बी. की शिक्षा प्राप्त ।  15 वर्षों का शिक्षण कार्य का अनुभव  एवं विगत 22 वर्षों से समाज सेवारत ।आकाशवाणी छतरपुर/जबलपुर एवं दूरदर्शन भोपाल में काव्यांजलि में लगभग प्रतिवर्ष रचनाओं का प्रसारण। कवि सम्मेलनों, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जिनमें भारत सरकार की पत्रिका “पर्यावरण” दिल्ली प्रमुख हैं में रचनाएँ सतत प्रकाशित।अब तक लगभग 72 राष्ट्रीय एवं 3 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार/अलंकरण। वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति, पाँच संस्थाओं की संरक्षिका एवं विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन। ) 

आपके द्वारा रचित अमृत का सागर (गीता-चिन्तन) और बुन्देली हनुमान चालीसा (आल्हा शैली) हमारी साँझा विरासत के प्रतीक है। 

आप प्रत्येक बुधवार को आपका साप्ताहिक स्तम्भ  ‘सलमा की कलम से’ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर गीत  “जाने किस गांव में”। 

✒️ साप्ताहिक स्तम्भ – सलमा की कलम से # 11 ✒️

?  गीत – जाने किस गांव में  —  डॉ. सलमा जमाल ?

होकर दीवानी मैं ढूंढती ही रही,

कभी इस गांव में, कभी उस गांव में ।

वो मिले ही , नहीं छुप गए हैं कहां,

जाने किस शहर में ,पेड़ों की छांव में ।।

 

इस ज़माने में उनको पाने के लिए,

मैंने सब कुछ किया, पर वफ़ा ना मिली ,

हर तरफ़ से मुझको ही शिकस्त मिली,

एक के बाद एक , हर प्यार के दांव में ।

होकर दीवानी ————- ।।

 

मुझको मंज़िल अभी तक मिली ही नहीं ,

चलते चलते अभी तक थकी ही नहीं ,

मेरे पैरों में कांटे चुभे अनगिनत ,

आज इस गांव में, तो कल उस पांव में ।

होकर दीवानी ————- ।।

 

एक ज़माना था दोनों ही दीवाने थे,

प्यार के दरिया से दोनों अनजाने थे ,

बदनसीबी नहीं है तो फिर और क्या ,

मैं हूं मझधार में ,वो जाने किस नाव में ।

होके दीवाने ————— ।।

 

मेरी राहें अलग ,उनकी मंज़िल जुदा ,

“सलमा”आज कहती है , हाफ़िज़ ख़ुदा ,

बेरहम दुनिया ने डाली हैं बेड़ियां ,

मेरे भी पांव में, उनके भी पांव में ।

होकर दीवाने ————– ।।

 

© डा. सलमा जमाल 

298, प्रगति नगर, तिलहरी, चौथा मील, मंडला रोड, पोस्ट बिलहरी, जबलपुर 482020
email – [email protected]

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शब्द मेरे अर्थ तुम्हारे – 10 – प्रेम, युद्ध और राजनीति ☆ श्री हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

☆ शब्द मेरे अर्थ तुम्हारे – 10 ☆ हेमन्त बावनकर

☆ प्रेम, युद्ध और राजनीति

यदि

‘प्रेम’ और ‘युद्ध’ में

सब ‘उचित’ है*

और

प्रेम, युद्ध और राजनीति में भी

सब ‘उचित’ है

इसका तात्पर्य है कि,

‘राजनीति’ में

सब ‘उचित’, ‘अनुचित’ 

और

सब ‘अनुचित’, ‘उचित’ ।

 

संभवतः

लोकतान्त्रिक समाज में

परस्पर ‘प्रेम’ के लिए

स्त्री और पुरुष का होना आवश्यक नहीं।  

‘युद्ध’ के लिए

राष्ट्रों का होना आवश्यक नहीं।  

और

परस्पर ‘राजनीति’ के लिए भी

राष्ट्रों का होना आवश्यक नहीं।  

 

संभवतः

लोकतान्त्रिक समाज में

धर्म, जाति और मानवीय संवेदनाओं  

की भुजाओं से निर्मित

‘त्रिकोण’ के तीन कोण हैं

प्रेम, युद्ध और राजनीति।  

 

अब

आप स्वयं तय करें  

कि आप

‘त्रिकोण’ के अंदर हैं,

‘त्रिकोण’ के बाहर हैं

या

तटस्थ हैं।

 

  * “All is fair in love in war” (प्रेम में सब उचित है) भावना का सबसे प्रथम उपयोग 1579 में प्रकाशित कवि जॉन लिली के उपन्यास “Euphues: The Anatomy of Wit” में किया गया था।   स्त्रोत – इंटरनेट

 

© हेमन्त बावनकर, पुणे 

2 फ़रवरी  2022

मो 9833727628

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 12 (11-15)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #12 (11-15) ॥ ☆

सर्गः-12

हुआ अयोध्या राज्य, बिन राजा के अति दीन।

छिद्रान्वेषी शत्रुगण, करने लगे मलीन।।11।।

 

तब अमात्यों ने भरत को, जो थे तब ननिहाल।

लेने भेजे मंत्रिगण बिना कहे कुछ हाल।।12।।

 

आके जाना भरत ने पिता-मरण की बात।

विमुख हुये, माँ, राज्य से सह न सके आघात।।13।।

 

सेन सहित तहँ-गये भरत जहाँ गये थे राम।

रोये लख वे विषम थल जहाँ किया विश्राम।।14।।

 

कहा भरत ने राम से, हुये दिवंगत तात।

राज्य-लक्ष्मी धर्म से बड़े की है सौगात।।15अ।।

 

चलें अयोध्या इसलिये और करें उपभोग।

कर सहता मैं कभी भी नीिं उसका उपयोग।।15ब।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 18 – सजल – कौन है अमृत पीकर आया… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है बुंदेली गीत  “कौन है अमृत पीकर आया…..। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # 18 – सजल – कौन है अमृत पीकर आया…

समांत- अले

पदांत- गए हैं

मात्राभार- 16

 

मानव हर युग दले गए हैं।

हर संकट में तले गए हैं।।

 

सतयुग हो या द्वापर का युग,

राम कृष्ण भी छले गए हैं ।

 

कौन है अमृत पीकर आया,

छोड़ सभी कुछ चले गए हैं।

 

सूरज ने सबको तड़पाया,

तपती धूप से ढले गए हैं।

 

आश्रय मात पिता से मिलता,

गुण-अवगुण में पले गए हैं।

 

परोपकार हैं वृक्ष हमारे,

सबको देने फले गए हैं।

 

ईश्वर की अनुकम्पा सब पर,

फिर भी हम सब खले गए हैं।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

५ जुलाई 2021

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य#112 – कविता – माघ का महीना …. ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  “माघ का महीना ….”। इस विचारणीय रचनाके लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 112 ☆

? कविता –? माघ का महीना कड़कड़ाती ठंड, बड़े भाग्य शाली हैं बसे है रेवा खंड ? ?

 

शंभु पसीना बन कर निकली, मां नर्मदा बेटी समान

माघ महिना तिल दान स्नान, पूजे नर्मदा सरिता जान।

 

बहे नर्मदा अविरल धारा, शिव शंभु ने दिया वरदान

कण-कण शंकर हर कंकण, दर्शन मात्र पून्य महान।

 

मकर वाहिनी सरिता नर्मदा, निश्चल तेज बहे छल छल

घाट घाट को खूब संवारती, श्वेत जल धार बहे निर्मल।

 

साधु संतो की अमृत वाणी, गुजें हर पल वेदों का स्वर

त्रिपुर सुन्दरी मां विराजती, भेड़ाघाट नर्मदा तेवर।

 

पंचवटी में नौका विहार, सबके मन करती खुशहाल

संगमरमर की सुंदर आभा, मूरत बन कर करें निहाल।

 

तीर्थ स्नान बारम्बार, दर्शन मात्र मां नर्मदा

भक्तों का करती कल्याण स्मरण करें नित भोर सर्वदा।

 

अमरकंटक से निकली नर्मदा, सतपुडा के घने जंगल

सागौन नीलगिरी और पलाश, वृक्ष साधे नभ मंडल।

 

भेट चढ़ाएं लाल चुनरिया, भोग लगे चना अरु खिचड़ी

भक्त जनों की दुख पीड़ा, कष्ट हरे संवारती बिगड़ी।

 

आरती वंदन पुन्य सलीला, माघ महिना लगता मेला

दूर दूर से दर्शन को आए, घाटन घाट सजा रंगीला।

 

मां नर्मदा महाआरती, करती भक्तों का कल्याण

जनम जनम के पाप कटे, नित करते जप और ध्यान।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 12 (6-10)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥

॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #12 (6-10) ॥ ☆

सर्गः-12

 

प्रथम, राम चौदह बरस वन में करें निवास।

भरत बनें राजा, द्वितीय जिनसे हुआ विनाश।।6।।

 

आज्ञा करने राज्य की, लगी राम को भार।

वन जाने की बात थी उन्हें सहज स्वीकार।।7।।

 

वस्त्राभूषण राजसी या वल्कल परिधान।

चकित थे सब यह देख, थे राम को एक समान।।8।।

 

पितृ आज्ञ को मान कर दशरथ वचन प्रमाण।

पाया सीता, लखन सह, वन जा उच्च स्थान।।9।।

 

याद आया दशरथ को भी श्रवण-मरण संयोग।

तजे शाप वश प्राण निज पाकर पुत्र-वियोग।।10।।

 

© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’   

A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 75 – दोहे ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 75 –  दोहे ✍

चटकाते चप्पल फिरे, फिर चुनाव की दौड़ ।

मंत्री पद पर बैठकर, जोड़े पांच करोड़।।

 

पावन गांधी नाम को, इतना किया खराब।

 नाम रखा उस मार्ग का, बिकती जहां शराब।।

 

चादर गांधी नाम की, ओढ़े फिरें जनाब ।

मांसाहारी आचरण, जमके पियें शराब।।

 

सत्याग्रह के अर्थ को, क्या समझेंगे आप ।

भ्रष्ट आचरण युक्त हैं, सारे क्रियाकलाप।।

 

तख्तनशीनी  हुई तो, हुए दूधिया आप ।

बदली सारी व्यवस्था, छिपा लिए सब पाप।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत # 75 – “जो छुपाये स्वयम्  में है ….” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “जो छुपाये स्वयम्  में है ….।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 75 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ || “जो छुपाये स्वयम्  में है ….” || ☆

नदी,घाटी,पर्वतों ,

पसरा हुआ है नील ।

जहाँ मौसम दिख रहा

है स्वत: ही अश्लील ।।

 

निकल कर अमराईयों से

झील पोखर में उतरता ।

सालता है , निरुत्तर हो

गली कूचों से गुजरता ।।

 

महमहाती देह की इस

नर्म सी बारादरी पर।

हुक्म की बे-वजह कह-

लो हो रही तामील।।

 

यहाँ पर यह कठिनतम

शालीन झुरमुट बेतहाशा ।

जो छुपाये स्वयम्  में है

वेदना दायक तमाशा।।

 

देह का आस्वाद देती

सामने आ थमी ।

रजत-पट की दिख रही

है श्वेत श्यामा रील ।।

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

20-01-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # 122 ☆ तंग करती कविता ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है  एक विचारणीय कविता ‘तंग करती कविता’ )  

☆ कविता  # 122 ☆ तंग करती कविता ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

कविता लिखने के लिए,

आज छुट्टी ले ली है,

दिन भर बिस्तर पर,

कविता – अविता चली,

बिस्तर में लेटकर,

मैदान में खेलता रहा,

फिर बेहूदा डांस,

उसी परदे पर देखा,

आज कविता के लिए,

किसी चैनल में जगह नहीं,

मां के बारे में कविता,

अभी लिखी नहीं है,

नदी का ऐसा है कि,

नदी अभी सूख गई है,

घर का मत पूछो,

वहां अभी मनहूसियत है,

पत्नी अभी बच्ची को,

कविता याद करा रही है,

प्रेमिका बिना प्रेम किए,

बहुत दूर बस गई है,

कविताएँ इधर-उधर,

डूबकर उतरा तो रहीं हैं,

पर गजब है कि कोई,

कविता हाथ नहीं आ रही है,

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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