हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बाल उपन्यास – ‘फूलों वाली घाटी का रहस्य‘ – सुश्री उषा सोमानी ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री उषा सोमानी जी के बाल उपन्यास “फूलों वाली घाटी का रहस्यकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 206 ☆

☆ बाल उपन्यास – ‘फूलों वाली घाटी का रहस्य‘ – सुश्री उषा सोमानी ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’

बाल उपन्यास- फूलों वाली घाटी का रहस्य 

उपन्यासकार- उषा सोमानी

पृष्ठ संख्या- 82

मूल्य- ₹100

प्रकाशक- ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन, B-209, गीत स्काई वैली, मित्तल कॉलेज रोड, नवी बाग, भोपाल, मध्यप्रदेश- 462038

समीक्षक-  श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 9424079675

☆ समीक्षा- रहस्य परिपूर्ण है फूल वाली घाटी –  ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

आज के जमाने में उपन्यास लिखना वैसे भी बहुत कठिन कार्य है। क्योंकि आज के समय में कोई उपन्यास पढ़ना नहीं चाहता। उसके पास इतना समय नहीं है कि वह इतने ज्यादा पृष्ठों के उपन्यास को पढ़कर अपना समझ जाया करें। इस कारण उपन्यासकार भी उपन्यास लिखकर अपना समझ जाया नहीं करना चाहते हैं।

बालकहानी की तुलना में उपन्यास लिखना श्रमसाध्य और दूरुह कार्य है। कहानी लिखने में एक घटनाक्रम और उसके आसपास कहानी का तानाबाना बुना जाता है। जबकि उपन्यास लिखने में संपूर्ण घटनाक्रम के साथ कई पूरक घटनाएं भी उसमें डालनी पड़ती है। ताकि उपन्यास को रहस्यपूर्ण और जिज्ञासा से भरपूर बनाया जा सके।

बालक उसी चीज को पढ़ते हैं जिसमें उसे आनंद के साथ-साथ भरपूर मनोरंजन मिले। उसे लगे कि इसमें कुछ बात है जिसे जानना चाहिए। तभी वह जिज्ञासा की  वशीभूत उसे चीज को पढ़ पाते हैं। इसलिए बालकों के लिए उपन्यास लिखते समय कई बातों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। वाक्य छोटे होने के साथ-साथ उसके पैराग्राफ छोटे और रहस्य-रोमांच से भरपूर हो।

इन सब बातों की कसौटी पर समीक्ष्य उपन्यास- फूलों वाली घाटी का रहस्य, को हम इस कसौटी पर कस कर देखते हैं। प्रथम दृष्टि जब हम उपन्यास के कवर को देखते हैं वह प्रथम दृष्टि हमें आकर्षित करता है। कारण, उस पर आकर्षक और रहस्यपूर्ण चित्र बना हुआ है जो बच्चों बच्चों के साथ बड़ों को लूभता है। कवर के पिछले पृष्ठ भाग पर ‘गोटी चलाओ और रहस्य ढूंढो’, नामक एक खेल बना हुआ है। जिसे बच्चे स्वयं खेल सकते हैं।

संपूर्ण उपन्यास को 14 भागों में विभाजित किया गया है। हरेक भाग का अपना एक अलग शीर्षक दिया गया है। जो उपन्यास पढ़ने की जिज्ञासा को और बढ़ा देता है। इसी के साथ उपन्यास का हरेक भाग बहुत छोटा दिया गया है। जिससे बाल पाठकों के बोर होने की संभावना नगण्य है।

उपन्यास की कथानक पर दृष्टि डाले तो कथानक बस इतना ही की उत्कृर्ष अपनी छुट्टियां मनाने के लिए अपने दादाजी के घर आता है। यहां वह गत छुट्टी की तरह ही मौजमस्ती करना और पहाड़ों पर घूमना चाहता है। मगर गांव में आते ही उसे कमरे में कैद हो जाना पड़ता है। जब वह घर से बाहर निकालने की कोशिश करता है तो उसके दादाजी, चाचाजी और अन्य सदस्य उसे बाहर जाने पर रोक लगा देते हैं। वह समझ नहीं पता कि ऐसा क्यों हो रहा है। तभी धीरे-धीरे रहस्य दर रहस्य उसके सामने यह परत खुलती जाती है कि उसे घर से बाहर क्यों नहीं निकलने दिया जा रहा है? उसका कारण क्या है?

तब वह अपना जासूसी दिमाग लगता है। ताकि इस रहस्य को सुलझा सके। धीरे-धीरे एक-एक करके रहस्य की परते खुलती जाती है। उसे पता चल जाता है कि इन सब के पीछे किसका हाथ था? वह रहस्य क्यों बना हुआ था? बाल सुलभ जिज्ञासा के वशीभूत इस रहस्य को उत्कर्ष कैसे सुलझाता है? यह तो उपन्यास पढ़ने के बाद ही पता चलेगा।

मगर कुल मिलाकर कथानक की दृष्टि से उपन्यास बेहतर बन पड़ा है। उपन्यास के हर पृष्ठ में रहस्य को बरकरार रखा गया है। जिज्ञासा पृष्ठ दर पृष्ठ बढ़ती चली जाती है। उपन्यास की भाषा सरल, सहज और रोचक है। संवाद शैली द्वारा उपन्यास को रोचकता प्रदान की गई है। जहां कहीं भी आवश्यकता हुई वर्णनात्मक शैली का उपयोग किया गया है। वर्तमान देशकाल व परिस्थितियों का भरपूर उपयोग किया गया है। साथ ही उपन्यास का उद्देश्य स्पष्ट है। जो इसे पढ़ने के बाद परिलक्षित होता है।

उपन्यास की रचनाकार उषा सोमानी एक जानीमानी बाल कहानीकार है। उनकी कहानियां रोचक और रहस्य से परिपूर्ण होने के साथ मनोरंजक भी होती है। इसी का उपयोग उन्होंने अपने इस नवीनतम उपन्यास को लिखने में किया है। इसका प्रकाशन व मुद्रण ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन भोपाल द्वारा किया गया है जो साफ सुथरा और त्रूटिहीन है। रोचकता और पठनीयता की दृष्टि से उपन्यास बहुत ही बढ़िया बन पड़ा है। इस कारण यह बच्चे और बड़ों दोनों को बहुत ही अच्छा लगेगा। ऐसा इस समीक्षक को विश्वास है। पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य ₹100 वाजिब है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

08-02-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – [email protected] मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 244 ☆ बाल गीत – नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक कुल 148 मौलिक  कृतियाँ प्रकाशित। प्रमुख  मौलिक कृतियाँ 132 (बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्यकर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित पाँच दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

 आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 244 ☆ 

☆ बाल गीत – नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

 नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।

दुश्मन के छक्के छुड़वाऊँ

ध्वज का मान बढ़ाऊँगा।

खूब पढ़ूँगा मैं मेहनत से

सबका कहना मानूँगा।

मात – पिता की सेवा करके

लक्ष्य सदा मैं ठानूँगा।

 *

काम समय से पूरा कर लूँ

नहीं कभी घबराऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

 *

तूफानों से नहीं डरूँगा

जीवन सफल बनाऊँ मैं।

हर मुश्किल आसान करूँगा

प्रेमिल पाठ पढ़ाऊँ मैं।

 *

सदा सत्य को मैं अपनाकर

शुचिता , शान बढ़ाऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

 *

मीठा – मीठा बोलूँगा मैं

सबसे मधु व्यवहार करूँ।

सीमाओं की रक्षा करके

दुश्मन से मैं नहीं डरूँ।

 *

प्राण देश के खातिर दे दूँ

कभी न पीठ दिखाऊँगा।

नन्हा हूँ मैं वीर सिपाही

आगे बढ़ता जाऊँगा।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ भूक…! ☆ श्री सुजित कदम ☆

श्री सुजित कदम

 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ भूक…! 

☆  

दर महीन्याला रेशन कार्डं वर

रेशन घ्यायला जाताना

कार्डं वरची

लेकरांची खोडलेली नावं पाहिली

की लेकरं मोठी झाल्याची

जाणिव होते…

कारण

आता प्रत्येक लेकरांन

आपआपल्या वेगळ्या घरासारखं

आपआपलं रेशन कार्डं ही वेगळ केलय

आता कार्डंवर…

दोघांचच धान्य मिळतं

ते ही अगदी. ! वाजवी दरात..

एका पिशवीत मावेल एवढंच…

पण … ह्या धान्य ऐवजी जर

दर महीन्याला रेशन वर

एका पिशवीत मावेल एवढाच

लेकरांचा वेळ मिळाला असता

तर किती बरं झालं असतं

कारण….हल्ली

पोटातल्या भुके पेक्षा

लेकरांना भेटण्याची भुकच

जास्त लागते…

कारण जेव्हा पासून

ह्या रेशन कार्डं वरून लेकरांनी

त्यांची नावं खोडलीत

तेव्हापासून त्यांना आम्हाला

भेटण्यासाठी वेळ असा

कधी मिळालाच नाही…

आणि

दर महीन्याला

रेशन कार्ड वरची..

लेकरांची खोडलेली नावं पहाण्याशीवाय

आमच्या समोर दुसरा पर्याय असा काही

उरलाच नाही..

© श्री सुजित कदम

मो.7276282626

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #273 – कविता – ☆ गीतिका – जलती रही चिताएँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गीतिका गीतिका – जलती रही चिताएँ” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #273 ☆

☆ गीतिका – जलती रही चिताएँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

बने रहो आँखों में ही, मैं तुम्हें प्यार दूँ

नजर, मिरच-राईं से, पहले तो उतार दूँ ।

*

दूर रहोगे तो, उजड़े-उजड़े पतझड़ हम

अगर रहोगे संग-संग, सुरभित बयार दूँ।

*

जलती रही चिताएँ, निष्ठुर बने रहे तुम

कैसे नेह भरे जीवन का, ह्रदय हार दूँ।

*

सुख वैभव में रमें,रसिक श्री कृष्ण कन्हाई

जीर्ण पोटली के चावल, मैं किस प्रकार दूँ।

*

चुका नहीं पाया जो, पिछला कर्ज बकाया

माँग रहा वह फिर, उसको कैसे उधार दूँ।

*

पानी में फेंका सिक्का, फिर हाथ न आया

कैसे मैं खुद को, गहरे तल में उतार दूँ ।

*

दायित्वों का भारी बोझ  लिए  काँधों पर

चाह यही हँसते-हँसते, जीवन गुजार दूँ।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # 97 ☆ जंगल अंगार हो गया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “जंगल अंगार हो गया”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # 97 ☆ जंगल अंगार हो गया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

टेसू क्या फूल गए

जंगल अंगार हो गया।

 

सज गई धरा

नवल वधू सी

वृक्षों ने पहने

परिधान राजसी

 

सरसों पर मस्त मदन

पीत वसन डाल सो गया।

 

महुआ रस गंध

बौराया आम

नील फूल कलसी

भेजती प्रणाम

 

सेमल के सुर्ख गाल

अधरों पर प्यार बो गया ।

 

थिरक रही हवा

घाघरा उठाकर

चहक रहे पंछी

बाँसुरी बजाकर

 

तान फागुनी सुनकर

मौसम गुलज़ार हो गया।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 101 ☆ सादगी बेहिस हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सादगी बेहिस हुई है “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # 101 ☆

✍ सादगी बेहिस हुई है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

सबको अपनी ही पड़ी है शहर में

हाय दिल की मुफ़लिसी है शहर में

*

रात पूनम सी कही पर तीरगी

किस तरह की रोशनी है शहर में

*

बिल्डिंगों के साथ फैलीं झोपडीं

साथ दौलत के कमी है शहर में

*

शानो-शौक़त का दिखावा बढ़ गया

सादगी बेहिस हुई है शहर में

*

हर गली में एक मयखाना खुला

मयकशी ही मयकशी है शहर में

*

जुत रहा दिन रात औसत आदमी

यूँ मशीनी ज़िंदगी है शहर में

*

नाम पर तालीम के सब लुट रहे

फीस आफ़त हो रही है शहर में

*

सभ्य वासी बन रहे पर सच यही

नाम की कब आज़ज़ी है शहर में

*

है अरुण सुविधा मयस्सर सब मगर

कब फ़ज़ा इक गाँव सी है शहर में

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ वो बेवफ़ा था चला गया… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक ग़ज़ल – वो बेवफ़ा था चला गया।)

✍ वो बेवफ़ा था चला गया… ☆ श्री हेमंत तारे  

जब जानते हो ग़लत है तो फिर करते क्यों हो

शिकस्त के ग़म में दिन – रात झुलसते क्यों हो

*

गर पाना है खोया प्यार तो ऐलान ऐ जंग करो

ज़माने  से लढो,  यलगार भरो,  डरते क्यों हो

*

वो बेवफ़ा था चला गया, राब्ते में न रहा

तुम बेदार रहो, उसे पाने को तडपते क्यों हो

*

मय का कारोबारी मयखोर हो जरूरी तो नही

वो बाहोश रहता है,  उसे रिंद समझते क्यों हो

*

दौलत- शोहरत का नशा तारी हो उससे पेशतर

कुछ ज़र्फ़ तो पैदा करो, यूं अकडते क्यों हो

*

उसकी फितरत है वो तो गलत बयानी ही करेगा

तुम तो दानिशवर हो,  बहकावे मे आते क्यों हो

*

तमन्ना है ‘हेमंत’, के वो छम्म से आ जाये अभी

आ जाये तो बता देना तुम संजीदा रहते क्यों हो

(एहतिमाम = व्यवस्था, सिम्त = तरफ, सुकूँ = शांति, एज़ाज़ = सम्मान , शै = वस्तु, सुर्खियां = headlines, आश्ना = मित्र, मसरूफियत = व्यस्तता)

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 14 ☆ लघुकथा – कैनवास… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा  – “कैनवास“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 14 ☆

✍ लघुकथा – कैनवास… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वे हर आयोजन में उपस्थित। लगता सबको ध्यान से देख रही हैं। पर मुझे महसूस होता कि वे आँखों से केवल देख रही हैं और आँखों के भीतरी पर्दे पर किसी और का प्रतिबिम्ब है। वे अंदर बाहर दोनों देखती हैं। यही नहीं साठ साल पहले का देखती हैं और आज का भी। सजी संवरी एम्बेसडर में बैठी अपने आप को और हृष्ट पुष्ट युवा पति को और व्हील चेयर पर बैठे बीमार वृद्ध पति को एक साथ देखती हैं, ऐसा लगता।

उनकी दृष्टि बहुत बड़ा कैनवास है, जिस पर हँसता खेलता बचपन, यौवन की अँगड़ाइयॉं, विवाह के सात फेरे, नन्हीं सी जान की छटपटाहट, बच्चों की किलकारियाँ, परिवार की जिम्मेदारियाँ, पति का बिजनेस और अपना स्कूल जब कुछ एक साथ कैनवास पर चलता रहता है। रंग बदलते रहते हैं। दृश्य भी बदलते रहते हैं पर उनकी तारतम्यता कभी भंग नहीं होती। सबसे बड़ी बात है कि आँखों में शून्यता पर चेहरे पर सदाबहार मुस्कान जो सबको आकर्षित करती।

मुझे किसी कारण शहर छोडना पड़ा। गर्मी का मौसम समाप्त होकर बरसात का मौसम आने वाला है। श्रावण मास चल रहा है। मुझे डाक से एक लिफाफा मिला। खोल कर देखा तो उसमें राखी थी और दो पंक्तियों की चिट्ठी, समय पर बाँध लीजिएगा। जब हम एक ही शहर में थे तब कभी ऐसा नहीं हुआ, बस हर पर्व व अवसर पर शुभकामनाओं का आदान प्रदान होता। मेरे हाथ में उनकी भेजी राखी है और मस्तिष्क में शून्यता में खोई उनकी नजरें। और अब मेरी आंखें भी कैनवास बन गईं। सब कुछ कैनवास पर चित्रित हो रहा है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 64 – बुढ़ापा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अंधी दौड़।)

☆ लघुकथा # 64 – क्षमादान श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रागिनी का बारहवीं कक्षा का रिजल्ट आया तो वो फेल हो गई थी। मां बचपन में ही चल बसी थी।

पापा के गुस्से के डर से उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?  जीवन बोझ लग रहा था। उसे याद आ रहा था जब पिछली क्लासों में वह किसी तरह पास होती थी तब पापा उसे बहुत मारते थे। भैया भाभी जीना मुश्किल कर देंगे। घर का काम तो पूरा करवाते ही हैं पढ़ने भी नहीं  देते। जाने अब क्या होगा?

पिताजी जब ऑफिस से घर आए तो रागिनी थर-थर काँपने लगी। साथ ही भैया भाभी भी ऑफिस से घर आ गए।

पापा ने कहा- “बेटी चिंता मत करो, और मन लगाकर पढ़ाई करो। यदि तुम पढ़ाई नहीं करना चाहती तो बता दो दूसरे और भी प्रोफेशनल कोर्स हैं जो तुम कर सकती हो? सिलाई, कढ़ाई और पार्लर का कोर्स भी कर सकती हो? खाना तुम कितना अच्छा बनाती हो, ड्राइंग भी अच्छा करती हो। जो काम अच्छा लगे वही करो, डरो मत।”“

उसने कहा कि- “पापा में पार्लर का कोर्स करूंगी और साथ ही फिर से 12वीं की परीक्षा दूंगी इस बार मैं अच्छा करके दिखाऊंगी? आपने इतना विश्वास किया है।”

क्षमादान पाकर उसमें एक नया उत्साह जाग गया।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 265 ☆ तूच… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # 265 ?

☆ तूच ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

मी पुन्हा पुन्हा–

त्याच तिथे येऊन पोहोचते,

जिथे केवळ नकार घंटाच,

घुमत असतात,

तुझ्या वागण्यात  !

 

तूही बदलत नाहीस,

आणि मी ही !

मला सांगायचं असतं..

तुला मनातलं बरंच काही,

मी स्वीकारलेलं असतं मला,

मी जशी आहे तशी,

सर्व गुणदोषांसकट!

 

पण तुझा वाढत चाललेला,

“श्रेष्ठत्व अहंकार”

आजकाल सहन होत नसतानाही,

तूच का हवी असतेस,

मनीचे गुज ऐकवायला?

 

भूतकाळात,

जरा जास्तच घुटमळत राहतो,

का आपण?

हा प्रश्न स्वतःलाच विचारत—

भविष्यात डोकावताना,

परत तूच??

हे कसं काय घडतंय?

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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