श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हरफनमौला ।)

?अभी अभी # 614 ⇒  हरफनमौला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिन्हें अरबी फारसी नहीं आती, वे हरफनमौला को उर्दू शब्द मानते हैं। जिन्हें उर्दू नहीं आती, वे इसे मुसलमानों का शब्द मानते हैं। एक बहुमुखी व्यक्ति, जो कई चीजों में विशेषज्ञ है, हरफनमौला कहलाता है। क्रिकेट की भाषा में इसे आल राउंडर कहते हैं। कपिल दा जवाब नहीं।

एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी को आप अंग्रेज़ी में multifaceted talent भी कह सकते हैं। बहुविज्ञता ही बहुमुखी प्रतिभा है। एक मुख वाली प्रतिभा के धनी तो हमने देखे है, बहुमुखी प्रतिभा के धनी की तो बात ही और है। अंग्रेज़ी में एक शब्द और है, jack of all! सभी विषयों की थोड़ी थोड़ी जानकारी रखना क्या बुरा है। लेकिन यह वाक्य अधूरा है। जब इसके आगे, master of none, लगता है, तब इसका अर्थ पूरी तरह बदल जाता है।।

जो किसी एक विषय के जानकार होते हैं, उनसे आप किसी अन्य विषय के बारे में बातचीत नहीं कर सकते। मैं मेरे कितने ही दोस्तों को जानता हूं, उनका जीवन सिर्फ शेयर मार्केट बनकर रह गया है। जिस तरह कुछ लोग दिन भर टीवी पर न्यूज़ लगाए बैठे रहते हैं, ये लोग हमेशा सेंसेक्स पर नजर गड़ाए बैठे रहते हैं। एक छोटे से उतार चढ़ाव में लाखों के बारे न्यारे हो जाते हैं। यही इनकी ज़िन्दगी है, खून पसीने की कमाई है।

लाला हरदयाल की एक पुस्तक है, Hints for Self-Culture. इसका प्रथम संस्करण सन् १९३४ में प्रकाशित हुआ था।

इस पुस्तक का अब हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। इस पुस्तक में जीवन के हर पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। यहां केवल भारतीय संस्कारों का जिक्र नहीं है, स्वयं के व्यक्तित्व के विकास के लिए, किन किन विषयों की जानकारी आवश्यक है, उनका विस्तारपूर्वक विवेचन, हर विषय को लेकर किया गया है। व्यक्ति के बौद्धिक, और शारीरिक विकास के साथ कलात्मक विकास की भी चर्चा की गई है इस पुस्तक में। साहित्य से इतर जितनी भी ललित कलाएं हैं, उनकी चार अध्यायों में विस्तृत व्याख्या इस पुस्तक की मुख्य विशेषता है।।

जानना ही ज्ञान है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं ! सही समय पर ज्ञान का उपयोग, सदुपयोग है, अनावश्यक ज्ञान का प्रदर्शन व्यक्ति को दंभी और अहंकारी बनाता है। जो ज्ञानी कम बोलते हैं, उनसे और अधिक जानने की उत्सुकता रहती है। लेकिन जो अधूरे ज्ञान का ढोल पीटा करते हैं, उनके लिए ही शायद यह कहावत बनी हो। थोथा चना, बाजे घना।

व्यक्ति हो या व्यक्तित्व, गंभीरता और गहराई जीवन में परिपक्वता लाती है। आम का पेड़, जब फलों से लद जाता है, तो उसकी डालियां झुक जाती हैं। बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। बोलने में भी अगर मितव्ययिता हो, जहां बोलना ज़रूरी हो वहीं बोला जाए, मृदु भाषी भी अगर हों, तो सोने में सुहागा। गागर में सागर केवल शब्दों में ही संभव है। मीन तो बेचारी सागर में भी प्यासी ही रह जाती है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

0 0 votes
Article Rating

Please share your Post !

Shares
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments