💐 ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ विशेष ☆ हेमन्त बावनकर 💐
हेमन्त बावनकर
प्रिय मित्रों,
एक वर्ष के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि सुमित्र जी नहीं रहे। ऐसा लगता है कि उनसे कल ही तो बात हुई थी। किन्तु, मृत्यु तो अटल सत्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वजनों को शारीरिक रूप से अवश्य छोड़ कर चले गए किन्तु, उनकी स्मृतियाँ सदैव उनकी पीढ़ी एवं वर्तमान पीढ़ी के मस्तिष्क में आजीवन रहेंगी।
सुमित्र जी से पहली मुलाक़ात मेरे स्व. पिताश्री टी डी बावनकर जी (सुमित्र जी के मित्र) के साथ 1982 की एक शाम को उनके निवास पर हुई। उसके बाद एक ऐसा संबंध बना जो आजीवन चलता रहेगा। उनके द्वारा प्रकाशित मेरी प्रथम कहानी “चुभता हुआ सत्य’ नवीन दुनिया के पाक्षिक तरंग के प्रवेशांक में प्रकाशित हुई थी। उनके पत्र एवं तरंग की प्रति मेरे पास अभी तक सुरक्षित है।
मेरी उपरोक्त स्मृति तो मात्र एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, उनसे जुडने वाले अनेकों मित्रों का जिन्हें उन्होने आजीवन अपना आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन दिया है। ऐसी अनेक कहानियाँ और संस्मरण आपको संस्कारधानी के साहित्य जगत में ही नहीं अपितु सारे विश्व के कई मित्रों में मिलेगी।
ई-अभिव्यक्ति के प्रथम अंक के लिए उनके आशीष स्वरूप प्राप्त कविता उद्धृत कर रहा हूँ जो मुझे ई-अभिव्यक्ति के सम्पादन में सदैव सकारात्मक मार्गदर्शन देती रहती है।
संकेतों के सेतु पर
साधे काम तुरंत |
दीर्घवयी हो जयी हो
कर्मठ प्रिय हेमंत
०
काम तुम्हारा कठिन है
बहुत कठिन अभिव्यक्ति
बंद तिजोरी सा यहां
दिखता है हर व्यक्ति
०
मनोवृति हो निर्मला
प्रकटें निर्मल भाव
यदि शब्दों का असंयम
हो विपरीत प्रभाव ||
०
सजग नागरिक की तरह
जाहिर हो अभिव्यक्ति
सर्वोपरि है देशहित
बड़ा न कोई व्यक्ति|
स्थान – दिल्ली 15 /10/18
मित्र श्री संतोष नेमा जी ने हाल ही में ‘सुमित्र संस्मरण’ प्रकाशित किया है। जिसमें 60 से अधिक लोगों के संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं। श्री नेमा जी के शब्दों में ही “साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें.”
सुमित्र जी के अनेकों स्वजनो के अनेकों संस्मरण हैं जो आजीवन उनकी याद दिलाते रहेंगे। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर यह विशेष संस्करण भी मात्र एक प्रतीक ही है।
इस प्रयास में हम आपके संस्मरणों/विचारों को श्रद्धासुमन स्वरूप स्मृतिशेष डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी को समर्पित करते है।
बस इतना ही।
हेमन्त बावनकर, पुणे
वर्तमान में बेंगलुरु से
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
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