हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ #84 ☆ आग्रह या दुराग्रह ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “आग्रह या दुराग्रह”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 84 ☆ आग्रह या दुराग्रह 

ग्रह शब्द जिसके भी साथ जुड़ता है उसके भाव बढ़ा देता है। आजकल सब लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित हो निर्णय करते हैं। ऐसा चुनावी मौसम में ज्यादा देखने को मिलता है। एक दूसरे को प्रलोभन देते हुए   पूरे मनोयोग से आग्रह करते हैं। मन में भले ही दुराग्रह हो पर  शब्द चासनी में लपेट कर  परोसते हैं। मीडियाकर्मियों को तो मसाला चाहिए वे फटाफट प्रश्नों की श्रंखला तैयार कर दोनों खेमें में पहुँच जाते हैं। जनता की ओर से प्रश्नोत्तर शुरू हो जाते हैं। मजे की बात कोई भी विकास के मुद्दे पर चर्चा नहीं करते बस सबको खाना पूर्ति करनी होती है। वोटर चुनावी एजेंडे को समझने हेतु एड़ी- चोटी का जोर लगा देते हैं पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। अपना सा मुख लेकर बिना कुछ समझे ही वोट देने को तैयार हो जाते हैं।

कोई बदलाव की बयार के साथ बहना चाहता है तो कोई और पाँच साल का मौका देने का विचार मन में रखता है। जोड़- तोड़ की उठा पटक के बीच कुछ लोग स्वामिभक्त  भी होते हैं वे सकारात्मकता ही देखते हुए जाति व धर्म की ओर मुड़ जाते हैं। जिसके ग्रह साथ दे गए वो जीत का ताज पहन कर इतराता हुआ पूर्णता की मनौती मनाने लगता है।

इन सबसे बेखबर जनता लोकतंत्र के पर्व को पूरे उत्साह के साथ मनाती है। उसे क्या ? कौउ नृप होय हमय का हानि के भाव को मन में भरे हुए, वोट देने जाने को आतुर रहती है। तभी गली  चौराहे में खड़े लोग आपसी परिचर्चा करके हवा का रुख निर्धारित कर देते हैं। जल्दी ही आग को हवा मिलती है और परिवार, मोहल्ला, समाज अपना वोट एक दिशा में मोड़ देता है। लाभ – हानि से ऊपर उठ व्यक्तिगत व्यवहार, देशहित, जीवन मूल्य, धर्म रक्षा हेतु सशक्त उम्मीदवारों को चुन कर कुर्सी पर विराजित कर दिया जाता है।

बस मजबूत सरकार देश को गौरवान्वित करने की शपथ लेकर लोककल्याण के कार्यों में जुट जाती है। ग्रहों से ऊपर एक दुनिया स्थापित हो सारे पूर्वाग्रहों को चकनाचूर करती जाती है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #122 ☆ व्यंग्य – वर्गभेद का टॉनिक ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘वर्गभेद का टॉनिक’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 122 ☆

☆ व्यंग्य – वर्गभेद का टॉनिक 

ईश्वर ने अच्छा काम किया जो चार वर्ण बनाये—-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इनमें जो अन्तर रखा गया वह सिर्फ कर्म का ही नहीं था, श्रेष्ठता और हीनता का भी था। यानी श्रेष्ठता में ब्राह्मण से शुरू कीजिए और उतरते हुए शूद्र तक आ जाइए। सौभाग्य से अपना चयन तथाकथित सवर्णों में हो गया, अन्यथा आज़ादी के सत्तर साल बाद भी न गाँव में घोड़ी पर बारात निकाल पाते, न ऊँची जाति के कुएँ से पानी ले पाते। अगर गलती से मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ जाते तो मन्दिर का शुद्धीकरण होता और लगे हाथ शायद अपनी भी ‘धुलाई’ हो जाती। कहने का मतलब यह कि प्रभु ने बड़ी दुर्गति और फजीहत से बचा लिया। इस महती अनुकम्पा के लिए जनम जनम तक प्रभु का आभारी रहूँगा।
ईश्वर ने एक और अच्छा काम किया कि अमीर गरीब बनाये। गरीब न हो तो अमीरों को अमीरी का एहसास कैसे हो और अमीरी की अहमियत कैसे समझ में आये।  ‘हमीं जब न होंगे तो क्या रंगे महफ़िल, किसे देख कर आप इतराइएगा (या इठलाइएगा)।’ कहते हैं कि आदमी इस जन्म में जो कुछ भी भोगता है, सब पूर्वजन्म के कर्मों का फल होता है। लेकिन यह समझ में नहीं आता कि कैसे कुछ लोग राजा का जन्म पाकर भी रंक बन जाते हैं और कुछ लोग रंक से राजा। लगता है कुछ लोग असंख्य पापों के साथ एकाध पुण्य कर लेते होंगे और कुछ लोग अनेक पुण्यों के बावजूद एकाध पाप में फँस जाते होंगे, जैसे युधिष्ठिर को अश्वत्थामा की मृत्यु के बारे में मिथ्याभाषण के लिए कुछ देर तक नरकभ्रमण करना पड़ा था। जो हो, इन बातों में सर खपाने से कोई फायदा नहीं है। सब प्रारब्ध की बात है।

आजकल समाज को तीन वर्गों में बाँटा जाता है —-उच्च वर्ग, मध्यवर्ग और निम्नवर्ग। लेकिन यह ‘झाड़ूमार वर्गीकरण’ है जिसे ‘स्वीपिंग क्लासिफिकेशन’ कहते हैं। फत्तेलाल एंड संस की हैसियत पाँच दस करोड़ की है, लेकिन यदि मैं उन्हें टाटा जी के वर्ग में रखूँ तो यह मेरी मूढ़ता होगी। इसीलिए समझदार लोग इन तीन वर्गों में उपवर्ग ढूँढ़ने लगे हैं,जैसे मध्यवर्ग को अब उच्च मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग में बाँटा जाता है। इस हिसाब से तीनों वर्गों को बाँटें तो वर्गीकरण होगा ——उच्च उच्च वर्ग, मध्य उच्च वर्ग, निम्न उच्च वर्ग;उच्च मध्य वर्ग, मध्य मध्य वर्ग,निम्न मध्य वर्ग; उच्च निम्न वर्ग, मध्य निम्न वर्ग, निम्न निम्न वर्ग। थोड़ा और बारीकी में चले जाएं तो सबसे ऊपर ‘उच्च उच्च उच्च वर्ग’ और सबसे नीचे ‘निम्न निम्न निम्न वर्ग’ होगा। एक मित्र को मैंने यह वर्गीकरण सुनाया तो कहने लगा, ‘तुम्हारी यह हुच्च हुच्च सुनकर मैं पागल हो जाऊँगा।’ ईश्वर उसे ये बारीकियाँ समझने की काबिलियत दे।

हमारे देश ने अंगरेज़ी हुकूमत की जो चन्द अच्छाइयाँ बरकरार रखीं उनमें से एक यह है कि समाज को साहबों और बाबुओं में बाँट दो। साहब हाई क्लास और बाबू लो क्लास। बाबू से साहब हो जाना निर्वाण प्राप्त करने से कम नहीं है। इसीलिए साहबों और बाबुओं की कालोनियाँ अलग अलग बनायी जाती हैं। दोनों कालोनियों को पास पास रखने से साहब लोगों को प्रदूषण का डर रहता है।
अब कर्मचारी चार वर्गों में बँटे हैं —क्लास वन, क्लास टू,क्लास थ्री और क्लास फ़ोर। यहाँ भी भेद सिर्फ काम का नहीं, श्रेष्ठता का भी है। क्लास वन और क्लास फ़ोर के बीच राजा भोज और भुजवा तेली का फर्क हो जाता है। क्लास वन  में भी सुपर क्लास वन होते हैं जिनकी श्रेष्ठता कल्पना से परे होती है। वैसे केन्द्रीय क्लास वन और प्रान्तीय क्लास वन में केन्द्रीय श्रेष्ठ जाति का माना जाता है। एक और वर्गीकरण ‘सीधी नियुक्ति वाला अफसर’ और ‘प्रोमोशन से नियुक्त अफसर’ का होता है। इनमें सीधी नियुक्ति वाला उच्च जाति का होता है।

मेरे एक परिचित किसी अध्ययन के लिए न्यूज़ीलैंड गये थे। जब वे वहाँ से लौटने को हुए तो उनके दफ्तर के सफाई कर्मचारी (जैनिटर) ने उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया और शाम को अपनी कार से उन्हें अपने घर ले गया। हमारे देश में यह अकल्पनीय है। हमारे यहाँ नेता फाइव स्टार होटल से उत्तम भोजन मँगाकर गरीब के घर में पालथी मारकर, गरीब को दिखा दिखा कर खाते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि गरीब के घर में खाने को कुछ नहीं मिलेगा। दुनिया में लोग होटल से बचा हुआ खाना लाकर गरीबों को खिलाते हैं, हमारे यहाँ होटल से भोजन लाकर गरीब के घर में बैठ कर खाने का रिवाज है। नेताओं को यह ख़ुशफहमी है कि गरीबों के घर में बैठकर पनीर, कोफ्ता और मशरूम खाने से वे उनके  हमदर्द साबित हो जाएंगे। हाल के लोकसभा चुनाव में एक नेताजी घर घर जाकर जीमने में इतने मसरूफ़ हो गये कि वोट माँगना भूल गये और चुनाव हार गये।

दरअसल मैं कहना यह चाहता हूँ कि समाज में ये जो भेद हैं ये समाज के स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद हैं क्योंकि आज का आदमी अपने से हीन आदमी को देखकर ही जीवित और स्वस्थ रहता है। अपने से श्रेष्ठ आदमी को देखकर मनोबल में जो गिरावट होती है वह अपने से निर्बल को देखकर सुधर जाती है।

अब आप ही सोचिए कि क्लास टू, थ्री या फ़ोर न हो तो क्लास वन किसे देखकर सन्तोष करे और किस पर शासन करे?vइसी तरह क्लास टू के स्वास्थ्य के लिए क्लास थ्री, और क्लास थ्री के सुकून के लिए क्लास फ़ोर का होना ज़रूरी है।  अब सरकार ने क्लास फ़ोर के सुख और सन्तोष का इंतज़ाम भी कर दिया है। उनके भी नीचे ‘डेली वेजेज़’ वाले या तदर्थ होते हैं। इनकी हालत देखकर ‘नियमित’ क्लास फ़ोर कर्मचारी अपने रक्त में कुछ वृद्धि कर सकते हैं। वैसे तो बेरोज़गारी की कृपा से अब इतने बेकार लोग दिखायी पड़ते हैं कि हर नौकरीशुदा आदमी अपने को सौभाग्यशाली समझकर अपना ख़ून और अपनी खुशी बढ़ा सकता है।

घर में जब मँहगाई की वजह से कद्दू की सब्ज़ी से सन्तोष करना पड़ता है तो गृहस्वामी को एकाएक याद आता है कि इस देश के करोड़ों लोगों को दो वक्त का भोजन नहीं मिलता। इस टिप्पणी से घर के लोगों को कद्दू का स्वाद कुछ बेहतर लगने लगता है। ऐसे ही जब घर के सामने कोई अट्टालिका उठती हुई दिखायी पड़ती है तो साधारण घर का स्वामी पत्नी से कहता है, ‘जानती हो?बंबई में आधी जनसंख्या झुग्गियों में रहती है।’ बंबई की झुग्गियों को याद करने से सामने खड़ी होती अट्टालिका के बावजूद अपना घर अच्छा लगने लगता है। बंबई की झुग्गियां हज़ारों मील दूर नगरों के गृहस्वामियों के लिए ‘टॉनिक’ भेजती हैं।

रेलों में सेकंड क्लास की मारामारी और दुर्गति देखकर ही ए.सी.के टापू में बैठने का पूरा आनन्द मिलता है। सड़क पर स्कूटर के बगल में साइकिल चले तो स्कूटर का आराम बढ़ता है, और  कार वाले के बगल में उसका उछाला हुआ कीचड़ झेलता स्कूटर वाला चले तो कार का सुख दुगना होता है। देश में मरे-गिरे,खस्ताहाल स्कूल न हों तो ठप्पेदार स्कूलों में पढ़ने का क्या मज़ा?और अपने सपूत की स्कूल यूनिफॉर्म तब ज़्यादा ‘स्मार्ट’ और ‘क्यूट’ लगती है जब सड़क पर, कंधे पर बस्ता लटकाये, स्याही के दाग वाली कमीज़ पहने, नाक पोंछता, रबर की चप्पलें सटसटाता,कोई ‘देसी’ स्कूल वाला बालक दिखता है।

इसलिए सज्जनो,अपनी साड़ी इसीलिए सफेद लगती है क्योंकि दूसरे की मैली होती है। फलसफाना अंदाज़ में कहूँ तो रात के कारण ही दिन का सुख है और धूप के कारण छाया का।

निष्कर्ष यह निकलता है कि समाज के स्वास्थ्य, सुख और सुकून के लिए वर्ग-भेद ज़रूरी है। यह अवश्य होना चाहिए कि जो सबसे नीची सीढ़ी पर हैं,उनसे भी नीचे कुछ सीढ़ियों की ईजाद हो ताकि अपने से नीचे देखकर उन्हें भी कुछ संतोष प्राप्त हो। धन का न हो सके तो कम से कम संतोष का बेहतर बँटवारा होना ही चाहिए।
अब वे दिन गये जब कहा जाता था ‘देख पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव; रूखा सूखा खायके ठंडा पानी पीव।’ अब ठंडा पानी पीने से दूसरे की चूपड़ी देखकर उठी जलन शान्त नहीं होगी। अब यह जलन तभी मिटेगी जब हमारी रोटी भी आधी चूपड़ी हो और सामने कोई ऐसा आदमी हो जिसकी रोटी बिलकुल चूपड़ी न हो।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ #83 ☆ जो जस करहिं तो तस फल चाखा… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “जो जस करहिं तो तस फल चाखा…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 83 ☆ जो जस करहिं तो तस फल चाखा… 

फल का क्या? कर्म करने पर मिलता है। अब समस्या ये है कि जो देंगे वही मिलेगा, ये लेन- देन किसी को भी चैन से बैठने ही नहीं देता। कोई भी एप  से जुड़ो नहीं कि तुरंत मैसेज आना शुरू हो जाते हैं अब समस्या ये है कि सारा दिन नोटिफिकेशन ही देखते रहें या कोई जरूरी कार्य भी करें। खैर तकनीकी को समझना और जानना है तो कदम बढ़ाना ही होगा। हर वर्ष एक ही राह पर चलते रहने से कभी तरक्की मिली है। इस बार कुछ नया हो ऐसी सोच के साथ पूर्वाग्रहों से मुक्त होने का मंत्र मेरे मोटिवेशनल कोच द्वारा दिया गया।

सकारात्मक सोच के साथ जो भी चलेगा वो विजेता के रूप में उभरेगा ही। संघ की परिकल्पना को अमलीजामा पहनाते हुए सबके साथ सामंजस्य बैठाने में मशक्कत तो करनी पड़ती है किंतु जान- पहचान बढ़ने से कई समस्याओं का हल चुटकी बजाते ही मिल जाता है। व्हाट्सएप पर सार्थक चैटिंग हो तो बहुत से नए रास्ते खुलते हैं जहाँ न केवल कल्पनाओं की उड़ान को पंख मिलते हैं वरन अपनी सशक्त पहचान भी बन जाती है। जो लोग दूरगामी दृष्टि के मालिक होते हैं वही लीडर के रूप में प्रतिष्ठित होकर अपना परचम फैलाते हैं।

डर- डर कर कदम बढ़ाने से भला कभी किसी को मंजिल मिली है। सार्थक करते हुए लोगों को जोड़ते जाना कोई आसान कार्य नहीं होता। मन अगर सच्चा हो और केवल सबकी भलाई का लक्ष्य हो तो आगे  बढ़कर पूरे दमखम के साथ कार्य को पूरा करने हेतु जुट जाना चाहिए। पूर्णता तक पहुँचने वाले ही शिखर पर प्रतिस्थापित होते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर न बनने पाए इसलिए सही नेतृत्व के साथ चलते रहने में ही भलाई है। जैसा करेंगे वही मिलेगा तो क्यों न सबका हित साधें और बढ़ें।

नया वर्ष ऐसे चिंतन हेतु एक नयी ऊर्जा लेकर आता है सो हम सब चिंतन- मनन करते हुए अपने लिए भी एक मुकाम तय करें और उसे पूरा करने के लिए जुट जाएँ।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेष कुशल # 24 ☆ व्यंग्य ☆ लक्ष्मी नहीं, बेटी ही आई है ….. ☆ श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  “लक्ष्मी नहीं, बेटी ही आई है…” । इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक हैं ।यदि किसी व्यक्ति या घटना से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि  प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल # 24 ☆

☆ व्यंग्य – लक्ष्मी नहीं, बेटी ही आई है ☆ 

“बधाई हो, आपके घर लक्ष्मी आई है.”

एक बारगी तो मैं घबरा ही गया, बिटिया के न चार हाथ, न ऊपर के दो हाथों में कमल, न तीसरे से ढुलती गिन्नियों का घड़ा है, न आशीर्वाद की मुद्रा में एक हथेली ही है. एक अबोध प्यारी गुलाबी बिटिया है, धरती पर साफ कोरी स्लेट की मानिंद. उस पर कोई देवी होने की ईबारत क्यों लिखे. असमंजस में रहा, धन्यवाद दूँ कि नहीं दूँ. बेटी चाही थी, बेटी मिली भी, अभी तो इसी से सातवें आसमान पर हूँ. उस पर कोई लक्ष्मी होना निरूपित न करे तो भी आसानी से जमीन पर उतरनेवाला नहीं हूँ. उन्हें लगा होगा कि बेटी के जन्म से अपन प्रसन्न नहीं हैं, वे लक्ष्मीजी के आने की प्रत्याशा जगाकर अपन का दुःख कम कर देंगे. उनके इस भोलेपन पर तरस आता है. उन्हें लगता है लक्ष्मी आने की सूचना मात्र से अपन झूमने लगेंगे, तो सिरिमान अपन तो सिम्पल बिटिया के आने की खुशी में वैसेई झूम रहे हैं. थोड़ी भौत जित्ती पॉकेट में धरी थी उसे नर्सों वार्ड-ब्वायों में बाँट चुके हैं. थोड़ी लक्ष्मी बैंक अकाउंट में धरी है सो भी कुछ देर में अस्पताल के अकाउंट के लिए प्रस्थान करने वाली है. अस्पतालवालों ने थोड़ी मेहर न की तो ‘पूप-सी’ की बोतल खरीदने लायक भी ना बचेगी. यूं भी लक्ष्मीजी का अपन से आंकड़ा छत्तीस का रहा है. नॉर्मली वे बायपास से गुजर जातीं हैं अपन के कूचे में झाँकती भी नहीं. और फिर, बेटे की प्रत्याशा में जिनकी गोद में पाँच-छह लक्ष्मियाँ आ जाती हैं वे तो मुकेश अंबानी से आगे निकल जाते होंगे.

फोन पर बधाई देनेवाले मित्र ने संतान में लक्ष्मी कभी नहीं चाही. लक्ष्मीजी लक्ष्मीजी की तरह ही आयें संतान का रूप धरकर नहीं सो अतिरिक्त सावधानी बरतते रहे. रिजल्ट आने तक आदरणीया भाभीजी को ‘पुत्र जीवक वटी’ भी खिलाते रहे, ओटलों-मज़ारों-साक्षात स्थानों पर मन्नत भी मांगते रहे॰ कुछ दिनों पहले उन्होने बिन मांगे सलाह दी ही थी – टेंशन मत लेना सांतिभिया इस बार न भी तो अगली बार प्लान करके करना, लड़का ग्यारन्टीड. महोबावाली मौसी की दवा के रिजल्ट हंड्रेड परसेंट हैं. थोड़ी देर और बात करते तो वे फॉयटिसाइड व्हाया अल्ट्रा-साउंड पर उतर आते. वे उन लोगों में से हैं जो लक्ष्मी के थोड़ा बड़ा होते ही स्कूल छुड़वाकर कर झाड़ू हाथ में थमा देने में यकीन रखते हैं. दरअसल वे विषय को लक्ष्मीजी के उस वाहन की तरह बरत रहे थे जिसे रात में ही दिखाई देता है. उन्हें बेटी गोरी और लक्ष्मी काली पसंद है. उन्होने बेतुकी तुक मिलाई – “सांतिभिया, पहली बेटी धन की पेटी होती है.”

मैंने कहा – “बेटी के आने से जो भावनात्मक और पारिवारिक समृद्धि हुई है वो धन सम्पदा से कहीं ज्यादा है माय डियर. एनी-वे थैंक-यू.” कट.

सारा संवाद दादू सुन रहा था, बोला – “इसे सीरियसली मत लो सांतिभिया, ये तो मुहावरे भर हैं.”

“मुहावरे ‘सरस्वती आई है’ जैसे भी तो गढ़े जा सकते थे.”

“सरस्वती साधन है लक्ष्मी साध्य है. लक्ष्मीजी की पूजा भारत मंं होती है मगर वे विराजती न्यूयॉर्क में हैं. तभी तो सवा दो साल के बच्चे को भी लोग प्रि-प्रीपेरेटोरी स्कूल में भर्ती करा आते हैं. सपना डेस्टिनेशन यूएसए का. नौकरी लगते ही सरस्वती पूजन का दौर समाप्त. लक्ष्मीजी की चाहत में जिंदगी गुजार दी तो मुहावरा तो उन्ही का गढ़ा जाएगा ना. कभी किसी सरकार को लाड़ली सरस्वती योजना की शुरुआत करते पाया है?”

“बात तो तब बने जब लड़का हो और कोई कहे – बधाई हो राम, कृष्ण या महावीर आये हैं. लक्ष्मी की कामना सब करते हैं दादू – संतान में नहीं, खीसे में.”

इस बीच एक वाट्सअप मैसेज मिला – ‘कांग्रेट्स, मुलगी झाली – लक्ष्मी आली.’ भांग तो पूरे कुएं में घुली है, नी क्या?

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #121 ☆ व्यंग्य – अन्तरात्मा की ख़तरनाक आवाज़ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘अन्तरात्मा की ख़तरनाक आवाज़’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 121 ☆

☆ व्यंग्य – अन्तरात्मा की ख़तरनाक आवाज़ 

एक हफ्ते से मुख्यमंत्री जी की नींद हराम है। रात करवटें बदलते गुज़रती है। कारण यह है कि विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है और तीन दिन बाद प्रस्ताव पर वोटिंग होनी है। चिन्ता का कारण यह है कि मुख्यमंत्री जी की सरकार दो और पार्टियों के सहयोग से बनी है और उनमें से एक, देशप्रेमी पार्टी  के नेता देशभक्त जी ने एक अखबार को इंटरव्यू में बयान दिया है कि उनकी पार्टी अन्तरात्मा की आवाज़ पर वोट देगी। तभी से मुख्यमंत्री जी को चैन नहीं है। बार बार अपने सरकारी आवास को हसरत से देखते हैं कि यह वैभव रहेगा या छूट जाएगा?

उन्होंने अपने विश्वस्त मंत्री त्यागी जी को बुलाया। आदेश दिया कि दोनों पार्टियों के नेताओं से मिलें और वस्तुस्थिति का ठीक ठीक पता लगाकर उन्हें तुरन्त जानकारी दें। त्यागी जी तत्काल पवनपुत्र की तरह पवन-वेग से रवाना हुए। मुख्यमंत्री जी बेचैनी से कमरे में टहलते रहे। त्यागी जी लौटे तो चेहरे पर चिन्ता विराजमान थी। मुख्यमंत्री जी को बताया, ‘जनसेवक पार्टी से तो कोई खतरा नहीं है, उनका सपोर्ट तो पक्का मिलेगा, लेकिन देशभक्त जी के मन में खोट है। साफ मना भी नहीं करते, लेकिन कहते हैं कि पार्टी के लोग अन्तरात्मा की आवाज़ पर वोट देना चाहते हैं। मैंने बहुत कोशिश की लेकिन साफ साफ बताने से बचते रहे।’

सुनकर मुख्यमंत्री जी का मुँह उतर गया,बोले, ‘इनकी अन्तरात्मा वोटिंग के टाइम ही जागती है। हम सब समझते हैं। अब वोटिंग से पहले इनकी अन्तरात्मा की आवाज़ को शान्त करना पड़ेगा। राजनीति में किसी का भरोसा नहीं है। उधर से मलाईदार कटोरा रख दिया जाएगा तो अन्तरात्मा की आवाज़ पर पल्टी मार जाएँगे। समय रहते इनका इलाज करना पड़ेगा। मंत्रिमंडल में कोई फायदेवाला पोर्टफोलियो चाहते होंगे,इसीलिए अन्तरात्मा अचानक आवाज़ देने लगी है। देशभक्त जी को फोन करके बुलाओ। बात करनी पड़ेगी।’

थोड़ी देर में. देशभक्त जी हाज़िर हो गये। हँसकर मुख्यमंत्री जी से बोले, ‘हम तो सोलहों आने आपके साथ हैं, लेकिन पार्टी के कुछ लोग खामखाँ अन्तरात्मा की आवाज़ की रट लगाये हैं। क्या करें?’

मुख्यमंत्री जी उन्हें कमरे में ले गये। त्यागी जी की उपस्थिति में गोपनीय बात हुई। एक घंटे तक बात चली। देशभक्त जी बाहर निकले तो तो उनका चेहरा खुशी से चमक रहा था। चलते चलते हाथ उठाकर मुख्यमंत्री जी से बोले, ‘आप बिलकुल निश्चिन्त रहें। हम प्रान जाएं पर वचन न जाई के उसूल पर चलने वाले हैं। पार्टी के लोगों को समझाने का जिम्मा हमारा है। कोई गड़बड़ नहीं होगी।’

उनके जाने के बाद मुख्यमंत्री जी त्यागी जी से बोले, ‘त्यागी जी, पॉलिटिक्स में अन्तरात्मा की आवाज़ से बड़ा हौआ कोई नहीं होता। यह अन्तरात्मा की आवाज़ अच्छों अच्छों की नींद हराम कर देती है। इस पर तुरन्त साइलेंसर न लगाया जाए तो बड़ा नुकसान हो सकता है। हमने अभी तो साइलेंसर लगा दिया है, लेकिन आगे सावधान रहना पड़ेगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ माइक्रो व्यंग्य – हेकिंग का लफड़ा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है  आपका एक  माइक्रो व्यंग्य  हेकिंग का लफड़ा’)  

 

☆ माइक्रो व्यंग्य – हेकिंग का लफड़ा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

 

-पहले तो आप खूब लिखा करते थे, आजकल क्या डाउनफॉल चल रहा है? या लिखने के लिए विषय नहीं मिल रहे हैं ?

– जी ऐसी बात नहीं है, वो क्या है कि आजकल हेकिंग का जमाना चल रहा है, जिस विषय पर लिखने के लिए दिमाग में उथल-पुथल मची रहती है वही दूसरे दिन किसी और के नाम पर अखबार में छपा दिख जाता है।

हेकिंग का जमाना है साब, सोचते हम हैं और कोई हेक करके अपने नाम से छपवा लेता है। इसलिए कोई व्यंग्य, कविता, कहानी कहीं भी पढ़ने मिले, तो ये मानकर चलना कि मूल सोच हमारी ही है, हम उस पर अच्छा लिखना चाहते थे, और सोच विचार कर रहे थे तब तक किसी ने हमारा दिमाग हेक कर लिया, और अपने नाम से रचना छपवा ली।

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #120 ☆ व्यंग्य – सर्दियों के फायदे ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  सर्दियों के फायदे। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 120 ☆

☆ व्यंग्य – सर्दियों के फायदे 

ज्ञानी लोग सर्दियों के बहुत से लाभ बताते हैं। मसलन, सर्दियाँ सेहत बनाने के लिए बढ़िया मौसम है। बादाम घोंटिए, मेवा खाइए और वर्जिश कीजिए। कहते हैं इस मौसम में हाज़मा बढ़िया काम करता है। जो खाइए सो भस्म।

लेकिन सवाल यह है कि जब मँहगाई के मारे आदमी खुद ही भस्म हो रहा हो तो वह क्या खाये और क्या भस्म करे? आज के ज़माने में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो जाए तो खु़दा का शुक्र अदा कीजिए। बादाम-मेवा अब दूध-घी की तरह देवताओं के भोजन हो गये हैं। देवताओं से मेरा मतलब उन नर-रत्नों से है जिनके पास माल की कमी नहीं है और जिन्हें मँहगाई की गर्मी बिल्कुल नहीं व्यापती। ऐसे लोगों की हमारे देश में कमी नहीं है। लेकिन मेहनत और ईमानदारी की कमाई पर पलने वाले परिवार में मूँगफली तो आ सकती है, बादाम ख़्वाब की बात है।

बादाम और काजू-किशमिश बड़े लोगों की पार्टियों की शोभा बनते हैं जहाँ कलफदार वर्दी पहने सेवक चीज़ों को अदब से पेश करते हैं और अतिथिगण बिना सेवकों की ओर देखे, बातों में मशगूल, चीज़ों को उदासीनता से मुँह में डाल लेते हैं। इन पार्टियों में वे मंत्री, विधायक और अधिकारी भी होते हैं जो इस ग़रीब देश के प्रतिनिधि और सेवक कहलाते हैं।

वर्जिश करके भी क्या कीजिएगा? अब बलिष्ठ शरीर का उतना महत्व नहीं रहा जितना पहले था। अब छुरे, चाकू, तमंचे का ज़माना है। तगड़े पहलवान साहब किसी सींकिए का चाकू खाकर अस्पताल का सेवन करते हैं और सींकिया अपनी हड्डियाँ फुलाये घूमता है। फिर यह परमाणु-युद्ध और स्टार-वार्स का ज़माना है। कभी भी ज़िन्दगी की रील कट सकती है। इसलिए बादाम खाने और सेहत बनाने का कोई मतलब नहीं है। बीच में ही दुनिया ख़त्म हो गई तो बादाम पर ख़र्च किये सारे पैसे बेकार हो जाएँगे।

लेकिन बादाम वर्जिश को छोड़ दें तो सर्दियों के दूसरे फायदे हैं। अगर आपके पास फटी कमीज़ें हैं या कमीज़ों की कमी है तो सर्दियों का मौसम आपके लिए बड़ा ग़रीब परवर है। शर्त यह है कि आपके पास एक अदद कोट हो। मुझे ऐसे बहुत से सज्जन मिले जो फटी कमीज़ों का उपयोग जाड़े में कोट के नीचे कर लेते हैं। अगर आपका कोट खुले कॉलर वाला है तो कमीज़ का कॉलर साबित होना ज़रूरी है। अगर बन्द गले का कोट है तो चिथड़ा हुई कमीज़ भी चलेगी।

मेरे एक मित्र सर्दियों में बिना बाँह की कमीज़ पहनते थे। बाँहें फट जाने पर वे उन्हें काट कर अलग कर देते थे और इन बंडी कमीज़ों को सर्दियों के लिए सुरक्षित रख लेते थे।

कुछ ऐसा ही कमाल वे मोज़ों में दिखाते थे। एक बार उन्होंने जूतों को अपने चरणों से अलग किया तो देखा मोज़ों का पंजों वाला हिस्सा ग़ायब है। हमारे ज्ञानवर्धन के लिए उन्होंने बताया कि मोज़े पंजों पर फट गये थे, इसलिए उन्होंने पंजे वाला हिस्सा काट कर अलग कर दिया था। अब उनके मोज़ों की शक्ल उन ‘एनक्लेट्स’ जैसी हो गयी थी जिन्हें फुटबॉल के खिलाड़ी पहनते हैं। लेकिन जूते पहनने पर सब ठीक-ठाक दिखता था।

कुछ ऐसे महापुरुष भी मिले जो शेरवानी के नीचे सिर्फ बनियाइन पहनते थे। कमीज़ की खटखट ही नहीं। यह तो उनका बड़प्पन था जो बनियाइन पहन लेते थे। वह भी न पहनते तो उनका कोई क्या बिगाड़ लेता?

महिलाएँ भी इस मौसम में फटे ब्लाउज़ को शॉल के नीचे चला लेती हैं। शॉल सबसे बढ़िया पैबन्द का काम करता है। लेकिन शॉल के साथ यह दिक्कत होती है कि उसे बराबर सँभाले रखना ज़रूरी है। ज़रा सी असावधानी होने पर कलई खुल सकती है। कोट या शेरवानी के बटन बन्द कर लेने पर निश्चिंत हुआ जा सकता है, लेकिन शॉल में यह सुविधा नहीं है।

जिन लोगों को सफाई से परहेज़ है और जिन्हें गन्दे कपड़े पहनना सुहाता है, उनके लिए सर्दी का मौसम मददगार होता है। कोट के नीचे गन्दे कपड़े भी उसी तरह चलते हैं जैसे फटे। लेकिन इसके लिए बन्द कॉलर का कोट अनिवार्य है। कमीज़ से बदबू आने का ख़तरा हो तो कोट के ऊपर थोड़ा सेंट छिड़का जा सकता है। वैसे भी कई लोग नहाते कम और सेंट ज्यादा छिड़कते हैं।

इस सब में अटपटा कुछ भी नहीं है क्योंकि आज का ज़माना ऊपरी दिखावे का है। जितना दुनिया को दिखता है उतना ठीक रखो। मुलम्मा चमकदार होना चाहिए, भीतर सब चलता है। बहुत से कौवे सफेदी पोतकर हंस के रूप में पुज रहे हैं, इसलिए बाहरी टीम-टाम ठीक रखो, भीतर कितना गन्दा और जर्जर है इसकी चिन्ता छोड़ो।

लेकिन जैसा मैंने पहले अर्ज़ किया, सर्दियों का लाभ वही उठा सकते हैं जिनके पास एक अदद कोट या शेरवानी हो। जिनके पास सिर्फ फटी कमीज़ें हैं या जिन्हें सर्दियाँ नगर निगम के अलावों के बल पर काटनी हैं, उनके लिए इन बातों का कोई मतलब नहीं है। वहाँ समस्या कमीज़ जुटाने की है, उसे छिपाने की नहीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ #81 ☆ सच्ची नियत ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “सच्ची नियत”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 81 ☆ सच्ची नियत 

जब किसी राह पर चलो तो कांटे और  नुकीले पत्थर मिलेंगे ही बस उन्हें हटाते हुए बढ़ना होगा,  क्या यहाँ पर नजरअंदाज करके बढ़ना  ज्यादा सही रहेगा  या जड़ से मिटाते हुए चलें जिससे दूसरों को उन बाधाओं से न गुजरना पड़े। रिश्तों में दरार डालना कोई कठिन कार्य नहीं होता है। भले ही कुछ प्रहारों का असर न दिखाई दे किन्तु कोई भी वार कभी खाली नहीं जाता है। कहीं न कहीं आंशिक ही सही दरार बनती जरूर है जो आगे चलकर विस्फोटक स्थिति उत्पन्न करती है।

लक्ष्य को छोड़कर बिना मतलब के कार्यों में अपनी ऊर्जा बर्बाद करना कहाँ तक सही कहा जा सकता है। खैर गाहे – बगाहे परेशानी आती ही रहती है। ऐसा ही कुछ हमारे मन्नूलाल जी के साथ हमेशा से हो रहा है। शिकायतों की पोटली लिए इधर से उधर भटकते रहते हैं जैसे ही कोई दिखा; झट से उसे पकड़ पहले इधर – उधर की बातें कीं फिर अपनी पोटली खोलते हुए दुनिया भर की समस्याओं को बिखरा दिया। इधर अनोखेलाल जी तो अपनी अनोखी हरकतों के द्वारा कभी किसी को हटाना, किसी को बसाना बस यही करते हुए अपना राग अलाप रहे थे। इस सब के बीच में जो सही था, वो ये कि हर व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था। कहते हैं जो चलेगा, कुछ करेगा वो अवश्य जीतेगा। और जब जीतेगा तो पार्टी तो होगी ही। बस ऐसी ही पार्टियाँ आए दिन होती रहतीं।

हर पार्टी में कोई न कोई आकर्षण का केंद्र अवश्य होता था जिसके इर्द गिर्द बातचीत घूमने लगती और तब तक घूमती जब तक नया मुद्दा न मिल जाए। खोने – पाने का खेल चलता ही रहता। मन्नूलाल जी रिकार्ड्स बनाने के बहुत शौकीन थे। कोई न कोई विषय पर खोजबीन करना, उसे पढ़ना और जुट जाना शिखर पर पहुँचने की ओर। इधर खबरी लाल भी उन्हें सारी जानकारी प्रदान करते जा रहे थे। अब तो ताबड़तोड़ उपलब्धियों की बरसात हो रही थी। लगातार लोगों द्वारा मदद भी मिलने लगी। जब कोई सफल होने लगता है तो सारा हुजूम उसके पीछे चलते हुए उसका साथ देना चाहता है।

एक के बाद एक बड़े कार्य होते जा रहे हैं ऐसा लगता है मानो सब कुछ खुली आँखों द्वारा देखा गया सपना ही तो है। सपने सच होते हैं उनके, जो परिश्रम करना जानते हैं, जो सबको साथ लेकर, सच्ची नियत के मालिक होते हैं।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #119 ☆ व्यंग्य – इंकलाब और फर्नीचर की दूकान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘इंकलाब और फर्नीचर की दूकान’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 119 ☆

☆ व्यंग्य – इंकलाब और फर्नीचर की दूकान 

रज्जू के घर कई दिन बाद गया था। ड्राइंग-रूम में दाख़िल हुआ तो देखा दीवान पर एक साहब छाती तक रज़ाई खींचे,लेटे, सिगरेट के कश लगा रहे हैं। सारे कमरे में सिगरेट की बू भरी हुई थी। सिरहाने सिगरेट के आठ दस टोंटे पड़े थे और अलमारी में ‘ब्लैक नाइट’ की एक ख़ाली बोतल रखी थी। एक तरफ एक अधखुला सूटकेस था जिसमें से कपड़े झाँक रहे थे। तीन चार कपड़े दीवान की पुश्त और किवाड़ पर टंगे थे। ख़ासा बेतरतीबी का आलम था।

अतिथि महोदय नौजवान ही थे। मुझे देखकर उन्होंने वैसे ही लेटे लेटे हाथ उठाकर सलाम किया। दस बज गये थे लेकिन ज़ाहिर था कि उनके लिए अभी बाकायदा सबेरा नहीं हुआ था।

रज्जू कहीं गया हुआ था। भीतर गया तो देखा भाभी का पारा ख़ासा गरम था। घर में हीटर की ज़रूरत नहीं थी। मैंने पूछा, ‘ये साहब कौन हैं?’

वे बोलीं, ‘इनके पुराने दोस्त हैं। आठ दिन से खून पी रहे हैं। हिलने का ना्म नहीं लेते। ये अभी उन्हीं के लिए अंडे लेने गये हैं। बिना आमलेट के उनका नाश्ता नहीं होता। इन्हें ऐसे ही निठल्ले दोस्त मिलते हैं।’

मैं भाभी के मिजाज़ पर दो चार ठंडे छींटे देकर वापस ड्राइंग रूम में आया तो अतिथि महोदय मेरे ऊपर इनायत करके अधलेटे हो गये। मेरी तरफ हाथ बढ़ाकर बोले, ‘मैं शम्मी, रज्जू का कॉलेज के ज़माने का दोस्त। यूँ ही अचानक याद आ गयी तो आ गया। वैसे भोपाल में रहता हूँ। आपकी तारीफ?’

मैंने कहा, ‘मैं जे.पी.शर्मा हूँ। रज्जू से बहुत पुराने ताल्लुक़ात हैं।’

वे बोले, ‘आपसे मिलकर ख़ुशी हुई।’

मैंने पूछा, ‘भोपाल में आप क्या करते हैं?’

वे थोड़ा हँसे, फिर छत पर आँखें टिकाकर बोले, ‘अजी जनाब, हमारी क्या पूछते हैं। बस यूँ समझिए कि—चला जाता हूँ हँसता खेलता मौजे हवादिस से, अगर आसानियाँ हों ज़िन्दगी दुश्वार हो जाए।’

मैं चमत्कृत हुआ। सोचा, यह तो कोई जीवट वाला, जुझारू आदमी है जो ज़िन्दगी से बहादुरी से दो दो हाथ कर रहा है। कहा, ‘लगता है आप बड़ी जद्दोजहद से गुज़र रहे हैं।’

वे सिगरेट के टोंटे को चाय के कप में बुझाते हुए लंबी साँस छोड़कर बोले, ‘अजी क्या पूछते हैं!बस यूँ समझिए कि आग के दरया में से डूब कर जा रहे हैं।’

मैं चुप हो गया तो वे बोले, ‘मेरे बारे में और कुछ नहीं जानना चाहेंगे?’

मैंने कहा, ‘क्यों नहीं!आपकी ज़िन्दगी तो ख़ासी दिलचस्प लगती है। फ़रमाइए।’

वे सिर को हथेली की टेक देकर, दुबारा छत पर नज़रें जमा कर धीरे धीरे बोले, ‘भोपाल में हमारे डैडी की फर्नीचर की बड़ी दूकान है। पाँच औलादों में मैं अकेला बेटा हूँ। मैं शुरू से शायर-तबियत और नफ़ासत-पसन्द इंसान रहा हूँ। डैडी का फर्नीचर का धंधा मुझे कभी पसन्द नहीं आया। कॉलेज के बाद मेरा बस यही शग़ल रहा—दोस्तों के साथ घूमना-घामना, खाना-पीना और मौज करना। एक दिन डैडी कहने लगे, बालिग़ हो गये हो, दूकान पर बैठो। मैंने कहा, मैं मुर्दा फर्नीचर के बीच बैठ कर क्या करूँगा, मैं तो ज़िन्दा चीज़ों का शैदाई हूँ। डैडी बेहद ख़फ़ा हो गये। कहने लगे,इसी फर्नीचर की रोटी खाता है और इसी की बुराई करता है?मैंने जवाब दिया, जनाब, रोटी तो ख़ुदा की दी हुई खाता हूँ। जिसने चोंच दी है वही चुग्गा देता है। आप खामखाँ क्रेडिट ले रहे हैं। बात बढ़ गयी। वे कहने लगे,दूकान पर बैठो, नहीं तो यहाँ से मुँह काला करो।

‘बात उसूलों की थी। मैंने फौरन घर छोड़ दिया। मम्मी ने मुझे चुपके से दस हज़ार रुपये पकड़ा दिये। वहाँ से लखनऊ अपने मामू के यहाँ चला गया। वहाँ दो महीने रहा। वहाँ भी कई दोस्त बन गये और ज़िन्दगी अच्छी ख़ासी गुज़रने लगी। लेकिन मुश्किल यह है कि दुनिया के कारोबारी लोगों को मेरे जैसे आदमी का सुकून बर्दाश्त नहीं होता। कुछ दिनों बाद मेरा सुख-चैन मेरे मामू को खटकने लगा। उनकी हार्डवेयर की दूकान है। कहने लगे दूकान पर बैठो। मैंने कहा, बात उसूलों की है। मैं नाज़ुक चीज़ों का प्रेमी हूँ, लोहा-लंगड़ के बीच बैठना मुझे गवारा नहीं। आख़िरकार लखनऊ भी छोड़ना पड़ा। चलते वक्त मामू से पाँच हज़ार रुपये ले लिये।

‘फिर रामपुर दूसरे मामू के यहाँ चला गया। वहाँ एक महीने ही रहा क्योंकि वे शुरू से ही पीछे पड़े रहे कि मैं डैडी के पास लौट जाऊँ। दुनिया भर की नसीहतों का दफ्तर खोले रहते थे। हर दूसरे दिन डैडी को फोन करते थे। लेकिन मेरे ऊपर उनकी बातों का असर भला क्यों होता?मैं तो सर पर कफ़न बाँध कर निकला था। मैंने कह दिया कि भीख माँग कर गुज़ारा कर लूँगा लेकिन फर्नीचर की दूकान पर बैठने भोपाल न जाऊँगा।

‘चुनांचे उन मामू से भी पाँच हज़ार रुपये लिये और वहाँ से अपने एक दोस्त के पास दिल्ली चला गया। वहाँ बीस दिन रहा। दोस्त तो भला आदमी है, लेकिन आप तो जानते ही हैं कि औरतें ज़रा तंगज़ेहन होती हैं। मैं दोस्त के साथ रात ग्यारह बारह बजे तक महफिल जमाये रहता था। दो चार और भले लोग शामिल हो जाते थे। बस उस नेकबख़्त औरत ने कहना शुरू कर दिया कि मैं उसके शौहर को बिगाड़ रहा हूँ। गोया कि उसका शौहर कोई दूध-पीता बच्चा है जो मैं बिगाड़ दूँगा। ख़ैर, मैंने दिल्ली भी छोड़ा और दोस्त से दो हज़ार रुपये लेकर इधर चला आया। जब हालात बेहतर होंगे, चुका दूँगा।’

मैंने कहा, ‘आपकी ज़िन्दगी तो जद्दोजहद की मुसलसल दास्तान है।’

वे सिगरेट का कश खींचकर गुल झाड़ते हुए बोले, ‘सच पूछिए तो हम तो इंकलाबी हैं और इंकलाब की मशाल लिये घूमते हैं। ये पुरानी सड़ी हुई पीढ़ी की तानाशाही हम क़तई बर्दाश्त नहीं करेंगे। दुश्वारियों की कोई फिक्र नहीं है। दुश्वारियों की तो आदत पड़ गयी है। आदत के बाद दर्द भी देने लगा मज़ा, हँस हँस के आह आह किए जा रहा हूँ मैं।’

मैंने एक मिनिट तक ‘वाह वाह’ करने के बाद पूछा, ‘अभी तो आप रुकेंगे?’

वे बोले, ‘देखिए, कब तक यहाँ आबोदाना रहता है। फिलहाल तो हूँ ही।’

अब तक रज्जू भी आ गया था। शम्मी साहब मुझसे बोले, ‘शाम को आइए। कुछ और दिल खोल कर बातें होंगी।’

मैं भाभी के तेवर देख चुका था। बोला, ‘आज शाम को तो मसरूफ़ हूँ। फिर कभी आऊँगा।’

थोड़ी देर में मैंने विदा ली। चलने लगा तो उन्होंने हाथ उठाकर दुहराया, ‘अगर आसानियाँ हों ज़िन्दगी दुश्वार हो जाए।’

रज्जू मुझे बाहर तक छोड़ने आया। मैंने उससे कहा, ‘इस बला से पीछा छुड़ा, नहीं तो भाभी किसी दिन हंगामा कर देगी।’

वह दुखी भाव से बोला, ‘क्या करूँ?मैं तो कई बार इशारा कर चुका, लेकिन उस पर कोई असर ही नहीं होता।’

दो दिन बाद रज्जू का फोन आया कि शम्मी मुझसे मिलना चाहते हैं। कई बार इसरार कर चुके हैं। मैं दोपहर को गया तो वे उसी तरह रज़ाई में घुसे मिले। हवा में वही सिगरेट की गमक थी और अलमारी में रात की खाली बोतल विराजमान थी।

मेरे बैठने के बाद वे बोले, ‘उस दिन की मुख़्तसर मुलाक़ात के बाद आपसे मिलने की ख़्वाहिश बनी रही। दरअसल अब एकाध रोज़ में यहाँ से चलने की सोच रहा हूँ।’ फिर तिरछी नज़र से भीतरी दरवाज़े की तरफ देखकर आवाज़ हल्की करके बोले, ‘मैंने पाया है कि दुनिया के ज़्यादातर लोग तंगज़ेहन हैं। एक इंकलाबी की ज़रूरतों को समझना और उसके काम में मदद करना लोगों को आता नहीं। ख़ास तौर से औरतों को मैंने इस मामले में बहुत ही नासमझ पाया। इसीलिए सोचता हूँ कि दोस्तों से मदद लेने के बजाय डैडी की फर्नीचर की दूकान पर ही लौट जाऊँ।’

मैंने कहा, ‘ख़याल नेक है। देर मत कीजिए।’

वे बोले, ‘वैसे मैं सोच रहा था दो चार दिन आपकी मेहमाननवाज़ी क़ुबूल की जाए। आप बड़े भले आदमी लगे।’

मेरा दिमाग़ तुरत रेस के घोड़े की तरह तेज़ भागा और मैंने निर्णय ले लिया। कहा, ‘तारीफ के लिए शुक्रिया, लेकिन मेरे घर में एक भारी समस्या है। मेरी बीवी को गुस्से के दौरे पड़ते हैं और दौरा पड़ने पर वह बिना सोचे समझे सामने वाले पर हाथ की चीज़ मार देती है। कई बार मुसीबत में पड़ चुका हूँ। ज़िन्दगी समझिए नर्क हो गयी है।’

शम्मी भाई घबराकर बोले, ‘तौबा तौबा!अच्छा हुआ आपने बता दिया। आप तो ख़ासी मुसीबत में हैं। मुझे आपसे हमदर्दी है।’

फिर बोले, ‘अब डैडी की फर्नीचर की दूकान पर लौट जाना ही बेहतर है। दुनिया की आबोहवा हम जैसे इंकलाबियों के लिए मौजूँ नहीं है। रज्जू से दो हज़ार कर्ज़ माँगा है, मिल जाए तो रवाना हो जाऊँगा।’

मैंने चलते वक्त उनसे हाथ मिलाया तो मेरा हाथ हिलाते हुए उन्होंने अपनी शहीदाना मुस्कान के साथ वही शेर पढ़ा—-चला जाता हूँ हँसता खेलता मौजे हवादिस से, अगर आसानियाँ हों ज़िन्दगी दुश्वार हो जाए।’

मैं दरवाज़े से निकलते निकलते मुड़ा तो उन्होंने इस तरह हाथ हिलाया जैसे बस हँसते हँसते फाँसी के तख़्ते पर चढ़ने ही वाले हों।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #12 – व्यंग्य निबंध – व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति होने से उसकी सम्प्रेषणीयता बढ़ जाती है पर प्रहारक क्षमता कमजोर हो जाती है. ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।  

आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की अगली कड़ी में आलेख ‘व्यंग्य निबंध – ‘व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति होने से उसकी सम्प्रेषणीयता बढ़ जाती है पर प्रहारक क्षमता कमजोर हो जाती है.’।  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो # 12 – व्यंग्य निबंध – व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति होने से उसकी सम्प्रेषणीयता बढ़ जाती है पर प्रहारक क्षमता कमजोर हो जाती है. ☆ श्री रमेश सैनी ☆ 

[प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ]

व्यंग्य  एक गंभीर विधा है. जो समाज, व्यक्ति के सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे बढ़ती हैं. जिसमें जीवन और समाज में  व्याप्त सारी विसंगतियों पर अपनी बात करती है. जिससे व्यक्ति समाज,या शासन का का वह तबका  जिसके कारण व्यक्ति समाज प्रभावित है वह सोचने को मजबूर ह़ो जाता है. व्यंग्य वह शक्ति निहित है कि शोषक तंत्र के माथे पर चिंता की रेखाएं खिच जाती है.. तब यह गंभीर  चिंतनीय विचारणीय हो जाता है. इस स्थिति में हमारे पास वह अस्त्र होना चाहिए. जिससे सामने वाले पर तीखा प्रहार पड़े. उन अस्त्रों में हमारे पास शब्द हैं. शैली हैं. विचार हैं. इन अस्त्रों के उपयोग से ही हम सार्थक ढ़ंग से सामने वाले के पास अपनी बात पहुँचाने में सक्षम होंगे. अन्यथा अगर किसी एक टूल में कमजोर हो जाएंगे. तब इस स्थिति में हमारी विसंगति, सोच का असरहीन होने की पूरी संभावना है.इससे हमारे प्रयास और उद्देश्य विफल हो जाएंगे.यह विफलता शोषण और शोषक को शक्ति प्रदान करेगी।यह अराजकता धीरे धीरे समाज में बड़ी समस्या बन सामने आ सकती है.  समस्या का विकराल में परिवर्तित होने पर समाज और व्यक्ति का बहुत बड़ा नुकसान होने की पूरी की पूरी संभावना है.इस स्थिति में हमें सिर्फ पश्चताने के सिवा कुछ हाथ नहीं आना है. सभी सभ्य समाज, व्यक्ति शासन, या सत्ता  सदा सजग जिम्मेदार चिंतक, विचारक, लेखक कला साधक समाज सुधारक, समाज सुधारक संस्था की ओर आशा की नज़र से देखता है. इस समय लेखक कवि, और कलाकार का दायित्व बढ़ जाता है कि वह गंभीरता से उस विसंगति, कमजोरी, पर विचार करे. अपने पूरे टूल्स के साथ के उन कमजोरियों के समाज और सत्ता के सामने लाए. या उन विसंगतियों का संकेत करे. जिससे पीड़ित, शोषित वर्ग उन विसंगतियों के प्रति सजग सतर्क हो सके. यह काम सिर्फ और सिर्फ गंभीर प्रवृत्ति वाले लोग ही अच्छे ढ़ंग से कर सकते हैं. जिससे बेहतर समाज, बेहतर मनुष्य को बनाने की संकल्पना कर सकते हैं. यह कार्य हास्य की उपस्थित में पूरी क्षमता के साथ संभव नहीं है. गंभीरता में हमारी क्षमताओं का घनत्व बढ़ जाता है. जिससे हमारी सोच और बात की संप्रेषणीयता को विस्तार मिलता है. तब इससे इसकी पठनीयता बढ़ जाती है. संप्रेषणीयता और पठनीयता के तत्वों के कारण हमारे उद्देश्य की सफलता के अवसर बढ़ जाते हैं.हास्य रचनाओं में तरलता प्रदान करता है. जिससे रचनाओं का उद्देश्य कमजोर हो जाता है. किसी कमजोर चीज या शक्ति का प्रभावहीन होना बहुत साधारण सी बात है. तब हमारा उद्देश्य पीछे ह़ो जाता है. हमारा यह श्रम और प्रयास विफल हो जाता है. गंभीर से गंभीर रचना अपने सरोकार और संवेदनशीलताको लेकर अपनी बात समाज के सामने आती है.उसका प्रभाव सकारात्मक लिए होता है. यदि उसमें हास्य का मिश्रण कर दें. तब उसकी संप्रेषणीयता और पठनीयता तो बढ़ जाएगी. तब लोग उसको हास्य में ले लेंगे.और उसॆ  हास्य में उड़ा देंगे. इस स्थिति में हमारा को उद्देश्य हास्यास्पद होने की संभावना बढ़ जाती है. यह विकट स्थिति है. इससे बचना चाहिए. हरिशंकर परसाई जी सदा विसंगतियों पर बहुत गंभीरता से लिखा. चाहे इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर,अकाल उत्सव, वैष्णव की फिसलन, पवित्रता का दौरा,आदि अनेक रचनाएं अपने गंभीर उद्देश्य को लेकर चलती है.. उनकी रचनाओं में हास्य के छीटे जरूर आते हैं पर व्यंग्य और विषय की गंभीरता को कम नहीं करते हैं. इस पर परसाई जी का कहना है कि “हास्य लिखना मेरा यथेष्ट नहीं है यदि स्वाभाविक रूप से हास्य आ जाए तो मुझे गुरेज भी नहीं है.” यहां पर परसाई जी ने हास्य को प्राथमिकता नहीं दी है. वरन वे अपनी बात को गंभीरता से क ने विश्वास करते हैं. उनकी चर्चित रचन ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर ‘ का संवाद हैं

एक  इंस्पेक्टर ने कहा  – हाँ  मारने वाले तो भाग गए थे. मृतक  सड़क पर बेहोश पड़ा था. एक भला आदमी वहाँ रहता है. उसने उठाकर अस्पताल भेजा. उस भले आदमी के कपड़ों पर खून के दाग लग गए हैं.

 मातादीन ने कहा- उसे फौरन गिरफ्तार करो

 कोतवाल ने कहा – “मगर उसने तो मरते हुए आदमी की मदद की थी “

मातादीन ने कहा – वह सब ठीक है. पर तुम खून के दाग ढूंढने कहाँ जाओगे  जो एविडेंस मिल रहा है. उसे तो कब्जे में करो. वह भला आदमी पकड़कर बुलवा लिया गया.

उसने कहा- “मैंने तो मरते आदमी को अस्पताल भिजवाया था. मेरा क्या कसूर है?

चाँद की पुलिस उसकी बात से एकदम प्रभावित हुई. मातादीन प्रभावित नहीं हुए. सारा पुलिस महकमा उत्सुक था। अब मातादीन क्या तर्क निकालते हैं।

मातादीन ने उससे कहा- पर तुम झगड़े की जगह गए क्यों? उसने जवाब दिया -“मैं झगड़े की जगह नहीं गया. मेरा वहां मकान है. झगड़ा मेरे मकान के सामने हुआ.

अब फिर मातादीन की प्रतिभा की परीक्षा थी. सारा महकमा उत्सुक देख रहा था.

मातादीन ने कहा- “मकान है, तो ठीक है. पर मैं पूछता हूं कि झगड़े की जगह जाना ही क्यों?” इस तर्क का कोई जवाब नहीं था. वह बार-बार कहता मैं झगड़े की जगह नहीं गया. मेरा वहां मकान है. मातादीन उसे जवाब देते – ‘तो ठीक है, पर झगड़े की जगह जाना ही क्यों ? इस तर्क प्रणाली  से पुलिस के लोग बहुत प्रभावित हुए.

संवाद हमें ह़ँसने के लिए विवश अवश्य करता है. व्यंग्य के उद्देश्य कहीं भी तरल या कमजोर नहीं करता है. यहाँ हास्य हैं पर रचना की गंभीरता पर कोई असर नहीं पड़ता है. परसाई जी सदा इन विशेषता के आज भी याद आते हैं. उन्होंने अपने व्यंंग्य में टूल्स का समानुपातिक मात्रा में प्रभावी ढ़ंग से लिखा. यहां पर उनके समकालीन लेखक के पी सक्सेना जी का अवश्य ही उल्लेख करना चाहूंगा. उन्होंने विपुल मात्रा में लिखा। पर उनकी रचनाएं हमें समरण नहीं है. उनकी रचनाओं में पठनीयता थी लोगों को बहुत पसंद आती थी. वे मंच पर बहुत सराहे जाते थे. पर हास्यपरक होने के उन पर आरोप लगते रहे. उन्हें भी जीवन भर यह मलाल रहा कि मेरी रचनाओं में व्यंंग्य हैं परंतु यह स्वीकारते नहीं. इसके पार्श्व में मूल कारण यही था कि उनकी रचनाओं में हास्य व्यंंग्य की गंभीरता को तरल कर देते थे. जिससे व्यंग्य प्रभावहीन होकर अपने उद्देश्य में विफल हो जाता था. जब व्यंंग्य अपने सरोकारों और मानवीय संवेदना से छिटककर सामने आता है. तब प्राणहीन प्रस्तर प्रतिमा के समान दिखती है.उसका आकर्षण तो होता है, पर जीवंतता गायब रहती है.यही व्यंंग्य की गंभीर रचना में हास्य दुष्प्रभाव है.   

© श्री रमेश सैनी 

सम्पर्क  : 245/ए, एफ.सी.आई. लाइन, त्रिमूर्ति नगर, दमोह नाका, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 482 002

मोबा. 8319856044  9825866402

ईमेल: [email protected]

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares