मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 5 ☆ पितृ दिवस विशेष – बाप..☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

(कवी राज शास्त्री जी (महंत कवी मुकुंदराज शास्त्री जी) का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप मराठी साहित्य की आलेख/निबंध एवं कविता विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मराठी साहित्य, संस्कृत शास्त्री एवं वास्तुशास्त्र में विधिवत शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत आप महानुभाव पंथ से विधिवत सन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक एवं समाज सेवा में समर्पित हैं। विगत दिनों आपका मराठी काव्य संग्रह “हे शब्द अंतरीचे” प्रकाशित हुआ है। ई-अभिव्यक्ति इसी शीर्षक से आपकी रचनाओं का साप्ताहिक स्तम्भ आज से प्रारम्भ कर रहा है। आज प्रस्तुत है पितृ दिवस के अवसर पर उनकी भावप्रवण कविता “बाप.. ”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 5 ☆ 

☆ पितृ दिवस विशेष – बाप.. ☆

 

काटा पायात रुततो

तरी तो तसाच राहतो

कुटुंब पोसण्या बाप

अजन्म लढत असतो…०१

 

काट्याचे कुरूप जाहले

बापाचा पाय सडला

रुतणाऱ्या काट्याने

पिच्छा नाही सोडला…०२

 

एक वेळ अशी येते

पायच तोडल्या जातो

उभ्या आयुष्याचा तेव्हा

स्तंभ सहज ढासळतो…०३

 

तरी हा पोशिंदा बाप

लढत पडत राहतो

त्याच्या रक्तात कधी

दुजा भावच नसतो…०४

 

पूर्ण आयुष्य बापाने

डोई भार वाहिला

कुटुंबास पोसण्या

दिस-वार ना पहिला…०५

 

ना रडला कधी बाप

ना कधी व्यथा मांडल्या

मोकळे आयुष्य जगतांना

कळा भुकेच्या सोसल्या…०६

 

असा बाप तुमचा आमचा

अहोरात्र झुंजला गांजला

का कुणास ठाऊक मात्र

बाप शापित गंधर्व का ठरला…०६

 

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन,

वर्धा रोड नागपूर,(440005)

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – प्रेम के सन्दर्भ में दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं।

आज 21 जून परम आदरणीय गुरुवर डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी के जीवन का अविस्मरणीय दिवस है। उनकी सुपुत्री डॉ भावना शुक्ल जी  एवं डॉ हर्ष तिवारी जी स्मरण  करते हैं  कि –  यदि आज आदरणीय माता जी स्व डॉ गायत्री तिवारी जी साथ होती तो हम सपरिवार उनके विवाह की 55वीं सालगिरह मनाते, योग दिवस मनाते।

? हम सब की और से पितृ दिवस पर उन्हें सादर चरण स्पर्श एवं इस अविस्मरणीय दिवस हेतु हार्दिक शुभकामनायें ?

 

 ✍  लेखनी सुमित्र की – प्रेम के सन्दर्भ में दोहे  ✍

 

नाम रूप क्या प्रेम का, उत्तर किसके पास।

प्रेम नहीं है और कुछ, केवल है अहसास।।

 

निराकार की साधना, कठिन योग पर्याय।

योग शून्य का शून्य में, शून्य प्रेम – संकाय ।।

 

गोप्य  प्रेम बहुमूल्य है, जैसे परम विराग ।

प्रकट प्रेम की व्यंजना, जैसे ठंडी आग ।।

 

आयु वेश की परिधि में, बंधे न बांधे प्यार ।

सागर रहता संयमित, रुके न रोके ज्वार ।।

 

सृष्टि समाहित प्रेम में, प्रेम अलौकिक गीत।

प्रेमिलता अनुभव करें, हृदयों का संगीत ।।

 

गोपनीय है प्रेम यदि, जाने केवल व्यक्ति ।

सहज प्रेम की सदा ही, होती है अभिव्यक्ति ।।

 

अंधा कहते प्रेम को, वही नयन विहीन।

दृष्टि दिव्य  हैं प्रेम की, करती ताप विलीन।।

 

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

9300121702

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 55 ☆ व्यंग्य – फिर प्रभु के दरबार में ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है  एक समसामयिक व्यंग्य  ‘फिर प्रभु के दरबार में’ऐसे अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 55 ☆

☆ व्यंग्य – फिर प्रभु के दरबार में ☆

हिम्मत भाई अखबार देखकर खुश हुए, बोले, ‘अच्छी खबर है। मन्दिर खुल गये। कल जाएंगे। ‘

पत्नी चिन्तित स्वर में बोली, ‘भीड़भाड़ में मत फँसना। ‘

हिम्मत भाई ने जवाब दिया, ‘सरकार ने नियम बना दिये हैं। छः फुट की दूरी रखना है,मास्क लगाना है, प्रसाद चढ़ाना या लेना नहीं है, घंटा नहीं बजाना है, भजन-कीर्तन मन में ही करना है। ‘

पत्नी बोली, ‘अभी बेकारी और भुखमरी फैली है। जूते चोरी करवाके मत आ जाना। ‘

हिम्मत भाई बोले, ‘अपने पुराने सिस्टम से चलेंगे, एक जूता इस छोर पर और दूसरा उस छोर पर। ढूँढ़ते रह जाओगे। ‘

दूसरे दिन हिम्मत भाई मन्दिर जाने को तैयार हुए,लेकिन तैयार होते होते रुक जाते थे,जैसे किसी दुविधा में हों। अचानक पत्नी से बोले, ‘जाने में झिझक हो रही है। ढाई महीने बाद भगवान को सूरत दिखाऊँगा। कहीं नाराज़ न हो गये हों। ज़रा सी मुसीबत आयी और हम भगवान को छोड़कर भाग खड़े हुए। ‘

पत्नी ने समझाया, ‘डर की कोई बात नहीं है। भगवान अन्तर्यामी हैं, करुणानिधान हैं। वे हमारी मजबूरी समझते हैं। ‘

हिम्मत भाई मन्दिर पहुँचे। वहाँ सब इन्तज़ाम चौकस था। बाहर दीवारों पर छिड़काव हो रहा था। भक्तों के लिए भीतर बाहर गोले बने थे। हाथ-पांव धोने के लिए इन्तज़ाम था। बार बार घोषणा हो रही थी कि एक बार में दस से ज़्यादा आदमियों का प्रवेश नहीं होगा, और भीतर पाँच मिनट से ज़्यादा नहीं रुकना है। यह भी कि पैंसठ से ऊपर के भक्त घर पर ही सुमिरन करें।

बाहर एक बुज़ुर्ग हाथ झटक झटक कर कुछ शिकायत कर रहे थे। कह रहे थे, ‘पैंसठ से ऊपर वालों को भगवान के दर्शन की रोक क्यों? भगवान के पास तो सबसे पहले उन्हीं को जाना है, फिर उन्हें रोकने से क्या फायदा? फिर यह भगवान की टैरिटरी है, यहाँ दुनिया भर की बन्दिशें लगाने का क्या मतलब? यहाँ तो भगवान की मर्जी के बिना परिन्दा भी पर नहीं मार सकता, वायरस की क्या मजाल? अभी तक भगवान आदमी की रक्षा करते थे, अब क्या हम भगवान के रक्षक बनेंगे?’

हिम्मत भाई लाइन में लग गये, लेकिन अभी भी चिन्तित थे। भगवान को कैसे मुँह दिखाएंगे? सोचते सोचते, धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे। उनकी गति देखकर मन्दिर का एक कर्मचारी चिल्लाया, ‘जल्दी आगे बढ़ो, भगत जी। कछुआ चाल मत चलो। ‘

हिम्मत भाई खिसकते खिसकते अन्दर मूर्ति के सामने पहुँच गये। थोड़ी देर आँखें झुकाये, मौन खड़े रहे, फिर हाथ जोड़कर बोले, ‘प्रभु,गलती माफ कर देना। ढाई महीने बाद हाज़िर हुआ हूँ। हम क्या करते, आपके पट ही बन्द हो गये थे। ‘

फिर बोले, ‘प्रभु, हम मनुष्य ऐसे ही हैं। वैसे तो आपको भजते थकते नहीं हैं, लेकिन संकट बड़ा होते ही हमारा भरोसा डगमगाने लगता है। फिर डाक्टर और अस्पताल की तरफ भागते हैं। अब बताइए, आपसे बड़ा डाक्टर कौन होगाऔर आपसे बेहतर दवा कहाँ मिलेगी?मुझे लगता है कि आपके मन्दिर के पट बन्द होना ठीक नहीं हुआ। ‘

हिम्मत भाई थोड़ा रुककर बोले, ‘प्रभु, मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार आपकी तरफ से होने वाले कुछ काम बन्द होने से आदमी का भटकाव बढ़ा है। पहला यह कि पहले आपके लोक से आकाशवाणी होती थी जिससे आपके ज़रूरी निर्देश मिल जाते थे। वह पूरी तरह बन्द हो जाने से आपसे संवाद नहीं होता। अब लोग रेडियो वाणी को ही आकाशवाणी मानते हैं। दूसरे, आपने हमारी धरती पर चमत्कार करना बन्द कर दिया है।  हम चमत्कार-प्रेमी लोग हैं। थोड़े बहुत चमत्कार होते रहें तो आपमें हमारी आस्था मज़बूत होती रहेगी। अभी ढोंगी लोग आपके नाम पर चमत्कार कर रहे हैं और अपनी जेबें भर रहे हैं। आकाशवाणी शुरू होने का एक फायदा यह होगा कि धरती पर जो अपने को भगवान समझते हैं वे कंट्रोल में रहेंगे। इसलिए ये दोनों काम जल्दी शुरू हो जाएं तो आदमी की बुद्धि भ्रमित नहीं होगी। ‘

इतना कह कर, एक बार फिर अपनी गलती की क्षमा माँगकर हिम्मत भाई मन्दिर से बाहर हो गये।

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 13 ☆ मुक्तिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपके मुहावरेदार दोहे. 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 13 ☆ 

☆ मुक्तिका☆ 

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

धीरे-धीरे समय सूत को, कात रहा है बुनकर दिनकर

साँझ सुंदरी राह हेरती कब लाएगा धोती बुनकर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

मैया रजनी की कैयां में, चंदा खेले हुमस-किलककर

तारे साथी धमाचौकड़ी मच रहे हैं हुलस-पुलककर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

बहिन चाँदनी सुने कहानी, धरती दादी कहे लीन हो

पता नहीं कब भोर हो गयी?, टेरे मौसी उषा लपककर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

बहकी-महकी मंद पवन सँग, क्लो मोगरे की श्वेतभित

गौरैया की चहचह सुनकर, गुटरूँगूँ कर रहा कबूतर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

सदा सुहागन रहो असीसे, बरगद बब्बा करतल ध्वनि कर

छोड़न कल पर काम आज का, वरो सफलता जग उठ बढ़ कर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: [email protected]

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 11 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 11/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 11 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

बस इतना सा असर होगा

हमारी यादों का

कि कभी कभी तुम बिना

बात मुस्कुराओगे…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

The only effect of my

Memories will be that

  Sometimes without any

Reason you will smile…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

काश मिल जाये हमें भी

कोई किसी आईने की तरह

जो हँसे भी साथ साथ

और रोये भी साथ साथ…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

Wish I could also have

 Someone like a mirror

  Who could laugh together

    And  even  cry together …

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

उन्हें  ठहरे…

समुंदर  ने  डुबोया

जिन्हें  तूफ़ाँ  का…

अंदाज़ा  बहुत  था…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

Calm seas…

drowned them only…

Who claimed to have great 

experience of braving the storms

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – वो वीर तिरंगे का वारिस था ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण , समसामयिक एवं ओजस्वी रचना  – वो वीर तिरंगे का वारिस था।  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  वो वीर तिरंगे का वारिस था ☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

जलाया होगा खुद का जिस्म बारूद गोलों से,

और फिर अनेकों गोलीयां सीनें पर खाई होगी।

दुश्मन के खून से खेली होगी सीमा पर होली,

इस तरह वतन परस्ती की रस्म निभाई होगी।।1।।

हिम्मत से मारा होगा दुश्मन को सरहद पे,

इस तरह मां की आबरू उसने बचाई होगी।

पहना होगा तिरंगे का कफन हमारी खातिर,

इस तरह अपनी‌ पूंजी वतन पे लुटाई होगी।।2।।

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

घर बार वतन वो छोड़ चला,चमन चहकता छोड़ चला ।

दुश्मन की कमर तोड़ने वह,अंधी मां को घर छोड़ चला।

गलियों में गांव के पला बढ़ा, सबका राज दुलारा था।

अंधी की कोख से पैदा था, उसके जीवन का सहारा था।।1।।

आंखों से देख सकी न उसे, खुशबू  से पहचानती थी।

पदचापों की आहट से, वह अपने लाल को जानती थी।

जब लाल सामने होता तो, उसको छू कर दुलराती थी।

मुख माथा चूम चूम उसका, उसको गले लगाती थी।।2।।

वह पढ़ा लिखा जवान हुआ, सेना का दामन थाम लिया था ।

उस दिन टटोल वर्दी हाथों से,  मां ने उसको सहलाया था।

अब वतन लाज तेरे हाथों, वर्दी  का मतलब बतलाया था।

उसको गले लगा करके,अपनी ममता से नहलाया था।।3।।

 

वतन पे मरने का मकसद ले, सरहद की तरफ बढ़ा था वह।

अपने ही वतन के गद्दारों की,  नजरों में आज चढ़ा था वह।

जम्मू कश्मीर जल रहा था, थे नौजवान बहके बहके।

आगे दुश्मन की गोली थी, पीछे हाथों में पत्थर थे।।4।।

 

वह अभिमन्यु बन चक्रव्यूह में,खड़ा खड़ा बस सोच रहा।

समझाउं उसको या मारूं,  ना समझ पड़ा बस देख रहा।

क्या करें वो कैसे समझाये, कानून के हाथों बंधा हुआ।

सीने में गोली सिर पे पत्थर,खाता फिर भी तना हुआ ।।5।।

पीछे अपनों के पत्थर है, आगे दुश्मन की ‌गोली है।

मेरे शौर्य उठती उंगली है कुछ लोगों की कड़वी  बोली है।

इस तरह खड़ा कुछ सोच रहा, उसको बस समझ नहीं आया।

अपनों से बच गैरों से निपट यह सूत्र काम उसके आया।।6।।

अपनों की मार सही उसने,उफ़ ना किया ना हाथ उठा,

अंतहीन लक्ष्य साथ ले सरहद पे चला वह क़दम बढ़ा।

अपनी तोपों के गोलों से दुश्मन का हौसला तोड़ दिया। ।

पीछे को दुश्मन भाग चलाउनके रुख को वह मोड़ दिया ।।7।।

 

धोखे से बारूद पे पांव पड़े तब उसमें विस्फोट  हुआ।

मरते मरते जय हिन्द बोला सरहद पे उसकी जली चिता।

सरहद पे जिसकी चिता जली वो असली हिंदुस्तानी था।

जो जाति धर्म से ऊपर उठकर मातृभूमि बलिदानी था ।।8।।

कर्मों से इतिहास ‌लिखा इक अंधी मां का बेटा है।

उसने भी अपने सीने में इक हिंदुस्तान ‌समेटा है।

अपनों के नफरत‌ से वह  घायल था बेहाल था।

वो वीर तिरंगे का वारिस था भारत मां का लाल था ।।9 ।।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 16 ☆ दिवाना ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  श्रृंगारिक कविता “दिवाना“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 16 ☆

☆ दिवाना

अगं मी तुझा दिवाना, आता नको बहाना

खुणवूनी दूर जाशी, ये बाहूपाशी ये नां !!

 

तुझी ती मयुरचाल, अन् ते हेलकावे

एका लयीत हलती, कानातली ती बाळे

घायाळ मजशी केले, फेकून नयनबाणा

अगं मी तुझा दिवाना…..!!

 

रसदार ओठ दोन्ही, अन् केस रेशमाचे

गालातली खळी ती, नयनात मोर नाचे

किती वेळ खेळशी गं, हा खेळ जीवघेणा

अगं मी तुझा दिवाना……..!!

 

तू रात्रभर पौर्णिमेची, दुग्धात नाहलेली

तू शुक्रतारका गं, पहाटेस चिंब ओली

तुज संगमरवरीला, बिलगून राहू दे नां

अगं मी तुझा दिवाना……..!!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 9 – दादा साहब फाल्के….3 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : दादा साहब फाल्के…. पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 9 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : दादा साहब फाल्के….3 ☆ 

जब विवाद बहुत बढ़ गया तो कम्पनी ने फ़िल्म निर्माण का ज़िम्मा उनके साथ पहली फ़िल्म से जुड़े साथियों मामा शिंदे, अन्ना सालुंखे, गजानन साने, त्र्यम्बक बी तेलंग, दत्तात्रेय तेलंग और नाथ तेलंग को सौपने का निर्णय किया। उन सब के द्वारा ज़िम्मेदारी लेने पर फाल्के को क्षतिपूर्ति भुगतान नहीं करना होगा। फाल्के ने बहुत दुखी मन से कम्पनी और बम्बई छोड़कर काशी प्रवास का निर्णय किया और सबकुछ त्याग कर सपरिवार काशी चले गए। उन्होंने पूरी कहानी नवयुग नामक अख़बार में प्रकाशित करवाई।

वे काशी में पुराने मित्र नारायण हरी आपटे से मिलकर घुमंतू नाटक संस्था “किर्लोसकर नाटक मंडली” से जुड़ गए जिसमें शंकर बापू जी मजूमदार, मनहर बर्वे और गणपत राव बर्वे कार्यरत थे। उन्होंने तात्कालिक नाट्य स्थिति पर व्यंग करते हुए मराठी में रंगभूमि नाटक लिखा। तभी बाल गंगाधर तिलक और पुराने साथी जी. एस. खपार्डे कांग्रेसी अधिवेशन में भाग लेने आए, उन्हें नाटक सुनाया तो उन्होंने आर्यन सिनेमा पूना में नाटक का मंचन शुरू करवाया  जो एक साल चला। नाटक का मंचन बम्बई के बलिवला थिएटर में 1922 में हुआ, उसके बाद नासिक में मंचित हुआ। उसके बाद फाल्के काशी में जम गए।

उन्होंने जमशेद जी के मदन थिएटर के लिए फ़िल्म बनाने का प्रस्ताव सहित अनेकों प्रस्ताव ठुकरा दिए तब संदेश अख़बार के सम्पादक अच्युत कोलहाटकर ने उनसे निर्णय बदल कर फ़िल्मी दुनिया में फिरसे आकर फ़िल्म बनाने का सुझाव दिया जिसके उत्तर में फाल्के ने पत्र में लिखा कि “फ़िल्मों के लिए फाल्के मर चुका है।” अच्युत कोलहाटकर ने वह पत्र संदेश अख़बार में छाप दिया, जिसके जवाब में सैंकड़ों की संख्या में पाठकों के पत्र आए, वे भी उन्होंने अख़बार में छापे और सारे अख़बार फाल्के को भेज दिए।

फाल्के तुरंत नासिक आ गए तब पूना की पुरानी हिंदुस्तान सिनेमा कम्पनी के साथियों वामन आपटे और बापू साहेब पाठक ने उनको बतौर फ़िल्म निर्माण मुखिया का पद 1,000 रुपया मासिक पर निमंत्रित किया जिसे उन्होंने मंज़ूर कर लिया। उन्होंने 1922 से 1929 तक कुछ फ़िल्मे बनाईं लेकिन नहीं चलीं उनका वेतन 1,000 से 500 और फिर 250 मासिक कर दिया गया। उन्होंने फाल्के डायमंड कम्पनी के बैनर तले बम्बई में माया शंकर भट्ट से 50,000 रुपयों की सहायता से सेतुबंधन फ़िल्म बनाना शुरू किया जिसकी शूटिंग हम्पी, चेन्नई और रत्नागिरी में हुई। धन की कमी से फ़िल्म रुक गई। वामन आपटे ने फाल्के डायमंड कम्पनी को हिंदुस्तान सिनेमा कम्पनी में विलय की शर्त पर फ़िल्म दो साल में पूरी करवाई। वह फाल्के की अंतिम फ़िल्म के पहले की फ़िल्म थी। वह पहली बोलती फ़िल्म 14 मार्च 1931 को प्रदर्शित हुई तब आलमआरा के निर्देशक अर्देशिर ईरानी ने उसे 40,000 खर्चे पर हिंदी में डब करवाकर प्रदर्शित करवाया।

कोल्हापुर रियासत के महाराजा रामराम-III ने दिसंबर 1934 में फाल्के को कोल्हापुर सिनटोन के लिए फ़िल्म बनाने हेतु आमंत्रित किया, फाल्के ने पहले मना कर दिया दोबारा आमंत्रण 1,500 स्क्रिप्ट लिखने और 500 मासिक खर्चे पर मंज़ूर कर लिया।

उपन्यासकार नारायण आपटे ने कहानी और स्क्रिप्ट लिखने में सहयोग किया और विश्वनाथ जाधव ने संगीत देकर “गंगा अवतरण” फ़िल्म 2,50,000 रुपयों की लागत से दो साल के समय में 1937 में बनकर तैयार हुई। वह फाल्के द्वारा बनाई गई एकमात्र सवाक् याने बोलने वाली फ़िल्म थी।

समय के साथ फ़िल्म तकनीक, निर्देशन, संगीत, गायन और कथानक के उतार चढ़ाव में बड़े परिवर्तन हो  चुके थे। फाल्के जिनसे तादात्म्य नहीं बिठा पाए क्योंकि वे काशी जाकर फ़िल्म की मुख्य धारा से कट चुके थे। 16 फ़रवरी 1944 को जन्मस्थान नासिक में उनका निधन हो गया।

उनकी अन्य फ़िल्मों की सूची इस प्रकार है।

लंका दहन (१९१७),श्री कृष्ण जन्म (१९१८), कलिया मर्दन (१९१९), बुद्धदेव (१९२३), भक्त प्रहलाद (१९२६)

भक्त सुदामा (१९२७), रूक्मिणी हरण (१९२७)

रुक्मांगदा मोहिनी (१९२७), द्रौपदी वस्त्रहरण (१९२७)

हनुमान जन्म (१९२७), नल दमयंती (१९२७)

परशुराम (१९२८), श्रीकृष्ण शिष्टई (१९२८)

काचा देवयानी (१९२९), चन्द्रहास (१९२९)

मालती माधव (१९२९), मालविकाग्निमित्र (१९२९)

वसंत सेना (१९२९), संत मीराबाई (१९२९)

कबीर कमल (१९३०), सेतु बंधन (१९३२)

गंगावतरण (१९३७)- दादा साहब फाल्के द्वारा निर्देशित पहली बोलती फिल्म है।

कोल्हापुर नरेश के आग्रह पर 1937 में दादासाहब ने अपनी पहली और अंतिम सवाक फिल्म “गंगावतरण” बनाई। दादासाहब ने कुल 125 फिल्मों का निर्माण किया। 16 फ़रवरी 1944 को 74 वर्ष की अवस्था में पवित्र तीर्थस्थली नासिक में भारतीय चलचित्र-जगत का यह अनुपम सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया। भारत सरकार उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष चलचित्र-जगत के किसी विशिष्ट व्यक्ति को ‘दादा साहब फालके पुरस्कार’ प्रदान करती है।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 48 – आयुर्वेद और अमृत तत्व ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  आयुर्वेद और अमृत तत्व। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 48 ☆

☆ आयुर्वेद और अमृत तत्व

आयुर्वेद हमारे शरीर, मस्तिष्क और प्रकृति को समझने में सहायता कर सकता है, और प्रकृति के स्वरूप को पहचानने में सक्षम है ताकि हम उस प्रकृति के स्वरूप को हमारे शरीर के भीतर भी देख सके ।

प्रकृति के तीन गुण हमारे मस्तिष्क को नियंत्रित करते हैं; हमारे शरीर की संरचना और आस-पास की प्रकृति के लिए पाँच तत्व जिम्मेदार हैं और छह स्वाद शरीर और मस्तिष्क  के बीच संबंध को नियंत्रित करते हैं । हम छह चक्र, तीन गुण, पाँच तत्व, छः स्वाद, और दस इंद्रियों की अभिव्यक्ति है । ये 24 असीमित आत्मा को सीमित या शरीर और मस्तिष्क से बंधे हुए हैं ।

हमें अपने शरीर और मस्तिष्क को प्रकृति के साथ समक्रमिक करने के लिए तीन नियमों का पालन करना होगा । सबसे पहले हमारे शरीर और मस्तिष्क को पर्यावरण, मौसम और आसपास के वातावरण इत्यादि के ताल के साथ ताल मिलाना है । दूसरा आसपास के साथ संरेखण है; और तीसरा बाहरी प्रकृति की हमारे शरीर की आंतरिक प्रकृति के साथ ध्रुवीयता है ।

अब मैं आपको आयुर्वेदिक दोषों के विषय में बताऊँगा । पहला कफ है जो वास्तव में पृथ्वी और जल तत्वों का संयोजन है । यह शरीर की स्थिरता और स्नेहन, ऊतक और शरीर के अपशिष्ट को नियंत्रित करता है । कफ सेल की संरचना को भी नियंत्रित करता हैं और स्रावों और पाचन अंगों को संरक्षित करने वाली चिकनाई को भी नियंत्रित करता हैं । मस्तिष्क में कफ एक समय में एक विचार को समझने के लिए मस्तिष्क के लिए आवश्यक स्थिरता प्रदान करता है । कफ की प्रकृति तेलीय, ठंडी, भारी, स्थिर, घनी और चिकनी है ।

दूसरा दोष पित्त है जो वास्तव में पानी और अग्नि तत्वों का संयोजन है । यह शरीर के संतुलन और संभावित ऊर्जा के संतुलन को नियंत्रित करता है । सभी पित्त की प्रक्रियाओं में पाचन शामिल है । इसके अतरिक्त पित्त कोशिकाओं के कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करने के लिए पोषक तत्वों का पाचन करता है । मस्तिष्क में पित्त नए सूचना को संसाधित करता है और निष्कर्ष निकालता है । पित्त की प्रकृति तेलीय, गर्म, हल्की, तीव्र, तरल आदि है ।

तीसरे दोष के विषय में केवल कुछ लोग जानते हैं, यह अग्नि और वायु तत्वों का संयोजन है । यह विभिन्न अंगों की सतह के साथ शरीर की ऊर्जा के आंदोलन के लिए ज़िम्मेदार होता है ।

चौथा दोष वात है जो वायु और आकाश तत्वों का संयोजन है । यह शरीर में गतिशील ऊर्जा का सिद्धांत है, मुख्य रूप से तंत्रिका तंत्र से संबंधित है और सभी शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है । यह पोषक तत्वों को कोशिकाओं में अंदर एवं अपशिष्ट को बाहर ले जाता है । यह भोजन को निगलने और चबाने के लिए भी जिम्मेदार है । मस्तिष्क में यह नयी सूचनाओं की तुलना में स्मृति से व्यापक सूचना पुनर्प्राप्त करता है । इसकी प्रकृति शुष्क, ठंडा, हल्का, अनियमित और गतिशील है ।

पाँचवे दोष के विषय में महान ऋषियों को छोड़कर और कोई नहीं जानता है यह आकाश और छठा चक्र के तत्व महत या ब्रह्मंडीय बुद्धि का सयोजन होता है यह आध्यात्मिक प्रथाओं की इच्छाओं और भावनाओं के लिए जिम्मेदार है ।

अब अगर हम शरीर में देखते हैं, तो दो प्रकार की क्रियाओं से एक बीमारी उत्पन्न हो सकती है । पहली एक दूसरे के साथ दोषों के असंतुलन से होती है जैसे कि कभी-कभी वात बढ़ता है और कफ और पित्त कम हो जाते हैं, और इसी तरह अन्य दोषों के लिए ।  दूसरी, दोषों की आंतरिक संरचना से, जैसे कि कफ दोष, जो पृथ्वी और जल का संयोजन है- यदि पृथ्वी का तत्व बढ़ता है और जल कम हो जाता है, तो यह गुर्दे में पत्थरी की तरह की बीमारी पैदा कर सकता है, इसी तरह यदि विपरीत हो अर्थात पृथ्वी तत्व कम हो जाये और जल तत्व बढ़ जाये तो अन्य विपरीत समस्याएँ हो सकती है, और इसी तरह अन्य दोषों के लिए ।

इस परिदृश्य के अनुसार शरीर और मस्तिष्क की कुल संभावित बीमारियों की संख्या 45 है और शेष इन 45 बीमारियों की ही उप श्रेणियाँ हैं ।

अगर हम अपने स्वाद कलियों के छह स्वाद देखें । मीठा स्वाद पृथ्वी और जल तत्वों का संयोजन है, खट्टा पृथ्वी और अग्नि तत्वों का संयोजन है, नमकीन स्वाद जल और अग्नि तत्वों का संयोजन है, तीखा स्वाद अग्नि और वायु तत्वों का संयोजन है कड़वा वायु और आकाश तत्वों का संयोजन है और कसैला वायु और पृथ्वी तत्वों का संयोजन है ।

क्या आप प्रकृति को नियंत्रित करने के स्तर पर आत्मनिर्भर बनाने के विषय में जानते हैं, सृजन का पूरा अनुक्रम है । भोजन से रस बनता है । रस से रक्त, रक्त से माँस बनता है । माँस से मैदा, मैदा से हड्डिया बनती है और हड्डियों से मज्जा धातु जिसे शरीर का सार कहते हैं जब इसे शरीर में बनाए रखा जाता है तो यह सघन होकर रोशनी उत्पन्न करता है । जो ओजस होता है तपस्या के द्वारा ओजास को तप में परिवर्तित किया जाता है, और तप से व्यक्ति सिद्ध या प्रकृति का नियंत्रक बन जाता है ।

मैंने पहले ही बताया है कि हम जो ठोस भोजन खाते हैं वह तीन भागों में विभाजित होता है सकल या स्थूल अपशिष्ट या मल के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है, मध्यम माँस का निर्माण करता है, और सूक्ष्म भाग मन बन जाता है ।

इसी प्रकार हम जिस तरल को पीते हैं वह तीन भागों में विभाजित होता है स्थूल भाग मूत्र के रूप में अपशिष्ट होता है, मध्यम रक्त बन जाता है, और सूक्ष्म प्राण बन जाता है ।

इसी तरह ‘तेज’ या चिकनाई जो हम खाते हैं तीन भागों में विभाजित हो जाता है सकल या स्थूल से हड्डी बनती है, मध्यम से मज्जा, और सूक्ष्म हमारी जुबान या बोलने की शक्ति बन जाती हैं ।

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे # 38 – वसुंधरा ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  आज प्रस्तुत है श्रीमती उर्मिला जी की  वर्षा ऋतू पर आधारित रचना  “वसुंधरा ”।  उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ केल्याने होतं आहे रे # 38 ☆

☆ वसुंधरा ☆ 
 

आला पाऊस आला पाऊस !

जलधारांच्या माळा घेऊन !!

 

भिजली धरणी जलधारांनी !

हरित तृणांचे लेणे लेऊनी !!

 

सजली जणू नववधू लाजरी !

हिरवा रेशमी शालू लेऊनी !

दिसते किती छान गोजिरी !!

 

ढगाआडुनी सखा डोकवी !

दिसते कशी मज सखी साजणी !

 

पाहुनी ही सुंदरा वसुंधरा !

सखा झाला कावरा बावरा !!

सखा झाला कावरा बावरा!!

 

©️®️उर्मिला इंगळे

सातारा

दिनांक:१७-६-२०

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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