हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हौसला… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता हौसला…।)

☆ कविता – हौसला… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तुमने राह में दीप जलाकर,

ज्योतिर्मय पथ कर दिया,

दूर अंधेरा हुआ राह को,

सुगम पथ कर दिया,

माना कि लम्हे खुशियों के,

होते हैं बहुत कम,

पर तुम जीवन में आए,

जीवन खुशमय कर दिया,

वो हमसफर जो साथ दे,

सुख में, दुख में,

हाथ पकड़ कर, छोड़े न,

साथ हमारा कर लिया,

राज की एक बात है,

राज न रह पाएगी,

रास्ता उनसे पूछकर,

मिलने का हौसला कर लिया.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of social media # 228 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain (IN) Pravin Raghuvanshi, NM

? Anonymous Litterateur of social media # 228 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 228) ?

Captain Pravin Raghuvanshi NM—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. An alumnus of IIM Ahmedabad was involved in various Artificial and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’. He is also the English Editor for the web magazine www.e-abhivyakti.com

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc.

Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi. He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper. The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his Naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Awards and C-in-C Commendation. He has won many national and international awards.

He is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves writing various books and translation work including over 100 Bollywood songs for various international forums as a mission for the enjoyment of the global viewers. Published various books and over 3000 poems, stories, blogs and other literary work at national and international level. Felicitated by numerous literary bodies..! 

? English translation of Urdu poetry couplets of Anonymous litterateur of Social Media # 228 ?

☆☆☆☆☆

क्यूँ शर्मिंदा करते हो रोज

हाल हमारा पूछ कर…

हाल  हमारा  वही  है

जो तुमने बना रखा है..

 ☆☆

Why d’you embarrass me everyday

By inquiring about my condition…

My condition  is  the   same only

As to what you have made me of

☆☆☆☆☆

सब्र तहजीब है…

मोहब्बत की साहब

और तुम समझते हो

कि बेजुबां  हैं  हम…

 ☆☆

O’ dear! Reticence is an

etiquette of endearment

And you think that

I  am  speechless …

 ☆☆☆☆☆

न जाहिर हुई तुमसे…

और न ही बयाँ हुई हमसे

बस सुलझी हुई आँखो में

उलझी रही मोहब्बत…

 ☆☆

Neither it was expressed by you

Nor was it ever revealed by me

Love just remained  entangled

Explicitly in the unravelled eyes!

 ☆☆☆☆☆

एहसास सच्चे हों

तो वही काफी है

यकीन तो लोग

सच पर भी नहीं करते…

☆☆

If the feelings are true

That itself  is enough

People don’t even

Believe in  the truth…!

☆☆☆☆☆

~ Pravin Raghuvanshi

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 635 ⇒ ओ रंगरेज ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी कविता – “ओ रंगरेज।)

?अभी अभी # 635 ⇒  ओ रंगरेज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ओ रंगरेज

इस होली पर

तू रंग दे मेरी जेब ।

 

सुना है,

भरी जेब

रंग लाती है

रौब लाती है

और कपड़ों के

लिए वॉर्डरोब

लाती है ।।

 

मेरे देश में

सबकी सदा

भरी रहे जेब ,

रंगत हो चेहरे पर

संगत हो संतों की

सज्जन पुरुषों की ।

 

तू ही मसीहा

तू ही रहबर

तेरे किस्से हैरतअंगेज

ना गरीबी हो

ना मुफलिसी हो

सब ओर हो

अमन चैन ,

ना हो चेहरा उदास

भरी भरी रहे जेब

ओ रंगरेज

तू भर दे मेरी जेब ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # 227 – अपराजिता ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अपराजिता)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 227 ☆

☆ अपराजिता ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

ओ मेरी अपराजिता! तुमको पा जग-जयी मैं

.

जड़ माटी में जमाकर

हुईं अंकुरित-पल्लवित।

धूप-छाँव हँसकर सहे-

हँस भव-बाधा की विजित।

ओ मेरी अपराजिता! तुमको पा निर्भयी  मैं

श्वेत-नील छवि मुग्धकर

सुख देती; दुख दग्ध कर।

मुस्कातीं मन मोहतीं-  

बाँहों में आबद्ध कर।

ओ मेरी अपराजिता! तुमको पा तन्मयी मैं

हरि-भरी आशा-लता

हर लेती हर आपदा।

धनी न मुझ सा अन्य है-

तुम मम अक्षय संपदा।

ओ मेरी अपराजिता! तुमको पा सुहृदयी मैं

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

 

१५.३. २०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ऐसे न मुझको भेज री माई ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम और भावप्रवण कविता ऐसे न मुझको भेज री माई )

☆ कविता – ऐसे न मुझको भेज री माई ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

ऐसे न मुझको भेज री माई

दे दे मुझे दहेज री माई

 *

उजली सी एक रात भी देना

तारों की बारात भी देना

और बादल की सेज री माई

 *

सपनों वाली आँख भी देना

उड़ने को फिर पाँख भी देना

और अंबर के भेद री माई

 *

प्रेम पगा ये गाँव भी देना

नीम की थोड़ी छाँव भी देना

और मिट्टी ज़रख़ेज़ री माई

 *

अपने हाथ की मठरी देना

यादों की एक गठरी देना

आँसू अपने सहेज री माई।

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – गौरैया दिवस विशेष – आदमकद ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आदमकद ? ?

(20 मार्च – गौरैया दिवस पर विशेष )

ये उन दिनों की बात है

जब सचमुच आदमकद था आदमी,

केवल ऊँचाई से नहीं

मन से भी ऊँचा था आदमी,

ऊँची-ऊँची फसलें

उगाता था आदमी,

थोड़ा सा हिस्सा

नन्हीं गौरैया के लिए

रख छोड़ता था आदमी…,

 

गौरैया के मन में

आदमी का कद बहुत ऊँचा था,

शायद यही वज़ह थी

आदमकद था आदमी….

 

आंगन आदमी के घर का हो,

आंगन आदमी के मन का हो,

आंगन में जगह बहुत बड़ी थी

जिसमें गौरैया को घोंसला बनाने,

चुरुंगनों को उड़ने की अनुमति थी,

सच पूछें तो हिल मिलकर रहते थे

गौरैया और आदमी….

 

आदमी को गौरैया से खास नेह था,

मानो गौरैया का संरक्षक था आदमी,

चिरैया में अपनी बेटी को देखता,

बेटी में चिरैया निहारता था आदमी…

 

ये वे  दिन थे

जब धरती को

माँ कहता था आदमी,

फिर एकाएक आदमी का मन

सिकुड़ने लगा,

विधान का चक्र उल्टा फिरने लगा,

आदमी, धरती का सौदा करने लगा..,

 

गोरैया की इंच भर जगह

आदमी को खलने लगी,

इंच-इंच धरती

अब बिकने लगी,

आदमी की आँख में

दुर्योधन उतरने लगा,

 घर का हो या मन का

आदमी के आँगन से

गोरैया का निष्कासन होने लगा,

 

फिर आदमी ने काट डाले पेड़,

आदमी ने नोंच डाले घोंसले,

तिल-तिल मरने लगी चिड़िया..,

लालची आदमी ने

धरती की कोख में

उतार दिया हलाहल,

और फसलों पर

छिड़क दिया ज़हर,

तड़प-तड़प कर

मरने लगी गोरैया,

 

फिर आदमी ने

गोरैया के ताबूत में

ठोंक डाली आखिरी कील,

मोबाइल टावर खड़े कर

चिरैया की उत्पत्ति ही रोक डाली..,

 

अब आदमी के पास घर है,

अब आदमी के पास मन है,

पर घर का हो या मन का,

किसी आँगन में अब

फुदकती नहीं चिरैया…,

 

बगुला भगत निकला आदमी,

गोरैया को मिटाकर

गोरैया दिवस मनाने लगा आदमी..,

 

आदमजात में कोई-कोई कवि होता है,

कवि अपने समय की आँख होता है,

इस आँख में सपना पलता है,

प्रकृति अपना चक्र घुमायेगी,

बीते दिन फिर लौटा लायेगी,

साथ-साथ जिएँगे गोरैया और आदमी,

गोरैया का घर-आँगन

फिर महक उठेगा,

बौना आदमी,

गोरैया के मन में

एक दिन फिर आदमकद हो उठेगा..!

?

© संजय भारद्वाज  

7 मार्च 2022, रात्रि 2:38 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # 152 ☆ मुक्तक – ॥ बस दुआओं के चिराग दिल में जलाए रखिए॥ ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # 152 ☆

☆ मुक्तक – ।। बस दुआओं के चिराग दिल में जलाए रखिए।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

बस दुआयों   के  चिराग जलाए  रखिए।

सब की  राह   में  फूल बिछाए  रखिए।।

एक ही  मिली  है  यह अनमोल जिंदगी।

बस दिलों से   दिलों को मिलाए  रखिए।।

=2=

कभी-कभी किसीकी गलती छुपाए   रखिए।

बिगड़ी बात हो फिर  भी  बनाए   रखिए।।

दिल रखो  अपना आप  एक दरिया जैसा।

जितना हो खुशियों के मोती लुटाए   राखिए।।

=3=

मुश्किलों में भी पाँव  अपने जमाए राखिए।

दुःखों मे भी हौंसला अपना बनाए   रखिए।।

सुख दुख तो जीवन केअंग होते हैं हमेशा ही।

बस हिम्मत से कदम हमेशा बढ़ाए   रखिए।।

=4=

हमेशा प्यार की  लगन को लगाए  रखिए।

रूठों को भी  हमेशा अपना बनाए  रखिए।।

मोहब्बत का लेन- देन  कारोबार हो आपका।

स्नेह प्रेम मूरत हमेशा  दिल में बसाए रखिए।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #217 ☆ शिक्षाप्रद बाल गीत – कविता – हमारा देश… ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – हमारा देश। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # 217

☆ शिक्षाप्रद बाल गीत – हमारा देश…  ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

सागर में पथ दिखलाने को ज्यों ध्रुव तारा है ।

जो भटके राही का केवल एक सहारा है ॥

*

 इस दुनिया के बीच चमकता देश हमारा है।

 हम इसमें जन्मे इससे यह हमको प्यारा है ॥

*

हम सब भारतवासी हैं इसकी प्यारी सन्तान

सबमें स्नेह भावना है हम सब हैं एक समान

*

दुनिया भर में इसकी सबसे शोभा न्यारी है।

पर्वत, नदी, समुद्र, खेत सुन्दर हर क्यारी है ॥

*

 यह ही है वह देश जहाँ जन्मे थे राघव राम ।

प्रेम, त्याग औ’ न्याय, धर्म हित थे जिनके सब काम ॥

*

 यह ही है वह देश जहाँ पर है वृन्दावन धाम ।

 जहाँ बजी थी मुरली औ’ थे रमे जहाँ घनश्याम ॥

*

यह ही है वह देश जहाँ जन्मे थे बुद्ध महान् ।

सारी दुनिया को प्रकाश दे सका कि जिनका ज्ञान ॥

*

 यहीं हुये गाँधी जिनने पाई हिंसा पर जीत ।

जो उनका दुश्मन था वह भी था उनको तो मीत ॥

*

 अनुपम है यह देश प्रकृति ने जिसे दिया सब दान ।

महात्माओं ने ज्ञान और ईश्वर ने भी सन्मान ॥

*

हम इसके सुयोग्य बेटे बन रखे इसकी शान ।

हमें शक्ति वरदान आज इतना दीजे भगवान ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मराठी कविता – परचा… – सौ. उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ ☆

श्री भगवान वैद्य प्रखर

☆ ☆ ☆ ☆

(विगत दिवस श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ जी ‘महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित हुए)

💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई 💐

☆ मराठी कविता – परचा… – सौ. उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

सौ. उज्ज्वला केळकर

नाद…घंटा नाद

निरंतर टकराता हुआ

नादब्रह्म का विस्तारित वृत्त

छू गया…कान …मन…अंगुली

कलम के सिरे को…

आधा परचा हो गया लिखकर।

 

काफी है इतना…पैंतीस अंकों के लिए!

डिग्री और नौकरी हासिल करने के लिए

क्लर्क की…या प्यून की तो भी…

शेष परचा तौल पर है

प्रतिकूल समय में दमा-ग्रस्त मम्मी के दुख पर

बढ़ी हुई आयु की बहन की धुंधुवाती उम्मीदों पर …

नन्हें भाई-बहनों के झुलसते हरित स्वप्नांकुरों पर…

 

पीछे के बेंच से कंपास की नोंक

सट गयी है पीठ से

बदलता जा रहा है उसका स्वरूप

आकुल है वह

धारदार नुकीला छुरा बनने के लिए ।     

पांव की पिंडली के पास उसके मालिक का

कोरा परचा फड़फड़ा रहा है

सुपवाइजर की दक्ष-दृष्टि

क्लास-रूम के दरवाजे के पार टिकी हुई है

(इस देखने या न देखने की कीमत भी होगी शायद 

दस…बीस …चालीस…पचास !)

 

अब ले ही लेना चाहिए मुझे

पीछे का परचा लिखने के लिए

एक घंटा पचास मिनट हैं अभी शेष

होना ही चाहिए पूरा परचा लिखकर

उसके मालिक को प्रथम पांच में जो आना है!

कम्पेटिटिव-इक्जैम के लिए आजमाइश …

कम- अज-कम एम-कॉम के लिए एडमिशन !

मुझे केवल इतना ही करना है

उसका परचा लिखकर देना है

उसके द्वारा दिये गये परीक्षा-शुल्क के एवज में…।

** 

मूल कविता – सौ. उज्ज्वला केळकर

 

प्रस्तुती : सौ. उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो.  836 925 2454, email-id – [email protected] 

भावानुवाद  श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

30, गुरुछाया कालोनी, साईंनगर, अमरावती  444607

संपर्क : मो. 9422856767, 8971063051  * E-mail[email protected] *  web-sitehttp://sites.google.com/view/bhagwan-vaidya

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नि:शब्द ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – नि:शब्द ? ?

एक तुम हो

जो अपने प्रति

नि:शब्द रही जीवनभर,

एक मैं हूँ

जो तुम्हारे प्रति

नि:शब्द रहा जीवनभर..।

?

© संजय भारद्वाज  

11:07 बजे , 3.2.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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