मराठी साहित्य – सूर संगत ☆ सूर संगत~महाराष्ट्राची लोककला – पोवाडा ☆ सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

 

? सूरसंगत ?

☆ सूर संगत~महाराष्ट्राची लोककला – पोवाडा ☆ सुश्री अरूणा मुल्हेरकर ☆ 

वीर रसांतील लेखनाचा आणि गायनाचा महाराष्ट्रातील लोकप्रिय प्रकार म्हणजे पोवाडा.

पोवाड्यांत तीन प्रकारची कवने आढळतात

  1. देवतांच्या अद्भूत लीलांचे वर्णन,तीर्थक्षेत्रांचे महात्म्य. – >> हे गायक गोंधळी म्हणून ओळखले जातात.
  2. राजे,सरदार,धनिक यांचे पराक्रम,वैभव,कर्तुत्व इत्यादीचा गौरव आणि त्यांची शौर्य गाथा! ->> ह्या प्रकारातील गायक मंडळीना भाट म्हटले जाते.
  3. लढाई,दंगा,दरोडा,दुष्काळ,पूर आदि घटनांचे रसभरीत निवेदन. ->> ह्या प्रकारातील गायक शाहीर या संज्ञेत मोडतात.

पोवाड्याचे कार्य काही अंशी आजच्या वर्तमानपत्रासारखे होते. घडलेल्या घटनांवर शाहीर लगेचच कवने रचीत आणि पोवाड्याच्या स्वरूपात सादर करीत असत.

पोवाड्याची रचना द्दृष्य वाक्यांची प्रवाही व स्वैर पद्यात्मक असते.बोली भाषेतील जिवंतपणा,ओघ आणि लय ह्यामुळे ती प्रभावी होते.

रचना करतांना लघु गुरू मात्रा मोजल्या जात नाहीत मात्र एकेक चरण चार किंवा आठ मात्रांच्या आवर्तनात गायले जातात.

वीरश्रीयुक्त असा हा गायनाचा प्रकार असल्यामुळे गायकाचा आवाज एकदम खडा,उमदा,टीपेचा असला तरच रसनिष्पत्ती होऊन श्रोतृवृंदात एकप्रकारचा आवेश निर्माण होतो.हा प्रकार गद्य आणि पद्यमिश्रित असल्यामुळे उच्चरवातील संवाद व दमदार गायन हे पोवाड्याचे वैशिष्ठ्य आहे.

शिवाजी, महाराष्ट्राचा जाणता राजा, सर्वांना आदरणीय, त्यामुळे शिवछत्रपतींचे अनेक पोवाडे सतराव्या शतकापासून ते आज एकविसाव्या शतकापर्यंत लिहीले गेले. १६८९ साली शाहीर अज्ञानदासाने जिजाऊंच्या आदेशावरून “अफझलखानाचा वध” हा पोवाडा रचला आणि २००९ साली मी शिवाजीराजे भोसले बोलतो या चित्रपटासाठी अफझलखानाचा वध हा पोवाडा लिहिला गेला.

पोवाड्याची भाषा कशी जळजळीत,तडफदार आणि रांगडी असते त्याचा हा नमूना.

“उठला अफझलखान

जिता जागता सैतान

शिवबाला टाकतो चिरडून?

महाराजांची कीर्ति बेफाम

भल्याभल्यांना फुटला घाम

अशा वाघिणीचा तो छावा

गनिमाला कसा ठेचावा”

तानाजी मालुसरे, बाजीप्रभू देशपांडे, सिंहगड, धर्मवीर संभाजी महाराज यांच्यावर लिहिलेले पोवाडे उपलब्ध आहेत.

राष्ट्र शिवशाहीर बाबासाहेब देशमुख यांनी तानाजीच्या पोवाड्याप्रारंभी जे नमन गायले आहे ते पहा~~

“ओम् नमो श्रीजगदंबे

नमन तुज अंबे

करून प्रारंभे

डफावर थाप तुणतुण्या तान

शाहीर हा महाराष्ट्राचा प्रान

शिवरायाचे गातो गुनगान”

ह्यावरून शाहीराची भूमिका आपल्याला समजते.

डफ,ढोलकी,संबळ,झांजा ही तालवाद्ये तसेच तुणतुणे,पूंगी,घांगळी ही तंतूवाद्ये पोवाडा गाताना साथीला घेतली जातात.

पठ्ठे बापूराव,रामजोशी,कवी अनंतफंदी,होनाजी बाळा,प्रभाकर आणि अगदी आधुनिक काळात अमरशेख,शाहीर साबळे,विठ्ठल उमप इत्यादी शाहीरांची नावे आपल्याला परिचित आहेतच.

पठ्ठे बापूरावांनी मुंबईवर पोवाडा लिहिला होता आणि संगीत सौदागर छोटा गंधर्व यांनी तो गायला होता.

वाचकांसाठी काही पंक्ति देत आहे.

“मुंबई नगरी बडी बाका

जशी रावणाची दुसरी लंका

मुंबई नगरी सदा तरनी

व्यापार चाले मनभरनी”

शाहीर विठ्ठल उमप हे आंबेडकरवादी होते.त्यांनी त्यांच्या रचनांतून अनेक सामाजिक व मानवतावादी प्रश्न मांडले. ‘खंडोबाचं लगीन’,’गाढवाचं लग्न’,’जांभूळ आख्यान’ हे त्यांचे कार्यक्रम फार लोकप्रिय झाले आहेत.

महाराष्ट्राची ही लोककला म्हणजे नुसतेच लोकरंजन नसून समाजप्रबोधनही आहे.

©  सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 91 – हाइकु ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

वरिष्ठ साहित्यकार एवं अग्रज श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके कुछ अप्रतिम हाइकु’। )

☆  तन्मय साहित्य  # 91  ☆

 ☆ हाइकु ☆

 

व्याकुल पंछी

उड़ने को आकाश

छोड़ दें रास।

        *

मन बेचैन

संसाधनों के बीच

कहाँ है चैन।

         *

हंसते रहे

मन की बेचैनियाँ

किससे कहें।

        *

सुबह होगी

रात से निबाह लें

उजाले देगी।

       *

भूल गए हैं

जीवन के मर्म को

धर्म कर्म को।

        *

भटक गए

विलासी बाजार में

अटक गए।

       *

शिथिल हुए

समूचे अंग जब

समझे तब।

      *

काम न धाम

बुढ़ापे में बादाम

नहीं पचते।

       *

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #75 – 12 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. पर्यटन आपकी एक अभिरुचि है। इस सन्दर्भ में श्री अरुण डनायक जी हमारे  प्रबुद्ध पाठकों से अपनी कुमायूं यात्रा के संस्मरण साझा कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है  “कुमायूं  – 12 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ”)

☆ यात्रा संस्मरण ☆ कुमायूं #76 – 12 – जिम कार्बेट राष्ट्रीय वन अभ्यारण्य ☆ 

जब से भारत में शहरीकरण बढ़ा है और विकसित होते  व्यवसायिक केन्द्रों में युवा पीढी अपने सपनों को साकार करने हाड़-तोड़ मेहनत कर रही है तो उन्हें मानसिक सूकून देने पर्यटन के क्षेत्र में भी एक नई क्रान्ति हुई है । यह क्रान्ति है, प्रकृति के नज़दीक तेजी से, कुकुरमुत्तों की भाँती उगते हुए रिसार्टों की । शहर की जिन्दगी से दूर , हरी भरी वादियों, नदियों और समुद्री किनारों के बीच बने  इन खूबसूरत  होटलों में,  जहाँ एक ओर रहन-सहन की आधुनिक सुविधाएं है, शहर की कोलाहल व  भागदौड़ भरी जिन्दगी से मुक्ति है तो दूसरी ओर उनके गतिविधि केंद्र या एक्टिविटी सेंटर मनोरंजन के लिए अनेक गतिविधियों को भी संचालित करते हैं और  साहस व रचनात्मकता से भरपूर यह गतिविधियाँ सभी उम्र के लोगों के लिए होती हैं, जिससे परिवार की तीन पीढियां एक साथ अवकाश के क्षणों का लुत्फ़ उठा सकती हैं ।

कोशी नदी, जिसका पौराणिक नाम  कौशिकी है के किनारे,  क्लब महिन्द्रा द्वारा संचालित, कार्बेट रिसार्ट, जहाँ हम ठहरे थे, ऐसी अनेक गतिविधियों का संचालन, अपने सदस्य अतिथियों के मनोरंजनार्थ सुबह से देर शाम तक करता रहता है । और जब कोई ग्यारह बजे हमने उनके एक्टिविटी सेंटर में  संपर्क किया तो पता चला कि नेचर वाक व सायकल चालन का आयोजन वे सुबह-सुबह करते हैं और दोपहर में विलेज वाक का मजा लिया जा सकता है । नेचर वाक का मजा तो मैं पिछली यात्रा के दौरान नौकुचियाताल में ले चुका था और अगले दिन यानी 29 नवम्बर की सुबह इस हेतु मैं जाने ही वाला था तथा बढ़ती उम्र के साथ सायकिल चलाना तो लगभग भूल ही चुका था, और ऐसा अनुभव मैंने एक्टिविटी सेंटर में खडी सायकिल को थोड़ी दूर चलाकर कर भी लिया, इसीलिए हमने विलेज वाक या ग्राम भ्रमण पर जाने का निर्णय लिया ।

हम लोग, एक गाइड के साथ जिप्सी में सवार होकर, गाँव की ओर चल पड़े । रिसार्ट से कोई दस किलोमीटर दूर सड़क के किनारे बसे एक गाँव में जब गाइड ने हमें उतरने को कहा तो एकबारगी लगा कि सड़क के किनारे बसे गाँव देखकर क्या मिलेगा । पर जैसे ही गाइड आगे बढ़ा और हम शनै-शनै रिंगौडा गांव की उबड़ खाबड़  गलियों से होकर गुजरने लगे तो आनंद दुगना होता चला  गया । हमारा भ्रमण हमें प्रकृति के नजदीक ले जा रहा था । प्रकृति द्वारा निर्मित कच्चा  मार्ग, उसके किनारे खड़े ऊंचे ऊंचे वृक्ष हमें मोह रहे थे । बीच-बीच में गाइड हमें बताता जाता था कि साहब यह साल का वृक्ष  है जो सालभर हराभरा रहता है, देखिये यह बेलपत्र का पेड़ है, इसके पत्ते छोटे हैं और यह बेलपत्र  आपके यहाँ की बड़े पत्तों वाली  प्रजाति जैसा नहीं है, यह हल्दू है जैसा नाम वैसा गुण, इसका तना अन्दर से पीले रंग का होता है । इतने में उसने कुछ और बृक्षों की ओर इशारा किया और मैं भी ठहरा वनस्पति  शास्त्र का पुराना विद्यार्थी, झट से बोल उठा हाँ भाई यह शीशम और सागौन के पेड़ हैं, सबसे अच्छी इमारती लकड़ी इन्ही से मिलती है ।  हम कुछ दूर चले ही थे कि एक विशाल बरगद के वृक्ष ने हमारा स्वागत किया । इस वृक्ष  के नीचे गिर ग्राम देवी विराजित हैं जो  ग्रामीणों की श्रद्धा व पूजा  का केंद्रबिंदु  है । बरगद के निकट ही एक बरसाती नाला था और बरगद की फैलती जड़ों ने भू स्खलन को रोक दिया था, जहाँ इस बड़े बृक्ष की जड़ें नहीं फ़ैली थी वहाँ से मिट्टी का कटाव स्पष्ट दिखता था । तनिक आगे, ढलान पर  एक सुन्दर दृश्य हमारा इन्तजार कर रहा था, पानी का झरना, गाँव से कोई दो किलोमीटर दूर,ग्रामीणों के लिए वर्ष भर जल का एक मात्र स्त्रोत । पहाड़ी क्षेत्रों में यही हाल है, उन्हें आज भी पेय जल लाने के लिए लम्बी दूरियाँ तय करनी पड़ती है लेकिन पहाड़ी महिलाएं इस जिम्मेदारी को प्रसन्नता पूर्वक तेज गति से निपटाती है । इस झरने का पानी बहुत ही मीठा था और बिस्लहरी या आरओ के पानी को भी मात कर रहा था । हम सब ने एक-एक चुल्लू पानी पिया और रिंगौडा गांव के  जीरो प्वाइंट की ओर चल दिए , सामने धीर गंभीर, कलकल  नाद करती हुई कोशी नदी बह रही थी और साल के दो विशाल बृक्षों के मध्य खड़े होकर जब हमने ऊपर, आसमान  की ओर देखा तो एक विरल-सघन आबादी का शहर दिखाई दिया, गाइड ने हमें बताया कि यह नैनीताल की वादियाँ हैं । इस नैसर्गिक  व्यु को हमें बहुत देर तक निहारते रहे और फिर दूसरे मार्ग से आगे बढ़ गए । एक कुटी के सामने, शुद्ध कुमायुनी अंदाज में हमारा स्वागत करने,  विमला आरती का थाल लिए खडी थी । उन्होंने हमें तिलक लगाया, आरती उतारी और फिर प्रेम से अपना घर दिखाया । लेंटाना और  कुरी की  झाड़ियों की फेंसिंग के मध्य सुन्दर बागीचा है जहाँ आम,कड़ी पत्ता,बेलपत्र, आवंला  और सब्जियों की बागवानी के मध्य दो कमरे व एक रसोईघर बनाया हुआ है । मकान के सामने ही कुछ खम्भों  पर  पुआल की छत से एक चबूतरानुमा जगह पर बेंच व टेबल लगाकर भोजन शाला बनाई गई है । यह विमला का स्वरोजगार है- होम स्टे, कुमायुनी भोजन  व जैविक उत्पाद का विक्रय केंद्र । ग्रामीणजन भी  हम शहरियों की मानसिकता अब समझने लगे हैं । यद्दपि चाय की चुस्कियों और कडी-पत्ता व  आलू के पकोड़े खाते हुए मैंने उसकी आर्थिक आमदनी के बारे में तो कुछ नहीं पूछा पर ग्रामीण समस्यायों के बारे में जरुर जानने की कोशिश की । पेय जल की समस्या का जिक्र तो मैं  पहले कर ही चुका हूँ , बिजली के खम्भे गाँव में इसलिए नहीं लगे हैं क्योंकि यह आबादी वन क्षेत्र  के अंतर्गत है लेकिन केंद्र सरकार ने सभी घरों में अनुदान देकर सोलर पेनल लगवा दिए हैं और इससे उत्पन्न ऊर्जा  से ग्रामीण प्रकाश, व हैण्ड-पम्प आदि चलाने की व्यवस्था कर लेते हैं । बच्चे शिक्षित हो रहे हैं यह अच्छी खबर विमला ने हमें दी । वह देर तक हमें अपने किस्से सुनाती रही और हर बार शाम को रुकने व भोजन कर वापस जाने का आग्रह करती रही पर हमें जिप्सी चालक को तय समय पर छोड़ना था सो हम उसके जैविक उत्पादों में से पहाडी लूंण ( एक प्रकार का मसाले दार नमक, कुछ कुछ वैसा ही जैसा बुंदेलखंड के हमारे जैन बंधू प्रयोग में लाते हैं ) व बोतल बंद चटनी क्रय कर अपने ठिकाने लौट आये जहाँ रात्रि का भोजन और बिछौना हमारा इन्तजार कर रहा था ।

पहाड़ के भोलेभाले  ग्रामीणजनों व उनके गावों का उल्लेख जिम कार्बेट ने अपनी किताब My ।nd।a में बख़ूबी किया है । वे लिखते हैं कि “जिस हिन्दुस्तान को मैं जानता हूँ, उसमें चालीस करोड़ लोग रहते हैं, जिनमें से नब्बे फीसदी लोग सीधे-सादे, ईमानदार, बहादुर, वफादार और मेहनती हैं जिनकी रोजाना की इबादत ऊपर वाले से यही रहती है कि उनकी जान-माल की सलामती बनी रहे और वो अपनी मेहनत का फल अच्छे से खा सकें । हिन्दुस्तान के ये वो लोग हैं जो निपट गरीब हैं और जिन्हें अक्सर ‘ हिन्दुस्तान के करोड़ों अधपेटे’ कहा जाता है ।”  जिम कार्बेट को ऐसे हिन्दुस्तानियों से बेपनाह मुहब्बत थी और एक बार ऐसे ही किसी गाँव के लोगों ने आदमखोर शेर से स्वयं को बचाने के लिए जिम कार्बेट को चन्दा जमा करके एक टेलीग्राम भेजा था । इस टेलीग्राम को भेजने के लिए ग्रामीणों का हरकारा कई मील दूर पैदल चलकर पोस्ट आफिस गया था । जिम कार्बेट ने भी इन विश्वासी  ग्रामीणों को निराश नहीं किया और वे, टेलीग्राम मिलते ही  मोकामघाट(बिहार ) से इस गाँव के लिए अपना काम छोड़कर आ गए – एक आदमखोर शेर को मारने के लिए । उन्हें हज़ार मील की लम्बी यात्रा  और लगभग बीस मील पैदल चलकर इस गाँव में पहुंचने में तब एक सप्ताह का समय लगा था । और वह गाँव इन्ही वादियों के मध्य स्थित था । लौटते वक्त हमें जंगल विभाग का वह गेस्ट हाउस भी दिखा जहाँ बाघ के शिकार के लिए आये जिम कार्बेट ने अपनी रातें बिताई थी।

आज़ादी के बाद इन सत्तर सालों में गाँव का नक्शा बदला है, घर अब पक्के हो गए हैं, पहुँच मार्ग और आवागमन के साधनों का जाल बिछा है , मूलभूत सुविधाएं भी सुधरी हैं और ग्रामीण जनों को उपलब्ध हुई हैं । लेकिन एक बात आज भी ठीक वैसी ही है जिसका जिक्र जिम कार्बेट ने My ।nd।a में किया  है और जिसका हिंदी अनुवाद मैंने ऊपर लिखा है।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 42 ☆ उदास जिंदगी ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता ‘उदास जिंदगी। ) 

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 42 ☆

☆ उदास जिंदगी 

ना जाने क्यों आज दिल बहुत उदास है,

किसी नदी किनारे पेड़ की छांव में,

बैठ कर रोने को मन कर रहा है ||

थक गया पहाड़ सी जिंदगी को ढ़ोते-ढ़ोते,

खुद को भूल गया बोझ के तले दब कर,

आज खुद को ढूंढने का मन कर रहा है ||

कितनी उतार-चढ़ाव भरी है जिंदगी,

दुर्गम रास्तों पर चलते हुए अब थक गया हूँ,

जिस्म भी साथ छोड़ने को आतुर हो रहा है ||

कितनी शांत एक लय में बह रही है नदी,

उलझन भरी इस जिंदगी में,

मेरा मन अशांत सा बह रहा है ||

क्या खोया क्या पाया, लेखा जीवन का देखा,

पाया तो थोड़ा कुछ और खोया सब कुछ,

खाता बही में शून्य ही बचा पाया हूँ ||

ना जिंदगी से गिला है ना अपनों से शिकवा,

मैं भी रिश्तों के जुर्म में,

बराबरी की भागीदारी निभा आया हूँ ||

अब जिंदगी में रखा भी क्या है?

कुछ रिश्तें मुझे भूल गए,

कुछ रिश्तों को में भूल आया हूँ ||

 

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 94 ☆ आत्मसाक्षात्कार – भाग -1 ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा सोनवणे जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 94☆

☆ आत्मसाक्षात्कार – भाग -1 ☆ 

आम्ही कुलिनांच्या कन्या

महाराष्ट्र साहित्य परिषदेच्या सभागृहात अखिल भारतीय महिला दिनाच्या निमित्ताने साहित्यदीप संस्थेचं  कवयित्री  संमेलन होतं, सूत्रसंचालन कवयित्री मृणालिनी कानिटकर जोशी करत होती.. मृणालिनी प्रत्येक कवयित्री ची ओळख करून देताना ज्येष्ठ कवयित्रींच्या कवितेतील ओळींचा आधार घेऊन त्या कवयित्रीच्या व्यक्तिमत्वाची ओळख करून देत होती.

मृणालिनीची निवेदनाची ही पद्धत खुपच छान  होती, ती कवितेविषयी न बोलता  कवयित्री विषयी बोलत होती…..माझ्या विषयी बोलताना  ती म्हणाली, प्रभा ताईंना पाहून मला पद्मा गोळेंच्या ओळी  आठवतात, “आम्ही कुलिनांच्या कन्या, चाफेकळ्या पानाआड…….”

मी सुखावले आणि आयुष्याचं  सिंहावलोकन करू लागले….

माझा जन्म सधन शेतकरी-बागाईतदार कुटुंबातला शहाण्णव कुळी मराठा घराणं, आजोबांची पंचक्रोशीत पत प्रतिष्ठा होती. वडील वर्षानुवर्षे गावचे पोलिस पाटील होते. खरंतर आम्ही नगर जिल्ह्यातील पारनेर तालुक्यातल्या वडनेर या गावचे वतनदार पण आजोबांची बहिण पुणे जिल्ह्यातील शिरूर तालुक्यातल्या पिंपरी -वाघाळे या गावातील सरदार पवार यांची पत्नी, सरदार पवार देवास(म.प्र.) येथे वास्तव्य करून होते पण पतिनिधनानंतर आजोबांची बहिण (आम्ही त्यांना मासाहेब म्हणत असू.) त्या त्यांच्या वतनाच्या जमीनी असलेल्या वाघाळे -पिंपरी या गावात आल्या, पवारांचे मामा म्हणून सगळे गाव आजोबांना मामा म्हणत असे. बहिणीच्या गावला आजोबांनी आपली कर्मभूमी मानली, तिथे स्वकष्टाने शेकडो एकर जमीन खरेदी करून तिथे फळांच्या बागा लावल्या. माझा जन्म झाला तो काळ खुप वैभवशाली, ऐश्वर्यसंपन्न काळ होता. आजोबांच्या तीन बहिणी देवास, बडोदा, सूरत येथे राजघराण्यातल्या सूना , माझ्या दोन आत्याही देवास व बडोदा येथील संस्थानिकांच्या घरातच नांदत होत्या.

जमीन जुमला, गाई म्हशी, घोडे, मोठा दगडीवाडा, नोकर चाकर अशा सरंजामशाही वातावरणातला माझा जन्म !त्या गावातला आमचा रूबाब काही वेगळाच होता….पण ते एक लहान  खेडेगाव असल्यामुळे चौथी पर्यंतच शाळा होती म्हणून आम्हा मुलांच्या शिक्षणासाठी माझी  आई माझ्या माँटेसरी पासून पुण्यात आम्हा सख्ख्या चुलत पाच भावंडांना घेऊन  बि-हाड करून राहिली होती.

आम्ही सुट्टीत गावाकडे जात असू, आमच्या वाड्याच्या शेजारी  एक गुजराती कुटुंब रहात होतं, त्यांचं किराणा मालाचं छोटसं दुकान होतं, त्या कुटुंबातल्या चंपा आणि शांतू या मुली वयाने माझ्या पेक्षा मोठ्या होत्या पण मी त्यांच्या घरी जात असे आणि त्या हंड्यावर हंडे घेऊन पाणी आणायला विहिरीवर जात त्याचं मला खुप कौतुक वाटत असे. त्या ओढ्यावर कपडे धुवायला चालल्या की मीही त्यांच्या बरोबर ओढ्यावर जाऊन पाण्यात खेळत असे, एकदा चंपा, शांतू बरोबर ओढ्यावर गेले असताना आमची मोलकरीण कमल मला बोलवायला आली, घरी आल्यावर आजीने समज दिली, “त्या चंपा शांतू बरोबर जात जाऊ नको, गावातले लोक नावं ठेवतील, मोठ्या घरची पोरगी ओढ्यावर हिंडती!”

मृणालिनी कानिटकर म्हटल्या प्रमाणेच, मी जन्माने कुलिनांच्या घरातली कन्या होते हे नक्की!

…….त्याचे फायदे तोटेही अनुभवले

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- [email protected]
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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मराठी साहित्य – मीप्रवासीनी ☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक-६ – सौंदर्य संपन्न आणि संशोधक क्रोएशिया ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

✈️ मीप्रवासीनी ✈️

☆ मी प्रवासिनी  क्रमांक-६ – सौंदर्य संपन्न आणि संशोधक क्रोएशिया ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

टर्की एअरलाइन्सने ऑस्ट्रिया इथे पोहोचलो. ऑस्ट्रियाहून बसप्रवास करून क्रोएशियाची राजधानी झाग्रेब इथे गेलो.  क्रोएशिया हा मध्य युरोपमधील एक छोटासा, सौंदर्यसंपन्न  देश आहे. झाग्रेब हे त्याच्या राजधानीचे शहर सावा नदीच्या काठी एका डोंगररांगांच्या पायथ्याशी वसले आहे.

रोमन काळापासून हे ऐतिहासिक महत्त्वाचे शहर आहे. गाईड बरोबर जुन्या शहराचा फेरफटका केला. एका मोठ्या चौकाच्या  सभोवताली असलेल्या आकर्षक दुकानांतून लोकांची खरेदी चालली होती. खाण्यापिण्याचा आनंद घेणाऱ्यांची गर्दी उसळली होती. पुढील चौकात झाग्रेब शहराचा तेरा चौरस मीटर लांब रुंद असलेला मिश्रधातूमध्ये बनविलेला नकाशा बघायला मिळाला. एका दगडी वेशीच्या कमानदार,उंच दरवाजातून आत गेल्यावर चौदाव्या शतकात बांधलेले सेंट मार्क चर्च दिसले. याचे उतरते छप्पर अतिशय देखणे आहे. छपरावर छोट्या छोट्या लाल व हिरवट टाईल्स चौकटीमध्ये बसविलेल्या आहेत. उजव्या बाजूला लाल-पांढऱ्या टाइल्सचे सोंगट्यांच्या पटासारखे डिझाईन आहे. यापुढे हिरवट रंगाच्या टाईल्स वर तीन सिंह  लाल टाइल्स मध्ये आहेत. चर्चच्या सभोवतालच्या उंच कोनाड्यात बारा धर्मगुरू दगडावर कोरलेले आहेत. हिरव्या सोनेरी रंगाच्या टाईल्सचा बेल टॉवर शोभिवंत दिसतो. एकोणिसाव्या शतकात इथे मोठा भूकंप झाला पण सुदैवाने बेल टॉवर अबाधित राहिले.

‘मार्शल टिटो स्क्वेअर’हा झाग्रेबमधील सर्वात मोठा चौक आहे.रुंद रस्ते, पुतळे, कारंजी, रेस्टॉरंटस्, मॉल्स रंगीबेरंगी फुलांनी सजलेल्या छोट्या बागा यामुळे हा चौक शोभिवंत दिसतो. रस्त्याच्या कडेला असलेल्या अनेक दुकानातून क्रोशाचे विणकाम असलेल्या सुंदर लेस, रुमाल, ड्रेस नजाकतीने मांडले होते. तऱ्हेतऱ्हेचे टाय होते. गाईडने सांगितले की नेकटाय आणि फुटबॉल यांची सुरुवात क्रोएशियाने केली.

झाग्रेबपासून साधारण दोन तासांवर ‘प्लिटविक लेक्स नॅशनल पार्क’ आहे.  अनेक डोंगर, दर्‍या, नद्या, धबधबे, सरोवरे असलेला हा एक खूप मोठा नैसर्गिक विभाग आहे. २९५ चौरस किलोमीटरच्या परिसरात पसरलेला प्लिटविक लेक्स परिसर फार प्राचीन काळापासून म्हणजे हिमयुगानंतर अस्तित्वात आला असे शास्त्रज्ञ म्हणतात. हा संपूर्ण विभाग चुनखडीच्या डोंगरांनी व्यापलेला आहे. या खडकांची सतत झीज होत असते. त्यामुळे डोंगर उतारावर अनेक घळी तयार झाल्या आहेत. त्यातून जलधारा कोसळत असतात. त्यांचे अनेक लहान-मोठे तलाव तयार झाले आहेत. निळ्या-हिरव्या रंगाचं गहिरं पाणी आणि त्यात तरंगणारी पांढऱ्या स्वच्छ कापसाच्या ढगांची प्रतिबिंबे मोहक दिसतात.

गाईड बरोबर जंगलातील थोडी पायवाट चालून एका छोट्या दोन डब्यांच्या रेल्वेत बसलो. दोन्ही बाजूंना बर्च, पाइन, ओक अशा सूचिपर्णी वृक्षांचे घनदाट जंगल होते. पाच मिनिटात गाडीतून उतरून परत चालायला सुरुवात केली. अनेक पायर्‍यांची चढ-उतर केली. छोट्या जंगलवाटेमधून ठिकठिकाणी निळ्या हिरव्या रंगांचे तलाव आणि त्यात अनेकांगांनी उड्या मारणारे असंख्य धबधबे यांचे नेत्रसुखद दर्शन होत होते. निसर्गाला अजिबात धक्का न लावता हे पायी चालण्याचे मार्ग तयार केले आहेत. वर्षानुवर्षे या चुनखडीच्या डोंगरांमधील कॅल्शिअम विरघळल्यामुळे ते सच्छिद्र झाले आहेत. या सातत्याने होणार्‍या प्रक्रियेमुळे या डोंगरातून येणारे झरे, धबधबे यांचा प्रवाह बदलत राहतो. वाहून गेलेल्या कॅल्शिअमचे पुन्हा लहान-मोठे दगड, बंधारे बनतात. त्यामुळे पाण्याच्या प्रवाहाचा ओघ बदलत राहतो. मोठे धबधबे निर्माण होतात. इथल्या लहान-मोठ्या सोळा सरोवरांपैकी एका सरोवरातून यांत्रिक बोटीतून फेरफटका मारला. किनाऱ्याजवळील मातकट रंगाच्या पाण्यातून बोट निळसर हिरव्या नितळ पाण्यात शिरली. किनाऱ्यावरील उंच, हिरव्या वृक्षांची छाया त्यात हिंदकळू लागली. गार गार वाऱ्याने शिरशिरी भरली होती. चालून चालून पाय दमले होते पण डोळे आणि मन तृप्त झाले होते.

घनदाट सूचिपर्ण वृक्षराजी आणि अनेक प्रकारच्या ऑर्किड्सनी समृद्ध अशा इथल्या जंगल दऱ्यांमध्ये जैवसमृद्धी आहे. अनेक प्रकारची फुलपाखरे, विविध पक्षी, वटवाघळे, तपकिरी अस्वल आणि अन्य वन्य प्राणी यांच्या नैसर्गिक सहजीवनाचे अस्तित्व कसोशीने जपलेले आहे वृक्षांच्या जुन्या ओंडक्यांचा उपयोग करुन त्यापासून लाकडी बाके, कडेचे लाकडी कंपाउंड, उपहारगृहांचे लाकडी बांधकाम, पाय वाटेवरून घसरू नये म्हणून बसविलेल्या लाकडाच्या गोल  चकत्या सारं तिथल्या निसर्गाशी एकरूप होणारं आहे. ट्रेकिंग, सायकलिंग, केबल कार,बोट रोईंग अशा अनेक प्रकारांनी धाडसी तरुणाई इथल्या निसर्ग वैभवाचा मुक्त आनंद घेत होती. प्लिटविक लेक्स नॅशनल पार्कला युनेस्कोने १९७९ साली वर्ल्ड नॅचरल हेरिटेज…. जागतिक नैसर्गिक वारसा संपत्ती असा दर्जा दिला आहे .

क्रोएशियाला शास्त्रीय संशोधनाची महान परंपरा आहे. आज दैनंदिन व्यवहारात आपण अनेक गोष्टींचा सहजतेने वापर करतो त्यातील कितीतरी महत्त्वाचे शोध येथील जगप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ निकोला टेस्ला ( Nikola Tesla १८५६–१९४३) यांनी लावले आहेत. त्यांची प्रयोगशाळा व ऑफिस असलेली इमारत झाग्रेब इथे बघायला मिळाली.

जगप्रसिद्ध शास्त्रज्ञ थॉमस एडिसन यांनी ज्यावेळी इलेक्ट्रिसिटीमध्ये डायरेक्ट करंटचा (DC ) शोध लावला त्याच वेळी निकोला टेस्ला यांनी अल्टरनेटिंग इलेक्ट्रिक करंटचा (AC ) शोध लावला. त्यामुळे इलेक्ट्रिकच्या  वापरामध्ये सुरक्षितता, सहज वहन व किमतीमध्ये बचत झाली. नुसते बटण दाबून इलेक्ट्रिकचे दिवे लावताना आपण निकोला टेस्ला यांची आठवण ठेवली पाहिजे. टीव्ही चॅनल्स बदलताना, एसी लावताना आपण रिमोट कंट्रोलचा वापर करतो त्याचे संशोधन निकोला टेस्ला यांचेच. फ्रीज, मिक्सर, वाशिंग मशीन, हेअर ड्रायर अशा अनेक वस्तू ज्यावर चालतात त्या इलेक्ट्रिक मोटरचा शोध टेस्ला यांनीच लावला. रेडिओचा शोध प्रथम मार्कोनी यांच्या नावावर होता. पण हा शोध टेस्ला यांनीच प्रथम लावल्याचे सिद्ध होऊन १९४ ३ साली त्यांना या संशोधनाचे पेटंट देण्यात आले. थर्मास, गॅस लायटर हेही त्यांचेच संशोधन!

त्यांच्या सन्मानार्थ इलेक्ट्रिक कारला टेस्ला असे नाव देण्यात आले आहे.

विसाव्या शतकापासून क्रोएशिया उद्योगधंदे, व्यापार, शैक्षणिक संस्था, दळणवळणाची साधने यांतही आघाडीवर राहिले आहे .मोठ्या पुलांची बांधणी, सस्पेन्शन ब्रिज, टर्बाइन्स, पॅरॅशूट जम्पिंग, आपण वापरत असलेले चष्मे हे संशोधन क्रोएशियातील शास्त्रज्ञांचे आहे. टीव्हीची सॅटॅलाइट डिश, असे अनेक महत्त्वाचे शोध लावले फाउंटन पेन चा शोध लावणारे पिकाला मास्टरयांच्या नावाची पेन फॅक्टरी अजूनही झाग्रेब मध्ये आहे .एमपी थ्री चा शोध इथलाच. क्रोएशियाच्या नवीन पिढीनेही हा वारसा पुढे नेला आहे. कार पार्किंग बाय टेक्स्ट मेसेज, सोलर पाॅवरवर चालणारा मोबाईल चार्जर बनविले आहेत. फेरारी, पोर्शे अशा कंपन्यांशी स्पर्धा करणारी इलेक्ट्रिक कार कंपनी झाग्रेब पासून जवळच आहे. केवळ 45 लाख लोकसंख्या असलेल्या या देशातील संशोधन निश्चितच कौतुकास्पद आहे.

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक–श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 80 ☆ जो मिला, सो मिला ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता “जो मिला, सो मिला । )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 80 ☆

☆ जो मिला, सो मिला ☆

चाहत थी कितनी , ग़मगुसार ना मिला

होना हो जो सो हो, किसी से क्या गिला

 

घाव सारे धो दिए, मिटा दिए निशान

जो फिर घाव दिखा, उसको मैंने सिला

 

दुनिया घूम डाली, क़रार था रूह में

सहलाया प्यार से, चाहत का फूल खिला

 

जिगर की डालियों पर. बहार ही बहार है

शुरू हो गया जैसे कोई, प्यार का सिलसिला

 

ग़मगुसार की चाहत नहीं, न ही कोई आहट

क़ुबूल किया मुस्कुराकर, जो भी मुझे मिला

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सकारात्मक कविता – विरासत ☆ श्री हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

☆ सकारात्मक कविता – विरासत ☆ हेमन्त बावनकर 

( एक सच्ची घटना से प्रेरित )

एक कोरोना संक्रमित

पिच्यासी वर्षीय बुजुर्ग ने

अपनी बेड

एक कोरोना संक्रमित युवा को

यह कह कर दे दी कि –

“ मैं तो अपनी जिंदगी जी चुका

और

इस नौजवान के सामने सारी जिंदगी पड़ी है”

 

तीन दिन बाद

वे संसार से चले गए

और

दे गए विरासत में काफी कुछ

जिसको लौटाया नहीं जा सकता

बस

दिया जा सकता है

अगली पीढ़ी को

विरासत में।

 

© हेमन्त बावनकर, पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 86 – लघुकथा – माता का भंडारा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  “लघुकथा – माता का भंडारा।  यह एक प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय कथानक है। इस महामारी में ऐसे प्रसंगों पर संवेदनशील निर्णय जरूरतमंदों के लिए सहायक ही नहीं होते अपितु समाज के सामने एक अनुकरणीय उदहारण भी होते हैं।  इस सार्थक रचना के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 86 ☆

? लघुकथा – माता का भंडारा ?

 

सिटी से दूर छोटी सी सुंदर कालोनी।

सभी लोग मिल जुल कर रहते थे होली हो, दीवाली हो, जगराता हो, बड़ा दिन हो, ईद हो या फिर कोई भी त्यौहार सभी मिलजुल कर मनाते थे।

अभी नवरात्रि का पर्व धूम-धाम से चल रहा था। चारों तरफ माता रानी के जयकारे लगाये जा रहे थे। विषम परिस्थितियो के कारण सभी बहुत उदास और घबराए हुए थे।

सारे विश्व में फैला हुआ कोरोना का भयानक मंजर से सभी सिहरे हुए थे। बस एक ही प्रार्थना दुआ आ रही थी कि किसी तरह कोरोना महामारी से रक्षा करो माता।

कालोनी में हर साल माता का भंडारा होता था। सभी बातें कर रहे थे कि इस बार क्या करें??? सभी का मन उदास था। मन भी नहीं मान रहा था कि भंडारा कराएं या नही कराए और कराए तो कोरोना का डर सता रहा था।

स्थिति को देखते हुए भंडारा नहीं करने का निर्णय लिया गया। यह आपस में बातचीत हो रही थी और यही चर्चा का विषय बना हुआ था।

एक फल वाला दादा कालोनी में रोज फल  लेकर आता था। बेचते-बेचते वह कालोनी में सभी को पहचानने लग गया था। कालोनी वाले भी वर्षों से उसको जान पहचान रहे थे।

उसके घर में उसकी पत्नी थी। बेटी को विवाह कर चुका था। लाकडाउन की वजह से वह दो चार दिनों से फेरी नहीं लगा रहा था। कालोनी में बातचीत हो रही थी कि दादा फल लेकर नहीं आ रहा हैं। कालोनी से थोड़ी दूर में वह अपनी पत्नी के साथ झुग्गी झोपड़ी बनाकर रहता था।

यह चर्चा काचल ही रही थी कि दादा ठेले में दो दर्जन केला लेकर आते हुए दिखाई दिया।

वह बहुत परेशान दिख रहा था। पूछने पर बताया कि… कहीं से कोई पैसे का इंतजाम नहीं हो पा रहा है और बिक्री भी नहीं हो रही है घर में कोई नहीं है और पत्नी बीमार चल रही है। कह कर वह फूट- फूट कर रोने लगा।

पुरी कालोनी इकट्ठी हो गई। देखते-देखते सभी लोग वहां पर खड़े हो गए और सब ने विचार किया। बातों ही बातों में उसका ठेला आटे का पैकेट दाल चांवल सब्जी और जरुरत के सभी सामानों से भर गया। ढेर सारे पैकेट्स से उसका ठेला भर चुका था।

फल वाले दादा की आंखों से आंसू बह निकले ।

आज तक ठेले पर फल बेचते आया था। आज पूरा सामान देख कर खुश हो गया और रोते-हंसते हुए बोला माता का भंडारा ऐसा भी होता है मैंने सोचा नहीं था।

आप सब लोग जुग-जुग जिए और कोरोना कभी आप लोग को छू भी न पाए।

कालोनी में एक डॉक्टर भी थे। उन्होंने कहा चलो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। फिर डॉक्टर साहब ने दादा की पत्नि की सेहत को देख कर उसे जरुरत की दवाई और कुछ विटामिन की शीशी देकर कहा.. तुम जरुरत पड़ने पर और भी सहायता ले लेना।

कालोनी वाले भी बहुत प्रसन्न हुए और सभी समझ चुके कि हमने माता का भंडारा बहुत अच्छे से करवा लिया। सभी खुश थे कि एक जरुरतमंद को हम सब ने साथ आकर सहायता कर माता का भंडारा करवा दिया और हमारा त्यौहार भी मन गया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 94 ☆ उल्हासित व्हा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 94 ☆

☆ उल्हासित व्हा ☆

हातमाग हा विणतो आहे धागा धागा

उभ्या आडव्या धाग्याने मग बनतो तागा

 

नात्याच्या ह्या वस्त्राचेही असेच असते

सूत आडवे उभ्या सुताच्या कुशीत घुसते

सूत वागते तसेच आपण सारे वागा

 

हृदयामधल्या बागेमधली फुले सुंगधी

उल्हासित व्हा प्रत्येकाला आहे संधी

मुठीएवढ्या हृदयी आहे प्रचंड जागा

 

ग्रीष्म ऋतूचे कामच आहे दाहकतेचे

होइल सिंचन धरतीवरती मग प्रेमाचे

जाइल हिरवा चारा देउन बुजविल भेगा

 

आयुष्याच्या वाटेवरती दुःख तोकडे

सुई एवढया दुःखाचेही तुम्हा वाकडे

किती राउळी धनवंतांच्या मोठ्या रांगा

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

[email protected]

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈

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