श्री जय प्रकाश पाण्डेय
© जय प्रकाश पाण्डेय, जबलपुर
(श्री जय प्रकाश पाण्डेय, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा हिन्दी व्यंग्य है। )
श्री जय प्रकाश पाण्डेय
© जय प्रकाश पाण्डेय, जबलपुर
(श्री जय प्रकाश पाण्डेय, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा हिन्दी व्यंग्य है। )
सुश्री ऋतु गुप्ता
बेटी
(सुश्री ऋतु गुप्ता जी रचित अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर का एक सार्थक कविता ‘बेटी’।)
बेटी शब्द का आगाज होते ही
हृदय में सम्पूर्ण माँ बनाने की अद्वितीय अनुभूति होती है
बगैर बेटी जन्मे मानो नारी अधूरी होती है।
उसका पहली बार माँ बोलना
हृदय को मुदित ममतामयी कर जाता है
हर उदित उमंग उल्लासित कर
गरिमामयी पद अतुल्य अभिनंदन पाता है।
कदम पहला उसका उठते ही बेचैन
मन मुद्रा मुसकुराती छवि हो जाती है
उसकी इक-इक भाव भंगिमा
एकटक निहारते नैनों की चमक अद्भुत हो जाती है
विस्मय से भरता जाता उसका बड़ा होना
घर पूरा गूँजता मानों चिड़िया चहचहाती है
पग घूम-घूम जहाँ-जहाँ रखती
धरा धन्य हो अपार आभार प्रकट कर जाती है।
बेटी कभी नहीं होती पराई
जिस्म से कभी नहीं अलग होती परछाई
बड़ी होने पर भी वही आँचल आगोश सदैव लालायित रहते हैं ।
बोझ नहीं आन वह कलेजे का टुकड़ा गौरवान्वित हो कहते हैं।
© ऋतु गुप्ता
* शौर्यराणी *
डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’
(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन)
डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’
(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन)
डा. मुक्ता
निर्भया
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है एक सामयिक एवं सार्थक कविता ‘निर्भया’’)
© डा. मुक्ता
पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, ईमेल: drmukta51 @gmail.com
डा. मुक्ता
मुक्तक
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है सार्थक मुक्तक)
मौन की भाषा
© डा. मुक्ता,
पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत,drmukta51 @gmail.com
डा. मुक्ता
शहादत
(डा. मुक्ता जी का e-abhivyakti में स्वागत है। आप हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। प्रस्तुत है एक सामयिक एवं सार्थक कविता ‘शहादत’)
आज मन बहुत हैरान-परेशान सा है
दिल में उठ रहा तूफ़ान-सा है
हर इंसान पशेमा-सा है
क्यों हमारे राजनेताओं का खून नहीं खौलता
पचास सैनिकों की शहादत को देख
उनका सीना फट क्यों नहीं जाता
कितने संवेदनहीन हो गए हैं हम
चार दिन तक शोक मनाते
कैंडल मार्च निकालते,रोष जताते
इसके बाद उसी जहान में लौट जाते
भुला देते सैनिकों की शहादत
राजनेता अपनी रोटियां सेकने में
मदमस्त हो जाते
सत्ता हथियाने के लिए
विभिन्न षड्यंत्रों में लिप्त
नए-नए हथकंडे अपनाते
काश हम समझ पाते
उन शहीदों के परिवारों की मर्मांतक पीड़ा
अंतहीन दर्द, एकांत की त्रासदी
जिसे झेलते-झेलते परिवार-जन टूट जाते
हम देख पाते उनके नेत्रों से बहते अजस्र आंसू
पापा की इंतज़ार में रोते-बिलखते बच्चे
दीवारों से सर टकराती पत्नी
आगामी आपदाओं से चिंतित माता-पिता
जिनके जीवन में छा गया है गहन अंधकार
जो काले नाग की भांति फन फैलाये
उनको डसने को हरदम तत्पर
दु:ख होता है यह देख कर
जब हमारे द्वारा चुने हुये नुमाइंदे
सत्ता पर काबिज़ रहने के लिए
नित नए हथकंडे अपनाते,
शवों को देख घड़ियाली आंसू बहाते,सहानुभूति जताते
सब्ज़बाग दिखलाते,बड़े-बड़े दावे करते
परंतु स्वार्थ साधने हित,पेंतरा बदल,घात लगाते
© डा. मुक्ता,
पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत,drmukta51 @gmail.com
डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’
विश्व शांति के दौर में, आतंकी विस्फोट
मानव मन में आई क्यों, घृणा भरी यह खोट
विकृत सोच से मर चुके, कितने ही निर्दोष
सोचो अब क्या चाहिए, मातम या जयघोष
प्रश्रय जब पाते नहीं, दुष्ट और दुष्कर्म
बढ़ती सन्मति, शांति तब, बढ़ता नहीं अधर्म
दुष्ट क्लेश देते रहे, बदल ढंग, बहुभेष
युद्ध अदद चारा नहीं, लाने शांति अशेष
मानवीय संवेदना, परहित जन कल्याण
बंधुभाव वा प्रेम ने, जग से किया प्रयाण
मानवता पर घातकर, जिन्हें न होता क्षोभ
स्वार्थ-शीर्ष की चाह में, बढ़ता उनका लोभ
हर आतंकी खोजता, सदा सुरक्षित ओट
करता रहता बेहिचक, मौका पाकर चोट
पाते जो पाखंड से, भौतिक सुख-सम्मान
पोल खोलता वक्त जब, होता है अपमान
रक्त पिपासू हो गये, आतंकी, अतिक्रूर
सबक सिखाता है समय, भूले ये मगरूर
सच पैरों से कुचलता, सिर चढ़ बोले झूठ
इसीलिए अब जगत से, मानवता गई रूठ
निज बल, बुद्धि, विवेक पर, होता जिन्हें गुरूर
सत्य सदा ‘पर’ काटने, होता है मजबूर
आतंकी हरकतों से, दहल गया संसार
अमन-चैन के लिए अब, हों सब एकाकार
मानव लुट-पिट मर रहा, आतंकी के हाथ
माँगे से मिलता नहीं, मददगार का साथ
आतंकी सैलाब में, मानवता की नाव
कहर दुखों का झेलती, पाये तन मन घाव
अपराधों की श्रृंखला, झगड़े और वबाल
शांति जगत की छीनने, ये आतंकी चाल
© विजय तिवारी “किसलय”, जबलपुर
श्री आशीष कुमार
Retired दोपहर