श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री उषा सोमानी जी के बाल उपन्यास – “फूलों वाली घाटी का रहस्य” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 206 ☆
☆ बाल उपन्यास – ‘फूलों वाली घाटी का रहस्य‘ – सुश्री उषा सोमानी ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’ ☆
बाल उपन्यास- फूलों वाली घाटी का रहस्य
उपन्यासकार- उषा सोमानी
पृष्ठ संख्या- 82
मूल्य- ₹100
प्रकाशक- ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन, B-209, गीत स्काई वैली, मित्तल कॉलेज रोड, नवी बाग, भोपाल, मध्यप्रदेश- 462038
समीक्षक- श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 9424079675
☆ समीक्षा- रहस्य परिपूर्ण है फूल वाली घाटी – ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
आज के जमाने में उपन्यास लिखना वैसे भी बहुत कठिन कार्य है। क्योंकि आज के समय में कोई उपन्यास पढ़ना नहीं चाहता। उसके पास इतना समय नहीं है कि वह इतने ज्यादा पृष्ठों के उपन्यास को पढ़कर अपना समझ जाया करें। इस कारण उपन्यासकार भी उपन्यास लिखकर अपना समझ जाया नहीं करना चाहते हैं।
बालकहानी की तुलना में उपन्यास लिखना श्रमसाध्य और दूरुह कार्य है। कहानी लिखने में एक घटनाक्रम और उसके आसपास कहानी का तानाबाना बुना जाता है। जबकि उपन्यास लिखने में संपूर्ण घटनाक्रम के साथ कई पूरक घटनाएं भी उसमें डालनी पड़ती है। ताकि उपन्यास को रहस्यपूर्ण और जिज्ञासा से भरपूर बनाया जा सके।
बालक उसी चीज को पढ़ते हैं जिसमें उसे आनंद के साथ-साथ भरपूर मनोरंजन मिले। उसे लगे कि इसमें कुछ बात है जिसे जानना चाहिए। तभी वह जिज्ञासा की वशीभूत उसे चीज को पढ़ पाते हैं। इसलिए बालकों के लिए उपन्यास लिखते समय कई बातों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। वाक्य छोटे होने के साथ-साथ उसके पैराग्राफ छोटे और रहस्य-रोमांच से भरपूर हो।
इन सब बातों की कसौटी पर समीक्ष्य उपन्यास- फूलों वाली घाटी का रहस्य, को हम इस कसौटी पर कस कर देखते हैं। प्रथम दृष्टि जब हम उपन्यास के कवर को देखते हैं वह प्रथम दृष्टि हमें आकर्षित करता है। कारण, उस पर आकर्षक और रहस्यपूर्ण चित्र बना हुआ है जो बच्चों बच्चों के साथ बड़ों को लूभता है। कवर के पिछले पृष्ठ भाग पर ‘गोटी चलाओ और रहस्य ढूंढो’, नामक एक खेल बना हुआ है। जिसे बच्चे स्वयं खेल सकते हैं।
संपूर्ण उपन्यास को 14 भागों में विभाजित किया गया है। हरेक भाग का अपना एक अलग शीर्षक दिया गया है। जो उपन्यास पढ़ने की जिज्ञासा को और बढ़ा देता है। इसी के साथ उपन्यास का हरेक भाग बहुत छोटा दिया गया है। जिससे बाल पाठकों के बोर होने की संभावना नगण्य है।
उपन्यास की कथानक पर दृष्टि डाले तो कथानक बस इतना ही की उत्कृर्ष अपनी छुट्टियां मनाने के लिए अपने दादाजी के घर आता है। यहां वह गत छुट्टी की तरह ही मौजमस्ती करना और पहाड़ों पर घूमना चाहता है। मगर गांव में आते ही उसे कमरे में कैद हो जाना पड़ता है। जब वह घर से बाहर निकालने की कोशिश करता है तो उसके दादाजी, चाचाजी और अन्य सदस्य उसे बाहर जाने पर रोक लगा देते हैं। वह समझ नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा है। तभी धीरे-धीरे रहस्य दर रहस्य उसके सामने यह परत खुलती जाती है कि उसे घर से बाहर क्यों नहीं निकलने दिया जा रहा है? उसका कारण क्या है?
तब वह अपना जासूसी दिमाग लगता है। ताकि इस रहस्य को सुलझा सके। धीरे-धीरे एक-एक करके रहस्य की परते खुलती जाती है। उसे पता चल जाता है कि इन सब के पीछे किसका हाथ था? वह रहस्य क्यों बना हुआ था? बाल सुलभ जिज्ञासा के वशीभूत इस रहस्य को उत्कर्ष कैसे सुलझाता है? यह तो उपन्यास पढ़ने के बाद ही पता चलेगा।
मगर कुल मिलाकर कथानक की दृष्टि से उपन्यास बेहतर बन पड़ा है। उपन्यास के हर पृष्ठ में रहस्य को बरकरार रखा गया है। जिज्ञासा पृष्ठ दर पृष्ठ बढ़ती चली जाती है। उपन्यास की भाषा सरल, सहज और रोचक है। संवाद शैली द्वारा उपन्यास को रोचकता प्रदान की गई है। जहां कहीं भी आवश्यकता हुई वर्णनात्मक शैली का उपयोग किया गया है। वर्तमान देशकाल व परिस्थितियों का भरपूर उपयोग किया गया है। साथ ही उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट है। जो इसे पढ़ने के बाद परिलक्षित होता है।
उपन्यास की रचनाकार उषा सोमानी एक जानीमानी बाल कहानीकार है। उनकी कहानियां रोचक और रहस्य से परिपूर्ण होने के साथ मनोरंजक भी होती है। इसी का उपयोग उन्होंने अपने इस नवीनतम उपन्यास को लिखने में किया है। इसका प्रकाशन व मुद्रण ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन भोपाल द्वारा किया गया है जो साफ सुथरा और त्रूटिहीन है। रोचकता और पठनीयता की दृष्टि से उपन्यास बहुत ही बढ़िया बन पड़ा है। इस कारण यह बच्चे और बड़ों दोनों को बहुत ही अच्छा लगेगा। ऐसा इस समीक्षक को विश्वास है। पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य ₹100 वाजिब है।
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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
08-02-2024
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