☆ सूचनाएँ/Information ☆
(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)
☆ दुष्यंत की कहानियों का पाठ और चर्चा ☆ साभार – श्री सुरेश पटवा ☆
भोपाल। दुष्यंत संग्रहालय में दुष्यन्त कुमार की 50वीं पुण्यतिथि वर्ष के उपलक्ष्य में उनकी कहानियों का पाठ एवं चर्चा का आयोजन वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी की अध्यक्षता और प्रसिद्ध उपन्यासकार चंद्र भान राही के मुख्य आतिथ्य में राज सदन में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सुनीता शर्मा की सरस्वती वंदना से हुआ।
संस्था की निदेशक करुणा राजुरकर ने वर्ष भर आयोजित किए जा रहे कार्यक्रम की रूपरेखा रखी। तत्पश्चात संयुक्त सचिव लेखक सुरेश पटवा ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि दुष्यंत केवल कवि और ग़ज़लकार ही नहीं थे। उन्होंने विशद गद्य लेखन भी किया। उन्होंने सात कहानियाँ और चार उपन्यास भी लिखे हैं। जो आम आदमी का दर्द बयान करती हैं। सभी दुष्यंत रचनावली के तीसरे खंड में संग्रहित हैं। “आघात” उनका भाई को खोने का निजी दुख का संस्मरण है। “कलियुग” साहूकारी शोषण पर आधारित है। “मिस पीटर” स्त्री विमर्श की कहानी है। “छिमिया” एक स्वाभिमानी नौंकरानी पर केंद्रित है। “मड़वा उर्फ माड़े” ग्राम सेवा पर जान लुटाने वाले स्वाभिमानी देसी ग्रामीण की कहानी है। “हाथी का प्रतिशोध” जंगल पर इंसानों के होते क़ब्ज़े की दास्तान बयान करती है। “मुसाफ़िर” रेल यात्रा पर एक अधूरी कहानी है।
गोकुल सोनी ने अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए कहा कि एक कथा लेखक की पैनी दृष्टि समकालीन समाज के परिवर्तनों पर होना चाहिए। लेखक का समय के सापेक्ष होना बहुत आवश्यक है। उसका दायित्व है कि वह अपने समय की अच्छाइयों और दुष्प्रवृत्तियों पर ईमानदारी से अपनी कलम, चलाए। दुष्यंत कुमार “कलियुग” जैसी कहानी लिखकर, स्त्री अस्मिता, स्वाभिमान, एवं गरीबों के शोषण पर लिखकर सहज ही प्रेमचंद के करीब खड़े नजर आते हैं।
चन्द्रभान राही ने उपस्थित साहित्य रसिकों को अवगत कराया कि “दुष्यंत ग़ज़लकार के रूप में अद्वितीय हैं जो हर आन्दोलन की आवाज बनते हैं। यह आग ही तो है जो भीतर जलती है।”
डॉक्टर अनिता चौहान ने “मिस पीटर” का, अरविंद मिश्र ने मुसाफिर और सुधा दुबे ने माड़े उर्फ मड़वा कहानी का पाठ किया।
कार्यक्रम का सरस संचालन जयन्त भारद्वाज ने किया। आभार प्रदर्शन संस्था के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने किया।
साभार – श्री सुरेश पटवा, भोपाल
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈