(प्रस्तुत है श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी का एक सामयिक व्यंग्य। एक्ज़िट पोल और इस व्यंग्य की समय सीमा आज तक ही है । इसलिए सामयिक हुआ न। तो फिर पढ़िये और शेयर करिए। )
☆ एक्जिट पोल में खोल ☆
बेचारा गंगू बकरियां और भेड़ चराकर जंगल से लौट रहा था और ये चुनावी सर्वे का बहाना करके गनपत नाहक में गंगू को परेशान कर रहा है, जब गंगू ने वोट नहीं डाला तो इतने सारे सवाल करके उसे क्यों डराया जा रहा है? गंगू की ऊंगली पकड़ कर बार बार देखी जा रही है कि स्याही क्यों नहीं लगी? परेशान होकर गंगू कह देता है लिख लो जिसको तुम चाहो। गंगू को नहीं मालुम कि कौन खड़ा हुआ और कौन बैठ गया। गंगू से मिलकर सर्वे वाला भी खुश हुआ कि पहली बोहनी बढ़िया हुई है।
सर्वे वाला भैया आगे बढ़ा। एक पार्टी के सज्जन मिले, गनपत भैया ने उनसे भी पूछ लिया। काए भाई किसको जिता रहे हो? सबने एक स्वर में कहा – वोई आ रहा है क्योंकि कोई आने लायक नहीं है। इस बार ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी, एक साथ हजारों की संख्या में एक ही जगह सर्वे का मसाला मिल गया।
तब तक फुल्की वाला वहीं से निकला, बोला -कौन जीत रहा है हम क्यों बताएं, हमने जिताने का ठेका लिया है क्या? पिछली बार तुम जीएसटी का मतलब पूछे थे तब भी हमने यही कहा था कि आपको क्या मतलब …..! गोलगप्पे खाना हो तो बताओ… नहीं तो हम ये चले।
अब गनपत को प्यास लगी तो एक घर में पानी मांगने पहुँचे तो मालकिन बोली – फ्रिज वाला पानी, कि ओपन मटके वाला …….
खैर, उनसे पूछा तो ऊंगली दिखा के बोलीं – वोट डालने गए हते तो एक हट्टे-कट्टे आदमी ने ऊंगली पकड़ लई, हमें शर्म लगी तो ऊंगली छुड़ान लगे तो पूरी ऊंगली में स्याही रगड़ दई। ऐसी स्याही कि छूटबे को नाम नहीं ले रही है। सर्वे वाले गनपत ने झट पूछो – ये तो बताओ कि कौन जीत रहो है। हमने कही जो स्याही मिटा दे, वोईई जीत जैहै।
पानी पीकर आगे बढ़े तो पुलिस वाला खड़ा मिल गया, पूछा – “कयूं भाई, कौन जीत रहा है ……?”
वो भाई बोला – “किसको जिता दें आप ही बोल दो।” गनपत समझदार है कुछ नोट सिपाही की जेब में डाल कर जैसा चाहिए था बुलवा लिया। पुलिस वाले से बात करके गनपत दिक्कत में पड़ गया। पुलिस वाले ने डंडा पटक दिया बोला – “हेलमेट भी नहीं लगाए हो, गाड़ी के कागजात दिखाओ और चालान कटवाओ।”
कुछ लोग और मिल गए हाथ में ताजे फूल लिए थे, गनपत ने उनसे पूछा “ये ताजे फूल कहां से मिल गए ……उनमें से एक रंगदारी से बोला – “चुरा के लाए है बोलो क्या कर लोगे …….. सुनिए तो थोड़ा चुनाव के बारे में बता दीजिये ……?”
बोले – “तू कौन होता बे…. पूछने वाला। सबको मालूम है हमारा कमाल, बसूलने का हमारा हक है, सब की ऐसी तैसी कर के रहेगें।”
नेता जी नाराज नहीं होईये हम लोग आम आदमी से चुनाव की बात कर एक्जिट पोल बना रहे हैं।“
“सुन बे आम आदमी का नाम नहीं लेना।”
आगे बढ़े तो कालेज वाले लड़के मिल गए, जब पूछा कि – “चुनाव …..मतलब ?”
कई लड़के हंसते हुए बोले – “फेंकू के चान्स ज्यादा हैं बाकि इस बार लफड़ा है।“
थक गए तो घर पहुंचे, पत्नी पानी लेकर आयी, तो पूछा – “काए किसको जिता रही हो …..?” पत्नी बड़बड़ाती हुई बोली – “तुम तो पगलाई गए हो …! पैसा वैसा कुछ कमाते नहीं और राजनीति की बात करते रहते हो। कोई जीते कोई हारे तुम्हें का मतलब …………..”
फोन आ गया, “हां हलो ,हलो ……कौन बोल रहे हैं ? अरे भाई बताओ न कौन बोल रहे हैं “
आवाज आयी – “साले तुमको चुनाव का सर्वे करने भेजा था और तुम घर में पत्नी के साथ ऐश कर रहे हो ………..”
“नहीं साब, प्यास लगी थी पानी पीने आया था, बहुत लोगों से बात हो गई है,”
“निकलो जल्दी … बहस लड़ा रहे हो, बहाना कर रहे हो ……….”
काम वाली बाई आ गई, उससे पूछा तो उसने पत्नी से शिकायत कर दी कि “साहब छेड़छाड़ कर रहे हैं …….”
घर से निकले तो पान की दुकान वाले गज्जू से चुनाव के रिजल्ट पर चर्चा छेड़ दी, गज्जू गाली देने में तेज था. मां-बहन से लेकर भोपाली गालियों की बौछार करने लगा, आजू बाजू वाले बोले “बढ़ लेओ भाई, काहे दिमाग खराब कर रहे हो ………..”
(प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रमेश सैनी जी का एक बेहतरीन व्यंग्य। श्री रमेश सैनी जी ने तो जीडीपी नाम के शस्त्र का व्यंग्यात्मक पोस्टमार्टम ही कर डाला। यह बिलकुल सही है कि जी डी पी एक ऐसा शस्त्र है जिसकी परिभाषा/विवेचना सब अपने अपने तरीके से करते हैं। यह तय है कि श्री सैनी जी के पात्र दद्दू जी के जी डी पी से तो अर्थशास्त्री भी हैरान-परेशान हो जाएंगे ।)
☆ जीडीपी और दद्दू ☆
चुनाव के दिन चल रहे हैं और इसमें सभी दल के लोग जीतने के लिए अपने अपने हथियार भांज रहे हैं. उसमें एक हथियार है, जीडीपी. अब यह जीडीपी क्या होता है. हमारे नेताओं को इससे कोई मतलब नहीं. जीडीपी को समझना उनके बस की बात भी नहीं है. उन्हें तो बस उसका नाम लेना है. हमने कई नेताओं से बात करी. उन्हें जीडीपी का फुल फॉर्म नहीं मालूम. पर बात करते हैं जीडीपी की. वैसे हमारे नेताओं का एक तकिया कलाम है कि जनता बहुत समझदार है. इस जुमले से नेता लोग अपनी कमजोरियों को बहुत ही चतुराई से बचा ले जाते हैं. वे जीडीपी का मतलब भी नहीं समझते हैं. हमारी जनता में से हमारे दद्दू हैं. उनको भी जीडीपी का फुल फॉर्म नहीं मालूम है. किंतु जीडीपी के बढ़ाने में उनका अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष योगदान है, वे अनेक प्रकार से इस प्रयास में लगे हुए हैं.
हमारे दद्दू कहते हैं कि- ठजीडीपी हमारी जीवन शैली है. जीडीपी याने जीवन ढलुआ प्रोग्राम”. इस शैली से अच्छे-अच्छे अर्थशास्त्री जीडीपी में गच्चा खा गए.
दद्दू कहते हैं जब खूबसूरत स्वप्न सुंदरी कहती है- इस लावण्य साबुन से नहाइए. सभी कहते हैं कि जवानी के दिनो में सुंदरी की बात नहीं टालना चाहिए. दद्दू ने भी नहीं टाली और उन्होंने वह लावण्य साबुन खरीदा और नहाने लगे. उन्हें उस साबुन से बहुत प्रेम था. वे सपने में भी साबुन के बहाने स्वप्न सुंदरी को देखते. हमारे दद्दू की नजर साबुन के रैपर बनी स्वप्न सुंदरी की फोटो और उस बट्टी पर बराबर बनी रहती. दादी ने बताया कि साबुन की बट्टी तो उनकी सौतन हो गयीं थी. वे स्वप्न सुंदरी को खुश करने के लिए साबुन की बट्टी खरीदते हैं. उसे किसी को हाथ नहीं लगाने देते. उसे रोज उपयोग करते हैं. जब आधी से कम हो जाती है. तो उसे शौचालय के बाहर में रख देते हैं. जब उससे भी आधी हो जाती और हाथ में पकड़ में नहीं आती है. तब उसे नयी बट्टी में चिपका देते और इस तरह उनका काम चलता. वे उस साबुन से इतना प्यार करते कि नहाते वक्त उस बट्टी को ले जाते, उसे प्यार भरी नजरों से निहारते और बिना साबुन लगाये नहा लेते. इस तरह वे एक महीने में चार बट्टी की जगह एक बट्टी से काम चला लेते और तीन साबुन बचा कर जीडीपी की ग्रोथ में देश की सेवा करते.
देश की जीडीपी बढ़ाने में हमारे दद्दू का अनेक प्रकार से अतुलनीय योगदान रहा है. वे नया पैजामा सिलवाते. उसे शादी विवाह में पहन कर अपनी शान बखारते, बारात में सबसे आगे चलते, जिससे सबकी नज़र उनके पैजामे पर पड़ सके. जब थोड़ा पुराना हो जाता तो उसे बाजार हाट पहन कर जाते. जब पैजामा नीचे से फटने लगता तो उसे फेंकते नहीं, वरन उसे घुटने के थोड़ा ऊपर से कटवा कर पैताने के दो थैले सिलवा लेते, और ऊपर के हिस्सा से चड्डी का काम लेते. उन्होंने जीवन भर नया थैला नहीं खरीदा और न ही उन्होंने अपने लिए नयी चड्डी भी नहीं खरीदी. इस तरह वे साल में चार थैले और चड्डी बिना खरीदे काम चला लेते. जब थैले फट जाते तो उसे काट छांट कर रुमाल बना लेते और चड्डी के फटने से उसका फर्श पोछने वाला पोछा बन जाता इस तरह वे पैजामे की जान निकलने तक उपयोग करते हैं. अगर कोई घर का सदस्य उनके लिए चड्डी ले आता तो उसे धन्यवाद देने के बजाय इतनी डाँट पिलाते कि उसका दिन का खाना खराब हो जाता था. वे नये थैले, चड्डी और रुमाल खरीदना, पैसे की बरबादी समझते.
दद्दू बचपन में दाँत साफ करने के लिए दाँतौन का उपयोग करते, जो आसानी से मिल जाती थी और दातौन न मिलनेपर राख या कोयले से काम चला लेते. फिर जमाना आया. टूथपेस्ट और ब्रश का. जब पेस्ट खतम होने लगता तो टयूब को हथौड़ी से पीट पीट कर कचूमर निकाल कर पेस्ट बाहर निकल लेते. इतने से वे चुप नहीं बैठते, जब पूरा टयूब पिचक जाता या यों कहें उसकी जान ही निकल जाती है तो फिर वे टयूब को कैंची से काट कर, दो फांक कर देते और ब्रश से पूरी सफाई कर एक दिन का काम चला लेते. इसी तरह ब्रश के बाल घिस जाते तो उससे साईकिल साफ करने का काम लेते. जब ब्रश के बाल पूरी तरह खराब हो जाते तब ब्रश के बालों वाला सिरा काट कर शेष डंडी से पैजामे और चड्डी का नाड़ा डालने का काम ले लेते.
इस सबसे उन्हें बहुत संतोष मिलता. इस तरह से बचत कर देश की आर्थिक स्थिति में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते. उनका मानना था कि पैसा कमाना सरल है, पर पैसा खर्च करना कठिन है. इसे संभाल कर करना चाहिए.
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का विभिन्न लेखकों के द्वारा दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु तो अवश्य ही खोल देंगे। तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।
वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा है, सामूहिक द्वेष और स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में………
तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न और उसके अनेक उत्तर। प्रस्तुत है इंदौर से श्री सुधीर कुमार चौधरी, जबलपुर से श्री रमेश सैनी, बैंगलोर से श्री अरुण अर्णव खरे, जबलपुर से डॉ कुन्दन सिंह परिहार, मुंबई से श्री शशांक दुबे,बावनकर एवं देवास से श्री प्रदीप उपाध्याय की ओर से –
सवाल : आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम ?
इंदौर से श्री सुधीर कुमार चौधरी जी का जबाब ___
वस्तुतः साहित्य किसी भी समाज का सेफ्टी वाल्व होता है ।साहित्य समाज के आक्रोश ,कुंठा और तनाव को अभिव्यक्त करता है ।साहित्य समाज के संस्कारों को सहेजता है। साहित्य सामाजिक मूल्यों ,आदर्शों और सिद्धांतों का शिल्पी और रक्षक दोनों ही होता है। साहित्य के धरातल पर सामाजिक आस्था और विश्वास अंकुरित होते हैं। साहित्य के दर्पण में समाज का चेहरा प्रतिबिंबित होता है।
लेखक अपनी कलम के स्टैथोस्कोप से समाज की धड़कनों का लेखा-जोखा रखता है ।इसमें तनिक भी अनियमितता अनुभव करने पर वह साहित्य की दवाओं से इसका उपचार प्रारंभ कर देता है। समाज की नब्ज पर लेखक का सदैव हाथ होता है ।वह समाज की दिनचर्या और आचार व्यवहार पर कड़ा नियंत्रण रखता है। समाज की दिशा निर्धारित करता है ।लेखक की कलम समाज की लगाम को खींच कर रखती है।
साहित्य के पन्नों में समाज स्पंदित होता है ।लेखक समाज की आवाज को मुखरित करता है। वस्तुतः साहित्य समाज का ऊर्जा कोष होता है। लेखक इस ऊर्जा कोष का सजग र्चौकीदार होता है ।लेखक समाज की सीमा पर तैनात वह सिपाही होता है जो उसकी सांस्कृतिक ,चारित्रिक और भाषाई संपदा की रक्षा करता है ।संस्कृति और संस्कारों पर होने वाले हमले की रक्षा कलम की तलवार ही करती है।साथ ही कलम समाज की उच्छृंखलता और विवेक हीनता पर नियंत्रण भी रखती है।समाज को दिग्भ्रमित और दिशाहीन होने से बचाती है ।कलम समाज का परिष्कार और निर्माण के साथ साथ इस पर नियंत्रण भी रखती है।
समाज और साहित्य की सह जीविता से मानवता उन्नत और समृद्ध होती हैं ।लेखक की कलम छैनी और नश्तर दोनों की ही भूमिका का निर्वाह करती है। एक और कलम समाज को गढ़ती है वहीं दूसरी और सामाजिक विसंगतियों और विरोधाभासों के उन्मूलन के लिए वह नश्तर बन जाती है।कलम के नियंत्रण से विहीन समाज पतनशील हो जाता है ।कलम की ऊर्जा से समाज सत्य सदैव गतिशील रहता है ।लेखक की कलम लगाम बनकर समाज को नियंत्रित करती हैं।
– श्री सुधीर चौधरी, इंदौर
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जबलपुर से श्री रमेश सैनी जी का जबाब ____
पिछले 50- 60 वर्षों में समाज में काफी परिवर्तन हुआ है. पहले समाज के प्रेम, भाईचारा, मोहल्ले बंदी एक दूसरे से सहयोग की भावना, छोटे-बड़ों में परस्पर सम्मान आदि महत्वपूर्ण तत्व थे,पर अब समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है आज व्यक्ति का सम्मान उसकी गुणों की अपेक्षा उसकी आर्थिक संपन्नता और सत्ता शक्ति से नापा जाता है. समाज में व्याप्त राजनीति ने भी बहुत बड़ा परिवर्तन किया है. भारतीय समाज की संस्कृति, संस्कार को भी राजनीति ने बहुत प्रभावित किया है. पहले लोग जीवन मूल्य और समाज के अनुशासन को मानते थे. जब लोग इन मूल्यों और अनुशासन के विपरीत आचरण करते थे, और लेखक इन पर संकेत करता था तो उसका प्रभाव होता था. उस समय को कुछ हद तक थोड़ा नियंत्रण/लगाम लेखक कह सकते हैं. यह इसलिए कह सकते हैं कि समाज में लेखक का सम्मान होता था. पर आज आधुनिक तकनीक, बाजारवाद और वैश्वीकरण ने समाज के मूल स्वरूप में सेंध मार दी है.समाज धीरे धीरे बिखरने लगा है, लोगों के आचरण में अनेक मुखौटों ने जगह ले ली है. लेखक भी इससे अछूता नहीं है. लेखक भी समयानुसार अपना आचरण तय करता है. अतः उसका प्रभाव भी कम पड़ा है. अब उसके हाथ से लगाम खिसकने लगी है. इसी का असर है कि सत्ता स्तर पर भी राज्यसभा में मानद सदस्यों का मनोनयन भी उसके गुणों/विशेषज्ञता की वजह से नहीं, व्यक्ति सत्ता के कितने नजदीक है, इससे किया जाता है. यह समाज के बदलते मूल्यों का प्रतिफलन है. आज लेखक के नियंत्रण में कुछ नहीं है. हाँ यह जरूर है कि पुराने इतिहास को देखकर भ्रम पाले है कि वह घोड़े की लगाम/आंख है.
– श्री रमेश सैनी, जबलपुर
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बैंगलोर से श्री अरुण अर्णव खरे जी का जबाब ___
बड़ा ट्रिकी प्रश्न है । घोड़ा मनुष्य के सम्पर्क में आने वाला सबसे पहला जानवर है अतएव मनुष्यों से दोस्ती का उसका बहुत पुराना इतिहास है । भारतीय इतिहास में सत, त्रेता और द्वापर युगों में घोड़ों के प्रशिक्षण और उनकी युद्ध में उपयोगिता को लेकर अनेक वृतांत हैं । सूरज के रथ में सात घोड़े हैं । महाभारत में पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का समय विराट नगर में अश्वों की सेवा में ही व्यतीत किया था । नकुल को अश्व विद्या में निपुणता हासिल थी । महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक को इतिहास में नायकों जैसा स्थान हासिल है । रानी लक्ष्मीबाई को भी उनके अश्व ने तब तक अंग्रेज़ों के हाथों में नहीं पड़ने दिया था जब तक उसमें जान थी । मतलब यह घोड़ा आदि काल से मनुष्यों का सबसे अच्छा मित्र और वफ़ादार रहा है ।
यहाँ सवाल घोड़े की आँख को लेकर है । सवाल आख़िर घोड़े की आँख ही क्यों ? घोड़े की आँख में ऐसा क्या है जो इस सवाल की ज़रूरत पड़ी । शायद ज़मीन पर रहने वाले सभी जानवरों में घोड़े की आँख सबसे बड़ी होती है । घोड़ा दिन और रात के समय में भी आँखें खुली रखता है । घोड़े की आँख सुदूर की चीज़ों को भी सटीकता पूर्वक देख सकती है ।
प्रश्न के उत्तर की तलाश में घोड़े की ऑँख को लेकर इतने विस्तार में जाना ज़रूरी लगा । लेखक का समाज के प्रति दायित्व भी घोड़े की आँख के समान अधिक है । समाज के सभी पक्षों पर सतत नज़र रखना अच्छे सृजन के लिए ज़रूरी है तभी कोई भी लेखक समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है ।
आज के परिवेश में जब समाज में विघटन बढ़ रहा है, इतिहास की ग़लत व्याख्या हो रही है, मनगढ़न्त और आधारहीन तथ्यों को आधार बनाकर मनचाहा खेल खेला जा रहा है तब लेखक के लिए लगाम लगाने का काम करना भी आवश्यक प्रतीत हो रहा है । लेखक ही ग़लत तथ्यों को सही परिप्रेक्ष्य में समाज के सामने ला सकता है और भ्रम फैलाने वाले प्रयासों पर लगाम लगा सकता है ।
मेरे दृष्टिकोण से लेखक की भूमिका दोनों रूपों में ज़रूरी है .. घोड़े की ऑंख के रूप में जागरूकता फैलाने के लिए और लगाम के रूप लें ग़लत बातों को रोकने के लिए ।
– श्री अरुण अर्णव खरे, बैंगलोर
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जबलपुर से डाॅ कुंदन सिंह परिहार जी का जबाब ___
लेखक समाज के घोड़े की आँख भी है और लगाम भी।दोनों का अपना अपना महत्व है।आँख का काम देखना है और लगाम का काम नियंत्रण करना। लेखक समाज की आँख है क्योंकि वह सामान्य व्यक्ति की तुलना में स्थितियों को अधिक सूक्ष्मता और स्पष्टता से देख-परख सकता है।लेकिन यह आँख तभी ठीक ठीक देख और दिखा सकती है जब इस आँख के पीछे सही दृष्टि, नीर-क्षीर विवेक और वैज्ञानिक सोच हो।पीलियाग्रस्त, पूर्वाग्रह से पीड़ित आँख, जिसे अंग्रेजी में ‘जांडिस्ड आई’ कहते हैं, न खुद चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्य में देख सकती है, न समाज को सही दिखा सकती है।जो खुद सही मार्ग न देख सके, वह समाज को सही मार्ग कैसे दिखाएगा?लेकिन सिर्फ देखना ही काफी नहीं होता।कभी कभी आँख दिखाना और तरेरना भी ज़रूरी होता है, अन्यथा सीधी-सादी आँख की कोई परवाह नहीं करता।
लेखक समाज की लगाम या वल्गा तभी बन सकता है जब उसकी समाज में पैठ और समाज पर प्रभाव हो।इसके लिए लेखक को ‘स्व’ से निकलकर ‘पर’ तक आना पड़ता है।इसके लिए समाज से जुड़ना होता है और अपनी चिंता से ज़्यादा समाज की चिंता करनी होती है।इसके लिए लेखक को लेखक के अलावा ‘सोशल एक्टिविस्ट’ बनना पड़ता है।सिर्फ अपने खोल में दुबक कर कागद कारे करते रहने से काम नहीं चलता।
भूतकाल में अनेक लेखकों का समाज पर काफी प्रभाव रहा है।अकबर के नवरत्नों में ‘आईने अकबरी’के रचयिता अबुल फजल, महान गायक तानसेन और अपने दोहों के लिए आजतक लोकप्रिय ‘रहीम’ थे।तुलसीदास आज भी भारत के हर घर में उपस्थित हैं क्योंकि उन्होंने रामकथा लिखने के अतिरिक्त समाज के लिए एक आचरण-संहिता प्रस्तुत की।
देश में अनेक कवियों और लेखकों का पर्याप्त सम्मान रहा है तथा समाज और शासन ने उनकी बात सुनी है।इनमें सुभद्राकुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, दादा माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह ‘दिनकर’,नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवि रहे हैं।हाल के वर्षों में जब तक परसाई जी स्वस्थ थे, उनका कद और सम्मान देखते ही बनता था।अन्त तक नगर के छात्र अपनी समस्याओं पर उनकी राय लेने के लिए उन्हें घेरे रहते थे।जबलपुर के उन्नीस सौ साठ के सांप्रदायिक दंगों के समय दंगों को शांत करने में परसाई जी और उनके मित्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
लेखक अपना कच्चा माल समाज से उठाता है, इसलिए उसे उसी परिमाण में समाज को लौटाना होगा।तभी समाज उसे अपने ऊपर लगाम डालने की अनुमति देगा।आज लेखक समाज से और समाज लेखक से विमुख है।सब तरफ ‘अहो रूपं,अहो ध्वनि’ का शोर है।लेखक ‘नार्सिसस कांप्लेक्स’ से ग्रस्त है, आत्मप्रचार और आत्मप्रशंसा में सारे वक्त मसरूफ है।अब हर लेखक के हाथ में आइना है,जिसके पार देखने की उसे फुरसत नहीं है।सारा वक्त अपनी नोंक-पलक संवारने में ही बीतता है।व्यवस्था की जांच-परख करने के बजाय लेखक सरकारी पुरस्कारों और सम्मानों के लोभ में ऐसा फंसा है कि व्यवस्था के सामने वह दयनीय और हीनता-बोध से ग्रस्त है।जिस लेखक को उसका पड़ोसी ही न जानता हो,वह समाज की लगाम के रूप में कितना प्रभावी हो सकता है यह समझा जा सकता है।
– डॉ कुन्दन सिंह परिहार, जबलपुर
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मुंबई से श्री शशांक दुबे जी का जबाब ___
आज यदि लेखक यह मानकर चल रहा है कि वह समाज के घोड़े की लगाम है, तो इसका मतलब यह है कि वह खुशफहमी के संसार में जी रहा है. साहित्य समाज में व्यापक स्तर पर हलचल पैदा करने में असमर्थ है. जब इलेक्ट्रोनिक चैनलों और सोशल मीडिया का दायरा इतना बढ़ा नहीं था और जब अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम लेखनी हुआ करती थी, तब लेखक में समाज को प्रभावित करने की, उनकी सोच में परिवर्तन लाने की थोड़ी बहुत क्षमता होती थी. यह क्षमता भी सीमित थी, क्योंकि तब का समाज भी हर किसी लेखक की कही बात का अनुसरण नहीं करता था. अलबत्ता पढ़ा लिखा मध्यवर्ग आज़ादी से पहले गणेश शंकर विद्यार्थी और आजादी के बाद सत्तर के दशक में राजेन्द्र माथुर और अस्सी के दशक में प्रभाष जोशी जैसे साहसिक पत्रकारों की लेखनी से प्रभावित होकर अपने विचार गढ़ता रहा. तब कलम की ताकत थी और लेखक भी इतने ईमानदार थे. आज जो लेखन किया जा रहा है, वह समाज सुधार या जन उद्धार के लिए नहीं किया जा रहा. आज का लेखन महज यश की प्रार्थना के लिए है. हालांकि इसमें भी अवलोकन के अलावा चिंताएँ हैं, मनोरंजन है, पीड़ाएँ हैं, आक्रोश हैं, खुशियां हैं, लेकिन यह सभी महज अपनी बात को रेखांकित करने के लिए, अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए, अपनी मामूली सी बात में वजन पैदा करने के लिए. लोक कल्याण की कम है. कहीं है भी तो वह लोक तक पहुँचने और उनका मानस बदलने में असमर्थ है. कहना न होगा, लेखक घोड़े की आँख ही है, लगाम नहीं.
– श्री शशांक दुबे, मुंबई
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देवास से श्री प्रदीप उपाध्याय जी का जबाब ___
आज के संदर्भ में लेखक समाज के घोड़े की खुली आँख है।लेखक का काम किसी बात को नियंत्रित करना नहीं है,वह किसी बात को होने से रोक भी नहीं सकता, वह राह दिखा सकता है।इस परिप्रेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि लेखक समाज के घोड़े की लगाम नहीं है।हाँ,वह अपनी चौकस दृष्टि से समस्त विसंगतिपूर्ण स्थिति को उजागर कर सकता है।अपनी खुली आँख से ही वह अच्छे-बुरे की पहचान कर सकता है।अतः वह समाज के घोड़े की आँख के समान ही है।यहाँ यह भी जरूरी है कि ये आँखें ऐसी न हो जिसे चमड़े का पट्टा चढ़ाकर तीस डिग्री तक ही देखने को मजबूर किया गया हो।लेखक को अपनी आँख का दायरा घोड़े की आँख के समान एक सौ अस्सी डिग्री तक विस्तारित रखना चाहिए, साथ ही उसमें इतनी दूरदृष्टि होना चाहिए कि जो उसके सामने घटित न भी हो रहा हो, वह भी पूर्वभास और पूर्वानुमान के साथ उसकी दृष्टि में तीन सौ साठ डिग्री तक समाहित हो जाए।
लेखक की इसी दृष्टि के कारण हमेशा शक्ति सम्पन्न वर्ग, सत्ता पक्ष और शोषक समाज को कष्ट पहुँचता आया है और अभिव्यक्ति की आजादी पर येनकेन प्रकारेण रोक लगाने के प्रयास होते आए हैं।बुद्धिजीवी वर्ग पर दबाव, डर,लोभ,प्रलोभन द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता रहा है कि वह भी घोड़े की दोनों आँखों पर चढ़े दो चमड़े के पट्टे जिन्हें घोड़ा ऐनक, अंग्रेजी में Blinders या Blinkers कहते हैं, के समान चष्मे लगा लेता है जिससे कि वह अपने आसपास और पीछे कुछ भी नहीं देख पाए।अपने चालक की इच्छानुरूप सिर्फ एक सीधी राह ही चलता चला जाए।
लेखक को बिना किसी दबाव के अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए और बिना किसी लोभ-लालच,प्रलोभन, दबाव या डर के घोड़ा ऐनक को छोड़कर समाज के घोड़े की आँख के समान अपनी दृष्टि और दृष्टिकोण रखना चाहिए।तभी वह समाज के हित में अपना सच्चा योगदान दे सकता है।लेखक घोड़े की लगाम तो हो ही नहीं सकता है क्योंकि लगाम हमेशा दूसरों के हाथ ही होती है।लेखक गलत-सही की पहचान करा सकता है, सही दिशा ज्ञान करा सकता है,उचित राह दिखा सकता है।अतः मेरे मत में लेखक समाज के घोड़े की आँखें ही हैं।
(प्रस्तुत है डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का एक बेहतरीन व्यंग्य। डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी के Sense of Humour को दाद देनी पड़ेगी। व्यंग्य में हास्य का पुट देकर अपनी बात पाठक तक पहुंचाने की कला में परिहार जी का कोई सानी नहीं । यह उनकी अपनी मौलिक शैली है और इसके लिए उनकी लेखनी को नमन।)
☆ बच्चूभाई की शौर्यगाथा ☆
बच्चूभाई की एक ही हसरत है —-एक शेर मारने और उस पर पाँव रखकर फोटो खिंचाने की। बच्चूभाई के दादा और पिता मशहूर शिकारी रहे। उनके पास कई पुराने, पीले पड़े फोटो हैं जिनमें उनके दादा या पिता मृत शेर पर पाँव धरे खड़े हैं। हाथ में बंदूक और चेहरे पर गर्व है। बच्चूभाई के पास अब भी उनकी दो बंदूकें और कुछ कारतूस हैं। वे कभी कभी उनकी सफाई करके तेल वेल लगा देते हैं और आह भरकर उन्हें कोने में रख देते हैं।
वीरों के वंशज बच्चूभाई एक दफ्तर में क्लर्क हैं। दिन भर कलम से फाइल पर निशाना लगाते रहते हैं। शिकार पर प्रतिबंध लग गया है। अब शेर मारें तो कैसे, और फोटो कैसे खिंचे?
मायूसी से कहते हैं, ‘लगता है यह हसरत मेरे साथ चिता पर चली जायेगी। ऊपर जाऊँगा तो पिताजी और दादाजी को क्या मुँह दिखाऊँगा?’
मैंने कहा, ‘मुँह दिखाने की छोड़ो। मुँह तो तुम्हारा यहीं रह जाएगा। कहते हैं ऊपर तो सिर्फ आत्मा जाती है। आत्मा के मुँह कहाँ होता है?’
बच्चूभाई कहते हैं, ‘कुछ भी हो। शेर नहीं मारूँगा तो मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी। मेरी आत्मा यहीं भटकती रहेगी।’
एक दिन बच्चूभाई मिले तो बहुत खुश थे। बोले, ‘जुगाड़ जम रहा है। एक वनरक्षक को पटा लिया है। वह इंतजाम कर देगा। कह रहा था सिर्फ खाल लेकर आने देगा। बाकी वहीं छोड़ कर आना होगा।’
मैंने कहा, ‘तुमने बंदूक चलायी तो है नहीं। शोभा के लिए रखे रहे। अब कैसे चलाओगे?’
बच्चूभाई कहते हैं, ‘तुमको बताया था न, कि स्कूल में एन.सी.सी. लिये था। तब तीन चार बार चलायी थी।’
मैंने कहा, ‘तुम्हें शिकार का अनुभव नहीं है। कहीं शेर की जगह कोई आदमी मत मार देना। और जहाँ तक मेरा सवाल है, तुम्हारे घर में बंदूक तो है, मेरे घर में वह भी नहीं। कैसे शिकार करोगे?’
बच्चूभाई मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘उसका भी इंतजाम कर लिया है। नगली गाँव के पुराने शिकारी रुस्तम लाल मेरे पिताजी के बड़े अच्छे दोस्त थे।उन्हें साथ ले जाएंगे।’
मैंने कहा, ‘तुम्हारे पिताजी के समय के हैं तो उनके हाथ-पाँव काँपते होंगे। वे तुम्हारे किस काम आएंगे?’
बच्चू बोले, ‘अमाँ यार, उनसे तो सिर्फ गाइडेंस चाहिए। बाकी हम खुद कर लेंगे।’
बच्चू बहुत उत्साह में थे।शिकार का दिन तय हो गया। बताया कि वनरक्षक मचान बनवा देगा। एक बकरे का इंतज़ाम भी हो गया, जिसका मिमियाना शेर को ठिये तक बुलायेगा। एक जीप का प्रबंध भी कर लिया गया।
बच्चू ने मुझसे कहा, ‘कैमरा ले चलने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। तीन चार फोटो खींचना, खास तौर से शेर पर पाँव रखकर खड़े होने वाली।’
एक दोपहर रुस्तम लाल आ गये। बुढ़ा गये थे, लेकिन धज पूरी शिकारी की थी —-जंगल बूट, जुराबें, नेकर, जरकिन और आगे की तरफ झुकायी हुई चमड़े की गोल टोपी। हाथ में बंदूक और छाती पर कारतूसों की माला।
कहने लगे, ‘इस सरकार ने शेर के शिकार पर रोक लगाकर ठीक नहीं किया। अब हम बहादुर लोग अपनी वीरता कहाँ दिखाएं? चिड़ियों, खरगोशों को मारकर संतोष करना पड़ता है, लेकिन उसमें वह थ्रिल कहाँ जो शेर के शिकार में है।’
मैंने कहा, ‘आप फौज में भर्ती क्यों नहीं हो गये? वहाँ वीरता दिखाने के काफी मौके मिल जाते।’
वे बोले, ‘हमारी काफी ज़मीन ज़ायदाद है। ज़मींदारी छोड़कर फौज में जाते तो यहाँ का काम कौन देखता?’
मैंने कहा, ‘तो फिर आप डाकुओं, आतंकवादियों से निपटने में सरकार की मदद कीजिए।’
वे नाराज़ हो गये, बोले, ‘आप तो मज़ाक करते हैं। मैं शेर के शिकार की बात करता हूँ और आप डाकुओं से निपटने की। मैं तो शिकारी हूँ। मुझे डाकुओं को मारने से क्या लेना देना?’
थोड़ी देर में बच्चूभाई तैयार होकर आ गये। मैंने देखा तो पहचान नहीं पाया —–ब्रीचेज़, जंगल बूट, जरकिन, सिर पर टोपी। सब पिताजी की पुरानी पेटी से निकाले हुए।सिर्फ चाल से ही पता चलता था कि शिकारी असली नहीं है। फाइलें देखते देखते कमर कुछ झुक गयी थी।
बंदूकें और सर्चलाइट लेकर हम चल पड़े। जहाँ से जंगल शुरू होता था वहाँ से एक बूढ़ा देहाती हमारे साथ हो लिया। उसने एक बकरा जीप में रख लिया। ठिये पर पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी।
देखा, एक पेड़ पर बढ़िया मचान बना था। बच्चूभाई मुँह उठाकर चिंतित स्वर में बोले, ‘मचान तक कैसे चढ़ेंगे?’
देहाती हंसने लगा। बच्चूभाई शर्मा गये।
बकरे को थोड़ी दूर एक पेड़ से बाँध दिया गया। उसने अपनी मिमियाने की ड्यूटी शुरू कर दी।फिर हम लोग मचान पर चढ़े। देहाती ने सहारा देकर बच्चूभाई को चढ़ाया, फिर भी उनकी ब्रीचेज़ फट गयी। शहर में होते तो तुरंत बदलनी पड़ती। यहां ज़रूरी नहीं था। रुस्तम लाल भी सहारा लेकर कांपते कांपते ऊपर चढ़े। बंदूकें, कारतूस, सर्चलाइट, खाना-पीना भी ऊपर पहुँचाया गया।
जीप वाला और देहाती सबेरे आने की कह कर चले गये।
अब हम थे और जंगल की रात और सन्नाटा। मेरी हालत खराब हो रही थी, और बच्चू की भी। हम शहर के लोग ऐसे सन्नाटे के आदी कहाँ हैं?वहाँ तो रात को बिजली चले जाने से घबराहट होने लगती है, यहाँ रात भर पेड़ों और जंगली जानवरों की आवाज़ों के बीच रहना था। रुस्तम लाल बैठे बैठे झपकी ले रहे थे।
रात गुज़रती गयी। करीब एक बज गया। वनरक्षक ने बच्चूभाई को पक्का आश्वासन दिया था कि शेर यहाँ आएगा। बकरा अपनी मिमियाने की ड्यूटी निष्ठा से कर रहा था। हम बीच बीच में सर्चलाइट से उसे देख लेते थे।
एकाएक पौधों के चटकने की आवाज़ आयी। हमने सर्चलाइट डाली, और हम भय और आश्चर्य से जड़ हो गये। सचमुच एक शेर चला आ रहा था, इत्मीनान और निश्चिंतता के साथ चलता हुआ। रुस्तम लाल चौकन्ने हुए। उन्होंने जल्दी से बंदूक बच्चूभाई को थमायी। बकरा अब डर के मारे फटी आवाज़ में मिमिया रहा था।
शेर ने बकरे की तरफ देखा भी नहीं। वह आराम से चलता हुआ मचान के पास आ गया। बच्चूभाई भय या उत्तेजना के मारे बंदूक लिये मचान पर खड़े हो गये। मैं बराबर सर्चलाइट डाल रहा था।
एकाएक शेर ने ज़ोर की दहाड़ मारी। पूरा जंगल उसकी दहाड़ से काँप गया। उसके दहाड़ते ही बच्चूभाई ने कलाबाजी खायी और मय बंदूक के सीधे नीचे शेर के चरणों में जा गिरे। हमारे प्राण हलक में आ गये।
बच्चूभाई मुर्दे की तरह निस्पंद, आँखें बंद किये, शेर के पाँवों के पास पड़े थे। मचान की ऊँचाई तो ज़्यादा नहीं थी लेकिन शायद डर के मारे बेहोश हो गये थे।
रुस्तम लाल अपनी बंदूक संभाल रहे थे। इतने में शेर बोला, ‘ए बूढ़े, बंदूक रख दे, नहीं तो मैं तेरे इस बहादुर साथी को हलाल करता हूँ।’
हम शेर को आदमी की तरह बोलते सुनकर स्तब्ध रह गये। एकदम चमत्कार। रुस्तम लाल ने बंदूक नीचे रख दी।
शेर ने अपना एक पंजा बच्चूभाई की छाती पर रखा और मुँह उठाकर बोला, ‘फोटो खींचो।’
मैंने फट से कैमरे का बटन दबाया। फोटो खिंच गयी।
शेर रुस्तम लाल को संबोधित करके बोला, ‘सुन बूढ़े! मैं जानता हूँ तू पुराना पेशेवर हत्यारा है। तेरे जैसे लोगों ने हमारे वंश का बहुत नाश किया है। अब तो बुढ़ा गया है, राम नाम ले।’
रुस्तम लाल सन्नाटे में थे।
शेर फिर बोला, ‘बहादुर है तो फिर ऊपर मचान पर बैठकर बंदूक से क्यों मारता है? बड़ा सूरमा है तो नीचे उतरकर बिना बंदूक के मुझसे कुश्ती लड़। मेरे पास नाखून हैं तो तू भी एकाध छुरी ले ले।’
रुस्तम लाल मुँह पर दही जमाये, सिर झुकाये बैठे थे।
शेर बोला, ‘मैं तो जा रहा हूँ। इस बेचारे बकरे को फालतू ही यहाँ लाकर मरवाने को बाँध दिया। मैं तुम लोगों के फेर में आकर इसे नहीं मारूँगा। तुम लोग दो हत्याएं करना चाहते थे।’
अब तुम लोग मचान के किनारे दूसरी तरफ मुँह करके बैठ जाओ। ज़रा भी हरकत की कि मैंने तुम्हारे दोस्त पर झपट्टा मारा। दस मिनट बाद पीछे मुड़ कर देखना।’
हम मचान के किनारे दस मिनट बेवकूफों जैसे बैठे रहे। दस मिनट बाद पीछे मुड़ कर देखा तो शेर का कहीं अता-पता नहीं था।
हम जल्दी जल्दी नीचे उतरे। देखा, बच्चूभाई लेटे लेटे आँखें मुलमुला रहे थे।उन्हें सही-सलामत देखकर हमारी जान में जान आयी।
मैंने पूछा, ‘ज़्यादा चोट तो नहीं आयी?’
वे उठकर बैठ गये। हाथ पाँव थथोलकर बोले, ‘थोड़ी सी आयी है, कोई चिन्ता वाली बात नहीं है। लेकिन यह शेर तो हमको पट्टी पढ़ा गया। अब फोटो का क्या होगा?’
मैंने कहा, ‘जो फोटो मैंने खींची है उसी को ड्राइंगरूम में टाँग लेना। वह एक दुर्लभ फोटो होगी। मुझे ज़रूर इस फोटो पर इनाम मिलेगा।’
बच्चूभाई नाराज़ होकर बोले, ‘तुम्हें हमेशा मज़ाक सूझता है। मेरी हसरत तो धरी की धरी रह गयी।’
फिर बोले, ‘लेकिन क्या यह मेरी बहादुरी नहीं है कि छाती पर शेर का पंजा रखा होने के बाद भी मैं जिन्दा रहा?’
मैंने कहा, ‘सो तो है। यह बात तुम गर्व से लोगों को बता सकते हो।’
हम फिर किसी तरह मचान पर चढ़कर सुबह का इंतज़ार करते करते सो गये। बकरा अब बेमतलब मिमिया रहा था। बच्चूभाई को उसके मिमियाने पर गुस्सा आ रहा था।
सबेरे जीप उस देहाती को लेकर आ गयी और हम अपना सामान समेटकर मय बकरे के चल दिये।
एक मोड़ पर वह वनरक्षक हमारा इंतज़ार करता मिल गया। जीप रुकने पर उसने बच्चूभाई से रहस्यमय आवाज़ में पूछा, ‘हो गया?’
बच्चूभाई संत की तरह गंभीर मुद्रा में बोले, ‘नहीं। मुझे रात को मचान पर बैठे बैठे ज्ञान हुआ कि जीवहत्या पाप है। इसलिए मैंने अपना इरादा बदल दिया। आपको सहयोग के लिए धन्यवाद।’
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का विभिन्न लेखकों के द्वारा दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु तो अवश्य ही खोल देंगे। तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।
वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा है, सामूहिक द्वेष और स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में………
तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न और उसके अनेक उत्तर। प्रस्तुत है पुणे से श्री हेमन्त बावनकर, जबलपुर से श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव , बीकानेर से डॉ. अजय जोशी एवम मुंबई से श्री संजीव निगम की ओर से –
सवाल : आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम ?
पुणे से श्री हेमन्त बावनकर जी का जबाब ___
लेखक बाज की आँख की तरह समाज को आईना दिखाता है
जनाब पहले तो यह तय करें कि आज के संदर्भ में आप किस लेखक की बात कर रहे हैं? उस लेखक की जो दिन रात दिमाग में विचारों के घोड़े दौड़ाते हुए हृदय, मस्तिष्क और कलम में सामंजस्य बैठाकर सकारात्मक साहित्य की रचना कर रहा है या उस लेखक की बात कर रहे हैं जो सोशल मीडिया में कट-पेस्ट-फॉरवर्ड कर तथाकथित साहित्य की रचना कर रहा है या कि शब्दों में कुछ हेरफेर कर दूसरों की रचना अपने नाम से प्रकाशित कर रहा है। कुछ ऐसे लेखक भी हैं जो उस समाज के घोड़े की आँख हैं जिनकी आँख के ऊपर कवर लगा होता है, नाक की सीध में चलते हैं, किसी न किसी के अंधभक्त हैं, उनकी लगाम उनके हाथ में भी नहीं होती है, शब्दों के चाबुक चलाते रहते हैं। कुछ लेखक तो सम्मान की दौड़ में किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। और भी किस्म किस्म के लेखक है जिनकी व्याख्या करने से शब्द सीमा के बाहर शब्दों के घोड़े दौड़ने लगेंगे।
मुद्दे की बात इतनी सी है जनाब कि मैं तो सिर्फ पहले किस्म के लेखक की नब्ज़ जानता हूँ। वह समय पड़ने पर समाज के घोड़े की आँख का उपयोग बाज के आँखों की मानिंद करता है और व्यंग्य जैसी विधा से लगाम लगा कर समाज को आईना दिखाने में कोई गुरेज नहीं करता।
– हेमन्त बावनकर, पुणे
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जबलपुर से श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी का जबाब ___
लेखक की भूमिका तो समाज के घोड़े की आँख, लगाम से आगे मस्तिष्क की भी है
लेखक समाज के घोड़े की आंख या लगाम मात्र नही , दरअसल वह भी समाज का ही हिस्सा होता है . लेखन कर्म से वही जुड़ता है जो अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील व जागरूख होता है . वह परिवेश में घट रही घटनाओ का मूक साक्षी भर नही होता जहां वह अच्छाई का समर्थक व प्रशंसक होता है . वहीं कुरीतियो और बुराई पर लेखक अपनी कलम से हर संभव वार करता है . इस सबके साथ ही अनेक बार स्वयं लेखक भी समाज सापेक्ष कमजोरियो से ग्रसित भी होता है , तब वह भी यहां वहां चारे पर मुंह मारने से बाज नही आता . किन्तु उसका चैतन्य लेखन समाज के घोड़े की आंख का तटस्थ युग दृष्टांत होता है . वह अपने लेखन की चाबुक से समाज के घोड़े को सही राह पर चलाये रखने सतत प्रयत्नशील रहता है . वह यथा संभव लगाम खींच कर समाज को सही मार्ग दिखाने का यत्न करता नजर आता है . यदि समाज को केवल एम एफ हुसैन के घोड़े में ही चित्रित करना हो तो लेखक की भूमिका समाज के घोड़े की आंख , लगाम ,या सरपट भागते पैरों से अधिक घोड़े के मस्तिष्क की हैं .
– विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर
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बीकानेर से डॉ. अजय जोशी जी का जबाब ___
लेखक समाज की ना आँख है ना लगाम
मुझे लगता है कि लेखक समाज घोड़े की ना तो आंख है और ना ही लगाम। देश की जनसंख्या में युवा वर्ग सर्वाधिक है। यही समाज का बड़ा हिस्सा है। इस वर्ग को लिखे गए किसी तरह के साहित्य से कोई खास लेना देना ही नही है। उनका एक बड़ा वर्ग आपने रोजगार और काम धंधे को ढूंढने और परिवार के भरण पोषण की जुगाड़ में संघर्ष कर रहा है तो दूसरा वर्ग अपनी अलग मस्ती में मस्त है। उसका अपना एक अलग संसार है। उसको खाने पीने और मौज मस्ती करने से ही फुरसत नही है।वह बढ़िया से बढ़िया कपड़े पहनता है,जूते पहनाता है, महंगी और बढ़िया गाड़ियों में घूमता है। अपनी गर्लफ्रैंड के साथ होटलों और रेस्ट्रोरेंट में मजे करता है और पार्टियां करता है। बहुत से युवा नशे की चपेट में भी है उनको दीन दुनिया से कोई लेना देना ही नही है। युवाओं का बड़ा वर्ग फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे सोसल मीडिया की आभासी दुनिया में व्यस्त और मस्त है। उसका अधिकांश समय इसमें ही बीतता है। इस सब के बीच उसके पास लेखक द्वारा लिखे गए को ना तो गंभीरता से पढ़ने का समय है और ना ही अमल करने में उसकी कोई रुचि। पढ़ने की रुचि और प्रवर्ति निरन्तर समाप्त हो रही है इसलिए वह लेखक के लिखे साहित्य की आंख से देखने का ना तो वो सोचता है और ना ही देखता है। यह पीढ़ी किसी बंधन को स्वीकार करने को भी तैयार ही नही है इसलिए लेखक के लिखे को घोड़ की लगाम को स्वीकार करने के लिए वह कतई तैयार ही नही है। युवा वर्ग का एक बहुत छोटा वर्ग पढ़ता लिखता है और गंभीर भी है लेकिन वह अन्य युवाओं को प्रभावित करने की स्थिति में नही है।युवा वर्ग के आलवा जो पीढ़ी है वह अब इस स्थिति में रही ही नही कि वो लेखक के लिखे को आंख के रूप में देख सके और लगाम के रूप में स्वीकार कर सके। दूसरी तरफ आज जो लिखा जा रहा है वह ना तो आंख की तरह दृष्टि देने में सक्षम है और ना ही समाज को इतना प्रभावित कर पाता है कि समाज उसको लगाम की तरह स्वीकार करे।
– डॉ. अजय जोशी, बीकानेर
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मुंबई से श्री संजीव निगम जी का जबाब ___
साहित्यकार समाज को एक सच्ची दृष्टि दे तो वही लगाम की तरह सार्थक होगी
क्या ही मस्त सवाल रखा है सामने, आज के संदर्भ में। ये ठकाठक दौड़ता समाज वाकई घोड़े की रफ्तार से दौड़ रहा है। इस समाज पर साहित्य ही लगाम का काम कर सकता है लेकिन अफसोस की बात यह है कि जीवन और समाज के बाकी क्षेत्रों की तुलना में साहित्य धीरे धीरे पीछे छूटता जा रहा है। हालांकि साहित्य आज भी उससे जो अपेक्षा है वह काम कर रहा है पर वह समाज पर वैसा असर नहीं छोड़ पा रहा है जो एक लगाम से अपेक्षित होता है। लेकिन हम कह सकते हैं कि साहित्य समाज के घोड़े की आंख जरूर है। अच्छे, बुरे को आज भी सही से देखता है और दिखाता है। अब ये समाज के विवेक पर है कि वह उन दृश्यों को देख कर अपने अंदर क्या सुधार करना चाहता है। आज का समाज सलाह पर तो फिर भी ध्यान दे देता है पर कोई बंधन स्वीकार नहीं करता है। साहित्य को भी इसी के अनुरूप चलना होगा, तभी वह कुछ मायनों में सार्थक हो पाएगा। साहित्यकार यदि एक सच्ची दृष्टि दे सके तो वह भी आज नहीं तो कल एक लगाम का काम करेगी।
(प्रस्तुत है डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का एक बेहतरीन व्यंग्य। अभी तक जिन साहित्यकारों का अभिनंदन नहीं हुआ है यह व्यंग्य उनके लिए प्राणवायु का कार्य अवश्य करेगा। )
आम तौर से जो साहित्यकार पचास पार कर लेते हैं उनका खोज-खाज कर अभिनंदन कर दिया जाता है।कोई और नहीं करता तो उनकी मित्रमंडली ही कर देती है। पचास पर अभिनंदन करने के पीछे शायद भावना यह होती है कि अब तुम जीवन की ढलान पर आ गये, पता नहीं कब ऊपर से सम्मन आ जाए। इसलिए समाज पर जो तुम्हारा निकलता है उसे ले लो और छुट्टी करो। बिना अभिनंदन के मर गये तो कब्र में करवटें बदलोगे।
लेकिन कुछ अभागे ऐसे भी होते हैं जिनका पचास से आगे बढ़ लेने के बाद भी अभिनंदन नहीं होता। ऐसे अभागों में से एक मैं भी हूँ। पचास पार किये कई साल हो गये लेकिन इतने बड़े शहर से कोई चिड़िया का पूत भी अभिनंदन की बात लेकर नहीं आया। धिक्कार है ऐसे जीवन पर और लानत है ऐसी साहित्यकारी पर।
इसी ग्लानि से भरा एक दिन बैठा ज़माने को कोस रहा था कि दो झोलाधारी युवकों ने मेरे घर में प्रवेश किया। हुलिया से ही समझ गया कि उनका संबंध साहित्य से है। काफी ऊबड़-खाबड़ दिख रहे थे। उनमें से एक का कुर्ता घुटने के नीचे तक था। थोड़ा और लंबा सिलवा लेते तो पायजामे की ज़रूरत न रहती।
छोटे कुर्ते वाला बोला, ‘हम लोग अभिशोक साहित्यिक संस्था से आये हैं। मैं ‘कंटक’ हूँ, संस्था का सचिव, और ये ‘शूल’ जी हैं, संस्था के सहसचिव।’
मैंने दुखी स्वर में कहा,’मिलकर खुशी हुई। क्या सेवा करूँ?’
वे बोले,’हमारी संस्था साहित्यकारों का अभिनंदन करती है। खोजने पर पता चला कि आप उन दो चार साहित्यकारों में से हैं जिनका अभी तक अभिनंदन नहीं हुआ, इसलिए आपके पास चले आये। हम आपका अभिनंदन करना चाहते हैं।’
मेरे मन के सूखे पौधों में एकाएक हरीतिमा का संचार हुआ। प्राणवायु के लिए फड़फड़ाते आदमी को आक्सीजन मिली। मन की पुलक को दबाते हुए मैंने कहा, ‘जैसी आपकी मर्जी, लेकिन मैं तो बहुत छोटा लेखक हूँ। इस सम्मान के योग्य कहाँ!’
मेरी विनम्रता को सराहने के बजाय ‘शूल’ जी आह भरकर बोले, ‘आप ठीक कहते हैं। लेकिन हमें तो किसी का अभिनंदन करना है।’
‘कंटक’ जी कागज़-कलम निकालकर बोले, ‘इस कागज़ पर अपना नाम ठीक ठीक लिख दीजिए। मैंने आपकी एक दो रचनाएं तो देखी हैं, लेकिन पूरा नाम याद नहीं है। बाकी अपना और कच्चा-चिट्ठा भी लिख दीजिए। झूठ मत लिखिएगा। कई साहित्यकार झूठ ही लिख देते हैं कि यह पुरस्कार मिला, वह पुरस्कार मिला। ज़्यादा तारीफ भी मत लिखिएगा। वह काम हम पर छोड़ दीजिए। हम दस साल से यही कर रहे हैं।’
कच्चा-चिट्ठा लिखवाने के बाद ‘कंटक’ जी बोले, ‘एक बात स्पष्ट कर देना ज़रूरी समझता हूँ। हमारा बजट सिर्फ श्रीफल के लिए ही पर्याप्त है। अगर आपको शाल भी लेना हो तो कुछ आर्थिक सहयोग देना होगा।’
मैं तुरंत सतर्क हुआ। कहा, ‘श्रीफल काफी है। मेरे पास तीन चार शाल हैं। और लेकर क्या करूँगा?’
‘शूल’ जी बोले,’तो फिर ऐसा करते हैं, आप अपना कोई नया सा शाल दे दीजिए। हम मुख्य अतिथि के हाथों वही आपको ओढ़वा देंगे।’
मेरे भीतर का वणिक और सतर्क हुआ। मैंने कहा, ‘अजी छोड़िए। कहीं शाल आपसे खो-खा गया तो अभिनंदन मुझे मंहगा पड़ जाएगा।’
‘कंटक’ जी बोले, ‘हमारे बजट में उपस्थित लोगों के लिए सिर्फ चाय की गुंजाइश है। आप अगर कुछ और जोड़ना चाहें तो आर्थिक सहयोग करना होगा।’
मैंने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया, ‘चाय काफी है। खाने पीने की चीज़ें ज़्यादा रखने से कार्यक्रम की गंभीरता नष्ट होती है।’
‘कंटक’ जी हंसकर बोले, ‘मैं समझ गया कि आपका अभिनंदन अभी तक क्यों नहीं हुआ।’
फिर बोले, ‘हम चलते हैं। शीघ्र ही आपको सूचित करेंगे।’
मैंने कहा, ‘एक बात बताते जाइए। आपकी संस्था के नाम का अर्थ क्या है? ‘अभिषेक’ शब्द तो जानता हूँ, ‘अभिशोक’ पहली बार सुना।’
वे पुनः हँस कर बोले, ‘बात यह है कि हमारी संस्था साहित्यकारों के लिए दो ही काम करती है—–अभिनंदन और शोकसभा। इसीलिए दोनों शब्दों को मिलाकर अभिशोक नाम रखा।’
मैंने हाथ जोड़कर कहा, ‘यह अच्छा है कि आप मेरा अभिनंदन किये दे रहे हैं, अन्यथा फिर शोकसभा के लायक ही रह जाता।’
अभिनंदन के लिए बड़ी उमंग से सज-धज कर पहुंचा, लेकिन वहां उपस्थित सिर्फ दस बारह श्रोताओं को देखकर मेरा दिल बैठ गया। उनमें भी दो तीन मेरे मित्र थे। इनका अभिनंदन अभी बाकी था, इसलिए वे अपने अभिनंदन में मेरी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आये थे। यह परस्पर लेन-देन का मामला था।
‘कंटक’ जी मुझसे फुसफुसा कर बोले, ‘थोड़ा और रुक लें? शायद कुछ लोग और आ जाएं।’
मैंने फुसफुसा कर जवाब दिया, ‘बिलकुल मत रुकिए। विलंब होने पर इनमें से भी कुछ खिसक सकते हैं।’
कार्यक्रम शुरू हुआ। शुरू में ‘कंटक’ जी बोले। उन्होंने मेरी प्रशंसा के खूब पुल बांधे। उस दिन ही मुझे पता चला कि मैं कितने वज़नदार गुणों का स्वामी हूँ। कस्तूरी-मृग की तरह मैं उनसे अनभिज्ञ ही रहा।’कंटक’ जी बार बार कहते थे ‘अब इनके बारे में क्या कहूँ’, और फिर आगे कहने लगते थे।
उनके बाद संस्था के अध्यक्ष ने बाकी बचे हुए गुणों से मुझे विभूषित किया। उनके भाषण के खत्म होने तक संसार के सारे गुण मेरे हिस्से में आ गये। मैं समझ गया कि उन्हें मेरे गुण-दोषों से कुछ लेना-देना नहीं है। उनके पास खूबियों की एक फेहरिस्त थी जिसे वे हर अभिनंदन में बाँच देते थे। अब कोई उसे सच समझ ले तो उनकी बला से।
उनके भाषण के बाद मुझे अभिनंदन-पत्र और श्रीफल भेंट किया गया। मेरे आश्चर्य और सुख की सीमा न रही जब श्रीफल देने के बाद मुझे एक शाल उढ़ाया गया। मैं समझ गया कि मेरे लिए संस्था ने कुछ गुंजाइश निकाल ही ली। यह एक ठोस उपलब्धि थी।
जब मैंने बोलना शुरू किया तो ज़्यादातर श्रोता जम्हाइयाँ लेने लगे। उनके खुले मुख के अंधकार को देखकर मुझे अपना भाषण छोटा करना पड़ा। संस्था के पदाधिकारियों को उनके साहित्य-प्रेम के लिए बधाई देकर मैं बैठ गया।
वापस लौटते वक्त मैं अकेला था। मित्र लोग अपनी ड्यूटी करके और मुझे ईर्ष्यापूर्ण बधाई देकर फूट लिये थे।
दस पंद्रह कदम ही बढ़ा हूँगा कि किसी ने पीछे से आवाज़ दी। मुड़ कर देखा तो ‘कंटक’ जी थे। मैंने सोचा उन्हें शाल की अप्रत्याशित भेंट के लिए धन्यवाद दे दूँ।
वे नज़दीक आये तो मैंने कहा, ‘शाल के लिए – – – –
वे मेरी बात बीच में ही काटकर बोले, ‘मैं शाल के लिए ही आया हूँ। दरअसल संस्था के अध्यक्ष जी कहने लगे कि अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमने अभिनंदित को शाल न उढ़ाई हो, भले ही वह उसी के पैसे की हो। बोले कि शाल नहीं उढ़ाई तो संस्था की पोल खुल जाएगी। इसलिए मैं अपने एक मित्र से शाल लेकर आया। अब काम हो गया। शाल वापस कर दीजिए।’
मेरा मुंह फूल गया। गुस्से में बोला, ‘यह क्या तरीका है? आपको शाल वापस ही लेना था तो आप कल मेरे घर आ सकते थे।’
‘कंटक’ जी बोले, ‘चीज़ एक बार पेटी में पहुँच जाए तो निकलवाना मुश्किल होता है। आपके घर पहुँचकर हल्ला भी नहीं कर सकता, क्योंकि संस्था की बदनामी होगी। इसलिए आप यहीं दे दीजिए। यह हमारा इलाका है, यहाँ वसूल करना आसान है।’
स्थिति प्रतिकूल देखकर मैंने तुरंत रुख बदला और हँस कर कहा, ‘मैं तो मज़ाक कर रहा था। यह रहा आपका शाल।’
मैंने शाल उतारकर उन्हें पकड़ा दिया। वे उसे तह करते हुए बोले, ‘प्रणाम! फिर भेंट होगी। कहा-सुना माफ कीजिएगा।’
फिर वे घूम कर अंधेरे में अंतर्ध्यान हो गये और मैं अपने अभिनंदन के बचे हुए प्रमाण श्रीफल और अभिनंदन-पत्र को लिये घर आ गया। कहने की ज़रूरत नहीं कि शाल की दास्तां मैं घर के लोगों से साफ छिपा गया।
(प्रख्यात व्यंग्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी ने किटी पार्टी पर काफी शोध कर लिया है। किन्तु, शोध के पश्चात ऐसे पारिवारिक /सामाजिक विषय पर व्यंग्य लिखने के लिए काफी हिम्मत की आवश्यकता पड़ती है। श्री विवेक जी को बधाई।)
पुराने जमाने में महिलाओं की परस्पर गोष्ठियां पनघट पर होती थी। घर परिवार की चर्चायें, ननद, सास की बुराई, वगैरह एक दूसरे से कह लेने से मनो चिकित्सकों की भाषा में, दिल हल्का हो जाता है, और नई ऊर्जा के साथ, दिन भर काटने को, पारिवारिक उन्नति हेतु स्वयं को होम कर देने की हमारी सांस्कृतिक विरासत वाली ’नारी’ मानसिक रूप से तैयार हो लेती थी। समय के साथ बदलाव आये हैं। अब नल-जल व्यवस्था के चलते पनघट इतिहास में विलीन हो चुके हैं। स्त्री समानता का युग है। पुरूषों के क्लबों के समकक्ष महिला क्लबों की संस्कृति गांव-कस्बों तक फैल रही है। सामान्यतः इन क्लबों को किटी-पार्टी का स्वरूप दिया गया है। प्रायः ये किटी पार्टियां दोपहर में होती है, जब पतिदेव ऑफिस, और बच्चे स्कूल गये होते हैं। महिलायें स्वयं अपने लिये समय निकाल लेती है। और मेरी पत्नी इस दौरान सोना, टी.वी. धारावाहिक देखना, पत्रिकायें-पुस्तकें पढ़ना, संगीत सुनना, और कुछ समय बचाकर लिखना जैसे षौक पाले हुए थी। पर हाल ही उसे भी किटी पार्टी का रोग लग ही गया।
प्रत्येक मंगलवार को मैं महावीर मंदिर जाता हूं, अब श्रीमती जी इस दिन किटी पार्टी में जाने लगी है। कल क्या पहनना है, ज्वेलरी, साड़ी से लेकर चप्पलें और पर्स तक इसकी मैंचिंग की तैयारियां सोमवार से ही प्रारंभ हो जाती हैं। कहना न होगा इन तैयारियों का अर्थिक भार मेरे बटुये पर भी पड़ रहा है। जिसकी भरपाई मेरा जेबखर्च कम करके की जाने लगी है। ब्यूटी कांषेस श्रीमती जी, नई सखियों से नये-नये ब्यूटी टिप्स लेकर, मंहगी हर्बल क्रीम, फेस पैक वगैरह के नुस्खे अपनाने लगी है। किटी पार्टी कुछ के लिये आत्म वैभव के प्रदर्शन हेतु, कुछ के लिये पति के बॉस की पत्नी की बटरिंग के द्वारा उनकी गुडबुक्स में पहुंचने का माध्यम कुछ के लिये नये फैशन को पकड़ने की अंधी दौड़, तो कुछ के लिये अपना प्रभुत्व स्थापित करने का एक प्रयास कुछ के लिये इसकी-उसकी बुराई भलाई करने का मंच, कुछ के लिये क्लब सदस्यों से परिचय द्वारा अपरोक्ष लाभ उठाने का माध्यम तो कुछ के लिये सचमुच विशुद्ध मनोरंजन होती है। कुछ इसे नेटवर्क मार्केटिंग का मंच बना लेती हैं।
क्लब में हाउजी का प्रारंपरिक गेम होता है, जिस किसी की टर्न होती है, उसकी रूचि, क्षमता एवं योग्यता के अनुरूप सुस्वादु नमकीन-मीठा नाश्ता होता है। चर्चायें होती हैं। गेम आफ द वीक होता है, जिसमें विनर को पुरस्कार मिलता है। मेरी इटेलैक्चुअल पत्नी जब जाती है, ज्यादातर कुछ न कुछ जीत लाती है। आंख बंद कर अनाज पहचानना, एक मिनट में अधिकाधिक मोमबत्तियां जलाना, जिंगल पढ़कर विज्ञापन के प्राडक्ट का नाम बताना, एक रस्सी में एक मिनट में अधिक से अधिक गठाने लगाना, जैसे कई मनोरंजक खेलों से, किटी पार्टी के जरिये हम वाकिफ हुये हैं। मेरा लेखक मन तो विचार कर रहा है एक किताब लिखने का- गेम्स आफ किटी पार्टीज मुझे भरोसा है, यह बेस्ट सैलर होगी। क्योंकि हर हफ्ते एक नया गेम तलाशने में महिलायें काफी श्रम कर रही है।
इस हफ्ते मेरी श्रीमती जी ’लेडी आफ दि वीक’ बनाई गई है। यानी इस बार टर्न उनकी हैं। चलतू भाषा में कहें तो उन्हें मुर्गा बनाया गया है- नहीं शायद मुर्गी। श्रीमती जी ने सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति देने के अंदाज में मेरे सारे मातहत स्टाफ को तैनात कर रखा है, चाट वाले को मय ठेले के क्लब बुलवाया जाना है, आर्डर पर रसगुल्ले बन रहे हैं, एस्प्रेसों काफी प्लांट की बुकिंग कराई जा चुकी है, हरेक को रिटर्न गिफ्ट की शैली में कुछ न कुछ देने के लिये मेरी किताबों के गिफ्ट पैकेट बनाये गये हैं- ये और बात है कि इस तरह श्रीमती जी लाफ्ट पर लदी मेरी किताबों का बोझ हल्का करने का एक और असफल प्रयास कर रही है, क्योंकि जल्दी ही मेरी नई किताब छपकर आने को है। क्या गेम करवाया जावे इस पर बच्चों से, सहेलियों से, बहनों से मोबाईल पर, लम्बे-लम्बे डिस्कशंस हो रहे हैं- मोबाईल पर कर्टसी काल करके वैयक्तिक आमंत्रण भी श्रीमती जी अपने क्लब मेम्बरस् को दे रही है। श्रीमती जी की सक्रियता से प्रभावित होकर लोग उन्हें क्लब सेक्रेटरी बनाना चाह रहे हैं। मैं चितिंत मुद्रा में श्रीमती जी की प्रगति का मूक प्रशंसक बना बैठा हूँ। उन्हें चाहकर भी रोक नहीं सकता क्योंकि क्लब से लौटकर जब चहकते हुये, वे वहाँ के किस्से सुनाती है, तो उनकी उत्फुल्लता देखकर मैं भी किटी पार्टी में रंग जमाने वाली संदर, सुशील, सुगढ़ पत्नी पाने हेतु स्वयं पर गर्व करने का भ्रम पाल लेता हूं। अब कुछ प्रस्ताव किटी पार्टी को आर्थिक लाभों से जोड़ने के भी चल रहे हैं, जिनमें बीसी के साथ ही, नेटवर्क मार्केटिंग, सहकारी खरीद, पारिवारिक पिकनिक वगैरह के हैं। आर्थिक सामंजस्य बिठाते हुये, श्रीमती जी की प्रसन्नता के लिये उनकी पार्टी में हमारा पारिवारिक सहयोग बदस्तूर जारी है। क्योंकि परिवार की प्रसन्नता के लिये पत्नी की प्रसन्नता सर्वोपरि है।
(श्री जय प्रकाश पाण्डेयजी का एक प्रयोग –एक मार्मिक माइक्रो व्यंग्य। आज सोशल मीडिया इस तरह की अनेकों मार्मिक घटनाओं से भरा पड़ा है। प्रश्न यह उठता है कि इनसे कितने लोगों की आँखें खुलती हैं? किन्तु, ऐसे माइक्रो व्यंग्य के प्रयोग आवश्यक हैं।)
“हलो…. बेटा तुम्हारे पापा अस्पताल में बहुत सीरियस हैं तुम्हें बहुत याद कर रहे हैं, उनका आखिरी समय चल रहा है। यहां मेरे सिवाय उनका कोई नहीं है। कब आओगे बेटा ?”
“माँ बहुत बिजी हूँ । वैसे भी इण्डिया में अभी बहुत गर्मी होगी, तुम्हारे घर में एसी भी नहीं है। छोटे भाई से बात करता हूँ कि अभी वो इण्डिया जाकर उन्हें देख ले फिर माँ के समय मैं चला जाऊँगा। तुम तो समझती हो माँ … मुझे तुम से ज्यादा प्यार है।”
(प्रस्तुत है डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का एक बेहतरीन व्यंग्य। डॉ कुन्दन सिंह जी के पात्रों के सजीव चित्रण का मैं कायल हूँ। लगता है उनके पात्र हमारे आस पास ही हैं। आवश्यकता से अधिक ज्ञान प्राप्त करना और उसे बांटने में अपनी ऊर्जा खत्म कर तनाव झेलना आम हो गया है। फिर ऐसी समझदारी का त्रासद अन्त कैसे होता है वह आप ही पढ़ लीजिये।)
रामसुख अपने नाम के हिसाब से ही हमेशा शान्त और सुखी रहते हैं। दफ्तर से लौटते हैं, थोड़ी देर टाँगें सीधी करते हैं, फिर टहलने निकल जाते हैं। लेकिन उनका टहलना दूसरों के टहलने जैसा नहीं होता। दूसरे लोग स्वास्थ्य-वर्धन के लिए, भोजन पचाने के लिए टहलते हैं, रामसुख सिर्फ दुनिया देखने के लिए, मन बहलाने के लिए टहलते हैं। दाहिने बायें देखते हुए, धीरे धीरे चलते हैं। जहाँ कुछ दिलचस्प दिखा, रुक गये। कोई मजमा, कोई तमाशा, झगड़ा, मारपीट होती दिखी, रुक गये। जितनी देर झगड़ा, मारपीट चलती रही, देखते रहे, फिर धीरे धीरे आगे बढ़ गये। कहीं भाषण होता दिखा तो वहीं रुक गये। थोड़ी देर सुना, फिर आगे बढ़ गये। रास्ते में कोई मंदिर पड़ा तो भीतर जाकर सिर झुकाकर प्रसाद ले लिया। भजन-कीर्तन हो रहा हो तो थोड़ी देर उसमें शामिल हो गये, नहीं तो प्रसाद फाँकते आगे बढ़ गये।
ऐसे ही रामसुख एक शाम एक ऐसी सभा में पहुँच गये जहाँ एक संत का प्रवचन चल रहा था। रामसुख टाइम काटने को भाषण सुनने बैठ गये, लेकिन जल्दी ही उनके कान खड़े हुए। संत बड़ी दिलचस्प बातें कह रहे थे। कह रहे थे—–‘भक्तजनो! हम पुरूष बहुत बड़ी गलती करते हैं कि अपनी पत्नियों को वैधव्य के लिए तैयार नहीं करते। जीवन अनिश्चित है, आज है कल नहीं। सामान सौ बरस का है, कल की खबर नहीं। पति को अचानक कुछ हो जाता है तो पत्नी को न उसके बैंक का पता होता है, न पासबुक का। यह भी पता नहीं होता कि उसका बीमा कितने का है, बीमा दफ्तर कहाँ है। किससे कितना लेना है, किसे कितना देना है। कई स्त्रियों ने तो अपने पति का दफ्तर तक नहीं देखा। पति एकाएक परलोक सिधार जाए तो पत्नी असहाय हो जाती है। उसे समझ में नहीं आता कि कहाँ जाएँ, क्या करें। यह हाल पढ़ी-लिखी स्त्रियों का भी है, बेपढ़ी लिखी स्त्रियों को तो छोड़ ही दीजिए।
‘इसलिए पतियों को चाहिए कि पत्नियों को इस बात की पूरी जानकारी दें कि यदि उनका ऊपर से अचानक बुलावा आ जाए तो उन्हें क्या करना है, किस तरह रहना है। अपने को अमर समझकर नहीं रहना चाहिए।’
सुनकर रामसुख के दिमाग़ में जैसे बल्ब जला। क्या मार्के की बात कही है! जिंदगी का क्या ठिकाना?सौ नयी बीमारियां पैदा हो गयी हैं। अभी सड़क पर चल रहे हैं, दूसरे पल पता चला ऊपर ट्रांसफर हो गया। सड़क पर इतने वाहन चलते हैं। थोड़ा धक्का लगा और छुट्टी। लूट-मार इतनी बढ़ गयी है कि अंधेरे में कहीं से निकलने में डर लगता है। आजकल लौंडे बात बाद में करते हैं, पहले चाकू निकालते हैं। संत जी ने ठीक कहा। पत्नी को सब जानकारी दे देना चाहिए।
घर आये तो खटिया पर लेट गये। पत्नी शकुंतला देवी को बुलाकर पास बैठा लिया। छत की तरफ देखकर दार्शनिक अंदाज़ में बोले, ‘जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं है। आज यहां कल वहां।’
शकुंतला देवी बोलीं, ‘क्या हुआ? कोई मर वर गया क्या?’
रामसुख गंभीर मुद्रा में बोले, ‘नहीं! मैं तो आदमी की जिंदगी के बारे में सोच रहा था। क्या पता कब क्या हो जाए! जिंदगी और मौत के बीच कितना फासला है, किसे मालूम?’
शकुंतला देवी बोलीं, ‘टीवी में किशन जी महाराज जो गीता का परवचन दे रहे हैं, लगता है उसी का असर हो गया है।’
रामसुख बोले, ‘नहीं! आज एक संत जी का भाषण सुना। वे कह रहे थे कि आदमी की जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं है, इसलिए पत्नी को घर-द्वार के बारे में सब समझा कर रखना चाहिए।’
शकुंतला देवी गुस्से में बोलीं, ‘चूल्हे में जाएं ऐसे संत। खबरदार जो आगे ऐसी बात मुँह से निकाली। जिंदगी जाए तुम्हारे दुश्मनों की।’
वे झपट कर घर के भीतर चली गयीं। रामसुख तम्बाकू की जुगाली करते, छत की तरफ ताकते, लेटे सोचते रहे।
दूसरी शाम उन्होंने अपनी दोनों पासबुक निकालकर तकिये के नीचे रख लीं, फिर शकुंतला देवी को बुलाया। जब वे आकर बैठ गयीं तो पासबुक निकालकर उन्हें दिखाकर बोले, ‘बताओ ये पासबुक किन बैंकों की हैं।’
शकुंतला देवी भौंहें चढ़ाकर बोलीं, ‘हमें क्या मालूम।’
रामसुख दुखी भाव से बोले, ‘यही तो गड़बड़ी है। देखो, यह काली वाली पासबुक महाराष्ट्र बैंक की है और गुलाबी वाली नागरिक बैंक की।’
शकुंतला देवी बोलीं, ‘होगी। तो हम क्या करें?’
रामसुख बोले, ‘अरे भाई, जरा समझो तो। सब दिन मूरख ही बनी रहोगी। आओ तुम्हें समझायें कि पासबुक में रकम कहाँ लिखी होती है।’
शकुंतला देवी फिर झटक कर खड़ी हो गयीं। बोलीं, ‘तुम पर फिर कल वाला भूत सवार हो गया। पहले तो कभी कभी भांग खाते थे, अब लगता है रोज जमाने लगे हो। ज्यादा आंय बांय बकोगे तो ओझा जी को बुलाकर तुम्हारा भूत उतरवाऊँगी।’
रामसुख चुप्पी साध गये।
लेकिन संत जी की बातें उनके दिमाग़ से निकलती नहीं थीं। अगले दिन फिर उन्होंने शकुंतला देवी को बुलाकर बैठा लिया। पुचकार कर बोले, ‘तुम मेरी बात का बुरा मान जाती हो। अरे, मैं मर थोड़े ही रहा हूँ। देखो न काठी एकदम ठोस है, टनाटन। लेकिन आदमी और औरत गिरस्ती की गाड़ी के दो पहिये होते हैं। दोनों को सब चीजों की जानकारी होनी चाहिए। अब देखो, वर्मा जी बीच में पत्नी को बिना कुछ बताये परलोक चले गये तो मिसेज़ वर्मा को कितनी परेशानी हुई। इसलिए सब बातों की जानकारी रखना जरूरी है।’
अब की बार शकुंतला देवी नाराज़ नहीं हुईं। बोलीं, ‘बाद में देखेंगे। अभी ये रामायण बन्द करो।’
रामसुख खुश हुए। चलो, बीजारोपण हो गया। अब धीरे धीरे सब हो जाएगा।
अगले दिन से वे शकुंतला देवी को पासबुक के बारे में समझाने लगे। कहाँ जमा पैसा लिखा जाता है, कहाँ निकाला हुआ, कहाँ बाकी चढ़ता है। शकुंतला देवी थोड़ी देर सुनतीं, फिर ‘उँह, बाद में देखेंगे, काम पड़ा है,’ कह कर उठ जातीं।
धीरे धीरे शकुंतला देवी की दिलचस्पी बढ़ने लगी। अब वे खुद ही पतिदेव से प्राविडेंट फंड, बीमा वगैरः के बारे में पूछताछ करने लगीं। फुरसत में उनके कागजात उलट-पलट कर समझने की कोशिश करती रहतीं। रामसुख और खुश हुए। एक दिन उन्हें अपनी स्कूटर के पीछे बैठा कर बैंक ले गये। वहाँ समझाते रहे कि पैसा कहाँ और कैसे जमा किया और निकाला जाता है। एक दिन बाहर से उन्हें अपने दफ्तर के दर्शन भी करा लाये।
एक दिन शकुंतला देवी पूछने लगीं, ‘क्यों जी! जिसका बैंक में खाता है, उसे भगवान न करे कुछ हो जाए तो उसका पैसा पत्नी को मिल जाता है न?’
रामसुख उत्साह से बोले, ‘हाँ, हाँ, बैंक में फार्म भरते वक्त उसका नाम देना पड़ता है जिसे पैसा मिलेगा। कोई दिक्कत नहीं होती।’
लेकिन उत्तर देने के बाद रामसुख के मन में ‘टुक्क’ से डंक जैसा लगा। यह तो एकदम मेरे मरने की सोचने लगी।मन कुछ बुझ गया।
एक दो दिन बाद रामसुख खटिया पर लेटे लेटे शकुंतला देवी को सुनाकर बोले, ‘आजकल सरकार ने अच्छा इंतजाम कर दिया है। कोई सरकारी कर्मचारी मर जाता है तो कफन-दफन के लिए चौबीस घंटे के भीतर आठ-दस हजार रुपये मिल जाते हैं।’
शकुंतला देवी सब्जी काटते काटते बोलीं, ‘यह तो अच्छी बात है।’
रामसुख के मन में फिर ‘टुक्क’ हुआ। यह तो ऐसे सहज भाव से बोल रही है जैसे मैं आलू खरीदने की बात कर रहा हूँ।
तीन चार दिन बाद शकुंतला देवी पूछने लगीं, ‘क्यों जी, यह जो आदमी के मरने के बाद औरत को पिंसिन ग्रेचूटी मिलती है उसमें कोई घपला तो नहीं होता? पूरा पैसा मिल जाता है?’
रामसुख भकुर गये। कुढ़ कर बोले, ‘तुम्हें और कोई काम नहीं है क्या? दिन भर यही फालतू बातें सोचती रहती हो।’
शकुंतला देवी बोलीं, ‘अरे भाई, आजकल हर जगह भरस्टाचार मचा है। इसलिए पूछ रही हूँ।’
रामसुख बड़ी देर तक भकुरे लेटे रहे।
अब रामसुख ने शकुंतला देवी को ज्ञान देना बन्द कर दिया था।शकुंतला देवी ही उनसे जब-तब पूछती रहती थीं। अब उनके हर सवाल पर रामसुख को झटका लगता था। उन्हें लगता जैसे वे उनके परलोक सिधारने का इंतज़ार कर रही हों।
एक दिन शकुंतला देवी पूछने लगीं, ‘आदमी नौकरी करता मर जाए तो औरत को कितनी पिंसिन मिलती है?’
रामसुख लेटे थे, उठ कर बैठ गए। खीझ कर बोले, ‘दो चार दिन में मर जाऊँगा तो अपने आप पता लग जाएगा। यही चाहती हो न?’
शकुंतला देवी ठुड्डी पर उंगली रखकर बोलीं, ‘हाय राम! मरें तुम्हारे दुश्मन। तुम्हीं तो कहते थे कि सब जानना चाहिए।’
रामसुख बोले, ‘हाँ, बहुत जान लिया। अब आज से जानना और पूछना बंद करो, नहीं तो मैं पगला जाऊँगा। ज्योतिषी ने कहा है कि मैं नब्बे साल की उमर तक जिऊँगा। बत्तीस साल पेंशन खाऊँगा।’
शकुंतला देवी बोलीं, ‘ए लो। पहले तो हमारे पीछे पड़े रहते थे कि यह जानो वह जानो। अब कहते हैं पगला जाएंगे। हमें क्या करना है, तुम जानो तुम्हारा काम जाने। अब आगे से हमें किन्हीं संत जी की बातें मत बताना।’
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का विभिन्न लेखकों के द्वारा दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु तो अवश्य ही खोल देंगे। तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।
वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा, सामूहिक द्वेष और स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में………
तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न और उसके अनेक उत्तर। प्रस्तुत है आठवाँ जवाब अबू धाबी से ख्यातिलब्ध व्यंग्यकारा सुश्री समीक्षा तेलंगजी एवं सवाई माधोपुर से श्री प्रभाशंकर उपाध्याय जी की ओर से –
सवाल : आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम ?
अबु धाबी से सुश्री समीक्षा तेलंग जी का जबाब ___
यदि आप समाज को घोड़ा मानते हैं तो आप खुद को उसकी आंख या लगाम भी मान सकते हैं। पर मैं, लेखक को स्वयं अश्व मानती हूं। आपने हॉर्सपावर सुना होगा…। किसी भी मशीन की क्षमता इसी इकाई से मापी जाती है। घोड़े की बुद्धि और ताकत का कोई सानी नहीं। वो चाहे तो दुनिया को हांक सकता है। उसकी तीक्ष्ण बुद्धि हवा के वेग से भी ज़्यादा होती है। और मनुष्य से अधिक संवेदनशील भी घोड़ा ही होता है। मैं लेखक को भी उतना ही संवेदशील मानती हूँ। तभी वो सृजन भी करता है।
लेकिन एक बात जो लेखकों को ही अपने आप में बाँटती है वो ये कि लेखक अपनी मानसिकता के हिसाब से लिखता है। कुछ लोगों के लिए वह दिशाविहीन लेखन होता है। कोई उसे सृजनात्मक मानता है। तो कोई उस लेखन को किसी दस्तावेज़ से कम नहीं मानता। एक का ही लिखा पढ़ने वाले की मानसिकता और लेखक की अपनी मानसिकता पर निर्भर करता है।
यदि लेखक घोड़ा है तो समाज उस ताँगे की तरह है, जिसके विचारों को लेखक और सुदृढ़ बनाता है। बशर्ते वह लेखन समाज को ध्यान में रखकर लिखा गया हो। हम भूल जाते हैं कि ताँगे के घोड़े की आँख पर ऐनक चढ़ा होता है। तभी वो अपने ताँगे को सही दिशा में हाँक पाता है, ख़ाली लगाम से नहीं। लगाम उसके वेग को कम ज़्यादा कर सकती है लेकिन दिशा नहीं दिखा सकती।
बग़ैर ऐनक वह आजू बाजू आगे और कुछ हद तक पीछे भी देख सकता है। क्या हो यदि उसे ऐनक न चढ़ाया जाए? वह मात्र भटका हुआ प्राणी हो जाता है। यही स्थिति लेखक की भी है।
मनुष्य भले ही अपनी गर्दन ३६० डिग्री पर नहीं घुमा सकता लेकिन ख़ुद घूमकर सही ग़लत का जायज़ा लेकर समाज में पनप रही विकृतियों को ज़रूर उजागर कर सकता है।
पहले के युद्धों में हरेक राजा का एक प्रिय घोड़ा ज़रूर होता था। किन्हीं स्थितियों तक वह उस राजा की जीत का भागीदार होता था। क्योंकि वह दुश्मन की आहट को बख़ूबी भाँप लेता था। और अपने प्रिय घुड़सवार को उन परिस्थितियों से बचा लेता था।
लेखक की भूमिका समाज के प्रति भी ऐसी ही होनी चाहिए। पीत पत्रकारिता जिस प्रकार समाज को विषैला प्रदूषित कर रही है। उसी प्रकार लेखक के एक एक शब्द का प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। इसलिए लेखक, घोड़े की आँख या लगाम बनने से बचें और ख़ुद अश्व बनकर दुनिया की असलियत उजागर करने का दंभ रखें।
– समीक्षा तैलंग, अबु धाबी (यू.ए.ई.)
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सवाई माधोपुर से श्री प्रभाशंकर उपाध्याय जी का जबाब ___
वर्तमान समाज, बेलगाम घोड़ा है। इसकी लगाम छीन कर कहीं गहरे दफन कर दी गई है। लाख ढूंढो तो भी नहीं मिलेगी। फिर सवाल घोड़े की आंख का है। पहले वे आंखें सीधे ही लक्ष्य पर केन्द्रित होती थीं। भटकने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। अब, आंखों का वह दिशा नियंत्रक भी नदारद है और यह बेशर्म घोड़ा अब खूब नैन मटक्का करता है। लेखक भी समाज का अंग है। अत:, आज के सन्दर्भ में लेखक घोड़े की आंख है।