हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 99 – लघुकथा – ओरिजनल फोटो ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  स्त्री विमर्श पर आधारित एक संवेदनशील लघुकथा  “ओरिजनल फोटो। इस विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 99 ☆

? लघुकथा – ओरिजनल फोटो ?

शहर की भीड़भाड़ ईलाके के पास एक फोटो कापी की दुकान। विज्ञापन निकाला गया कि काम करने वाले लड़के – लड़कियों की आवश्यकता है, आकर संपर्क करें।

दुकान पर कई दिनों से भीड़ लगी थीं। बच्चे आते और चले जाते। आज दोपहर 2:00 बजे एक लड़की अपना मुंह चारों तरफ से बांध और ऐसे ही आजकल मास्क लगा हुआ। जल्दी से कोई पहचान नहीं पाता। दुकान पर आकर खड़ी हुई।

मालिक ने कहा कहां से आई हो, उसने कहा… पास ही है घर मैं समय पर आ कर सब काम कर जाऊंगी। मेरे पास छोटी स्कूटी है। दुकानदार ने कहा ..जितना मैं पेमेंट  दूंगा तुम्हारे पेट्रोल पर ही खत्म हो जाएगा। तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा।

लड़की ने बिना किसी झिझक के कहा… सर आप मुझे नौकरी पर रखेंगे तो मेहरबानी होगी और एक गरीब परिवार को मरने से बचा लेंगे।

जानी पहचानी सी आवाज सुन दुकान वाले ने जांच पड़ताल करना चाहा। और कहा… अपने सभी कागजात दिखाओ और अपने चेहरे से दुपट्टा हटाओं, परंतु लड़की ने जैसे ही अपना चेहरा दुपट्टे से हटाया!!! अरे यह तो उसकी अपनी रेवा है जिसे वह साल भर पहले एक काम से बाहर जाने पर मिली थी।बातचीत में शादी का वादा कर उसे छोड़ आया था। उसने कहा ..जी हां मैं ही हूं…. आपके बच्चे की मां बन चुकी हूं। अपाहिज मां के साथ मै जिंदगी खतम करने चली थी, परंतु बच्चे का ख्याल आते ही अपना ईरादा बदल मैंने काम करना चाहा।

आज अचानक आपका पता और दुकान नंबर मिला। मैं नौकरी के लिए आई।मैं आपको शादी के लिए जोर नहीं दे रही। वह मेरी गलती थी, परंतु आपके सामने आपके बच्चे के लिए मैं काम करना चाहती हूं।

फोटो कापी के दुकान पर अचानक सभी तस्वीरें साफ हो गई । अपने विज्ञापन को वह क्या समझे??? कभी रेवा के कागज तो कभी उसके बंधे हुए बेबस चेहरे को देखता रहा।

उस का दिमाग घूम रहा था। जाने कितने फोटो कापी मशीन चलाता रहा और जब ओरिजिनल सामने आया तब सामना करना मुश्किल है????

तभी आवाज आई कितना पेमेंट देगें मुझे आप?????

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 107 ☆ बा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 107 ☆

☆ बा ☆

या घराचे दार आहे ठेंगणे

शिकविले त्यानेच ताठा सोडणे

 

पाय लागे उंबऱ्याला सारखा

टाळले त्याने तरी ना भेटणे

 

कौल होउन सोसतो सूर्यास ‘बा’

म्हणत नाही शक्य नाही सोसणे

 

माणसे साधीच ही माझ्या घरी

पण तिथे संस्कार आहे देखणे

 

तावदानाची गरज नाही मला

मुक्त वाऱ्याचे पहावे नाचणे

 

सूर्यही येतो सकाळी अंगणी

अर्घ्य देउन हात त्याला जोडणे

 

चार भिंतीच्या घराचे थोरपण

ज्या ठिकाणी सभ्यतेचे नांदणे

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

[email protected]

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की#59 – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)

✍  लेखनी सुमित्र की #59 –  दोहे 

संताने हैं नयन की, रखना अश्रु संभाल ।

पढ़ना चाहो तो पढ़ो, भूत, भविष्यत काल।।

 

किसने कब कैसे किया, युद्ध का आव्हान।

युद्ध कथा का मूल है, आशु का अपमान।।

 

आंसू टपका आंख से, कहे हृदय का हाल ।

समझदार तो है वही, जो समझे तत्काल ।

 

आंसू बहे प्रसाद के,   रहे निराला मौन ।

बच्चन के मन की व्यथा, बांच सका है कौन ।

 

तुलसी सूर कबीर के, अश्रु बने इतिहास।

कौन कहे मीरा कथा, आंसू का उपवास।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव-गीत # 59 – कुटीरों में भूख का अध्याय है …. ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण अभिनवगीत – “कुटीरों में भूख का अध्याय है ….। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 59 ☆।। अभिनव-गीत ।। ☆

☆ कुटीरों में भूख का अध्याय है …. ☆

बुरे से हालात

हैं दृग के

तैरते डोरे

दिखे ड्रग के

 

उबरते तक नहीं

इस दृश्य से

अजनबी सन्दर्भ

हैं अदृश्य से

 

विप्लवी नशे

की मरीचिका –

में, पड़े छौने

किसी मृग के

 

कुटीरों में भूख

का अध्याय है

विवशता बैठी

जहाँ निरुपाय है

 

बहुत चिंतित

क्षुब्ध शुभ चिन्तक

कुयें में औंधे

पड़े नृग के

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

24-09-2021

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # 105 ☆ मरघट यात्रा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में  सँजो रखा है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय  व्यंग्य ‘मरघट यात्रा).   

☆ व्यंग्य # 105 ☆ मरघट यात्रा ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

मैं मर चुका था, काफी देर हो चुकी थी। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं वास्तव में मर चुका हूं। सब मजाक कर रहे थे कि मैं इतने जल्दी नहीं मर सकता। डाक्टर बुलाया गया, उसने हाथ पकड़ा फिर नाड़ी देखी और सबको देखता रह गया …. तब भी लोगों ने सोचा कहीं डाक्टर तो नहीं मर गया। 

मेरे हर काम में लोग शक करते हैं और अड़ंगा डालते हैं,इतने देर से मैं मरा पड़ा हूं और लोग-बाग मानने तैयार नहीं हैं कि मैं वैसा ही मर चुका हूं जैसे सब मर जाते हैं, दरअसल मित्र लोग खबर मिलने पर अंतिम दर्शन को आ रहे हैं पर हाथी जैसे डील-डौल वाले शरीर को कंधा देने में कतरा रहे हैं और मजाक करते हुए यहां से कन्नी काट कर यह कहकर आगे बढ़ जाते हैं कि मैं मर नहीं सकता, गलती मेरी भी है कि मैं  जीवन भर से हर बात पर नखरे करता रहा, बहाने बनाता रहा, शरीर फैलता रहा, वजन कम नहीं किया। मुझे नहीं मालूम था कि हाथी जैसे डील-डौल वाले को मरने के बाद कंधा देने चार आदमी भी नहीं मिलते।

जिनको उधार दिया था उनमें से तीन किसी प्रकार कंधा देने तैयार हुए पर चौथा आदमी नहीं मिल रहा था। बाकी तीनों ने आते- जाते अनेक लोगों से मदद माँगी। किसी के पास समय नहीं था। चौथे आदमी को ढूंढने में विलंब इतना हो रहा था कि  मैं डर गया कि कहीं ये तीन भी धीरे धीरे कोई बहाना बना कर भाग न जाएं, इसलिए मैंने अपनी दोनों आंखें खोल दीं ताकि उन तीनो को थोड़ी राहत महसूस हो, मेरी आंखें खुलते ही वे तीनों इस बात से डर गये कि कहीं उधारी वाली चर्चा न चालू हो जाए, और वे तीनों भी भाग खड़े हुए।

तब मैंने भी सोचा कि चार दोस्तों के कंधों पर जब पांचवा सवार होता है तो वे उसे मरघट पहुंचा के ही दम लेते हैं, इसलिए उठकर बैठ जाना ही अच्छा है, और मैं उठकर बैठ गया तो सब भूत भूत चिल्लाते हुए भाग गए…….

मैं अभी भी मरा हुआ पड़ा हूं, काफी देर हो गई है पर कोई मानने तैयार नहीं है क्योंकि इन दिनों लोगों के समझ नहीं आ रहा है कि सच क्या है और झूठ क्या है…..

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #49 ☆ नवरात्रि पर्व विशेष – माता रानी ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी नवरात्रि पर्व पर विशेष कविता “# माता रानी #”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 49 ☆

☆ # नवरात्रि पर्व विशेष – माता रानी # ☆ 

अंधकार ही अंधकार है

दुःख दर्द तो अपार है

त्राहि त्राहि है जनमानस

व्याकुल सारा संसार है

पोंछने आंखों का पानी

आजा आजा माता रानी

 

भूख बेकारी गले पड़ गई

गरीबी जन्म से अड़ गई

अधनंगी काया लेकर घूमे

शर्म, हया

 कफन के साथ गड़ गई

छाया दे दे, तू हे दानी

आजा आजा माता रानी

 

न्याय तो अधमरा हो गया

सत्य तो डरा डरा सो गया

दुष्ट कर रहे हैं तांडव

कानून लाचार जार जार हो गया

तू चूर करदे इनकी अभिमानी

आजा आजा माता रानी

 

माता, पूजा पर तेरे पहरे है

मन पर घाव गहरे हैं

सच्चे है जो तेरे साधक

दूर कोने में ठहरे हैं

दर्शन देकर,

दूर कर इनकी ग्लानि

आजा आजा माता रानी

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 51 ☆ प्रेम… ☆ महंत कवी राज शास्त्री

महंत कवी राज शास्त्री

?  साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 51 ? 

☆ प्रेम… ☆

प्रेम आंधळं असतं

म्हणायला सोप्प जातं

झाल्यावर मात्र

गोड सुद्धा कडू लागतं…०१

 

प्रेम आंधळं असतं

ते कुठे ही होतं

काळी गोरी बोबडी

प्रेम मानत नसतं…०२

 

प्रेम आंधळं असतं

हे कसं पटवायचं

घरच्यांसमोर सांगा

सामोरं कसं जायचं…०३

 

प्रेम आंधळं असतं

पुरावे आहेत बारा

तरी सुद्धा पहा हो

नाही होत कमी तोरा…०४

 

प्रेम आंधळं असतं

नाही कधी करायचं

पण प्रेम होऊनच जातं

अलिप्त कसं रहायचं…०५

 

प्रेम आंधळं असतं

गणित खूप कठीण प्रेमाचं

भले भले इथे शूर थकले

न उलगडे कोडं प्रेमाचं…०६

 

माझे प्रेम तुला अर्पण

मीरा वदली कान्हाला

विष पिऊन दिला दाखला

प्रेमाचा असा बोलबाला…

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ अप्रूप पाखरे – 16 – रवींद्रनाथ टैगोर ☆ प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

? वाचताना वेचलेले ?

☆ अप्रूप पाखरे – 16 – रवींद्रनाथ टैगोर ☆ प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆ 

[८१]

जितका मृदू

ईश्वराचा उजवा हात

तितकाच कठोर

त्याचा डावा हात

 

[८२]

दिवसाचं फूल माझं

पाकळ्या गाळल्या त्याने

विस्मृतीच्या खोल विवरात

पण संध्याकाळी

छान पिकलं ते

आठवणीचं सोनेरी फळ बनून          

 

[८३]

किती क्रूर असतात

माणसं !

किती कोमल असतो

माणूस

 

[८४]

धरतीनं झिडकारलं प्रेम त्याचं

म्हणून तडफडणार्‍या

कुणा अनाम देवाचा

व्याकूळ आक्रोशच

हे वादळ म्हणजे

 

मूळ रचना – स्व. रविंद्रनाथ टैगोर 

मराठी अनुवाद – रेणू देशपांडे (माधुरी द्रवीड)

प्रस्तुति – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार #108 ☆ व्यंग्य – ‘एक पाती प्रभु के नाम’ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘एक पाती प्रभु के नाम ’। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 108 ☆

☆ व्यंग्य – एक पाती प्रभु के नाम 

परम आदरणीय भगवान जी,

बैकुंठधाम।   

सेवा में निवेदन है कि मैं मर्त्यलोक में अपने घर में ठीक-ठाक हूँ।  आप तो कुशल से होंगे क्योंकि आप तो दुनिया की कुशलता के इंचार्ज हैं।  

आगे समाचार यह है कि सेवक की उम्र अब पचहत्तर पार हो गयी जो भारत की औसत आयु से 5-6 साल ज़्यादा है।  इसलिए माना जा सकता है कि यमराज के दूत कभी भी रस्सी का फन्दा घुमाते मेरी आत्मा को गिरफ्तार करने आ सकते हैं।  

इस संबंध में शिकायत यही है कि आप के यहाँ आत्मा को शरीर से निकालने के पहले कोई नोटिस की व्यवस्था नहीं है।  हमारे यहाँ बिल्डिंग गिराते हैं तो पहले नोटिस देते हैं।  बिना नोटिस दिये कोई कार्रवाई हो जाए तो कोर्ट कान पकड़ती है।  आपके यहाँ आदमी को उठाने से पहले कोई नोटिस नहीं दिया जाता।  यहाँ से कानून के बड़े बड़े खुर्राट ट्रांसफर होकर वहाँ पहुँचे हैं।  उनकी सलाह लेकर नोटिस की व्यवस्था करें ताकि आदमी अचानक ही दुनिया से रुख़्सत न हो।  

दूसरी बात यह है कि वहाँ जाने से पहले यह जानने की इच्छा है कि वहाँ बिजली, पानी और आवास व्यवस्था का क्या हाल है।  अब  यहाँ एसी और कूलर की आदत पड़ गयी है, घर में मिनरल वाटर का उपयोग होने लगा है।  घरों में टाइल्स वाइल्स लगाकर बढ़िया बना लेते हैं।  कृपया सूचित करें कि वहाँ इन सब की क्या स्थिति है।  ध्यान दें कि अब दीपक और पर्णकुटी से काम नहीं चलेगा।  जैसा यहाँ जीते रहे वैसा ही वहाँ मिले तो ठीक रहेगा।  

वहाँ वाहन-व्यवस्था की जानकारी दें।  यहाँ अब हवाई-यात्रा और रेल में एसी की आदत पड़ गयी।  अब रथयात्रा बर्दाश्त नहीं होगी।  स्लिप- डिस्क का मरीज़ हूँ,रथयात्रा बहुत भारी पड़ेगी।  उम्मीद करता हूँ कि वहाँ पुष्पक विमान सब को मुहैया होंगे।  

एक और धड़का चाय को लेकर लगा है।  पता नहीं वहाँ चाय मिलेगी या नहीं।  यहाँ तो सबेरे बिना चाय के ठीक से आँख नहीं खुलती।  वहाँ चाय न मिली तो भारी दिक्कत हो जाएगी।  

प्रभुजी, यहाँ भाई-भतीजावाद और ‘दस्तूरी’ का खुला खेल चलता है।  बिना दस्तूरी दिये कोई काम नहीं होता।  जितना बड़ा अफसर, उतनी बड़ी दस्तूरी।  सब प्रेम से बाँटकर खाते हैं।  आशा है वहाँ यह सब नहीं होगा।  कहीं ऐसा न हो कि पापियों को स्वर्ग और पुण्यवानों को नर्क भेज दिया जाए।  पापी लोग इसमें जुगाड़ लगाने की कोशिश ज़रूर करेंगे।  

यहाँ इमारतों, सड़कों और पुलों की हालत खराब है।  उद्घाटन से पहले ही टूट जाते हैं और अपने साथ आदमियों को भी ले जाते हैं।  आशा है वहाँ सड़कें और इमारतें मज़बूत होंगीं।  ऐसा तो नहीं कि यहाँ से गये ठेकेदारों ने वहाँ भी ठेके हथया लिये हों।  

प्रभुजी, यहाँ के नेता सब लबार हो गये हैं।  आँख के सामने काले को सफेद और सफेद को काला बताते हैं।  आशा है वहाँ ऐसा झूठ और प्रपंच नहीं होगा।   दूसरी बात यह कि यहाँ ताकतवर लोग जेल में अपनी एवज में दूसरे लोगों को भेज देते हैं।  अतः कृपया वहाँ भी जाँच करा लें कि नर्क में कुछ सीधे-सादे ‘एवजी वाले’ तो नहीं बैठे हैं।  

यहाँ जाति और धर्म का बड़ा झगड़ा है।  रोज जाति और धर्म के नाम पर लोग एक दूसरे की कपाल-क्रिया करते हैं।  अतः यह जानने की इच्छा होती है कि क्या अलग अलग धर्मों के ईश्वर भी आपस में झगड़ते हैं?वहाँ जातिप्रथा से छुटकारा मिलेगा या वहाँ भी ऊँचनीच चलेगा?

एक बात जो समझ में नहीं आती वह यह कि अलग अलग धर्म वालों को अपने अपने स्वर्ग में अपने अपने ईश्वर ही क्यों दिखायी पड़ते हैं?क्या अलग अलग धर्मों के अलग अलग स्वर्ग और नरक हैं?ये बातें सोचते सोचते मूड़ पिराने लगता है, लेकिन कहीं से कोई संतोषजनक समाधान नहीं मिलता।  

इन शंकाओं का समाधान हो जाए तो थोड़ा इत्मीनान से आपके लोक आ सकूँगा।  अब कलियुग में आप प्रकट तो होते नहीं, इसलिए मेरे सपने में आकर मेरे प्रश्नों का उत्तर दीजिएगा।  मेरे सपने में आना ओ प्रभु जी,मेरे सपने में आना जी।  (तर्ज- मेरे सपने में आना रे सजना, फिल्म राजहठ)।  आप आना ठीक न समझें तो किसी समझदार प्रतिनिधि को भेज दीजिएगा।  

चलते चलते एक प्रार्थना और।  हम यहाँ दिन भर टीवी से चिपके रहते हैं।  कभी कभी सिनेमा थिएटर भी चले जाते हैं।  टाइम कट जाता है।  वहाँ समय काटने के हिसाब से मनोरंजन के कौन से साधन हैं यह जानकारी देना न भूलिएगा।  यह बता दूँ कि यहाँ अब क्लासिकल मुसीकी और क्लासिकल डांस कोई पसन्द नहीं करता।  इसलिए नये ज़माने के हिसाब से मनोरंजन के साधन हों तभी वहाँ मन लगेगा।  बाकी आपका भजन-पूजन तो जितना बनेगा उतना करेंगे ही।  

आपका भक्त

अनोखेलाल

साकिन जम्बूद्वीप

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 108 ☆ भाषाई अस्मिता ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # 107 ☆ भाषाई अस्मिता ☆

प्रश्नमंजूषा का एक कार्यक्रम चैनल पर चल रहा है। प्रश्न पूछा जाता है कि चौरानवे में से चौवन घटाने पर कितना शेष बचेगा? सुनने पर यह प्रश्न बहुत सरल लगता है पर प्रश्न के मूल में 94 – 54 = 40 है ही नहीं। प्रश्न के मूल में है कि उत्तरकर्ता को चौरानवे और चौवन का अर्थ पता है या नहीं।

हमारी धरती पर हमारी ही भाषा के अंक और शब्द जिस तरह से निरंतर हमसे दूर हो रहे हैं, उनके चलते संभव है कि भविष्य में किसी प्रश्नमंजूषा में पूछा जाए कि माँ और बेटा साथ जा रहे हैं, बताओ कि उम्र में दोनों में कौन बड़ा है? प्रश्न बचकाना लग सकता है पर केवल उनको जिन्हें माँ और बेटा का अर्थ पता होगा। बाकियों को तो उत्तर से पहले इन शब्दों के परदेसी अर्थ क्रमश: ‘मदर’ और ‘सन’ तक पहुँचना होगा। कुछ मित्रों की दृष्टि में यह अतिश्योक्ति हो सकती है पर अतिश्योक्ति होते तो हम रोज़ देख रहे हैं।

आज, हमारी भाषाओं के अंकों का उच्चारण न केवल कठिन मान लिया गया है, बल्कि मज़ाक का विषय भी बनने लगा है। भविष्य में शब्द समाप्त होने लगेंगे.., लेकिन ठहरिए, समय अधिक नहीं है। भविष्य दहलीज़ पर खड़ा है। कुछ शब्द तो उसने वहाँ खड़े-खड़े ही गड़प लिए हैं। बकौल डेविड क्रिस्टल, ‘एक शब्द की मृत्यु, एक व्यक्ति की मृत्यु के समान है।’

प्रश्न है कि हमारी भाषाई संपदा की अकाल मृत्यु के लिए उत्तरदायी कौन है? क्या केवल व्यवस्था पर इसका दोष मढ़ देना उचित है? निश्चित ही व्यवस्था, विशेषकर शिक्षा के माध्यम का इसमें बड़ा हाथ है। तथापि लोकतांत्रिक व्यवस्था की इकाई नागरिक होता है। इकाई की भूमिका क्या है? अब यह बहाना न तलाशा जाय कि दिन भर रोज़ी-रोटी के लिए खटने के बाद समय और शक्ति कहाँ बचती है कि कुछ और किया जाय? समाचार, क्रिकेट, फिल्में, सोशल मीडिया, शेयर मार्केट, सीरियल, ओ.टी.टी. सबके लिए समय है पर अपनी भाषा की साँसें बचाये रखने के नाम पर विवशता का रोना है।

कहा गया है, ‘धारयेत इति धर्म:।’ अनेक घरों में अकादमिक शिक्षा के अलावा निजी स्तर पर अनिवार्य धार्मिक शिक्षा का प्रावधान है। क्या अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी भाषा और मातृभाषा में बच्चों को पारंगत करना हमारा धर्म नहीं होना चाहिए? इकाई यदि सुप्त होगी तो समुदाय भी सुप्त होगा और जो सुप्त है, उसका ह्रास और कालांतर में विनाश निश्चित है।

अपने पुत्रों की मृत्यु से आहत गांधारी ने महाभारत युद्ध की समाप्ति पर श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि यदुवंश का नाश हो जाएगा। माधव सारी स्थितियों से भली-भाँति परिचित थे। बोले, ‘जैसे आशीष, वैसे आपका श्राप भी सिर-माथे पर।..हाँ एक बात है, आप श्राप देती या न देती, यदुवंशी जिस प्रकार अपने कर्मों से दूर होकर सुप्त हुए जा रहे हैं, उसे देखते हुए उनका नाश तो यूँ भी निश्चित है।’

मुद्दा यही है। अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का श्राप तो है ही, प्रश्न हमारी अपनी सुप्त अवस्था का भी है। शब्दों का भाषा से दूर होते जाना एक तरह से भाषा का चीरहरण है। शनै: शनै: चीर और छोटा होता जाएगा। क्या हम भाषाई अस्मिता को इसी कुचक्र में फँसते देखना चाहते हैं?

अभी भी समय है। सामूहिक प्रयत्नों से हम सब मिलकर योगेश्वर की भूमिका में आ सकते हैं, ताकि चीर अपरिमित हो जाए और उतारने वालों के हाथ थक कर चूर हो जाएँ।

आइए साथ में जुटें। आपकी भाषा को आपकी प्रतीक्षा है।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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