हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 106 ☆ कर्मण्येवाधिकारस्ते! ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # 106 ☆ कर्मण्येवाधिकारस्ते! ☆

एक युवा व्यापारी मिले।  बहुत परेशान थे। कहने लगे, “मन लगाकर परिश्रम से अपना काम करता हूँ  पर परिणाम नहीं मिलता। सोचता हूँ काम बंद कर दूँ।” यद्यपि उन्हें  काम आरम्भ किए बहुत समय नहीं हुआ है। किसी संस्था के अध्यक्ष मिले। वे भी व्यथित थे। बोले,” संस्था के लिए जान दे दो पर आलोचनाओं के सिवा कुछ नहीं मिलता। अब मुक्त हो जाना चाहता हूँ इस माथापच्ची से।” चिंतन हो पाता, उससे एक भूतपूर्व पार्षद टकराए। उनकी अपनी पीड़ा थी। ” जब तक पार्षद था, भीड़ जुटती थी। लोगों के इतने काम किए। वे ही लोग अब बुलाने पर भी नहीं आते।”

कभी-कभी स्थितियाँ प्रारब्ध के साथ मिलकर ऐसा व्यूह रच देती हैं कि कर्मफल स्थगित अवस्था में आ जाता है। स्थगन का अर्थ तात्कालिक परिणाम न मिलने से है। ध्यान देने योग्य बात है कि स्थगन किसी फलनिष्पत्ति को कुछ समय के लिए रोक तो सकता है पर समाप्त नहीं कर पाता।

स्थगन का यह सिद्धांत कुछ समय के लिए निराश करता है तो दूसरा पहलू यह है कि यही सिद्वांत अमिट जिजीविषा का पुंज भी बनता है।

क्या जीवित व्यक्ति के लिए यह संभव है कि वह साँस लेना बंद कर दे?  कर्म से भी मनुष्य का वही सम्बंध है जो साँस है। कर्मयोग की मीमांसा करते हुए भगवान कहते हैं,

 ‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।’

कोई क्षण ऐसा नहीं जिसे मनुष्य बिना कर्म किए बिता सके। सभी जीव कर्माधीन हैं। इसलिए गर्भ में आने से देह तजने तक जीव को कर्म करना पड़ता है।

इसी भाव को गोस्वामी जी देशज अभिव्यक्ति देते हैं,

 ‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा।’

जब साँस-साँस कर्म है तो उससे परहेज कैसा? भागकर भी क्या होगा? ..और भागना संभव भी है क्या? यात्रा में धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता आती-जाती हैं। आकलन तो किया जाना चाहिए पर पलायन नहीं। चाहे लक्ष्य बदल लो पर यात्रा अविराम है। कर्म निरंतर और चिरंतन है।

सनातन संस्कृति छह प्रकार के कर्म प्रतिपादित करती है- नित्य, नैमित्य, काम्य, निष्काम्य, संचित एवं निषिद्ध। प्रयुक्त शब्दों में ही अर्थ अंतर्निहित है। बोधगम्यता के लिए इन छह को क्रमश: दैनिक, नियमशील, किसी कामना की पूर्ति हेतु, बिना किसी कामना के, प्रारब्ध द्वारा संचित, तथा नहीं करनेवाले कर्म के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

इसमें से संचित कर्म पर मनन कीजिए। बीज प्रतिकूल स्थितियों में धरती में दबा रहता है। स्थितियाँ अनुकूल होते ही अंकुरित होता है। कर्मफल भी बीज की भाँति संचितावस्था में रहता है पर नष्ट नहीं होता।

मनुष्य से वांछित है कि वह पथिक भाव को गहराई से समझे, निष्काम भाव से चले, निरंतर कर्मरत रहे।

अपनी कविता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ उद्धृत करना चाहूँगा-

भीड़ का जुड़ना / भीड़ का छिटकना,

इनकी आलोचनाएँ  / उनकी कुंठाएँ,

विचलित नहीं करतीं / तुम्हें पथिक..?

पथगमन मेरा कर्म / पथक्रमण मेरा धर्म,

प्रशंसा, निंदा से / अलिप्त रहता हूँ,

अखंडित यात्रा पर /मंत्रमुग्ध रहता हूँ,

पथिक को दिखते हैं / केवल रास्ते,

इसलिए प्रतिपल / कर्मण्येवाधिकारस्ते!

 

विचार कीजिएगा।

 

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

[email protected]

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 60 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 60 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 60) ☆

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc. in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

हम ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए आदरणीय कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी के “कविता पाठ” का लिंक साझा कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें।

फेसबुक पेज लिंक  >>  कैप्टेन प्रवीण रघुवंशी जी का “कविता पाठ” 

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 60 ☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

खामोश रहने का

अपना ही मजा है,

नींव के पत्थर…

कभी बोला नहीं करते…

 

Being silent

has its own fun,

Foundation stones

never speak…

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काश सीख पाते हम भी,

मीठे झूठ बोलने का हुनर

कड़वे सच ने तो  ना जाने

कितने लोग हमसे छीन लिए..!

 

Wish I could also learn the

art  of  telling  sweet  lies…

Knoweth not how many people did

the  bitter  truth  snatch  from  me..!

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

ना तुमसे मिलने की आस है

ना ही तुम्हें पाने की प्यास है,

फिर भी तुम्हारे प्यार का जुनून है

ये देता मेरे दिल को बड़ा सुकून है …!

 

Neither any hope is there of meeting you

Nor is any urge left to have you, still,

The passionate obsession of your love

gives serene tranquility to my heart ….!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

कितना आसान है कह देना

कि मैं भूल  जाऊँ  तुम्हें,

क्या जिस्म से भी कभी रूह

यूँ आसानी से निकलती है…

 

How easy it is to say

that I must forget you,

Does  the  soul  ever  

leave the body easily!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 60 ☆ सलिल न बन्धन बाँधता …. ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताeह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी द्वारा रचित भावप्रवण कविता ‘सलिल न बन्धन बाँधता …. । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 60 ☆ 

सलिल न बन्धन बाँधता …. ☆ 

*

मुक्तक

नित्य प्रात हो जन्म, सूर्य सम कर्म करें निष्काम भाव से।

संध्या पा संतोष रात्रि में, हो विराम नित नए चाव से।।

आस-प्रयास-हास सँग पग-पग, लक्ष्य श्वास सम हो अभिन्न ही –

मोह न व्यापे, अहं न घेरे, साधु हो सकें प्रिय! स्वभाव से।।

*

दोहे

सलिल न बन्धन बाँधता, बहकर देता खोल।

चाहे चुप रह समझिए, चाहे पीटें ढोल।।

*

अंजुरी भर ले अधर से, लगा बुझा ले प्यास।

मन चाहे पैरों कुचल, युग पा ले संत्रास।।

*

उठे, बरस, बह फिर उठे, यही ‘सलिल’ की रीत।

दंभ-द्वेष से दूर दे, विमल प्रीत को प्रीत।।

*

स्नेह संतुलन साधकर, ‘सलिल’ धरा को सींच।

बह जाता निज राह पर, सुख से आँखें मींच।।

*

क्या पहले क्या बाद में, घुली कुँए में भंग।

गाँव पिए मदमस्त है, कर अपनों से जंग।।

*

जो अव्यक्त है, उसी से, बनता है साहित्य।

व्यक्त करे सत-शिव तभी, सुंदर का प्रागट्य।।

*

नमन नलिनि को कीजिए, विजय आप हो साथ।

‘सलिल’ प्रवह सब जगत में, ऊँचा रखकर माथ।।

*

हर रेखा विश्वास की, शक-सेना की हार।

सक्सेना विजयी रहे, बाँट स्नेह-सत्कार।

*

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य #90 ☆ # गौरैया एक आत्मकथा# ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  श्री सूबेदार पाण्डेय जी की  एक भावप्रवण एवं विचारणीय आलेख  “## गौरैया एक आत्मकथा##। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य# #90 ☆ # गौरैया एक आत्मकथा # ☆

वो मुझे मिली थी सारा शरीर छलनी हो गया था उसका, वह खून से लथपथ हो रही थी। भीषण गर्मी तथा भय से हांफ और कांप रही थी वो, भूख और प्यास से बुरा हाल था उसका, कौवों का झुंड पड़ा था उसके जान के पीछे । किसी तरह बचती बचाती आ गिरी थी मेरी गोद में।  उसकी हालत देख मैं अवाक हो ताकता रह गया था, उसे!  मेरे हाथों का कोमल स्पर्श पाकर उसे अजीब-सी शांति मिली थी। अपनेपन के एहसास की गहराई से उसका डर दूर हो गया था।

वह मुझसे संवाद कर बैठी बोल पड़ी थी। मुझे पहचाना तुमने ,मैं वहीं गौरैया हूं  जिसका जन्म तुम्हारे आंगन में हुआ था। मेरी पीढ़ियां तुम्हारे आंगन के कोनों में खेली खाई पली बढ़ी है।  वो तुम ही तो हो जो बचपन में मेरे लिए दाना पानी रखा करते थे। दादी अम्मा के साथ गर्मियों में गंगा स्नान को जाया करते थे तथा उनके पीछे-पीछे चींटियों की बांबी पर सत्तू छिड़का करते थे। तुम्हारा घर आंगन मेरे बच्चों की चींचीं चूं चूं से निरंतर गुलजार रहा करता था। मेरे रहने का स्थान बंसवारी तथा पेड़ों के झुरमुट और तुम्हारे घर के भीतर बाहर खाली स्थान हुए  करते थे।

कितनी संवेदनशीलता थी तुम्हारे समाज के भीतर? कितना ख्याल रखते थे  तुम लोग पशुओं पंछियों का? लेकिन अचानक से समय बदला परिस्थितियां बदलीं समय  के  साथ तुम लोगों के हृदय की दया, ममता, स्नेह तथा संवेदनाये सब कुछ खत्म होता गया।

अब तो तुम सबका दिल इतना छोटा हो गया उसमें तुम्हारे मां बाप के लिए भी जगह नहीं बची, फिर हम लोगों का क्या? कौन करेगा हमारा ख्याल ? अरे अब तो अपने स्वार्थ में अंधे बने  हमारे रहने की भी जगह छीन ली है तुम लोगों ने।अब न तो हमारे पास भोजन है न तो पानी और ना ही तुम सबकी संवेदनायें ही बची है। अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन हमारी पीढ़ियां प्राणी संग्रहालय में शोभा बढायेगी या फिर किताबों के पन्नों में दफ़न हो कर अपना दम तोड़ती नजर आएंगी। आखिर कब तक तुम लोग साल में एक दिन कभी गौरैया दिवस कभी शिक्षक दिवस कभी मदर्स डे, कभी फादर्स डे मना कर अपने दिल को झूठी तसल्ली देते रहोगे और फिर अत्यधिक रक्तस्राव के चलते बात करते हुए उसकी गर्दन एक तरफ की ओर झुकती चली गई, और वह सच में मर गई।

उसकी हालत देखते हुए मेरी आंखों से दो बूंदें छलक पड़ी थी, जिनका अस्तित्व उसके उपर गिर कर वातावरण में विलीन हो गया था और मै  उसका पार्थिव शरीर देख  अवाक रह गया था क्यो कि उसने मरते मरते भी सच का आइना जो दिखा दिया था।

© सूबेदार  पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #4 – 21वीं सदी का व्यंग्य : दिशा और दशा ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।  

आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की अगली कड़ी में आलेख ‘21वीं सदी का व्यंग्य : दिशा और दशा

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #4 – 21वीं सदी का व्यंग्य : दिशा और दशा ☆ श्री रमेश सैनी ☆ 

[प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ]

व्यंग्य लेखन हड़बड़ी का नहीं, जिम्मेदारी का है – रमेश सैनी

 21वीं सदी के व्यंग्य पर बात करने के लिए हमें  बीसवीं सदी के व्यंग्य के परिदृश्य  को आधार बनाना पड़ेगा .तब हम 21वीं सदी में अब तक के परिदृश्य  और भविष्य के व्यंग्य की संभावना पर बात कर सकते हैं.क्योंकि अभी 21वीं सदी के दो ही दशक गुजरे हैं। और उसमें मुकम्मल बात नहीं हो सकती है.हां उसकी संभावना पर हम अब तक हुए लेखन पर बात कर सकते हैं.भारतीय जीवन दर्शन और परंपरा आशावादी दृष्टिकोण ले लेकर आगे बढ़ती है. हमारे जीवन में निराशा का भाव बहुत कम होता है. हमारे जीवन या समाज के सामने दुर्दिन, कष्ट, दुख आएं पर हम उन से विमुख नहीं होते हैं. हम उनका सामना करते हैं. वरन उन दिनों की दशा पर एक ही सकारात्मक दृष्टिकोण तय कर लेते हैं. कि यह सब कुछ पहले से ही नियति ने तय कर रखा था. जब नियति द्वारा सब कुछ तय है. तब घबड़ाना क्यों ?फिर विश्वास करते हैं कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’. इस विश्वास के सहारे हमारे जीवन और समाज में संघर्षों के दिनों में उर्जा बढ़ जाती है. इस काल में हमारा जीवन  अर्निभाव से सहज, सरल, सतत गति से चलता रहता है.

भारतीय साहित्य और राजनीति में जब काल के हिसाब से गणना करते हैं. तब स्वभाव या प्राकृतिक रूप से दो कालखंड हमारे सामने दृष्टिगत होते हैं .पहला काल खंड स्वतंत्रता के पहले अर्थात 1947 के पूर्व और दूसरा काल खण्ड स्वतंत्रता के बाद अर्थात 1947 के बाद का. इन दोनों की अपनी विशेषता है. पहला कालखंड नवजागरण संघर्ष और अपनी भारतीयता को बचाने का था. अपनी मुक्ति का संघर्ष का समय था. जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग का सहयोग और योगदान था. जिसमें जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियां विडम्बनाएं हमारे समक्ष अमूर्त रूप में थी. उस समय हमारे समक्ष स्पष्ट लक्ष्य था. अंग्रेजी शासन से मुक्ति. मुक्ति संघर्ष के समय में  भी समाज बहुत सारी मे विसंगतियां विडम्बनाएं जैसे जात-पात, छुआछूत अंधविश्वास, जमीदारी प्रथा, आदि समाज में घुन की भांति थी.पर सब मुक्ति संघर्ष के सामने सामाजिक चेतना से बाहर थी  इसी कारण उस समय के परिदृश्य में लेखन के केन्द्र में सिर्फ राष्ट्रवाद था।उस समय का अधिकांश व्यंग्य राजनीति और तत्कालीन विदेशी सत्ता के विरोध में था. इन व्यंग्य  का असर सत्ता पर उस वक्त आसानी से अनुभव किया जा सकता था.

स्वतंत्रता के बाद भारतीय साहित्य में आमूल परिवर्तन देखा जा सकता है. भारतीय जनमानस का ध्यान समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखंडवाद, ठकुरसुहाती, नौकरशाही, अवसरवादी, बेरोजगारी, अकाल, गिरते नैतिक मूल्य, धार्मिक कट्टरता,अंधविश्वास आदि विद्रूपताएं विडंबनाएं विसंगतियां ,बुराइयां आदि दिखने लगी थी ,जबकि यह पहले से व्याप्त थी. पर इसे पूर्व में अनदेखा किया गया. इन  विसंगतियों को उस वक्त के व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई शरद जोशी रवीन्द्रनाथ त्यागी,आदि व्यंग्यकारों ने निर्डरता से समाज के सामने उजागर किया. सामाजिक और मानवीय सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध लेखन से एक नया शिल्प आया और इन लेखकों को व्यंग्यकारों के रुप में पहचाना गया. इन व्यंग्य लेखों के माध्यम से साहित्य में इन लेखकों को व्यंग्यकारों की रूप में स्वीकार्यता मिली. इसमें भी कोई संदेह नहीं है. उस समय केवल व्यंग्यकारों ने मानवीय सरोकारों, संवेदना के साथ अपनी लेखक की  जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह किया था .यह बात रेखांकित करने की बात है इन व्यंग्यकारों की एक लंबी फेहरिस्त है जो अपनी सामाजिक मानवीय सरोकारों और संवेदना के साथ समाज और जीवन के प्रति प्रतिबद्ध रहे.

21वीं सदी के आरंभ में भी सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां  लगभग बीसवीं सदी के समान है इसमें कोई खास बदलाव नहीं हुआ है. समाज में आज भी गरीबी, भूख, अकाल, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट, भ्रष्टाचार, अपहरण ,बलात्कार, उपभोक्तावाद आतंकवाद आदि ने उन सभी विसंगतियों का विस्तार किया है, पर बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के लेखकों ने 21वीं सदी में भी इन विसंगतियों को अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया.पर नई पीढ़ी विशेषकर 21वीं सदी के आरंभ की पीढ़ी जिन्होंने कुछ वर्षों पहले लेखन अपना आरंभ किया है.उनकी दृष्टि में ये विसंगतियां और बुराईयां गौड़ थी. पर उपरोक्त बुराईयों के साथ-साथ भारतीय जीवन और समाज में के परिदृश्य में धीरे-धीरे बहुत बदलाव दिख रहा था. जिसे हम महसूस कर सकते थे. राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा था. शिक्षा और स्वास्थ्य में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ.लोगों की जीवन शैली बदल गई.संयुक्त परिवार टूट कर एकल हो गए . इंटरनेट, बेबसाइट, फेसबुक आदि सोशल मीडिया ने सूचना माध्यम को सहज बना दिया.यह हमारी सामाजिक संरचना में प्रवेश कर गया. तकनीकी क्रांति ने लोगों की सोचने समझने की क्षमता को प्रभावित किया. इस तकनीकी प्रभाव ने लोगों को तकनीक का पराधीन बना दिया. इंटरनेट, वेबसाइट, सर्च इंजन सूचना के महत्वपूर्ण स्त्रोत हो गए.इसका प्रभाव लेखकों पर भी पड़ा. इस कारण लेखक धीरे-धीरे बाहर की दुनिया से अलग होने लगा.और वह मानवीय संवेदनाएं, सरोकार, आर्थिक,सामाजिक, राजनैतिक विसंगतियां  लेखन के विषय छूटने लगे वैश्वीकरण, निजीकरण, बाजारवाद, के मायावी संसार में  लेखक भी फंस कर रह गया. इस सदी के प्रारंभ की रचना देखें .तो आप खुद अनुभव करेंगे कि रचनाओं के विषय बदल गए हैं.मानवीय सामाजिक राजनैतिक विसंगतियों से बचकर लिखने लगा है.उसमें उसका अपना गुणा भाग रहता है.वह रचनाओं के माध्यम से अपना नफा नुकसान का बहीखाता रखता है.आज का व्यंग्यकार  बहुत डरा हुआ है.वह बहुत संभलकर और सावधानी से लिख रहा है.वह ऐसे विषय पर लिखता है. जिसका सामाजिक राजनैतिक और मानवीय सरोकारों से कोई संबंध नहीं रहता है.इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है.पिछले दिनों बाजार में  प्याज बहुत महंगी हो गई .सभी शहरों में ₹150 से लेकर ₹200 तक बिकी. बहुत से लेखकों ने प्याज की महंगाई पर व्यंग्य लिखें. जबकि उस वक्त भी  बहुत सी ऐसी सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियां थी .जिस पर लेखक मौन रहा है.उसने साहस नहीं दिखाया. शाहीनबाग था, ,किसान आत्महत्या कर रहे थे. लड़कियों पर बलात्कार हो रहे थे नेताओं द्वारा धार्मिक प्रपंच कर रहे थे,आदि. पर   इन पर व्यंग्यकारों के लेख नहीं आए.  क्योंकि इस पर लिखना एक रिस्क लेना था.चाहे वह रिस्क सत्ता से हो या समाज से.

मोबाइल, कंप्यूटर क्रांति ने सिर्फ मनुष्य को नहीं बदला है, वरन उसमें उपभोक्ता संस्कृति ने विस्तार में सहयोग कर मनुष्यता को ही बदल दिया है. इसका प्रभाव लेखन पर बहुत सरलता से देखा जा सकता है.जीवन और समाज में व्याप्त विसंगतियों को धीरे धीरे ढका जा रहा है.एक नयी आभासी दुनिया का सृजन किया जा रहा है. एक नए प्रकार का लेखन  सामने आ रहा है  जिसे हम यथार्थवाद  कह सकते हैं. इसके दुष्प्रभाव से साहित्य में यथार्थवाद की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है. यथार्थवाद ने हमारी वैचारिक शक्तियों को कमजोर सा कर दिया है,हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को पीछे कर दिया है.उपभोक्ता संस्कृति से उपजे बाजारवाद ने इसमें आग में घी का काम किया है. इसके प्रमाण में एक ही बात कहना चाहता हूँ. इस समय के महत्वपूर्ण व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी भी बाजारवाद की शक्तिशाली भुजाओं से अपनों को नहीं बचा सके.विगत दिनों उनका उपन्यास “हम न मरब” में भारतीय ग्रामीण क्षेत्र की परंपरागत गालियों की भरमार थी. इसे हम सार्वजनिक, परिवार के साथ बैठकर पढ़ नहीं सकते  हैं.जबकि इन गालियों से बचा जा सकता था.इन गालियों ने उपन्यास का बाजार बना दिया. लोगों ने इस संबंध में उनसे पूछा, तब उनका उत्तर था-“जिस पृष्ठभूमि में यह उपन्यास लिखा गया, उस क्षेत्र का परिवेश और पात्र इसी भाषा (गालियों वाली) का उपयोग करते हैं.इसे हम परिवार के बीच में जोर से बोल कर नहीं पढ़ सकते हैं क्योंकि हमारी सामाजिक और पारिवारिक मर्यादा भी है. जिनको हमें बचाए रखना पड़ता है.यथार्थवादी लेखन ,कहीं नहीं कहीं हमारी मूल्यों को नीचे ले जा रहा है. इसी तरह  बाजार को  सामने रखकर  उन्होंने  मार्फत लेखन के बहाने  एक हमारे समय के महत्वपूर्ण और महान लेखक की छवि को यथार्थ वाद से धूमल करने  का प्रयास किया.अब प्रश्न उठता है  यथार्थवादी लेखन के माध्यम से आने वाली  पीढ़ी और 21वीं सदी को हम क्या परोस रहे हैं.यह चिंतनीय और विचारणीय है.

तकनीक और सूचना के विस्तार ने लेखकों को  पाठक  तक पहुंचने का रास्ता आसान कर दिया है अब लेखक को जो प्लाट क्लिक किया उसे फटाफट लिखा और हड़बड़ी में व्हाट्सएप या फेसबुक में डाल दिया .जबकि व्यंग्य हड़बड़ी का लेखन नहीं है वरन जिम्मेदारी का है. पर लेखक आत्ममुग्धता वह लाइक ,अच्छी ,बढ़िया, सहमत आदि टिप्पणियों का इंतजार करता है. फिर इन टिप्पणियों को देख लेखक गदगद हो जाता है. पर यहां पर उसका नुकसान भी हो रहा है क्योंकि यहाँ लेखक और पाठक के बीच का संपादक गायब है और  टिप्पणियाँ मुंह देखी होती है..लेखक में इतना संयम भी नहीं है.कि वह अपनी रचना का संपादन खुद कर सकें. इन माध्यमों से लेखक आत्ममुग्धता का शिकार हो रहा है.इससे व्यंग्य की गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं. यह लेखक और व्यंग्य के लिए चिंता का विषय है.

आज व्यंग्य बहुतायत से लिखा जा रहा है अखबारों पत्रिका में व्यंग्य स्तंभ जरूरी हो गया है पर उन्होंने पर कतर दिए है. अखबार और पत्रिकाओं ने लेखों को शब्द सीमा तक सीमित कर दिया .एक तरह  व्यंग्य का बोनसाई बना दिया है. जो सुंदर और आकर्षक होते हैं. पर उनमें से उनकी आत्मा सुगंध और स्वाद गायब है.पर लेखक छपास के मोह में अपनी आत्मा से समझौता कर रहा है.अब तो वन लाइनर व्यंग्य का इंतजार हो रहा है.

इन सबके बावजूद व्यंग्य की उपरोक्त विसंगतियों के समांतर समाज में व्याप्त विसंगतियों प्रकृति और प्रवृत्तियों पर भी व्यंग्यकारों की दृष्टि है. और वे विसंगतियों को केंद्र में रख कर अपने लेखकीय दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं. अभी 21वीं सदी सदी का मात्र दो दशक बीता है. इस समय में  21वीं सदी का पूरी तरह मूल्यांकन नहीं कर सकतेहैं. जो बीत गया है. वह भी पूरा 21वी सदी का सच नहीं है हां 21वीं सदी तकनीक के माध्यम से आगे बढ़ रही है और व्यंग्यकार की दृष्टि सब पर बराबर है.जोकि व्यंग्य के लिए आवश्यक है.  अभी समय पहले ही व्यंग्ययात्रा के संपादक वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉक्टर प्रेम जनमेजय की एक रचना आई थी “बर्फ का पानी” यह रचना आश्वस्त करती है कि भविष्य में व्यंग्य साहित्य की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक होगी .इसी तरह व्यंग्य में एक नये शिल्प के साथ ललित लालित्य ने धमाकेदार उपस्थिति दर्ज की है.

भविष्य के गर्भ में क्या है यह अभी कह नहीं सकते. पर जो अभी दिख रहा है.इस आधार पर  समाज में व्याप्त विसंगतियों और विडम्नाओं  के विरोध में रहकर आज का व्यंग्यकार अपने पूर्वजों की परम्परा से मुंह नहीं मोड़ेगा. क्योंकि वह पहले से अधिक साधन सम्पन्न है.

*?*

© श्री रमेश सैनी 

सम्पर्क  : 245/ए, एफ.सी.आई. लाइन, त्रिमूर्ति नगर, दमोह नाका, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 482 002

मोबा. 8319856044  9825866402

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 48 ☆ अटपटे परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

(आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण कविता “अटपटे परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। ) 

☆ काव्य धारा # 47 ☆ अटपटे परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम ☆

जहां के वातावरण में घुली रहती व्यंग्य भाषा

चोटें ही करती है स्वागत स्नेह की संभव न आशा

बजा करते फिर वही गाने जमाने के पुराने

रास्ते संकरे हैं इतने कठिन होता निकल पाने

ऐसे तो परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम

सांस ले सकने को समुचित वायु मिल पाती है कम

 

जहां जाके कभी मन की बातें कोई कह ना पाता

बात कब क्या मोड़ ले यह समझ में कुछ भी ना आता

सशंकित रहती है सांसे कब बजे कोई नया स्वर

कब उठे आंधी कभी कोई या दिखे मुस्कान मुंह पर

ऐसे तो परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम

सांस ले सकने को समुचित वायु मिल पाती है कम

 

सही बातें होने पर भी कब सहज आयें उबालें

या पुरानी गठरियों से बातें नई जाएं निकाले

या कि फिर अभिमान के अंगार नए कोई सुलग जांए

उचित शब्दों के भी कोई अर्थ उल्टे समजें जायें

ऐसे तो परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम

सांस ले सकने को समुचित वायु मिल पाती है कम

 

अनिश्चित व्यवहार का रहता जहां डर व्याप्त मन में

बेतुकी बातों का है भंडार जहां अटपट वचन में

अप्रसांगित बातों में जहां हाँ में हाँ को न मिलायें

तो अकारण क्रोध का भाजन उसे जाया बनाये

ऐसे तो परिवेश में सद्भाव का घुटता है दम

सांस लेने ले सकने को समुचित वायु मिल पाती है कम

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

[email protected]

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – “मैं” की यात्रा का पथिक…3 ☆ श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  साप्ताहिकआलेख श्रृंखला की प्रथम कड़ी  “मैं” की यात्रा का पथिक…3”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – “मैं” की यात्रा का पथिक…3 ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

वीणा के तार जब न अधिक कसे होते हैं और न ढीले होते हैं, तभी संगीत पैदा होता है। जीवन के संगीत को पाने का सूत्र भी यही है। जो आध्यात्म-योग के माध्यम से पांचों इंद्रियों और मन को संतुलन में रखता है, उसे ही जीवन का अमृत प्राप्त होता है। कबीर कहते हैं : ज्यों कि त्यों धर दीनी चदरिया। अध्यात्म की यात्रा पर चलने से जीवन बदल जाता है। बदलने का सबसे बड़ा उपाय है -आत्मा को “मैं” के द्वारा देखना। जब तक भीतर नहीं देखा जाता तब तक बदलाव नहीं होता, रूपांतरण नहीं होता।

शास्त्रों में एक सूत्र है -जहां राग होता है वहीं द्वेष होता है। द्वेष कड़वा होता है, वह तो छूट जाता है, पर राग मीठा जहर है। वह आसानी से नहीं छूटता। इसीलिए आचार्यों ने कहा है कि यदि राग को जड़ से काट दें तो द्वेष पैदा ही न हो। आसक्ति ही आत्मा के केंद्र से च्युति का कारण है। आसक्ति के कारण एक के प्रति राग और दूसरे के प्रति द्वेष हो ही जाता है।

“मैं” को आत्मबोध की अनुभूति की राह में राग और द्वेष बड़े रोड़े हैं। उनसे लड़े बग़ैर “मैं” स्वयं की आरम्भिक मौखिक अनुभूति तक नहीं पहुँचा सकता। “मैं’ के निर्माण की प्रक्रिया में इंद्रियों से अनुराग पहली सीढ़ी थी। “मैं” के मुँह में माँ के दूध की पहली बूँद और उसके नरम अहसास की पहली अनुभूति राग का पहला पाठ था। माँ का “मैं” को सहलाना, लोरी सुनाना, माँ की देह की सुगंध “मैं” की नासिका में पहुँचना राग का दूसरा पाठ था। माँ-बाप का “मैं” को दुलराना, खिलाना और झुलाना तीसरा पाठ था। कामना की उत्पत्ति यहीं से होती है।

राग की आरम्भिक अवस्था में जब भी कामना की पूर्ति में व्यवधान आता है तब “मैं” रोता है, मचलता है, खीझता है। फिर भी कामना पूरी नहीं होती तो “मैं” पहली बार क्रोध की अनुभूति करता है। जब बार-बार कामना निष्फल होती है तो द्वेष का पहला सबक़ मिलता है। “मैं” के आसपास जिनकी कामना पूरी हो रही है, उनसे द्वेष उत्पन्न होता है। यही राग-द्वेष माया प्रपंच आत्मबोध की राह पर चलने की बाधा है।

तो क्या माता-पिता का प्यार साज सम्भाल बेकार की बातें हैं? नहीं, बेकार की बातें नहीं हैं। वे अपना कर्तव्य निभा कर “मैं” के मन में अधिकारों का अविच्छिन्न अधिकार रच रहे थे, और “मैं” की कामना संतुष्ट न होने पर द्वेष का ज़ाल बुन रहे थे। वे अपने प्रेम से “मैं” के अंदर कभी न संतुष्ट होने वाले मन को खाद-पानी दे रहे थे। जिनके बग़ैर “मैं” का विकास सम्भव नहीं था। वे अपने पितृ ऋण से उऋण हो रहे थे।

जब तुमने यही काम अपने बच्चों के लिए किया, तुम अपने पितृ ऋण से उऋण हो गए। लेकिन इस प्रक्रिया में रचा राग-द्वेष का चक्र अभी भी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। यही तुम्हारी बेचैनी का कारण है। यही माया का प्रबल अस्त्र “मैं” को सरल होने की राह की बाधा है। राग और प्रेम में एक फ़र्क़ है। राग कामनाओं का मकड़जाल बुनता है। प्रेम माँ के कर्तव्य की तरह कामना रहित निष्काम कर्म है, जो मैं को मुक्त करता है। “मैं” को एक काम करना है। मुक्त होने के लिए उसे माँ बनना है। सिर्फ़ निष्काम कर्म करना है, अनासक्त भाव से फल निर्लिप्त कर्म।

राग आकर्षण का सिद्धांत है और द्वेष विकर्षण का। इस तरह द्वंद्व की स्थिति बनी ही रहती है। यद्यपि आत्मा अपने स्वभाव के अनुसार समता की स्थिति में रमण करती है, लेकिन राग-द्वेष आदि की उपस्थिति किसी भी स्थायी संतुलन की स्थिति को संभव नहीं होने देती। यही विषमता का मूल आधार है। आज की युवा पीढ़ी पूछती है -धर्म क्या है? किस धर्म को मानें? मंदिर में जाएं या स्थानक में? अथवा आचरण में शुद्धता लाएं? कुछ धर्मानुरागियों के आडंबर और व्यापार आचरण को देखकर भी युवा पीढ़ी धर्म-विमुख होती जा रही है। धर्म ढकोसले में नहीं, आचरण में है। धर्म जीवन का अंग है। समता धर्म का मूल है। धर्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है -अध्यात्म की यात्रा। जो धर्म अपने अनुयायियों से अध्यात्म की यात्रा नहीं कराता, वह धर्म एक प्रकार से छलना है, धोखा है, ढोंग है और यदि उसे कम्युनिस्टों की तर्ज़ पर अफीम भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #60 – लाल फर्श वाला कमरा ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। 

अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”)

☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #60 – लाल फर्श वाला कमरा  ☆ श्री आशीष कुमार

इस बार जब घर गया तो कुछ देर के लिए अकेला जाकर लाल फर्श वाले कमरे में बिस्तर पर लेट गया।

वो कमरा जो बचपन में बहुत बड़ा लगता था अब वो बहुत छोटा लगने लगा था क्योकि मैं शायद अपने आपको बहुत बड़ा समझने लगा था।

मैं कुछ ही देर लेटा था की तुरंत यादें मन का हाथ थामे ले गयी मुझे बचपन में

जब इस कमरे में बैठकर पूरा परिवार होली से पहले गुंजिया बनवाता था।

हां वो ही कमरा जिसमे दिवाली की पूजा होती थी और पूजा के दौरान मन बेचैन रहता था की जल्दी पूजा ख़त्म हो और मैं अपने भाई- बहन के साथ घर की छत पर जाकर पठाखे फोड़ सकू।

अनायास ही मेरा ध्यान उस कमरे के टांड पर चला गया जो लाधे खड़ा था मेरा हँसता हुआ बचपन अपने कंधो पर।

पता नहीं अचानक मुझे क्या हुआ मैं बिस्तर पर से उठा और उस टांड के सिरों को सहलाने लगा जो मेरी खुशियों का बोझ उठाते उठाते बूढा हो चला था।

जिस पर एक बार घरवालों से छिपाकर मैंने एक कॉमिक छुपाई थी

उस टांड के गले में हम पैरो को फंसा कर उल्टा लटककर बेताल बना करते थे।

एक बार छुपन-छुपाई में मैं उस टांड पर चढ़ कर बैठा गया था और आगे से पर्दा लगा लिया था।

तभी मेरा ध्यान कमरे में लगें कढ़ो पर गया क्योकि कमरा पुराना था इसलिए कढ़ो वाला था।

वो कढ़ा भी मेरी ओर देखकर 360 की मुसकुराहट दे रहा था जिसमे से होकर हम डैक के स्पीकरों का तार निकला करते थे।

कमरे की दीवारों की पुताई कई जगह से छूट गयी थी और कई परतों के बीच मेरे बचपन वाली पुताई की परत ऐसे झांक कर देख रही थी जैसे गुजरे ज़माने में घर की बहुएँ किसी बुजुर्ग को अपने पल्ले के परदे के पीछे से झांकती थी।

अब उस कमरे में लाल रंग का फर्श नहीं रहा

wooden flooring हो गयी है

जिस कमरे को मैं छोटा सोच रहा था उसमे तो मेरा पूरा बचपन बसा था

अब मैं आपने आप को उस कमरे मे फिर से बहुत छोटा अनुभव कर रहा था ।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 74 – माय माझी ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 74 – माय माझी ☆

माय माझी बाई।

अनाथांची आई।

सर्वा सौख्यदाई।

सर्वकाळ।

 

घरे चंद्रमौळी।

स्नेह शब्दावली।

दारी रंगावली।

प्रेमस्पर्शी।

 

पूजते तुळस।

मनी ना आळस।

घराचा कळस।

माझी माय।

 

पै पाहुणचार।

करीत अपार।

 देतसे आधार।

अनाथासी।

 

संस्काराची खाण।

कर्तव्याची जाण।

आम्हा जीवप्राण ।

माय माझी।

 

गेलीस सोडूनी।

प्रेम वाढवूनी।

जीव वेडावूनी।

 माझी  माय।

 

लागे मनी आस।

जीव कासावीस।

सय सोबतीस।

सर्वकाळ।

 

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 101 ☆ क़ामयाब-नाक़ामयाब ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख ग़क़ामयाब-नाक़ामयाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 101 ☆

☆ क़ामयाब-नाक़ामयाब ☆

‘कोशिश करो और नाकाम हो जाओ, तो भी नाकामी से घबराओ नहीं; फिर कोशिश करो। अच्छी नाकामी सबके हिस्से में नहीं आती’– सैमुअल वेकेट मानव को यही संदेश देते हैं कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ इसलिए मानव को नाकामी से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि मकड़ी से सीख लेकर बार-बार प्रयत्न करना चाहिए। जैसे किंग ब्रूस ने मकड़ी को बार-बार गिरते-उठते व अपने कार्य में तल्लीन होते देखा और उसके हृदय में साहस संचरित हुआ। उन्होंने युद्ध-क्षेत्र की ओर पदार्पण किया और वे सफल होकर लौटे। जार्ज एडीसन का उदाहरण भी सबके समक्ष है। अनेक बार असफल होने पर भी उन्होंने पराजय स्वीकार नहीं की, बल्कि अपने दोस्तों को आश्वस्त किया कि उनकी मेहनत व्यर्थ नहीं हुई। अब उन्हें वे सब प्रयोग दोहराने की आवश्यकता नहीं होगी। अंततः वे बल्ब का आविष्कार करने में सफल हुए।

‘पूर्णता के साथ किसी और के जीवन की नकल कर जीने की तुलना में अपने आप को पहचान कर अपूर्ण रूप से जीना बेहतर है।’ भगवान श्रीकृष्ण मानव को अपनी राह का निर्माण स्वयं करने को प्रेरित करते हैं। यदि हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति करनी है, तो हमें अपनी राह का निर्माण स्वयं करना होगा, क्योंकि लीक पर चलने वाले कभी भी मील के पत्थर स्थापित नहीं कर सकते। बनूवेनर्ग उस व्यक्ति का जीवन निष्फल बताते हुए कहते हैं कि ‘जो वक्त की कीमत नहीं जानता; उसका जन्म किसी महान् कार्य के लिए नहीं हुआ।’ वे मानव को ‘एकला चलो रे’ का संदेश देते हुए कहते हैं कि ज़िंदगी इम्तिहान लेती है। सो! आगामी आपदाओं के सिर पर पांव रख कर हमें अपने मंज़िल की ओर अग्रसर होना चाहिए।

जीवन में समस्याएं आती हैं और जब कोई समस्या हल हो जाती है, तो हमें बहुत सुक़ून प्राप्त होता है। परंतु जब समस्या सामने होती है, तो हमारे हाथ-पांव फूल जाते हैं और कुछ लोग तो उस स्थिति में अवसाद का शिकार हो जाते  हैं। रॉबर्ट और उपडेग्रॉफ ‘थैंकफुल फॉर योअर ट्रबल्स’ पुस्तक में समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करते हुए इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि हम चतुराई व समझदारी से समस्याओं के ख़ौफ से बच सकते हैं और उनके बोझ से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। अधिकतर समस्याएं हमारे मस्तिष्क की उपज होती हैं और वे उनके शिकंजे से मुक्त होकर बाहर नहीं आतीं। अधिकतर बीमारियां बेवजह की चिन्ता का परिणाम होती हैं। हमारा मस्तिष्क उन चुनौतियों को, समस्याएं मानने लगता है और एक अंतराल के पश्चात् वे हमारे अवचेतन मन में इस क़दर रच-बस जाती हैं कि हम उनके अस्तित्व के बारे में सोचते ही नहीं। वास्तव में संसार में हर समस्या का समाधान उपलब्ध है। हमें अपनी सूझ-बूझ से उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार हमें न केवल आनंद की प्राप्ति होगी, बल्कि अनुभव व ज्ञान भी प्राप्त होगा। मुझे स्मरण हो रहा है वह प्रसंग –जब एक युवती संत के पास अपनी जिज्ञासा लेकर पहुंचती है कि उसे विवाह योग्य सुयोग्य वर नहीं मिल रहा। संत ने उस से एक बहुत सुंदर फूल लाने की पेशकश की और कहा कि ‘उसे पीछे नहीं मुड़ना है’ और शाम को उसके खाली हाथ लौटने पर संत ने उसे सीख दी कि ‘जीवन भी इसी प्रकार है। यदि आप सबसे योग्य की तलाश में भटकते रहोगे, तो जो संभव है; उससे भी हाथ धो बैठोगे।’ इसलिए जो प्राप्तव्य है, उसमें संतोष करने की आदत बनाओ। राधाकृष्णन जी के मतानुसार ‘आदमी के पास क्या है, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि वह क्या है?’ सो गुणवत्ता का महत्व है और मानव को संचय की प्रवृत्ति को त्याग उपयोगी व उत्तम पाने की चेष्टा करनी चाहिए।

जीवन में यदि हम सचेत रहते हैं, तो शांत, सुखी व  सुरक्षित जीवन जी सकते हैं। इसलिए हमें समय के मूल्य को समझना चाहिए और आगामी आपदाओं के आगमन से पहले पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए ताकि हमें किसी प्रकार की हानि न उठानी पड़े। इसलिए कहा जाता है कि यदि हम  विपत्ति के आने के पश्चात् सजग व सचेत नहीं  रहते, तो विनाश निश्चित है और उन्हें सदैव हानि उठानी पड़ती है। सो! हमें चीटियों से भी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, क्योंकि वे सदैव अनुशासित रहती हैं और एक-एक कण संकट के समय के लिए एकत्रित करके रखती हैं। मुसीबतों से नज़रें चुराने से कोई लाभ नहीं होता। इसलिए मानव को उनका साहस-पूर्वक सामना करना चाहिए।

समस्याएं डर व भय से उत्पन्न होती हैं। यदि जीवन में भय का स्थान विश्वास ले ले, तो वे अवसर बन जाती हैं। नेपोलियन हिल पूर्ण  विश्वास के साथ समस्याओं का सामना करते थे और उन्हें अवसर में बदल डालते थे। अक्सर वे ऐसे लोगों को बधाई देते थे, जो उनसे समस्या का ज़िक्र करते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यदि आपके जीवन में समस्या आई है, तो बड़ा अवसर आपके सम्मुख है। सो! उसका पूर्ण लाभ उठाएं और समस्या की कालिमा में स्वर्णिम रेखा खींच दें। हौसलों के सामने समस्याएं सदैव नतमस्तक होती हैं और उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकतीं। इसलिए उनसे भय कैसा?

गंभीर समस्याओं को भी अवसर में बदला जा सकता है। यदि हम समस्याओं के समय मन:स्थिति को बदल दे और सोचें कि वे क्यों, कब और कैसे उत्पन्न हुईं और उसने कितनी हानि हो सकती है… लिख लें कि उनके समाधान मिलने पर उन्हें क्या प्राप्त होगा– मानसिक शांति, अर्थ व उपहार। यदि वे सब प्राप्त होते हैं, तो वह समस्या नहीं, अवसर है और उसे ग्रहण करना श्रेयस्कर है।

आइए! एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति के बारे में जानें कि वह अपना जीवन किस प्रकार व्यतीत करता था। वह अपने दिनभर की मानसिक समस्याएं अपने दरवाज़े के सामने वाले पेड़ ‘प्राइवेट ट्रबल ट्री ‘ अर्थात् कॉपर ट्री पर टांग आता था और अगले दिन जब वह काम पर जाते हुए उन्हें उठाता और देखता कि 50% समस्याएं तो समाप्त हो चुकी होती थीं और शेष भी इतनी भारी व चिंजाजनक नहीं होती थीं। इससे सिद्ध होता है कि हम व्यर्थ ही अपने मनो-मस्तिष्क पर बोझ रखते हैं; बेवजह की चिंताओं में उलझे रहते हैं। सो! हमें समस्या को अवसर में बदलना सीखना होगा और उन्हें तन्मयता से सुलझाना होगा। उस स्थिति में वे अवसर बन जाएंगी। वैसे भी जो व्यक्ति अवसर का लाभ नहीं उठाता; मूर्ख कहलाता है तथा सदैव भाग्य के सहारे प्रतीक्षा करता रह जाता है। इसलिए मानव को केवल दृढ़-निश्चयी ही नहीं; पुरुषार्थी बनना होगा और अथक परिश्रम से अपनी मंज़िल पर पहुंचना होगा, क्योंकि जीवन में दूसरों से उम्मीद रखना कारग़र नहीं है।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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