॥ श्री रघुवंशम् ॥
॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥
☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #16 (81 – 85) ॥ ☆
रघुवंश सर्ग : -16
कुमुद नाग ने गर्व से सिर उठा समझ गरुड़ास्त्र की महिमा का भेद खोला।
तनय राम के कुश जो थे शत्रुहंता से करके नमन यों विनत स्वर में बोला।।81।।
मैं जानता हूँ कि तुम विष्णु के रूप श्रीराम के पुत्र कुश हितमना हो।
भला आपके नेह की, पूज्य जो है, क्यों किसी भी भाँति अवमावना हो।।82।।
उछाले गये गेंद को झेलती सी, गगन से उतरती हुई ज्योति के सम।
तुम्हारे विजय शील इस आमरण को, जिस जल में लख रख कुमुद ने लियादम।।83।।
तो जो भूमि रक्षा के हित अर्गला संग है आजानु बाहू ज्या-आघात-चिन्हित।
से भुंजबंध इसका हो संयोग फिर से, यह अब हमारा मनोरथ है निश्चित।।84।।
हे कुश इसके अपहरण अपराध का दण्ड, अनुजा कुमुद को कृपा कर यों दीजै।
कि चिरकाल इसको चरण सेवा में अपनी दासी बना लेना स्वीकार कीजे।।85।।
© प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈