हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 115 ☆ अनुस्वार ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण कविता  संतुलन। इस विचारणीय विमर्श के लिए श्री विवेक रंजन जी की लेखनी को नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 115 ☆

? कविता – अनुस्वार ?

चंचला हो

नाक से उच्चारी जाती

मेरी नाक ही तो

हो तुम .

माथे पर सजी तुम्हारी

बिंदी बना देती है

तुम्हें धीर गंभीर .

पंचाक्षरो के

नियमों में बंधी

मेरी गंगा हो तुम

अनुस्वार सी .

लगाकर तुममें डुबकी

पवित्रता का बोध

होता है मुझे .

और

मैं उत्श्रंखल

मूँछ मरोड़ू

ताँक झाँक करता

नाक से कम

ज्यादा मुँह से

बकबक

बोला जाने वाला

ढ़ीठ अनुनासिक सा.

हंसिनी हो तुम

मैं हँसी में

उड़ा दिया गया

काँव काँव करता

कौए सा .

पर तुमने ही

माँ बनकर

मुझे दी है

पुरुषत्व की पूर्णता .

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 69 ☆ हरि इच्छा के आगे ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक सार्थक एवं विचारणीय रचना “हरि इच्छा के आगे ”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 69 – हरि इच्छा के आगे

उम्मीदों का टोकरा लेकर पार्टी में पहुँचे हुए साहब ने देखा कि यहाँ उनकी पूछ- परख कम हो रही है । हमेशा मंच पर बैठने वाले आज दर्शक दीर्घा में बैठकर तालियाँ बजा रहे थे । किसी तरह इस कार्यक्रम को बीतने दो तो आयोजकों की खबर लेता हूँ । वे मन ही मन कहे जा रहे थे कि इतना खर्च कर के आया हूँ, न कोई ढंग का फोटोसेशन न ही मीडिया कवरेज , लगता है खुद ही आगे बढ़कर मोर्चा संभालना होगा ।

सो साहब जी सबकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए आगे आकर बोले , आप सबको आनन्दित होते हुए देखना सचमुच सुखकारी लगता है । मैंने तो आज नए लोगों को मौका दिया है, वे अपनी योजनाओं से अवगत करावें । जहाँ जरूरत होगी वहाँ मैं सहयोग को हाजिर हो जाऊँगा ।

जोरदार तालियाँ बजीं, सबसे अधिक मंचासीन लोगों ने बजाई । कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मनोहर जी ने उन्हें ससम्मान ऊपर बुलाया अब वे भी अपने को विशिष्ट मान रहे थे । दरसल इस तरह के आयोजनों में मुख्य परिचर्चा तो कम ही होती है, सभी लोग केवल अपनी गोटियाँ फिट करने की फिराक में ज्यादा दिखाई देते हैं । पुरस्कारों का लेन देन तो आम बात है किंतु आपसी अचार व्यवहार में कितना सम्मान किसे मिला ये भी नोटिस किया जाता है । जब सिक्का बदलता है तो हिसाब बराबर का होते देर नहीं लगती है ।

लोग क्या कहेंगे इस पर तो हम अपने आपको चलाते ही हैं पर आजकल नए- नए मुद्दे भी इसमें शामिल होते जा रहे हैं । बाकायदा  इवेंट मैनेजर रखा जाता है जिसे सब पहले से ही पता होता है कि कैसा क्या होगा । जिससे रिश्ता बनाकर रखना होता है उसे सबसे पहले और अन्य को उनकी उपयोगिता के आधार पर रखा जाता है । मजे की बात यहाँ उम्र आड़े नहीं आती है बस स्वार्थ सिद्ध होने से मतलब है । वैसे  हम लोग तो प्राचीन काल से ही कर्मयोगी रहे हैं । मैं से दूर होकर कर्म करो, कर्ता बनने की भूल मत करना ये हमें सिखाया गया है । सो हरि इच्छा का जाप करते हुए हमेशा स्थिति के अनुरूप ढल जाने में ही समझदारी दिखती है ।

उम्मीद कायम है …

किसी घटनाक्रम में जब हम सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देते हैं तो स्वतः ही सब कुछ अच्छा होता जाता है। वहीं नकारात्मक देखने पर खराब असर हमारे मनोमस्तिष्क पर पड़ता है।

अभावों के बीच ही भाव जाग्रत होते हैं। जब कुछ पाने की चाह बलवती हो तो व्यक्ति अपने परिश्रम की मात्रा को और बढ़ा देता और जुट जाता है लक्ष्य प्राप्ति की ओर। ऐसा कहना एक महान विचारक का है। आजकल सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा  वीडियो इन्हीं विचारों से भरे हुए होते हैं। जिसे देखो वही इन्हें सुनकर अपनी जीवनशैली बदलने की धुन में लगा हुआ है। बात इतने पर आकर रुक जाती तो भी कोई बात नहीं थी लोग तो सशुल्क कक्षाएँ  भी चला रहे हैं। जिनकी फीस आम आदमी के बस की बात नहीं होती है क्योंकि इन्हें देखने वाले वही लोग होते हैं जो केवल टाइम पास के लिए इन्हें देखते हैं। दरसल चार लोगों के बीच बैठने पर ये मुद्दा काफी काम आता है कि मैं तो इन लोगों के वीडियो देखकर बहुत प्रभावित हो रहा हूँ। अब मैं भी अपना ब्लॉग/यू ट्यूब चैनल बनाकर उसे बूस्ट पोस्ट करूंगा  और देखते ही देखते  सारे जगत में प्रसिद्ध हो जाऊँगा।

इतने लुभावने वीडियो होते हैं कि बस कल्पनाओं में खोकर सब कुछ मिल जाता है। जब इन सबसे मन हटा तो सेलिब्रिटी के ब्लॉग देखने लगते हैं बस उनकी दुनिया से खुद को जोड़ते हुए आदर्शवाद की खोखली बातों में उलझकर पूरा दिन बीत जाता है। कभी – कभी मन कह उठता है कि देखो ये लोग कैसे मिलजुल एक दूसरे के ब्लॉग में सहयोग कर रहे हैं। परिवार के चार सदस्य और चारों के अलग-अलग ब्लॉग। एक ही चीज चार बार विभिन्न तरीके से प्रस्तुत करना तो कोई इन सबसे सीखे। सबको लाइक और सब्सक्राइब करते हुए पूरा आनन्द मिल जाता है। मजे की बात,  जब डायरी लिखने बैठो तो समझ में आता है कि सारा समय तो इन्हीं कथाकथित महान लोगों को समझने में बिता दिया है। सो उदास मन से खुद को सॉरी कहते हुए अगले दिन की टू डू लिस्ट बनाकर फिर सो जाते हैं। 

बस इसी  उधेड़बुन में पूरा दिन तो क्या पूरा साल कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चल बीतता जा रहा है। हाँ कुछ अच्छा हो रहा है तो वो ये कि मन सकारात्मक रहता है और एक उम्मीद आकर धीरे से कानों में कह जाती है कि धीरज रखो समय आने पर तुम्हारे दिन भी बदलेंगे और तुम भी मोटिवेशनल स्पीकर बनकर यू ट्यूब की बेताज बादशाह बन चमकोगे।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 89 – लघुकथा – सहयोग ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण लघुकथा  “सहयोग।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 89

☆ लघुकथा — सहयोग ☆ 

” उसे जरूरी काम है। अवकाश मंजूर कर दो भाई।”

” नहीं करूंगा। वह अपने आपको बहुत ज्यादा होशियार समझता है।” प्रभारी प्राचार्य ने कहा।

” उसकी मजबूरी है। देख लो।”

“उससे कहो- वह मेरी बात मान ले।”

“अरे भाई ! वह नास्तिक है। आपकी बात कैसे मान  सकता है? ” उसके साथी ने सिफारिश करते हुए कहा।

” उससे कहो- ताली एक हाथ से नहीं बजती है,”  प्राचार्य ने विजय मुद्रा में मुस्कुराते हुए कहा,”  वह मंदिर-निर्माण के लिए दान दे कर मेरा सहयोग करें तब मैं उस का अवकाश मंजूर कर के उसका सहयोग करूंगा।”

यह निर्णय सुनते ही उसका साथी चुप हो गया।

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

17-08-21

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – [email protected]

मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 77 ☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – षोडशोऽध्यायः ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । 

आज से हम प्रत्येक गुरवार को साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत डॉ राकेश चक्र जी द्वारा रचित श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। कृपया आत्मसात करें । आज प्रस्तुत है षोडशोऽध्यायः

पुस्तक इस फ्लिपकार्ट लिंक पर उपलब्ध है =>> श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 77 ☆

☆ श्रीमद्भगवतगीता दोहाभिव्यक्ति – षोडशोऽध्यायः ☆ 

स्नेही मित्रो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत गीता का अनुवाद मेरे द्वारा श्रीकृष्ण कृपा से दोहों में किया गया है। पुस्तक भी प्रकाशित हो गई है। आज आप पढ़िए सोलहवाँ अध्याय। आनन्द उठाइए। ??

– डॉ राकेश चक्र।।

☆ सोलहवाँ अध्याय – दैवीय और आसुरी स्वभाव ☆

श्रीकृष्ण भगवान ने इस अध्याय में अर्जुन को दैवीय व आसुरी स्वभाव के बारे में ज्ञान दिया। दो प्रकार के मनुष्य भगवान ने वर्णित किए हैं, एक दैव प्रकृति के तथा दूसरे आसुरी प्रवत्ति के। उनके गुण व अवगुण भगवान ने बताए हैं –

 

दैवीय मनुष्यों  के गुण इस प्रकार हैं

 

दैव तुल्य हैं जो मनुज,दैव प्रकृति सम्पन्न।

भरतपुत्र! होते नहीं, वे ईश्वर से भिन्न ।। 1

 

आत्म-शुद्ध आध्यात्म से,हो परिपूरित ज्ञान।

संयम अनुशीलन करे,सदा सुपावन दान।। 2

यज्ञ, तपस्या भी करें, पढें शास्त्र व वेद।

सत्य, अहिंसा भाव से, करें क्रोध पर खेद।। 2

 

शान्ति, क्षमा,करुणा,रखें,हो न हृदय में भेद।

लोभ विहीना ही रहें, करें दया, रख तेज।। 3

लज्जा हो , संकल्प हो, मन से रहे पवित्र।

यश की करे न कामना, धैर्य , प्रेम हो मित्र।।3

 

दम्भ, दर्प, अभिमान सब,हैं आसुरी स्वभाव।

क्रोधाज्ञान, कठोरता, देते सबको घाव।। 4

 

दिव्य गुणी देते रहे, मानव तन को मोक्ष।

वृत्ति आसुरी दानवी, माया करे अबोध।। 5

 

दो प्रकार के हैं मनुज, असुर,दूसरे देव।

दैवीय गुण बतला चुका, सुनलो असुर कुटेव।। 6

 

भगवान ने असुर स्वभाव के मनुजों के बारे में बताया है—

 

वृत्ति आसुरी मूढ़ नर, रखते नहीं विवेक।

हो असत्य,अपवित्रता, नहीं आचरण नेक।। 7

 

मिथ्या जग को मानते, ना इसका आधार।

सृष्टा से होकर विमुख,करते भोगाचार।। 8

 

आत्म-ज्ञान खोएँ असुर, चाहें दुर्मद राज।

बुद्धिहीन बनकर सदा, करें न उत्तम काज।। 9

 

मद में डूबें गर्व से , झूठ प्रतिष्ठा चाह।

मोह-ग्रस्त संतोष बिन, सबको करें तबाह।। 10

 

इन्द्रिय के आश्रित रहें,जानें केवल भोग।

चिन्ता करते मरण तक, रहते नहीं निरोग।। 11

 

इच्छाओं की चाह में, करें पाप के काम।

मुफ्त माल चाहें सदा, क्रोध करें अतिकाम।। 12

 

असुरों के स्वभाव के बारे में भगवान ने बताया——–

 

 व्यक्ति आसुरी सोचता, धन भी रहे अथाह।

वृद्धि उत्तरोत्तर करूँ, बस दौलत की चाह।। 13

 

मन में रखते शत्रुता, करें शत्रु पर वार।

सुख सुविधा चाहें सभी, सोचें मैं संसार।। 14

 

करें कल्पना मैं सुखी, मैं ही सशक्तिमान।

मुझसे बड़ा न कोय है, करें सभी सम्मान।। 15

 

चिन्ता कर, उद्विग्न रह, बँधे मोह के जाल।

चाहें इन्द्रिय भोग सब, बढ़ें नरक के काल।। 16

 

श्रेष्ठ मानते स्वयं को, करते सदा घमण्ड।

विधि-विधान माने नहीं, जकड़े मोह प्रचंड।। 17

 

अहंकार, बल, दर्प से, करते काम या क्रोध।।

प्रभु ईर्ष्या कर रहे , सत से रहें अबोध।।18

 

क्रूर , नराधम जो मनुज, और बड़े ईर्ष्यालु।

प्राप्त अधोगति को हुए , ईश न होयँ कृपालु।। 19

 

प्राप्त अधोगति को हुए, असुर प्रवृत्ति के लोग।

बार-बार वे जन्म लें, भोगें फल का भोग।। 20

 

तीन नरक के द्वार, काम, क्रोध सँग लोभ।

बुद्धिमान को चाहिए, कर लें इनसे क्षोभ।। 21

 

नरक द्वार से जो बचें, उनका हो कल्यान।

प्राप्त परमगति को करें, बढ़े सदा सम्मान।।22

 

जो जन शास्त्रादेश की,नहीं मानते बात।

उन्हें मिली सुख-सिद्धि कब, मिलती तम की रात।। 23

 

शास्त्र पढ़ें, उनको गुनें, जानें सुविधि- विधान।

उच्च शिखर पर पहुँचते, होता है कल्यान।। 24

 

इति श्रीमद्भगवतगीतारूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन संवाद में ” दैवीय और आसुरी स्वभाव ब्रह्मयोग ” सोलहवाँ अध्याय समाप्त।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

[email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 79 – बाप्पा…! ☆ श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #79 ☆ 

☆ बाप्पा…! ☆ 

बाप्पा तुझा देवा घरचा पत्ता

मला तू ह्या वर्षी तरी

देऊन जायला हवा होतास..

कारण..,

आता खूप वर्षे झाली

बाबांशी बोलून

बाबांना भेटून…

ह्या वर्षी न चूकता

तुझ्याबरोबर बांबासाठी

आमच्या खुशालीची

चिठ्ठी तेवढी पाठवलीय

बाबा भेटलेच तर

त्यांना ही

त्याच्यां खुशालीची चिठ्ठी

माझ्यसाठी

पाठवायला सांग…

बाप्पा…,

त्यांना सांग त्याची चिमूकली

त्यांची खूप आठवण काढते म्हणून

आणि आजही त्यांना भेटण्यासाठी

आई जवळ नको इतका हट्ट

करते म्हणून…,

बाप्पा तू दरवर्षी येतोस ना तसच

बाबांनाही वर्षातून एकदातरी

मला भेटायला यायला सांग..,

तुझ्यासारखच…,त्यांना ही

पुढच्या वर्षी लवकर या..

अस म्हणण्याची संधी

मला तरी द्यायला सांग…,

बाप्पा.., पुढच्या वर्षी तू…

खूप खूप लवकर ये..

येताना माझ्या बाबांना

सोबत तेवढ घेऊन ये…!

 

© सुजित कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #100 – आदमी सूरजमुखी सा…. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा रात  का चौकीदार” महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता  “आदमी सूरजमुखी सा….”। )

☆  तन्मय साहित्य  #100 ☆

☆ आदमी सूरजमुखी सा…. ☆

हवाओं के साथ, रुख बदला नया है

आदमी, सूरजमुखी  सा  हो  गया है।

 

दोष देने में लगे हैं,  खेत को ही

घुन खाए बीज, कोई  बो  गया है।

 

सोचना, नीति – अनीति व्यर्थ अब

संस्कृति संस्कार घर में खो गया है।

 

संयमित  हो कर, घरों  में  ही  रहें

खिड़कियों के काँच मौसम धो गया है।

 

सियासत के  चक्रव्यूह  की कैद से

फिर कभी छूटे नहीं, जो भी गया है।

 

फेन, फ्रिज, कूलर, सभी  चालु तो है

कौन सा भय फिर कमीज भिगो गया है।

 

अब  बचा  नहीं  पाएंगे, मन्तर  उसे

रात उसकी छत पे उल्लू रो गया है।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ #82 – शिक्षक दिवस एवं “स्मार्ट क्लास ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है।आज प्रस्तुत है श्री अरुण डनायक जी के  शिक्षक दिवस से सम्बंधित संस्मरण  शिक्षक दिवस एवं “स्मार्ट क्लास)

☆ जीवन यात्रा #82 – शिक्षक दिवस एवं “स्मार्ट क्लास” ☆ 

विगत 5 सितम्बर को ही में हम सब ने शिक्षक दिवस मनाया। भारत के यशस्वी राष्ट्रपति डा.सर्वपल्ली राधा कृषणन (5 सितम्बर 1888 – 17 अप्रैल 1975) का जन्म दिन था।  वे शिक्षाविद थे और महात्मा गांधी के कहने पर भारतीय राजनीति में आए। सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि अखिल भारतीय कांग्रेसजन भी  यह चाहते थे कि उन्हे गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जायें। स्वतन्त्रता के बाद उन्हें  संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक के समय कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये। जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 14 – 15 अगस्त 1947 की रात्रि को उस समय किया जाये जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वे अपना सम्बोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें। क्योंकि उसके पश्चात ही नेहरू जी के नेतृत्व में संवैधानिक संसद द्वारा शपथ ली जानी थी।  वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे । उन्होंने महात्मा गांधी पर दो विषद ग्रंथों  का सम्पादन किया गांधी अभिनंदन ग्रंथ (वर्ष 1939 ) और गांधी श्रद्धांजलि ग्रंथ (वर्ष 1955 )। उनके इन्हीं अनेक गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। पंडित नेहरू ने उनको मान  सम्मान दिया,  पहले उपराष्ट्रपति और फिर  राष्ट्रपति निर्वाचित करवाने में अपने पद का  या अंग्रेजी में कहें तो गुड आफिसेस का उपयोग किया। उन्हे श्रद्धापूर्वक नमन।

वर्ण व्यवस्था की माने तो हमारे परिवार का पेशा  होना चाहिए था अध्ययन अध्यापन, पठन पाठन। पर विगत दस-बारह  पीढ़ियों में हमारे परिवार का पेशा  शिक्षण कार्य तो नहीं रहा। हमारे पुरखे जो गुजरात से पन्ना आए वे पहले तो सामाजिक व्यवस्था में निर्यायक  या दंडनायक की भूमिका निभाते रहे और इसीलिए हमारा उपनाम डनायक  हुआ।  फिर तीन पीढ़ियों ने हीरा और अनाज विक्रय  आदि का व्यवसाय किया और अब भूत-वर्तमान चार पीढ़िया नौकरी कर जीवन यापन कर रही हैं। उनमें से कुछ शिक्षक भी हैं ।

मेरी, माँ स्व श्रीमती कमला डनायक, विवाह के पूर्व जैन प्राथमिक शाला दमोह में पढ़ाती थी, बाबूजी के दो चचेरे भाई स्व श्री भगवान शंकर डनायक उनकी भार्या स्व श्रीमती तारा  व श्री केशव राम एवं  उनकी अर्धागनी  श्रीमती उषा डनायक सेवानिवृति तक हमारे पैतृक नगर पन्ना में शिक्षक रहे।  बाबूजी के एक अन्य चचेरे भाई श्री श्याम शंकर डनायक, हमारे परिवार में प्रथम स्नातकोत्तर तक शिक्षित,  ने भी अपनी आजीविका  की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में तो की  पर बाद को वे रेलवे में नौकरी करने लगे । लेकिन सेवानिवृति के बाद कुछ साल तक वे सतना में अर्थ-शास्त्र पढ़ाते रहे ।  मेरी, एक बहन रीता पण्ड्या,  केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका रही तो अनुज, अतुल कुमार डनायक भी उच्चतर माध्यमिक शाला में प्राचार्य बना और वर्तमान में राज्य शिक्षा केंद्र में संयुक्त निदेशक के रूप में शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में अपनी भूमिका निभा रहा है ।  मेरे एक चचेरे भी रवि शंकर केशव राम डनायक  भी शिक्षक हैं। मेरी पुत्र वधू श्रुति सेलट डनायक ने पहले मुंबई और फिर अमेरिका और कनाडा में शिक्षक के दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया है।  मेरे चचेरी बहनें भावना मेहता (पुत्री श्री  केशव राम डनायक ) व सोनाली ठाकर  (आत्मजा स्व श्री  भगवान शंकर डनायक ) भी शिक्षक हैं और भौतिक विज्ञान व गणित  जैसे कठिन विषयों को पढ़ाने में पारंगत हैं। 

इन्ही भाइयों और काका–काकी की प्रेरणा से मैं भी सेवानिवृति के बाद स्कूली शिक्षा से  जुड़ा । और जन सहयोग, जिसका अधिकांश हिस्सा मेरे साथियों, स्टेट बैंक  से सेवानिवृत अधिकारियों व अन्य सेवनिवृत मित्रों  ने आर्थिक सहयोग के रूप में दिया था के द्वारा 27 विद्यालयों में स्मार्ट क्लास शुरू करवाने में सफलता पाई । कोरोना संक्रमण ने हमारे इस अभियान को अल्प विराम दिया है।  आशा की किरणे  धूमिल नहीं हुई हैं, कभी फिर यह सपना आकार लेगा। अमरकंटक के माँ सारदा  कन्या विद्या  पीठ की बैगा आदिवासी बालिकाओं को तो कभी कभार मैंने पढ़ाने का असफल प्रयत्न भी किया।  जब इन बच्चियों को मैं पढ़ाता हूँ तो मुझे मेरी माँ की याद आती है।  हम भाई बहनों ने अपने चरवाहे के पुत्र सबलू को शिक्षित करने की ठानी।  एक सप्ताह तक प्रयास करने पर भी हम उसे अ लिखना भी नहीं सिखा  सके।  और तब मेरी माँ ने स्लैट पेंसिल उठाई और दो दिनों में उस अबोध आदिवासी बालक को ‘सबलू ‘ लिखना सिखा दिया।

तो आज शिक्षक दिवस पर मेरी प्रथम गुरु हमारी मां  कमला डनायक , परमेश्वर रूपी गुरु पिता रेवाशांकर डनायक, परिवार के शिक्षक व्यवसाय से जुड़े काकाजी, काकी, को सादर नमन।  मेरे सभी शिक्षकों , परिवार के शिक्षक व्यवसाय से जुड़े, भाइयों और बहनों जिनका उल्लेख मैंने ऊपर किया है, 27 विद्यालयों के शिक्षकों जहां जन सहयोग से  स्मार्ट क्लास शुरू की गई, मेरे शिक्षक मित्र डाक्टर मनीष दुबे, स्मार्ट क्लास के प्रणेता दिव्य दम्पत्ति ( दिव्य प्रकाश और मीनाक्षी सिंह ) तथा इन शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों को शुभकामनाएं।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 103 ☆ प्रार्थना ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

? साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 103 ?

☆ गझल ☆

चंद्र परका चांदणेही पाहवेना

आजची कोजागरी का पेलवेना 

 

सोनचाफा आवडीचा फार माझ्या

मात्र आता गंध त्याचा साहवेना

 

वेढते वैराग्य की वय बोलते हे

वाट आहे तीच आता चालवेना

 

फोन माझा, चार वेळा टाळला तू

या मनाला काय सांगू सांगवेना

 

खूप झाला त्या  तिथेही  बोलबाला

मूक अश्रू ढाळलेले ऐकवेना

 

पूर्वजांचे मानले आभार मी ही

कंठ दाटे या क्षणाला बोलवेना

 

कावळा आलाय दारी घास खाण्या

आप्त आहे पण मला हे मानवेना

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी क्रमांक- १२ – भाग ५ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मी प्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक- १२ – भाग ५ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

✈️ऐश्वर्यसंपन्न पीटर्सबर्ग✈️

संध्याकाळी रिव्हर क्रूजमधून फेरफटका मारला. फोंटांका नदीच्या एका कॅनॉल मधून सुरू झालेली क्रूज, मोइका नदीतून, विंटर कॅनॉलमधून नीवा नदीमध्ये गेली आणि पुन्हा फोंटांकाच्या एका कालव्यात शिरून आम्ही किनार्‍याला उतरलो. क्रूज सहलीमध्ये दुतर्फा दिसलेल्या इमारती आता ओळखीच्या झाल्या होत्या. क्रूजमधील प्रवासाने सुंदर पीटर्सबर्गचा निरोप घेतला.

जिंकलेल्या प्रदेशातील उत्तमोत्तम गोष्टींचा विध्वंस करण्याची जेत्यांची प्रवृत्ती जगभर आढळते. पीटर्सबर्गमधील अनेकानेक कला प्रकार, प्रासाद शत्रूंनी नष्ट केले. पण आज ते ऐश्वर्य पुन्हा जसेच्या तसे दिमाखात उभे आहे. याची कारणे अनेक आहेत. पीटर दी ग्रेटपासून अशी पद्धत होती की, जी जी कलाकृती, पेंटिंग निर्माण होईल त्याचा छोटा नमुना व त्याची साद्यंत माहिती म्हणजे वापरलेले मटेरियल, त्याची रचना, मोजमाप वगैरे आर्काइव्हज मध्ये जतन करून ठेवण्यात येत असे. सर्वात महत्त्वाचे म्हणजे पीटर्सबर्गमध्ये जशा अनेक नामांकित शैक्षणिक संस्था, सायन्स इंस्टिट्यूशन्स आहेत तशीच एक रिस्टोरेशन युनिव्हर्सिटी आहे. वेळेअभावी आम्ही ती पाहू शकलो नाही. पण नष्ट झालेल्या कलाकृतींचे पुनर्निर्माण आणि असलेल्या वस्तू आणि वास्तू सुस्थितीत ठेवण्यासाठी तिथे खास शिक्षण दिले जाते. याशिवाय राज्यकर्त्यांचा दृष्टिकोण आणि आर्थिक पाठबळ हेही महत्त्वाचे!

या पार्श्‍वभूमीवर आपल्याकडे काय परिस्थिती आहे? आपल्याकडेही अनेक नामवंत, उत्तमोत्तम चित्रकार, शिल्पकार, काष्ठ कलाकार आहेत. सर्वश्री बाबुराव सडवेलकर,व्ही. एस. गुर्जर,ज. द. गोंधळेकर, जाधव, शिंदे, शिल्पकार करमरकर,स.ल.हळदणकर,राजा रविवर्मा, रावबहादूर धुरंधर,एम.आर.आचरेकर, गोपाळराव देऊसकर, विश्वनाथ नागेशकर, भैय्यासाहेब ओंकार, डी. जी. कुलकर्णी, संभाजी कदम अशी असंख्य नावे आहेत. काही वर्षांपूर्वी नामवंत चित्रकार सुहास बहुलकर यांचा  लेख एका दिवाळी अंकात वाचला होता. दिवंगत नामवंत कलाकारांच्या कलाकृती मिळवून, त्याचे पुनर्लेपन,वॉर्निशिंग, माउंटिंग करून त्यांचे प्रदर्शन भरविणे व त्यायोगे कलाकाराच्या कुटुंबाला आर्थिक सहाय्य मिळवून देणे अशा उद्देशाने त्यांनी अनेक कलाकारांच्या,  माळ्यावर धूळ खात पडलेल्या कलाकृती मोठ्या कष्टाने मिळविल्या. त्यावेळी त्यांना आलेले अनुभव मन विषण्ण करणारे, निराशाजनक होते. वर्तमानपत्रातून जे.जे. महाविद्यालयातील चित्रांची, पुतळ्यांची हेळसांड, बेपर्वा वृत्ती, राजकारण हे सारे वाचून वाईट वाटते. हा आपला राष्ट्रीय ठेवा आहे. कलाकारांना आर्थिक काळजीतून मुक्त ठेवणे हे समाजाचे, सरकारचे काम आहे. या चित्रांचा, कलाकृतींचा सांभाळ, डागडुजी,पुनर्लेपन, वॉर्निशिंग,जपणूक, यासाठी शास्त्रोक्त शिक्षण आवश्यक आहे. हे एकट्या-दुकट्याचे काम नाही. राजकारण विरहीत राजकीय इच्छाशक्ती, आर्थिक पाठिंबा व सामान्य नागरिकांचा सहभाग असेल तरच हे सांस्कृतिक वैभव सांभाळले जाईल. आपला भारत हा सुद्धा ‘ऐश्वर्यसंपन्न’ देश आहे. प्रत्येकाने हे ऐश्वर्य सांभाळण्याचा आटोकाट प्रयत्न केला पाहिजे.

पीटर्सबर्ग समाप्त

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 89 ☆ मीनारें ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता “मीनारें । )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 89 ☆

☆ मीनारें ☆

जब अपने कमरे के अन्दर चुपचाप बैठी होती हूँ

अक्सर “धडाक” और “चटक” की आवाजें आती हैं;

और मैं बाहर दौड़ पड़ती हूँ देखने कि यह कैसी आवाजें हैं?

जानना चाहती हूँ कि कहाँ से निकलीं यह आवाजें?

 

ज़िंदगी यूँ तो बड़ी छोटी है,

पर आदमी अक्सर अपने अहम की मीनारें बना लेता है,

जो कि बहुत ही ऊंची होती हैं!

 

यह मीनारें धीरे-धीरे झुकने लगती हैं,

और आदमी को पता भी नहीं चलता!

ऐसा भी नहीं है कि इनका कोण

लीनिंग टावर ऑफ़ पीसा कि तरह तय हो

और उतना ही रहे यह कोण-

झुकाव बढ़ता ही जाता है!

पता भी नहीं चलता

और यह मीनारें झुकते-झुकते गिर ही जाती हैं

“धडाक” और “चटक” की आवाज़ के साथ! 

 

सुनो,

इस अहम को छोटा ही रहने दो-

इसे मीनार की तरह न बनने दो-

फिर तो

न यह गिरेगा,

न तुम चोट से तिलमिलाओगे!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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